Thursday, 7 November 2019

आवासीय परियोजनाओं को संजीवनी: देर से लिया सही निर्णय



देर से ही सही लेकिन केद्र सरकार को आखिरकार ये समझ में आ ही गया कि गृह निर्माण के क्षेत्र को प्रोत्साहन दिए बिना अर्थव्यवस्था को पटरी पर नहीं लाया जा सकता। गत दिवस केन्द्रीय मंत्रीमंडल द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार देश में अर्थाभाव के कारण रुकी पड़ी तकरीबन 1600 आवासीय परियोजनाओं को पूरा करने हेतु 10  हजार करोड़ रु. सरकार एवं 15 हजार करोड़ रु. भारतीय स्टेट बैंक और भारतीय जीवन बीमा निगम देंगे। इसके बाद अन्य स्रोतों से भी धन एकत्र करते हुए बड़ा कोष बनाकर आधी-अधूरी बनी 4.58 लाख आवासीय इकाइयों को पूरा करने के लिए प्रमोटरों को कर्ज प्रदान किया जावेगा। मौजूदा स्थिति में धन के अभाव में सैकड़ों बड़ी आवासीय परियोजनाएं बंद पड़ी हुई हैं। उनमें बैंकों के अलावा अनेक वित्तीय संस्थानों का पैसा तो फंसा ही है खरीददारों की भी मेहनत की कमाई उलझ गयी है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि काम बंद हो जाने से लाखों श्रमिकों का रोजगार तो छिना ही साथ में लोहा, सीमेंट, हार्डवेयर, सेनेटरीवेयर, बिजली फिटिंग्स के साथ दर्जनों ऐसी चीजों का व्यापार बैठ गया जिनकी निर्माण कार्य में जरूरत होती है। बैंकों  सहित जिन वित्तीय संस्थानों ने इन परियोजनाओं को ऋ ण उपलब्ध करवाए थे वे भी संकट में फंसे हुए हैं। रेरा जैसा कानून आने के बाद आवासीय परियोजनाओं के असीमित विस्तार पर भी रोक लगी। मई में लोकसभा चुनाव के फौरन बाद से ही आर्थिक मंदी को लेकर हल्ला मचने लगा था। पहले-पहल तो सरकार उसे नकारती रही क्योंकि उसे स्वीकार करने का मतलब अपनी आर्थिक नीतियों की विफलता पर खुद मोहर लगाना होता। लेकिन दूसरी तरफ उसने ऐसे  कदम उठाने शुरू कर दिए जिनसे आर्थिक मंदी दूर हो सके।  कार्पोरेट टैक्स में कमी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उसके बाद सरकार ने ऋ ण मेले लगवाकर तकरीबन 80  हजार करोड़ रूपये अर्थव्यवस्था की गतिशीलता बढ़ाने के लिए बंटवाये। लेकिन गत दिवस उसने जो कदम उठाया वह सबसे कारगर और प्रभावशाली कहा जा सकता है । आधी-अधूरी पड़ी हुई आवासीय परियोजनाओं के दोबारा शुरू होने के बहुआयामी लाभ होंगे। सबसे बड़ी बात ये है कि इससे बैंकों और दूसरी वित्तीय संस्थाओं का जो पैसा एनपीए की शक्ल में फंस गया है वह वापिस आयेगा वहीं अपने घर का सपना संजोए  बैठे लाखों उपभोक्ताओं का निवेश भी फलीभूत होगा। आर्थिक मामलों  के जानकारों की मानें तो आवासीय परियोजनाओं को सबसे बड़ा झटका नोटबंदी के बाद लगा क्योंकि जमीन- जायजाद में काले धन की बड़ी भूमिका रही है। उसके बाद जीएसटी की ऊँची दरें भी दूबरे में दो आसाढ़़ वाली स्थिति का कारण बन गईं। शुरू-शुरू में तो सरकार अपनी अकड़ में रही लेकिन बाद में जाकर उसे जीएसटी की दरें घटानी पड़ीं। जहां तक इस व्यवसाय में काले धन के उपयोग को रोकने की बात है तो उसका इलाज करने हेतु ही कल का निर्णय लिया गया। ये बात भी सही है कि  जमीन और जायजाद के दाम बढ़ाने में काले धन की सबसे बड़ी भूमिका रही है। नोटबंदी के बाद से इस व्यवसाय में आये ठंडेपन का कारण काले धन का प्रवाह अचानक रुक जाना ही था। बहरहाल सरकार ने व्यवहारिकता  के धरातल  पर उतरकर स्थितियों का आकलन किया और उसके बाद ही बंद पड़ी हुई आवासीय परियोजनाओं में जान फूंकने के लिए पूंजी उपलब्ध करवाने जैसा बहुप्रतीक्षित निर्णय लिया। हालाँकि अभी इसका लाभ मिलने में कुछ समय लगेगा किन्तु वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा ज्योंही तत्सम्बन्धी घोषणा की गयी जमीन-जायजाद के व्यवसाय से जुड़े  लोगों के अलावा लाखों उन निवेशकों की आँखों में चमक आ गई जो पूरी तरह निराश हो चुके थे। जैसी कि चर्चा सुनाई दे रही है उसके अनुसार सरकार आगामी बजट के पहले कुछ और राहतें देने का मन भी बना रही है। महाराष्ट्र और हरियाणा के ताजा चुनाव परिणामों ने भाजपा के नीति नियंत्रकों को इस बात का एहसास करवा दिया है कि आम नागरिक आर्थिक नीतियों के बेहतर नतीजों को लेकर बहुत लम्बे समय तक धैर्य रखने को राजी नहीं है। मध्यम वर्ग में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि सरकार ने कार्पोर्रेट टेक्स घटाकर उद्योगपतियों को तो बड़ी राहत दे दी लेकिन अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने में सबसे अधिक सहायक बनने वाले मध्यमवर्ग को आयकर में कोई अतिरिक्त राहत नहीं दी। बैंकों में जमा राशि पर ब्याज दर में लगातार गिरावट से बचतकर्ता विशेष रूप से सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिकों को जीवन यापन करना कठिन हो गया है। ये कहना गलत नहीं होगा कि उदारीकरण के बाद से छोटे बचतकर्ताओं को पूरी तरह निरुत्साहित करते हुए उन्हें कर्ज लेकर घी पीने के लिए प्रेरित करने की जो नीति शुरू की गई उसने मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट बिगाड़कर रख दिया। मृत पड़ी आवासीय परियोजनाओं में जान फूंकने का ताजा प्रयास निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। देर से उठाये गए इस कदम से उद्योग, व्यापार और  रोजगार सभी क्षेत्रों को सहारा मिलेगा ये उम्मीद की जा सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 November 2019

अयोध्या: फैसले से पहले शुभ संकेत



सैकड़ों वर्षों से विवाद की जड़ बने हुए अयोध्या मसले पर आगामी कुछ दिनों में ही सर्वोच्च नयायालय की संविधान पीठ का फैसला आने वाला है । बरसों से ये मामला निचली अदालत से चलते हुए आखिर में सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा ।  जिसने लम्बी अड़ंगेबाजी के बाद अंतत: नियमित सुनवाई करते हुए फैसले को सुनिश्चित कर दिया ।  अदालत से बाहर आपसी सहमति के जरिये विवाद निपटाने  के लिए मध्यस्थ भी शीर्ष न्यायालय ने नियुक्त किये लेकिन बात नहीं बनी ।  बीते तीस साल से ये प्रकरण कानूनी से ज्यादा धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चित रहा ।  केंद्र और राज्यों की सरकारें भी इसके चलते बनीं और गिरीं ।  बात धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तक जा पहुँची ।  केंद्र सरकार की तरफ से भी विवाद शांत करने की कोशिशें हुईं लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली क्योंकि प्रयासों में ईमानदारी का अभाव था ।  अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने वाला जो निर्णय दिया वह भी सम्बन्धित पक्षों को मंजूर नहीं होने पर सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें हुईं ।  वहां भी लम्बी प्रक्रिया चली ।  किसी न किसी वजह से सुनवाई टलती रही लेकिन वर्तमान प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने आगामी 1।  नवम्बर को सेवा निवृत्त होने के पहले ही इस विवाद का कानूनी हल करने की प्रतिबद्धता दिखाई और उसी की वजह से वह घड़ी बेहद करीब आ गयी जब देश की सर्वोच्च न्याय आसन्दी इस पर अपना फैसला सुनाने जा रही है ।  क्या होगा , क्या नहीं ये कोई नहीं बता सकता लेकिन संतोष की बात ये है कि न सिर्फ धार्मिक संगठनों  अपितु राजनीतिक दलों की तरफ से भी फैसले के पहले  जिस तरह की बातें कही जा रहीं हैं उनसे ये आश्वासन मिल रहा है कि अदालती फैसले को स्वीकार करने की मानसिकता बन चुकी है ।  दोनों पक्षों के जो धर्माचार्य आस्था के नाम पर अदालत के क्षेत्राधिकार को मानने राजी नहीं होते थे वे ही अपीलें जारी करते हुए कह रहे हैं कि जो भी फैसला आये उसे सभी मान्य करें ।  इसी आशय की बातें रास्वसंघ और  जमायत ए इस्लामी जैसे संगठनों द्वारा भी कही जा रही हैं ।  फैसले के बाद जीत के जश्न या हार के  मातम जैसे किसी आयोजन से बचने की नसीहत दिया जाना भी शुभ संकेत है ।  निश्चित रूप से इसके पीछे केंद्र सरकार की कोशिशें भी हैं ।  कुछ दिनों पूर्व फैसले को लेकर की जा रही बयानबाजी पर स्वयं प्रधानमन्त्री ने नाराजगी व्यक्त की थी ,  जिसका असर भी हुआ ।  बहरहाल पूरे देश में कानून व्यवस्था बनाये रखने को लेकर एहतियात बरती जा रही है ।  शासन - प्रशासन अपने काम में लग गए हैं ।  सोशल मीडिया पर भी नजर रखी जा रही है ।  समाचार माध्यम भी शांति बनाये रखने में सहयोग दे रहे हैं ।  ये स्थिति भारत के परिपक्व होने का प्रमाण है ।  तीन दशक पहले इस मामले में शुरू हुई राजनीति की वजह से जो कटुता उत्पन्न हुई वह पूरी तरह से मिट जायेगी , ये आशावाद पाल लेना जल्दबाजी हो सकती है लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों में एक वर्ग ऐसा मुखर हो उठा है जो उत्साह और उन्माद में फर्क करना जानता है ।  ये एक रचनात्मक संकेत है ।  राम मंदिर बने ये देश का बहुसंख्यक हिन्दू चाहता है लेकिन न्यायालयीन फैसले में अग्रिम रूप से विश्वास व्यक्त करने वाली बात पहले नहीं सुनाई देती थी ।  ऐसा ही एहसास मुस्लिम खेमे से भी आता दिख रहा है ।  तमाम मुस्लिम संगठनों के प्रमुख भी संयम रखने की अपीलें सार्वजानिक रूप से करते सुने जा रहे हैं ।  अयोध्या से भी जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार वहां रहने वाले हिन्दू और मुस्लिम किसी भी अप्रिय स्थिति की आशंका को गलत साबित करने के लिए साझा तौर पर प्रयासरत हैं ।  कुल मिलाकर अब तक के संकेत इस संभावना के प्रति आश्वस्त करते हैं कि अदालत जो भी फैसला करेगी उसे सभी पक्ष सद्भावना के साथ स्वीकार करेंगे ।  एक मुस्लिम नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि फैसला हिन्दुओं के पक्ष में  आने के बाद भी कोई  अपील नहीं की जाए ।  ये मानसिकता आगे भी बनी रहे और लंबे समय से उलझे हुए विवादित मसलों पर ऐसी ही समझदारी दिखाई जाए तो देश अनेक समस्याओं से मुक्त होकर तेजी से विकास की राह पर बढ़ सकता है ।  सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के पांचों न्यायाधीश फैसले को अंतिम रूप देने में व्यस्त होंगे ।  देश भर से जिस तरह की अच्छी खबरें उन तक सामाचार माध्यमों के जरिये पहुँच रही हैं उनसे वे भी अपने आपको दबावमुक्त अनुभव कर रहे होंगे जो ऐसे अवसर पर नितांत जरुरी होता है ।  तीन दशक से देश की राजनीति को भीतर तक प्रभावित कर रहे इस विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद कोई विवाद न हो ये देश का प्रत्येक जिम्मेदार और समझदार व्यक्ति चाह रहा है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 November 2019

व्यापार समझौते से दूरी : सही निर्णय



थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में आसियान देशों के सम्मलेन में हुए क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) नामक व्यापार समझौते से भारत द्वारा हाथ खींचे जाने की पूरे देश में अनुकूल प्रतिक्रिया हुई है। विपक्ष इसे अपनी जीत बता रहा है जबकि किसान संगठन अपनी। उद्योग जगत ने भी राहत की साँस ली है। इस सम्मलेन में एशिया और पैसिफिक क्षेत्र के देशों के बीच जो व्यापार समझौता हुआ उसके मुताबिक भारत को आयात शुल्क में कटौती करना पड़ती जिससे समझौते में शामिल देशों का सामान यहाँ आसानी से आ सके। इस सम्मलेन में चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं जिन्हें विकसित देश माना जाता है। इस समझौते से इन देशों को तो जबर्दस्त लाभ होता लेकिन भारत के घरेलू उद्योगों और कृषि उत्पादकों को भारी नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती। उल्लेखनीय है चीन से आयातित वस्तुओं के कारण भारत का घरेलू उद्योग पहले से ही बर्बादी के कगार पर है। यद्यपि ये स्थिति विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के शामिल होने के बाद से ही बनने लगी थी लेकिन बीते एक दशक में वह बद से बदतर होती गयी। बैंकाक सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति कूटनीतिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण थी ही लेकिन इस व्यापार समझौते के लिहाज से मौके पर ही निर्णय करने के लिए भी उनका वहां होना जरूरी था। समझौते का प्रारूप तैयार होते समय जो खबरें छन-छनकर आईं उनके मद्देनजर भारत में कांग्रेस के साथ ही दूसरे विपक्षी दलों सहित किसान संगठनों और उद्योग जगत से भी विरोध की आवाजें आने लगीं। राहुल गांधी ने तो ऐसा प्रचारित किया मानों श्री मोदी ने समझौते  पर दस्तखत कर ही दिए हों। गत दिवस जब प्रधानमंत्री ने समझौते को भारत के हितों के विरुद्ध बताते हुए उसमें शामिल नहीं होने की घोषणा की तो श्री गांधी ने उसका श्रेय खुद को दिया। राजनीतिक दांवपेंच के मुताबिक उनका बयान स्वाभाविक ही है। अनेक किसान संगठनों ने भी ये कहा  कि श्री मोदी को उनके विरोध के सामने झुकना पड़ा। वास्तविकता जो भी हो लेकिन श्री मोदी द्वारा दो टूक शब्दों में उक्त समझौते से भारत को दूर रखने की घोषणा किये जाने से भारत की बढ़ती ताकत और आत्मविश्वास दुनिया के सामने प्रगट हुए हैं। सबसे ज्यादा झटका चीन को लगा जो अमेरिका द्वारा प्रारम्भ ट्रेड वार से त्रस्त होकर भारत के बाजारों में अपना माल झोंकने के मंसूबे पाल रहा था। जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया को एक बारगी छोड़ भी दें लेकिन मलेशिया, वियतनाम, थाईलैंड और तो और बांग्लादेश सरीखे छोटे-छोटे देशों  तक से  भारत में जबर्दस्त आयात होता है। उसकी तुलना में हमारा निर्यात बेहद कम है जिसकी वजह से व्यापार घाटा बढऩे के अलावा घरेलू उद्योगों की भी कमर टूट गयी। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि और कोई समय होता तब शायद भारत समझौते का हिस्सा बन भी जाता लेकिन मौजूदा स्थितियों में जब देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी हुई दिखाई देती है और कारोबारी जगत पूरी तरह हताश है तब आयात बढ़ाने वाला कोई भी निर्णय आत्मघाती ही होगा और उस दृष्टि से प्रधानमंत्री ने जो निर्णय लिया वह वर्तमान परिस्थितियों में तो पूरी तरह से अनुकूल है ही देश के दूरगामी आर्थिक हितों के लिहाज से भी बेहद उपयोगी है। इस बारे में ध्यान देने वाली बात ये है कि दुनिया के सभी देश इस समय कमोबेश आर्थिक मंदी के शिकार होने से अपने लिए नये बाजार तलाश रहे हैं। चीन ही नहीं अपितु अमेरिका जैसी आर्थिक महाशक्ति भी इस समस्या से जूझ रही है। चीन के साथ चल रहा व्यापार युद्ध भी मंदी की ही उपज है। भारत में हालात अपेक्षाकृत ज्यादा खराब हैं क्योंकि व्यापार घाटा हमारी अर्थव्यवस्था का स्थायी हिस्सा बना हुआ है। लेकिन बीते कुछ सालों में स्थिति और खराब हो गई। मोदी सरकार की तमाम राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य उपलब्धियां आर्थिक मोर्चे पर उत्पन्न चिंताजनक परिस्थितियों की वजह से चमक खोती हुई दिख रही हैं। भले ही सरकार उपरी तौर पर उसे स्वीकार नहीं कर रही किन्तु उद्योग-व्यापार जगत के साथ ही आम जनता में भी घबराहट का जो माहौल है उसे दूर करने का कोई उपाय नजर नहीं आ रहा। ऐसे में श्री मोदी ने थाईलैंड में हुए व्यापार समझौते से हाथ खींचकर समझदारी ही दिखाई। कश्मीर मुद्दे पर पकिस्तान का साथ देने के कारण सरकार ने तुर्की और मलेशिया के प्रति कड़ा रुख अपनाकर ये संकेत दे दिया था कि भारत अपने फैसले अपनी दम पर लेने की हैसियत हासिल कर चुका है। इस बारे में महत्वपूर्ण बात ये है कि थाईलैंड में मौजूद देशों में से कुछ के भारत के साथ बेहद दोस्ताना रिश्ते हैं। बावजूद उसके श्री मोदी ने देश के आर्थिक हितों का हवाला देते हुए जिस साफगोई का परिचय दिया उसके कारण भारत की वजनदारी में भी वृद्धि हुई है। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों के सामने भारत का ऊंची आवाज में बात करना दूसरे अर्थों में भी महत्वपूर्ण है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 November 2019

महाराष्ट्र : सत्ता का लालच छोड़ दे भाजपा



महाराष्ट्र में चुनाव नतीजे आये दस दिन बीत गये लेकिन अभी तक नई सरकार का गठन नहीं हो सका। यद्यपि मतदाताओं ने भाजपा - शिवसेना गठबंधन को सुविधाजनक बहुमत दे दिया लेकिन पूरे परिणाम आने के पहले ही शिवसेना ने 50 - 50 का वायदा याद दिलाते हुए भाजपा पर इस बात का दबाव बना दिया कि मुख्यमंत्री पद ढाई - ढाई साल तक दोनों पार्टियों के पास रहे। वैसे मुम्बई में दशहरा रैली के दौरान ही उद्धव ठाकरे ने अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होने की बात उछाली थी लेकिन उस समय किसी ने उसे गम्भीरता से नहीं लिया। चुनाव परिणामों में भाजपा की सीटें घटने से शिवसेना को हावी होने का अवसर मिल गया और मुम्बई में उद्धव के बेटे आदित्य को मुख्यमंत्री बनाये जाने वाले पोस्टर भी चस्पा हो गए। उधर मुख्यमंत्री पद अपनी जेब में मानकर चल रहे देवेन्द्र फडनवीस ने भी कड़ा रुख अख्तियार करते हुए दो टूक कह दिया कि मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई वायदा नहीं किया गया था और वह भाजपा के पास ही रहेगा। नतीजे आने के बाद माना जा रहा था कि शिवसेना उपमुख्यमंत्री सहित कुछ प्रमुख विभागों से मान जायेगी लेकिन नई विधानसभा का गणित कुछ इस तरह का है जिसमें बिना उसके किसी की सरकार नहीं बन सकती। यह देखते हुए ही उसकी तरफ  से ये बयान आ गया कि दूसरे विकल्प भी खुले हुए हैं। जिसका आशय शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस से मिलकर सत्ता हासिल करने से है। भाजपा का सोचना ये था कि 2014 की तरह इस बार भी ना , ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे वाली स्थिति बन जायेगी। स्मरणीय है पिछला चुनाव दोनों अलग - अलग लडऩे के बाद भी आखिर एक हो गये थे। यही स्थिति मुम्बई महानगर पालिका में भी बनी लेकिन शिवसेना की संख्या ज्यादा होने से भाजपा ने बाहर से समर्थन देकर गठबंधन बनाये रखा। बीते पांच साल में महाराष्ट्र सरकार में हिस्सेदार रहने के बावजूद शिवसेना ने न सिर्फ  प्रदेश अपितु केंद्र सरकार की आलोचना में कोई कसर नहीं छोड़ी। पार्टी के मुखपत्र सामना में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी तक की तीखी आलोचना की जाती रही। लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा-शिवसेना ने फिर गठबंधन किया। शिवसेना की मानें तो उसी दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उद्धव ठाकरे से 50-50 संबंधी वायदा किया था तथा श्री फडनवीस भी उस वक्त उपस्थित थे किन्तु मुख्यमंत्री ने ऐसे किसी वायदे से जब साफ़  इनकार कर दिया तब शिवसेना के तेवर और तीखे होते गए और तभी से उसके प्रवक्ता संजय राउत बिना नाम लिए तंज कसे जा रहे हैं। यद्यपि नतीजों के बाद एनसीपी ने विपक्ष में बैठने की बात कहकर भाजपा को राहत दी थी लेकिन शिवसेना के जिद पकड़ लेने के बाद न सिर्फ  एनसीपी बल्कि कांग्रेस में भी इस बात पर विचार हो रहा है कि भाजपा को रोकने के लिए क्यों न कर्नाटक में किये गये प्रयोग को दोहराते हुए शिवसेना की सरकार बनवा दी जाए। शरद पवार इसी सिलसिले में आज दिल्ली आकर सोनिया गांधी से मिलने वाले हैं। उधर मुख्यमंत्री भी दिल्ली में अमित शाह से चर्चा करेंगे। यद्यपि राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि अंतत: भाजपा -शिवसेना ही सरकार बनायेंगे। शिवसेना की नाराजगी बीते पांच साल में भाजपा द्वारा किये गए कथित रूखे व्यवहार के प्रति है। केंद्र में केवल एक ही मंत्री पद उसे दिया गया जबकि अकाली दल को बेहद कम सांसदों के बाद भी एक मंत्री मिला। एक मंत्री से नाराज जनता दल (यू) ने तो सरकार में शामिल होने से मना ही कर दिया। कहा जा रहा है महाराष्ट्र में कुछ महत्वपूर्ण मंत्रालय लेने के साथ ही श्री ठाकरे केंद्र में भी एक दो और मंत्री बनवाने के लिए दबाव बना रहे हैं। शिवसेना भी ये बात जानती है कि एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से भले ही वह मुख्यमंत्री पद प्राप्त कर भाजपा को ठेंगा दिखा दे लेकिन वह व्यवस्था टिकाऊ नहीं होगी। कर्नाटक में कुमारस्वामी का उदाहरण ताजा -ताजा है। और फिर कांग्रेस के साथ जाकर आंध्र के ताकतवर नेता रहे चन्द्रबाबू नायडू की क्या दुर्दशा हुई ये भी शिवसेना समझती है। सही बात ये है कि जब तक बाल ठाकरे रहे तब तक भाजपा शिवसेना के पीछे चलती थी लेकिन उनके बाद से ही पार्टी ने अपना स्वतंत्र अस्तित्व कायम करने की रणनीति बनाई जिसे देवेन्द्र फडनवीस ने बखूबी अंजाम तक पहुंचाया। बीते पांच साल में बतौर मुख्यमंत्री वे महाराष्ट्र के सबसे ताकतवर नेता के तौर पर उभरे जो शिवसेना को हजम नहीं होता। इसीलिए उसने विधानसभा की टिकिटों के लिए सौदेबाजी के बाद 126 सीटें हासिल करते हुए भाजपा की अपने दम पर बहुमत हासिल करने की महत्वाकांक्षा को विफल कर दिया। बीते चुनाव की तुलना में भाजपा की सीटें घटने से शिवसेना को अकडऩे का मौका मिल गया। पहले उम्मीद थी कि अमित शाह और उद्धव ठाकरे की मुलाकात के बाद मामला सुलट जाएगा लेकिन दोनों तरफ से चल रही ज़ुबानी जंग के कारण वह मुलाकात अभी तक तो नहीं हो सकी। मौजूदा विधानसभा की अवधि 9 नवम्बर तक है। यदि तब तक गतिरोध दूर नहीं हुआ तो राष्ट्रपति शासन की नौबत आ जायेगी। जहां तक बात भाजपा की है तो वह न ही शिवसेना के दबाव में आना चाहती है और न ही सत्ता से दूर बैठने की हिम्मत जुटा पा रही है। वैसे बेहतर यही होगा कि पार्टी शिवसेना को बता दे कि वह उसकी शर्त मानने तैयार नहीं है और उसे एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाना हो तो वह शौक से चली जाए। शिवसेना कहे कितना भी लेकिन एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाने के बाद उसकी हिन्दुत्ववादी छवि खंडित हुए बिना नहीं रहेगी। श्री पवार और श्रीमती गांधी के लिये भी शिवसेना को समर्थन दिए जाने के बाद अपनी सेकुलर छवि बनाये रखना मुश्किल होगा। ये देखते हुए शिवसेना दूसरे विकल्पों की जो धौंस भाजपा को दिखा रही है उसमें उतना दम नहीं है। लेकिन सच्चाई ये है कि भाजपा खुद सत्ता के लिए इतनी ज्यादा लालायित है कि उसे सहयोगियों के सामने झुकना पड़ता है। वरना बीते पांच सालों में शिवसेना ने उसकी जिस बुरी तरह से फजीहत की उसके बाद तो उससे किसी भी तरह का गठबंधन सम्मानजनक नहीं कहा जा सकता। उद्धव और उनके पुत्र आदित्य तो उतना नहीं बोलते लेकिन संजय राउत जिस तरह की बातें बोलते और लिखते हैं उसे देखते हुए भाजपा को चाहिए कि शिवसेना से दूरी बनाकर चले। बिना भाजपा के जो भी सरकार राज्य में बनेगी वह स्थायी नहीं होने से मध्यावधि चुनाव की नौबत आयेगी जिसमें शिवसेना को भारी नुकसान हुए बिना नहीं रहेगा। भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता में आने की मानसिकता की वजह से अपने आत्मसम्मान से जो समझौता करती है उसके कारण उसके प्रतिबद्ध मतदाता भी छिटकने लगे हैं। दो राज्यों के ताजा परिणाम इसके प्रमाण हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

जबलपुर वालो दिल्ली की छोड़ो अपनी सोचो

जबसे देश की राजधानी दिल्ली की हवा के दम घोंटू होने की खबर उड़ी तभी से जबलपुर में रहने वाले अपने शहर को लेकर बहुत ही गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। महानगरों की भागदौड़ से अलग सुकून भरी जि़न्दगी के महत्व को भी वे सभी महसूस कर रहे हैं जिनके मन में पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता और चिन्तन दोनों हैं। जैसे समाचार और चित्र आ रहे हैं उन्हें देखने के बाद दिल्ली वासियों की दुर्दशा पर रहम आने लगा है। जिस शहर से देश की सरकार चलती हो वहां रहने वाले शुद्ध हवा में सांस लेने तक से वंचित हो जाएँ तब सोचने को बाध्य हो जाना पड़ता है। दिल्ली की प्रदेश सरकार केंद्र पर आरोप लगा रही है तो केंद्र पलटवार करने में जुटा है। लेकिन दिल्ली की जनता किसको कठघरे में खड़ा करे ये बताने वाला कोई नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय , एनजीटी और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल के मुख्यालय दिल्ली में है। ये सभी समय - समय पर पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ न कुछ करते आये हैं लेकिन हर साल दिल्ली में इस तरह का आपातकाल आता है जिसमें इन्सान सांस के साथ अपने फेफड़ों में जहर भरने मजबूर हो जाता है। दिल्ली के हिस्से बन चुके गुरुग्राम , गाजिय़ाबाद और नोएडा में भी हालात संगीन हैं। इसके कारण यूँ तो अनेक हैं लेकिन सवाल ये है कि सब जानते हुए भी इसकी पुनरावृत्ति रोकने का प्रयास कोई नहीं करता। और यदि करता भी है तो उसमें ईमानदारी नहीं होती जिससे साल दर साल दिल्ली गैस चेम्बर में तब्दील होती चली गयी। अब लौट फिरकर अपने जबलपुर पर आ जाएं तो क्या हमारा शहर भी धीरे - धीरे प्रदूषण की गिरफ्त में आकर अपने खुशनुमा मौसम को खोता नहीं जा रहा ? शहर का बेतरतीब और अनियोजित विकास , अवैध कालोनियां, पेशेवर भूमाफिया के साथ , राजनेताओं , जनप्रतिनिधियों तथा भ्रष्ट नौकरशाहों की अतृप्त वासना के कारण इस शहर की आबोहवा में अब पुरानी बात नहीं रही। वाहनों की बेतहाशा संख्या की वजह से भले ही अभी दिल्ली जैसी स्थिति न बनी हो लेकिन सांस के साथ धीमे जहर के शरीर में प्रवेश की भूमिका तैयार हो चुकी है। जलस्रोतों के साथ हुए नृशंस अत्याचार ने यहाँ की धरती में समाई ठंडक खत्म की वहीं चारों तरफ  फैली चट्टानी पहाडिय़ों को इंसानी हवस ने बर्बाद कर दिया। विकास के नाम पर तानी जा रही कांक्रीट की अट्टालिकाओं ने शहर के शांत आवासीय इलाकों की रौनक छीन ली है। ले दे के एक ठो नर्मदा जी बची हैं इतराने के लिए तो उनके अति उत्साहित भक्तजन ही उनकी पवित्रता और शुद्धता से खिलवाड़ करने पर आमादा हैं। यदि ईमानदारी से अध्ययन करवाया जाए तब ये बात सामने आये बिना नहीं रहेगी कि जबलपुर का पर्यावरण काफी बिगड़ चुका है और यही हाल रहा तो आने वाले कुछ सालों बाद यहाँ भी शुद्ध हवा बीते ज़माने की बात होकर रह जायेगी। इस शहर में तमाम विश्वविद्यालय हैं जहां तरह - तरह के शोध होते हैं। अच्छा होगा जबलपुर में बढ़ते प्रदूषण को लेकर वे तथ्यपरक आंकड़े सार्वजनिक करते हुए लोगों को इसके प्रति जागरूक ही नहीं सावधान भी करें क्योंकि जब तक जनता अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगी तब तक शासन - प्रशासन कुछ नहीं कर सकेंगे। वैसे भी आजकल उनका काम कागज पर आंकड़ों की फसल उगाना मात्र रह गया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने नौकरशाही को नया फार्मूला दे दिया है जिसके अनुसार काम करो न करो लेकिन करते हुए दिखो जरूर जिससे फोटो छपती और दिखती रहे। इसलिए प्यारे जबलपुर वासियों अभी से सावधान हो जाओ और याद रखो कि भगवान भी उसी की मदद करते हैं जो अपनी मदद खुद करता है। विकास जब होगा तब होगा लेकिन जो है उसका विनाश न हो जाए इसकी चिंता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 November 2019

शुद्ध हवा चुनावी वायदा कब बनेगी



भारत की राजधानी दिल्ली एक ऐतिहासिक महानगर है। मुगलों के बाद अंग्रेजों ने इसे राजधानी बनाया और जब देश आजाद हुआ तब भी उसकी इस हैसियत को बरकरार रखा गया। ब्रिटिश सत्ता ने दिल्ली में राजधानी के लिए आवश्यक पूरा ढांचा तैयार कर दिया था। मसलन राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ और साऊथ ब्लाक नामक सचिवालय और संसद भवन जैसी अधो संरचना की वजह से दिल्ली को स्वाधीन भारत की राजधानी स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं हुई। हांलांकि दक्षिणी राज्यों की दृष्टि से दिल्ली असुविधाजनक थी लेकिन उसकी ऐतिहासिकता उसके पक्ष में गई और 15 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू द्वारा लालकिले की प्राचीर पर तिरंगा फहराए जाने के बाद किसी भी प्रकार की अनिश्चितता नहीं रही। यूँ तो दिल्ली पहले से ही बड़ा शहर हुआ करता था लेकिन आजादी के बाद पाकिस्तान से आये शरणार्थियों के कारण इसकी आबादी और चरित्र दोनों बदले। बीते सात दशक में दिल्ली महानगर से प्रदेश बन गया। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं रही। बढ़ती आबादी के कारण हरियाणा के गुरुग्राम के अलावा उप्र के नोएडा और गाजिय़ाबाद भी दिल्ली के हिस्से बनते चले गए। जिसके बाद एनसीआर (नेशनल कैपिटल रीजन) नामक परियोजना शुरू की गयी और दूसरे राज्यों का हिस्सा होने के बाद भी उक्त शहरों में दिल्ली जैसी सुविधाओं का विकास किया जाने लगा। आज की परिस्थिति में तो ये फैलाव भी छोटा पडऩे लगा है। लेकिन इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि दिल्ली के आसपास का खुला इलाका भी कांक्रीट के जंगलों में तब्दील होकर रह गया। जिसके कारण जिन समस्याओं से दिल्ली जूझती है वे ही कमोबेश गुरुग्राम, नोएडा और गाजिय़ाबाद में भी देखी जा सकती हैं। यही वजह है कि दिल्ली से कुछ सरकारी कार्यालय हटाकर अन्य निकटवर्ती शहरों में ले जाने की चर्चा भी अनेक अवसरों पर चली किन्तु बात आगे नहीं बढ़ सकी। धीरे-धीरे दिल्ली देश की राजधानी के साथ ही प्रदूषण की राजधानी भी बनती चली गई। ये सुनकर शर्म आती है कि वह विश्व की सबसे प्रदूषित राजधानियों में पहले दस में है। बीते दो-तीन दिनों से दिल्ली के साथ ही नोएडा और गाजिय़ाबाद की स्थिति बुरी तरह खराब हो चुकी है। वहां स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया गया है। शिक्षण संस्थानों में अवकाश के साथ ही निर्माण कार्य रोक दिए गए हैं। चारों तरफ  छाये धुंए के कारण राष्ट्रपति भवन और इण्डिया गेट तक दिखना बंद हो चुके हैं। दिल्ली और समीपवर्ती एनसीआर इलाकों को गैस चेम्बर कहा जाने लगा है। इसकी वजह हरियाणा , पंजाब और उप्र के किसानों द्वारा खेतों में लगाई गई आग से निकला धुंआ है जो हवा के साथ दिल्ली के आसमान पर आकर ठहर जाता है। पहले से प्रदूषित एनसीआर के लिए ये स्थिति कोढ़ में खाज साबित होती है। बीते अनेक सालों से दिल्ली, नोएडा और गाजिय़ाबाद इस संकट का सामना करते आ रहे हैं। खेतों में फसल काटने के बाद बची पराली (ठूंठ) को काटने में आने वाली परेशानियों से बचने के लिए उसमें किसान आग लगा देते हैं जिससे उनका काम तो आसान हो जाता है किन्तु उससे निकलने वाला धुँआ उड़कर दिल्ली की तरफ  जाता है। सर्दियां शुरू होते ही उत्तरी हवाओं की दिशा परिवर्तित होने के कारण पड़ोसी राज्यों में पराली के जलाये जाने की वजह से कुछ दिनों के लिए समूचा एनसीआर उसके धुंध में ढँक जाता है। इसे लेकर हर वर्ष खूब हल्ला मचता है। पड़ोसी राज्यों पर दोषारोपण के साथ ही दिल्ली की स्थानीय राजनीति भी गरमाती है। वैसे हरियाणा और पंजाब में भी पराली जलाने पर रोक लगाने का प्रयास होता है लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिलने से ये समस्या स्थायी होती जा रही है। प्रधानमन्त्री की अपील का भी विशेष असर नहीं हुआ। वैसे पराली की समस्या तो साल के कुछ दिन ही आती है लेकिन दिल्ली और आसपास के शहरों में प्रदूषण स्थायी हो गया है। आबादी के विस्फोट को रोकने की लिए भले ही गुरुग्राम, नोएडा और गाजिय़ाबाद जैसे इलाके विकसित किये गए हों लेकिन वाहनों के साथ ही औद्योगिक धुंए से होने वाले प्रदूषण ने हालात बेकाबू कर दिए हैं। राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के बावजूद देश की राजधानी सबसे प्रदूषित नगरों में बनी हुई है। लुटियंस की दिल्ली कहे जाने वाले वीआईपी क्षेत्रों को छोड़ दें तो शेष दिल्ली में देश के अन्य हिस्सों जितने ही कचरे के ढेर नजर आते हैं। सवाल ये है कि जब राजधानी की ये दुर्दशा है तब देश के छोटे शहरों और कस्बों की क्या स्थिति होगी? प्रधानमन्त्री ने स्वच्छता सर्वेक्षण नामक जो प्रतियोगिता शुरू की उसका सकारात्मक असर हुआ है। देश के अनेक नगरों की स्थिति में आश्चर्यजनक सुधार देखा जा सकता है लेकिन देश की सत्ता जिस दिल्ली में विराजमान है वहां की दशा चिंताजनक है। केजरीवाल सरकार ने सड़कों पर वाहनों की आवाजाही कम करने के लिए ऑड-ईवन नामक व्यवस्था भी लागू की लेकिन उससे भी समस्या का समाधान नहीं हो सका। लेकिन प्रदूषण की समस्या को केवल दिल्ली या और महानगरों तक ही सीमित करके नहीं देखा जा सकता क्योंकि अब तो कुछ को छोड़कर बाकी सभी छोटे-बड़े शहर प्रदूषण की गिरफ्त में आ चुके हैं। दु:ख और चिंता का विषय ये है कि शुद्ध हवा के लिए पहिचाने जाने वाले गाँवों में भी ये समस्या निरंतर गम्भीर होती जा रही है। दिल्ली का बोझ कम करने के लिए कुछ दफ्तर वहां से दूसरे शहरों में ले जाने का सुझाव भी यदि अमल में आ आये तब भी देश के बाकी हिस्सों में प्रदूषण को कैसे रोका जायेगा ये प्रश्न राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। पराली का धुँआ तो कुछ दिनों बाद छंट जाएगा लेकिन केवल उतने मात्र से ही दिल्ली को राहत नहीं मिलेगी। दु:ख की बात ये है मानव जीवन के लिए अत्यावश्यक शुद्ध हवा देना किसी भी चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा नहीं होता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 November 2019

सरदार को इससे अच्छी श्रद्धांजलि नहीं हो सकती



31 अक्टूबर 2019 का दिन स्वाधीन भारत के इतिहास में यादगार बन गया। हालाँकि देश के एकीकरण में ऐतिहासिक योगदान देने सरदार पटेल की जयंती और बांग्लादेश के निर्माण में साहसिक भूमिका का निर्वहन करने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि की वजह से ये तारीख पहले से ही महत्वपूर्ण रही लेकिन गत दिवस जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन के कारण 31 अक्टूबर नए संदर्भ में भी सदैव याद किया जायेगा। आजादी के बाद से विभिन्न समस्याओं से घिरे इस सीमावर्ती राज्य के भौगोलिक स्वरूप के साथ ही उसकी संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति में बड़ा बदलाव बीते दिन हो गया। विगत 5 और 6 अगस्त को देश की संसद ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35 ए को समाप्त कर दिया था। इसी के साथ ही जम्मू और कश्मीर को मिलाकर एक केंद्र शासित राज्य बना दिया गया जिसमें दिल्ली और पुडुचेरी की तरह से विधानसभा तो रहेगी पर इसे पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया गया। राज्यपाल की जगह वहां उपराज्यपाल (लेफ्टीनेंट गवर्नर) की नियुक्ति कर दी गयी। लद्दाख को भी अलग केंद्र शासित राज्य बना दिया गया लेकिन वहां विधानसभा नहीं होगी। इस प्रकार अब जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक हैसियत अतीत बनकर रह गई। उसका अलग संविधान और अलग ध्वज भी इतिहास की विषय वस्तु होकर रह गये। देश के बाकी राज्यों की तरह से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में भी भारतीय कानून और व्यवस्था समान रूप से लागू हो गयी। देश का कोई भी नागरिक अब वहां जाकर न केवल बस सकता है वरन भूमि खरीदकर उसका मालिकाना हक भी प्राप्त कर सकेगा। और भी अनेक ऐसी बातें हैं जो इस समूचे क्षेत्र को भारत के साथ पूरी तरह से जोडऩे में सहायक होंगी। सबसे बड़ी चीज ये होगी कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में रहने वालों को इस बात का एहसास हो जायेगा कि वे भी भारत के किसी दूसरे राज्य जैसे ही हैं। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा कि 370 के रूप में जो दीवार खड़ी थी वह गिरा दी गई। हालांकि जम्मू और लद्दाख ने तो नई व्यवस्था को पहले दिन ही स्वीकार कर लिया था लेकिन कश्मीर घाटी के भीतर एक बड़ा तबका है जिसे मोदी सरकार का ये कदम सहन नहीं हो रहा। भले ही केन्द्र सरकार और सुरक्षा बलों की सख्ती के कारण ज्यादा चूं-चपाट नहीं हो सकी लेकिन अलगाववादी भावनाएं अभी भी घाटी में हैं। बीते कुछ दिनों में सेब लादने गए गए ट्रक ड्राइवरों के अलावा कुछ मजदूरों की हत्या से ये भी साबित हो गया कि आतंकवादियों की जड़ें वहां हैं। यद्यपि घाटी में मोबाईल सेवा बहाल होने के बाद जैसी आशंका थी उस अनुपात में विरोध सामने नहीं आया जिससे लगता है कि आम कश्मीरी में समूचे बदलाव से विशेष नाराजगी नहीं है। लेकिन राजनीतिक बिरादरी में अपनी दुकानदारी चौपट होने का गुस्सा जरुर है। तमाम बड़े नेता और अलगाववादी सरगना अभी भी बंद हैं। उस वजह से विरोध संगठित नहीं हो पा रहा। शिक्षण संस्थानों में उपस्थिति बढ़ती जा रही है। सरकारी कार्यालयों में भी कर्मचारी और अधिकारी काम कर रहे हैं। उन्हें भी बदले हुए हालातों का एहसास हो चुका है। दरअसल केंद्र के इस कदम ने अलगाववादी ताकतों को संभलने का अवसर ही नहीं दिया। राजनीतिक नेता भी कुछ समझ पाते उसके पहले ही उन्हें घेर लिया गया। शीघ्र ही केंद्र की पहल पर राज्य में बड़ा निवेशक सम्मलेन होने वाला है। उसमें बड़े पैमाने पर निवेश लाने की कोशिश की जायेगी ताकि औद्योगिक पिछड़ापन तथा बेरोजगारी दूर हो सके। आतंकवाद के कारण इस राज्य के पर्यटन उद्योग को जो नुकसान हुआ वह भी सामान्य हालात बनते ही फिर से विकसित हो सकेगा। इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात ये है कि जिस कश्मीर घाटी में अलगाववाद को संरक्षण मिलता रहा उसकी राजनीतिक वजनदारी को कम करने की कार्ययोजना पर भी काम चल रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव के पहले नए सिरे से परिसीमन किया जाएगा। जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच सीटों को लेकर जो असंतुलन था उसे दूर करने के प्रयास भी जारी हैं। सभी जानते हैं कि इस राज्य की राजनीतिक ताकत कश्मीर घाटी के पास होने से जम्मू और लद्दाख हर तरह से उपेक्षित रहे। लद्दाख तो खैर, अब अलग हो गया लेकिन जम्मू आगे भी कश्मीर घाटी के साथ ही रहेगा। ये देखते हुए राजनीतिक असंतुलन दूर करना निहायत जरूरी है। गत दिवस घाटी में किसी भी तरह का विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। न सिर्फ  श्रीनगर बल्कि घाटी के अंदरूनी इलाकों तक में शांति बनी रही। इससे साबित होता है कि आम कश्मीरी को ये बात समझ में आ गयी है कि चाहे नेता जितनी भी कोशिश कर लें लेकिन अनुच्छेद 370 और 35 ए की वापिसी असम्भव है। इसलिए उसके सामने नई परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए उनके साथ सामंजस्य बिठाने के सिवाय दूसरा रास्ता नहीं है। नई प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह से प्रभावशील होने में अभी कुछ समय लगेगा। शासकीय कर्मचारी भी केंद्र के अधीन आने के बाद कुछ समय तक तो असहज महसूस करेंगे लेकिन शुरुवाती परेशानियों के बाद घाटी को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने का उद्देश्य जरुर पूरा होगा ये विश्वास बीते तीन महीनों में दिन ब दिन मजबूत होता गया। भाजपा समर्थक तो अपने आदि पुरुष डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सपने के पूरा होने से प्रसन्न हैं ही लेकिन सरदार पटैल को भी इससे अच्छी श्रद्धांजलि दूसरी नहीं हो सकती थी। उनके जन्मदिन पर कश्मीर में एक नए सूर्य का उदय एक सुखद संयोग ही है।

- रवीन्द्र वाजपेयी