Thursday, 14 November 2019

कॉलेजियम में पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिए



सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस एक महत्वपूर्ण फैसले में देश के प्रधान न्यायाधीश के दफ्तर को भी  सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाने के दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय पर मोहर लगा दी । यद्यपि अभी भी न्यायपालिका से जुड़ी बहुत सी बातें ऐसी हैं जिनमें सूचना का अधिकार लागू नहीं होगा किन्तु सेवानिवृत्ति के चंद रोज पहले प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई का ये कहना मायने रखता है कि सूचना का अधिकार न्यायिक स्वतंत्रता को कम नहीं करता। सबसे रोचक बात ये है कि दिल्ली उच्च न्यायालय के संदर्भित निर्णय को सर्वोच्च न्ययालय के सेकेट्ररी जनरल और केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी द्वारा ही सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। अब उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए बनने वाले कॉलेजियम में शामिल नामों का खुलासा तो करना होगा लेकिन उसका कारण बताना जरूरी नहीं होगा । श्री गोगोई सहित वरिष्ठ न्यायाधीशों की पीठ के इस फैसले के बाद हालांकि सूचना के अधिकार का दायरा बढ़ा है और देश के प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय में भी पारदर्शिता बढ़ेगी लेकिन कॉलेजियम में शामिल नामों का कारण नहीं बताए जाने के कारण बहुत सी चीजें अभी भी पर्दे के पीछे रहेगीं। पीठ ने साफ  तौर पर कहा भी है कि सूचना के अधिकार का उपयोग सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी के लिए नहीं किया जा सकता । निश्चित तौर पर ये एक अच्छा फैसला है जिसका दूरगामी असर होगा । देश की सबसे बड़ी न्यायिक पीठ पर आसीन मुखिया के क्रियाकलापों को पूरी तरह से छिपाकर रखना तमाम संदेहों को जन्म देता रहा है । वैसे भी न्यायपालिका की कार्यप्रणाली में ताक झांक करने की हिम्मत अच्छे-अच्छों की नहीं होती। यहां तक कि समाचार माध्यम भी उसे लेकर बेहद सतर्क रहते हैं । न्यायपालिका के प्रति सम्मान और विश्वास में कमी के बावजूद अदालत की अवमानना का भय बदस्तूर कायम है । यद्यपि अदालती फैसलों पर आलोचनात्मक टिप्पणियां सुनने और समीक्षात्मक लेख पढऩे मिलने लगे हैं । मुस्लिम नेता सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की आलोचना करते हुए कहा था कि वह सर्वोच्च होने से आदरणीय है लेकिन अचूक नहीं है । श्री ओवैसी स्वयं बैरिस्टर हैं। इसलिए उनके विधिक ज्ञान पर भी अंगुली उठाने का औचित्य नहीं  है किंतु सीधे न कहते हुए भी उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में चूक की आशंका व्यक्त कर दी। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एके गांगुली ने भी इस फैसले की जमकर आलोचना की । टीवी चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में भी उक्त फैसले के पक्ष और विपक्ष में कहा -सुना गया। ये एक शुभ संकेत है क्योंकि इससे न्यायपालिका  अपनी जवाबदेही और निष्पक्षता के प्रति सजग और सतर्क रहती है लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु बनने वाले कॉलेजियम सम्बन्धी पारदर्शिता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने अधूरापन बरकरार रखा । जिन लोगों के नाम उसमें शामिल होते हैं उनको सूचना के अधिकार के अंतर्गत उजागर करने पर सहमत होने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने उनके चयन का कारण बताने से इंकार कर दिया। बाकी बातों को छोड़ दें तो कॉलेजियम में नाम शामिल करने के आधार को गोपनीय रखने से उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर होने वाली टीका-टिप्पणियों को रोकना मुश्किल होगा । इसे लेकर न्यायपालिका के भीतर भी तरह - तरह की चर्चाएं चला करती हैं । बेहतर होता सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय में इस पहलू पर भी विचार कर लेता । न्यायाधीशों की नियुक्ति में योग्यता को पूरी तरह उपेक्षित किया जाता हो ये कहना तो गलत होगा किन्तु  न्यायाधीशों के परिवारों से ही नियुक्तियां होने से अंकल जज जैसी फब्तियां कसी जाने लगीं । सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू तो इस विषय में सार्वजनिक तौर पर भी तीखी टिप्पणियां करते रहे हैं । न्यायिक क्षेत्र को लेकर होने वाली हर चर्चा में कॉलेजियम में नाम शामिल करने के आधार पर खूब बातें होती हैं । यद्यपि देश के प्रधान न्यायाधीश के दफ्तर को सूचना के अधिकार के दायरे में लाना एक सकारात्मक फैसला है लेकिन न्यायपालिका के प्रति विश्वास को अखंड बनाये रखने के लिए जरूरी है कि उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की समूची प्रक्रिया पूरी तरह निर्दोष और पारदर्शी हो । न्यायिक नियुक्ति आयोग को अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और स्वायत्तता का हवाला दिया था । जिन 4 न्यायाधीशों ने इस मुद्दे पर पत्रकार वार्ता की थी उसकी अगुआई श्री गोगोई ने ही की थी । लेकिन न्यायपालिका का स्वछंद होना भी ठीक नहीं होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय स्वप्रेरणा से कॉलेजियम को लेकर की जाने वाली अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए जरूरी कदम उठाएगा । गत दिवस जो फैसला हुआ उसे शुरूवात माना जा सकता है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 13 November 2019

शिवसेना : तमाशा बन गये खुद ही तमाशा देखने वाले



महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय की आलोचना करने वाले दलों के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने सरकार बनाने के मामले में जो अनिर्णय की स्थिति बनाकर रखी उसकी वजह से राज्यपाल के पास और कोई विकल्प नहीं बचा था। शिवसेना जब बहुमत का प्रमाण देने में विफल रही तब राजभवन द्वारा एनसीपी को कल रात 8.30 बजे तक का समय दिया गया लेकिन पार्टी ने कल सुबह 11.30 बजे ही और समय दिए जाने की अर्जी भेज दी। राज्यपाल ने चूंकि शिवसेना को और समय देने से इनकार कर दिया था इसलिए एनसीपी को और मोहलत देना संभव नहीं था। कांग्रेस ने अभी तक अपने विधायक दल का नेता ही नहीं चुना इसलिए उसे निमंत्रण नहीं दिया गया। उधर कांग्रेस और एनसीपी मिलकर भी ये तय नहीं कर पाए कि शिवसेना को समर्थन दिया जावे या नहीं। एनसीपी ने भी शिवसेना को किसी भी तरह का आश्वासन नहीं दिया। वहीं कांग्रेस ने ये कहकर अनिश्चितता बनाये रखी कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम को अंतिम रूप दिए बिना वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंचेगी। राज्यपाल को जब लगा कि शिवसेना और एनसीपी दोनों बहुमत का इंतजाम करने में विफल रहीं तब उन्होंने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश भेज दी जिसे केंद्र सरकार ने मंजूर करते हुए राष्ट्रपति को भेजा जिन्होंने बिना देर लगाये उस पर मोहर लगा दी। शिवसेना ने तत्काल सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगा दी जिस पर आज सुनवाई होगी। उधर एनसीपी और कांग्रेस ने संयुक्त पत्रकार वार्ता में राष्ट्रपति शासन लगाने की तो आलोचना की लेकिन ये भी स्वीकार किया कि अभी तक सरकार बनाने के मामले में वे किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं। शरद पवार ने तो मजाक में ये तक कह दिया कि राज्यपाल ने उन्हें सरकार बनाने के लिए छह महीने का समय दे दिया है। ज्योंही राष्ट्रपति शासन लगा त्योंही भाजपा ने भी अपनी कोशिशों को नए सिरे से शुरू कर दिया। वहीं शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपने बेटे के साथ उतरा हुआ चेहरा लेकर पत्रकारों से मिले और अपने हिंदुत्ववादी होने का हवाला देते हुए भाजपा पर वायदा खिलाफी का आरोप लगाया लेकिन वे एनसीपी और कांग्रेस की चालबाजी से खुद को ठगा सा महसूस करते दिखे। इस समूचे मामले में एक बात साबित हो गयी कि कांग्रेस भाजपा की सरकार को रोकने की इच्छा के बावजूद एनसीपी को खुला हाथ देने के मूड में नहीं है। वहीं एनसीपी भी उद्धव ठाकरे को तश्तरी में रखकर महाराष्ट्र की सत्ता सौंपने के लिए तैयार नहीं है। इधर शिवसेना की परेशानी ये हो गयी कि जल्दबाजी और अति उत्साह में वह इतना आगे बढ़ गयी कि अब उसके लिए पीछे लौटना नामुमकिन हो गया है। शुरू में शिवसेना के रणनीतिकार मानकर चल रहे थे कि भाजपा से नाता तोड़ते ही एनसीपी और कांग्रेस उसे कंधों पर बिठाकर घुमाएंगे। लेकिन उन्होंने दाना फेंककर पहले तो आदित्य ठाकरे को अनुभवहीन बताते हुए उद्धव को मुख्यमंत्री बनने के लिए राजी किया और उसके बाद उन पर एनडीए से बाहर निकलने का दबाव बनाते हुए केन्द्रीय मंत्रीमंडल में शिवसेना के मंत्री के इस्तीफे की शर्त भी रख दी। शिवसेना ने भीगी बिल्ली की तरह सारी बातें मान भी लीं किन्तु एन वक्त पर एनसीपी और कांग्रेस ने उसे ठेंगा दिखा दिया। भाजपा के साथ रहते हुए भी उसे गरियाने वाली शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के विरुद्ध जुबान खोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही जो उसकी दयनीयता को दर्शाता है। राष्ट्रपति शासन लगते ही भाजपा ने जिस तरह शिवसेना छोड़कर आये नारायण राणे को सरकार बनाने की कोशिशों के साथ आगे किया उसकी वजह से शिवसेना ही नहीं एनसीपी भी चिंतित हो गयी है क्योंकि श्री राणे एनसीपी में भी रहे हैं। यद्यपि भाजपा को सरकार बनाने के लिए जितने विधायकों का समर्थन चाहिए उतने जुटाना कठिन लगता है लेकिन ये भी सही है कि मौजूदा स्थिति में स्थिर सरकार केवल भाजपा के नेतृत्व में ही बन और चल सकती है। ये भी कहा जा सकता है कि दूसरे दलों में सेंध लगाने की क्षमता भी भाजपा में सबसे अधिक है। कर्नाटक में कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनने हेतु समर्थन देकर कांग्रेस ने भले ही भाजपा को रोक दिया था लेकिन बाद में जो हुआ उसे देखते हुए शिवसेना और एनसीपी के अनेक विधायक यदि भाजपा की गोद में आ बैठें तो आश्चर्य नहीं होगा। इस दौरान तो कई बार लगा कि खुद शरद पवार नहीं चाहते कि शिवसेना का मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस के लिए तो शिवसेना का समर्थन करना सौ जूते या सौ प्याज खाने जैसी दुविधा से गुजरने जैसा है। इसीलिये सोनिया गांधी किसी न किसी बहाने समर्थन की चि_ी देने से बचती रहीं। शरद पवार ने कल शाम जिस बेफिक्र अंदाज में राष्ट्रपति शासन पर अपनी प्रतिक्रिया दी उससे लगा कि वे भी शिवसेना को ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं हैं। खैर, आगे जो भी हो लेकिन फिलहाल तो उद्धव ठाकरे दो पाटों के बीच में फंस गए हैं। भाजपा से उनका दोबारा गठबंधन फिलहाल तो नामुमकिन लगता है और एनसीपी तथा कांग्रेस जी भरकर उनका मजाक बनाने पर तुले हैं। आने वाले दिनों में भले शिवसेना अपनी सरकार बना ले जाए लेकिन उसकी ठसक पूरी तरह उतर चुकी है। पार्टी अपने मुखपत्र सामना में हर किसी की हंसी उड़ाने पर आमादा रहा करती थी लेकिन बीते दो सप्ताह में उद्धव ठाकरे को खुद सियासत के भद्दे मजाकों का सामना करना पड़ा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 November 2019

कांग्रेस को पवार का रिंग मास्टर बनना रास नहीं आ रहा



महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन का मामला जिस तरह से उलझता जा रहा है उससे शिवसेना को ये समझ में आ गया होगा कि अपना मुख्यमंत्री बनाने का सपना साकार करना उतना आसान नहीं जितना वह समझ रही थी। भाजपा द्वारा पांव पीछे खींच लेने के बाद राज्यपाल ने उसको सरकार बनाने का न्यौता देते हुए कल शाम तक का समय दिया था। आदित्य ठाकरे राजभवन जाकर बैठे भी रहे लेकिन न उनके पास एनसीपी के समर्थन की चि_ी थी और न ही कांग्रेस के। लिहाजा राज्यपाल ने और समय देने से इंकार करते हुए एनसीपी को निमंत्रण देकर  आज रात 8.30 बजे तक का समय दे दिया। सबसे रोचक बात ये है कि एनसीपी की शर्त मानकर शिवसेना ने एनडीए से नाता तोड़ते हुए केंद्र सरकार से अपना मंत्री भी हटा लिया लेकिन उसके बावजूद शरद पवार उद्धव ठाकरे को बातों में उलझाये हुए हैं। राज्यपाल द्वारा सरकार बनाने का निमंत्रण मिलने पर एनसीपी द्वारा इंकार नहीं किये जाने और दिल्ली में कांग्रेस की उच्चस्तरीय बैठक के बाद जारी बयान में शिवसेना को समर्थन देने के बारे में निर्णय आज पर टाल देने की बाद से उद्धव ठाकरे की घबराहट बढऩा स्वाभाविक है। अंदरखाने की खबर के अनुसार एनसीपी शिवसेना को झूला झुलाने की रणनीति पर चलते हुए अकेला करने की कोशिश में है। भाजपा के विरुद्ध वह इतना जहर उगल चुकी है कि फिलहाल उसके साथ दोबारा दोस्ती मुश्किल है और इधर शरद पवार के अलावा जब तक कांग्रेस का साथ नहीं मिलेगा तब तक सत्ता हाथ आना नामुमकिन है। कांग्रेस की दुविधा ये है कि वह शिवसेना को समर्थन देकर मुस्लिम मतों को खोने का खतरा मोल लेने से बचना चाहती है। मुम्बई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पुराने शिवसैनिक संजय निरुपम ने तो पार्टी को उसके बारे में आगाह भी कर दिया है। प्राप्त संकेतों के मुताबिक सोनिया गांधी महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार नहीं बनने से तो खुश हैं लेकिन वे ये भी नहीं चाह रहीं कि शिवसेना का साथ लेकर शरद पवार दोबारा राज्य की राजनीति में शक्तिशाली बन जाएं। कांग्रेस की एक परेशानी ये है कि उसके पास महाराष्ट्र में नेता तो कई हैं लेकिन उनमें सर्वमान्य कोई नहीं होने से हाईकमान को अलग-अलग सलाह मिल रही हैं। कुछ किसी भी कीमत में सत्ता के साथ जुडऩे के लिए लालायित हैं तो कुछ को पार्टी की धर्मनिरपेक्ष छवि के खंडित होने का खतरा नजर आ रहा है। इसीलिये ये संकेत भी मिले हैं कि श्रीमती गांधी शिवसेना को समर्थन देने का निर्णय एनसीपी के कंधों पर डालकर कांग्रेस को सांप्रदायिक होने के आरोप से बचाए रखना चाह रही हैं। इसके अलावा बिना सरकार में शामिल हुए दबाव बनाने का अधिकार रख मौका मिलते ही झटका देने की अपनी चिर-परिचित नीति पर चलने से भी उसे परहेज नहीं होगा। कांग्रेस द्वारा किये जा रहे विलम्ब का कारण दरअसल एनसीपी की पिछलग्गू होने के आरोप से बचना भी है। उसे ये डर सताने लगा है कि कहीं भविष्य में श्री पावर शिवसेना से गठजोड़ करते हुए महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ी ताकत न बन जाएं। कुल मिलाकर अब तक के संकेतों से पता चलता है कि कांग्रेस भले ही श्री पवार के जरिये गैर भाजपा सरकार को समर्थन दे दे लेकिन अपना मुख्यमंत्री बनाने की शिवसेना की जिद को अस्वीकार करने का दांव भी चल सकती है। कांग्रेस में एक खेमा ये सोच रहा है कि एनसीपी के कहने मात्र से शिवसेना को समर्थन देने की बजाय अपना महत्व साबित किया जावे। अभी तक उद्धव ठाकरे को लग रहा था कि श्री पवार को राजी कर लेने मात्र से उनका काम बन जायेगा। लेकिन श्रीमती गांधी ने निर्णय को लटकाकर श्री ठाकरे के साथ श्री पवार को भी झटका दे दिया। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से ज्यादा सीटें जीतने के बाद से एनसीपी खुद को महाराष्ट्र में वैकल्पिक राजनीतिक ताकत के रूप में प्रस्तुत करने लगी थी। शिवसेना ने भी सरकार बनाने के बारे में श्री पवार से ही सम्पर्क साधा। श्रीमती गांधी से तो उद्धव ने कल फोन पर बात की। निश्चित रूप से कांग्रेस को ये अपनी उपेक्षा लगी होगी। हो सकता है आज की बैठक के बाद वह अपना समर्थन दे भी दे। लेकिन वह उद्धव के लिए होगा या एनसीपी के लिए ये देखने वाली बात होगी। क्या होगा क्या नहीं ये तो कांग्रेस की आज की बैठक के बाद पता चल पायेगा परन्तु पार्टी चाहे तो पिक्चर अभी बाकी है वाली स्थिति उत्पन्न कर सकती है। यदि आज शाम तक उसने किसी को समर्थन की चि_ी नहीं दी तब राज्यपाल एनसीपी को दिया न्यौता वापिस लेकर कांग्रेस के पाले में गेंद सरका देंगे। और उस स्थिति में शिवसेना और एनसीपी दोनों के लिए उगलत-निगलत पीर घनेरी के हालात बन जायेंगे। रही भाजपा तो उसके पास फिलहाल न पाने को कुछ है और न ही खोने को। हां, एनसीपी ने भी मना कर दिया और राज्यपाल के पास किसी के भी समर्थन का पत्र नहीं पहुंचा तब वे कांग्रेस को आमंत्रण दिए बिना राष्ट्रपति शासन की सिफारिश भेजने का कदम उठा सकते हैं। वर्तमान स्थिति में सबसे ज्यादा हास्यास्पद और दयनीय स्थिति शिवसेना और उसकी नेता उद्धव ठाकरे की हो गई है। वे मुख्यमंत्री बनने के बाद भी शिवसेना की चिर परिचित शैली की सियासत नहीं कर सकेंगे। जो उत्पात बीते पांच साल में शिवसेना ने राज्य सरकार में रहते हुए भाजपा को सताने के लिए किया, वैसा ही कांग्रेस भी कर सकती है। आखिरकार उसके पास भी तो संजय राउत जैसा संजय निरुपम जो है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 11 November 2019

लेकिन क्या हिंदुत्व छोड़ सकेगी शिवसेना



यदि शिवसैनिकों ने बाबरी मस्जिद तोड़ी तो मुझे उन पर गर्व है कहने वाले स्व. बाल ठाकरे के बेटे और पोते यदि कांग्रेस और एनसीपी से समझौता करते हुए महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने जा रहे हैं तो किसी को कोई  आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्योंकि जब भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बना ली तब राजनीति में छुआछूत और सैद्धांतिक भेद का कोई अर्थ नहीं रह गया। लेकिन इसे विचित्र संयोग ही कहा जा सकता है कि जिस दिन अयोध्या में राममंदिर के निर्माण का फैसला आया लगभग उसी के साथ मंदिर निर्माण की पक्षधर शिवसेना उन दलों के साथ गठबंधन को तैयार हो गयी जिन्होंने कभी बाबरी ढांचे को दोबारा खड़ा करने का वायदा किया था और जिनकी निगाह में स्व. ठाकरे सबसे बड़े साम्प्रदायिक व्यक्ति थे। खैर, राजनीति में अब ये सब बातें मायने खो चुकी हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा का गठबंधन भले औपचारिक तरीके से अब जाकर टूटा हो लेकिन बीते पांच साल में साथ रहने के बावजूद दोनों के रिश्ते कभी सौहाद्र्रपूर्ण नहीं रहे। 2014 का लोकसभा चुनाव दोनों ने मिलकर लड़ा और शिवसेना का एक मंत्री भी मोदी सरकार में शामिल हुआ लेकिन राज्य विधानसभा चुनाव आते तक अलगाव हो गया और दोनों अलग-अलग मैदान में उतरे। पहली बार भाजपा ने शिवसेना को पीछे छोड़ा और 122 सीटें लेकर सरकार बनाने की दावेदार बन बैठी। शुरुवाती खींचतान के बाद दोनों फिर एकजुट हुए और देवेन्द्र फडनवीस के नेतृत्व वाली सरकार में शिवसेना शरीक हो गई। लेकिन पूरे पांच साल वह भाजपा पर तीखे हमले करती रही। यहां तक कि केंद्र सरकार की नीतिगत आलोचना से भी उसने परहेज नहीं किया। बावजूद उसके गठबन्धन चलता रहा। लोकसभा चुनाव में दोनों मिलकर उतरे और अच्छी खासी सफलता हासिल की। शिवसेना का एक मंत्री दोबारा मोदी मंत्रीमंडल का सदस्य भी बना लेकिन विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा होने के बाद चुनाव परिणाम आते ही शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद को लेकर जिद पकड़ ली। भाजपा चूंकि 105 पर आकर अटक गई इसलिए उसके पास सौदेबाजी करने की  ताकत नहीं बची। एनसीपी और कांग्रेस की सदस्य संख्या काफी निर्णायक हो गई। भाजपा को ये मुगालता रहा कि अंतत: शिवसेना की हिन्दुत्ववादी नीतियां उसे अलग नहीं होने देगी किन्तु उसकी सोच को धता बताते हुए उसने इस बार किसी भी कीमत पर वाली जिद पकड़ी और कल रात तक जो कुछ भी सामने आया उसके अनुसार अब आदित्य ठाकरे की बजाय उद्धव ठाकरे खुद मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। इस बारे में जो पता लगा उसके अनुसार पार्टी के अनेक वरिष्ठ विधायकों और कुछ नेताओं ने आदित्य के मातहत काम करने में संकोच दिखाया। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने भी उद्धव ठाकरे को आदित्य की अनुभवहीनता का हवाला देते हुए खुद मुख्यमंत्री बनने की सलाह दी लेकिन एनडीए छोडऩे तथा केंद्र से अपने मंत्री का स्तीफा दिलाने की शर्त रख दी। कांग्रेस इस सरकार को बाहर से समर्थन करेगी या शामिल होगी ये साफ  नहीं है लेकिन श्री पवार के भतीजे अजीत उपमुख्यमंत्री बनेंगे और कांग्रेस विधानसभा अध्यक्ष अपना बनायेगी ये चर्चा है। आज शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलने वाले हैं। यदि बड़ा उलटफेर नहीं हुआ तब शाम तक शिवसेना की अगुआई में एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से सरकार का गठन हो जाएगा। इसके स्थायित्व को लेकर भले ही अभी से शंका व्यक्त की जाने लगी हो किन्तु शिवसेना को उसकी चिंता नहीं है। वह इस पूरे खेल में भाजपा को नीचा दिखाने के उद्देश्य से कुछ भी करने को तैयार है। इसकी एक वजह उसे अपने अस्तित्व के लिए निरंतर बढ़ता जा रहा खतरा भी है। उद्धव ठाकरे को ये लगने लगा था कि यदि दोबारा श्री फडनवीस को मुख्यमंत्री बनने दिया तो अगले पांच साल बाद शिवसेना राज्य की राजनीति में पूरी तरह से हाशिये पर चली जायेगी। उस दृष्टि से उनका दांव मरता क्या न करता वाली स्थिति की तरफ  इशारा कर रहा है। सवाल ये है कि ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री वाले जिस वायदे की बात शिवसेना लगातार उछालती रही उसके बारे में श्री फडनवीस तो इनकार करते रहे लेकिन आज तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उस विषय पर एक शब्द भी नहीं कहा जबकि बकौल शिवसेना लोकसभा चुनाव की सीटों के बंटवारे के समय उद्धव के साथ हुई बैठक में श्री शाह ने ही वह वायदा किया था। भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व का इस बारे में मौन वाकई चौंकाने वाला रहा। इसी तरह ये बात भी काबिले गौर है कि शिवसेना की नाराजगी दूर करने के लिए भी भाजपा के किसी वरिष्ठ नेता की तरफ  से कोशिश होती नहीं दिखी। यहां तक कि स्व. प्रमोद महाजन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा के सबसे बड़े चेहरे नितिन गडकरी तक को उपेक्षित रखा गया। कुछ लोगों का मानना रहा है कि ठाकरे परिवार की खुन्नस दरअसल श्री फडनवीस से ज्यादा थी। यदि भाजपा श्री गडकरी को आगे कर देती तब विवाद सुलझ सकता था। बहरहाल अब शिवसेना इतने आगे बढ़ चली है कि उसका लौटना फिलहाल सम्भव नहीं रहा। एनसीपी और कांग्रेस के साथ उसका याराना कितने दिन चलेगा ये कहना कठिन है क्योंकि ये गठबंधन राज्य में मध्यावधि चुनाव रोकने के लिए हो रहा है। लेकिन उसे लम्बे समय तक टालना संभव नहीं होगा। देखने वाली बात ये होगी कि शिवसेना एनडीए छोडऩे के बाद भी क्या हिंदुत्व की नीति छोड़ सकेगी क्योंकि वैसा करने के बाद तो उसकी पहिचान ही नहीं बचेगी। राजनीतिक लिहाज से तो शिवसेना ने भाजपा को फिलहाल झटका दे दिया लेकिन इस चाल से उसने अपने भविष्य को भी खतरे में डाल दिया है। एनसीपी और कांग्रेस के पास तो खोने के लिए कुछ था ही नहीं लेकिन शेर बनकर दहाडऩे वाली शिवसेना को अब इन दोनों पार्टियों के सामने भीगी बिल्ली बनकर रहना पड़ेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 10 November 2019

केवल राजनीति से ही देश नहीं चलता



राम को इमाम ए हिन्द कहने वाले अल्लामा इकबाल की भवना को यदि समझ लिया जाता तो अयोध्या विवाद कभी का सुलझ गया होता। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गत दिवस दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में इस बात को  स्वीकार किया गया कि 6 दिसम्बर 1992 को ढहाए गये विवादित ढांचे के नीचे ही भगवान राम की जन्मभूमि रही और मीर  बाकी ने जिस कथित बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था वह पहले से ही विद्यमान मंदिर पर बनी थी। हालांकि न्यायालय ने ये मानने से इंकार कर दिया कि मीर  बाकी ने मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई थी लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अतीत में की गई खुदाई के काफी पहले ही इस बात की पुष्टि कर दी गयी थी कि मस्जिद के भीतर  हिन्दू स्थापत्य कला के साक्षात प्रमाण मौजूद थे। यद्यपि न्यायालय के फैसले का आधार आस्था, इतिहास और पुरातात्विक प्रमाणों का मिश्रण है लेकिन उसके बाद भी उसने मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन देने का आदेश देते हुए अपने फैसले को एकपक्षीय होने के आरोप से बचाने की कोशिश की। बावजूद इसके ओवैसी ब्रांड मुस्लिमों को छोडकर अधिकांश ने फैसले को विवाद की समाप्ति मानकर स्वीकार करने की समझदारी दिखाते हुए  उन लोगों की दुकान बंद करवा दी जो मुस्लिम समुदाय को  मुख्यधारा से दूर करने का षड्यंत्र रचते रहे। फैसले के पहले ही मुसलमानों के बीच से ये चर्चा सुनाई देने लगी थी कि विवादित भूमि हिन्दुओं को सौंप दी जाये ताकि हम  शांति के साथ रह सकें। इस विवाद का यही हल होना था लेकिन एक सुनियोजित योजना के तहत अदालती विवाद को टाला जाता रहा। गत वर्ष जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की जल्द सुनवाई करते हुए फैसला करने की पहल की तब कपिल सिब्बल ने उसे लोकसभा चुनाव के बाद तक टालने की दलील ये कहते हुए रखी कि उसका राजनीतिक फायदा उठाया जायेगा। वरिष्ठ अधिवक्ता होने के कारण श्री सिब्बल भी जानते थे कि विवादित ढांचा मूलत: मन्दिर ही था। स्व. राजीव गांधी के कार्यकाल में जब ढांचे में रखी मूर्तियों का ताला खुलवाया गया उस समय भी यदि मुस्लिम पक्ष को विश्वास में लेकर आगे बढऩे का प्रयास किया जाता तो तीस साल तक देश ने जो सहा उससे बचा जा सकता था। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मामले को  अंजाम तक पहुँचाने के  लिए दिखाई गयी इच्छा शक्ति की प्रशंसा के साथ केंद्र सरकार को भी धन्यवाद देना चाहिए जिसने बिना लागलपेट के पूरे देश को इस बात के लिये प्रेरित किया कि अदालत का जो भी निर्णय आयेगा उसे जस का  तस स्वीकार किया जाये और उसमें किसी की जीत या हार जैसी सोच न रखी जाए। यही कारण रहा कि दशकों से चला आ रहा विवाद इतनी सहजता से निपट गया। इतने बड़े अदालती फैसले पर जिस तरह की सधी और सुलझी हुई प्रतिक्रियाएं आईं वे इस बात का प्रमाण हैं कि भारत वाकई बदल रहा है और उसमें परिपक्वता आई है। इसके पहले भी तीन तलाक और अनुच्छेद 370 को लेकर बड़े फैसले किये गये जिनका देश के सामान्य जनमानस ने आमतौर पर स्वागत और समर्थन किया। भले ही दूध में नीबू निचोडऩे वाले तबके ने उन निर्णयों को गलत साबित करने की पुरजोर कोशिशें कीं  लेकिन अधिकतर लोगों ने व्यापक राष्ट्रीय हितों को महत्व देते हुए किसी भी संकुचित सोच से परहेज किया। अयोध्या विवाद सुलझने के बाद वैश्विक स्तर पर भी भारत  की प्रतिष्ठा में अकल्पनीय वृद्धि हुई है। दुनिया को ये समझ में आने लगा है कि भारत में  अपनी समस्याओं का हल करने की क्षमता के साथ कड़े और बड़े फैसले लेने की इच्छा शक्ति भी है। इस फैसले को राजनीतिक नफे-नुकसान के लिहाज से देखने वालों की तुलना उस भक्त से की जा सकती है जिसकी पूजा में भक्ति कम स्वार्थसाधना अधिक होती है। मौजूदा केंद्र सरकार पर तरह-तरह के आरोप लगाने वालों को ये समझ लेना चाहिए कि उसने लम्बित मामलों का हल करने का जो  साहस दिखाया वह देश के दूरगामी हितों के मद्देनजर है। अयोध्या विवाद केवल हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच का झगड़ा न होकर तुष्टीकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षतावाद का पोषक बनकर रह गया था। भगवान राम की जन्मभूमि में उनके जन्म को साबित करने के लिए देश की आजादी के पहले से चला रहा विवाद केवल मतदाताओं के धु्रवीकरण तक सीमित नहीं रहा। दुर्भाग्य से स्वाधीनता मिलने के बाद भी ऐसे अनेक मामलों को निपटाने के प्रति दुर्लक्ष्य किया गया जो उस समय आसानी से हल हो सकते थे। खैर, जो हो गया सो हो गया। नये संदर्भों में अब देश को नए दृष्टिकोण सोच के साथ आगे बढऩे  पर विचार करना  चाहिए और उसके लिए जरूरी है सोच को बदलना। ये बात सही है कि राजनीति के बिना देश नहीं चलता किन्तु इसी के साथ ये भी मानना होगा कि केवल राजनीति से ही देश नहीं चलता। अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद अयोध्या को लेकर चले लम्बे विवाद का अदालती हल हो जाना बहुत  बड़ी सफलता है। इसके लिए किसी एक या कुछ लोगों को श्रेय देने की बजाय हर उस व्यक्ति, संस्था और राजनीतिक दल की प्रशंसा करनी चाहिए जिन्होंने अपने क्षणिक लाभ को दरकिनार रखते हुई देश के बारे में सोचा। सर्वोच्च न्यायालय के पाँचों माननीय न्यायाधीश अभिनंदन के पात्र हैं जिन्होंने बिना भय और पक्षपात  के एक बड़ी समस्या का सर्वमान्य समाधान देश को दे दिया। लेकिन इसके बाद संतुष्ट होकर बैठ जाना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि अभी छोटे- छोटे अनेक ऐसे मामले हैं जिनकी वजह से देश आये दिन मुसीबत झेलता रहता है। परिपक्व सोच और विशाल ह्रदय का परिचय देते  हुए इसी तरह एक के बाद एक फैसले करने का ये सबसे सही समय है क्योंकि केंद्र में एक निर्णय लेने वाली सरकार  के साथ ही जनमत भी पूरी तरह से रचनात्मक सोच से प्रेरित है। किसी देश के जीवन में ऐसे अवसर सौभाग्य से ही आते हैं। इन्हें गंवाने पर इतिहास हमें माफ़  नहीं करेगा।
-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 November 2019

आँधियों में भी जो जलता हुआ मिल जाएगा



ठीक तीस साल पहले जब मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का पहला अंक पाठकों तक पहुंचा तब देश में जबर्दस्त उथल पुथल मची थी। समूची राजनीति जिस एक मुद्दे पर आकर टिकी हुई थी वह था अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण। तब से वह मुद्दा न जाने कितने पड़ाव पार करता हुआ आज ही अंजाम तक पहुँचने की स्थिति में आ गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर अपना फैसला सुना दिया। निश्चित रूप से ये एक संयोग ही है कि मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस की शुरुवात जिस चर्चित मामले के जोर पकड़ते समय हुई , आज जब उसकी तीन दशक की यात्रा पूरी  हो रही है तब राम मंदिर को लेकर चला आ रहा कानूनी विवाद भी अंतत: हल हो गया। किसी भी समाचार पत्र के लिए एक ऐतिहासिक घटनाचक्र का साक्षी बनना सौभाग्य की बात होती है और उस लिहाज से मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने आजाद हिन्दुस्तान के उस दौर को देखा जिसने न सिर्फ  समूचे राजनीतिक विमर्श को उलट-पुलट किया वरन अर्थव्यवस्था के साथ समाज की सोच में भी आमूल परिवर्तन की स्थितियां बना दीं। मंडल और कमंडल के रूप में हुए समुद्र मंथन से जो निकला वही आज भी  भारतीय राजनीति को तरह - तरह से प्रभावित कर रहा है। बीते तीन दशकों में देश ने भांति - भांति के प्रयोग राष्ट्रीय राजनीति में देखे। नए सिद्धांतों का प्रतिपादन और पुरानों को तिलांजलि देने का काम भी जमकर हुआ। राजनीतिक छुआछूत का अंत और  अवसरवाद के उदय ने सियासत को तिजारत बनाकर रख दिया। आर्थिक उदारवाद के आकर्षण  में गांधी , लोहिया और दीनदयाल की स्वदेशी विचारधारा को उनके अनुयायियों ने ही तीन तलाक दे दिया। देश ने इस दौरान राजनीतिक अस्थिरता का भी खूब स्वाद चखा। मजबूत और मजबूर दोनों तरह की सरकारें आईं और गईं। आर्थिक क्षेत्र में भी खूब प्रयोग हुए , जिनके अच्छे और बुरे दोनों परिणाम आये। 2014 में लम्बे समय बाद देश ने पहली बार एक विशुद्ध गैर कांग्रेसी सरकार का चुनाव किया और इसी वर्ष मई में उसी निर्णय को दोहराया भी। इसका परिणाम कांग्रेस के बेहद कमजोर होने के रूप में सामने आया। लोकतंत्र के प्रति चिंतित रहने वालों को विपक्ष का कमजोर होना अशुभ संकेत लग रहा है।  लेकिन ये भी सत्य है कि विपक्ष भी पूरी तरह दिशाहीनता का शिकार होकर रह गया है। भारत ने बीते तीन दशकों में मंगल और चन्द्रमा तक पहुँचने  की महत्वाकांक्षा को पंख देकर अपना सफर सफलतापूर्वक तय किया जिससे पूरी दुनिया में उसका कद बढ़ा। आज का भारत दुनिया के मंचों पर एक सशक्त देश के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है तो इसके लिए बीते तीन दशक सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहे जब नई पीढी ने ''हम होंगे कामयाब एक दिन"  का सपना संजोया और उसे साकार कर दिखाया। बीते तीन दशकों में भारतीय मूल के लाखों लोग पूरी दुनिया में फैल गए और अपने ज्ञान और कार्यकुशलता का  लोहा मनवा दिया। आज की दुनिया में  यदि भारतीयों को एक वैश्विक समुदाय के तौर पर पहिचान और प्रतिष्ठा मिली तो ये सब बीते  तीन दशक में ही हो सका। उस दृष्टि से मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस बदलते भारत के हर पल का गवाह बना। इस दौर में पत्रकारिता भी खूब बदली और विकसित भी हुई। अखबार से टेलीविजन और फिर इन्टरनेट  से होते हुए मोबाईल के जरिये आये सोशल मीडिया के आगमन ने पत्रकारिता की सीमाओं , स्वरूप और छवि तीनों को बदलकर रख दिया। लेकिन सबसे अधिक चिंता की बात ये है कि व्यवसायिकता के फेर में उलझकर पत्रकारिता ने विश्वसनीयता  नामक अपनी सबसे बड़ी पूंजी सस्ते में गंवा दी। नौबत यहाँ तक आ पहुँची है कि सत्ता के सिंहासन को हिलाने की ताकत रखने वाले समाचार माध्यम आज अपनी प्रतिष्ठा को बचाने की असफल कोशिश करते दिखाई देते हैं।  ऐसे माहौल में भी एक हिन्दी अखबार तमाम चकाचौंध से दूर रहते हुए ब्लैक एंड व्हाईट में छपकर अपने अस्तित्व को ही नहीं अपितु विश्वसनीयता को सुरक्षित रखते हुए तीन दशक की संघर्षमय यात्रा पूरी कर सका तो इसका श्रेय मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस के उन अनगिनत पाठकों और शुभचिंतकों को है जिन्होंने सदैव इस पर अपना भरोसा बनाये रखा। तीस सालों के इस सफर में न जाने कितने बहाव , दबाव और प्रभाव आये किन्तु मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने निर्भीक पत्रकारिता की गौरवशाली परम्परा को ईमानदारी से जीवित रखा। इस अवसर पर हमें ये स्वीकार करने में कोई संकोच या शर्म नहीं है कि हमारा आर्थिक प्रबन्धन आशानुरूप नहीं रहा। लेकिन उसे सुधारने के लिए अपना स्वाभिमान गिरवी रखने की जो कीमत चुकानी पड़ती, वह हमें मंजूर नहीं थी। अभाव और परेशानियां जैसी तब थीं वैसी ही आज भी हमारी हमराह बनी हुईं हैं। सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियां और बढ़ती व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के इस युग में इस तरह के अखबारों के दम तोडऩे की आशंका दिन ब दिन प्रबल होती जा रही है। लेकिन मध्यप्रदेश  हिन्दी एक्सप्रेस सदैव धारा के विपरीत तैरा है , और वही दुस्साहस हमारे उत्साह और ऊर्जा का आधार है। तीस साल के इस सफर के पूर्ण होने पर हम उन सभी के प्रति दिल की गहराइयों से कृतज्ञता व्यक्त करते हैं जिन्होंने हमारी ईमानदारी का मजाक उड़ाने की बजाय हमें प्रोत्साहित किया। हम आश्वस्त करते हैं कि ऊंची आवाज में सच बोलने का यह दुस्साहस आगे भी ऐसे ही जारी रहेगा। हालात बदलें या न बदलें लेकिन हमारी तासीर नहीं बदलेगी , ये वचन हम जरुर देते हैं। किसी कवि की ये पंक्तियाँ सदैव हमें प्रेरित करती हैं कि :-
'आँधियों में भी जो जलता हुआ मिल जाएगा , उस दिये से पूछना मेरा पता मिल जाएगा'
विनम्र आभार और अनंत शुभकामनाओं सहित ,

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 November 2019

बूढ़े माता-पिता बोझ नहीं वरदान हैं




खत्म होती संयुक्त परिवार प्रथा , हम दो हमारे दो से प्रेरित एकाकी परिवार और बच्चों के बाहर चले जाने के कारण अकेले बुजुर्ग माता-पिता आधुनिक भारतीय समाज की पहिचान बनते जा रहे हैं। पहले केवल ये सब शहरों तक सीमित था लेकिन अब तो कस्बों और गाँवों में भी अकेलेपन के शिकार बुजुर्ग नजर आने लगे हैं। इसी के साथ ही एक और नई समस्या उत्पन्न हो गई है जिसको बूढ़े माता-पिता की उपेक्षा के तौर पर जाना जाता है। आये दिन बुजुर्ग अभिभावकों के साथ दुव्र्यवहार की खबरें आया करती हैं। जिन औलादों को वे बड़े ही अरमानों से पाल पोसकर बड़ा करते हैं वे ही बोझ मानकर उनको प्रताडि़त करने से बाज नहीं आते। उनके साथ अमानुषिक व्यवहार की जानकारी आने पर और भी दु:ख होता है। इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर कड़े निर्देश देते हुए नालायक औलादों को दण्डित करने के लिए समुचित व्यवस्था करने कहा। इस बारे में आज एक नई खबर आई। केंद्र सरकार जल्द ही एक कानून बनाने जा रही है जिसमें माता-पिता की उचित देखभाल नहीं करने वाली संतानों के विरुद्ध दंडनीय कार्रवाई की जायेगी। इसमें तीन माह की सजा के मौजूदा प्रावधान को बढ़ाकर छह माह किया जावेगा। नये प्रावधानों के अंतर्गत पुलिस थानों में बुजुर्गों की खोजखबर रखने एवं उनकी शिकायतों पर प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करने की व्यवस्था भी होगी। सरकार की सोच अपनी जगह बिलकुल सही है लेकिन केवल कानून बना देने से ही यदि समस्या हल होती तब तीन महीने की सजा भी कम नहीं थी। भारतीय समाज का आधार परिवार नामक इकाई को ही माना जाता है। सैकड़ों सालों की विदेशी सत्ता के बाद भी यदि हमारी संस्कृति सुरक्षित रह सकी तो उसका मुख्य कारण परिवार ही थे जिनकी वजह से संस्कार एक से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते गए। केवल माता-पिता ही नहीं उनके समकक्ष माने जाने वाले अन्य रिश्तों को उतना ही सम्मान देने की परम्परा भी रही है। ये सब पूरी तरह समाप्त हो गया हो ऐसा नहीं है लेकिन ये भी कड़वा सच है कि वृद्ध माँ-बाप के प्रति दुव्र्यवहार की घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। उनकी संपत्ति हड़पकर उन्हें बेसहारा छोड़ देने की शिकायत भी आम हो चली है। बढ़ती उम्र और शारीरिक अशक्तता के कारण ऐसे अधिकांश बुजुर्ग चाहकर भी पुलिस या कानून की सहायता नहीं ले पाते। बहुत से तो चुपचाप अपनी औलाद का अत्याचार सहते हैं क्योंकि बोलने से परिवार की बदनामी होगी। नाते-रिश्तेदारों में भी अब पहले जैसी सम्वेदनशीलता नहीं रही जिस वजह से सब कुछ पता होते हुए भी लोग किसी के मामले में दखल नहीं देते। पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरण की वजह से भी परिवारों के टूटने का सिलसिला बेरोकटोक जारी है। युवा होते बच्चे अपने माता-पिता द्वारा दादा-दादी के साथ किया जाने वाला व्यवहार देखकर ही संस्कारित होते हैं। यही वजह है कि अपनी बारी आने पर वे भी ऐसा ही करने में नहीं झिझकते। अनेक बुजुर्गों ने तो इसलिए अपनी देहदान करने का फैसला लिया क्योंकि उन्हें इस बात का भरोसा नहीं था कि संतान द्वारा उनका अंतिम संस्कार भी ढंग से किया जावेगा या नहीं। सरकार चूंकि कानून बना सकती है लेकिन उसका कितना असर होगा ये कहना मुश्किल है। बेहतर हो समाज इस बारे में अपनी भूमिका के निर्वहन के लिए आगे आये। हमारे देश में आज भी जातीय संगठन सक्रिय हैं। एक समय ऐसा था जब ये संगठन ऐसे मामलों में दबाव समूह का काम करते थे और उनके द्वारा किये गए फैसले बंधनकारी होते थे। आदिवासी समुदाय सहित समाज के निचले वर्ग में तो अभी भी सामाजिक व्यवस्था का लिहाज कायम है लेकिन शहरों और ग्रामों में जातीय संगठन अब केवल वोट बैंक बनकर रह गये हैं। उन पर राजनीतिक नेताओं के अलावा संपन्न वर्ग का आधिपत्य होने लगा है। सबसे बड़ी बात ये है कि शिक्षित होने के बाद युवा पीढ़ी ऐसे संगठनों से दूर होती जा रही है। इसका दुष्परिणाम बुजर्ग अभिभावकों की उपेक्षा के तौर पर सामने आने लगा है। दरअसल उनके प्रति किया जाने वाला अत्याचार विकृत मानसिकता का परिचायक है। किसी भी सभ्य समाज के लिए ये स्थिति कलंक से कम नहीं है। जहां तक बात पश्चिमी समाज की है तो वहां सामजिक विघटन के चलते परिवार नामक इकाई का अस्तित्व खतरे में है। किशोरावस्था में ही लड़के-लड़कियां आत्मनिर्भर होकर परिवार से दूर होने में नहीं हिचकते। लेकिन हमारे देश में संतानों को जिम्मेदारी मानकर उनका भविष्य संवारने के लिए माँ-बाप हरसंभव कष्ट उठाते हैं। संपत्ति का उत्तराधिकारी भी औलाद ही होती है। इसीलिए उससे अपेक्षा की जाती है कि वह वृद्धावस्था में अपने जन्मदाताओं का ख्याल रखे जिससे वे खुद को बेसहारा या कमजोर न मानकर प्रसन्नचित्त रहते हुए जीवनयापन कर सकें। निराश्रित वृद्धों के लिए शासन और निजी स्वयंसेवी संगठनों द्वारा वृद्धाश्रमों का संचालन किया जाता है जिनमें आने वालों की संख्या में वृद्धि परिवार नामक संस्था में आ रही टूटन का प्रमाण है। ताजा जानकारी के अनुसार बड़े औद्योगिक घराने अब पश्चिमी देशों की तर्ज पर सर्वसुविधायुक्त वृद्धाश्रम खोलने की दिशा में बढ़ रहे हैं। जिनमें एक निश्चित्त धनराशि जमा करवाकर बुजुर्ग लोग आजीवन आराम से रह सकेंगे। वहां उन्हें अपने हमउम्रों का सान्निध्य भी सहज उपलब्ध होगा। लेकिन क्या ये भारतीय समाज के लिए चिन्तन का विषय नहीं है कि किसी बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में महज इसलिए रहना पड़े क्योंकि उसकी अपनी संतानें उन्हें बर्दाश्त करने तैयार नहीं। और तो और तो उनके साथ अमानुषिक बर्ताव करती हैं। सरकार कानून जरुर बनाये लेकिन समाजिक स्तर पर इस तरह की मुहिम चलाई जानी जरूरी है जिसके जरिये वृद्ध माँ-बाप के प्रति नई पीढ़ी के बेटे-बेटियों के मन में भी वैसी ही सेवा और श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जो हमारे देश का संस्कार है। बूढ़े माता-पिता को बोझ मानने की बजाय वरदान मानने की मानसिकता सरकार नहीं समाज ही विकसित कर सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी