Monday, 7 October 2019
प्रकृति, पर्यावरण और प्रगति में समन्वय जरूरी
Saturday, 5 October 2019
आयकर में भी राहत दे सरकार
Friday, 4 October 2019
कांग्रेस बन गई विपक्ष की कमजोरी का कारण
Thursday, 3 October 2019
समाधि महात्मा की: नाम राजघाट
Wednesday, 2 October 2019
बापू: उनकी वैश्विक प्रासंगिकता ही सबसे बड़ा सम्मान
आज महात्मा गांधी की 150 वीं जयन्ती है । वे एक ऐसे इंसान थे जिनका जीवन दो शताब्दियों में बंटा हुआ था लेकिन अपनी मृत्यु के सात दशक बाद 21 वीं सदी में भी वे उतने ही प्रासंगिक और स्वीकार्य बने हुए हैं तो उसका कारण उनका अत्यंत विस्तृत कार्यक्षेत्र था जिसमें मानव जीवन से जुड़ी हर छोटी बड़ी चीज के लिए कुछ न कुछ था । यही वजह रही कि वे अपने जीते जी ही एक किंवदंती बनते हुए हुए वैश्विक जिज्ञासा का विषय हो चुके थे । जिस ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए उन्होंने अपना समूचा जीवन लगा दिया वह भी उन्हें पूरी तरह तिरस्कृत करने का दुस्साहस नहीं कर सका । वरना राजद्रोह के आरोप में वह उन्हें भी अपने रास्ते से हटा देता । हालाँकि इस बारे में ये कहने वाले भी कम नहीं हैं कि उनका अहिंसक आन्दोलन अंग्रेजों को क्रांतिकारियों की अपेक्षाकृत ज्यादा सुविधाजनक प्रतीत होता था । इसलिए सुनियोजित तरीके से उन्होंने बापू को ही स्वाधीनता संग्राम के नेता के तौर पर स्वीकार भी किया और स्थापित भी । लेकिन इस सबसे अलग हटकर भी उनका योगदान भारतीय समाज के लिए था जिसे पुनर्जागरण के लिहाज से देखा जाना कहीं बेहतर होगा । अछूतोद्धार , गाम स्वराज और स्वदेशी जैसी बातें उन्होंने उस दौर में कीं जब भारतीय समाज पूरी तरह से दिशाहीनता और नेतृत्व शून्यता का शिकार था । दक्षिण अफ्रीका से लौटे बैरिस्टर एम.के गांधी का महात्मा के तौर पर रूपांतरण उन्नीसवीं सदी के रुढि़वादी भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव था । ऐसा नहीं है कि उनके पहले किसी ने आजादी के बारे में सोचा नहीं हो । गांधी जी के जन्म से 12 वर्ष पहले ही 195। की क्रांति हो चुकी थी । लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जैसे स्वाधीनता के प्रवक्ता भी उनसे पहले ही सक्रिय थे लेकिन ये कहना पूरी तरह सही होगा कि आजादी की ललक को जन - जन में पैदा करने का जो कारनामा उस फकीरनुमा इंसान ने कर दिखाया वह इतिहास होने के बाद भी आज तक जीवंत है । उनकी लड़ाई यूँ तो राजनीतिक नजर आती थी लेकिन गांधी जी ने सत्ता के साथ ही समाज की व्यवस्था और सोच को भारतीय परिवेश के अनुसार ढालने का जो प्रयास किया वह उनका असली योगदान था । वे केवल आजादी की लड़ाई को ही अपना मिशन बनाते तब शायद इतिहास उनके लिए इतना उदार नहीं होता । लेकिन गांधी जी ने अपने समकालीन भारत ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को प्रभावित किया क्योंकि उनका समूचा चिंतन और कार्यशैली मानवता के बेहद करीब थी । यही वजह रही कि वे जीते जी विश्व मानव के तौर पर स्वीकार्य हो गये थे । भारतीय समाज की ताकत और कमजोरियों को जितनी बारीकी से उन्होंने समझा उसके कारण उन्हें एक सिद्धहस्त मनोवैज्ञानिक कहना भी गलत नहीं होगा । जातियों में बंटे समाज को एकजुट करते हुए रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित करने का कार्य उनसे बेहतर किसी ने नहीं किया । भारत लौटने के कुछ समय बाद ही वे इस वास्तविकता से अवगत हो चुके थे कि आजादी की लड़ाई सीधे शुरू करना आत्मघाती हो सकता है और इसीलिये उन्होंने एक कुशल सेनापति के रूप में समाज के हर तबके को एकजुट किया जिसे अंग्रेज जब तक समझ पाते तब तक बहुत देर हो चुकी थी । अहिंसा के प्रति उनका आग्रह जिद की हद तक था जिसे लेकर आज भी उनकी आलोचना की जाती है । ये भी कहा जाता है कि अहिंसा के जरिये मिली आजादी का मोल भारत के लोग चूँकि नहीं समझे इसीलिये सत्तर साल बाद भी हमारा देश उन लक्ष्यों को हासिल करने में सफल नहीं हो सका जिनका सपना 15 अगस्त 194। को देखा और दिखाया गया था । लेकिन गांधी जी का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना बड़ा और व्यापक था कि उसको सीमित दायरे में रखकर उनका मूल्यांकन करना नासमझी होगी । गांधी जी आजादी के बाद ज्यादा समय नहीं रहे और उनकी तासीर जैसी थी उसके मुताबिक यदि रहते तब वे दोबारा संघर्ष के रास्ते पर चल पड़ते । आज उनके 150 वें जन्मदिवस पर देश और दुनियाँ में बहुत कुछ हो रहां है । उनकी प्रशंसा में अखबारों के पन्ने भरे हुए हैं लेकिन गांधी का सपना किस तरह अधूरा है उसकी एक बानगी गत दिवस देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दलितों पर अत्याचार संबंधी एक निर्णय से मिली । सात दशक बीत जाने के बाद भी भारत में जातिगत भेदभाव मिटना तो दूर और बढ़ गया है जिसके लिए वे सब कसूरवार हैं जिन्होंने गांधी जी की फर्जी वसीयतें बनवाकर खुद को उनका मानस पुत्र घोषित कर रखा है । केवल बाहरी स्वच्छता का अभियान चलाकर गांधी जी के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित कर देना पर्याप्त्त नहीं होगा । साबरमती के संत के प्रति सबसे बड़ा सम्मान तब होगा जब हम अपना मन भी स्वच्छ कर लें । भले ही उन्हें नोबल जैसे पुरस्कार से वंचित रखा गया हो लेकिन महात्मा जी की वैश्विक प्रासंगिकता उनका सबसे बड़ा सम्मान है । डेढ़ शताब्दी पहले जन्मे एक इंसान ने जिस प्रभावशाली ढंग से पूरी दुनिया को रास्ता दिखाया उसके आधार पर ये कहना गलत नहीं होगा कि उनके बाद उन जैसा महामानव आज तक दूसरा कोई नहीं जन्मा ।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 1 October 2019
भौतिक सम्पन्नता ने बना दिया गरीब
सुबह - शाम बेटों - बहुओं के फोन आ रहे हैं । बेटी - दामाद भी दिन में कई मर्तबा Get well soon कहने की रस्म अदायगी कर देते हैं।
दरअसल घर में फिसलकर गिरी माँ को चिकित्सकों ने एक महीने तक बिस्तर से उठने तो क्या हिलने - डुलने तक से रोक दिया है । उसकी तीमारदारी के लिए घर की नौकरानी ही एकमात्र है लेकिन उसके भी बाल बच्चे हैं । सो बीच -बीच में चली जाती है । माँ ने खाना -पीना न के बराबर कर दिया है। वरना जरूरत के समय कौन सहायता करेगा।
पड़ोसी आते हैं । हमदर्दी के साथ समय भी देते हैं। लेकिन कई घण्टे कमरे की छत अकेले ताकते रहने की बाध्यता का कोई इलाज नहीं है ।
डॉक्टर हौसला अफजाई के लिए एक महीना बता तो गए लेकिन क्या पता कितना वक्त लगे ? देखने वाले विचलित हो जाते हैं लेकिन सबके अपने -अपने गम हैं।
ये स्थिति किसी एक की नहीं अनगिनत वृद्धों की है ।
सीनियर सिटीजन दिवस पीछे छूट गया है लेकिन जिनके लिए वह मनाया जाता है वे एकाकीपन नामक सजा भोगने मजबूर हैं । बच्चों को आगे बढ़ाने के फेर में उनकी जिन्दगी ठहरकर रह गई।
कहने को सब कुछ है । बड़ा सा मकान , सुख - सुविधा के साधन , बैंक बैलेंस , और भरा -पूरा लेकिन देश - विदेश में बिखरा परिवार ।
भारत को युवाओं का देश कहा जाने लगा है लेकिन साथ ही यह उपेक्षित और एकाकी वृद्धजनों का भी मुल्क बनता जा रहा है ।
दो दिन पहले ही श्राद्ध पक्ष समाप्त हुआ। दिवंगत पितरों के प्रति अपेक्षित कर्मकांड भी देश भर में हुआ लेकिन अकेले रह रहे जीवित माता -पिता की अतृप्त इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास या तो मजबूरियों का शिकार है या लापरवाही का ।
कभी - कभी लगता है पुराने गांव और मोहल्ले ही अच्छे थे जहां हर कोई अपना सा लगता था ।
भौतिक सम्पन्नता ने सही मायनों में हमें गरीब बना दिया । रिश्तों की जो दौलत थी वह भी जमीन में गड़े उस खजाने जैसी होकर रह गई जो न तो मिलता है और न ही उसका मोह छूटता है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
हनीट्रैप : ट्रेलर आया पिक्चर बाकी
मप्र में इन दिनों जिस हनीट्रैप की चर्चा हर किसी की जुबान पर है उसे लेकर रोचक बात ये है कि जिन महिलाओं ने अपने मोहपाश में राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को फंसाकर पैसे ऐंठे उनके नाम और चेहरे तो सामने आ गए लेकिन जो लोग इन सुन्दरियों के जाल में फंसे उनके नाम हालांकि संचार माध्यमों विशेष रूप से सोशल मीडिया पर उछल रहे हैं लेकिन उनमें से किसी ने भी अभी तक ये कहने का साहस नहीं दिखाया कि ये सब असत्य और उनके चरित्र हनन का षडय़ंत्र है। अनेक वीडियो भी सार्वजनिक हो चुके हैं जिनमें कई पूर्व और वर्तमान नेता शर्मनाक स्थिति में देखे जा सकते हैं। कुछ समय पहले एक वरिष्ठ अधिकारी का ऐसा ही वीडियो उजागर होने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था। जैसे दावे किये जा रहे हैं उनके अनुसार पूर्व हो चुके एक राज्यपाल और मुख्यमंत्री के अलावा सांसद रहे अनेक नेता भी हनीट्रैप में फंसे थे। कुछ वर्तमान जनप्रतिनिधियों के दामन पर भी दाग बताये जा रहे हैं। ये मामला केवल देह व्यापार का न होकर सीधे-सीधे भयादोहन का है। जिन महिलाओं ने इस पूरे मामले को अंजाम दिया उन्होंने शासन और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे लोगों की चारित्रिक कमजोरी का लाभ उठाते हुए जमकर आर्थिक लाभ अर्जित किया। नगद राशि, जमीन-जायजाद और सुख-सुविधा के तमाम साधन भी उसी से जुटाए गए। ये कारोबार बरसों से चला आ रहा था। जब इंदौर के एक इंजीनियर ने ब्लैकमेल में माँगी जा रही बड़ी रकम देने में असमर्थ होने पर पुलिस में शिकायत की तब जाकर भंडाफोड़ हुआ और उसके बाद पुलिस के हाथ वे रिकार्डिंग्स आईं जिनके जरिये वे फंसे हुए नेताओं और अफसरों से वसूली किया करती थीं। मामला खुला तो पुलिस भी सक्रिय हुई। जाँच दल बना लेकिन उसमें भी ताबड़तोड़ बदलाव हुए। सम्बन्धित थाना के प्रभारी हटा दिए गए। जिस वरिष्ठ अधिकारी को जाँच का मुखिया बनाया गया वह बीच में ही छोड़कर अलग हो गया। और उसके बाद पुलिस महानिदेशक स्तर के दो अधिकारियों के बीच शीतयुद्ध शुरू होने से जांच की दिशा भटकने का खतरा भी नजर आने लगा। विवाद सार्वजनिक होने पर मुख्यमंत्री कमलनाथ को हस्तक्षेप करना पड़ा और गत दिवस उन्होंने प्रदेश के दो-तीन सर्वोच्च अधिकारियों को बिठाकर उनकी खिंचाई करते हुए इस बात पर ऐतराज भी जताया कि बीते कुछ महीनों से किसके कहने पर इस कांड की निगरानी चल रही थी और खुलासा होने पर जाँच के लिए एंटी टेररिस्ट दल को क्यों लगाया गया ? मुख्यमंत्री ने और क्या-क्या कह़ा ये तो पता नहीं चला लेकिन जिस तरह दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुलेआम लड़े और उसके बाद कमलनाथ को बैठकर पंचायत करवानी पड़ी उससे ये साबित हो गया कि मामला बेहद संगीन है और जाँच में सच्चाई उजागर किये जाने की बजाय उस पर पर्दा डालने की चाल चली जा रही है। इसकी वजह केवल नेताओं का ही नहीं अपितु पुलिस और प्रशासन के तमाम अधिकारियों का भी फंसना है। सबसे बड़ी बात ये है कि हनीट्रैप के जरिये जो गलत-सलत काम करवाए गए उनका खुलासा होने पर पूरा प्रशासनिक ढांचा ही कठघरे में खड़ा हो जायेगा। कमलनाथ की समूची राजनीति का आधार प्रशासनिक अधिकारी ही रहे हैं और इस कांड में उनके कुछ चहेते अफसरों के चेहरों पर भी कालिख पुतने की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। ये बात भी सही है कि जो महिलाएं पकड़ी गईं हैं वे सब बेहद शातिर और निडर होने से किसी के बारे में भी मुंह खोलकर अप्रत्याशित धमाका कर सकती हैं। यही वजह है कि उनके पास से जप्त वीडियो फिल्मों को लेकर जबर्दस्त गोपनीयता बरती जा रही है। वैसे एक चर्चा ये भी है कि उनका उपयोग राजनीतिक ब्लैकमेलिंग के लिए भी किया जा सकता है जिसका उद्देश्य राज्य सरकार के स्थायित्व पर मंडराने वाले खतरे को पूरी तरह से समाप्त कर देना है। गौरतलब है कि जबसे ये मामला प्रकाश में आया उसके बाद कमलनाथ सरकार को गिराने की भाजपाई हुंकारें शांत होकर रह गईं हैं। हो सकता है इसीलिये मुख्यमंत्री ने वरिष्ठ अधिकारियों को ज्यादा तेजी दिखाने से रोका हो। ये भी सच है कि जितनी देर होती जायेगी सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका उतनी ही बढ़ती जायेगी। वैसे ये प्रकरण नेताओं और अधिकारियों की बजाय समाज के किसी और वर्ग से सम्बंधित होता तब शायद अभी तक तो पुलिस के सूरमा पत्रकार वार्ता करते हुए अपनी पीठ ठोंकने का पराक्रम दिखाते नजर आते लेकिन मामला चूंकि शासन और प्रशासन से जुड़े बड़े लोगों का है इसलिए बड़े-बड़े परदे खींच दिए गए हैं। बहरहाल ये सवाल जोरदारी से उठ रहा है कि जिन नेताओं और बाकी लोगों के नाम हनीट्रैप में चर्चित हो रहे हैं उनमें से कोई अभी तक अपना चरित्र प्रमाणपत्र लेकर मैदान में नहीं उतरा। ये भी कहा जा रहा है कि जिनके नाम अभी तक चर्चा में और करतूत कैमरे में नहीं आईं उनमें से भी अनेक सफेदपोशों के माथों पर पसीने की बूंदें छलछला रही हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि जो सामने आया वह तो ट्रेलर मात्र है। पूरी पिक्चर अभी बाकी है।
-रवीन्द्र वाजपेयी