Monday, 14 October 2019

आयुष्मान योजना को बीमार होने से बचाना जरूरी



सरकार द्वारा जनता के हित में बनाई जाने वाली अच्छी नीतियों का क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं होने की वजह से एक तो उनका मकसद पूरा नहीं होता और दूसरे वे भ्रष्टाचार के मकडज़ाल में फंकर रह जाती हैं। इन्हीं में से एक है प्रधानमन्त्री द्वारा देश के लगभग 55 करोड़ ऐसे लोगों के लिए पांच लाख तक की चिकित्सा निशुल्क प्रदान करने प्रारम्भ की गयी आयुष्मान योजना, जो इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। चूंकि सरकारी अस्पतालों में न तो पर्याप्त क्षमता है और न ही अपेक्षित सुविधाएं इसलिए निजी अस्पतालों में इलाज करवाने पर भी आयुष्मान योजना का लाभ प्रदान कर दिया गया। इस निर्णय में सरकार की नेकनीयती साफ झलकती है लेकिन इस सुविधा का लाभ साधनहीन मरीज को कितना मिल रहा है उससे ज्यादा सवाल इस बात का उठ खड़ा हुआ कि इसकी आड़ में निजी अस्पतालों ने कितनी लूट मचानी शुरू कर दी। हाल ही में छत्तीसगढ़ से खबर आई थी कि एक निजी अस्पताल ने साल भर के भीतर लगभग 300 रीढ़ की हड्डी के जटिल आपरेशन कर डाले। मप्र सरकार द्वारा संचालित इसी तरह की स्वास्थ्य योजना में निजी अस्पतालों द्वारा की गयी लूटमार सर्वविदित है। इस लिहाज से आज आई उस खबर ने ध्यान आकर्षित किया कि आयुष्मान योजना का लाभ घर के ही नजदीक उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से छोटे और मझोले शहरों में आधुनिक निजी अस्पतालों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम करते हुए 100 बिस्तरों की क्षमता वाले 1000 नये अस्पाताल खोले जाएंगे। सरकारी अस्पतालों की कमी के मद्देनजर इस तरह की योजना स्वागतयोग्य है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि निजी क्षेत्र की चिकित्सा सेवा में सेवा भाव तो लगभग खत्म हो चुका है और वे भी पूंजी के खेल में लिप्त होकर मुनाफा कमाने के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार हैं। सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली चिकित्सा सुविधा भी जबसे निजी अस्पतालों में भी शुरू की गई तबसे एक चिकित्सा माफिया पूरे देश में पनप गया। दवाईयां बनाने वाली कम्पनियां भीं इसमें शामिल हो गयीं। पेथालोजी, स्केनिंग, एमआरआई जैसी जांच में भी कमीशनबाजी का खेल चल पड़ा। निजी मेडिकल कालेजों से पढ़कर डाक्टर बने युवाओं के मन में पहले दिन से ही अपनी पढ़ाई पर हुए मोटे खर्च की चक्रवृद्धि ब्याज दर से वसूली की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। इन परिस्थतियों में सरकार को आयुष्मान योजना के अंतर्गत निजी अस्पतालों को अधिकार देने के साथ ये भी देखना होगा कि इस व्यवस्था से वह आम आदमी ज्यादा लाभान्वित हो जिसके लिए सरकार करोड़ों रूपये खर्च करने के लिए तत्पर है न कि कमाई का अड्डा बन चुके निजी अस्पताल। आयुष्मान योजना निश्चित रूप से एक क्रांतिकारी निर्णय है जिसके लिए नरेंद्र मोदी प्रशंसा के हकदार है। किसी साधनहीन इन्सान को बिना स्वास्थ्य बीमा करवाए यदि पांच लाख तक का इलाज सरकारी खर्चे पर मिल जाए तो इससे बड़ी बात क्या होगी? देश में सरकारी कर्मचारियों को तो इलाज के सुविधा है। सांसद और विधायक तो आधुनिक सामंत हैं सो उनके लिए तो देश ही नहीं विदेश तक में इलाज का इंतजाम हो जाता है। आर्थिक दृष्टि से संपन्न लोग स्वास्थ्य बीमा करवाकर खुद को सुरक्षित कर लेते हैं लेकिन करोड़ों ऐसे लोग हैं जिनके पास डाक्टर की फीस देने तक के पैसे नहीं होते, जांच और दवाई तो बहुत बड़ी बात है। ऐसे लोगों के लिए ही आयुष्मान योजना वरदान बनकर आई लेकिन जैसा दिख रहा है उसके मुताबिक तो इसका हाल भी पहले जैसा हो रहा है। दिक्कत ये है कि सरकार के पास न तो पर्याप्त अस्पताल हैं और न ही संसाधन। दोनों हैं तो डाक्टरों का अभाव है। यही वजह है कि निजी अस्पतालों का जाल फैलता गया। छोटे और मझोले शहरों, कस्बों, गांवों में जाकर सेवा करने की भावना नई पीढ़ी के चिकित्सकों में लुप्तप्राय होते जाने से निजी चिकित्सा सेवाओं का भी शहरीकरण होता चला गया। आजादी के सात दशक बाद भी जबलपुर जैसे बड़े शहरों में रहने वालों को यदि बेहतर चिकित्सा हेतु दिल्ली, मुम्बई या अन्य किसी महानगर में जाना पड़ता है तो ये विचारणीय से ज्यादा शर्म का विषय है। आयुष्मान योजना जिस वर्ग के लिए शुरू की गयी वह शैक्षणिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टि से पीछे होने से उसकी आड़ में निजी अस्पतालों द्वारा की जाने वाली लूटखसोट से अनभिज्ञ रहता है। जिसका निजी अस्पाताल संचालक बेजा लाभ उठाते हैं। चूंकि इन अस्पतालों का संचालन अब केवल चिकित्सक नहीं बल्कि नेता, बिल्डर, उद्योगपति करने लगे हैं इसलिए यह सेवा पूरी तरह से व्यवसाय बनकर रह गई है। आयुष्मान योजना के विस्तार की बात बहुत ही नेक विचार है लेकिन उसे निजी अस्पतालों के हाथ सौंपने के खतरों से भी सरकार को सतर्क रहना होगा। जिस तरह बादलों से निकला वर्षा का जल पूरी तरह शुद्ध होता है। लेकिन पृथ्वी पर उतरने के बाद वह प्रदूषित होता जाता है ठीक वही हाल सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का होता है। लेकिन आयुष्मान योजना का सम्बन्ध चूंकि मानव जीवन की रक्षा से है इसलिए इस बारे में विशेष चिंता की जानी चाहिए कि जनता की बीमारी का इलाज करने वाली योजना ही कहीं बीमार होकर न रह जाए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 October 2019

कमलनाथ: बाहर से ज्यादा खतरा भीतर से



मप्र में कांग्रेस की सरकार 15 साल बाद आई और वह भी अल्पमत वाली। यद्यपि शुरू-शुरू में उसकी स्थिरता को लेकर जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं वे धीरे-धीरे ठंडी पड़ गईं। मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ शासन -प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाते जा रहे हैं। जो भाजपा नेता आये दिन सरकार गिराने की धमकी दिया करते थे वे पहले तो अपने दो विधायकों के टूटने से सनाके में आ गए और बची-खुची कसर पूरी कर दी हनी ट्रैप काण्ड ने जिसमें भाजपा के अनेक नेता लिप्त बताये जाने से पूरी पार्टी रक्षात्मक होकर रह गई। कहने वाले तो यहाँ तक कहते सुने जा सकते हैं कि श्री नाथ ने हनी ट्रैप मामले की जाँच जानबूझकर धीमी करवा दी जिससे भाजपा में घबराहट बनी रहे। शिवराज सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए कथित घोटालों की जाँच बिठाकर भी वे भाजपा पर दबाव जारी रखने का प्रयास कर रहे हैं। ताजा उदाहरण 450 करोड़ के पौधारोपण में घोटाले का आरोप लगाकर शिवराज सिंह चौहान और तत्कालीन वन मंत्री गौरीशंकर शेजवार के विरुद्ध जाँच करवाए जाने का है। इस सबसे मुख्यमंत्री का आत्मविश्वास जाहिर होता है। प्रदेश में निवेशक सम्मलेन आयोजित कर वे उद्योग जगत को भी ये सन्देश देने में जुटे हैं कि उनकी सरकार स्थायी है। लेकिन इससे अलग हटकर एक दूसरा चित्र भी है जो इस बात का संकेत देता है कि प्रदेश सरकार की हालत उतनी अच्छी नहीं जितनी ऊपर से नजर आ रही है और इसकी वजह है कांग्रेस पार्टी में व्याप्त गुटबाजी। जिस तरह से बड़े नेता और उनके पिछलग्गू बयानबाजी करते हुए एक दूसरे की टांग खींचने में जुटे हुए हैं उससे लगता है कि कमलनाथ का मुख्यमंत्री बनना उनकी पार्टी के सभी गुटों को अभी तक नहीं पचा। ज्योतिरादित्य सिंधिया तो सरकार बनने के कुछ दिनों बाद से ही रूठे-रूठे चल रहे हैं। कभी वे किसानों की समस्याओं को लेकर राज्य सरकार को घेरते हैं तो कभी कर्ज माफी में देर पर उसे कठघरे में खड़ा करने में नहीं हिचकिचाते। उनके कोटे के मंत्री भी दूसरे गुटों के मंत्रियों से उलझने में नहीं डरते। श्री सिंधिया के मन की पीड़ा सर्वविदित है। प्रदेश की सत्ता हाथ से निकलने का गम वे चाहकर भी भुला नहीं पा रहे और ऊपर से लोकसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित हार ने उनके आभामंडल को चकनाचूर करके रख दिया। कहाँ तो वे राष्ट्रीय राजनीति में ऊंची उड़ान का ख्वाब देखते फिर रहे थे और कहाँ दिल्ली में सरकारी बंगले से निकलकर निजी आवास में आने की मजबूरी से गुजरना पड़ा। राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष पद त्यागने के कारण भी ज्योतिरादित्य को झटका लगा। बीते कुछ समय से उनके जो बयान कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति के बारे में आये वे भी उनकी नाराजगी का संकेत हैं। लेकिन जिन दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ की ताजपोशी की राह आसान की वे भी जिस तरह की बातें कर रहे हैं उससे ये लगता है कि मुख्यमंत्री सरकार चलाने में इस बुरी तरह उलझ गये हैं कि पार्टी के भीतर सामंजस्य बनाये रखने की फुर्सत उन्हें नहीं है। स्मरणीय है अभी भी वही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं। गत दिवस राजमार्गों पर बैठी गायों को लेकर दिग्विजय सिंह द्वारा किये गये ट्वीट के जवाब में कमलनाथ के खासमखास मंत्री सज्जन सिंह वर्मा की तीखी प्रतिक्रिया और उसके बाद मुख्यमंत्री के लगातार दो-तीन ट्वीट से ये स्पष्ट हो गया कि दिग्विजय सिंह की दखलंदाजी श्री नाथ को भी नागवार गुजरने लगी है। उल्लेखनीय है कुछ समय पहले पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विभिन्न मंत्रियों को पत्र लिखकर जवाब मांगे जाने और उनके पास आकर सरकार के कामकाज का ब्यौरा पेश करने की बात पर जबर्दस्त बवाल मचा था। उमंग सिंगार नामक एक मंत्री ने तो दिग्विजय सिंह को जिस अंदाज में जवाब दिया उससे उनकी खूब किरिकिरी भी हुई। श्री सिंगार ने यहाँ तक कह दिया कि दिग्विजय सिंह परदे के पीछे से सरकार चला रहे हैं। उनके इस बयान का कमलनाथ खेमे तक को खंडन करना पड़ा। राजनीति के जानकार बताते हैं कि उमंग सदृश युवा मंत्री द्वारा दिग्विजय जैसे बड़े नेता से जुबान लड़ाना मामूली बात नहीं थी। लेकिन मुख्यमंत्री ने उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई न करते हुए संयम रखने की समझाइश मात्र दे दी। दिग्विजय के मंत्री पुत्र जयवर्धन ने अवश्य पिता का बचाव किया लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री को पार्टी के भीतर भी वैसा समर्थन नहीं मिला जैसी उन्हें उम्मीद रही होगी। उसके बाद से उनकी वजनदारी में निश्चित रूप से कमी आई। हालांकि वे सिंधिया खेमे के साथ जुड़ते नहीं दिखे लेकिन गत दिवस गोरक्षा को लेकर उन्होंने जिस तरह का ट्वीट किया और जिस तरह से पहले सज्जन सिंह और बाद में खुद मुख्यमंत्री ने जवाब दिया उससे दिग्विजय सिंह को ये एहसास हो गया होगा कि उन्हें अपनी वरिष्ठता का गुमान छोड़ देना चाहिए। लेकिन कमलनाथ को भी एक साथ ज्योतिरादित्य और दिग्विजय दोनों से टकराना नुकसानदेह हो सकता है। हालांकि श्री सिंह के कांग्रेस विरोधी होने की कोई सम्भावना नहीं है लेकिन श्री सिंधिया जिस तरह से छटपटा रहे हैं उसे देखते हुए उनके बागी होने की अटकलें हकीकत में बदल सकती हैं। कुछ सूत्र तो अमित शाह के साथ उनकी गुप्त मुलाकात हो जाने का दावा भी कर रहे हैं। ये भी सुनने में आया है कि बड़ौदा के राजपरिवार के जरिये ज्योतिरादित्य के भाजपा प्रवेश का तानाबाना बुना जा रहा है। उल्लेखनीय है उनकी पत्नी बड़ौदा के गायकवाड़ परिवार से हैं जिसके नरेंद्र मोदी और श्री शाह से नजदीकी सम्बन्ध हैं। बहरहाल ताजा हालातों में कमलनाथ सरकार को बाहरी तौर पर कोई खतरा भले नहीं हो लेकिन उनके अपने घर में ही बगावत के चिंगारियां सुलगने लगी हैं। ज्योतिरादित्य के बाद दिग्विजय का भी खुले आम सरकार पर निशाना साधना हवा में उड़ाने लायक बात नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 11 October 2019

चीन को दबाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा



आज की दुनिया में सामरिक शक्ति के समानांतर आर्थिक मजबूती का महत्व है ।  यही वजह है कि इमरान खान जब भारत को परमाणु युद्ध की धमकी देते हैं तब पूरी दुनिया में उसका मजाक बनता है। इसका कारण उसका फटेहाल हो जाना है। आर्थिक कूटनीति से किसी ताकतवर प्रतिद्वंदी को कैसे झुकाया जा सकता है इसका सबसे ताजा उदाहरण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा चीन  के विरुद्ध शुरू किया गया व्यापारिक युद्द (ट्रेड  वार) है। विश्व में चीन की गिनती आर्थिक महाशक्ति के तौर पर भी होने लगी थी। भारत जैसे देश तो खैर उसका  मुकाबला करने में सक्षम नहीं थे लेकिन अमेरिका तक चीन के आर्थिक प्रवाह को रोक पाने में खुद को असमर्थ महसूस करने लगा। अमेरिका के बाजारों में चीन उत्पादों का छा जाना आम बात होने लगी। वहां की वित्तीय संस्थाओं पर भी चीनी कम्पनियां  काबिज  होने लगीं। सबसे बड़ी बात ये हुई  कि सस्ते श्रमिकों  के लालच में अमेरिका की नामी गिरामी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पूंजी चीन में निवेशित हो गयी। धीरे - धीरे चीन की आर्थिक प्रगति उसके लिए चिंता का सबब बनने लगी। सोवियत संघ के विघटन के बाद चीन ही अमेरिका का सबसे प्रमुख वैचारिक प्रतिद्वंदी था। हालांकि विश्व की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला एशिया का यह देश माओवादी लौह आवरण वाले दौर से बाहर निकलकर बहुत हद तक पूंजीवादी संस्कृति और जीवन शैली में ढल चुका है।  बावजूद इसके चीन अभी भी अमेरिका की तुलना में काफी पीछे और अलग है। विस्तारवादी नीतियों की वजह से उसके सभी पड़ोसी देश उससे भयभीत रहते हैं। पहले वह केवल सामरिक ताकत से डराया करता था लेकिन ज्योंही उसने आर्थिक  मोर्चे पर दुनिया के विकसित देशों के बराबर खड़े होने की हैसियत प्राप्त कर ली त्योंहीं वह अमेरिका की निगाहों में खटकने लगा। इसीलिये डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका की बागडोर संभालते ही चीन के विरूद्ध व्यापारिक जंग शुरू करते हुए तरह - तरह के प्रतिबन्ध लगा दिए। इसका असर भी देखने मिला और साल दर साल कुलांचे मार रही चीन की अर्थव्यवस्था में उतार आने लगा। ट्रम्प ने अमेरिकी कम्पनियों को चीन से कारोबार समेटने के लिए बाध्य कर दिया। धीरे - धीरे वे वहां से उठकर भारत जैसे किसी दूसरे  देश में ठिकाने तलाशने लगीं जहां श्रमिक विकसित देशों की तुलना में सस्ते हैं। हालाँकि इस प्रक्रिया में समय लगेगा लेकिन चीन इससे घबराहट में है। उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग माओ के बाद सबसे ताकतवर नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने जीवन भर सत्ता में बने रहने की व्यवस्था भी साम्यवादी पार्टी से करवाली है। जिनपिंग ये भी समझ गये हैं कि  चीन अपनी सामरिक ताकत के बल पर वह सब हासिल नहीं कर पायेगा जो आर्थिक समृद्धि से संभव है। इसीलिये वह अमेरिका के व्यापारिक युद्ध से लडऩे के रास्ते तलाश रहा है। आज से शुरू हो रही जिनपिंग की दो दिवसीय भारत यात्रा उसी सिलसिले में है। चीन की महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड परियोजना खटाई में पडऩे के कारण उसकी काफी पूंजी फंसकर रह गई है। भारत द्वारा इस प्रकल्प से पूरी तरह दूरी बना लेने से भी चीन को परेशानी हुई। उधर पाकिस्तान के भीतर भी इसका विरोध होने लगा है। चीन द्वारा मुस्लिमों पर लगाई जा रहे प्रतिबंधों से  पकिस्तान के कट्टरपंथी संगठन काफी नाराज हैं। ऐसी  स्थिति में पाकिस्तान चीन के गले की हड्डी बन गया है। यद्यपि शुरू से ही भारत विरोधी नीति के कारण उसने पाकिस्तान को बिना शर्त समर्थन दिया लेकिन बीते कुछ  सालों से वह भारत को लेकर थोड़ा ही सही किन्तु लचीला हुआ है। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भी वह  चाहे - अनचाहे भारत के सुर में सुर मिलाता दिखता  है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि जम्मू - कश्मीर को लेकर भारत सरकार द्वारा बीते अगस्त माह में जो बड़े निर्णय लिए उनका विरोध करने के बाद भी चीन ने पाकिस्तान को वैसा समर्थन नहीं दिया जैसा वह अतीत में करता आया है। लेकिन उसका मूल चरित्र नहीं बदल सकता। जिनपिंग के भारत आने के पहले जब इमरान खान बीजिंग गए तब पहले तो जिनपिंग ने कश्मीर को द्विपक्षीय मसला मानकर भारत और पाकिस्तान द्वारा उसे मिलकर सुलझाने जैसी बात कहकर भारत को प्रसन्न कर दिया। लेकिन फिर पलटी मारते हुए पाकिस्तान को अपना पक्का  दोस्त बताकर भारत को चिढ़ाने की  हरकत दोहरा दी। ऐसे हालात में जिनपिंग का भारत दौरे का उद्देश्य समझना जरूरी है। ऐसा लगता है वे भारत को अमेरिकी  प्रभाव से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। नरेंद्र मोदी की  हालिया अमेरिका यात्रा से चीन काफी परेशान है। उसे मोदी सरकार द्वारा रूस से भी नजदीकी रिश्ते बना लेने से खुन्नस हो रही है। बीते पांच सालों में भारत ने सामरिक मोर्चे पर जिस तरह से अपनी  ताकत  में वृद्धि की उससे भी चीन सतर्क है । डोकलाम विवाद  के समय भारत द्वारा प्रदर्शित सख्त रवैये के बाद भी जब - जब सीमा पर चीनी सैनिकों की घुसपैठ हुई तब - तब भारत  संयम रखते हुए भी कड़ाई से पेश आया। जिनपिंग की वर्तमान भारत यात्रा का मकसद दरअसल अमेरिका की आर्थिक मोर्चेबंदी से निपटने में भारत का साथ और समर्थन हासिल करना है। उल्लेखनीय है ईरान के विरुद्ध डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाई गई बंदिशों से भारत के आर्थिक हित भी बुरी तरह प्रभवित हुए हैं। लेकिन उसने फिलहाल अमेरिका का विरोध नहीं करने की नीति अपना रखी है। इसका कारण वाशिंगटन का पाकिस्तान की प्रति कठोर हो जाना है। उसकी देखा - सीखी बाकी  पश्चिमी ताकतें भी भारत के प्रति उदार हुई हैं। हाल के सालों में चीन भी भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन बनाकर चलता रहा है। उसकी समझ में आ गया है कि भारत के साथ शत्रुता रखना उसके दूरगामी हितों के विरुद्द्ध होगा। जिनपिंग से मुलाक़ात के दौरान चाशनी में  लिपटी कूटनीतिक बातों के परे श्री मोदी को ये इशारा कर देना चाहिए कि चीन को जितना नुक्सान अमेरिका के  साथ व्यापार युद्ध में हो रहा है उतना ही भारत भी पहुंचा सकता है। आर्थिक मंदी के कारण भारत का घरेलू औद्योगिक ढांचा जिस तरह चरमराया उसकी वजह चीन में बनी सस्ती वस्तुएं ही हैं। भाजपा जिस स्वदेशी आन्दोलन से वैचारिक तौर पर जुडी हुई है उसका जोर चीनी वस्तुओं के आयात को नियंत्रित करना रहा है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के साथ ही भारतीय उद्योगपतियों के हितों की खातिर इस बारे में कड़े निर्णय लेने में मोदी सरकार हिचकती रही। लेकिन वर्तमान वैश्विक माहौल में चीन जिस तरह से दबाव में  है और उसकी आर्थिक प्रगति का आंकड़ा ढलान की तरफ जा रहा है तब भारत के लिए अच्छा अवसर है जब वह जिनपिंग को शुद्ध हिन्दी में समझा दे कि भारत के साथ सम्बन्ध रखना हैं तो उसमें धूर्तता के लिये कोई जगह नहीं होनी चाहिए। केवल कश्मीर ही नहीं वरन आर्थिक मोर्चे पर भी चीन को झुकाने का यह अच्छा  मौका है। जिनपिंग इस समय चौतरफा घिरे हैं। कश्मीर पर भारत को मिला अभूतपूर्व  वैश्विक समर्थन चीन के लिए भी चेतावनी है। नरेंद्र मोदी का कद भी विश्व राजनीति में बेहद ऊँचा होने से वे जिनपिंग के साथ बराबरी से निपट सकते हैं। राष्ट्रीय अपेक्षा यही है कि महाबलीपुरम में होने जा रही बातचीत में भारत अपना पलड़ा भारी रखने में सफल रहेगा। चीन की गर्दन  दबाने के इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए क्योंकि वह इस समय हर तरह से दबाव में है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 10 October 2019

जीएसटी रिफंड मिले और एनपीए का दबाव कम हो



कार्पोरेट टेक्स घटा दिया गया, विभिन्न चीजों पर जीएसटी की दरें भी कम कर दी गईं, रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में लगातार पांचवी बार कटौती करते हुए कर्ज सस्ते करने का रास्ता साफ  किया और उसके बाद गत दिवस केन्द्रीय कर्मचारियों और पेंशन धारियों को पांच फीसदी महंगाई भत्ता स्वीकृत कर दिया गया। ये सभी कदम किसी मेहरबानी के तहत नहीं उठाये गये बल्कि आर्थिक मंदी को दूर करने के लिए ऐसा करना केंद्र सरकार की मजबूरी बन गई थी। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव नहीं होते तब शायद राहतों की बरसात के लिए अभी कुछ दिन इंतजार और करना पड़ता। राजस्व की वसूली कम होने के बाद सौगातों का पिटारा खोला जाना अच्छा आर्थिक प्रबंधन नहीं है लेकिन सत्ता में बैठे लोगों का अर्थशास्त्र भी राजनीतिशास्त्र से प्रभावित रहता है। विशेष रूप से भारत जैसे देश में राजनीति का धंधा चूँकि वोटों की फसल पर आधारित होता है इसलिए तदनुसार नीति और निर्णय होते हैं। बीते कुछ दिनों में केंद्र सरकार ने जो कुछ भी किया उसके पीछे अर्थव्यवस्था को टेका लगाना प्रत्यक्ष कारण है लेकिन पर्दे के पीछे जो चर्चाएँ हैं उनके मुताबिक लोकसभा चुनाव के फौरन बाद और खास तौर पर केंद्र का बजट आते ही अर्थव्यवस्था पर मंदी की छाया और गहराने लगी। मोदी सरकार को अब तक की तमाम उपलब्धियों पर उसकी वजह से पानी फिरता देख अंतत: वही करना पड़ा जो अपरिहार्य था और काफी पहले हो जाना चाहिए था। दरअसल सत्ताधारी कुनबे के भीतर भी अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को लेकर चिंता व्यक्त होने लगी थी। अप्रैल से जून तक की पहली तिमाही की विकास दर जब पांच फीसदी पर आ गई तब आम जनता के मन में भी भय समाने लगा और उसी के बाद केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक और जीएसटी काउन्सिल सब एक साथ पसीज उठे। इन समस्त प्रयासों का समन्वित उद्देश्य बाजार में मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाकर मांग पैदा करना ही है जिससे कारोबारी जगत सन्निपात से उबरकर फिर से उठ खड़ा हो। उक्त सभी उपाय पूरी तरह से सकारात्मक और उपयोगी कहे जायेंगे जिनमें से कुछ का असर तत्काल प्रभाव से और कुछ का थोड़े समय बाद महसूस होगा। दबी जुबान ये खबर भी है कि निकट भविष्य में आयकर को लेकर भी बड़ा नीतिगत निर्णय लिया जा सकता है। उसकी दरें कम करने सम्बन्धी सिफारिशों पर सघन विचार-विमर्श चल रहा है। कहने वाले तो यहाँ तक दावा कर रहे हैं कि आयकर खत्म करते हुए किसी वैकल्पिक व्यवस्था की तलाश भी जारी है। खैर, वह तो जब होगा, तब होगा लेकिन आज की स्थिति में उद्योग और व्यापार जगत में छाई उदासी की एक बड़ी वजह है जीएसटी में कारोबारी जगत का पैसा फंस जाना। निजी क्षेत्र इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जीएसटी के रिफंड नहीं आने से व्यापारियों की पूंजी फंसकर रह गयी है। उससे उन्हें व्यापार को गतिशील बनाए रखने में मुसीबत हो रही हैं वहीं दूसरी तरफ  बैंकों से कर्ज लेने वाले कारोबारी एनपीए दूर करने के लिए बनाये जा रहे दबाव से हलाकान हैं। हालांकि इस बारे में बैंक और सरकार पूरी तरह से गलत नहीं हैं लेकिन सभी कारोबारियों को एक ही लाठी से हांका जाना सही नहीं है। बेहतर हो जीएसटी के रिफंड के साथ ही एनपीए को लेकर बनाये जाने वाले दबाव के संबंध में वित्त मंत्रालय समयोचित कदम उठाये। आर्थिक क्षेत्र में सरकार द्वारा हाल के वर्षों में उठाये गए क़दमों का देश के सभी वर्गों ने समर्थन किया और लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को एक मौका और दिया। लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं होने की वजह से उनका प्रभाव उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ, अपितु कुछ हद तक उलटा भी हो गया। सौभाग्यवश केंद्र सरकार की नीयत पर किसी को संदेह नहीं था। इसीलिये भारी असंतोष के बावजूद भी शांति बनी रही। लेकिन अब समय आ गया है जब सरकार को भी आभार स्वरूप व्यापार-उद्योग और जनता सभी की चिंताओं को दूर करने के लिए समुचित और समयबद्ध कदम उठाने चाहिए। किसी भी सरकार को अपनी नीतियाँ लागू करने के लिए एक कार्यकाल पर्याप्त होता है। भारत जैसे देश में चूंकि निर्णय प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी है इसलिये जनता ने नरेन्द्र मोदी को दूसरा अवसर दे दिया। लेकिन इस बार किसी बहाने की गुंजाइश नहीं रहेगी। दूसरी बात ये है कि दो और तीन साल पहले लिए गये कड़े और बड़े फैसलों का फायदा अब सामने आना चाहिए। अन्यथा जनता के मन में सत्ता के प्रति व्याप्त विश्वास में कमी आने में देर नहीं लगेगी। जीएसटी के रिफंड और एनपीए को लेकर बनाये जा रहे अनुचित दबाव के बारे में केंद्र के वित्त मंत्रालय को सार्थक कदम उठाने चाहिए जिससे कारोबार के रास्ते से रोड़े हटाये जा सकें।

-रवीन्द्र वाजपेयी



Wednesday, 9 October 2019

बाजार में मंदी की मार : ऑनलाइन गुले-गुलजार



भारत में दशहरा और दीपावली त्यौहारी मौसम के तौर पर जाने जाते हैं। यूँ तो हमारे यहाँ हर अंचल में सांस्कृतिक विविधता है लेकिन दशहरा और दीपावली पर पूरे देश में हर्षोल्लास का वातावरण बन जाता है।  वर्षा ऋतु की औपचारिक विदाई के बाद चार महीनों से ठहरी जि़न्दगी पटरी पर लौट आती है। मौसम खुशनुमा होते ही लोगों का मन भी उमंग और उत्साह से भर उठता है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है आर्थिक कारोबार अर्थात बाजार पर। नवरात्रि प्रारम्भ होते ही बाजारों में खरीददारी शुरू होने लगती है। दीपावली के पश्चात ही चूँकि शादी-विवाह के मुहूर्त निकलने लगते हैं इसलिए उसका असर भी बाजार पर पड़ता है। लेकिन इस वर्ष त्यौहार का मौसम आने के बावजूद भी बाजार में वह चहलपहल नहीं दिखाई दे रही जिसका व्यापारी वर्ग पूरे साल इन्तजार किया करते हैं। इसकी वजह आर्थिक मंदी बताई जा रही है जिसकी शुरुवात यूँ तो कई सालों पहले हो चुकी थी लेकिन जैसा आम तौर पर मान लिया गया है उसके अनुसार 2016 में हुई नोटबन्दी और उसके बाद 2017 में लागू हुए जीएसटी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से अस्त व्यस्त कर दिया। शुरू-शुरू में कहा गया कि ये प्रसव पीड़ा जैसा है लेकिन अभी तक जो हालात बने हुए हैं उनमें कोई भी ये बता पाने की स्थिति में नहीं है कि मंदी या सरकारी शब्दावली के अनुसार कारोबारी सुस्ती आखिर कब तक चलेगी। चूंकि इस वर्ष तमाम आशंकाओं को दरकिनार करते हुए मानसूनी वर्षा काफी जोरदार रही इसलिए कृषि क्षेत्र से अच्छी खबरें आने की उम्मीदें होने से बाजार में भी आशा का संचार तो हुआ है किंतु यहाँ भी विरोधाभास पीछा नहीं छोड़ रहा। जैसी कि जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक देश में पेट्रोल और डीजल के बाद सबसे ज्यादा आयातित होने वाले सोने का कारोबार इस साल आश्चर्यजनक रूप से कमजोर रहना तय है। दीपावली के दस दिन पहले धनतेरस पर सोने की रिकार्ड खरीदी होती रही है लेकिन इस साल उसका आंकड़ा भी 50 फीसदी नीचे आ जायेगा। बीते साल तक के आंकड़ों के मुताबिक धनतेरस पर देश भर में 40 टन सोने की बिक्री होती थी लेकिन इस साल इसका आधा भी बिक जाए तो बड़ी बात होगी।  सितम्बर के महीने में कुल 26 टन स्वर्ण का आयात हुआ जबकि गत वर्ष इसी दौरान लगभग 82 टन सोना विदेशों से खरीदा गया था। यद्यपि कुछ लिहाज से ये एक अच्छा लक्षण भी है क्योंकि सोने के आयात के लिए उपयोग होने वाली विदेशी मुद्रा के कारण रूपये का विनिमय मूल्य गिरता है।  व्यापार असंतुलन की एक बड़ी वजह सोना भी है।  हालाँकि स्वर्ण आभूषण बनाने वाले लाखों कारीगर भी इससे प्रभावित होंगे। बावजूद इसके यदि देश में सोने की मांग घटती है तो उसका दूरगामी असर अच्छा ही होगा क्योंकि उसके भंडारण से अर्थव्यवस्था को कोई लाभ नहीं होता।  लेकिन अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के कारोबार में मांग कम होने से बुरा असर पड़ता है। बीते काफी समय से बाजारों में जिस तरह की मुर्दानगी देखी जा रही है उसकी वजह से भय का महौल बन गया है। वाहनों की बिक्री में गिरावट को उच्च और मध्यम वर्गीय आय समूह से जुड़ा हुआ मानकर भले ही उपेक्षित कर दिया जाए लेकिन रोजमर्रे की चीजों की बिक्री में आई कमी से मंदी की पुष्टि की जा सकती है। आज ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की अध्यक्ष ने भी विश्वव्यापी मंदी को स्वीकार करते हुए कहा कि इस साल की वैश्विक विकास दर भी घटना तय है। हालाँकि वे भी दबी जुबान इसे अमेरिका और चीन के बीच चले ट्रेड वार का नतीजा बताती हैं लेकिन मंदी भी अर्थव्यस्था का एक चक्र माना जाता है और उस लिहाज से ये एक स्वाभाविक परिस्थिति है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में मंदी का असर कम हो सकता था बशर्ते हमारा घरेलू उत्पादन ज्यादा होता। लेकिन बीते कुछ सालों में चीन से हुआ बेतहाशा आयात ने भारतीय उत्पादकों को बहुत नुकसान पहुँचाया। उसे लेकर तरह-तरह की बहस और विश्लेष्ण होता रहा है। बीते दो साल में भारतीय उत्पादन इकाइयां मरणासन्न हालात में पहुँच गईं। इन सब कारणों से त्यौहारी बाजार ठंडा रहने के आसार और मजबूत होते जा रहे थे किन्त्तु इसके ठीक विपरीत ऑनलाइन कारोबार करने वाली दो प्रमुख कंपनियों ने बीते एक सप्ताह में ही 18 हजार करोड़ की बिक्री कर डाली और उन्हें उम्मीद है दीपावली तक ये आंकड़ा 42 हजार करोड़ तक जा पहुंचेगा। ये गत वर्ष की अपेक्षा 30 फीसदी ज्यादा होगा। आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक ये स्थिति दर्शाती है कि उपभोक्ता बेहतर मुनाफे के लिए इन कम्पनियों की तरफ  झुक रहा है जो उसे ज्यादा से ज्यादा रियायत देकर परम्परागत बाजार का हिस्सा अपने नाम करती जा रही हैं। बाजार में मंदी और ऑनलाइन कारोबार में रौनक का ये परस्पर विपरीत चित्र भ्रम की स्थिति को भी जन्म दे रहा है। इसका ये भी संकेत है कि भारत के बड़े उपभोक्ता बाजार को लुभाने की लिए व्यापारी समुदाय को भी नई रणनीति के साथ आगे आना होगा। दुकानदार और ग्राहक के पुश्तैनी सम्बन्धों का दौर धीरे-धीरे गुजरे जमाने की बात होता जा रहा है।  यहाँ तक कि स्वर्ण आभूषण खरीदने वाले ग्राहक भी अब सराफे की बजाय ब्रांडेड कम्पनी को प्राथमिकता देने लगे हैं। उस दृष्टि से देखें तो हर मुसीबत कुछ न कुछ सिखाती है। मंदी का ये दौर भारत के व्यापारिक ढांचे को कितना बदलता है ये देखने वाली बात होगी क्योंकि ऑनलाइन कारोबार का केवल विरोध करने से काम नहीं चलेगा। उसका मुकाबला करने के लिए व्यापार जगत को भी नई रणनीति पर काम करना होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 7 October 2019

प्रकृति, पर्यावरण और प्रगति में समन्वय जरूरी



महात्मा गांधी की 150 वीं जयन्ती से देश भर में एक बार उपयोग कर फेंक दी जाने वाली प्लास्टिक ( सिंगल यूज) की चीजों पर रोक का अभियान चल पड़ा है। केंद्र सरकार ने दिल्ली स्थित अपने दफ्तरों से इसकी शुरुवात भी कर दी। रेलवे ने प्लास्टिक के कप की जगह मिट्टी के कुल्हड़ वापिस लाने की पहल कर दी है। प्लास्टिक की थैलियों के स्थान पर कपड़े के थैले के उपयोग हेतु जन सामान्य से आग्रह किया जा रहा है। पर्यावरण के प्रति संवेदनशील लोग पालीथिन के उपयोग को रोकने के प्रति पहले से ही प्रयत्नशील थे। प्लास्टिक की घटिया चीजों को बनाने पर सरकारी रोक भी लागाई जा चुकी है। यद्यपि उसका अपेक्षित असर नहीं हुआ लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि उससे होने वाले नुकसानों के बारे में काफी बड़े वर्ग में जागरूकता आई। प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण को लेकर पूरे देश में सकारात्मक वातावरण नजर आना निश्चित्त रूप से आश्वस्त करता है। लेकिन अभी भी लापरवाही बरतने वाले तुलनात्मक रूप से ज्यादा हैं। इस वर्ष देश के अनेक हिस्सों में अतिवृष्टि होने से अनेक शहरों में जल प्लावन के हालात बन गये। देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में तो प्रति वर्ष बारिश के समय पानी भर जाने से लाखों लोगों का जीवन ठहर जाता है। ताजा उदाहरण बिहार की राजधानी पटना का है जहां लगभग एक सप्ताह तक पानी भरे रहने से आपदा प्रबन्धन के सभी इंतजाम धरे के धरे रह गए। सफाई में कहा गया कि सौ साल से भी ज्यादा समय के बाद पटना में इस तरह का जल प्लावन हुआ लेकिन पानी उतरने के बाद ये बात भी सामने आई कि पटना शहर की तमाम नालियां और नाले पानी की बोतलों, पोलीथिन की थैलियों, थर्मोकोल और गुटका के खाली पाउचों से भरे होने से अतिरिक्त जल की निकासी में व्यवधान पैदा हुआ तथा सड़कों से होता हुआ पानी घरों के भीतर भर गया। उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी तक को उनके घर से निकालने में बचाव दस्ते को जबर्दस्त मशक्कत करनी पड़ी। जिसे लेकर बिहार सरकार को हंसी का पात्र भी बनना पडा। शहरों ही नहीं अपितु छोटे-छोटे कस्बों तक में पॉलीथीन और प्लास्टिक से बनी बाकी चीजों के कारण जिस तरह की समस्याएँ पैदा हो गईं उनको देखने के बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि हम जागे तो लेकिन बहुत देर से। दरअसल प्रधानमन्त्री द्वारा लालकिले की प्राचीर से सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक लगाने की घोषणा के बाद देश भर में हरकत हुई। आम तौर पर उसका स्वागत ही हुआ। हालांकि प्लास्टिक के सामान बनाने वालों की लाबी ने भी समानांतर रूप से सक्रियता दिखाते हुए सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया लेकिन अच्छी बात ये है कि समाज ने प्रधानमंत्री के आह्वान को अच्छा समर्थन दिया। लेकिन सिंगल यूज प्लास्टिक के अलावा पैकिंग में अल्युमीनियम के उपयोग को लेकर भी चिंता के बादल मंडरा रहे हैं। थर्मोकोल भी दूसरी बड़ी समस्या है। एक समय था जब इनके बारे में कोई सोचता नहीं था लेकिन अब ये चीजें हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं। निश्चित रूप से इनकी वजह से पैकेजिंग उद्योग में जबर्दस्त क्रांति हुई और कारोबार भी बढ़ा लेकिन कालान्तर में इनकी वजह से पर्यावरण संबंधी जो समस्या उत्पन्न हुई उसकी तरफ  दुर्लक्ष्य किये जाने का दुष्परिणाम अब भयावह रूप में सामने आ चुका है। समय आ गया है जब देश में पैकेजिंग उद्योग को भी पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में सार्थक प्रयास किये जावें। जिन विकसित देशों से हमने ये सब चीजें ग्रहण कीं वहां एक तो आबादी बहुत कम है दूसरी बात ये भी है कि उनके यहाँ प्लास्टिक, थर्मोकोल और अल्युमीनियम जैसे कचरे के विनष्टीकरण का इंतजाम भी समय रहते कर लिया गया। ऐसे में एक आम उपभोक्ता तो प्लास्टिक के कैरी बैग या पॉलीथिन के विकल्प के तौर पर कपड़े के थैले को अपना लेगा लेकिन उद्योग जगत पैकेजिंग में उपयोग होने वाले थर्मोकोल, प्लास्टिक और पॉलीथिन के स्थान पर क्या उपयोग करेगा ये बड़ा सवाल है। आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो कपड़े के थैले का उपयोग करने की अपील को घड़ी की सुइयां पीछे घुमाने का प्रयास बताकर उसका उपहास कर रहे हैं। लेकिन ये बात भी पूरी तरह सही है कि पटना की बेकाबू बाढ़ के बाद भी अगर हम नहीं चेते तो दुनिया भर में हमारी छवि मूर्खों की बने बिना नहीं रहेगी। प्रकृति, पर्यावरण और विकास एक दूसरे के शत्रु बन जाएँ ये जरूरी नहीं है। भारतीय जीवन शैली में उनके साथ संतुलन बनाकर आगे बढऩे की प्रवृत्ति रही है। खान-पान, धर्म-कर्म सभी में प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखा जाता था। अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली खेती भी पूरी तरह से पर्यावरण के संरक्षण पर केन्द्रित थी। जल, जंगल और जमीन को देव स्वरूप माना जाता था। आधुनिकता के आगमन और बढ़ती आबादी के कारण उत्पन्न समस्याओं की वजह से पूरी तरह से अतीत को पुनर्जीवित करना तो संभव नहीं रहा लेकिन अब तक भी जो बचा रहा उसे सुरक्षित रखना भी बड़ी बात होगी। उस लिहाज से कपड़े के थैले , मिट्टी के कुल्हड़ और दोना - पत्तल का उपयोग पिछड़ेपन की बजाय हमारी प्रगतिशील सोच का प्रमाण बन सकती है। दक्षिण भारत के अनेक पांच सितारा होटलों तक में केले के पत्तों पर भोजन परोसे जाने को लोग पसंद करते हैं। कुछ दशक पहले तक शादी की दावतों में दोने-पत्तल और कुल्हड़ का ही उपयोग हुआ करता था। इसकी वजह से समाज के एक बड़े वर्ग को स्थायी रोजगार उपलब्ध था। सैकड़ों लोगों का भोजन होने के बाद भी आसपास का वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। विज्ञान का काम निरंतर नई चीजें खोजना है लेकिन इसका ये अर्थ नहीं है कि जो कुछ भी पुराना है वह रद्दी की टोकरी के लायक हो गया। जिस विज्ञान ने दुनिया को प्रदूषण दिया ये उसका दायित्व है कि वही उससे बचने के तरीके ईजाद करे। विश्व के अग्रणी देश भी चाहें तो भारत से सीख सकते हैं जिसने प्रकृति और पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए भी प्रगति की राह पर बढऩे का हुनर हासिल कर लिया था। लेकिन उसके पहले हम भारतवासियों को भी अपनी प्राचीन विरासत के प्रति स्नेह और सम्मान का भाव पुनर्जीवित करना होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 October 2019

आयकर में भी राहत दे सरकार



रिजर्व बैंक ने गत दिवस एक बार फिर कर्ज सस्ता कर दिया। शशिकांत दास के गवर्नर बनने के बाद से लगातार पांच समीक्षाओं में ब्याज दर घटाई गई। लेकिन अधिकतर बैंकों ने इसमें भांजी मार दी तथा उसका पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दिया। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा और घटी हुई ब्याज दर का समुचित लाभ तत्काल प्रभाव से कर्ज लेने वाले ग्राहकों तक पहुंच सकेगा। ऐसा करने के पीछे रिजर्व बैंक का उद्देश्य बाजार में नगदी की उपलब्धता बढ़ाकर आर्थिक सुस्ती को दूर करना है। श्री दास के पूर्ववर्ती गवर्नरों ने मुद्रा स्फीति को रोककर महंगाई पर लगाम लगाने के लिए ब्याज दरों में कमी नहीं करने की जो जिद ठान रखी थी उसकी वजह से बाजार में सुस्ती बढ़ती गयी जिसके परिणामस्वरूप भारतीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक सके। वर्तमान हालात अचानक पैदा नहीं हुए। रिजर्व बैंक की स्वायत्तता निश्चित तौर पर जरूरी है लेकिन वह स्वेच्छाचारिता की स्थिति तक चली जाए, ये भी उचित नहीं है। रघुराम राजन ने उस दृष्टि से अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने में बड़ी भूमिका निबाही। कई अवसरों पर तो लगा मानों वे किसी और के इशारों पर चलते हुए सरकार के लिए मुसीबतें पैदा कर रहे हों। उनके बाद आये गवर्नर भी बहुत संतुष्ट नहीं कर सके। इस सबसे परेशान होकर ही जब केंद्र सरकार ने श्री दास को रिजर्व बैंक की कमान सौंपी तब ये आरोप लगा कि प्रधानमंत्री ने अपने आज्ञाकारी अधिकारी को बिठाकर देश के केन्द्रीय बैंक को भी सरकारी नियंत्रण में ले लिया है। बीच में उससे अतिरिक्त लाभांश वसूलने पर भी खूब बवाल मचा। लेकिन श्री दास के आने के बाद कम से कम एक काम तो अच्छा हुआ कि केंद्र सरकार और केन्द्रीय बैंक के बीच आये दिन होने वाली खींचातानी बंद हो गई और वह अर्थव्यवस्था की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक फैसले लेने लगा। पिछली पांच बैठकों में ब्याज दर कुल 1.35 फीसदी कम होने से बीते दस साल के न्यूनतम स्तर 5.15 प्रतिशत पर आ गयी जो उत्साहजनक है। पिछले गवर्नरों को दरें घटाने से महंगाई बढऩे का डर सताया करता था किन्तु अभी तक के अनुमानों के अनुसार उसके 3.7 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रहने से चिंता का कोई कारण नहीं रहेगा। हालांकि शेयर बाजार में ब्याज दर घटने के बाद भी गिरावट देखी गई लेकिन उसका मुख्य कारण मनोवैज्ञानिक था क्योंकि रिजर्व बैंक ने वार्षिक विकास दर के अनुमान को घटाकर 6.1 फीसदी कर दिया। चूंकि घटी हुई ब्याज दरों का असर आने में कुछ समय लगता है इसलिए माना जा सकता है कि दीपावली के दौरान न सही लेकिन उसके बाद इसका अनुकूल प्रभाव अवश्य पड़ेगा। बारीकी में जाने पर ये लगता है कि रिजर्व बैंक को ब्याज दर में कम से कम एक फीसदी की कमी अभी और करनी चाहिए जिससे हमारे उत्पादन सस्ते होकर चीन से आयातित उपभोक्ता वस्तुओं का मुकाबला कर सकें। दूसरी बेहद महत्वपूर्ण बात गृह निर्माण क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की है। अधो संरचना (इन्फ्रा स्ट्रक्चर) के बाद इसी क्षेत्र पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना जरूरी है। जहां तक बात ऑटोमोबाईल उद्योग में मंदी की है तो वह उतनी चिंता का विषय नहीं है लेकिन गृह निर्माण को यदि और सहूलियतें तथा रियायतें मिलें तो औद्योगिक गतिविधियों में स्वाभाविक तेजी आ जायेगी। उल्लेखनीय है कि यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें छोटी से बड़ी सैकड़ों चीजों का इस्तेमाल होने के साथ बड़ी मात्रा में रोजगार का सृजन होता है। बताने की जरूरत नहीं है कि खेती के बाद सबसे ज्यादा श्रमिक निर्माण गतिविधियों में ही लगते हैं। ग्रामीण इलाकों से शहरों में काम की तलाश में गए अकुशल श्रमिक को निर्माण कार्यों में ही रोजी-रोटी का साधन मिलता है लेकिन इसके लिए सरकार को न्यूनतम मजदूरी के नियमों में व्यवहारिकता लाने के साथ ही श्रम कानूनों में नौकरशाही की तानाशाही दूर करनी होगी। अर्थव्यवस्था को लेकर मंडरा रहे चिंता के बादलों के बीच अच्छी खबर ये है कि भरपूर मानसूनी वर्षा के कारण खरीफ की अच्छी फसल आने वाली है जिसकी वजह से सितम्बर से दिसम्बर की तिमाही में आर्थिक विकास दर की गिरावट का क्रम सुधरेगा। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अतिरिक्त वर्षा से जमीन के भीतर विद्यमान नमी से रबी फसल को भी जबर्दस्त फायदा होने की उम्मीद बढ़ी है। हालाँकि ये कहना जल्दबाजी होगी कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था छलांगें लगाने की स्थिति में लौट आयेगी लेकिन सरकार और रिजर्व बैंक के बीच अच्छे तालमेल से ये जरुर लगने लगा है कि सही समय पर जरूरी फैसले लिये जा सकेंगे। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते दिनों जो रियायतें दीं उनसे जो उम्मीद जगी उसमें रिजर्व बैंक के ताजा फैसले से और वृद्धि हुई। लेकिन सरकार के पास विशेषज्ञ समिति की जो रिपोर्ट आई है उसके अनुसार आयकर की दरें कम करने का निर्णय लेना भी अच्छा उपाय होगा क्योंकि देश के मध्यम वर्ग के पास पैसा होने पर ही बाजार में रौनक दिखाई देती है। वैसे प्रधानमन्त्री को अपनी पार्टी के सांसद डा. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा आयकर समाप्त करने के सुझाव पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि यह भारत में भ्रष्टाचार, कर अपवंचन और काले धन के सृजन का सबसे बड़ा कारण है। हो सकता है वे इस निर्णय को भविष्य के लिए बचाकर रखे हों किन्तु बेहतर होगा इसे जल्द से जल्द प्रभावशील किया जाए। चाहें तो इस मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस चलाकर जनमत भी लिया जा सकता है। रिजर्व बैंक के ताजा निर्णय से अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर हो न हो लेकिन लोगों में ये भरोसा जरुर जागेगा कि उनकी आवाज पर ध्यान दिया जा रहा है। वैसे ये सब यही समय रहते कर लिया जाता तो अच्छे दिन के लिए इन्तजार और आगे नहीं बढ़ता।

-रवीन्द्र वाजपेयी