Monday, 9 December 2019

मुआवजा: जिम्मेदारी से बचने का आसान तरीका



केंद्र के साथ ही दिल्ली और बिहार सरकार ने मरने वालों और घायलों के लिए मुआवजे की घोषणा कर दी। दिल्ली भाजपा संगठन ने भी आर्थिक सहायता देने की दरियादिली दिखाई है। बीते रविवार की सुबह देश की राजधानी की  अनाज मंडी नामक घनी बस्ती की एक गली में स्थित बैग बनाने वाली फैक्ट्री में आग लग गयी जिसकी वजह से वहां सो रहे 5 मजदूर तो जलकर मर गए और 38 धुंए की वजह से दम घुटने के कारण जान गँवा बैठे। गली इतनी संकरी थी कि फायर ब्रिगेड  को 400 मीटर दूर से पाइप लगाकर आग बुझानी पड़ी। जो चित्र आये हैं उनसे स्पष्ट है कि बिजली के खम्बों पर जिस तरह तारों के गुच्छे झूल रहे हैं उनकी वजह से कभी भी कुछ भी अनहोनी घट सकती है। आग कैसे लगी ये तो जाँच से पता चलेगा लेकिन जो स्थितियां घटनास्थल की बताई जा रही हैं उनके अनुसार फैक्ट्री पूरी तरह से अवैध थी। उसका पंजीयन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग से अनापत्ति जैसी जरूरी  औपचारिकताएँ पूरी नहीं थी। इसका कारण ये था कि उस स्थान पर इस तरह के कार्य की अनुमति ही सम्भव नहीं थी। फैक्ट्री में कार्यरत अधिकतर मजदूर बिहार के बताये जाते हैं। कम मजदूरी की वजह से वे सभी उसी परिसर में रहते और सोते थे। दिल्ली के अनेक इलाके इतने घने बसे हैं कि वहां किसी तरह का विकास संभव ही नहीं है। एक तरफ तो राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण एक हिस्सा अंतर्राष्ट्रीय मानकों के मुताबिक विकसित  करने की मुहिम चला करती है वहीं बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो बदहाली का जीता जागता प्रमाण है। और वहां रह रहे लोग नारकीय हालातों में जिन्दगी गुजारने मजबूर हैं। इन इलाकों में हजारों इस तरह के कारोबार चलते हैं जिनकी कोई अनुमति नहीं ली गयी। संकरी गलियों के कारण वहां अग्नि शमन वाहनों का पहुंचना संभव नहीं है। बिजली के तार भी खतरनाक तरीके से झूलते देखे जा सकते हैं। संक्षेप में कहें तो ये इलाके अव्यवस्था के  समानार्थी हैं। चूंकि दिल्ली में विधानसभा चुनाव नजदीक है इसलिए सरकारों के अलावा दिल्ली भाजपा ने भी मरने वालों को पांच लाख देने की मेहरबानी की। दिल्ली में बिहारी मतदाता बहुत बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। इसीलिये पार्टी ने भोजपुरी गायक मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। दिल्ली में राज्य सरकार आम आदमी पार्टी की है तो नगर निगम भाजपा के कब्जे में। दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी चल पड़ा है। सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर दु:ख व्यक्त किये जाने की औपचारिकता भी निभाई जा रही है। फैक्ट्री मालिक को गैर इरादतन हत्याओं के आरोप में गिरफ्तार भी किया जा चुका है। 1997 में दिल्ली के उपहार सिनेमा में हुए अग्निकांड के बाद भी काफी हल्ला मचा था। लेकिन दो दशक से ज्यादा बीत जाने पर भी राष्ट्रीय राजधानी की दुर्दशा दूर नहीं हुई। बल्कि ये कहना भी गलत नहीं होगा कि हालात और बदतर हो गए हैं। जिस महानगर में केंद्र , राज्य और स्थानीय तीनों शासन एक साथ मौजूद हों वहां इंसानी जिंदगियां इस तरह सस्ते में जलने और घुटने से खत्म हो जाएँ तो डूब मरने की बात है। केवल मुआवजा  बाँट देने और फैक्ट्री मालिक को गिरफ्तार कर दण्डित कर देना ही समस्या का हल नहीं है। नगर निगम के अमले के अलावा उस क्षेत्र के पार्षद की भी ये जिम्मेदारी थी कि वह इस तरह के अवैध कारोबारों पर रोक लगवाता। लेकिन उसको तो केवल वोट बटोरने से मतलब रहता है। प्रश्न ये है कि बीते सात दशक की आजादी के बाद भी यदि देश की राजधानी के भीतर लाखों लोग कीड़े-मकोड़े की तरह बसर करने बाध्य हों तब शहरी विकास पर लुटाये जाने वाले करोड़ों-अरबों रूपये का औचित्य क्या है ? मोदी सरकार ने देश में सौ स्मार्ट सिटी बनाने की जो योजना शुरू की वह कितनी सफल है उसके लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत ही क्या है जब केंद्र सरकार की नाक के नीचे आधा सैकड़ा के लगभग लोग दर्दनाक हालातों में मारे जाएँ। हमारे देश में हर समस्या का हल मुआवजा मान लिया गया है। बलात्कार और दुर्घटना के शिकार लोगों को मुआवजा, घायलों को इलाज और ज्यादा हुआ तो प्रभावित परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी जैसे तरीके अपनाकर जनाक्रोश शांत करने का प्रयास किया  जाता है। लेकिन स्थायी हल की तरफ ध्यान नहीं दिए जाने से बीमारी यथावत बनी रहती है। संदर्भित  दुर्घटना चूँकि दिल्ली में घटित हुई इसलिए वह राष्ट्रीय स्तर का समाचार बन गई किन्तु ईमानदारी से सर्वेक्षण करें तो देश के सभी हिस्सों में हादसों के ऐसे ही अड्डे मौजूद हैं जिनकी अनदेखी के पीछे लापरवाही भी है और सरकारी विभागों का भ्रष्टाचार भी। आम जनता और जनप्रतिनिधि भी उदासीन रहते है। शहरों में बढ़ती आबादी के कारण पुरानी बसाहट वाले इलाकों में सर्वत्र अव्यवस्था का बोलबाला नजर आता है। विकास के नाम पर बेतहाशा धन खर्च होने के बाद भी करोड़ों लोग बदहाली में जीने मजबूर हैं। कुछ दिन हल्ला मचेगा और सरकारी विभाग भी मुस्तैदी दिखायेंगे लेकिन इसी बीच कहीं दूसरी घटना हो जायेगी जिसके बाद पूरा ध्यान उस पर केन्द्रित हो जायेगा। गलतियों से नहीं सीखना हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 December 2019

ज्वालामुखी के सक्रिय होने का संकेत .....



हैदराबाद पुलिस ने कल सुबह उन चारों को मार गिराया जिन्हें बीते सप्ताह एक महिला पशु चिकित्सक के साथ दुष्कर्म करने के बाद जलाकर मारने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बकौल पुलिस गत दिवस प्रात:काल वह चारों आरोपियों को जाँच के सिलसिले में दुष्कर्म की जगह लेकर गयी थी। वह समय इसलिए चुना गया जिससे कि वहां भीड़ एकत्र न हो जाये। जाँच के दौरान उन चारों ने भागने की कोशिश की। पुलिस से हथियार छीने और फिर हमला कर दिया, ईंट और पत्थर भी उठाकर फेंकने शुरू कर दिए जिससे दो पुलिस कर्मी घायल भी हो गए। आत्मरक्षार्थ पुलिस ने गोलियां चलाईं और चारों आरोपी ढेर हो गए। एन्काउटर की खबर देश भर में फैल गयी। घटनास्थल पर जनता की भीड़ आ गई। पुलिस जिंदाबाद के नारे लगने लगे, पुष्पवर्षा हुई। पुलिसवालों को जनता ने कन्धों पर उठा लिया। पूरे देश में हैदराबाद पुलिस की प्रशंसा के पहाड़ खड़े किये जाने लगे। चंद अपवाद छोड़कर सभी ने माना कि बलात्कारियों को इसी तरह दंडित किया जाना चाहिए। रात में घर लौट रही उक्त महिला चिकित्सक के साथ हुए अमानवीय हादसे के बाद से देश भर में आक्रोश था। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर जबर्दस्त बहस चल पड़ी। सड़क से संसद तक गुस्सा दिख रहा था। राज्यसभा में जया बच्चन ने दुष्कर्मियों को जनता के हवाले करने जैसा सुझाव तक दे डाला। बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों के साथ उन्हें रोकने के विभिन उपायों पर भी विमर्श चल पड़ा। निर्भया कांड के दोषियों को अब तक फांसी नहीं लगने को लेकर व्यवस्था पर पर सवाल कड़े किये जाने लगे। न्यायपालिका की सुस्ती को कठघरे में खड़ा किया गया। अदालत द्वारा फांसी सुनाये जाने के बाद भी दया याचिका के नाम पर दोषियों को जीवित रखे जाने की आलोचना होने लगी। कोई इस्लामी कानून के अनुसार दण्डित करने की सलाह देने लगा तो किसी ने उन्हें नपुंसक बनाने जैसा सुझाव दे डाला। जिसके मन में जो आया उसने वह कहा। हालाँकि हैदराबाद पुलिस ने 24 घंटों के भीतर ही चारों आरोपियों को पकड़ लिया था लेकिन उसके बाद भी देश भर से आती रही बलात्कार की खबरों ने जनता के गुस्से को और बढ़ा दिया। विशेष रूप से लड़कियां जिस तरह से मुखर होकर सामने आईं वह समाज में दुष्कर्म को लेकर व्याप्त असंतोष का परिचायक माना गया। ये सब चल ही रहा था कि उप्र के उन्नाव में एक और दर्दनाक काण्ड हो गया। एक वर्ष पहले एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में जेल में बंद आरोपियों ने जमानत पर छूटकर आने के बाद उस युवती को चाकू से घायल किया और फिर तेल डालकर आग लगा दी। जलती हुई अवस्था में वह युवती लगभग एक किलोमीटर दौड़ती हुई अपने घर के पास आकर गिर गई। बाद में उसे दिल्ली इलाज के लिए भेजा गया लेकिन 90 फीसदी जली होने के कारण गत रात्रि उसका देहांत हो गया। उक्त घटना के बाद हैदराबाद काण्ड से उपजा गुस्सा चरम पर जा पहुंचा। ऐसे में जब हैदराबाद पुलिस द्वारा चारों आरोपियों को मार गिराने की खबर आई तो उसके समर्थन में जो सकारात्मक प्रतिक्रियाएं सुनने मिलीं उनसे लगा कि जनता का गुस्सा कुछ कम हुआ। जो पुलिस खलनायक थी वही अचानक महानायक बन गयी। लेकिन ज्यों ज्यों दिन आगे बढ़ा त्यों-त्यों एन्काउन्टर की सत्यता और औचित्य पर सवाल भी खड़े किये जाने लगे। असदुद्दीन ओवैसी के अलावा, सीताराम येचुरी, अरविन्द केजरीवाल और भाजपा की मेनका गांधी ने पुलिस की कार्रवाई को न्याय व्यवस्था का उल्लंघन बताया। यहाँ तक कहा गया कि यदि इस तरह से चलेगा तो फिर न्यायालयों की जरूरत ही क्या रह जायेगी? अतीत में हुए अनेक फर्जी एन्काउटरों के हवाले से पुलिस द्वारा बताई कहानी की विश्वसनीयता को भी संदेह  के घेरे में रखा जाने लगा। हालाँकि मारे गये आरोपियों के प्रति किसी ने हमदर्दी दिखाने की जुर्रत तो नहीं की किन्तु ये पूछने वाले भी सामने आ गये कि पुलिस ने जिन चारों को आरोपी बनाकर पकड़ा वे वास्तविक अपराधी थे या जनता के गुस्से से बचने के लिए चार निरपराधों को बलि का बकरा बना दिया गया ये भी कहा गया कि किसी को बचाने के लिए किसी और के गले में फंदा डाल दिया गया। राजनीतिक पार्टियों के भीतर भी मतभिन्नता दिखी। रामगोपाल यादव और जया बच्चन अलग जुबान में बोले तो अरविंद केजरीवाल और उनके राज्यसभा सदस्य संजय सिंह की प्रतिक्रिया भिन्न थी। मायावती ने तो उप्र की पुलिस को भी हैदराबाद पुलिस का अनुसरण करने की समझाइश दे डाली। दूसरी तरफ इस बात पर चिंता भी जताई गयी कि एन्काउंटर की सत्यता जाने बिना चार लोगों की मौत पर जश्न मनाना उन्माद और अपरिपक्वता का परिचायक है जिसके दूरगामी नतीजे खतरनाक होंगे। समूची प्रतिक्रियाओं का लब्बोलुआब ये रहा कि बलात्कार के दोषियों को जल्द से जल्द कड़े से कड़ा दंड मिलना चाहिए। इसके लिए न्याय प्रक्रिया को तदनुसार ढालने की जरूरत पर भी बल दिया गया। हैदराबाद पुलिस के कृत्य की जांच उच्च न्यायालय ने आदेशित कर दी है। मावाधिकार आयोग का दौरा कार्यक्रम बन गया है। मृतकों के पोस्ट मार्टम की वीडियो बनाने कह दिया गया है। दो चार दिनों में मामला ठंडा होने के बाद भी आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी रहेगा। राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती रहेंगी। और तब तक उन्नाव की तरह दूसरा कोई जघन्य कांड हो जाएगा। सवाल ये है कि समाज में व्याप्त गुस्से को शांत करने का तरीका क्या है? उन्माद किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होता। भीड़ की विवेकशून्यता भी प्रमाणित सत्य है। लेकिन आम जनमानस इस हद तक उत्तेजित क्यों और कैसे हो गया ये सोचने की जरूरत कोई नहीं समझ रहा। हैदराबाद पुलिस ने जनता के गुस्से पर पानी डालने के लिए वह कदम उठाया। यदि ये मान लिया जाए तब भी इस सवाल का जवाब तो ढूंढना ही पड़ेगा कि आखिर जनता इतने गुस्से में क्यों आई? पुलिस को कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। लेकिन कल जिस तरह की उग्र प्रतिक्रियाएँ सुनने मिलीं उनमें बिना कुछ कहे भी न्यायपालिका निशाने पर आ गयी। ये कहना गलत नहीं होगा कि दुष्कर्मियों को न्याय प्रणाली से बाहर निकलकर उनके किये की सजा देने जैसी भावना का प्रगटीकरण सोये हुए ज्वालामुखी के सक्रिय होने का संकेत है। इसे ठीक तरह से नहीं समझा गया तो उससे निकलने वाला लावा कितना नुक्सान पहुंचाएगा ये कह पाना कठिन है। संसद और सरकार तो जब करेंगे तब करेंगे लेकिन समाज को भी तो अपनी जिम्मेदारी और भूमिका तय करनी होगी क्योंकि अंतिम परिणाम तो उसे ही भोगने पड़ते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 December 2019

लगे हाथ पूर्व सांसदों की मुफ्तखोरी भी रोकी जाए



हालाँकि इतने बड़े देश की अर्थव्यवस्था में 17 करोड़ बहुत बड़ी रकम नहीं है लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनका सांकेतिक महत्व होता है। उस दृष्टि से संसद की कैंटीन में मिलने वाले भोजन पर दी जाने वाली रियायत खत्म करने का निर्णय आम जनता के मन को संतोष देने वाला है। संसद भवन की कैंटीन में केवल वर्तमान एवं पूर्व सांसद ही नहीं उनके साथ आये लोगों के अलावा संसद भवन में कार्यरत कर्मचारी भी भोजन, नाश्ता आदि ग्रहण करते हैं। वहां खाने की चीजें इतनी सस्ती हैं कि दातों तले उंगली दबाने मजबूर हो जाना पड़ता है। पहले तो इस तरफ  किसी का ध्यान नहीं गया लेकिन बीते कुछ सालों जब भी खाने-पीने की चीजें महंगी होतीं तब-तब संसद की कैंटीन का सस्ता भोजन आलोचना और ईष्र्या का विषय बन जाता। 2014 में मोदी सरकार आने के बाद कीमतें थोड़ी बढ़ाई गईं लेकिन उसके बाद भी इस कैंटीन में खाना बाजार के सस्ते से सस्ते रेस्टारेंट की अपेक्षा बेहद मामूली दाम पर उपलब्ध था। धीरे-धीरे सांसदों को भी जनता के मन में व्याप्त नाराजगी का एहसास हुआ और फिर एक समिति बनाकर इस रियायत को खत्म करने का विचार शुरू हुआ जो गत दिवस जाकर अंजाम पर पहुँच सका। 2 रूपये की चपाती और 5 रूपये की दाल आज के दौर में कल्पनातीत है लेकिन संसद की कैंटीन में इसी कीमत पर इनकी उपलब्धता निश्चित रूप से जनता को खलने वाली थी। चिकन करी और मटन करी जैसे मांसाहारी व्यंजन क्रमश: 50 और 45 रुपये में मिलना भी सपने देखने जैसा है। मात्र 5 रु. में बढिय़ा चाय और कॉफी भला दिल्ली की फुटपाथों पर खड़े ठेले पर भी नहीं मिलेगी। स्मरणीय है प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार नरेंद्र मोदी भी इस कैंटीन में खाना खाने जा पहुंचे थे और उन्होंने उसका बाकायदा भुगतान भी किया। शाकाहारी भोजन का उनका देयक मात्र 50-60 रु. ही बना। हो सकता है वे इस कैंटीन की सस्ती दरों को लेकर होने वाली आलोचना के मद्देनजर ही मुआयना करने गए हों। सच्चाई जो भी हो, बहरहाल गत दिवस तदाशय की खबरें आ गईं जिनके अनुसार संसद भवन की कैंटीन में मिलने वाला सस्ता भोजन अब सामान्य दरों पर ही उपलब्ध होगा। रेलवे द्वारा इस कैंटीन को होने वाले घाटे की आपूर्ति सरकार करती रही। हालाँकि जैसा कि पूर्व में कहा गया कि केवल सांसद ही नहीं बल्कि संसद भवन में कार्यरत कर्मचारी, अधिमान्य पत्रकार, संसद की कार्रवाई देखने आने वाले पासधारी भी इस कैंटीन के सस्ते भोजन का लाभ उठाते थे परन्तु आलोचना का केंद्र केवल सांसद ही बनते रहे। यद्यपि 1 जनवरी 2016 से इस कैंटीन में लागत खर्च पर भोजन सामग्री बेची जाने की व्यवस्था की गयी थी किन्तु उसके बाद भी जो दरें निर्धारित की गईं वे बहुत ही कम थीं। इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है हमारे देश में चली आ रही वीआईपी संस्कृति। वाहनों पर बत्तियां लगाना बंद होने के बाद मोदी सरकार ने दिल्ली में सरकारी बंगला घेरे बैठे नेताओं पर भी शिकंजा कसा। सांसद नहीं रहने पर भी सरकारी फ्लैट या बंगला कब्जाए रहने की सुविधा छीन लिए जाने से सरकार का करोड़ों रु. बच गया। वरना नए सांसदों को आवास खाली नहीं होने के कारण पांच सितारा होटलों में ठहराया जाता था। हाल ही में गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा खत्म किये जाने पर हुए विवाद में भी ये बात चर्चा में आई कि आखिर कब तक किसी व्यक्ति या परिवार को प्रधानमन्त्री स्तर की सुरक्षा दी जाए, जिस पर लाखों रु. रोज का खर्चा होता है। भारत में लोकतंत्र है जिसे जनता के द्वारा, जनता का और जनता के लिए शासन कहा जाता है। लेकिन बीते सात दशक के दौरान लोक और तन्त्र के बीच का अंतर लगातार बढ़ाया जाता रहा। ये अच्छी बात है कि जनप्रतिनिधियों को मिल रही सुविधाएँ अब जनचर्चा का विषय बनने लगी हैं। संसद की कैंटीन में मिलने वाले सस्ते भोजन पर मात्र 17 करोड़ की सब्सिडी से देश गरीब नहीं हो रहा था लेकिन इसके कारण आम जनता के मन में ये भाव जरुर पैदा होता था कि लोकशाही के इस दौर में भी राजा और प्रजा के बीच अंतर है। इसी तरह सांसदों के वेतन और भत्तों में चाहे जब की जाने वाली वृद्धि भी जनाक्रोश का बड़ा कारण बनती रही है। इसे लेकर भी मोदी सरकार ने व्यवस्था की है। अपने वेतन-भत्ते बढ़ाने में सांसदों द्वारा की जाने वाली मनमानी रोकने के लिए आयोग की व्यवस्था भी चर्चा में है। लुटियंस की बनाई दिल्ली के पुराने बंगले तोड़कर बहुमंजिला इमारतों में फ्लैट बनाकर सांसदों को उनमें रखने की शुरुवात भी हो चुकी है जिससे उनकी सुरक्षा और सुविधाओं पर होने वाला खर्च तो घटा ही, साथ ही बेशकीमती सरकारी जमीन भी खाली हो गई। मोदी सरकार ने सांसदों और मंत्रियों की सुख-सुविधाओं को घटाने लिए अनेक कदम उठाये हैं लेकिन पूर्व सांसदों को मिलने वाली पेंशन, मुफ्त रेल यात्रा पास और इलाज की जो सुविधा है उस पर भी विचार होना चाहिए। लम्बी समयावधि तक सांसद रहे व्यक्ति के पास यदि कमाई का कोई साधन न हो और उसने केवल जनसेवा में ही खुद को समर्पित कर रखा हो तब तो उसके शेष जीवन के लिए सरकार को सोचना चाहिए लेकिन जिनके पास आय के पर्याप्त साधन हों और जो सियासत के साथ ही किसी व्यवसाय से जुड़े हुए हों उनको जीवन भर दी जाने वाली मुफ्त सुविधाएँ सरासर गलत हैं। एक दिन भी सांसद रह जाने वाला उम्र भर सरकारी दामाद बनकर रहे ये लोकतंत्र का मजाक नहीं तो और क्या है ? संसद की कैंटीन में सस्ता भोजन बंद होने के बाद पूर्व सांसदों की मुफ़्तखोरी पर भी रोक लगाना जनापेक्षा है। उनकी देखासीखी पूर्व विधायकों के लिये भी जनता के कर की मोटी रकम मुफ्त लुटाई जाने लगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 December 2019

नागरिकता संशोधन : राजनीतिक हित से जरूरी राष्ट्रहित



केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश किये जाने वाले नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक हल्ला शुरू हो गया है। गत दिवस इसे मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिलने के बाद विपक्षी दलों की मोर्चेबंदी भी तेज हो चली है। लोकसभा में तो सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है इसलिए विधेयक को पारित करवाने में विशेष दिक्कत नहीं जायेगी। लेकिन जहां तक राज्यसभा का प्रश्न है तो शिवसेना के एनडीए से अलग होने के बाद भाजपा को उच्च सदन में संख्याबल जुटाना होगा। तीन तलाक और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर राज्यसभा में जिस आसानी से सरकार ने बहुमत हासिल किया उसकी वजह से सत्ता पक्ष आत्मविश्वास से भरपूर है किन्तु ये कहना भी गलत नहीं होगा कि सत्ता पक्ष में ही पूर्वोत्तर के अनेक सांसद इस विधेयक से नाराज हैं। दरअसल इस विधेयक का मूल उद्देश्य उन गैर मुस्लिमों को भारत की नागरिकता देने के नियम आसान करना है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से निर्वासित होकर भारत आने मजबूर हो जाते हैं। इनमें से अनेक ऐसे हैं जो वर्षों पहले वहां से प्रताडि़त होकर भारत आ गए थे लेकिन नागरिकता नहीं मिलने से अभी भी कानूनी रूप से भारत के नागरिक नहीं बन पाए। इनके भारत आने के पीछे मुख्य वजह वहां धार्मिक आधार पर इनका उत्पीडऩ ही है। जिन तीन देशों से आने वालों के लिए ये सुविधा प्रस्तावित है वहां से न सिर्फ  हिन्दुओं बल्कि जैन, बौद्ध, पारसी, सिख और ईसाई धर्मावलम्बियों को प्रताडि़त किए जाने की खबरें आम हैं। उनके धर्मस्थल या तो नष्ट किये जा रहे हैं या फिर उन्हें अपवित्र करने की हरकतें होती हैं। बहू-बेटियों का अपहरण करते हुए उन्हें मुसलमान बनाने की घटनाएँ भी आम होती जा रही हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं सहित बाकी गैर मुस्लिम धर्म के अनुयायियों की जनसंख्या निरंतर घटती जा रही है। वहीं अफगानिस्तान में तालिबान के उदय के बाद से हिन्दू और सिख अपने को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। नागरिकता संशोधन विधेयक में केवल छह धर्मों से जुड़े लोगों को भारतीय नागरिकता देने के नियमों में लचीलापन लाने की वजह से भाजपा के परम्परागत विरोधी दल उसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसा करना धार्मिक आधार पर भेदभाव होगा। उक्त तीन देशों से आने वाले गैर मुस्लिम लोगों को नागरिकता देने के मामले में भारत में उनके रहने की समयावधि घटा दी गई है। वहीं उनके पास कोई वैध दस्तावेज नहीं होने पर भी उन्हें जेल नहीं भेजा जाएगा। ममता बैनर्जी और आरजेडी सहित कांग्रेस और वामपंथी विशेष रूप से इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं लेकिन भाजपा से हाल ही में अलग हुई शिवसेना ने भी धार्मिक आधार पर नागरिकता देने का सैद्धांतिक आधार पर विरोध करने का जो इशारा किया वह महाराष्ट्र की सत्ता मिलने के साथ जुड़ी मजबूरी का नतीजा माना जा रहा है। वैसे ताजा जानकारी के अनुसार शिवसेना खुद को मुस्लिमपरस्त कहलाने से बचने के लिए मतदान के दौरान सदन से बहिर्गमन करने की रणनीति पर चलेगी। लेकिन उसका ऐसा करना चौंकाने वाला होगा। नागरिकता संशोधन विधेयक का ज्यादातर लाभ उक्त तीन देशों से पलायन कर भारत आये हिन्दुओं को ही मिलेगा क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है। चूँकि हिन्दुओं का दुनिया में और कोई देश नहीं है इसलिए उनका भारत आना ही स्वाभाविक है। विशेष रूप से ऐसे लोगों के लिए तो भारत ही आसरा है जिनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। हिन्दुओं के बाद सबसे ज्यादा ऐसे लोग सिख हैं जो मुख्य रूप से पाकिस्तान और अफगनिस्तान से आये हैं। पूर्वोत्तर राज्यों के हिन्दुओं को ये डर सताने लगा है कि बांग्लादेश से आये हिन्दू इन राज्यों के नागरिक बनकर वहां के मूल वाशिंदों के अधिकारों में बटवारा करेंगे। सवाल और भी हैं। लेकिन इस विधेयक का सकारात्मक पहलू ये भी है कि उसमें केवल हिन्दू, सिख, बौद्ध और जैन ही नहीं बल्कि पारसी और ईसाई भी भारत की नागरिकता आसानी से हासिल करने के पात्र हो जायेंगे। जहां तक बात मुसलमानों को दूर रखने की है तो सरकार का मानना है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान चूँकि इस्लामिक देश हैं इसलिए वहां के मुसलमानों को भारतीय नागरिकता देने का कोई औचित्य नहीं है और ऐसा करने से बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों की संख्या को सम्भालना मुश्किल होगा। 1971 के बाद से भारत में घुस आये बांग्लादेशियों की समस्या पहले से ही लाइलाज बनी हुई है। एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) नामक योजना भी विसंगतियों की शिकार होकर रह गई। उस दृष्टि से नागरिकता संशोधन विधेयक काफी उदार होगा क्योंकि इसमें हिन्दुओं के अलावा जैन, सिख और बौद्धों के साथ ही पारसी और ईसाईयों को भी भारतीय नागरिकता देने के नियमों में दी जा रही ढील का लाभ मिलेगा। जो भी पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं उनकी चिंता का विषय केवल इतना है कि विधेयक पारित होने के बाद बरसों से भारत में रह रहे हिन्दुओं का नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा। दूसरी तरफ  जो मुस्लिम उक्त तीन देशों से बिना वैध दस्तावेजों के भारत आकर रह रहे हैं उन्हें नागरिक नहीं बनाये जाने से वे घुसपैठिये माने जायेंगे मतदाता सूची से तो उनका नाम अलग होगा ही शासन द्वारा दी जाने वाली बाकी सुविधाओं से भी उन्हें वंचित किया जाएगा। कांग्रेस, वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस के साथ ही आरजेडी जैसी पार्टियों को मुस्लिम मतदाताओं के हाथ से खिसक जाने का भय सताने लगा है लेकिन इस विधेयक को देश के दूरगामी राष्ट्रीय हितों के परिप्रेक्षय में देखा जाना चाहिए। शिवसेना जैसी पार्टी द्वारा विधेयक के समर्थन की बजाय सदन से गैर हाजिर रहने का संकेत उसके नीतिगत भटकाव का प्रमाण है। अच्छा होगा यदि यह विधेयक सर्वसम्मति से पारित हो क्योंकि इसमें भाजपा को क्या हासिल होगा ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि इसके पारित होने से देश को लाभ होगा। दुर्भाग्य से हमारे देश में राष्ट्रहित पर राजनीतिक हित हावी होते रहे हैं। बांग्लादेश से आये करोड़ों घुसपैठियों को देश का नागरिक बनाने वाले नेताओं और पार्टियों को तात्कालिक सियासी फायदा भले मिलता रहा हो लेकिन वे देश के लिए जो समस्या पैदा कर गये उसका दुष्परिणाम किसी से छिपा नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 December 2019

महिला सुरक्षा : जो भी जरूरी हो किया जाये



आग लगने के बाद कुआ खोदने वाली कहावत हमारे देश में सबसे अच्छी तरह से चरितार्थ होती है। गत दिवस सोशल मीडिया पर उप्र के हरदोई शहर से एक अच्छी खबर आई। रात में सड़क पर अकेले जा रही एक युवती को देखकर गश्त पर निकले पुलिस अधीक्षक ने अपनी गाड़ी रोककर उससे बात की और तब पता चला कि वह एक होटल में कर्मचारी है और अपनी पारी खत्म होने के बाद घर लौट रही थी। पुलिस अधीक्षक फौरन उक्त होटल गए और उसके प्रबंधन को फटकारते हुए आदेश दिया कि रात में किसी महिला कर्मचारी के घर लौटने की स्थिति में उसे सुरक्षित घर पहुंचाने हेतु वाहन उपलब्ध करवाया जावे। हालांकि होटल मालिक इस आदेश का कितना पालन करेंगे ये कह पाना कठिन है लेकिन छोटी सी यह खबर किसी अच्छी व्यवस्था की शुरुवात बन सकती है। वैसे कॉल सेंटर, एयर लाइंस, टीवी चैनल सहित सितारा होटलों में रात को घर लौटने वाले कर्मचारियों, खास तौर पर महिला कर्मियों के लिए ऐसी सुविधाएँ हैं लेकिन कम आय वाली नौकरियों में इस तरह की बात सोचना भी सपना है। बहरहाल हरदोई की उक्त घटना के बाद गत दिवस पंजाब सरकार ने भी कुछ फोन नम्बरों की जानकारी देते हुए ये आदेश जारी कर दिया कि रात्रि में किसी अकेली महिला का फोन आने पर उसको पुलिस वाहन में घर छोडऩे की व्यवस्था की जावे। निश्चित रूप से ये एक आदर्श स्थिति होगी जिससे पुलिस की छवि सुधरने के साथ ही शासन और प्रशासन में आम जनता का भरोसा बढ़ेगा। एक टीवी चैनल की पत्रकार ने गत रात्रि लखनऊ में कुछ घंटे विभिन्न बस स्टाप वगैरह पर गुजारने के बाद अपने जो अनुभव सुनाये उनके मुताबिक उसे किसी सार्वजनिक स्थान पर कहीं भी पुलिस नहीं दिखाई दी। पास खड़े पुरुषों द्वारा अभद्र टिप्पणियाँ भी उसे सुननी पडीं। हैदराबाद की घटना के बाद देश भर में महिलाओं की जो रोषपूर्ण प्रतिक्रियाएं सुनाई दे रही हैं उनमें पुलिस व्यवस्था में कमी की शिकायत भी आम है। इसका दूसरा पहलू ये भी है कि बढ़ती आबादी के अनुपात में पुलिस बल उतना नहीं बढ़ा। किसी नेता या अन्य विशिष्टजन के आगमन पर उसकी सुरक्षा के लिए तो पुलिस की व्यवस्था कर दी जाती है लेकिन आम जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। पुलिस के पास वाहन आदि की पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं है। ऐसे में पंजाब सरकार द्वारा महिलाओं को घर पहुँचाने के लिए पुलिस वाहन की सुविधा देने का फरमान कितना कारगर हो सकेगा ये बड़ा सवाल है। इसके साथ ये भी सोचने वाली बात है कि क्या हमारे देश की पुलिस इतनी विश्वसनीय है कि रात के समय सुरक्षित घर लौटने के लिए अकेली महिला बेखौफ उसकी मदद ले सके। उल्लेखनीय है कि देश के अनेक थानों में पुलिस कर्मियों द्वारा महिलाओं के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किये जाने की घटनाएँ प्रकाश में आती रही हैं। और फिर अपराधियों से पुलिस की संगामित्ती भी जगजाहिर है। हो सकता है पंजाब की देखासीखी कुछ और राज्य भी महिलाओं को रात के समय पुलिस वाहन की सुविधा देने की घोषणा कर दें। हालांकि इस व्यवस्था की सफलता पर अनगिनत प्रश्नचिन्ह हैं। फिर भी इसका स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि समाज का वातावारण जिस तरह से दूषित होता जा रहा है उसके मद्देनजर महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। आधुनिकता के फेर में युवा पीढ़ी में खुलापन आने के साथ उसकी आड़ में जिस तरह का उन्मुक्त व्यवहार देखने मिल रहा है वह चिंता का कारण है। महिलाओं के मन में व्याप्त असुरक्षा का भाव किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं है। उसे दूर करने के लिए जो भी करना पड़े वह किया जाना चाहिए। लेकिन इसमें ज्यादा देर ठीक नहीं होगी क्योंकि पानी सिर से ऊपर गुजरने की स्थिति में आ चुका है और लोगों की नाराजगी इस हद तक बढ़ती जा रही है कि सड़क से संसद तक ये मांग उठने लगी है कि दुष्कर्मियों को कानून की अदालत की बजाय जनता के हवाले कर दिया जाए जिससे उन्हें उनके किये की सजा जल्दी से जल्दी दी जा सके।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 December 2019

क्या संसद के बाहर यही सुझाव देंगीं जया बच्चन



 कुछ साल पहले की बात है। नागपुर की एक अदालत में एक बलात्कारी को पेशी पर लाया जा रहा था। अचानक महिलाओं की एक भीड़ वहां आई और उस बलात्कारी को पीटने लगी। इसके पहले किसी को कुछ समझ में आता पिटाई के कारण वह मर गया। अदालत परिसर में ऐसी घटना किसी दक्षिण भारतीय फिल्मों में दिखाई जाने वाली अति नाटकीयता का हिस्सा कही जा सकती है। भीड़ की हिंसा (मॉब लिंचिंग) के उस जीवंत उदाहरण पर किसी ने बवाल नहीं मचाया। उलटे उन महिलाओं के दुस्साहस को मर्दानगी बताकर उसकी तारीफ  ही हुई। हालाँकि उस तरह की घटना दोबारा नहीं सुनी गई किन्तु हैदराबाद की महिला चिकित्सक के साथ हुए अमानवीय कृत्य पर गत दिवस राज्यसभा में अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए सपा सांसद और प्रख्यात फिल्म अभिनेत्री जया बच्चन ने ये कहकर सदन को सनाके में ला दिया कि बलात्कार करने वाले को जनता के हवाले कर दिया जाना चाहिए जिससे वही उसे सजा दे सके। सभापति वेंकैया नायडू तक उनके इस विचार पर सकते में आ गये। भीड़ की हिंसा मोदी सरकार के विरुद्ध विपक्ष का बड़ा हथियार रहा है। अल्पसंख्यकों और गो तस्करों के अलावा कुछ अपराधियों को भीड़ द्वारा मौत के घाट उतारने की अनेक घटनाओं के कारण ऐसा माहौल बना दिया गया कि देश में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं बची तथा पूरी तरह से अराजकता आ चुकी है। यहाँ तक कि विदेशों में भी मॉब लिंचिंग को लेकर भारत की बदनामी करने का सुनियोजित प्रयास हुआ। लेकिन जब जया जी ने इस तरह का सुझाव संसद के उच्च सदन में दिया तब भले ही उसका स्वागत नहीं हुआ हो लेकिन कोई भी सदस्य यहाँ तक कि सभापति श्री नायडू तक उसको कार्रवाई से निकालने का निर्णय नहीं कर पाए। वैसे वे जब भी सदन में बोलती हैं, काफी आक्रामक रहती हैं। हैदराबाद की घटना से पूरे देश की महिलाएं आक्रोशित हैं। जिस तरह की बात श्रीमती बच्चन ने सदन में कही वैसी ही सदन के बाहर आम जनता के मुंह से सुनाई दे रही है। सोशल मीडिया पर बलात्कारियों को कठोरतम दंड देने के लिए लोग अपने-अपने तरीके से सुझाव दे रहे हैं। उस लिहाज से देखें तो बतौर सांसद श्रीमती बच्चन समाज के एक तबके की भावनाओं को ही संसद में रख रही थीं। लेकिन बलात्कार करने वाले को जनता के हवाले करने या उसकी लिंचिंग जैसा सुझाव देकर उन्होंने अपने गुस्से का इज़हार तो कर दिया लेकिन व्यवहारिक तौर पर किसी इस्लामिक देश में ही ऐसा करना संभव है जहां अपराध की सजा उनके सर्वमान्य धार्मिक ग्रन्थ के मुताबिक ही दी जाती है। रही बात जनता द्वारा किसी अपराधी को उसके किये का दंड देने की तो उसे लेकर ही तो मॉब लिंचिंग को बढ़ावा देने का आरोप विपक्ष द्वारा भाजपा और मोदी सरकार पर लगाया जाता रहा है। जिसमें उनकी अपनी पार्टी सपा भी बाकायदा शामिल रही है। ऐसे में क्या जया जी द्वारा कही गई बात को अमल में लाया जा सकेगा, ये बड़ा सवाल है। और क्या वे सदन के बाहर भी यही बात कहने का साहस कर सकेंगीं? फिल्मों में ऐसे दृश्य कई बार फिल्माए जाते हैं जिनमें किसी अपराधी को नायक या भीड़ मार डालती है। लेकिन भारत सरीखे कानून के राज में इस तरह का सुझाव ऐसा व्यक्ति दे जो कानून बनाने और संविधान के पालन से सीधा जुड़ा हुआ हो, तब आश्चर्य होता है। बावजूद इसके जया जी ने जो कुछ कहा वह भले ही अटपटा लगता हो लेकिन जनभावनाएं यदि उसके पक्ष में हैं तो इससे पता चलता है कि बलात्कारियों को दण्ड देने की मौजूदा प्रक्रिया से आम जनता कितनी असंतुष्ट है। हालाँकि लोगों को सजा देने की छूट देना अराजकता को आमंत्रित करने जैसा होगा लेकिन श्रीमती बच्चन ने एक बहस को जन्म तो दे ही दिया जो वर्तमान न्याय प्रणाली की कमी को उजागर करती है। कड़ी से कड़ी सजा का साधारण तौर पर अभिप्राय मृत्युदंड ही होता है। लेकिन निर्भया कांड के अपराधी अभी तक जीवित आवस्था में हैं। यद्यपि उनकी फांसी सुनिश्चित है परन्तु उसमें इतना लम्बा समय लग जाना अपराध की गम्भीरता को हल्का कर देता है। जया बच्चन फिल्मी हस्ती हैं अत: हो सकता है उनके मन में किसी पटकथा की कल्पना जाग उठी हो। देखना ये है कि अन्य राजनीतिक पार्टियां ख़ास तौर पर उनकी अपनी पार्टी सपा उनके सुझाव पर क्या रुख अपनाती है ? बहरहाल अप्रत्यक्ष तौर पर या गुस्से में ही सही लेकिन श्रीमती बच्चन ने भीड़ की हिंसा या मॉब लिंचिंग को सकारात्मक उद्देश्य से राष्ट्रीय विमर्श का विषय तो बना ही दिया।लेकिन श्रीमती बच्चन को चाहिए कि वे अपनी फिल्मी बिरादरी पर भी इसी तरह का गुस्सा व्यक्त करें जो बलात्कार के दृष्यों को वास्तविक बनाने के फेर में तमाम स्थापित मर्यादाएं तोडऩे पर आमादा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 December 2019

पहले मुफ्त उपहार का धंधा : फिर गले में फंदा




बुजुर्ग बताते रहते हैं कि किस तरह अंग्रेजों के दौर में चाय कम्पनियां वाले मोहल्लों में घूम फिरकर चाय मुफ्त में बाँटकर उसका प्रचार किया करते थे। जब लोगों को उसका चस्का लगा तब वह ऊँचे दाम पर बाजार में बिकने लगी और आज आलम ये है कि ज्यादातर आम हिन्दुस्तानी बिना चाय के नहीं रह पाते। इस उदाहरण की प्रासंगिकता आज मोबाइल फोन पर बातचीत और इंटरनेट की दरों में अच्छी खासी वृद्धि के रूप में साबित हो गयी। हमारे देश में मोबाइल और इंटरनेट के दरें दुनिया में सबसे कम बताई जाती हैं। बीते कुछ सालों में खासकर मुकेश अम्बानी की कम्पनी जियो द्वारा शुरू की गयी धमाकेदार प्रतिस्पर्धा ने शेष टेलीकॉम कंपनियों की कमर तोड़कर रख दी। वे अरबों-खरबों के नुकसान में आ गईं। कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद कुछ कम्पनियों पर हजारों करोड़ रूपये की देनदारी निकल आई जिसके बाद उनके दिवालिया होने के आसार बढ़ गए और उस घाटे की पूर्ति के लिए उनके पास दाम बढ़ाने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं बचा था। कुछ दरियादिली सरकार की तरफ  से भी दिखाई गयी जिसके बाद आज से दर्रों में वृद्धि का बोझ ग्राहकों पर पडऩे जा रहा है। जियो ने 6 दिसम्बर से दर बढ़ाने के संकेत दिए हैं। हालांकि उसी ने कुछ दिन पहले मोबाइल पर बातचीत के अलावा इंटरनेट के इस्तेमाल की दरें बढ़ाते हुए असीमित बात करने या डाटा उपयोग को सीमित करने की पहल की थी। वैसे जानकारों के अनुसार जियो ने ही टेलीकाम बाजार को खराब किया। अब चूंकि सभी कम्पनियां दरें बढ़ाने के रास्ते पर आगे बढ़ गईं हैं इसलिए अब हर ग्राहक का खर्च बढ़े बिना नहीं रहेगा। विपक्षी खेमे द्वारा इस वृद्धि को सरकार की शह बताई जा रही है। हो सकता है सरकार को अपनी वसूली करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए दरों में वृद्धि ही सबसे आसान तरीका समझ आया हो। और फिर बैंकों की मोटी रकम भी इन कंपनियों में फंसी है। अब रही बात उपभोक्ता के नज़रिये की तो उसे ये वृद्धि नागवार लगना स्वाभाविक है क्योंकि टेलीकॉम कम्पनियों ने अंग्रेजों के ज़माने में मुफ्त चाय पिलाने वाली शैली का उपयोग करते हुए ही ऐसे ग्राहकों को भी मोबाइल पर बतियाने और इंटरनेट के उपयोग हेतु उकसाया जिन्हें निजी अथवा व्यवसायिक तौर पर इसकी उतनी जरूरत नहीं थी। अनेक अध्ययनों और सर्वेक्षणों में ये बात सामने आई है कि अधिकांश भारतीय मोबाइल उपभोक्ता बिना आवश्यकता के उसका उपयोग करते हैं। विशेष रूप से किशोर और युवावस्था के ग्राहकों द्वारा मोबाइल फोन और इंटरनेट का जिस तरह बेताहाशा इस्तेमाल किया जाता है वह समय की बर्बादी के अलावा अनेक ऐसी समस्याओं और बुराइयों को जन्म दे रहा है जिन्हें लेकर समाज में चिंता का माहौल है। संचार सुविधाओं के विकास में मोबाइल फोन ने चमत्कारिक परिणाम दिए। भारत जैसे गरीब और विकासशील समझे जाने वाले देश में दुनिया के सबसे ज्यादा मोबाइल उपभोक्ता होना अपने आप में उल्लेखनीय है। इसके बाद जबसे मोबाइल पर इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध हुई तबसे तो वह विलासिता की बजाय एक अनिवार्यता माना जाने लगा। इंटरनेट के जरिये प्राप्त होने वाली जानकारी के साथ ही वह सूचनातंत्र और उससे भी बढ़कर मनोरंजन का साधन बन गया। सोशल मीडिया के आने के बाद से तो मोबाइल का उपयोग बहुआयामी बन गया। प्रधानमन्त्री से लेकर सामान्यजन तक इसका उपयोग कर रहे हैं। राजनेता, फिल्मी अभिनेता, साहित्यकार, पत्रकार और सभी आयु वर्ग के सामान्य लोग भी सोशल मीडिया से जुड़े हैं। ये राजनीतिक और सामाजिक बहस का सबसे आसान मंच जो बन गया है। लेकिन इसका खतरनाक पहलू ये है कि इसके माध्यम से सहज रूप से उपलब्ध होने वाली आपत्तिजनक सामग्री से कम उम्र के लड़के- लड़कियों की मानसिकता पर जो बुरा असर पड़ रहा है वह सांस्कृतिक प्रदूषण के तौर पर सामने आया है। बीते कुछ वर्षों के दौरान यौन अपराधों में किशोर पीढ़ी की बढ़ती लिप्तता के लिए मोबाइल के माध्यम से उपलब्ध उस सामग्री को दोषी माना जा रहा है जो भारतीय परिवेश में निषिद्ध मानी जाती है। लेकिन मोबाइल के उपयोग को व्यापक रूप देने में सस्ती दरें ही जिम्मेदार कहीं जायेंगीं। स्मार्ट फोन आने के बाद से मोबाइल की उपयोगिता वार्तालाप के साथ इंटरनेट के उपयोग में भी बढ़ गई। ऐसा लगता है टेलीकॉम कंपनियों को भी ये उम्मीद नहीं रही होगी कि करोड़ों लोगों के गरीब और अशिक्षित होने के बावजूद शायद स्मार्ट फोन का उपयोग इतना अधिक हो सकेगा। लेकिन पूरी दुनिया ये देखकर अचम्भित रह गई कि रिक्शा और ठेले वाले तक मोबाइल फोन ही नहीं बल्कि डाटा का उपयोग भी करने लगे। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों ने आकर्षक ऑफर भी दे दिए। लेकिन गलाकाट प्रतिस्पर्धा के साथ ही सरकारी नीतियों में दृढ़ता का अभाव होने से टेलीकॉम कम्पनियां घाटे में आ गईं। इसके लिए जियो को भी दोषी ठहराया जा रहा है। मोदी सरकार को मुकेश अम्बानी पर विशेष मेहरबानी के लिए कठघरे में खड़ा किया जाता है। बहरहाल आज से होने जा रही दर वृद्धि के औचित्य पर बहस के बावजूद ये ग्राहकों के अनुशासन से जुड़ा विषय भी है। मोबाइल फोन की उपयोगिता से कोई इंकार नहीं कर सकता लेकिन उसका अनावश्यक उपयोग निश्चित रूप से विचारणीय है। विशेष रूप से किशोर और युवाओं में इसे लेकर जो अति उत्साह है उस पर नियंत्रण करना जरूरी लगता है। वैसे टेलीकॉम कंपनियों की व्यवसायिक नीतियों को लेकर भी सरकार को सख्त रवैया अपनाना चाहिए। पहले ग्राहकों को लालच देकर मोहपाश में फंसाना और फिर उनका शोषण करने के गोरखधंधे पर लगाम लगना जरूरी है। मुक्त अर्थव्यवस्था के अपने लाभ हैं लेकिन वह उन्मुक्त न हो जाए इसका ध्यान रखा जाना भी जरूरी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी