Monday, 7 October 2019

प्रकृति, पर्यावरण और प्रगति में समन्वय जरूरी



महात्मा गांधी की 150 वीं जयन्ती से देश भर में एक बार उपयोग कर फेंक दी जाने वाली प्लास्टिक ( सिंगल यूज) की चीजों पर रोक का अभियान चल पड़ा है। केंद्र सरकार ने दिल्ली स्थित अपने दफ्तरों से इसकी शुरुवात भी कर दी। रेलवे ने प्लास्टिक के कप की जगह मिट्टी के कुल्हड़ वापिस लाने की पहल कर दी है। प्लास्टिक की थैलियों के स्थान पर कपड़े के थैले के उपयोग हेतु जन सामान्य से आग्रह किया जा रहा है। पर्यावरण के प्रति संवेदनशील लोग पालीथिन के उपयोग को रोकने के प्रति पहले से ही प्रयत्नशील थे। प्लास्टिक की घटिया चीजों को बनाने पर सरकारी रोक भी लागाई जा चुकी है। यद्यपि उसका अपेक्षित असर नहीं हुआ लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि उससे होने वाले नुकसानों के बारे में काफी बड़े वर्ग में जागरूकता आई। प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण को लेकर पूरे देश में सकारात्मक वातावरण नजर आना निश्चित्त रूप से आश्वस्त करता है। लेकिन अभी भी लापरवाही बरतने वाले तुलनात्मक रूप से ज्यादा हैं। इस वर्ष देश के अनेक हिस्सों में अतिवृष्टि होने से अनेक शहरों में जल प्लावन के हालात बन गये। देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में तो प्रति वर्ष बारिश के समय पानी भर जाने से लाखों लोगों का जीवन ठहर जाता है। ताजा उदाहरण बिहार की राजधानी पटना का है जहां लगभग एक सप्ताह तक पानी भरे रहने से आपदा प्रबन्धन के सभी इंतजाम धरे के धरे रह गए। सफाई में कहा गया कि सौ साल से भी ज्यादा समय के बाद पटना में इस तरह का जल प्लावन हुआ लेकिन पानी उतरने के बाद ये बात भी सामने आई कि पटना शहर की तमाम नालियां और नाले पानी की बोतलों, पोलीथिन की थैलियों, थर्मोकोल और गुटका के खाली पाउचों से भरे होने से अतिरिक्त जल की निकासी में व्यवधान पैदा हुआ तथा सड़कों से होता हुआ पानी घरों के भीतर भर गया। उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी तक को उनके घर से निकालने में बचाव दस्ते को जबर्दस्त मशक्कत करनी पड़ी। जिसे लेकर बिहार सरकार को हंसी का पात्र भी बनना पडा। शहरों ही नहीं अपितु छोटे-छोटे कस्बों तक में पॉलीथीन और प्लास्टिक से बनी बाकी चीजों के कारण जिस तरह की समस्याएँ पैदा हो गईं उनको देखने के बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि हम जागे तो लेकिन बहुत देर से। दरअसल प्रधानमन्त्री द्वारा लालकिले की प्राचीर से सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक लगाने की घोषणा के बाद देश भर में हरकत हुई। आम तौर पर उसका स्वागत ही हुआ। हालांकि प्लास्टिक के सामान बनाने वालों की लाबी ने भी समानांतर रूप से सक्रियता दिखाते हुए सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया लेकिन अच्छी बात ये है कि समाज ने प्रधानमंत्री के आह्वान को अच्छा समर्थन दिया। लेकिन सिंगल यूज प्लास्टिक के अलावा पैकिंग में अल्युमीनियम के उपयोग को लेकर भी चिंता के बादल मंडरा रहे हैं। थर्मोकोल भी दूसरी बड़ी समस्या है। एक समय था जब इनके बारे में कोई सोचता नहीं था लेकिन अब ये चीजें हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं। निश्चित रूप से इनकी वजह से पैकेजिंग उद्योग में जबर्दस्त क्रांति हुई और कारोबार भी बढ़ा लेकिन कालान्तर में इनकी वजह से पर्यावरण संबंधी जो समस्या उत्पन्न हुई उसकी तरफ  दुर्लक्ष्य किये जाने का दुष्परिणाम अब भयावह रूप में सामने आ चुका है। समय आ गया है जब देश में पैकेजिंग उद्योग को भी पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में सार्थक प्रयास किये जावें। जिन विकसित देशों से हमने ये सब चीजें ग्रहण कीं वहां एक तो आबादी बहुत कम है दूसरी बात ये भी है कि उनके यहाँ प्लास्टिक, थर्मोकोल और अल्युमीनियम जैसे कचरे के विनष्टीकरण का इंतजाम भी समय रहते कर लिया गया। ऐसे में एक आम उपभोक्ता तो प्लास्टिक के कैरी बैग या पॉलीथिन के विकल्प के तौर पर कपड़े के थैले को अपना लेगा लेकिन उद्योग जगत पैकेजिंग में उपयोग होने वाले थर्मोकोल, प्लास्टिक और पॉलीथिन के स्थान पर क्या उपयोग करेगा ये बड़ा सवाल है। आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो कपड़े के थैले का उपयोग करने की अपील को घड़ी की सुइयां पीछे घुमाने का प्रयास बताकर उसका उपहास कर रहे हैं। लेकिन ये बात भी पूरी तरह सही है कि पटना की बेकाबू बाढ़ के बाद भी अगर हम नहीं चेते तो दुनिया भर में हमारी छवि मूर्खों की बने बिना नहीं रहेगी। प्रकृति, पर्यावरण और विकास एक दूसरे के शत्रु बन जाएँ ये जरूरी नहीं है। भारतीय जीवन शैली में उनके साथ संतुलन बनाकर आगे बढऩे की प्रवृत्ति रही है। खान-पान, धर्म-कर्म सभी में प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखा जाता था। अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली खेती भी पूरी तरह से पर्यावरण के संरक्षण पर केन्द्रित थी। जल, जंगल और जमीन को देव स्वरूप माना जाता था। आधुनिकता के आगमन और बढ़ती आबादी के कारण उत्पन्न समस्याओं की वजह से पूरी तरह से अतीत को पुनर्जीवित करना तो संभव नहीं रहा लेकिन अब तक भी जो बचा रहा उसे सुरक्षित रखना भी बड़ी बात होगी। उस लिहाज से कपड़े के थैले , मिट्टी के कुल्हड़ और दोना - पत्तल का उपयोग पिछड़ेपन की बजाय हमारी प्रगतिशील सोच का प्रमाण बन सकती है। दक्षिण भारत के अनेक पांच सितारा होटलों तक में केले के पत्तों पर भोजन परोसे जाने को लोग पसंद करते हैं। कुछ दशक पहले तक शादी की दावतों में दोने-पत्तल और कुल्हड़ का ही उपयोग हुआ करता था। इसकी वजह से समाज के एक बड़े वर्ग को स्थायी रोजगार उपलब्ध था। सैकड़ों लोगों का भोजन होने के बाद भी आसपास का वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। विज्ञान का काम निरंतर नई चीजें खोजना है लेकिन इसका ये अर्थ नहीं है कि जो कुछ भी पुराना है वह रद्दी की टोकरी के लायक हो गया। जिस विज्ञान ने दुनिया को प्रदूषण दिया ये उसका दायित्व है कि वही उससे बचने के तरीके ईजाद करे। विश्व के अग्रणी देश भी चाहें तो भारत से सीख सकते हैं जिसने प्रकृति और पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए भी प्रगति की राह पर बढऩे का हुनर हासिल कर लिया था। लेकिन उसके पहले हम भारतवासियों को भी अपनी प्राचीन विरासत के प्रति स्नेह और सम्मान का भाव पुनर्जीवित करना होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 October 2019

आयकर में भी राहत दे सरकार



रिजर्व बैंक ने गत दिवस एक बार फिर कर्ज सस्ता कर दिया। शशिकांत दास के गवर्नर बनने के बाद से लगातार पांच समीक्षाओं में ब्याज दर घटाई गई। लेकिन अधिकतर बैंकों ने इसमें भांजी मार दी तथा उसका पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दिया। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा और घटी हुई ब्याज दर का समुचित लाभ तत्काल प्रभाव से कर्ज लेने वाले ग्राहकों तक पहुंच सकेगा। ऐसा करने के पीछे रिजर्व बैंक का उद्देश्य बाजार में नगदी की उपलब्धता बढ़ाकर आर्थिक सुस्ती को दूर करना है। श्री दास के पूर्ववर्ती गवर्नरों ने मुद्रा स्फीति को रोककर महंगाई पर लगाम लगाने के लिए ब्याज दरों में कमी नहीं करने की जो जिद ठान रखी थी उसकी वजह से बाजार में सुस्ती बढ़ती गयी जिसके परिणामस्वरूप भारतीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक सके। वर्तमान हालात अचानक पैदा नहीं हुए। रिजर्व बैंक की स्वायत्तता निश्चित तौर पर जरूरी है लेकिन वह स्वेच्छाचारिता की स्थिति तक चली जाए, ये भी उचित नहीं है। रघुराम राजन ने उस दृष्टि से अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने में बड़ी भूमिका निबाही। कई अवसरों पर तो लगा मानों वे किसी और के इशारों पर चलते हुए सरकार के लिए मुसीबतें पैदा कर रहे हों। उनके बाद आये गवर्नर भी बहुत संतुष्ट नहीं कर सके। इस सबसे परेशान होकर ही जब केंद्र सरकार ने श्री दास को रिजर्व बैंक की कमान सौंपी तब ये आरोप लगा कि प्रधानमंत्री ने अपने आज्ञाकारी अधिकारी को बिठाकर देश के केन्द्रीय बैंक को भी सरकारी नियंत्रण में ले लिया है। बीच में उससे अतिरिक्त लाभांश वसूलने पर भी खूब बवाल मचा। लेकिन श्री दास के आने के बाद कम से कम एक काम तो अच्छा हुआ कि केंद्र सरकार और केन्द्रीय बैंक के बीच आये दिन होने वाली खींचातानी बंद हो गई और वह अर्थव्यवस्था की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक फैसले लेने लगा। पिछली पांच बैठकों में ब्याज दर कुल 1.35 फीसदी कम होने से बीते दस साल के न्यूनतम स्तर 5.15 प्रतिशत पर आ गयी जो उत्साहजनक है। पिछले गवर्नरों को दरें घटाने से महंगाई बढऩे का डर सताया करता था किन्तु अभी तक के अनुमानों के अनुसार उसके 3.7 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रहने से चिंता का कोई कारण नहीं रहेगा। हालांकि शेयर बाजार में ब्याज दर घटने के बाद भी गिरावट देखी गई लेकिन उसका मुख्य कारण मनोवैज्ञानिक था क्योंकि रिजर्व बैंक ने वार्षिक विकास दर के अनुमान को घटाकर 6.1 फीसदी कर दिया। चूंकि घटी हुई ब्याज दरों का असर आने में कुछ समय लगता है इसलिए माना जा सकता है कि दीपावली के दौरान न सही लेकिन उसके बाद इसका अनुकूल प्रभाव अवश्य पड़ेगा। बारीकी में जाने पर ये लगता है कि रिजर्व बैंक को ब्याज दर में कम से कम एक फीसदी की कमी अभी और करनी चाहिए जिससे हमारे उत्पादन सस्ते होकर चीन से आयातित उपभोक्ता वस्तुओं का मुकाबला कर सकें। दूसरी बेहद महत्वपूर्ण बात गृह निर्माण क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की है। अधो संरचना (इन्फ्रा स्ट्रक्चर) के बाद इसी क्षेत्र पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना जरूरी है। जहां तक बात ऑटोमोबाईल उद्योग में मंदी की है तो वह उतनी चिंता का विषय नहीं है लेकिन गृह निर्माण को यदि और सहूलियतें तथा रियायतें मिलें तो औद्योगिक गतिविधियों में स्वाभाविक तेजी आ जायेगी। उल्लेखनीय है कि यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें छोटी से बड़ी सैकड़ों चीजों का इस्तेमाल होने के साथ बड़ी मात्रा में रोजगार का सृजन होता है। बताने की जरूरत नहीं है कि खेती के बाद सबसे ज्यादा श्रमिक निर्माण गतिविधियों में ही लगते हैं। ग्रामीण इलाकों से शहरों में काम की तलाश में गए अकुशल श्रमिक को निर्माण कार्यों में ही रोजी-रोटी का साधन मिलता है लेकिन इसके लिए सरकार को न्यूनतम मजदूरी के नियमों में व्यवहारिकता लाने के साथ ही श्रम कानूनों में नौकरशाही की तानाशाही दूर करनी होगी। अर्थव्यवस्था को लेकर मंडरा रहे चिंता के बादलों के बीच अच्छी खबर ये है कि भरपूर मानसूनी वर्षा के कारण खरीफ की अच्छी फसल आने वाली है जिसकी वजह से सितम्बर से दिसम्बर की तिमाही में आर्थिक विकास दर की गिरावट का क्रम सुधरेगा। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अतिरिक्त वर्षा से जमीन के भीतर विद्यमान नमी से रबी फसल को भी जबर्दस्त फायदा होने की उम्मीद बढ़ी है। हालाँकि ये कहना जल्दबाजी होगी कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था छलांगें लगाने की स्थिति में लौट आयेगी लेकिन सरकार और रिजर्व बैंक के बीच अच्छे तालमेल से ये जरुर लगने लगा है कि सही समय पर जरूरी फैसले लिये जा सकेंगे। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते दिनों जो रियायतें दीं उनसे जो उम्मीद जगी उसमें रिजर्व बैंक के ताजा फैसले से और वृद्धि हुई। लेकिन सरकार के पास विशेषज्ञ समिति की जो रिपोर्ट आई है उसके अनुसार आयकर की दरें कम करने का निर्णय लेना भी अच्छा उपाय होगा क्योंकि देश के मध्यम वर्ग के पास पैसा होने पर ही बाजार में रौनक दिखाई देती है। वैसे प्रधानमन्त्री को अपनी पार्टी के सांसद डा. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा आयकर समाप्त करने के सुझाव पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि यह भारत में भ्रष्टाचार, कर अपवंचन और काले धन के सृजन का सबसे बड़ा कारण है। हो सकता है वे इस निर्णय को भविष्य के लिए बचाकर रखे हों किन्तु बेहतर होगा इसे जल्द से जल्द प्रभावशील किया जाए। चाहें तो इस मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस चलाकर जनमत भी लिया जा सकता है। रिजर्व बैंक के ताजा निर्णय से अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर हो न हो लेकिन लोगों में ये भरोसा जरुर जागेगा कि उनकी आवाज पर ध्यान दिया जा रहा है। वैसे ये सब यही समय रहते कर लिया जाता तो अच्छे दिन के लिए इन्तजार और आगे नहीं बढ़ता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 October 2019

कांग्रेस बन गई विपक्ष की कमजोरी का कारण



लोकतंत्र में विपक्ष की मजबूती एक अनिवार्य तत्व है। उस दृष्टि से अनेक लोग वर्तमान परिदृश्य को लेकर चिंतित रहते हैं। 2014 के बाद  2019 के लोकसभा चुनाव में भी विपक्ष बुरी तरह पराजित हुआ। कहां तो ये आशंका व्यक्त की जाने लगी थी कि भाजपा को अपनी दम पर बहुमत नहीं मिलेगा और उसे सहयोगी दलों की बैसाखी का सहारा लेना होगा। उस स्थिति में नरेन्द्र मोदी की ताकत घट जाती। ये सोचने वाले भी कम नहीं थे कि भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए बहुमत से पीछे रह जाएगा और तब कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी गठबंधन सत्ता में आ जाएगा। लेकिन जब नतीजे  आये तब सबको चौंकाते हुए अकेले भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटें जीतकर अपने दम पर स्थायी सरकार बनाने की ताकत हासिल कर ली। यद्यपि उसने एनडीए के अपने सहयोगियों को सत्ता में हिस्सेदारी भी दी जिसे नीतीश कुमार की जद (यू) को छोड़कर सभी ने चुपचाप स्वीकार कर लिया। जिस शिवसेना ने बीते पांच साल तक साथ रहते  हुए भी खूब मुंह चलाया वह भी दूसरी पारी में शालीनता दिखा रही है। महाराष्ट्र में विधानसभा सीटों के बंटवारे से ये साफ भी हो गया। नई लोकसभा में हालांकि कांग्रेस की सीटें 10 सीटें बढ़ गईं लेकिन तमाम दिग्गजों के हार जाने से उसकी रंगत फीकी पड़ गई। खुद राहुल गांधी अपनी पुश्तैनी अमेठी सीट नहीं बचा सके और केरल से लोकसभा पहुंचे। बहरहाल विपक्ष के कमजोर होने को लोकतंत्र के लिए खतरा मानने वालों की चिंता तब और बढ़ जाती है जब संसद और उसके बाहर कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद लचर दिखाई देता है। इसकी असली वजह  शीर्ष स्तर पर व्याप्त नेतृत्व शून्यता और अनिर्णय की स्थिति है। लोकसभा चुनाव में करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने पार्टी का अध्यक्ष पद त्यागकर जिस नैतिकता का परिचय दिया वह तब पानी में चली गयी जब महीनों तक उनका उत्तराधिकारी तय नहीं हो सका और अंत में सोनिया गांधी को ही कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर गाड़ी घसीटने का निर्णय किया गया। दूसरा उदाहरण मप्र का है। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद त्यागने की पेशकश कर  दी लेकिन उनकी जगह कौन लेगा इसे लेकर पार्टी के अंदर ही रस्साकशी चल रही है। ऐसे ही नजारे हरियाणा और महाराष्ट्र में भी दिखाई दे रहे हैं। हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा बगावत पर उतारू हो गए तब अशोक तंवर को हटाकर उन्हें पार्टी की बागडोर सौंप तो दी  गई लेकिन श्री हुड्डा के ताकतवर होने के बाद श्री तंवर पार्टी  की जड़ें खोदने पर आमादा हैं। उन्होंने चुनाव संबंधी समितियों से स्तीफा देते हुए आरोप लगा दिया कि हरियाणा में पार्टी हुड्डा कांग्रेस बन चुकी है। हरियाणा की आग महाराष्ट्र में भी जा पहुंची जहां मुम्बई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और उत्तर भारतीयों के नेता के रूप में स्थापित संजय निरुपम ने टिकिट वितरण के विरोध में पार्टी का प्रचार करने से मना करते हुए यहां तक कह दिया कि उम्मीद है पार्टी को गुड बाय कहने की नौबत नहीं आयेगी। इन दोनों राज्यों में पार्टी के अनेक दिग्गज नेता और विधायक कांग्रेस छोड़ चुके हैं। कांग्रेस समर्थक माने जाने वाले विश्लेषक भी कह  रहे हैं कि दोनों जगह कांग्रेस की हालत पतली ही नहीं बेहद पतली है। इसकी वजह राज्य में पार्टी की अंतर्कलह से ज्यादा केन्द्रीय स्तर पर व्याप्त दिशाहीनता है। महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने में विफलता ने कांग्रेस को  अंतर्विरोधों में ही उलझाकर रख दिया है। अनुच्छेद 370 पर अनेक वरिष्ठ नेताओं के बयान पार्टी नीति से अलग आना इसका प्रमाण है। नई संसद के पहले सत्र में सदन के भीतर उसका प्रदर्शन भी प्रभावहीन रहा। विपक्षी महागठबंधन की कोशिशें तो पहले ही बीच रास्ते  में दम तोड़ चुकी हैं। आज की तारीख में पूरे देश में विपक्ष का जो बिखराव है उसके लिए कांग्रेस ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जिसके कारण क्षेत्रीय दल भी उससे छिटकने लगे। भाजपा यदि इस परिस्थिति का लाभ लेकर अपने को मजबूत कर रही है तो ये उसकी अक्लमंदी कही जायेगी। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस और विपक्ष में बैठी शेष पार्टियों के पास मोदी सरकार और भाजपा को कठघरे में खड़ा करने के लिए मुद्दे कम हों। लेकिन उनकी समझ में नहीं आ रहा कि वे  करें तो करें क्या? उप्र ने पहले कांग्रेस और सपा का गठबंधन देखा और उसके बाद सपा और बसपा का। लेकिन आज की स्थिति में ये तीनों अलग हैं। बिहार में कांग्रेस लालू से पिंड छुड़ाना चाह रही है। आन्ध्र में उसके सहयोगी बने चंद्रा बाबू नायडू की लुटिया डूब चुकी है। तमिलनाडु में भी वह पूरी तरह से द्रमुक पर निर्भर है। पंजाब में जो सफलता मिली थी वह सिद्धू और अमरिंदर की लड़ाई में चमकविहीन  हो गयी। मप्र और राजस्थान में भी गुटबाजी बढ़ती जा रही है जिसे रोकने का कोई प्रयास नजर नहीं आ रहा। केवल छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेस की दशा और दिशा ठीक है वरना तो वह पूरी तरह हाशिये की तरफ  तेजी से बढ़ रही है। देश की  सबसे पुरानी पार्टी का इस तरह कमजोर होता जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। उसका यह आशावाद भी हवा - हवाई है कि 1984 में भाजपा भी तो लोकसभा में 2 सीटों पर आ गयी थी जबकि आज पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है। कांग्रेस भूल जाती है कि भाजपा ने अपने संगठन के साथ ही जनता की भावनाओं को समझते हुए नीतियां बनाकर वापिसी की किन्तु कांग्रेस न तो अपने चरमराते संगठन की मरम्म्त पर ध्यान दे रही है और न ही जनता की नब्ज पर हाथ रखने का उसे ध्यान है। ये बात पूरी तरह से सही है कि भले ही देश में पार्टियों की भरमार हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर के विकल्प के रूप में कांग्रेस पर ही लोगों की निगाह जाती है और उस लिहाज से यदि देश में विपक्ष को मजबूत बनाना है तो कांग्रेस को दोबारा खड़ा होना पड़ेगा। लेकिन मौजूदा सूरते हाल में तो उसकी संभावना नहीं लग रही। यदि हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव नतीजे भी  जैसी संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं, वैसे ही आये तब तो कांग्रेस के भविष्य पर मंडराने वाले काले बादल और गहरे हो जायेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 October 2019

समाधि महात्मा की: नाम राजघाट



गांधी जी की 150 वीं जयंती पूरी देश में धूमधाम से मनाई गयी। विविधताओं का देश होने से सभी ने अपने-अपने ढंग से गांधी जी को पूजा और सराहा। इस दौरान ये जताने की कोशिश भी हुई कि उनका असली वारिस कौन है। कोई रैली निकाल रहा था तो कोई पदयात्रा के जरिये उनसे अपनी निकट रिश्तेदारी साबित करने की कोशिश में जुटा था। सभाओं, गोष्ठियों और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिये भी महात्मा जी को याद करने की औपचारिकता का निर्वहन किया गया। संसद भवन से साबरमती आश्रम तक उनके प्रति श्रद्धा का उद्घोष किया गया। इस दौरान आरोप-प्रत्यारोप भी हुए जिसका उद्देश्य गांधी पर अपना पक्का कब्जा जताने की कोशिश ही थी। प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी ने देश को खुले में शौच से मुक्त कराने का श्रेय लूटा तो कांग्रेस ने उन पर बीते पांच वर्षों में बापू की आत्मा को दुखी करने की तोहमत थोप दी। राज्यों में भी अपनी-अपनी पसंद और सुविधानुसार राष्ट्रपिता के प्रति लगाव दर्शाने का प्रयास किया गया। बीते सत्तर साल में बापू के उपदेशों की धज्जियां उड़ाने वालों ने नये सिरे से उनमें निवेश करने की दिशा में कदम उठाते  हुए उनके नाम  पर स्तंभ, पीठ और स्मारक बनाकर खाने-पीने के नए रास्ते भी तलाश  लिए। चूंकि गांधी को संसार छोड़े हुए सात दशक से ज्यादा हो गए  इसलिए उन पर किसी का कापीराईट नहीं रहा। यही वजह है कि गांधी जी के अपने परिवार को पीछे रखते हुए उनके नये रिश्तेदार माहौल पर कब्जा करते नजर आये। राजघाट तो खैर, ऐसे अवसर पर रेडीमेड सरकारी पर्यटन केंद्र बन ही जाता है लेकिन देश में जहां-जहां गांधी जी के चरण कभी भी पड़े उन सभी स्थानों को लीप-पोतकर उनकी उपस्थिति को महसूस करने का प्रयास हुआ। संभवत: गांधी जी ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो पूरे देश में लोगों के साथ सीधे जुड़े और जहां भी गये अपनी छाप छोड़कर आये। यही वजह थी कि गत दिवस पूरे देश ने उन्हें याद करते हुए उनके कृतित्व के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। लेकिन इस दौरान भी वह कटुता नहीं मिट सकी जो वे चाहते थे। किसी ने  गांधी जी की ह्त्या को मुद्दा बनाया तो किसी ने उनके विचारों को दफन करने के लिए दोषारोपण करने की पुरजोर कोशिश की। राष्ट्रपिता कहलाने वाले एक युगपुरुष को श्रद्धांजलि देते समय भी राष्ट्रीय एकता की बजाय खेमेबाजी के शर्मनाक प्रदर्शन ने उनकी आत्मा को निश्चित तौर पर दु:ख पहुँचाया होगा। ये सब देखने के बाद सवाल उठ खड़ा होता है कि गांधी-गांधी करने के बाद भी उनकी इच्छाओं और उपदेशों के प्रति क्या अपेक्षित सम्मान का भाव हमारे नेताओं और उनके अनुयायियों में है? यदि होता तब गत दिवस अच्छी-अच्छी बातों के बीच जहर  बुझे तीर नहीं छोड़े जाते। बरसों पहले स्व. हरिशंकर परसाईं ने एक व्यंग्य लिखा था। जिसमें गणेश विसर्जन  के जुलूस में इस बात पर विवाद होने का जिक्र था कि उच्च जाति के लोगों द्वारा रखी गयी प्रतिमा से आगे नीची जाति के लोगों की प्रतिमा कैसे चल रही थी। उनका आशय ये था कि लोगों की आस्था भगवान गणेश में कम और अपनी कथित जातिगत श्रेष्ठता में ज्यादा थी। परसाईं जी तो नहीं रहे लेकिन उनका वह कटाक्ष गत दिवस गांधी भक्ति को लेकर हुए विवाद के रूप में फिर ताजा हो  गया। महात्मा जी ने जीते जी ही कह  दिया था कि उनके विचारों को किसी दर्शन का नाम नहीं दिया जाए क्योंकि उनमें विभिन्न विचारों का संग्रह है। फिर भी सत्य और अहिंसा को उनके नाम पर चस्पा कर दिया गया। इस पर किसी को ऐतराज  भी नहीं है क्योंकि वे जीवन भर इन दोनों का भरसक पालन भी करते रहे। लेकिन परेशानी तब हो जाती है जब गांधी दर्शन से अभिप्राय गांधी को दर्शनीय बनाने से लगा लिया जाता है। हमारे देश की समूची व्यवस्था गांधी जी को हाजिर नाजिर मानकर संचालित होती है। वैध-अवैध सभी प्रकार का लेनदेन जिस मुद्रा के माध्यम से किया जाता है उस पर भी मुस्कुराते बापू नजर आते हैं। इस तरह उनके योगदान का मूल्यांकन हर कोई अपनी अंटी में रखे रूपये के नोट के मुताबिक करने लगा है। 150  वां जन्मदिन मनाकर महात्मा जी के गौरवगान  के साथ ही केंद्र और राज्यों की सरकारों  ने उनके नाम पर अर्जित कुछ उपलब्धियों और कुछ नये कार्यक्रमों का ऐलान करते हुए अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। आचरण की बजाय उन्हें भी आंकड़ों की विषयवस्तु बना दिया गया। बेहतर होता इस अवसर पर बीते सात दशकों का हिसाब-किताब तैयार करते हुए देश और दुनिया को ये बताया जाता कि हमने किस हद तक गांधी जी को धोखा दिया और उनकी कही गईं किन-किन बातों को राजघाट के पीछे बहने वाली प्रदूषण की प्रतीक यमुना में सडऩे फेंक दिया गया?  सही बात तो ये है कि गांधी जी, सिद्धान्तों की ओट लेकर सत्ता  हथियाने का जरिया मात्र  बनकर रह गए हैं। उनके नाम से किसी को परहेज नहीं है  लेकिन उनके कामों को दोहराने के प्रति अरुचि  भी कम नहीं है। एक फकीराना जीवन जीने वाले महात्मा जैसे व्यक्ति  की समाधि का नाम राजघाट रखा जाना भी विरोधाभास नहीं तो और क्या है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 2 October 2019

बापू: उनकी वैश्विक प्रासंगिकता ही सबसे बड़ा सम्मान

आज महात्मा गांधी की 150 वीं जयन्ती है । वे एक ऐसे इंसान थे जिनका जीवन दो शताब्दियों में बंटा हुआ था  लेकिन अपनी मृत्यु के सात दशक बाद 21 वीं सदी में भी वे उतने ही प्रासंगिक और स्वीकार्य बने हुए हैं तो उसका कारण उनका अत्यंत विस्तृत कार्यक्षेत्र था जिसमें मानव जीवन से जुड़ी हर छोटी बड़ी चीज के लिए कुछ न कुछ था । यही वजह रही कि वे अपने जीते जी ही एक किंवदंती बनते हुए हुए वैश्विक जिज्ञासा का विषय हो चुके थे । जिस ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से उखाड़  फेंकने के लिए उन्होंने अपना समूचा जीवन लगा दिया वह भी उन्हें पूरी तरह तिरस्कृत करने का दुस्साहस नहीं कर सका । वरना राजद्रोह के  आरोप में वह उन्हें भी अपने रास्ते से हटा देता । हालाँकि इस बारे में ये कहने वाले भी कम नहीं हैं कि उनका अहिंसक आन्दोलन अंग्रेजों को क्रांतिकारियों की अपेक्षाकृत ज्यादा सुविधाजनक प्रतीत होता था ।  इसलिए सुनियोजित तरीके से उन्होंने  बापू को ही स्वाधीनता संग्राम के नेता के तौर पर स्वीकार भी किया और स्थापित भी । लेकिन इस सबसे अलग हटकर भी उनका योगदान भारतीय समाज के लिए था जिसे पुनर्जागरण के लिहाज से देखा जाना कहीं बेहतर होगा । अछूतोद्धार , गाम स्वराज और  स्वदेशी जैसी बातें उन्होंने उस दौर में कीं जब भारतीय समाज पूरी तरह से दिशाहीनता  और नेतृत्व शून्यता का शिकार था । दक्षिण अफ्रीका से लौटे बैरिस्टर एम.के गांधी का महात्मा के तौर पर रूपांतरण उन्नीसवीं सदी के रुढि़वादी भारतीय समाज के लिए  बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव था । ऐसा नहीं है कि उनके पहले किसी ने आजादी के बारे में सोचा नहीं हो । गांधी जी के जन्म से 12 वर्ष पहले ही 195। की क्रांति हो चुकी थी । लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जैसे स्वाधीनता के प्रवक्ता भी उनसे पहले ही सक्रिय थे लेकिन ये कहना पूरी तरह सही होगा कि आजादी की ललक को जन - जन में पैदा करने का जो कारनामा उस फकीरनुमा इंसान ने कर दिखाया वह इतिहास होने के बाद भी आज तक जीवंत है । उनकी लड़ाई यूँ तो राजनीतिक नजर आती थी लेकिन गांधी जी ने सत्ता के साथ ही समाज की व्यवस्था और सोच को भारतीय परिवेश के अनुसार ढालने का जो प्रयास किया वह उनका असली योगदान था । वे केवल आजादी की लड़ाई को ही अपना मिशन बनाते तब शायद इतिहास उनके लिए इतना उदार नहीं होता । लेकिन गांधी जी ने अपने समकालीन भारत ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को प्रभावित किया क्योंकि उनका समूचा चिंतन और कार्यशैली मानवता के बेहद करीब थी । यही वजह रही कि वे जीते जी विश्व मानव के तौर पर स्वीकार्य हो गये थे । भारतीय समाज की ताकत और कमजोरियों को जितनी बारीकी से उन्होंने समझा उसके कारण उन्हें एक सिद्धहस्त मनोवैज्ञानिक कहना भी गलत नहीं होगा । जातियों में बंटे समाज को एकजुट करते हुए रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित करने का कार्य उनसे बेहतर  किसी ने नहीं किया । भारत लौटने के कुछ समय बाद ही वे इस वास्तविकता से अवगत हो चुके  थे कि आजादी की लड़ाई सीधे शुरू करना आत्मघाती हो सकता है और इसीलिये उन्होंने एक कुशल सेनापति के रूप में समाज के हर तबके को एकजुट किया जिसे अंग्रेज जब तक समझ पाते तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।  अहिंसा के प्रति उनका आग्रह जिद की हद तक था जिसे लेकर आज  भी उनकी आलोचना की जाती है । ये भी कहा जाता है कि अहिंसा के जरिये मिली आजादी का मोल भारत के लोग चूँकि नहीं समझे इसीलिये सत्तर साल बाद भी हमारा देश उन लक्ष्यों को हासिल करने में सफल  नहीं हो सका जिनका सपना 15 अगस्त 194। को देखा और दिखाया गया था । लेकिन  गांधी जी का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना बड़ा  और व्यापक था कि उसको सीमित दायरे में रखकर उनका मूल्यांकन करना नासमझी होगी । गांधी जी आजादी के बाद ज्यादा समय नहीं रहे और उनकी तासीर जैसी थी उसके मुताबिक यदि रहते तब वे दोबारा संघर्ष के रास्ते पर चल पड़ते । आज उनके 150 वें जन्मदिवस पर देश और दुनियाँ में बहुत कुछ हो रहां है । उनकी प्रशंसा में अखबारों के पन्ने भरे हुए हैं लेकिन गांधी का सपना किस तरह अधूरा है उसकी एक बानगी गत दिवस देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दलितों पर अत्याचार संबंधी  एक निर्णय से मिली । सात दशक बीत जाने के बाद भी भारत में जातिगत भेदभाव मिटना तो दूर और बढ़ गया है जिसके लिए वे सब कसूरवार हैं जिन्होंने गांधी जी की फर्जी वसीयतें बनवाकर खुद को उनका मानस पुत्र घोषित कर रखा है । केवल बाहरी स्वच्छता का अभियान  चलाकर गांधी जी के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित कर देना पर्याप्त्त नहीं होगा । साबरमती के संत के प्रति सबसे बड़ा सम्मान तब होगा जब हम अपना मन भी स्वच्छ कर लें । भले ही उन्हें नोबल जैसे पुरस्कार से वंचित रखा गया हो लेकिन महात्मा जी की वैश्विक प्रासंगिकता उनका सबसे बड़ा  सम्मान है । डेढ़ शताब्दी पहले जन्मे एक इंसान ने जिस प्रभावशाली ढंग से पूरी दुनिया को रास्ता दिखाया उसके आधार पर ये  कहना गलत नहीं  होगा कि उनके बाद उन जैसा महामानव आज तक दूसरा कोई नहीं जन्मा ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 October 2019

भौतिक सम्पन्नता ने बना दिया गरीब

सुबह - शाम बेटों - बहुओं के फोन आ रहे हैं । बेटी - दामाद भी दिन में कई मर्तबा Get well soon कहने की रस्म अदायगी कर देते हैं।

दरअसल घर में फिसलकर गिरी माँ को चिकित्सकों ने एक महीने तक बिस्तर से उठने तो क्या हिलने - डुलने तक से रोक दिया है । उसकी तीमारदारी के लिए घर की नौकरानी ही एकमात्र है लेकिन उसके भी बाल बच्चे हैं । सो बीच -बीच में चली जाती है । माँ ने खाना -पीना न के बराबर कर दिया है। वरना जरूरत के समय कौन सहायता करेगा।

पड़ोसी आते हैं । हमदर्दी के साथ समय भी देते हैं। लेकिन कई घण्टे कमरे की छत अकेले ताकते रहने की बाध्यता का कोई इलाज नहीं है ।

डॉक्टर हौसला अफजाई के लिए एक महीना बता तो गए लेकिन क्या पता कितना वक्त लगे ? देखने वाले विचलित हो जाते हैं लेकिन सबके अपने -अपने गम हैं।

ये स्थिति किसी एक की नहीं अनगिनत वृद्धों की है ।

सीनियर सिटीजन दिवस पीछे छूट गया है लेकिन जिनके लिए वह मनाया जाता है वे एकाकीपन नामक सजा भोगने मजबूर हैं । बच्चों को आगे बढ़ाने के फेर में उनकी जिन्दगी ठहरकर रह गई।

कहने को सब कुछ है । बड़ा सा मकान , सुख - सुविधा के साधन , बैंक बैलेंस , और भरा -पूरा लेकिन देश - विदेश में बिखरा परिवार ।

भारत को युवाओं का देश कहा जाने लगा है लेकिन साथ ही यह उपेक्षित और एकाकी वृद्धजनों का भी मुल्क बनता जा रहा है ।

दो दिन पहले ही  श्राद्ध पक्ष समाप्त हुआ। दिवंगत पितरों के प्रति अपेक्षित कर्मकांड भी देश भर में हुआ लेकिन अकेले रह रहे जीवित माता -पिता की अतृप्त इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास या तो मजबूरियों का शिकार है या लापरवाही का ।

कभी - कभी लगता है पुराने गांव और मोहल्ले ही अच्छे थे जहां हर कोई अपना सा लगता था ।

भौतिक सम्पन्नता ने सही मायनों में हमें गरीब बना दिया । रिश्तों की जो दौलत थी वह भी जमीन में गड़े उस खजाने जैसी होकर रह गई जो न तो मिलता है और न ही उसका मोह छूटता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

हनीट्रैप : ट्रेलर आया पिक्चर बाकी

मप्र में इन दिनों जिस हनीट्रैप की चर्चा हर किसी की जुबान पर है उसे लेकर रोचक बात ये है कि जिन महिलाओं ने अपने मोहपाश में राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को फंसाकर पैसे ऐंठे उनके नाम और चेहरे तो सामने आ गए लेकिन जो लोग इन सुन्दरियों के जाल में फंसे उनके नाम हालांकि संचार माध्यमों विशेष रूप से सोशल मीडिया पर उछल रहे हैं लेकिन उनमें से किसी ने भी अभी तक ये कहने का साहस नहीं दिखाया कि ये सब असत्य और उनके चरित्र हनन का षडय़ंत्र है। अनेक वीडियो भी सार्वजनिक हो चुके हैं जिनमें कई पूर्व और वर्तमान नेता शर्मनाक स्थिति में देखे जा सकते हैं। कुछ समय पहले एक वरिष्ठ अधिकारी का ऐसा ही वीडियो उजागर होने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था। जैसे दावे किये जा रहे हैं उनके अनुसार पूर्व हो चुके एक राज्यपाल और मुख्यमंत्री के अलावा सांसद रहे अनेक नेता भी हनीट्रैप में फंसे थे। कुछ वर्तमान जनप्रतिनिधियों के दामन पर भी दाग बताये जा रहे हैं। ये मामला केवल देह व्यापार का न होकर सीधे-सीधे भयादोहन का है। जिन महिलाओं ने इस पूरे मामले को अंजाम दिया उन्होंने शासन और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे लोगों की चारित्रिक कमजोरी का लाभ उठाते हुए जमकर आर्थिक लाभ अर्जित किया। नगद राशि, जमीन-जायजाद और सुख-सुविधा के तमाम साधन भी उसी से जुटाए गए। ये कारोबार बरसों से चला आ रहा था। जब इंदौर के एक इंजीनियर ने ब्लैकमेल में माँगी जा रही बड़ी रकम देने में असमर्थ होने पर पुलिस में शिकायत की तब जाकर भंडाफोड़ हुआ और उसके बाद पुलिस के हाथ वे रिकार्डिंग्स आईं जिनके जरिये वे फंसे हुए नेताओं और अफसरों से वसूली किया करती थीं। मामला खुला तो पुलिस भी सक्रिय हुई। जाँच दल बना लेकिन उसमें भी ताबड़तोड़ बदलाव हुए। सम्बन्धित थाना के प्रभारी हटा दिए गए। जिस वरिष्ठ अधिकारी को जाँच का मुखिया बनाया गया वह बीच में ही छोड़कर अलग हो गया। और उसके बाद पुलिस महानिदेशक स्तर के दो अधिकारियों के बीच शीतयुद्ध शुरू होने से जांच की दिशा भटकने का खतरा भी नजर आने लगा। विवाद सार्वजनिक होने पर मुख्यमंत्री कमलनाथ को हस्तक्षेप करना पड़ा और गत दिवस उन्होंने प्रदेश के दो-तीन सर्वोच्च अधिकारियों को बिठाकर उनकी खिंचाई करते हुए इस बात पर ऐतराज भी जताया कि बीते कुछ महीनों से किसके कहने पर इस कांड की निगरानी चल रही थी और खुलासा होने पर जाँच के लिए एंटी टेररिस्ट दल को क्यों लगाया गया ? मुख्यमंत्री ने और क्या-क्या कह़ा ये तो पता नहीं चला लेकिन जिस तरह दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुलेआम लड़े और उसके बाद कमलनाथ को बैठकर पंचायत करवानी पड़ी उससे ये साबित हो गया कि मामला बेहद संगीन है और जाँच में सच्चाई उजागर किये जाने की बजाय उस पर पर्दा डालने की चाल चली जा रही है। इसकी वजह केवल नेताओं का ही नहीं अपितु पुलिस और प्रशासन के तमाम अधिकारियों का भी फंसना है। सबसे बड़ी बात ये है कि हनीट्रैप के जरिये जो गलत-सलत काम करवाए गए उनका खुलासा होने पर पूरा प्रशासनिक ढांचा ही कठघरे में खड़ा हो जायेगा। कमलनाथ की समूची राजनीति का आधार प्रशासनिक अधिकारी ही रहे हैं और इस कांड में उनके कुछ चहेते अफसरों के चेहरों पर भी कालिख पुतने की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। ये बात भी सही है कि जो महिलाएं पकड़ी गईं हैं वे सब बेहद शातिर और निडर होने से किसी के बारे में भी मुंह खोलकर अप्रत्याशित धमाका कर सकती हैं। यही वजह है कि उनके पास से जप्त वीडियो फिल्मों को लेकर जबर्दस्त गोपनीयता बरती जा रही है। वैसे एक चर्चा ये भी है कि उनका उपयोग राजनीतिक ब्लैकमेलिंग के लिए भी किया जा सकता है जिसका उद्देश्य राज्य सरकार के स्थायित्व पर मंडराने वाले खतरे को पूरी तरह से समाप्त कर देना है। गौरतलब है कि जबसे ये मामला प्रकाश में आया उसके बाद कमलनाथ सरकार को गिराने की भाजपाई हुंकारें शांत होकर रह गईं हैं। हो सकता है इसीलिये मुख्यमंत्री ने वरिष्ठ अधिकारियों को ज्यादा तेजी दिखाने से रोका हो। ये भी सच है कि जितनी देर होती जायेगी सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका उतनी ही बढ़ती जायेगी। वैसे ये प्रकरण नेताओं और अधिकारियों की बजाय समाज के किसी और वर्ग से सम्बंधित होता तब शायद अभी तक तो पुलिस के सूरमा पत्रकार वार्ता करते हुए अपनी पीठ ठोंकने का पराक्रम दिखाते नजर आते लेकिन मामला चूंकि शासन और प्रशासन से जुड़े बड़े लोगों का है इसलिए बड़े-बड़े परदे खींच दिए गए हैं। बहरहाल ये सवाल जोरदारी से उठ रहा है कि जिन नेताओं और बाकी लोगों के नाम हनीट्रैप में चर्चित हो रहे हैं उनमें से कोई अभी तक अपना चरित्र प्रमाणपत्र लेकर मैदान में नहीं उतरा। ये भी कहा जा रहा है कि जिनके नाम अभी तक चर्चा में और करतूत कैमरे में नहीं आईं उनमें से भी अनेक सफेदपोशों के माथों पर पसीने की बूंदें छलछला रही हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि जो सामने आया वह तो ट्रेलर मात्र है। पूरी पिक्चर अभी बाकी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी