Tuesday, 17 December 2019

जामिया मिलिया : छात्रों के कन्धों का इस्तेमाल



महात्मा गांधी ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान अनेक बार अपने आन्दोलन को हिंसा होने पर स्थगित कर दिया था। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने भी दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विवि में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका को सुनने से इंकार करते हुए साफ कह दिया कि पहले हिंसा रोको। उल्लेखनीय है नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में उक्त संस्थान में छात्रों द्वारा किये जा रहे आन्दोलन के दौरान हिंसा होने लगी। सार्वजानिक संपत्ति की तोडफ़ोड़ के साथ वाहन भी जलाये गये। दिल्ली पुलिस ने परिसर में घुसकर उपद्रवी तत्वों पर कार्रवाई की जिससे छात्र और भड़क गए। कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियां छात्रों के समर्थन में कूद पड़ीं। प्रियंका गांधी तो इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गईं। याचिका पर विचार करने के लिए दी गईं दलीलों पर प्रधान न्यायाधीश ने गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा कि सार्वजानिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और बसों को जलाए जाने जैसी घटनाएं रोके बिना न्यायालय सुनवाई नहीं करेगा। यद्यपि अदालत ने ये भी कहा कि वह ये फैसला नहीं कर रही कि कौन सही और कौन गलत है। जामिया मिलिया दिल्ली का सुप्रसिद्ध शिक्षण संस्थान है। इस केन्द्रीय विवि को गुणवत्ता के आधार पर काफी बेहतर श्रेणी प्राप्त है। इसकी स्थापना यूं तो अलीगढ़ में हुई किन्तु कालान्तर में इसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। हालांकि इसका मुस्लिम स्वरूप बरकरार रखा गया। पूर्व राष्ट्रपति स्व. डा. जाकिर हुसैन भी इसके उपकुलपति रहे थे। दिल्ली स्थित जेएनयू की तरह यह संस्थान उतना विवादास्पद नहीं रहा किन्तु बीते कुछ सालों से यहां भी वामपंथी तेवर नजर आने लगे हैं जिसकी बानगी ताजा उपद्रवों से मिली। कुलपति ने ये आरोप लगा दिया कि पुलिस ने बिना अनुमति परिसर में प्रवेश किया और छात्रों की पिटाई कर डाली। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विवि में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और देखते-देखते देश के कई शहरों में छात्र जामिया मिलिया के छात्रों के समर्थन में आन्दोलनरत हो उठे। प्रश्न ये है कि उक्त विवि के छात्रों को नागरिकता संशोधन कानून से ऐसी क्या परेशानी हो गयी कि वे हिंसक आन्दोलन पर उतर आये। ये बात सही है कि दिल्ली पुलिस ने परिसर में घुसकर तोडफ़ोड़ और आगजनी करने वाले छात्रों पर बलप्रयोग किया किन्तु किसी कानून का विरोध करते हुए इस तरह की गतिविधि में शामिल लोग महज ये कहकर सहानुभूति के पात्र नहीं बन सकते कि वे छात्र हैं। पुलिस पर पत्थर फेंकते हुए छात्रों की भीड़ के चित्र सार्वजानिक हो चुके हैं। विवि परिसर में इतने पत्थर किसके द्वारा और क्यों लाये गए इस बात का उत्तर भी कुलपति को देना चाहिए। समूची घटना से ये तो पता चलता ही है कि छात्रों की आड़ में असामाजिक तत्वों ने अपना खेल दिखा दिया। आज हुई गिरफ्तारियां इसका प्रमाण हैं। जिस तरह से अलीगढ़ मुस्लिम विवि में इसकी त्वरित प्रतिक्रिया हुई वह भी सवाल खड़े कर रही है। टीवी पर अनेक छात्रों ने ये स्वीकार किया कि कतिपय वामपंथी संगठन विवि की परीक्षा टलवाना चाहते थे और उसी उद्देश्य से नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर ये हिंसा करवाई गई। सच्चाई जो भी हो लेकिन इतना तो सच है कि विवि परिसर में इस कानून के विरोध का कोई अर्थ नहीं था। वहां पढऩे वाले वाले छात्र इससे तनिक भी प्रभावित नहीं हो रहे हैं। न तो उनकी नागरिकता खतरे में है और न ही उन्हें कोई देश से निकाल रहा है। ऐसे में आन्दोलन इतना हिंसक कैसे हुआ ये गम्भीरता से सोचने वाली बात है। और फिर कांग्रेस ने जिस तत्परता से हिंसक आन्दोलन की निंदा करने की बजाय उलटे पुलिस पर आरोप लगाना शुरू कर दिया उससे ये संदेह और भी गहराता है कि छात्रों की हिंसा के पीछे राजनीतिक षडयंत्र काम कर रहा था। जामिया मिलिया के छात्र विवि परिसर के बाहर आकर जब बस को जलाने लगे तब पुलिस ने उन्हें रोककर परिसर में लौटाने की कोशिश की और उसके बाद उपद्रव होने पर फिर पिटाई हुई। इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू ये है कि इस्लामिया नाम जुड़ा होने के बावजूद जामिया मिलिया में अलीगढ़ मुस्लिम विवि जैसी कट्टरता और जेएनयू की तरह वामपंथी धारा नहीं थी। लेकिन ताजा आन्दोलन के बाद अब ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि एक अच्छे भले शैक्षणिक संस्थान का माहौल खराब कर दिया गया। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जिस तरह का विरोध हो रहा है उसके पीछे अधिकतर वही लोग हैं जिन पर इस कानून का रत्ती भर भी असर नहीं होने वाला। कानून को मुस्लिम विरोधी बताने वालों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि देश का आम मुसलमान इसे लेकर सड़कों पर क्यों नहीं उतरा? चंद नेता ही इसे लेकर भड़काने वाली गतिविधियों को हवा दे रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने हिंसा रोके बिना याचिका की सुनवाई नहीं करने की जो बात कही वह पूरी तरह सही है क्योंकि दबाव की इस राजनीति का अंत समय की मांग और जरूरत दोनों हैं। यूं भी हिंसा से किसी आन्दोलन का औचित्य खतरे में पड़ जाता है। असम में उक्त कानून का सबसे ज्यादा विरोध शुरू हुआ लेकिन उसके हिंसक होते ही आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे प्रमुख संगठन ने उसे वापिस लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय जाने का निर्णय लिया। देश के जिन हिस्सों में कानून के विरोध में प्रदर्शन आदि हो रहे हैं उनमें मुस्लिमों की संख्या कितनी है ये देखने वाली बात है। बेकार में धजी का सांप बनाकर चंद राजनीतिक नेताओं ने जो गलती की उसका लाभ उठाकर देश विरोधी ताकतें अपने षडय़ंत्र में कामयाब हो गईं। विदेशी नागरिकों पर केंद्रित कानून को मुस्लिम विरोधी बताकर उसका विरोध करने वाले ये भूल गए कि ऐसा करते हुए एक बार फिर वे हिन्दू धु्रवीकरण की परिस्थितियां बनाने में सहायक बन गए हैं। राजनीति अपनी जगह है किन्तु पढ़ाई-लिखाई कर रहे छात्रों के कंधों पर रखकर बन्दूक चलाने वालों को ये सोचना चाहिए कि अराजकता फैलाने वाले भी अंतत: उसी की चपेट में आ जाते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 December 2019

मायावती के सवालों का भी जवाब दें राहुल



ऐसा लगता है राहुल गांधी बोलने के पहले सोचते नहीं हैं। या फिर उन्हें आज तक ये समझ नहीं आया कि कब, कहाँ, क्या और कैसे बोलना चाहिए ? बीते सप्ताह दिल्ली में हुई कांग्रेस की रैली में उन्होंने बड़ी ही तेज आवाज में कहा कि उनका नाम राहुल सावरकर नहीं बल्कि राहुल गांधी है और वे सच्चाई की लिए मर जायंगे लेकिन माफी नहीं मांगेंगे। इसके पीछे उनके उस बयान पर माफी मांगने सम्बन्धी मांग थी जिसमें उन्होंने प्रधानमन्त्री के मेक इन इण्डिया नारे का रेप इन इण्डिया कहकर मजाक उड़ाया था। संसद और बाहर उसे लेकर काफी बवाल मचा था। दिल्ली की रैली में वे मोदी सरकार पर नीतिगत हमले करते तो किसी को ऐतराज नहीं होता किन्तु उन्होंने बेवजह खुद के सावरकर नहीं होने की बात कह डाली जो न सिर्फ  अप्रासंगिक अपितु अनावश्यक भी थी। जब से महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्वातंत्र्य वीर सावरकर को भारत रत्न देने की बात अपने घोषणापत्र में शामिल की तभी से कांग्रेस और वामपंथी लॉबी सावरकर जी को लेकर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करने में जुटी हुई है। ये सही है कि उन पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगा था किन्तु वे अदालत से बरी हो गये। बावजूद इसके ये कहा जाता रहा कि सावरकर जी की विचारधारा ने ही नाथूराम गोडसे को गांधी जी की हत्या के लिए उकसाया। और द्विराष्ट्र का सिद्धांत भी उन्हीं का दिया हुआ था। जेल से बाहर आने के लिए अंग्रेजों से लिखित माफी मांगने का आरोप भी उन पर लगाया गया। लेकिन सावरकर जी के प्रति कांग्रेस की नाराजगी के बावजूद स्व. इंदिरा गांधी के प्रधानमन्त्री कार्यकाल में ही उन पर डाक टिकिट जारी किया गया था। यही नहीं इंदिरा जी ने लिखित रूप में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सावरकर जी के संघर्ष की प्रशंसा भी की थी। दरअसल जब से देश के विभाजन के लिए भाजपा ने पंडित नेहरू को जिम्मेदार ठहराने का अभियान छेड़ा है तभी से कांग्रेस कभी सावरकर जी और कभी जनसंघ के संस्थापक स्व. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को विभाजन के लिए कसूरवार ठहराने की रणनीति पर चल पड़ी है। इतिहास को लेकर विभिन्न अवधारणाएं होना गलत नहीं हैं। उसकी प्रामाणिकता पर भी विवाद हो सकते हैं लेकिन सावरकर जी का इतिहास इतना पुराना भी नहीं है कि उसे लेकर अनभिज्ञता रहे। ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध उनका संघर्ष किसी प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं है। उन्हें काले पानी की सजा के दौरान अंडमान की सेलुलर जेल में 10 वर्षों तक कठोर यातनाएं सहनी पड़ीं। उनके पूरे परिवार को प्रताडि़त किया गया। कट्टर हिंदूवादी होने के बावजूद सावरकर जी ने समाज सुधार विशेष तौर पर जातिवाद के विरुद्ध काफी जनजागरण किया। वे उच्च कोटि के लेखक थे। ऐसे व्यक्ति से वैचारिक मतभेद रखना तो सामान्य बात है लेकिन उसका अपमान करने की कोशिश किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं कही जा सकती। महाराष्ट्र में जिस शिवसेना के साथ कांग्रेस ने हाल ही में मिलकर सरकार बनाई है वह सावरकर जी को अपना आदर्श और प्रेरणास्रोत मानती है। उन्हें भारत रत्न दिए जाने की भी वह पक्षधर है। राहुल के बयान पर उसने भी नाराजगी जताई है। यद्यपि संजय राउत जैसे बड़बोले प्रवक्ता ने बजाय आग उगलने के ये कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि कांग्रेस के उच्च नेताओं से बात की जायेगी। उन्होंने श्री गांधी को सावरकर जी द्वारा रचित साहित्य पढऩे के लिए दिए जाने की बात भी कही। राज्य के गृहमंत्री ने भी राहुल की बात पर ऐतराज किया है। हालांकि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की खामोशी चौंकाने वाली है। बहरहाल श्री गांधी द्वारा खुद के सावरकर नहीं होने की बात से कांग्रेस को एक बार फिर जबर्दस्त नुकसान हो गया। स्वातंत्र्य वीर के तौर पर प्रसिद्ध सावरकर जी की स्वाधीनता संग्राम में जो भूमिका है उसके कारण शिवसेना और भाजपा के अलावा भी देश का एक बड़ा वर्ग उनके प्रति सम्मान का भाव रखता है। युवा पीढ़ी में भले ही उस महान नेता के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं हो लेकिन श्री गांधी द्वारा की गयी टिप्पणी के बाद से सावरकर जी को पढऩे और समझने के प्रति असंख्य लोगों की रूचि जागृत हो गई है। सोशल मीडिया पर जो कुछ भी चल रहा है उससे ये स्पष्ट हो जाता है कि सावरकर जी अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बन गए। इस मुद्दे पर राजनीतिक दृष्टिकोण से भी सोचें तो राहुल ने एक बार फिर बचकानापन दिखाते हुए कांग्रेस के लिए मुश्किल पैदा कर दी है। उनकी दादी ने जिस व्यक्ति के सम्मान में डाक टिकिट जारी करवाया और स्वाधीनता संग्राम में उनकी संघर्षशीलता के प्रति आदरभाव व्यक्त किया हो उसके प्रति हल्कापन दिखाना किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं है। बसपा नेत्री मायावती ने श्री गांधी द्वारा सावरकर जी के प्रति व्यक्त किये गये उद्गार के बाद कांग्रेस पर दोहरा चरित्र रखने का आरोप लगाते हुए सवाल किया कि शिवसेना अपने एजेंडे पर कायम है। जिसके तहत उसने नागरिकता संशोधन विधेयक पर मोदी सरकार का साथ दिया और वह सावरकर जी की अनन्य भक्त भी है। फिर भी कांग्रेस उसके साथ महाराष्ट्र सरकार में क्यों बनी हुई है? महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं के साथ ही शरद पवार की एनसीपी भी श्री गांधी द्वारा सावरकर जी के बारे में जिस तरह की बातें की गईं उनसे सनाके में है। दरअसल कांग्रेस की दिक्कत ये है कि वह महात्मा गांधी से ज्यादा आज के गांधी परिवार की भक्त हो गयी जिस वजह से उसके किसी सदस्य द्वारा की गई गलतियों पर टोकने वाला कोई नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 December 2019

माफिया उन्मूलन : सरकारी मुख्यालय से हो शुरुवात



मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों को माफिया के विरुद्ध निर्णायक मुहिम छेडऩे का जो आदेश दिया वह स्वागतयोग्य है। प्रदेश भर से आये उच्च अधिकारियों को उन्होंने जिस सख्त अंदाज में निर्देश दिए यदि उसका सही-सही पालन हो गया तो निश्चित रूप से ये बड़ी उपलब्धि होगी। माफिया शब्द से साधारण तौर पर अभिप्राय अपराधी गिरोहों से होता है लेकिन धीरे-धीरे सफेदपोश माफिया भी अस्तित्व में आता गया और आज आलम ये है कि कोई भी ऐसा क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसका माफियाकरण न हो गया हो। एक समय था जब अपराधी तत्व राजनेताओं के संरक्षण में पलते रहते थे। लेकिन कालान्तर में वे खुद ही राजनेता बन गए। हालात यहाँ तक आ गए कि देश की संसद और विधानसभाओं में बड़ी संख्या में ऐसे जनप्रतिनिधि चुनकर आने लगे जिन पर संगीन अपराधों के मुकदमे चल रहे हैं। फूलन देवी का लोकसभा के लिए चुना जाना काफी कुछ कह गया। अनेक ऐसे कुख्यात अपराधी तत्व हैं जो कत्ल या उस जैसे ही किसी अपराध के प्रकरण में जेल में बंद रहने के बाद भी लोकसभा और विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। ये विडंबना ही है कि चुनाव जीतने की क्षमता वाले उम्मीदवार उतारने की रणनीति के चलते राजनीतिक दलों ने प्रत्याशी की अपराधिक अपराधिक पृष्ठभूमि को अनदेखा करने की आदत डाल ली है। राजनीति और अपराध का गठजोड़ जब पूरी तरह सफलतापूर्वक स्थापित हो गया तब अन्य क्षेत्रों में भी माफिया का प्रवेश हुआ और स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि शासन, प्रशासन, उद्योग-व्यापार, सभी में सीधे या परोक्ष रूप से माफिया का दबदबा बढ़ता गया। भू माफिया, शराब माफिया, दूध माफिया से बढ़ते-बढ़ते बात मीडिया माफिया तक आ पहुँची है। किसी भी क्षेत्र में गलत काम करने वालों का संगठित गिरोह माफिया कहा जा सकता है। उस दृष्टि से देखें तो कमलनाथ ने बहुत ही सही सोच का परिचय दिया। अभी तक होता ये था कि सरकार द्वारा कड़ाई बरतने की हिदायत मिलते ही पुलिस और प्रशासन मिलकर स्थापित अपरधियों की पकड़-धकड़ कर दिया करते थे। लेकिन मुख्यमंत्री ने माफिया विरोधी मुहिम को व्यापक रूप देने का हुक्मनामा जारी करते हुए अधिकारियों को कड़े शब्दों में समझा दिया कि ढिलाई बरतने पर उनकी खैर नहीं रहेगी। जैसे समाचार मिल रहे हैं उनके अनुसार प्रशासनिक अमला माफिया विरोधी अभियान में जुट गया है। लेकिन सवाल ये है कि पुलिस और प्रशासन के अनेक जिम्मेदार लोगों का माफिया से जो याराना है उसे मुख्यमंत्री किस तरह रोक सकेंगे? सही बात तो यही है कि माफिया के विस्तार में राजनीति, पुलिस और प्रशासन का ही योगदान है। अपराधी प्रवृत्ति एक मानसिकता है लेकिन संगठित अपराध जब सरकारी संरक्षण में चलने लगते हैं तब उसे माफिया की हैसियत मिल जाती है। उस लिहाज से कमलनाथ को चाहिए कि वे माफिया विरोधी अभियान का शुभारम्भ भोपाल स्थित सचिवालय से करें। सचिवालय में घूमने वाले दलाल किस-किस अधिकारी से मिलते हैं उसका पता किया जाए तो ये बात उजागर होते देर नहीं लगेगी कि माफिया राज का उद्गम स्थल सरकार का अपना मुख्यालय ही है। राजधानी में बैठे अनेक पत्रकार भी सत्ता के दलाल बनकर माफिया के कारोबार में मददगार बनते सुने जा सकते हैं। मुख्यमंत्री की मंशा पर कोई शक किए बिना ये कहना सर्वथा उचित रहेगा कि जब तक सरकार अपने घर की सफाई नहीं करती तब तक माफिया का उन्मूलन नहीं हो सकता। हाल ही में इंदौर के एक अखबार मालिक के कथित अवैध कारोबार को सरकार ने नेस्तनाबूत कर दिया। इसके पीछे जो वजह बताई गई वह हनीट्रैप नामक उस कांड से जुड़ी हुई है जिसमें अनेक राजनेताओं तथा आला अधिकारियों की रंगरेलियों की सचित्र दास्तान का पर्दाफाश हुआ। सरकार द्वारा उक्त अखबार मालिक और उसके होटलों इत्यादि पर जिस तरह से बुलडोजर चलाया गया उसे लेकर तरह-तरह की बातें सोशल मीडिया पर चल रही हैं। उक्त अख़बार मालिक की काली करतूतों से किसी को सहानुभूति नहीं हो सकती लेकिन उसको बर्बाद किये जाने की वजह यदि बड़ी हैसियत वाले तमाम नेताओं और अधिकारियों की इज्जत उतरने का खौफ  है तब मुख्यमंत्री को चाहिये वे इस मामले में उछल रहे आरोपों को लेकर अपनी सरकार की अग्निपरीक्षा देने का साहस भी दिखाएँ। कमलनाथ बहुत ही अनुभवी नेता हैं। उनकी योग्यता और दक्षता असंदिग्ध है किन्तु माफिया के सफाए के लिए उन्होंने नौकरशाहों को जो निर्देश दिए वे तब तक कारगर नहीं हो सकेंगे जब तक सत्ता से जुड़े लोगों के साथ ही प्रशासन और पुलिस की विभिन्न क्षेत्रों के अपराधी तत्वों के साथ चल रही अघोषित भागीदारी पर शिकंजा नहीं कसा जाता। बीते दिनों प्रदेश में रेत के ठेके नीलाम किये गए। मुख्यमंत्री यदि सही-सही पता कर लें कि जिन लोगों ने आर्थिक मंदी के इस दौर में भी सरकार की उम्मीद से बहुत बढ़कर बोली लगाई वे और उनके साथ कौन-कौन हैं तो उनको माफिया की वास्तविक स्थिति पता चल जायेगी। यदि पुलिस और प्रशासन ठान ले तथा राजनेता संरक्षण नहीं दें तो किसी शहर या बस्ती में चलने वाली अधिकतर अपराधिक गतिविधियों को चुटकी बजकर रोका जा सकता है। माफिया राज यदि आज समूची व्यवस्था पर हावी है तो उसके लिये सरकारी अमला सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। मप्र अपेक्षाकृत शांत राज्य है और यहाँ कानून व्यवस्था भी काफी अच्छी मानी जाती है। लेकिन समय के साथ ही इस राज्य में भी उन समस्त बुराइयों का पदार्पण होता गया जिनके लिए उप्र और बिहार को बदनाम किया जाता रहा। खैर, कमलनाथ की कोशिश को देर आयद दुरुस्त आयद मानकर उम्मीद की जानी चाहिए कि ज्यादा न सही थोड़ा सा भी कुछ हो गया तो वह भी राहत की बात होगी। लेकिन मुख्यमंत्री की निष्पक्षता तभी साबित हो सकेगी जब वे शासन -प्रशासन और अपनी पार्टी के माफिया के साथ चले आ रहे गठबंधन को तहस-नहस करने की हिम्मत दिखाएँ। यदि वे ऐसा कर सके तब मप्र को विकसित राज्य बनाने का सपना साकार हो सकेगा। वरना जो चल रहा है वैसा ही चलता रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 December 2019

काश, समय रहते इलाज कर लिया होता



समय पर इलाज नहीं होने से किस तरह छोटी सी फुंसी पहले फोड़ा और बाद में नासूर बन जाती है इसका ताजा उदहारण है पूर्वोत्तर की वर्तमान स्थिति। पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और अब नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध को लेकर देश के पूर्वी राज्यों में जिस बड़े पैमाने पर हिंसक आन्दोलन हो रहे हैं उन्हें तात्कालिक प्रतिक्रिया कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आजादी के बाद से ही पूर्वोत्तर राज्यों में भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीयता के नाम पर अलगाववाद के बीज बोये जाते रहे हैं। जनजातीय समुदायों के बाहुल्य वाले इस अंचल में सांस्कृतिक विविधता तो सदियों से ही थी लेकिन ब्रिटिश राज में वहां ईसाई मिशनरियों का जाल फैलता चला गया। स्वाधीन भारत में इस इलाके की संवेदनशीलता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिए जाने की वजह से पूर्वोत्तर मुख्यधारा में शामिल होने से वंचित रह गया। म्यांमार (बर्मा) और बांग्ला देश (1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान) से घुसपैठिये लगातार सीमावर्ती राज्यों में आते गए। लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ असम। पूर्व राष्ट्रपति स्व. फखरुद्दीन अली अहमद जब असम की राजनीति में सक्रिय थे उस समय वहां काफी मुस्लिम घुसपैठिये आये जिन्हें सुनियोजित तरीके से नागरिकता दी जाती रही क्योंकि वे कांग्रेस के वोट बैंक माने जाते थे। सांस्कृतिक और भाषायी विविधता के साथ भौगोलिक संरचना की वजह से पूर्वोत्तर में नए-नए राज्य बनते गये। इसके पीछे भी अनेक कारण थे लेकिन दुर्भाग्यवश इन प्रदेशों में राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा की बजाय क्षेत्रीय दलों या ये कहें कि कबीला संस्कृति पर आधारित राजनीति का आधिपत्य बना रहा। ईसाई मिशनरियों के अलावा यहाँ चीन ने भी भारत विरोधी भावनाओँ को भड़काते हुए अशांति का माहौल बनाये रखा। पूर्वोत्तर के राज्यों की क्षेत्रीय पहिचान और सांस्कृतिक विशिष्टता बनाये रखने के लिए उन्हें जम्मू कश्मीर जैसे तरह-तरह के अनेक विशेषाधिकार भी दिए गए। इन राज्यों में अनेक सशस्त्र उग्रवादी संगठन भारत के विरुद्ध विद्रोह पर उतारू रहे जिसकी वजह से समूचा इलाका अशांत बना रहा। समय-समय पर अनेक समझौते भी केंद्र ने किये लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिस तरह से शेष भारत का तादात्म्य इस इलाके से नहीं कायम हो सका ठीक वैसी ही स्थिति इन राज्यों के लोगों की भी रही। प्राकृतिक सौन्दर्य और अपार वन संपदा से से भरपूर पूर्वोत्तर के अरुणाचल राज्य को तो चीन अपने नक्शे में दिखाने से भी बाज नहीं आता। लम्बे समय तक अशांत रहने के बावजूद पूर्वोत्तर राज्यों में भारतीय प्रभुसत्ता बनी रही तो उसका कारण हमारे सुरक्षा बल ही हैं। जहां तक बात वर्तमान समस्या की है तो इसकी शुरुवात 1971 में बांग्ला देश बनने के पहले तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में हुए गृह युद्ध से उत्पन्न हुई जब बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी बनकर लाखों लोग सीमा पार करते हुए सीमावर्ती राज्यों में आ गए। सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ असम। बांग्ला देश के निर्माण के बाद इंदिरा गांधी और शेख मुजीब के बीच समझौता हुआ जिसके अनुसार भारत में घुस आये शरणार्थियों को वापिस भेजा जाना तय हुआ। लेकिन मुजीब के तख्ता पलट के बाद वहां सत्ता में आये लोगों के भारत के साथ रिश्ते बिगड़ गए और शरणार्थी भारत में ही रह गये। हालाँकि उस समय उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में शिविर बनाकर रखा गया था किन्तु असम और बंगाल में वे बड़ी संख्या में जमे रहे और यहीं से असम का ऐतिहासिक छात्र आंदोलन शुरू हुआ। लंबे संघर्ष के बाद स्व. राजीव गांधी ने आन्दोलनकारियों के साथ नया समझौता करते हुए असम को शरणार्थियों के बोझ से मुक्ति देने का वायदा किया। उसके बाद वहां असम गण परिषद की सरकार बनी लेकिन बाद में डेढ़ दशक तक कांग्रेस सत्ता में रही। डा मनमोहन सिंह भी इसी राज्य से राज्यसभा के लिए चुने जाते रहे हैं लेकिन उस समझौते को अमल में लाने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किये गए। और यदि किये भी गये होंगे तो उनका कोई असर जमीन पर तो नहीं दिखाई दिया। इस कारण से वहां जनसंख्या असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती गयी। अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के फेर में कांग्रेस और वामपंथियों ने बांग्ला देश से आये मुसलमानों को अपना वोटबैंक बना लिया। आज ममता बनर्जी भी उसी लाइन पर चल रही हैं। इस समस्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के दखल पर नागरिकता रजिस्टर बनाया गया लेकिन उसके झमेले में फंसने के बाद केंद्र सरकार नया विधेयक लेकर आई जो अब कानून बन गया है। हालाँकि इसके अनुसार 2014 की निश्चित तिथि तक आये गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है लेकिन पूर्वोत्तर में ये आशंका व्याप्त है कि इस कानून के कारण अब नये सिरे से शरणार्थियों का रेला आना शुरू हो जाएगा। असम के अलावा अन्य राज्यों को अपनी भाषा और संस्कृति खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है। विधेयक पारित होने के पहले ही बड़ा इलाका आन्दोलन की चपेट में आ चुका था। हलात बेहद तनावपूर्ण हैं। उनमें सुधार कैसे होगा ये कह पाना बेहद कठिन है। केंद्र सरकार आश्वासन दे रही है। प्रधानमंत्री गृहमंत्री भी ये समझा रहे हैं कि डरने की बात नहीं है। आगे क्या होगा ये कोई नहीं बता पा रहा। विपक्ष ने केंद्र सरकार को इसके लिए जिम्मेदार बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। हिंसा का ये दौर लम्बा चलेगा या फिर जल्द ही शांति हो जायेगी ये फिलहाल कहना कठिन है। लेकिन इस विवाद से एक बात पुन: साबित हो गयी कि इस तरह की समस्याओं का हल जितनी जल्दी हो किया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर में मोदी सरकार ने विकास की धारा बहाने के लिए कारगर कदम उठाये हैं। वहां का पर्यटन भी बढ़ा है लेकिन अचानक वहां अशांति का पुराना माहौल लौट आया। उम्मीद है जल्द ही हालात सामान्य होंगे और भ्रम तथा आशंकाएं दूर हो जायेंगीं किन्तु पूर्वोत्तर में अलगाववाद और घुसपैठ की समस्या का समय रहते समाधान न किये जाने की कितनी बड़ी कीमत देश ने चुकाई ये गम्भीर चिन्तन का विषय है। राष्ट्रीय विषयों पर राजनीति से उपर उठकर सोचने की प्रवृत्ति न जाने कब हमारे यहाँ विकसित होगी?

-रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 12 December 2019

एक वायदा अच्छे दिन का भी तो था



तीन तलाक, अनुच्छेद 370, राम मंदिर और अब नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद मोदी सरकार के पास ये कहने का भरपूर अवसर है कि उसने भाजपा के घोषणापत्र के उन परंपरागत वायदों को पूरा कर दिया जिन्हें लेकर उसे विपक्ष और जनता दोनों से उलाहने सुनने मिलते थे। यद्यपि अयोध्या मसला सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निपटाया गया लेकिन वह चूंकि हिंदुओं के पक्ष में गया इसलिए उसका राजनीतिक फायदा भाजपा के खाते में आया और हिंदुत्व की भावना को भी इस फैसले से काफी बल मिला किन्तु शेष तीनों विषय मोदी सरकार की उपलब्धि माने जाएंगे। सबसे बड़ी बात ये हुई कि विपक्ष द्वारा राज्यसभा में सरकार की राह में अवरोधक लगाने की रणनीति बुरी तरह बिखर गई। हालांकि बीते कुछ वर्षों में उच्च सदन में भाजपा और एनडीए की सदस्य संख्या खासी बढ़ गई लेकिन पूर्ण बहुमत में अभी भी कमी है। बावजूद उसके भाजपा का संसदीय प्रबंधन अपेक्षाकृत बेहतर रहा और वह कांग्रेस सहित शेष भाजपा विरोधी दलों की एकता में सेंध लगाने में कामयाब हो गई। नागरिकता संशोधन विधेयक दरअसल राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में उत्पन्न विसंगतियों के कारण लाना पड़ा। इसका पूर्वोत्तर राज्यों में जिस तरह का विरोध हो रहा है उसे देखते हुए केंद्र सरकार को आने वाले समय में विकट हालातों का सामना करना पड़ सकता है। ये दांव यदि उल्टा पड़ा तो पूर्वोत्तर में भाजपा के रथ के पहिये फंस भी सकते हैं । लेकिन देश के बाकी हिस्सों में पार्टी अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को बांधे रखने में जरूर सफल होगी । विपक्ष भी ये नहीं कह सकेगा कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए भावनात्मक मुद्दे उठाती है । लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि अब मोदी सरकार को इस आरोप से खुद को बचाना होगा कि वह आर्थिक मोर्चे पर मिल रही विफलता पर पर्दा डालने के लिए विवादग्रस्त विषयों को छेड़कर देश का ध्यान भटकाती रहती है। समाज के एक बड़े वर्ग के अनुसार संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक को जिस तरह पेश किया गया उसकी उतनी जरूरत नहीं थी। सरकार उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप होने वाले उपद्रवों का पूर्वानुमान लगाने में भी विफल रही । ये भी कहा जा रहा है कि कश्मीर में शान्ति का दावा कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरने के पहले ही मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर में अलगाववाद के नए बीज बो दिये । हालांकि सरकार जिस तरह से अपने फैसले पर कायम रही उससे ये लगता है कि इस विधेयक को लेकर भी उसके मन में कश्मीर जैसी ही कोई न कोई कार्ययोजना है जिसकी वजह से वह पूर्वोत्तर में भड़क उठी हिंसा को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है । हो सकता है उसका आत्मविश्वास ठोस तैयारी की वजह से हो किन्तु अब समय आ गया है जब केंद्र सरकार को आर्थिक मोर्चे पर छाई निराशा को दूर करने की परिणाममूलक कोशिशें करनी चाहिए। आर्थिक मंदी कहें या सुस्ती लेकिन वास्तविकता यही है कि कारोबारी जगत में जबरदस्त अनिश्चितता है । घटते उत्पादन और बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े जनचर्चा के विषय बनते जा रहे हैं । विकास दर को लेकर पेश की गई रंगीन तस्वीर के रंग फीके पडऩे लगे हैं । भाजपा के भीतर ही अर्थव्यवस्था को लेकर असंतोष और आलोचना महसूस की जा सकती है । वित्तमंत्री द्वारा दी जाने वाली सफाई मजाक का विषय बनने लगी है । प्रधानमंत्री तो यूं भी ऐसे मुद्दों पर कुछ बोलने से कतराते हैं । भाजपा के प्रवक्ता भी संतोषजनक जवाब देने की बजाय या तो कन्नी काट जाते हैं या फिर तथ्यहीन बातें कहकर अपनी, पार्टी और सरकार तीनों की भद्द पिटवा देते हैं । भावनात्मक मुद्दों को व्यापक राष्ट्रीय हितों से जोड़ने  की उसकी रणनीति अब तक निश्चित रूप से कारगर रही किन्तु आर्थिक मोर्चे को लंबे समय तक अनदेखा नहीं किया जा सकता । मौजूदा वित्तीय वर्ष समाप्ति की ओर है । नए बजट का खाका तैयार होने लगा है। जीएसटी की वसूली उम्मीद से कम होने के साथ ही राजकोषीय घाटा भी अनुमानों के बाहर जाने को मचल रहा है । विपक्ष के साथ ही अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विशेषज्ञ और रेटिंग एजेंसियां भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर चिंताजनक भविष्यवाणी करते रहती हैं । ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि भले ही सरकार कुछ भी कहती रहे लेकिन आम जनता भी आर्थिक स्थिति को लेकर आश्वस्त नहीं है । नोटबन्दी और जीएसटी की वजह से आई कारोबारी सुस्ती दूर होने का नाम ही नहीं ले रही। समूचा व्यापार, उद्योग और बैंकिंग जगत एक अजीबोगऱीब दहशत से गुजर रहा है। सरकार इस स्थिति से बेखबर या उदासीन है ये कहना तो गलत होगा लेकिन उसने जो उपाय किये वे जरूरत के मुताबिक अपर्याप्त थे या फिर माकूल नहीं रहे। हाल ही में वित्तमंत्री ने आगामी बजट में निजी आयकर की दरें घटाने के संकेत दबी जुबान में दिए थे। कारपोरेट कर में कमी के बाद से ये मांग उठने लगी थी कि आम जनता को भी तो कुछ राहत सीधे तौर पर मिले जिससे उसकी क्रय शक्ति बढऩे से बाजारों में मांग उठे। ऐसा होगा या कुछ और निर्णय लिए जाएंगे ये स्पष्ट नहीं है क्योंकि मोदी सरकार पूर्वानुमान लगाने के अवसर नहीं देती । खैर जो भी हो लेकिन कुछ न कुछ तो होना ही चाहिए क्योंकि शांतिकाल में आम इंसान की चिंता घर, परिवार और रोजी रोटी पर केंद्रित रहती है। बाजारवाद के इस दौर में केवल भावनाएं लंबे समय तक जनापेक्षाओं को दबाकर नहीं रख सकतीं। मोदी सरकार इस वास्तविकता को जितनी जल्दी समझ ले उतना बेहतर होगा। प्रधानमंत्री को ये भी याद रखना चाहिए कि उन्होंने एक वायदा अच्छे दिन आने का भी किया था।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 December 2019

शिवसेना : नीतिगत पलायन को मजबूर



नागरिकता संशोधन विधेयक पर शिवसेना ने लोकसभा में सरकार का साथ दिया था लेकिन कहा जा रहा है कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा नाराजगी व्यक्त किये जाने के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पलटी मारी और राज्यसभा में विधेयक के समर्थन को लेकर किन्तु-परन्तु लगाते हुए शर्तें रख दीं। महाराष्ट्र और मराठी माणूस तक सीमित रहने वाले श्री ठाकरे को अचानक दूसरे राज्यों की चिंताएं भी सताने लगीं। पार्टी के अत्यंत मुखर प्रवक्ता संजय राउत से जब लोकसभा में समर्थन के बाद राज्यसभा में आनाकानी के बारे में पूछा गया तो वे बोले कि लोकसभा में जो हुआ उसे भूल जाओ। आज की भारतीय राजनीति में इस तरह से पलटी मारना कोई नई बात नहीं है। भाजपा के साथ बिहार में सरकार चला रहे जनता दल (यू) में भी इस विधेयक को समर्थन पर अंतर्कलह की खबर है। लेकिन उसका अनेक नीतिगत मामलों में भाजपा के साथ मतभेद जाहिर है परन्तु शिवसेना और भाजपा दोनों का वैचारिक आधार एक समान है। एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा में भी श्री ठाकरे ने भाजपा को सुनाते हुए साफ तौर पर कहा था कि हिंदुत्व उनकी स्थायी नीति है। लोकसभा में उक्त विधेयक का समर्थन किये जाने से लगा कि शिवसेना श्री ठाकरे के उस दावे को सही साबित कर रही है लेकिन गत दिवस उनके बयान से ऐसा महसूस हुआ कि शिवसेना सत्ता की लालच में कांग्रेस के दबाव के आगे झुकने को तैयार हो गई। राज्यसभा में उसका अंतिम रुख क्या रहेगा ये अभी तक साफ़ नहीं है लेकिन यदि उसने विरोध में मत दिया तब माना जाएगा कि उद्धव ठाकरे पूरी तरह जाल में फंस चुके हैं। उल्लेखनीय है तीन तलाक के मामले में कांग्रेस भी ऐसी ही दुविधा की शिकार थी। लोकसभा में तो उनकी पार्टी ने सरकार का साथ दिया लेकिन राज्यसभा में उसका निर्णय बदल गया। इस अलटी-पलटी का उसे जबर्दस्त नुकसान हुआ। क्योंकि वह मुसलमानों और हिन्दुओं में से किसी का भी विश्वास नहीं जीत सकी। शिवसेना ने सत्ता के लिये भले ही पूरी तरह विपरीत विचारधारा वाली पार्टियों से गठजोड़ कर लिया हो लेकिन उसकी छवि एक हिंदूवादी पार्टी की ही मानी जायेगी। और उससे हटने का परिणाम उसकी पहिचान नष्ट हो जाने के तौर पर सामने आये बिना नहीं रहेगा। नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में अनेक नेताओं ने साफ तौर पर आरोप लगाया कि भाजपा, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की राह पर चल रही है। शिवसेना की अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना से ही जुड़ी हुई थी। स्व. बाल ठाकरे ने कभी भी उसे छिपाया नहीं। उद्धव ठाकरे के अब तक के नीतिगत वक्तव्य भी प्रखर हिंदुत्व पर ही केन्द्रित थे लेकिन ऐसा लगता है सत्ता सुन्दरी के सान्निध्य में आते ही वे अपने स्वर्गीय पिता की तेजस्विता को तिलाजंलि देने को मजबूर हो गए। अभी तक भाजपा पर ये आरोप लगा करता था कि वह विपक्ष में रहते हुए जिन मुद्दों को लेकर आक्रामक रहा करती है उन्हें सत्ता में आने के बाद किनारे कर देती है। कांग्रेस ने तो उप्र विधानसभा के पिछले चुनाव में राम मन्दिर बनाने के वायदे के साथ ही अपना प्रचार शुरू किया था। राहुल गांधी ने अयोध्या के मंदिरों में मत्था टेक कर खुद को हिंदूवादी दिखाने का भरसक प्रयास किया। बाद में गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में तो वे हिन्दू नेता से भी एक कदम आगे बढ़कर ब्राह्मण के रूप में खुद को पेश करने लगे। मंदिरों और मठों में धोती पहिनकर अनुष्ठान करते हुए उनके चित्र भी खूब प्रसारित हुए। बाद में मानसरोवर की यात्रा करते हुए उन्होंने शिवभक्त होने का भी दावा किया। लेकिन उनके प्रयासों को आम जनता में कोई अहमियत नहीं मिली। दूसरी तरफ  सत्ता में आते ही अपने मूल मुद्दों से मुंह मोड़ लेने वाली भाजपा ने बड़ी ही चतुराई से तीन तलाक़ और अनुच्छेद 370 जैसे जटिल मामलों को आसानी से निपटा दिया। नागरिकता संशोधन भी उसकी नीतियों का ही हिस्सा है और जैसी कि राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा है कि इससे फुर्सत पाते ही मोदी सरकार समान नागरिक संहिता लागू करने की तरफ  कदम बढ़ाएगी। लोकसभा में परसों बोलते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कहा भी कि ये सब भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में किये गए वायदे ही थे। उस दृष्टि से देखें तो शिवसेना ने नागरिकता संशोधन विधेयक पर जिस तरह से अपने रुख में परिवर्तन के संकेत दिए उससे उसे तात्कालिक फायदा भले हो लेकिन दूरगामी नुकसान से वह नहीं बच सकेगी। राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होने की बात को चाहे जितना भी स्वाभाविक मान लिया जाए लेकिन किसी पार्टी की नीतियां और सिद्धांत तो स्थायी होने चाहिए क्योंकि उन्हीं से तो उसकी पहिचान होती है। शिवसेना और भाजपा के बीच अधिकतर मुद्दों पर वैचारिक साम्यता होने के बावजूद आक्रामकता का अंतर जरूर था। दूसरी बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी मूल पहिचान को तो और भी पुख्ता कर लिया लेकिन जो शिवसेना बाबरी ढांचे के विध्वंस का श्रेय लेने में नहीं डरी वह श्रीमती गांधी की नाराजगी से ही अपनी नीति छोड़ बैठी। उद्धव ठाकरे भले ही पहली बार सत्ता में आए है लेकिन उन्हें राजनीतिक अनुभव काफी लम्बा है। उस आधार पर उनका बदला हुआ रुख चौंकाने वाला है। यदि आगे भी वे इसी तरह घुटने टेकते रहे तो बड़ी बात नहीं महाराष्ट्र में भी कर्नाटक के नाटक का मंचन हो जाए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 December 2019

महंगा सौदा : विचार की कीमत पर सरकार



महाराष्ट्र में जोर का झटका धीरे से खा चुकी भाजपा को कर्नाटक विधानसभा की 15 सीटों के उपचुनावों के परिणामों से जबर्दस्त राहत मिली होगी। 12 सीटों पर उसके प्रत्याशी जीत गए वहीं जीता हुआ एक निर्दलीय उसका बागी है। कांग्रेस को मात्र दो सीटें मिलीं जबकि देवगौड़ा परिवार की पार्टी जनता दल (एस) का फट्टा साफ हो गया। ये उपचुनाव कांग्रेस और जनता दल (एस) से टूटकर आये विधायकों की सदस्यता रद्द होने के कारण हुए थे। इन सभी को भाजपा ने टिकिट दे दी। चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जीते हुए 12 में से 11 विधायकों को मंत्री बनाये जाने का ऐलान कर दिया। इन नतीजों ने कर्नाटक में छाई राजनीतिक अस्थिरता दूर कर दी। येदियुरप्पा सरकार के पास अब पर्याप्त बहुमत हो गया है। भाजपा विरोधी जो गठबंधन विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और जनता दल (एस) ने मिलकर बनाया था वह अपने ही अंतर्विरोधों में छिन्न - भिन्न हो गया। आजकल दोनों ही दल एक दूसरे को दोषी ठहराने में जुटे हैं। सही बात तो ये है कि कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया जनता दल (एस) के नेता कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे किन्तु सोनिया गांधी ने भाजपा को किसी भी कीमत पर रोकने के लिए उनकी ताजपोशी करवा दी। कुछ महीनों तक तो इसे भाजपा की बड़ी शिकस्त के तौर पर देखा गया लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली शानदार जीत ने इस गठबंधन की जड़ें खोद दीं। इसमें दो राय नहीं कि भाजपा ने कुमारस्वामी सरकार को गिराने के लिये जो कुछ भी किया वह नैतिकता के लिहाज से किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता था क्योंकि जो विधायक कांग्रेस और जनता दल (एस) को छोड़कर आये वे भाजपा के सिद्धांतों के प्रति आकृष्ट तो थे नहीं। कुमारस्वामी सरकार में मंत्री पद नहीं मिलने से नाराज होकर भाजपा के साथ सौदेबाजी के चलते वे पाला बदलकर आ गये। चूँकि भाजपा के लिए भी सत्ता हासिल करना प्रमुख मिशन बन गया है इसलिये उसके दरवाजे सभी के लिए खोल दिए गए हैं। बीते दिनों महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडऩवीस द्वारा एनसीपी के भ्रष्ट नेता कहे जाने वाले अजीत पवार के साथ आनन फानन में सरकार बनाने का जो प्रयोग किया गया उसके बाद ये पूरी तरह से स्पष्ट हो गया कि किसी भी तरह से सत्ता हासिल करने से भाजपा को परहेज नहीं रहा। लेकिन राजनीति नामक खेल के प्रचलित नियमों में अनुचित कुछ नहीं रहा इसलिए भाजपा को भी अपराधी होने से मुक्ति मिल जाती है। अब सवाल ये है कि क्या कांग्रेस से आये 11 विधायकों को मंत्री बना दिए जाने से पार्टी के भीतर असंतोष नहीं बढ़ेगा? यूँ भी सभी दलबदलुओं को टिकिट दिए जाने से पार्टी कार्यकर्ताओं में नाराजगी थी। महाराष्ट्र और हरियाणा में भी भाजपा ने अपने पुराने विधायकों और मंत्रियों की टिकिटें काटकर नए नवेले लोगों को उपकृत किया जिसका नुकसान भी उसे उठाना पड़ा। 2014 के बाद भाजपा ने अपना प्रभावक्षेत्र निश्चित रूप से राष्ट्रव्यापी बना लिया। यहाँ तक कि पूर्वोत्तर के लगभग सभी राज्यों में पार्टी की दमदार उपस्थिति महसूस की जाने लगी। त्रिपुरा से सीपीएम को उखाड़ फेंकने के साथ ही बंगाल में डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोकसभा सीटें जीतना साधारण उपलब्धि नहीं कही जा सकती। बावजूद इसके ये कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा का विकास भी हारमोन का इंजेक्शन लगाकर रातों-रात बढ़ाई गई लौकी जैसा ही है जो स्वादरहित होने के साथ शरीर को नुकसान भी पहुंचाती है। दरअसल 2014 में मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद भाजपा के दिमाग आसमान पर चढ़े जिसके कारण वह अपने मूल आधार से कटने लगी। यही वजह है कि उसके परम्परागत गढ़ दिल्ली मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ एक - एक कर उसके हाथ से निकल गए और हाल ही में महाराष्ट्र में भी वह गच्चा खा गयी। गुजरात में उसे फीकी जीत मिली वहीं हरियाणा में भी उसे बहुमत नहीं मिलने पर गठबंधन करना पड़ा। कर्नाटक में उपचुनावों के नतीजों से भले ही महाराष्ट्र का गम कुछ कम हो गया हो लेकिन इसे सैद्धांतिक जीत मान लेना सच्चाई से आँखें चुराने जैसा ही होगा। यूँ भी येदियुरप्पा की छवि भ्रष्ट नेता की है जो जेल तक जा चुके हैं। अतीत में भाजपा ने उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा दिया था लेकिन जातिगत समीकरणों के कारण उन्हें मजबूरन वापिस लाकर मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाना पड़ा। हालाँकि उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत और उपयोगिता दोनों साबित कर दीं। कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल (एस) की सरकार को गिराना येदियुरप्पा के ही बस की बात थी लेकिन उसके लिए भाजपा को जो भी करना पड़ा उससे उसका वैचारिक पक्ष कमजोर हुआ है। इसके पहले पूर्वोत्तर के राज्यों सहित गोवा में भी वह ऐसा कर चुकी है। लेकिन सत्ता की इस अंधी दौड़ में वह कहने को तो बहुत कुछ हासिल कर रही है लेकिन जो उसे खोना पड़ रहा है उसका मूल्य सत्ता से कई गुना ज्यादा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी