Wednesday, 16 October 2019

बेपेंदी के लोटों की घर वापिसी



मप्र के जिन दो भाजपा विधायकों ने कुछ माह पूर्व विधानसभा में कमलनाथ सरकार के विधेयक का समर्थन कर कांग्रेस में जाने के संकेत दिए थे उनमें से एक नारायण त्रिपाठी गत दिवस भाजपा में वापिस आ गए। उनके साथ ही पार्टी से दूर होने वाले विधायक शरद कोल के बारे में भी दावा किया गया कि वे भाजपा में ही हैं। दरअसल इन दोनों ने जब सरकारी विधेयक के पक्ष में मतदान किया उस समय चूंकि भाजपा ने किसी भी तरह का व्हिप जारी नहीं किया था इसलिए दोनों पर दलबदल कानून लागू नहीं हुआ। हालाँकि दोनों ने क्षेत्रीय विकास के नाम पर मुख्यमंत्री की शान में कसीदे पढ़ते हुए भाजपा को कोसा भी लेकिन पार्टी ने उनके विरुद्ध किसी भी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जिससे तकनीकी तौर पर वे पार्टी के ही विधायक बने रहे। बावजूद उसके सदन में सरकार का समर्थन करने के बाद से वे भाजपा के करीब नहीं नजर आये और आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करने में भी नहीं चूके। जिस समय उन्होंने विधानसभा में कमलनाथ सरकार का साथ दिया उस समय भाजपा के छोटे से लेकर बड़े नेता तक कमलनाथ सरकार गिराने की डींगें हांका करते थे। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव तो हाईकमान का इशारा मिलने भर की बातें करते सुने गए। लेकिन ज्योंही उक्त दोनों विधायकों ने पाला बदला त्योंही सरकार गिराने की बजाय भाजपा अपना घर बचाने में जुट गई। अब अचानक वे दोबारा पार्टी से कैसे जुड़े ये तो वही जानें। शरद कोल ने तो सार्वजानिक तौर पर ज्यादा कुछ नहीं कहा लेकिन श्री त्रिपाठी ने जो बयान दिया वह उनकी बेशर्मी का परिचायक है। वैसे वे हैं भी पुराने दलबदलू। 2013 में वे मप्र की मैहर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक बने लेकिन 2014 में विधायकी छोडकर भाजपा में आ गए और उपचुनाव में जीते। 2018 में फिर चुने गए लेकिन कुछ महीनों बाद ही कांग्रेस के करीब जा बैठे। दरअसल उक्त दोनों विधायक मंत्री बनने के लालच में कमलनाथ के झंडे तले चले तो गए लेकिन उसके लिए उन्हें विधायकी छोड़कर उपचुनाव लडऩा पड़ता जिसके लिए शायद कांग्रेस राजी नहीं थी। उनके सामने परेशानी ये थी कि विधानसभा में उन्हें भाजपा के साथ ही बैठना पड़ता और व्हिप जारी होने पर उसका पालन करते हुए सरकार के विरोध में मतदान करना पड़ता। राजनीति में माहिर कमलनाथ को जब लगा कि ये दोनों उनके लिए बोझ बन जायेंगे तब उनकी उपेक्षा शुरू हो गई, जिसके बाद बाद शरद कोल चुपचाप और नारायण त्रिपाठी ढोल पीटते हुए भाजपा में लौट आये। श्री त्रिपाठी कभी समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे थे। प्रदेश में सत्ता से बाहर बैठी भाजपा के लिए झाबुआ उपचुनाव के ठीक पहले दोनों विधायकों का घर लौट आना निश्चित तौर पर मनोबल बढ़ाने वाला तो है किन्तु ऐसे बेपेंदी के मिर्जापुरी लोटा कहलाने वाले विधायकों पर दोबारा भरोसा करना किसी भी लिहाज से अक्लमंदी नहीं है। लेकिन भाजपा को अब इन सबसे कोई सरोकार नहीं रहा। सत्ता की अंधी दौड़ में नैतिकता , निष्ठा और ईमानदारी कांग्रेस की तरह उसके लिए भी फिजूल की बातें बनकर रह गईं हैं। शरद कोल तो पिछले विधानसभा चुनाव के पहले तक कांग्रेस के पदाधिकारी तक रह चुके थे। जहां तक बात श्री त्रिपाठी की है तो उनके अवसरवादी और मतलबपरस्त होने में किसी को कोई संदेह न पहले था और न ही अब है। उन दोनों ने सदन में कमलनाथ सरकार के पक्ष में मत देने के बाद व्हिप नहीं होने से अनजाने में वैसा करने की बात कही होती तब उन्हें निर्दोष माना जा सकता था। लेकिन बाद में उनके द्वारा की गयी बयानबाजी से जाहिर था कि कांग्रेस के साथ उनकी बातचीत पहले से चल रही थी। उन्होंने भाजपा में उपेक्षा के आरोप भी लगाए। लेकिन जब उन्हें लगा कि एक तो कांग्रेस उन्हें भाव नहीं दे रही और विधायकी छोड़कर उपचुनाव लडऩा खतरे से खाली नहीं होगा तब वे घर वापिसी का नाटक करते हुए लौट आये। भाजपा भी उनका स्वागत करने इस तरह बेताब दिखी मानों मेले में खोये हुए भाई वापिस लौट आये हों। दो विधायकों के रूठकर जाने और फिर मान-मनौव्वल के बाद वापिस आ जाने का ये किस्सा भाजपा के लिए अब नया नहीं है। लेकिन इससे उसके निष्ठावान कार्यकर्ताओं और नेताओं पर क्या गुजरती है ये भी उसके कर्ताधर्ताओं को सोचना चाहिये। राजनीति उसके लिए केवल सत्ता का खेल हो गयी है तब उसे बेहिचक ये स्वीकार करना चाहिए कि इस मामले में वह भी और दलों की तरह ही है। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से उसने नई भर्ती वालों को टिकिट दी उससे उसकी वैचारिक पहिचान पर एक बार फिर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। मप्र में उसके दो विधायकों के कांगे्रस की गोद में जाकर बैठ जाने और स्वार्थसिद्धि नहीं होने के बाद मीठी - मीठी बातें करते हुए लौट आने का समूचा घटनाचक्र राष्ट्रीय राजनीति की पहिचान सा बन गया है लेकिन भाजपा भी उसी का हिस्सा बन गई ये देखकर उन लोगों को आश्चर्य कम और दु:ख ज्यादा होता है जो उसकी नीतियों और सिद्धांतों के कारण उसका समर्थन करते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 15 October 2019

कश्मीर घाटी में एक अच्छी शुरुवात



जम्मू-कश्मीर में 72 दिनों के बाद पोस्ट पेड मोबाईल फोन  सेवा बहाल कर दी गयी। उससे एसएमएस भी भेजे जा सकेंगे। प्री पेड कनेक्शन पर बातचीत की सुविधा अभी रुकी रहेगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार 40 लाख मोबाईल फोनधारियों के बंद पड़े फोन चालू होने से घाटी के भीतर संचार और संवाद को लेकर व्याप्त दिक्कतें दूर हो सकेंगी। घाटी के भीतर रहने वाले आम नागरिक और बाहर रहने वाले  उनके परिजनों के बीच बीते दो माह से भी ज्यादा से कोई बातचीत नहीं हो पा रही थी। इसको लेकर न सिर्फ  वहां के नेता बल्कि घाटी के बाहर की विपक्षी पार्टियां भी सवाल उठा रही थीं। केंद्र  सरकार द्वारा जब - जब भी घाटी में हालात सामान्य होने की बात कही गयी  तब - तब ये प्रश्न भी उठा कि यदि सब कुछ ठीक ठाक है तो घाटी को मोबाईल सेवा से वंचित क्यों रखा गया है ? कश्मीर के लोगों को भी इस बात पर जबर्दस्त शिकायत थी कि उनकी आवाज को पूरी तरह से दबाकर केंद्र सरकार तानाशाही पर उतारू है। ये बात भी सही है कि ये समस्या केवल घाटी की ही थी। जम्मू और लद्दाख के लोगों ने तो अनुच्छेद 370 हटाये जाने का खुलकर समर्थन किया था इसलिए वहां सरकार को किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका नहीं थी लेकिन कश्मीर घाटी के भीतर अलगाववाद की भावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से मोबाईल ही नहीं लैंडलाइन और इन्टरनेट भी बंद कर  दिए गए।   निश्चित रूप से इससे आम जनता को भारी परेशानी हुई लेकिन देश विरोधी ताकतों के सम्पर्क सूत्र काटने का इसके अलावा और कोई  चारा भी नहीं था। वैसे भी ये पहला अवसर नहीं था जब घाटी में संचार सुविधाएं बाधित की गयी हों। आतंकवादी संगठनों के पाकिस्तान से संपर्क सर्वविदित हैं। उसे देखते हुए ये कदम नहीं उठाया गया होता तो अनुच्छेद 370 हटाने के बाद घाटी में स्थिति अनियंत्रित होना स्वाभाविक था क्योंकि मोबाइल और इन्टरनेट के जरिये अफवाहें फैलाने वाला तंत्र भी सक्रिय हुए बिना नहीं रहता। घाटी में छिपे बैठे आतंकवादी भी आपस में संपर्क करते हुए लोगों को भड़काने का काम कर सकते थे। उस लिहाज से केंद्र सरकार द्वारा समय रहते जो सख्त फैसला लिया वह कारगर रहा। भले ही कोई कुछ भी कहे लेकिन घाटी में बीते दो महीने के दौरान यदि हालात नियंत्रण में रहे तो उसमें सुरक्षा बलों की तैनाती के अलावा संचार सुविधाएं ठप कर देने का भी बड़ा योगदान रहा। हालांकि दूरस्थ क्षेत्रों में भले ही छोटी-छोटी घटनाएं हुईं लेकिन कहीं भी बलप्रयोग की नौबत नहीं आई। इस दौरान किसी की जान भी नहीं  गयी जो उल्लेखनीय है। अभी तक की स्थिति का आकलन करने के बाद केंद्र सरकार ने पहले पर्यटकों की आवाजाही पर लगी रोक हटाई और उसके बाद पोस्ट पेड मोबाईल सेवा भी शुरू करवा दी। इससे लगता है कि सरकार को ये भरोसा हो गया है कि घाटी में हालात पूरी तरह से काबू में हैं  और आतंकवादी नेटवर्क पूरी तरह से छिन्न - भिन्न हो चुका है। हुर्रियत सहित तमाम राजनीतिक नेताओं के नजरबन्द रहने से अलगाववादी गतिविधियां भी ठंडी हैं। घाटी में सर्दियों की   दस्तक शुरू हो चुकी है। ऐसे में वहां जनजीवन सामान्य करने की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम शुरुवात हो सकती है। जम्मू-कश्मीर का विधिवत विभाजन भी होने को है। उस हेतु प्रशासनिक व्यवस्था भी तदनुसार बदलेगी। इसलिए भी संचार सुविधाएं चरणों में बहाल करने की जरूरत महसूस की गयी  होगी। लेकिन ये घाटी  की जनता के व्यवहार पर निर्भर  होगा कि प्रतिबंधों को और शिथिल किया जाए अथवा नहीं। घाटी को पूरी तरह सामान्य मान लेना जल्दबाजी होगी। ज्योंहीं लोगों के बीच सम्पर्क कायम होगा परदे के पीछे छिपे भारत विरोधी तत्व अपनी  हरकतों से बाज नहीं आयंगे। बेहतर होगा जो लोग अमनपसंद हैं वे थोड़ी हिम्मत और समझदारी दिखाते हुए सरकार द्वारा सामान्य स्थिति बहाली के लिए उठाये जा रहे कदमों को सार्थक बनाने में मदद करें। क्योंकि यदि इस छूट का दुरूपयोग हुआ और अलगाववादी तत्वों ने इसका लाभ लेकर घाटी में अशांति फैलाने की कोशिश की तो फिर केंद्र सरकार के पास दोबारा रोक लगाने का विकल्प ही बच रहेगा और उस सूरत में घाटी  के लोगों के प्रति जो थोड़ी सी सहानुभूति है वह भी जाती रहेगी। कश्मीर के चंद लोग और उनके सरपरस्त चाहे कितना भी जोर लगा लें लेकिन कश्मीर में अनुच्छेद 370 की वापिसी अब नामुमकिन है। केंद्र शासित हो जाने से जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह से कायम हो चुका है और आगे भी रहेगा। नौकरशाही में बैठे भारत विरोधी मानसिकता के लोगों को भी अब पहले जैसी आजादी नहीं रहेगी। पुलिस भी अलगाववादी संगठनों के प्रति पूर्ववत उदारता नहीं दिखा सकेगी। केंद्र सरकार ने बीते दो माह में जिस तरह की मोर्चेबंदी की उससे घाटी में ये एहसास तो मजबूत हुआ है कि केंद्र सरकार मजबूत इरादों के साथ काम कर रही है। यदि घाटी  के आम लोग इस अवसर का लाभ लेकर भारत विरोधी भावनाएं फैलाने वालों को उपेक्षित करना शुरू कर दें तब इस राज्य के विकास की गति तेज होते देर नहीं लगेगी। वरना घाटी आगे भी आग में जलती रहेगी और लोग सस्ते में मारे जाते रहेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 14 October 2019

आयुष्मान योजना को बीमार होने से बचाना जरूरी



सरकार द्वारा जनता के हित में बनाई जाने वाली अच्छी नीतियों का क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं होने की वजह से एक तो उनका मकसद पूरा नहीं होता और दूसरे वे भ्रष्टाचार के मकडज़ाल में फंकर रह जाती हैं। इन्हीं में से एक है प्रधानमन्त्री द्वारा देश के लगभग 55 करोड़ ऐसे लोगों के लिए पांच लाख तक की चिकित्सा निशुल्क प्रदान करने प्रारम्भ की गयी आयुष्मान योजना, जो इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। चूंकि सरकारी अस्पतालों में न तो पर्याप्त क्षमता है और न ही अपेक्षित सुविधाएं इसलिए निजी अस्पतालों में इलाज करवाने पर भी आयुष्मान योजना का लाभ प्रदान कर दिया गया। इस निर्णय में सरकार की नेकनीयती साफ झलकती है लेकिन इस सुविधा का लाभ साधनहीन मरीज को कितना मिल रहा है उससे ज्यादा सवाल इस बात का उठ खड़ा हुआ कि इसकी आड़ में निजी अस्पतालों ने कितनी लूट मचानी शुरू कर दी। हाल ही में छत्तीसगढ़ से खबर आई थी कि एक निजी अस्पताल ने साल भर के भीतर लगभग 300 रीढ़ की हड्डी के जटिल आपरेशन कर डाले। मप्र सरकार द्वारा संचालित इसी तरह की स्वास्थ्य योजना में निजी अस्पतालों द्वारा की गयी लूटमार सर्वविदित है। इस लिहाज से आज आई उस खबर ने ध्यान आकर्षित किया कि आयुष्मान योजना का लाभ घर के ही नजदीक उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से छोटे और मझोले शहरों में आधुनिक निजी अस्पतालों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम करते हुए 100 बिस्तरों की क्षमता वाले 1000 नये अस्पाताल खोले जाएंगे। सरकारी अस्पतालों की कमी के मद्देनजर इस तरह की योजना स्वागतयोग्य है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि निजी क्षेत्र की चिकित्सा सेवा में सेवा भाव तो लगभग खत्म हो चुका है और वे भी पूंजी के खेल में लिप्त होकर मुनाफा कमाने के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार हैं। सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली चिकित्सा सुविधा भी जबसे निजी अस्पतालों में भी शुरू की गई तबसे एक चिकित्सा माफिया पूरे देश में पनप गया। दवाईयां बनाने वाली कम्पनियां भीं इसमें शामिल हो गयीं। पेथालोजी, स्केनिंग, एमआरआई जैसी जांच में भी कमीशनबाजी का खेल चल पड़ा। निजी मेडिकल कालेजों से पढ़कर डाक्टर बने युवाओं के मन में पहले दिन से ही अपनी पढ़ाई पर हुए मोटे खर्च की चक्रवृद्धि ब्याज दर से वसूली की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। इन परिस्थतियों में सरकार को आयुष्मान योजना के अंतर्गत निजी अस्पतालों को अधिकार देने के साथ ये भी देखना होगा कि इस व्यवस्था से वह आम आदमी ज्यादा लाभान्वित हो जिसके लिए सरकार करोड़ों रूपये खर्च करने के लिए तत्पर है न कि कमाई का अड्डा बन चुके निजी अस्पताल। आयुष्मान योजना निश्चित रूप से एक क्रांतिकारी निर्णय है जिसके लिए नरेंद्र मोदी प्रशंसा के हकदार है। किसी साधनहीन इन्सान को बिना स्वास्थ्य बीमा करवाए यदि पांच लाख तक का इलाज सरकारी खर्चे पर मिल जाए तो इससे बड़ी बात क्या होगी? देश में सरकारी कर्मचारियों को तो इलाज के सुविधा है। सांसद और विधायक तो आधुनिक सामंत हैं सो उनके लिए तो देश ही नहीं विदेश तक में इलाज का इंतजाम हो जाता है। आर्थिक दृष्टि से संपन्न लोग स्वास्थ्य बीमा करवाकर खुद को सुरक्षित कर लेते हैं लेकिन करोड़ों ऐसे लोग हैं जिनके पास डाक्टर की फीस देने तक के पैसे नहीं होते, जांच और दवाई तो बहुत बड़ी बात है। ऐसे लोगों के लिए ही आयुष्मान योजना वरदान बनकर आई लेकिन जैसा दिख रहा है उसके मुताबिक तो इसका हाल भी पहले जैसा हो रहा है। दिक्कत ये है कि सरकार के पास न तो पर्याप्त अस्पताल हैं और न ही संसाधन। दोनों हैं तो डाक्टरों का अभाव है। यही वजह है कि निजी अस्पतालों का जाल फैलता गया। छोटे और मझोले शहरों, कस्बों, गांवों में जाकर सेवा करने की भावना नई पीढ़ी के चिकित्सकों में लुप्तप्राय होते जाने से निजी चिकित्सा सेवाओं का भी शहरीकरण होता चला गया। आजादी के सात दशक बाद भी जबलपुर जैसे बड़े शहरों में रहने वालों को यदि बेहतर चिकित्सा हेतु दिल्ली, मुम्बई या अन्य किसी महानगर में जाना पड़ता है तो ये विचारणीय से ज्यादा शर्म का विषय है। आयुष्मान योजना जिस वर्ग के लिए शुरू की गयी वह शैक्षणिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टि से पीछे होने से उसकी आड़ में निजी अस्पतालों द्वारा की जाने वाली लूटखसोट से अनभिज्ञ रहता है। जिसका निजी अस्पाताल संचालक बेजा लाभ उठाते हैं। चूंकि इन अस्पतालों का संचालन अब केवल चिकित्सक नहीं बल्कि नेता, बिल्डर, उद्योगपति करने लगे हैं इसलिए यह सेवा पूरी तरह से व्यवसाय बनकर रह गई है। आयुष्मान योजना के विस्तार की बात बहुत ही नेक विचार है लेकिन उसे निजी अस्पतालों के हाथ सौंपने के खतरों से भी सरकार को सतर्क रहना होगा। जिस तरह बादलों से निकला वर्षा का जल पूरी तरह शुद्ध होता है। लेकिन पृथ्वी पर उतरने के बाद वह प्रदूषित होता जाता है ठीक वही हाल सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का होता है। लेकिन आयुष्मान योजना का सम्बन्ध चूंकि मानव जीवन की रक्षा से है इसलिए इस बारे में विशेष चिंता की जानी चाहिए कि जनता की बीमारी का इलाज करने वाली योजना ही कहीं बीमार होकर न रह जाए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 October 2019

कमलनाथ: बाहर से ज्यादा खतरा भीतर से



मप्र में कांग्रेस की सरकार 15 साल बाद आई और वह भी अल्पमत वाली। यद्यपि शुरू-शुरू में उसकी स्थिरता को लेकर जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं वे धीरे-धीरे ठंडी पड़ गईं। मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ शासन -प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाते जा रहे हैं। जो भाजपा नेता आये दिन सरकार गिराने की धमकी दिया करते थे वे पहले तो अपने दो विधायकों के टूटने से सनाके में आ गए और बची-खुची कसर पूरी कर दी हनी ट्रैप काण्ड ने जिसमें भाजपा के अनेक नेता लिप्त बताये जाने से पूरी पार्टी रक्षात्मक होकर रह गई। कहने वाले तो यहाँ तक कहते सुने जा सकते हैं कि श्री नाथ ने हनी ट्रैप मामले की जाँच जानबूझकर धीमी करवा दी जिससे भाजपा में घबराहट बनी रहे। शिवराज सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए कथित घोटालों की जाँच बिठाकर भी वे भाजपा पर दबाव जारी रखने का प्रयास कर रहे हैं। ताजा उदाहरण 450 करोड़ के पौधारोपण में घोटाले का आरोप लगाकर शिवराज सिंह चौहान और तत्कालीन वन मंत्री गौरीशंकर शेजवार के विरुद्ध जाँच करवाए जाने का है। इस सबसे मुख्यमंत्री का आत्मविश्वास जाहिर होता है। प्रदेश में निवेशक सम्मलेन आयोजित कर वे उद्योग जगत को भी ये सन्देश देने में जुटे हैं कि उनकी सरकार स्थायी है। लेकिन इससे अलग हटकर एक दूसरा चित्र भी है जो इस बात का संकेत देता है कि प्रदेश सरकार की हालत उतनी अच्छी नहीं जितनी ऊपर से नजर आ रही है और इसकी वजह है कांग्रेस पार्टी में व्याप्त गुटबाजी। जिस तरह से बड़े नेता और उनके पिछलग्गू बयानबाजी करते हुए एक दूसरे की टांग खींचने में जुटे हुए हैं उससे लगता है कि कमलनाथ का मुख्यमंत्री बनना उनकी पार्टी के सभी गुटों को अभी तक नहीं पचा। ज्योतिरादित्य सिंधिया तो सरकार बनने के कुछ दिनों बाद से ही रूठे-रूठे चल रहे हैं। कभी वे किसानों की समस्याओं को लेकर राज्य सरकार को घेरते हैं तो कभी कर्ज माफी में देर पर उसे कठघरे में खड़ा करने में नहीं हिचकिचाते। उनके कोटे के मंत्री भी दूसरे गुटों के मंत्रियों से उलझने में नहीं डरते। श्री सिंधिया के मन की पीड़ा सर्वविदित है। प्रदेश की सत्ता हाथ से निकलने का गम वे चाहकर भी भुला नहीं पा रहे और ऊपर से लोकसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित हार ने उनके आभामंडल को चकनाचूर करके रख दिया। कहाँ तो वे राष्ट्रीय राजनीति में ऊंची उड़ान का ख्वाब देखते फिर रहे थे और कहाँ दिल्ली में सरकारी बंगले से निकलकर निजी आवास में आने की मजबूरी से गुजरना पड़ा। राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष पद त्यागने के कारण भी ज्योतिरादित्य को झटका लगा। बीते कुछ समय से उनके जो बयान कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति के बारे में आये वे भी उनकी नाराजगी का संकेत हैं। लेकिन जिन दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ की ताजपोशी की राह आसान की वे भी जिस तरह की बातें कर रहे हैं उससे ये लगता है कि मुख्यमंत्री सरकार चलाने में इस बुरी तरह उलझ गये हैं कि पार्टी के भीतर सामंजस्य बनाये रखने की फुर्सत उन्हें नहीं है। स्मरणीय है अभी भी वही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं। गत दिवस राजमार्गों पर बैठी गायों को लेकर दिग्विजय सिंह द्वारा किये गये ट्वीट के जवाब में कमलनाथ के खासमखास मंत्री सज्जन सिंह वर्मा की तीखी प्रतिक्रिया और उसके बाद मुख्यमंत्री के लगातार दो-तीन ट्वीट से ये स्पष्ट हो गया कि दिग्विजय सिंह की दखलंदाजी श्री नाथ को भी नागवार गुजरने लगी है। उल्लेखनीय है कुछ समय पहले पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विभिन्न मंत्रियों को पत्र लिखकर जवाब मांगे जाने और उनके पास आकर सरकार के कामकाज का ब्यौरा पेश करने की बात पर जबर्दस्त बवाल मचा था। उमंग सिंगार नामक एक मंत्री ने तो दिग्विजय सिंह को जिस अंदाज में जवाब दिया उससे उनकी खूब किरिकिरी भी हुई। श्री सिंगार ने यहाँ तक कह दिया कि दिग्विजय सिंह परदे के पीछे से सरकार चला रहे हैं। उनके इस बयान का कमलनाथ खेमे तक को खंडन करना पड़ा। राजनीति के जानकार बताते हैं कि उमंग सदृश युवा मंत्री द्वारा दिग्विजय जैसे बड़े नेता से जुबान लड़ाना मामूली बात नहीं थी। लेकिन मुख्यमंत्री ने उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई न करते हुए संयम रखने की समझाइश मात्र दे दी। दिग्विजय के मंत्री पुत्र जयवर्धन ने अवश्य पिता का बचाव किया लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री को पार्टी के भीतर भी वैसा समर्थन नहीं मिला जैसी उन्हें उम्मीद रही होगी। उसके बाद से उनकी वजनदारी में निश्चित रूप से कमी आई। हालांकि वे सिंधिया खेमे के साथ जुड़ते नहीं दिखे लेकिन गत दिवस गोरक्षा को लेकर उन्होंने जिस तरह का ट्वीट किया और जिस तरह से पहले सज्जन सिंह और बाद में खुद मुख्यमंत्री ने जवाब दिया उससे दिग्विजय सिंह को ये एहसास हो गया होगा कि उन्हें अपनी वरिष्ठता का गुमान छोड़ देना चाहिए। लेकिन कमलनाथ को भी एक साथ ज्योतिरादित्य और दिग्विजय दोनों से टकराना नुकसानदेह हो सकता है। हालांकि श्री सिंह के कांग्रेस विरोधी होने की कोई सम्भावना नहीं है लेकिन श्री सिंधिया जिस तरह से छटपटा रहे हैं उसे देखते हुए उनके बागी होने की अटकलें हकीकत में बदल सकती हैं। कुछ सूत्र तो अमित शाह के साथ उनकी गुप्त मुलाकात हो जाने का दावा भी कर रहे हैं। ये भी सुनने में आया है कि बड़ौदा के राजपरिवार के जरिये ज्योतिरादित्य के भाजपा प्रवेश का तानाबाना बुना जा रहा है। उल्लेखनीय है उनकी पत्नी बड़ौदा के गायकवाड़ परिवार से हैं जिसके नरेंद्र मोदी और श्री शाह से नजदीकी सम्बन्ध हैं। बहरहाल ताजा हालातों में कमलनाथ सरकार को बाहरी तौर पर कोई खतरा भले नहीं हो लेकिन उनके अपने घर में ही बगावत के चिंगारियां सुलगने लगी हैं। ज्योतिरादित्य के बाद दिग्विजय का भी खुले आम सरकार पर निशाना साधना हवा में उड़ाने लायक बात नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 11 October 2019

चीन को दबाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा



आज की दुनिया में सामरिक शक्ति के समानांतर आर्थिक मजबूती का महत्व है ।  यही वजह है कि इमरान खान जब भारत को परमाणु युद्ध की धमकी देते हैं तब पूरी दुनिया में उसका मजाक बनता है। इसका कारण उसका फटेहाल हो जाना है। आर्थिक कूटनीति से किसी ताकतवर प्रतिद्वंदी को कैसे झुकाया जा सकता है इसका सबसे ताजा उदाहरण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा चीन  के विरुद्ध शुरू किया गया व्यापारिक युद्द (ट्रेड  वार) है। विश्व में चीन की गिनती आर्थिक महाशक्ति के तौर पर भी होने लगी थी। भारत जैसे देश तो खैर उसका  मुकाबला करने में सक्षम नहीं थे लेकिन अमेरिका तक चीन के आर्थिक प्रवाह को रोक पाने में खुद को असमर्थ महसूस करने लगा। अमेरिका के बाजारों में चीन उत्पादों का छा जाना आम बात होने लगी। वहां की वित्तीय संस्थाओं पर भी चीनी कम्पनियां  काबिज  होने लगीं। सबसे बड़ी बात ये हुई  कि सस्ते श्रमिकों  के लालच में अमेरिका की नामी गिरामी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पूंजी चीन में निवेशित हो गयी। धीरे - धीरे चीन की आर्थिक प्रगति उसके लिए चिंता का सबब बनने लगी। सोवियत संघ के विघटन के बाद चीन ही अमेरिका का सबसे प्रमुख वैचारिक प्रतिद्वंदी था। हालांकि विश्व की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला एशिया का यह देश माओवादी लौह आवरण वाले दौर से बाहर निकलकर बहुत हद तक पूंजीवादी संस्कृति और जीवन शैली में ढल चुका है।  बावजूद इसके चीन अभी भी अमेरिका की तुलना में काफी पीछे और अलग है। विस्तारवादी नीतियों की वजह से उसके सभी पड़ोसी देश उससे भयभीत रहते हैं। पहले वह केवल सामरिक ताकत से डराया करता था लेकिन ज्योंही उसने आर्थिक  मोर्चे पर दुनिया के विकसित देशों के बराबर खड़े होने की हैसियत प्राप्त कर ली त्योंहीं वह अमेरिका की निगाहों में खटकने लगा। इसीलिये डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका की बागडोर संभालते ही चीन के विरूद्ध व्यापारिक जंग शुरू करते हुए तरह - तरह के प्रतिबन्ध लगा दिए। इसका असर भी देखने मिला और साल दर साल कुलांचे मार रही चीन की अर्थव्यवस्था में उतार आने लगा। ट्रम्प ने अमेरिकी कम्पनियों को चीन से कारोबार समेटने के लिए बाध्य कर दिया। धीरे - धीरे वे वहां से उठकर भारत जैसे किसी दूसरे  देश में ठिकाने तलाशने लगीं जहां श्रमिक विकसित देशों की तुलना में सस्ते हैं। हालाँकि इस प्रक्रिया में समय लगेगा लेकिन चीन इससे घबराहट में है। उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग माओ के बाद सबसे ताकतवर नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने जीवन भर सत्ता में बने रहने की व्यवस्था भी साम्यवादी पार्टी से करवाली है। जिनपिंग ये भी समझ गये हैं कि  चीन अपनी सामरिक ताकत के बल पर वह सब हासिल नहीं कर पायेगा जो आर्थिक समृद्धि से संभव है। इसीलिये वह अमेरिका के व्यापारिक युद्ध से लडऩे के रास्ते तलाश रहा है। आज से शुरू हो रही जिनपिंग की दो दिवसीय भारत यात्रा उसी सिलसिले में है। चीन की महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड परियोजना खटाई में पडऩे के कारण उसकी काफी पूंजी फंसकर रह गई है। भारत द्वारा इस प्रकल्प से पूरी तरह दूरी बना लेने से भी चीन को परेशानी हुई। उधर पाकिस्तान के भीतर भी इसका विरोध होने लगा है। चीन द्वारा मुस्लिमों पर लगाई जा रहे प्रतिबंधों से  पकिस्तान के कट्टरपंथी संगठन काफी नाराज हैं। ऐसी  स्थिति में पाकिस्तान चीन के गले की हड्डी बन गया है। यद्यपि शुरू से ही भारत विरोधी नीति के कारण उसने पाकिस्तान को बिना शर्त समर्थन दिया लेकिन बीते कुछ  सालों से वह भारत को लेकर थोड़ा ही सही किन्तु लचीला हुआ है। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भी वह  चाहे - अनचाहे भारत के सुर में सुर मिलाता दिखता  है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि जम्मू - कश्मीर को लेकर भारत सरकार द्वारा बीते अगस्त माह में जो बड़े निर्णय लिए उनका विरोध करने के बाद भी चीन ने पाकिस्तान को वैसा समर्थन नहीं दिया जैसा वह अतीत में करता आया है। लेकिन उसका मूल चरित्र नहीं बदल सकता। जिनपिंग के भारत आने के पहले जब इमरान खान बीजिंग गए तब पहले तो जिनपिंग ने कश्मीर को द्विपक्षीय मसला मानकर भारत और पाकिस्तान द्वारा उसे मिलकर सुलझाने जैसी बात कहकर भारत को प्रसन्न कर दिया। लेकिन फिर पलटी मारते हुए पाकिस्तान को अपना पक्का  दोस्त बताकर भारत को चिढ़ाने की  हरकत दोहरा दी। ऐसे हालात में जिनपिंग का भारत दौरे का उद्देश्य समझना जरूरी है। ऐसा लगता है वे भारत को अमेरिकी  प्रभाव से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। नरेंद्र मोदी की  हालिया अमेरिका यात्रा से चीन काफी परेशान है। उसे मोदी सरकार द्वारा रूस से भी नजदीकी रिश्ते बना लेने से खुन्नस हो रही है। बीते पांच सालों में भारत ने सामरिक मोर्चे पर जिस तरह से अपनी  ताकत  में वृद्धि की उससे भी चीन सतर्क है । डोकलाम विवाद  के समय भारत द्वारा प्रदर्शित सख्त रवैये के बाद भी जब - जब सीमा पर चीनी सैनिकों की घुसपैठ हुई तब - तब भारत  संयम रखते हुए भी कड़ाई से पेश आया। जिनपिंग की वर्तमान भारत यात्रा का मकसद दरअसल अमेरिका की आर्थिक मोर्चेबंदी से निपटने में भारत का साथ और समर्थन हासिल करना है। उल्लेखनीय है ईरान के विरुद्ध डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाई गई बंदिशों से भारत के आर्थिक हित भी बुरी तरह प्रभवित हुए हैं। लेकिन उसने फिलहाल अमेरिका का विरोध नहीं करने की नीति अपना रखी है। इसका कारण वाशिंगटन का पाकिस्तान की प्रति कठोर हो जाना है। उसकी देखा - सीखी बाकी  पश्चिमी ताकतें भी भारत के प्रति उदार हुई हैं। हाल के सालों में चीन भी भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन बनाकर चलता रहा है। उसकी समझ में आ गया है कि भारत के साथ शत्रुता रखना उसके दूरगामी हितों के विरुद्द्ध होगा। जिनपिंग से मुलाक़ात के दौरान चाशनी में  लिपटी कूटनीतिक बातों के परे श्री मोदी को ये इशारा कर देना चाहिए कि चीन को जितना नुक्सान अमेरिका के  साथ व्यापार युद्ध में हो रहा है उतना ही भारत भी पहुंचा सकता है। आर्थिक मंदी के कारण भारत का घरेलू औद्योगिक ढांचा जिस तरह चरमराया उसकी वजह चीन में बनी सस्ती वस्तुएं ही हैं। भाजपा जिस स्वदेशी आन्दोलन से वैचारिक तौर पर जुडी हुई है उसका जोर चीनी वस्तुओं के आयात को नियंत्रित करना रहा है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के साथ ही भारतीय उद्योगपतियों के हितों की खातिर इस बारे में कड़े निर्णय लेने में मोदी सरकार हिचकती रही। लेकिन वर्तमान वैश्विक माहौल में चीन जिस तरह से दबाव में  है और उसकी आर्थिक प्रगति का आंकड़ा ढलान की तरफ जा रहा है तब भारत के लिए अच्छा अवसर है जब वह जिनपिंग को शुद्ध हिन्दी में समझा दे कि भारत के साथ सम्बन्ध रखना हैं तो उसमें धूर्तता के लिये कोई जगह नहीं होनी चाहिए। केवल कश्मीर ही नहीं वरन आर्थिक मोर्चे पर भी चीन को झुकाने का यह अच्छा  मौका है। जिनपिंग इस समय चौतरफा घिरे हैं। कश्मीर पर भारत को मिला अभूतपूर्व  वैश्विक समर्थन चीन के लिए भी चेतावनी है। नरेंद्र मोदी का कद भी विश्व राजनीति में बेहद ऊँचा होने से वे जिनपिंग के साथ बराबरी से निपट सकते हैं। राष्ट्रीय अपेक्षा यही है कि महाबलीपुरम में होने जा रही बातचीत में भारत अपना पलड़ा भारी रखने में सफल रहेगा। चीन की गर्दन  दबाने के इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए क्योंकि वह इस समय हर तरह से दबाव में है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 10 October 2019

जीएसटी रिफंड मिले और एनपीए का दबाव कम हो



कार्पोरेट टेक्स घटा दिया गया, विभिन्न चीजों पर जीएसटी की दरें भी कम कर दी गईं, रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में लगातार पांचवी बार कटौती करते हुए कर्ज सस्ते करने का रास्ता साफ  किया और उसके बाद गत दिवस केन्द्रीय कर्मचारियों और पेंशन धारियों को पांच फीसदी महंगाई भत्ता स्वीकृत कर दिया गया। ये सभी कदम किसी मेहरबानी के तहत नहीं उठाये गये बल्कि आर्थिक मंदी को दूर करने के लिए ऐसा करना केंद्र सरकार की मजबूरी बन गई थी। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव नहीं होते तब शायद राहतों की बरसात के लिए अभी कुछ दिन इंतजार और करना पड़ता। राजस्व की वसूली कम होने के बाद सौगातों का पिटारा खोला जाना अच्छा आर्थिक प्रबंधन नहीं है लेकिन सत्ता में बैठे लोगों का अर्थशास्त्र भी राजनीतिशास्त्र से प्रभावित रहता है। विशेष रूप से भारत जैसे देश में राजनीति का धंधा चूँकि वोटों की फसल पर आधारित होता है इसलिए तदनुसार नीति और निर्णय होते हैं। बीते कुछ दिनों में केंद्र सरकार ने जो कुछ भी किया उसके पीछे अर्थव्यवस्था को टेका लगाना प्रत्यक्ष कारण है लेकिन पर्दे के पीछे जो चर्चाएँ हैं उनके मुताबिक लोकसभा चुनाव के फौरन बाद और खास तौर पर केंद्र का बजट आते ही अर्थव्यवस्था पर मंदी की छाया और गहराने लगी। मोदी सरकार को अब तक की तमाम उपलब्धियों पर उसकी वजह से पानी फिरता देख अंतत: वही करना पड़ा जो अपरिहार्य था और काफी पहले हो जाना चाहिए था। दरअसल सत्ताधारी कुनबे के भीतर भी अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को लेकर चिंता व्यक्त होने लगी थी। अप्रैल से जून तक की पहली तिमाही की विकास दर जब पांच फीसदी पर आ गई तब आम जनता के मन में भी भय समाने लगा और उसी के बाद केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक और जीएसटी काउन्सिल सब एक साथ पसीज उठे। इन समस्त प्रयासों का समन्वित उद्देश्य बाजार में मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाकर मांग पैदा करना ही है जिससे कारोबारी जगत सन्निपात से उबरकर फिर से उठ खड़ा हो। उक्त सभी उपाय पूरी तरह से सकारात्मक और उपयोगी कहे जायेंगे जिनमें से कुछ का असर तत्काल प्रभाव से और कुछ का थोड़े समय बाद महसूस होगा। दबी जुबान ये खबर भी है कि निकट भविष्य में आयकर को लेकर भी बड़ा नीतिगत निर्णय लिया जा सकता है। उसकी दरें कम करने सम्बन्धी सिफारिशों पर सघन विचार-विमर्श चल रहा है। कहने वाले तो यहाँ तक दावा कर रहे हैं कि आयकर खत्म करते हुए किसी वैकल्पिक व्यवस्था की तलाश भी जारी है। खैर, वह तो जब होगा, तब होगा लेकिन आज की स्थिति में उद्योग और व्यापार जगत में छाई उदासी की एक बड़ी वजह है जीएसटी में कारोबारी जगत का पैसा फंस जाना। निजी क्षेत्र इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जीएसटी के रिफंड नहीं आने से व्यापारियों की पूंजी फंसकर रह गयी है। उससे उन्हें व्यापार को गतिशील बनाए रखने में मुसीबत हो रही हैं वहीं दूसरी तरफ  बैंकों से कर्ज लेने वाले कारोबारी एनपीए दूर करने के लिए बनाये जा रहे दबाव से हलाकान हैं। हालांकि इस बारे में बैंक और सरकार पूरी तरह से गलत नहीं हैं लेकिन सभी कारोबारियों को एक ही लाठी से हांका जाना सही नहीं है। बेहतर हो जीएसटी के रिफंड के साथ ही एनपीए को लेकर बनाये जाने वाले दबाव के संबंध में वित्त मंत्रालय समयोचित कदम उठाये। आर्थिक क्षेत्र में सरकार द्वारा हाल के वर्षों में उठाये गए क़दमों का देश के सभी वर्गों ने समर्थन किया और लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को एक मौका और दिया। लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं होने की वजह से उनका प्रभाव उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ, अपितु कुछ हद तक उलटा भी हो गया। सौभाग्यवश केंद्र सरकार की नीयत पर किसी को संदेह नहीं था। इसीलिये भारी असंतोष के बावजूद भी शांति बनी रही। लेकिन अब समय आ गया है जब सरकार को भी आभार स्वरूप व्यापार-उद्योग और जनता सभी की चिंताओं को दूर करने के लिए समुचित और समयबद्ध कदम उठाने चाहिए। किसी भी सरकार को अपनी नीतियाँ लागू करने के लिए एक कार्यकाल पर्याप्त होता है। भारत जैसे देश में चूंकि निर्णय प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी है इसलिये जनता ने नरेन्द्र मोदी को दूसरा अवसर दे दिया। लेकिन इस बार किसी बहाने की गुंजाइश नहीं रहेगी। दूसरी बात ये है कि दो और तीन साल पहले लिए गये कड़े और बड़े फैसलों का फायदा अब सामने आना चाहिए। अन्यथा जनता के मन में सत्ता के प्रति व्याप्त विश्वास में कमी आने में देर नहीं लगेगी। जीएसटी के रिफंड और एनपीए को लेकर बनाये जा रहे अनुचित दबाव के बारे में केंद्र के वित्त मंत्रालय को सार्थक कदम उठाने चाहिए जिससे कारोबार के रास्ते से रोड़े हटाये जा सकें।

-रवीन्द्र वाजपेयी



Wednesday, 9 October 2019

बाजार में मंदी की मार : ऑनलाइन गुले-गुलजार



भारत में दशहरा और दीपावली त्यौहारी मौसम के तौर पर जाने जाते हैं। यूँ तो हमारे यहाँ हर अंचल में सांस्कृतिक विविधता है लेकिन दशहरा और दीपावली पर पूरे देश में हर्षोल्लास का वातावरण बन जाता है।  वर्षा ऋतु की औपचारिक विदाई के बाद चार महीनों से ठहरी जि़न्दगी पटरी पर लौट आती है। मौसम खुशनुमा होते ही लोगों का मन भी उमंग और उत्साह से भर उठता है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है आर्थिक कारोबार अर्थात बाजार पर। नवरात्रि प्रारम्भ होते ही बाजारों में खरीददारी शुरू होने लगती है। दीपावली के पश्चात ही चूँकि शादी-विवाह के मुहूर्त निकलने लगते हैं इसलिए उसका असर भी बाजार पर पड़ता है। लेकिन इस वर्ष त्यौहार का मौसम आने के बावजूद भी बाजार में वह चहलपहल नहीं दिखाई दे रही जिसका व्यापारी वर्ग पूरे साल इन्तजार किया करते हैं। इसकी वजह आर्थिक मंदी बताई जा रही है जिसकी शुरुवात यूँ तो कई सालों पहले हो चुकी थी लेकिन जैसा आम तौर पर मान लिया गया है उसके अनुसार 2016 में हुई नोटबन्दी और उसके बाद 2017 में लागू हुए जीएसटी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से अस्त व्यस्त कर दिया। शुरू-शुरू में कहा गया कि ये प्रसव पीड़ा जैसा है लेकिन अभी तक जो हालात बने हुए हैं उनमें कोई भी ये बता पाने की स्थिति में नहीं है कि मंदी या सरकारी शब्दावली के अनुसार कारोबारी सुस्ती आखिर कब तक चलेगी। चूंकि इस वर्ष तमाम आशंकाओं को दरकिनार करते हुए मानसूनी वर्षा काफी जोरदार रही इसलिए कृषि क्षेत्र से अच्छी खबरें आने की उम्मीदें होने से बाजार में भी आशा का संचार तो हुआ है किंतु यहाँ भी विरोधाभास पीछा नहीं छोड़ रहा। जैसी कि जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक देश में पेट्रोल और डीजल के बाद सबसे ज्यादा आयातित होने वाले सोने का कारोबार इस साल आश्चर्यजनक रूप से कमजोर रहना तय है। दीपावली के दस दिन पहले धनतेरस पर सोने की रिकार्ड खरीदी होती रही है लेकिन इस साल उसका आंकड़ा भी 50 फीसदी नीचे आ जायेगा। बीते साल तक के आंकड़ों के मुताबिक धनतेरस पर देश भर में 40 टन सोने की बिक्री होती थी लेकिन इस साल इसका आधा भी बिक जाए तो बड़ी बात होगी।  सितम्बर के महीने में कुल 26 टन स्वर्ण का आयात हुआ जबकि गत वर्ष इसी दौरान लगभग 82 टन सोना विदेशों से खरीदा गया था। यद्यपि कुछ लिहाज से ये एक अच्छा लक्षण भी है क्योंकि सोने के आयात के लिए उपयोग होने वाली विदेशी मुद्रा के कारण रूपये का विनिमय मूल्य गिरता है।  व्यापार असंतुलन की एक बड़ी वजह सोना भी है।  हालाँकि स्वर्ण आभूषण बनाने वाले लाखों कारीगर भी इससे प्रभावित होंगे। बावजूद इसके यदि देश में सोने की मांग घटती है तो उसका दूरगामी असर अच्छा ही होगा क्योंकि उसके भंडारण से अर्थव्यवस्था को कोई लाभ नहीं होता।  लेकिन अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के कारोबार में मांग कम होने से बुरा असर पड़ता है। बीते काफी समय से बाजारों में जिस तरह की मुर्दानगी देखी जा रही है उसकी वजह से भय का महौल बन गया है। वाहनों की बिक्री में गिरावट को उच्च और मध्यम वर्गीय आय समूह से जुड़ा हुआ मानकर भले ही उपेक्षित कर दिया जाए लेकिन रोजमर्रे की चीजों की बिक्री में आई कमी से मंदी की पुष्टि की जा सकती है। आज ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की अध्यक्ष ने भी विश्वव्यापी मंदी को स्वीकार करते हुए कहा कि इस साल की वैश्विक विकास दर भी घटना तय है। हालाँकि वे भी दबी जुबान इसे अमेरिका और चीन के बीच चले ट्रेड वार का नतीजा बताती हैं लेकिन मंदी भी अर्थव्यस्था का एक चक्र माना जाता है और उस लिहाज से ये एक स्वाभाविक परिस्थिति है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में मंदी का असर कम हो सकता था बशर्ते हमारा घरेलू उत्पादन ज्यादा होता। लेकिन बीते कुछ सालों में चीन से हुआ बेतहाशा आयात ने भारतीय उत्पादकों को बहुत नुकसान पहुँचाया। उसे लेकर तरह-तरह की बहस और विश्लेष्ण होता रहा है। बीते दो साल में भारतीय उत्पादन इकाइयां मरणासन्न हालात में पहुँच गईं। इन सब कारणों से त्यौहारी बाजार ठंडा रहने के आसार और मजबूत होते जा रहे थे किन्त्तु इसके ठीक विपरीत ऑनलाइन कारोबार करने वाली दो प्रमुख कंपनियों ने बीते एक सप्ताह में ही 18 हजार करोड़ की बिक्री कर डाली और उन्हें उम्मीद है दीपावली तक ये आंकड़ा 42 हजार करोड़ तक जा पहुंचेगा। ये गत वर्ष की अपेक्षा 30 फीसदी ज्यादा होगा। आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक ये स्थिति दर्शाती है कि उपभोक्ता बेहतर मुनाफे के लिए इन कम्पनियों की तरफ  झुक रहा है जो उसे ज्यादा से ज्यादा रियायत देकर परम्परागत बाजार का हिस्सा अपने नाम करती जा रही हैं। बाजार में मंदी और ऑनलाइन कारोबार में रौनक का ये परस्पर विपरीत चित्र भ्रम की स्थिति को भी जन्म दे रहा है। इसका ये भी संकेत है कि भारत के बड़े उपभोक्ता बाजार को लुभाने की लिए व्यापारी समुदाय को भी नई रणनीति के साथ आगे आना होगा। दुकानदार और ग्राहक के पुश्तैनी सम्बन्धों का दौर धीरे-धीरे गुजरे जमाने की बात होता जा रहा है।  यहाँ तक कि स्वर्ण आभूषण खरीदने वाले ग्राहक भी अब सराफे की बजाय ब्रांडेड कम्पनी को प्राथमिकता देने लगे हैं। उस दृष्टि से देखें तो हर मुसीबत कुछ न कुछ सिखाती है। मंदी का ये दौर भारत के व्यापारिक ढांचे को कितना बदलता है ये देखने वाली बात होगी क्योंकि ऑनलाइन कारोबार का केवल विरोध करने से काम नहीं चलेगा। उसका मुकाबला करने के लिए व्यापार जगत को भी नई रणनीति पर काम करना होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी