Monday, 13 January 2020

वामपंथ : डूबते को जेएनयू का सहारा



दिल्ली की प्रसिद्ध जेएनयू में बीते दिनों हुआ बलवा कहने को तो शांत हो गया लेकिन उसके कारण वामपंथी हताशा एक बार फिर उजागर हो गयी। 5 जनवरी की शाम वहां कुछ नकाबपोशों द्वारा की गयी मारपीट का देश भर में जबर्दस्त प्रचार हुआ। लेकिन उसके पहले जो कुछ भी हुआ उस बारे में लोगों को ज्यादा नहीं पता। धीरे-धीरे जो जानकारी आई उसके अनुसार नये सेमेस्टर का पंजीयन रोकने के लिए वामपन्थी छात्रों द्वारा सम्बंधित दफ्तर की समूची संचार व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया। उन्हें रोकने वाले छात्रों को पीटा भी गया। फीस और छात्रावास शुल्क में वृद्धि के विरोध में चलाये जा रहे आन्दोलन के अंतर्गत वामपंथी जेएनयू में समूची शैक्षणिक गतिविधियों को महज इसलिए ठप्प किये हुए हैं जिससे कि उनकी स्वच्छन्दता पर लगाये जा रहे नियंत्रण प्रभावशील न हो सकें। इसके पीछे शिक्षकों का भी वह समूह है जो वामपंथी विचारधारा में रंगा हुआ है। इनमें तमाम ऐसे लोग हैं जो इसी विवि के छात्र रह चुके हैं। पूरे फसाद की जड़ यही है कि वामपंथी जेएनयू में अपने एकाधिकार को मिल रही चुनौती से भन्नाए हुए हैं। उनकी ये सोच केवल इस संस्थान में ही नहीं बल्कि दिल्ली के जामिया मिलिया, अलीगढ़ मुस्लिम विवि, हैदराबाद के उस्मानिया और बंगाल के जादवपुर विवि जैसे उन तमाम शिक्षण संस्थानों में भी साफ दिखाई दे रही है जहां वामपन्थी ताकतों को वैचारिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। ये स्थिति अचानक नहीं बनी। बीते पांच सालों में केंद्र की सत्ता द्वारा वामपंथी और उनकी आड़ में सक्रिय देश विरोधी तत्वों की गतिविधियों पर रोक लगाये जाने के बाद से ही सुनियोजित तरीके से उक्त शिक्षण संस्थानों में अराजकता और अव्यवस्था का माहौल बनाकर उसे युवा असंतोष का नाम देकर भ्रम फैलाया जा रहा है। उनके अलावा भी अन्य विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलित हुए लेकिन उनकी संख्या मु_ी भर रही। कुल मिलाकर वामपन्थी और उनके साथ जुड़े बाकी देशविरोधी मानसिकता वाले छात्र ही इस बवाल के पीछे हैं। इस सन्दर्भ में ये बात बिलकुल सही है कि पूरे घटनाक्रम का उद्देश्य केवल और केवल देश के भीतर अराजक वातावारण का निर्माण करना है। इस बारे में एक टीवी वार्ता के दौरान पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने जेएनयू में हुए ताजा फसाद को लेकर एक तरफ  तो जहां विवि प्रशासन और दिल्ली पुलिस की तीखी आलोचना की वहीं उन्होंने पंजीयन रोके जाने के लिए सर्वर रूम को नुकसान पहुँचाने के लिए वामपंथी छात्रसंघ की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। लगे हाथ उन्होंने ये भी कहा कि सत्तर के दशक में वामपंथी शासन के दौरान कोलकाता विवि में भी वामपंथी छात्र संगठनों ने इसी तरह की हिंसक हरकतें कीं जिनके परिणामस्वरूप उस प्रतिष्ठित संस्थान की छवि धीरे-धीरे खऱाब होती चली गई। छात्र आंदोलनों से उत्पन्न हालातों ने अलाहाबाद विवि की भी गरिमा को पहले जैसा नहीं रहने दिया। इस बारे में चौकाने वाली बात ये है कि जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विवि के देशविरोधी तत्वों का गठजोड़ होने के बाद उसमें जादवपुर विवि और जामिया मिलिया जैसे अन्य संस्थान भी जुड़ते चले गये। निश्चित रूप से ये आकस्मिक तौर पर नहीं हुआ। इसकी पृष्ठभूमि जेएनयू में 2016 में हुआ वह आन्दोलन है जिसमें भारत तेरे टुकड़े होंगे और कश्मीर की आजादी जैसे नारे खुले आम लगाए गए और वामपंथी संगठन उसके लिये दोषी लोगों के बचाव में आ खड़े हुए। उस दौर में पूरे देश में असहिष्णुता के नाम पर वामपंथी बुद्धिजीवी अवार्ड वापिसी अभियान चला रहे थे। चूंकि उसका निशाना केंद्र की मोदी सरकार थी इसलिए न सिर्फ  कांग्रेस बल्कि शेष गैर भाजपाई दल भी उनके सुर में सुर मिलाने लगे। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव ने वामपंथियों सहित पूरे विपक्ष को नकार दिया। बाकी दल तो कमोबेश इस देश की मिट्टी से जुड़े हुए हैं इसलिए उनके पास अभी भी वापिसी की संभावनाएं हैं लेकिन साम्यवादी विचारधारा आयातित होने की वजह से लगातार तिरस्कृत होती जा रही है। ऊपर से केंद्र सरकार ने कश्मीर संबंधी ऐतिहासिक फैसला कर अलगावादियों के हौसले पस्त कर दिए। बची खुची कसर नागरिकता संशोधन कानून के लागू होने ने पूरी कर दी। जेएनयू की छात्र राजनीति को पूरी तरह वामपंथी रंग तो दशकों पहले दे दिया गया था लेकिन हाल के कुछ सालों में जबसे लाल रंग फीका पडऩे का खतरा बढ़ा तबसे वामपंथी विचारधारा को अपने पाँव उखड़ते नजर आने लगे। कांग्रेस को इस खेल को समझना चाहिए क्योंकि उसका जितना नुकसान भाजपा ने नहीं किया उससे ज्यादा उन वामपंथी सलाहकारों ने कर दिया जो पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा जी तक के समय सत्ता के गलियारों में घुसकर समूची व्यवस्था को अपने मुताबिक मोडऩे में कामयाब होते रहे। शैक्षणिक और बौद्धिक गतिविधियों से जुड़े हर महत्वपूर्ण संस्थान पर छद्म रूप से वामपंथियों ने कब्जा जमा लिया जिसे कांग्रेसी समझ ही नहीं सके। दुर्भाग्य से आज भी वे इस षडयंत्र से अनभिज्ञ हैं। उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि वामपंथी राजनीति इस देश के हितों का सौदा करने वाली रही है। और बहुदलीय लोकतंत्र तथा अभिव्यक्ति की आजादी में साम्यवाद का कोई भरोसा नहीं है। मजदूर्रों और किसानों की हमदर्द बनी रहने वाली साम्यवादी पार्टियों की वजह से ही इस देश का किसान पूरी तरह सरकार पर निर्भर होकर अपना हुनर भूल बैठा वहीं श्रमिक आन्दोलन भी दिशाहीन होते-होते बिखराव का शिकार हो गया। अब केवल इस विचारधारा को जेएनयू जैसे कुछ संस्थानों का ही सहारा है। समाचार माध्यमों में बैठे साम्यवादी इसीलिये ऐसे संस्थानों में होने वाली किसी भी घटना को योजनाबद्ध तरीके से राष्ट्रीय स्तर का बना देते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 January 2020

इन्टरनेट : सर्वोच्च न्यायालय का संतुलित फैसला



सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 35 ए और 370 हटाये जाने के दौरान की गई प्रतिबंधात्मक व्यवस्थाओं पर अपना निर्णय सुनाते हुए जो भी टिप्पणियाँ कीं वे बेहद महत्वपूर्ण हैं। एक कश्मीरी पत्रकार और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद द्वारा प्रस्तुत याचिकाओं का निपटारा करते हुए तीन सदस्यों की पीठ ने धारा 144 के तर्कसंगत और वास्तविक आधार पर उपयोग पर बल देते हुए कहा कि बार-बार इसका उपयोग शक्ति का दुरूपयोग है। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य के प्रशासन को ये आदेश दिया कि वह धारा 144 और इन्टरनेट पर लगे प्रतिबंध संबंधी आदेशों को सार्वजनिक करे जिससे उन्हें उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सके। अदालत ने इन्टरनेट पर लगी रोक की एक सप्ताह में समीक्षा करते हुए नियमों का पालन करने की हिदायत भी दी और जरूरी सेवाओं के लिए उसे तत्काल शुरु करने कहा। लेकिन अपने निर्णय में अदालत ने जो टिप्पणियाँ कीं वे अध्ययन और विमर्श का विषय हैं। अदालत ने एक तरफ जहां इन्टरनेट को अभिव्यक्ति और व्यवसाय के लिए अनिवार्य बताया वहीं ये कहने में भी परहेज नहीं किया कि उसका काम स्वतंत्रता के अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कायम रखना है। स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच हमेशा टकराव रहा। ये नहीं कहा जा सकता कि किसकी ज्यादा जरूरत है , दोनों के बीच संतुलन कायम करने की जरूरत है। अदालत का ये कथन ही संदर्भित फैसले की आत्मा है। अदालत ने इन्टरनेट को सम्वैधानिक अधिकार तो माना किन्तु इस आधार पर उसे मौलिक अधिकार की श्रेणी में नहीं रखा क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने उसकी मांग नहीं की थी। धारा 144 के बारे में भी फैसले में ये कहा गया कि वह खतरे की आशंका पर भी लगाई जा सकती है। दोनों मुद्दों पर अदालत ने एक तरफ जहां नागरिकों के अधिकार और कानून के दुरूपयोग को रोकने के प्रति अपनी सतर्कता प्रगट की वहीं दूसरी तरफ ये कहकर कि उसका काम स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कायम करना है अपने दायित्वबोध का भी परिचय दे दिया। चूंकि याचिका और फैसले का सीधा सम्बन्ध जम्मू - कश्मीर से है इसलिए स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की बात बेहद प्रासंगिक और साथ ही महत्वपूर्ण हो जाती है। राज्य में अलगाववाद और उसकी आड़ में पनपे आतंकवाद की वजह से कश्मीर घाटी में विशेष रूप से नागरिक अधिकार और स्वतंत्रता मजाक बनकर रह गये थे। इन्टरनेट के उपयोग के जिस संवैधानिक अधिकार को सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान्य किया उसका दुरूपयोग जिस तरह से हो रहा था उसके बाद उस पर प्रतिबन्ध लगाया जाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक जरूरी कदम था। इन्टरनेट के कारण देश विरोधी ताकतों के बीच संपर्क बना रहता था। मोबाइल का उपयोग भी अलगाववादियों ने देश को नुकसान पहुँचाने के लिए किया। ये बात साबित हो चुकी है कि बीते कुछ महीनों में घाटी में आतंकवादी गतिविधियों पर नियन्त्रण लगने में मोबाईल और इन्टरनेट पर लगे प्रतिबन्ध काफी सहायक रहे। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस स्पष्टता के साथ सरकार को उसकी सीमाओं का स्मरण करवाते हुए दायित्वों की जरूरत पर भी बल दिया वह उन लोगों के लिए भी संकेत है जो इस फैसले को सरकार की हार बताते घूम रहे हैं। इन्टरनेट अभिव्यक्ति और व्यावसायिक जरूरतों के लिहाज से एक ऐसी जरूरत बन गई है जिसके अभाव में किसी इंसान की अधिकतर गतिविधियां ठप्प होकर रह जाती हैं। लेकिन उसके साथ भी विज्ञान अभिशाप है या वरदान वाली बहस जुड़ गई है। दुनिया भर को जोडऩे वाली यह तकनीक अपने आप में बेजोड़ हैं। लेकिन कश्मीर घाटी में इसका जिस काम के लिये उपयोग हुआ उससे इसकी नकारात्मकता भी उजागर हो गयी। सरकार से ये अपेक्षा करना कि वह जम्मू - कश्मीर में लगाए गये प्रतिबंधात्मक आदेशों का प्रकाशन करते हुए जनता को उसे चुनौती देने का अधिकार प्रदान करे पूरी तरह सही है लेकिन संदर्भित याचिकाओं पर फैसला देने में जल्दबाजी से बचने की अदालत की नीति ने अपने आप ही ये साबित कर दिया कि इन्टरनेट रोकने का सरकार का निर्णय समय की मांग थी। जैसे कि संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक घाटी सहित पूरे राज्य में प्रशासनिक ढांचे का पुनर्गठन हो चुका है। खूनी खेल पर भी रोक लगी है। और अलगाववादी ताकतों का हौसला भी कमजोर पड़ रहा है। आम जनता भी अमन की पक्षधर बताई जा रही है। सरकार अपनी तरफ  से ही मोबाइल और इन्टरनेट शुरू करने के इरादे जता चुकी थी। ये सब देखते हुए न्यायालय के फैसले को सही नजरिये से देखना चाहिए। स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कायम रखने को अपनी जिम्मेदारी बताकर सर्वोच्च न्यायालय ने थोड़े में ही बहुत कुछ कह दिया।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 January 2020

विपक्षी एकता : सर्वमान्य नीति और नेता का अभाव बाधक



विपक्षी एकता की नई कोशिश अभी से सवालिया घेरे में आ गयी है। 13 जनवरी को कांग्रेस द्वारा दिल्ली में आमंत्रित विपक्षी दलों की बैठक में आने से तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने खुले तौर पर इंकार कर दिया। बसपा की तरफ  से मायावती ने भी बैठक में शरीक होने के प्रति अरुचि दिखा दी है। शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत के अनुसार उनकी पार्टी को अभी तक न्यौता ही नहीं मिला। समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों को अपने झंडे के तले लाने की कांग्रेसी मुहिम नई नहीं है। विगत लोकसभा चुनाव के पूर्व भी सोनिया जी के बुलाने पर विपक्षी पार्टियों के नेता एक साथ आये और हाथ उठाकर फोटो भी खिंचवाया। देश के अनेक राज्यों में विपक्ष की साझा रैलियाँ भी हुईं। जिनके जरिये ये दिखाने का भरपूर प्रयास हुआ कि भाजपा के विरोध में एक महागठबंधन बन गया है जो नरेंद्र मोदी की वापिसी को रोकने में कामयाब होगा। लेकिन ज्यों-ज्यों चुनाव करीब आते गए एकता का वह राग बेसुरा होने लगा। यद्यपि गठबंधन तो हुए लेकिन राष्ट्रीय की बजाय प्रांतीय स्तर पर। मसलन बंगाल में ममता अकेली लड़ीं। उप्र में सपा-बसपा ने कांग्रेस को किनारे कर दिया। उड़ीसा में बीजू जनता दल ने भी कांग्रेस को तवज्जो नहीं दी। तो हरियाणा में क्षेत्रीय दलों ने अपनी खिचड़ी अलग पकाई। वामपंथी दल भी कहीं साथ तो कहीं अलग रहे। इस प्रकार जितना ढोल पीटा गया उस हिसाब से कुछ भी नहीं हुआ। इसकी एक वजह ये रही कि भले ही कांग्रेस विपक्ष की अकेली पार्टी है जिसे राष्ट्रीय कहा जा सकता है किन्तु भाजपा विरोधी बाकी दल अब उसे पहले जैसा वजन नहीं देना चाहते। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि अधिकतर क्षेत्रीय दलों के पास जो वोट बैंक है वह कांग्रेस के खाते से ही निकला हुआ है। ऐसे में वे नहीं चाहेंगे कि वह फिर से मजबूत हो। उप्र में सपा ने तो एक बार कांग्रेस के साथ गठबंधन किया भी था किन्तु बसपा दूर ही रही। पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती ने अखिलेश यादव के साथ गठबंधन किया लेकिन चुनाव परिणामों के बाद दोनों की राहें जुदा हो गईं। दरअसल कांग्रेस की मुसीबत ये है कि वह पंजाब और छत्तीसगढ़ के अलावा कहीं भी अपनी दम पर सत्ता में नहीं है। पुडुचेरी में उसकी सरकार है जरूर लेकिन उसका कोई महत्व नहीं है। राजस्थान और मप्र में उसे बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा है। उसके अलावा जिन और राज्यों में कांग्रेस सरकार का हिस्सा है वहां भी उसकी हैसियत बेहद साधारण है। कर्नाटक में उसने जिस तरह से कटोरे में रखकर सत्ता कुमारस्वामी को सौंपी उससे उसकी कमजोरी साबित हो गई। महाराष्ट्र में जो ताजा राजनीतिक प्रयोग हुआ उसमें भी कांग्रेस का महत्व घटा। पूरी निर्णय प्रक्रिया पर शरद पवार हावी रहे। झारखंड में भी कांग्रेस हेमंत सोरेन के आभामंडल के समक्ष फीकी है। ऐसे में छोटे-छोटे दल भी पूरी तरह से उसका आधिपत्य मंजूर करने में हिचकते हैं। 13 तारीख की प्रस्तावित विपक्षी बैठक से ममता बैनर्जी का किनारा करना ही कांग्रेस के लिए बड़ा धक्का है क्योंकि विपक्ष में वे ही ऐसी एकमात्र ऐसी नेत्री हैं जो अपने दम पर बंगाल जैसे बड़े राज्य की सत्ता पर बनी हुई हैं। जिस वामपंथी किले को इंदिरा गांधी तक नहीं हिला सकीं उसे ममता ने धराशायी कर दिया। इसी तरह मायावती भी कांग्रेस की नाव में सवार होकर दलित वोटों पर अपना एकाधिकार नहीं छोडऩा चाहेंगी। अखिलेश यादव ने 2017 के विधानसभा चुनाव में राहुल को अपनी सायकिल पर बिठाया था लेकिन उसकी वजह से सपा को जबरर्दस्त नुकसान हुआ। ऐसे में केवल शरद पवार और थोड़ा-बहुत वामपंथी ही कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाना चाहेंगे। हालांकि लालू की राजद और हेमंत सोरेन की झामुमो जैसी पार्टियां कांग्रेस के साथ चिपकी हुई हैं लेकिन वे राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से महत्वहीन हैं। वामपंथी भी बंगाल में भले कांग्रेस से याराना बनाकर रखें लेकिन केरल में वे अपने प्रभावक्षेत्र में उसे घुसने नहीं देंगे। ये देखते हुए 13 जनवरी की बैठक कितनी कारगर होगी ये देखने वाली बात रहेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर नेतृत्व को लेकर भी अनिश्चितता है। श्रीमती गांधी कार्यकारी अध्यक्ष जरूर हैं लेकिन बीच-बीच में राहुल गांधी को दोबारा कमान सौंपे जाने की चर्चा चलने से विपक्षी दल बिचकने लगते हैं। जहां तक प्रियंका वाड्रा को आगे लाने की बात है तो वे उप्र में ही ज्यादा सक्रिय हैं। चूँकि सोनिया जी का स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं है कि वे देश भर में दौरा करते हुए विपक्षी एकता को पुख्ता आधार दे सकें इसलिए छोटी पार्टियां भी कांग्रेस को अब पहले जैसा महत्व नहीं देतीं। कुल मिलाकर कांग्रेस इस समय संक्रान्तिकाल से गुजर रही है। उसके पास नीति और नेता दोनों को लेकर अनिश्चितता है। शिवसेना को गले लगाकर वह तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की अपनी पहिचान को खतरे में डाल ही चुकी है। सीएए के विरोध के बहाने उसने विपक्ष को एकजुट करने का जो दांव चला है उसकी सफलता संदिग्ध ही है क्योंकि निकट भविष्य में दिल्ली, बिहार और बंगाल के जो विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें वहां के भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दल कांग्रेस को अपने ऊपर हावी नहीं होने देंगे। अरविन्द केजरीवाल, तेजस्वी यादव और ममता बैनर्जी वैसे तो भाजपा के घोर विरोधी हैं लेकिन वे कांग्रेस को भी ताकतवर होते नहीं देखना चाहते। और यही देश की सबसे पुरानी पार्टी की दिक्कत है। दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व और गांधी परिवार के विकल्प के अभाव के चलते कांग्रेस को अब छोटी पार्टियां भी भाव नहीं दे रहीं। विपक्षी एकता की कोशिशों का अपना महत्व है लेकिन सर्वमान्य नेता और नीति की गैर मौजूदगी उसमें बाधक बन जाती है। श्रीमती गांधी के अलावा शरद पवार, एच डी देवगौड़ा, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे नेता अब वृद्धावस्था का शिकार हैं। उनके पीछे कोई भी ऐसा चेहरा नहीं दिखता जो पूरे देश में प्रभाव और पहिचान रखता हो। ऐसे में कांग्रेस की ताजा कोशिश किसी मुकाम पर पहुँचती नहीं लगती। नवीन पटनायक, ममता बैनर्जी, के. चंद्रशेखर राव, जगन मोहन रेड्डी, जैसे क्षेत्रीय छत्रपों के बिना विपक्षी एकता का वैसे भी कोई अर्थ नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 January 2020

अब सारी उम्मीदें बजट पर टिकी हैं



नये साल की खुशियाँ खत्म होते ही भारत में नए वित्तीय वर्ष के बजट का इन्तजार शुरू हो जाता है। पहले फरवरी के अंत में पेश होने वाला बजट मोदी सरकार के आने के बाद एक फरवरी को लोकसभा में पेश हो जाता है। इसका लाभ ये हुआ कि 31 मार्च को वित्तीय वर्ष समाप्त होने के पहले ही संसद नए बजट को मंजूरी दे देती है और नये आवंटन भी अप्रैल में ही होने से नए कारोबारी साल का काम समय पर शुरू हो जाया करता है। अतीत में ये शिकायत आम थी कि नए बजट में स्वीकृत की गयी राशि सम्बन्धित विभाग को मई और यहाँ तक कि जून माह तक मिल पाती थी। तब तक मानसून की दस्तक होने से मैदानी विकास कार्य विलम्बित होते थे और बड़ी मात्रा में बजट राशि अनुपयोगी पड़ी रह जाती थी। बीते पांच वर्षों में ये विसंगति दूर हुई है। इस वर्ष भी आम बजट एक फरवरी को पेश होने का ऐलान हो चुका है सरकारी विभागों से इस सम्बन्ध में भेजे गये प्रतिवेदनों के बाद केंद्र सरकार का वित्त विभाग बजट को अंतिम रूप देने में लग जाता है। इस समय वही प्रक्रिया तेजी से चल रही है। लेकिन इस वर्ष बजट का इन्तजार कुछ ख़ास वजहों से ज्यादा हो रहा है। मोदी सरकार के पहले पांच साल आशाएं जगाने वाले रहे। उम्मीदें आसमान छूने लगीं। अच्छे दिन का इन्तजार बेसब्री बढ़ाने लगा। लेकिन वैसा कुछ हुआ नहीं जिसका वायदा किया गया था। बावजूद इसके देश ने प्रधानमन्त्री पर भरोसा दिखाते हुए उन्हें 2019 के चुनाव में पहले से भी ज्यादा बहुमत देकर सत्ता सौंप दी। मतदाताओं को ये भरोसा हो चला था कि भले ही 2014 में किये वायदों को पूरा करने में सरकार सफल नहीं हुई लेकिन उसकी नीति और नीयत साफ़ थी। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि आम जनता ने समृद्धि के साथ देश की सुरक्षा को भी बराबर से महत्व दिया और निजी हितों को राष्ट्रहित की तुलना में तुच्छ समझते हुए एक निर्णायक जनादेश नरेंद्र मोदी को प्रदान करते हुए उनके विरोधियों को बुरी तरह निराश कर दिया। बीते पांच वर्ष में केंद्र सरकार ने जो गलतियाँ कीं उन्हें मतदाता ने ये सोचकर भी नजरअंदाज कर दिया कि जो काम करता है उसी से चूक होती है। उल्लेखनीय है अपनी निजी ईमानदारी और पेशेवर विद्वता के बावजूद डा. मनमोहन सिंह की सरकार फैसले नहीं कर पाने वाली सरकार के रूप में बदनाम होने से जनता की निगाहों में उतर गयी थी। उस लिहाज से श्री मोदी दुस्साहासिक फैसले लेने वाले साबित हुए। हालाँकि उनकी वजह से समाज के हर वर्ग को अकल्पनीय परेशानियां उठानी पडीं। लेकिन उसके बाद भी लोगों को प्रधानमंत्री की नेकनीयती पर भरोसा बना रहा। 2019 का जनादेश पूरी तरह श्री मोदी की निजी साख का परिणाम कहा जाना चाहिए और वह गलत भी नहीं है। लेकिन उसके बाद बीते छह महीनों में राजनीतिक मोर्चे पर ऐतिहासिक कार्य करने की बावजूद मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। हालत सुधरना तो दूर रहा और भी बिगडऩे की नौबत आ गई। बेरोजगारी के आंकड़े बीते चार दशक के सर्वोच्च स्तर तक जा पहुँचे। बाजार में मांग घटते जाने से उत्पादन में गिरावट आती चली गई । निर्यात में कमी के वजह से व्यापार घाटा भी चिंताजनक स्थिति में आ पहुँचा। अर्थशास्त्र के अंतर्गत जितने भी नकारात्मक मापदंड हो सकते हैं , भारतीय अर्थव्यवस्था के उसी मुकाम पर पहुंचने की बात न केवल राष्ट्रीय वरन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रचारित हो रही है। सरकार के विरोधियों के दावे भले ही नजरअंदाज कर दिए जाएँ किन्तु उसके अपने समर्थक खेमे में भी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता का माहौल है। हालांकि इसके लिए वर्तमान सरकार को पूरी तरह कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि अधिकृत तौर पर ये माना जाता है कि 2011 से ही इसकी शुरुवात हो चुकी थी जो वैश्विक कारणों से आर्थिक मंदी की शक्ल में जमकर बैठ गयी। हालांकि अर्थशास्त्रियों का बड़ा वर्ग नोटबंदी और जीएसटी को इसके लिए जिम्मेदार मानता है। भाजपा को हालिया विधानसभा चनावों में जो असफलता हाथ लगी उसके लिए भी आम तौर पर आर्थिक कारणों को जिम्मेदार माना जा रहा हैं। प्रधानमन्त्री की निजी लोकप्रियता और क्षमता पर भी इसी कारण सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में अब आगामी बजट ही वह जरिया है जो अर्थव्यवस्था को लेकर छाई निराशा को दूर कर सकता है। भले ही सरकार और रिजर्व बैंक ने बीते महीनों में कुछ उपाय किये लेकिन उनका जैसा असर अपेक्षित था वैसा नहीं हुआ। जनाकारों का कहना है कि ये उपाय दीर्घकालीन लाभ देंगे। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा कुछ किये जाने की जरुरुत है जिससे उद्योग - व्यापार जगत के साथ ही जनता में भी ये भाव पैदा हो कि सरकार आर्थिक समस्याओँ को लेकर न केवल चिंतित है अपितु उनके निराकरण के लिए प्रयासरत भी है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन कितनी राहत दे सकेंगी ये अभी कह पाना सम्भव नहीं है किन्तु यदि ये अवसर भी चला गया तब मोदी सरकार के पास देश में छाई निराशा को दूर करना बेहद कठिन होगा। बेहतर होगा आगामी बजट ज्यादा सैद्धांतिक न होकर थोड़ा व्यवहारिक भी हो क्योंकि अब जनता का धैर्य भी जवाब देने लगा है । मोदी सरकार की राष्ट्रवादी सोच और नीतियाँ पूरी तरह सही हैं लेकिन आज के दौर में आर्थिक नीतियाँ सब पर भारी पड़ जाती हैं। खाली जेब तमाम खुशियों और उपलब्धियों का आनंद छीन लेती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 January 2020

ईरान : अमेरिका का दांव उलटा पडऩे के आसार



पश्चिम एशिया का संकट और भी गहराता जा रहा है। ईरान तो खैर सीधे मुकाबले में खड़ा हुआ है लेकिन अब ईराक ने भी अमेरिका को आँखें दिखानी शुरू कर दीं। उसकी संसद ने प्रस्ताव पारित करते हुए अपने देश में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को देश छोडऩे का आदेश दे दिया। उल्लेखनीय है अमेरिका द्वारा ईरान के फौजी जनरल सुलेमानी की ह्त्या ईराक के बग़दाद हवाई अड्डे पर ही ड्रोन से हवाई हमला कर की गई थी। कुछ दशक पूर्व ईराक और ईरान के बीच बहुत लम्बी जंग चली थी जिसमें लाखों लोग मारे गये। लेकिन मौजूदा हालात में दोनों पड़ोसी देश अमेरिका के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं जो इस अंचल में आया बड़ा बदलाव है। जैसी जानकारी मिली है उसके मुताबिक सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ईराक, बहरीन जैसे अनेक खाड़ी देशों में अमेरिका के सैनिक और अस्त्र-शस्त्र मौजूद हैं। वैसे तो दूसरे महायुद्ध के बाद शीतयुद्ध के मद्देनजर अमेरिका ने एक तरह से पूरी दुनिया में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाई है। उसके समुद्री बेड़े जगह-जगह तैनात हैं। कई देशों में तो उसके स्थायी सैन्य अड्डे हैं। हालांकि पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और इजरायल ही उसके परम समर्थक रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे कुछ और देश भी उसकी शरण में आते गए। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अमेरिका ने अपनी कूटनीति, सैन्य बल और आर्थिक सम्पन्नता से इस्लामिक देशों के बीच भी फूट डालने में कामयाबी हासिल कर ली। बीती सदी के अंत में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर बलात कब्जा किया तब अमेरिका को इस्लामिक देशों के बीच बतौर संरक्षक बनकर घुसने का अच्छा अवसर मिल गया। स्मरणीय है सद्दाम ने इस्लाम को मानने के बावजूद ईराक को आधुनिक बनाने में काफी योगदान दिया था। जबकि शाह पहलवी के रहते आधुनिकता की राह पर चलने वाला ईरान अयातुल्ला खोमैनी का राज आते ही कट्टरवादी इस्लामिक देश बन बैठा। अमेरिका ने समय रहते अरब जगत में आ रहे वैचारिक बदलाव का फायदा उठाया और छोटे-छोटे अनेक अरबी देशों को कट्टरपंथी पड़ोसियों का भय दिखाकर वहां अपनी सैन्य टुकडिय़ां तैनात कर दीं। जिन अरबी मुल्कों में अभी भी पुराना शाही शासन चला आ रहा है उन्हें भी इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर आ रहे बवंडर में अपनी सत्ता खतरे में नजर आई और वे अमेरिका की छतरी के नीचे आ गए। लेकिन ईरान पर उसका जादू नहीं चल पाया और उसने अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखते हुए अमेरिका के झंडे तले आने से इंकार कर दिया। दरअसल 1979 में जब खोमैनी ने शाह पहलवी की सत्ता लटकर घड़ी की सुइयां उल्टी घुमाते हुए ईरान को कट्टरवादी इस्लामिक देश बना दिया तभी से अमेरिका की नजर में वह खटक रहा था। लेकिन उसे खाड़ी में घुसने का मौका और बहाना नहीं मिल रहा था। कुवैत पर सद्दाम के हमले ने अमेरिका को वहां जमने का रास्ता दे दिया। उसी के बाद से राजशाही से संचालित अनेक अरबी देश वाशिंगटन को अपना रहनुमा मानकर शरणागत हो गये। ये कहना भी प्रासंगिक होगा कि फिलीस्तीन की आजादी के लिए लडऩे वाले यासर अराफात की मौत के बाद तो अरब जगत में अमेरिका से ऊंची आवाज में बात करने वाला कोई व्यक्तित्व बचा ही नहीं। एक दौर था जब सोवियत संघ अमेरिका को पश्चिम एशिया में शह दिया करता था लेकिन उसके विघटन के बाद रूस में वह दमखम नहीं बचा। यद्यपि ब्लादिमीर पुतिन के सत्ता में आने के बाद उसने एक बार फिर अमेरिका को चुनौती देने का साहस दिखाया जिसका प्रमाण सीरिया को दिया गया उसका संरक्षण है किन्तु उसका प्रभावक्षेत्र अमेरिका जैसा व्यापक नहीं हो सका। मौजूदा संकट के पीछे अमेरिका की सोच काफी दूरगामी है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हालात जैसे बन गये हैं उनके बाद अब उसको वहां बने रहना कठिन हो रहा है। ऐसे में उसे पश्चिम एशिया के साथ ही मध्य एशिया पर नजर रखने के लिए कोई जगह चाहिए। लादेन और बगदादी का सफाया करने के बाद अब अरब जगत में इस्लामिक कट्टरवाद का झंडा बुलंद करने वाला ईरान ही बच रहता है। पूरे परिदृश्य पर नजर डालें तो दिखाई देगा कि यासर आराफात, कर्नल गद्दाफी और सद्दाम हुसैन जैसे ताकतवर नेताओं का अभाव अरब जगत में महसूस किया जा सकता है। सऊदी अरब के शाही परिवार में भी फूट के बीज अमेरिका ने बो दिए हैं और बड़ी बात नहीं कुछ सालों के भीतर इस्लाम का यह सबसे प्रमुख देश भी शाही शासन से मुक्त होकर राजनीतिक अनिश्चितता में फंसकर रह जाए। कहने को तो अमेरिका सऊदी अरब का संरक्षक है लेकिन उसे ये पता है कि दुनिया भर में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद को आर्थिक सहायता देने में सऊदी अरब का सबसे अधिक योगदान है। इसके पीछे शाही परिवार का उदेश्य अपनी सत्ता बचाकर रखना है। इस प्रकार पश्चिम एशिया में आज की सूरत में केवल ईरान ही है जो अभी तक अमेरिका के इशारों पर नाचने से इंकार करता रहा। लेकिन ताजा तनाव के बाद अरब जगत एक अदृश्य भय से गुजर रहा है। जिस तरह से अमेरिका ने जनरल सुलेमानी को मारा उससे पश्चिम एशिया के अनेक शासक दहशत में डूब गये हैं। उन्हें ये डर भी सताने लगा है कि अमेरिका की हाँ में हाँ मिलाने के फेर में कहीं उनके देश में भी इस्लामिक आतंकवाद सिर न उठा ले। ये बात सौ फीसदी सही है कि अरब ही नहीं अपितु दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले अधिकांश मुस्लिम अमेरिका को इस्लाम का दुश्मन मानते हैं। और उस दृष्टि से अरब देशों में सत्ता में बैठे हर शासक को दिखावे के लिए ही सही लेकिन अमेरिका का विरोध करना पड़ता है। लेकिन मौजूदा हालातों में अमेरिका के लिए भी शोचनीय स्थिति बन गयी है जिसमें इधर कुआं उधर खाई है। ईराक के साथ ही अन्य अरबी देश सुलेमानी की हत्या के तरीके को पचा नहीं पा रहे हैं। बताया जा रहा है कि फौजी जनरल होने के बावजूद सुलेमानी अरब देशों के बीच एकता की कूटनीतिक पहल कर रहा था जिसमें उसे काफी सफलता भी मिलने लगी थी। इसीलिए अमेरिका ने उसे रास्ते से हटा दिया। लेकिन इसके बाद पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईराक से आई प्रतिक्रियाएं उसे चिंतित कर रही हैं। गत दिवस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रधानमन्त्री से फोन पर जो लम्बी बात की उसका मुख्य विषय ईरान संकट ही था। हो सकता है भारत और ईरान के नजदीकी रिश्तों को देखते हुए अमेरिका बीच का रास्ता निकालने के लिए श्री मोदी की सेवाएं लेना चाहता हो। अरब जगत में उठे गुस्से के सैलाब से ट्रंप भी सतर्क हो उठे हैं। भारत भी चाहता है कि ये विवाद आगे न बढ़े क्योंकि बीते कुछ दिन में ही पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ गए हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 January 2020

जेएनयू : विवाद की जड़ जानना भी जरूरी



दिल्ली के जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विवि)) परिसर में बीते रविवार की शाम कुछ नकाबपोशों ने घुसकर जो मारपीट की उसके दृश्य टीवी चैनलों के जरिये पूरे देश ने देखे। मारपीट करने वाले कौन थे ये अभी तक पता नहीं चल पाया है लेकिन घटना के तुरंत बाद ही ये आरोप लगाया जाने लगा कि नकाबपोश अभाविप (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) के थे जिसे भाजपा समर्थित छात्र इकाई माना जाता है। चूंकि जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष भी हमले में घायल हो गईं इसलिए वामपंथी लॉबी के प्रचार को और बल मिल गया। पूरी घटना विवि. परिसरों के भीतर छात्रों के गुटों में होने वाले सामान्य झगड़े तक ही सीमित रहती लेकिन प्रो. योगेन्द्र यादव ने जेएनयू पहुंचकर परिसर में घुसने की कोशिश की किन्तु पुलिस ने उन्हें रोक लिया। इस दौरान उनके साथ धक्कामुक्की भी हुई जिसके बाद उन्होंने पूरी तरह पेशेवर राजनेता की तरह वामपंथी धारा के अनुरूप बयान देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे सीताराम येचुरी, डी. राजा और ऐसे ही अन्य नेता भी जेएनयू पहुंच गये। घायल छात्रों को देखने कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा अस्पताल जा पहुंची। राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल के ट्वीट भी आने लगे। जो कुछ भी हुआ वह दर्दनाक और शर्मनाक कहा जाएगा। जेएनयू देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में माना जाता है। लेकिन बीते काफी समय से इसकी चर्चा नकारात्मक कारणों से होने लगी है। इसकी वजह वहां वामपंथी एकाधिकार के लिए उत्पन्न खतरा ही है। एक समय था जब इस संस्थान में छात्र और शिक्षकों में वामपंथी रुझान वाले ही ज्यादा थे। दूसरी विचारधारा के लोगों की हालत दांतों के बीच में जीभ जैसी थी। लेकिन कुछ साल पहले से जब वहां अभाविप ने भी छात्र राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना शुरू की तबसे वामपंथी कुनबे के पेट में दर्द शुरू हो गया। गौरतलब ये है कि कहने को तो कांग्रेस की छात्र इकाई एएसयूआई भी जेएनयू में सक्रिय है लेकिन उसका होना न होना एक जैसा है। अभाविप का जनाधार बढऩे के पूर्व जेएनयू में विभिन्न वामपंथी गुट ही आपस में टकराते रहते थे। कुछ साल पहले जब वहां छात्रसंघ चुनाव में अभाविप का पदाधिकारी जीत गया तब वामपंथी गुटों को अपने वर्चस्व के लिए खतरा महसूस हुआ और उसके बाद के चुनावों में वे एकजुट होकर मैदान में उतरे। योगेन्द्र यादव जिस आम आदमी पार्टी के संस्थापक रहे उसकी छात्र इकाई ने भी जेएनयू में हाथ आजमाया लेकिन निराशा हाथ लगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि छात्रसंघ राजनीति में अभाविप अकेली ही संयुक्त वामपन्थी ताकत की प्रतिद्वंदी है। अभाविप का प्रभाव बढ़ते जाने का असर ये हुआ कि जेएनयू परिसर और छात्रावासों में होने वाली आपत्तिजनक गतिविधियों की जानकारी बाहर आने लगी। बेहद मामूली फीस होने के कारण यहां पढऩे वाले छात्रों का खर्च बहुत कम है। इसलिये वे लम्बे समय तक किसी न किसी बहाने छात्रावासों में पड़े रहते हैं। कई छात्र तो 40-45 साल के होने पर भी शोध की आड़ में वहां जमे हुए हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने जब शिक्षण और छात्रावास शुल्क में वृद्धि की तो छात्रों ने आन्दोलन शुरू कर दिया। अभाविप ने भी उसमें समर्थन दिया। सरकार ने काफी कुछ रियायत दे दी और आगे विचार का आश्वासन भी दिया जिसके बाद अभाविप तो आन्दोलन से अलग हो गयी लेकिन वामपंथी छात्र संगठन अड़े हुए हैं। मौजूदा विवाद के पीछे भी यही आन्दोलन है। नए सेमेस्टर हेतु छात्रों के पंजीयन की अंतिम तिथि घोषित हो चुकी थी। अधिकतर छात्र उस हेतु प्रयासरत थे किन्तु वामपंथी छात्रसंघ पंजीयन को बाधित कर परीक्षा को रोके रखना चाहते थे। रविवार 5 जनवरी को पंजीयन की आखिऱी तिथि थी। एक दिन पहले से छात्रसंघ पदाधिकारी पंजीयन करवाने आये छात्रों को रोकने का काम कर रहे थे जिस कारण छुटपुट तनाव था जो कि जेएनयू के लिए सामान्य बात है। लेकिन जब उन्हें लगा कि बहुमत उनके विरुद्ध जा रहा है तब उन्होंने पंजीयन कार्यालय की संचार व्यवस्था तहस नहस कर डाली। इसका विरोध करने वाले छात्रों को भी वामपंथियों ने धमकाया और कुछ के साथ हाथापाई किये जाने की भी खबर है। ऐसे छात्रों में अनेक ऐसे भी थे जिनका किसी राजनीतिक विचारधारा से सम्बन्ध नहीं है और वे केवल पढऩे के लिए जेएनयू में आये हैं। छात्रसंघ चुनाव में वामपंथी उम्मीदवारों को वोट देने वाले सभी छात्र उनके वैचारिक अनुयायी हैं ये मान लेना गलत है। ऐसे अनेक छात्र पंजीयन रोके जाने का विरोध कर रहे थे। नकाबपोश कौन थे, वे परिसर में कैसे घुसे, पुलिस की क्या भूमिका रही ये सब जांच का विषय हैं। हिंसा करने वाले और उसे संरक्षण देने वाले किसी भी व्यक्ति या विचारधारा का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन जेएनयू या किसी अन्य शिक्षा संस्थान में एक ही विचारधारा का पोषण किया जाना कहां तक उचित है? जेएनयू में वैचारिक स्वतंत्रता और जागरूकता अच्छी बात है लेकिन उसके नाम पर केवल साम्यवादी विचारधारा थोपने की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। किसी विवि. में कश्मीर की आजादी और देश के टुकड़े-टुकड़े होने जैसे नारे लगाने वालों पर शिकंजा कसा जाना किस तरह से अनुचित है, ये बड़ा सवाल है। बीते रविवार जो हुआ उसके लिये यदि अभाविप जिम्मेदार है तो बेशक उसके विरुद्ध कानून सम्मत कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन विवि की परीक्षा को बाधित करने वाले छात्रसंघ के नेताओं का कृत्य भी तो अपराध की श्रेणी में आता है। प्रौढ़ावस्था में प्रविष्ट होने के बाद भी जेएनयू में जमे बैठे अंकलनुमा छात्रों का लक्ष्य क्या है ये तो वे ही जानें किन्तु अधिकतर छात्र ऐसे हैं जो समय पर परीक्षा पास करने के बाद अपनी राह चुनना चाहते हैं। ऐसे में परीक्षा रोकने से ऐसे छात्रों का जो नुकसान होता है उसके बारे में क्या योगेन्द्र यादव और सीताराम येचुरी कभी सोचते हैं? डी. राजा की तो बेटी भी जेएनयू की छात्रा है। गत दिवस इस संस्थान के पूर्व छात्र रहे विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने कहा भी कि वे जिस जेएनयू में पढ़े उसमें टुकड़े-टुकड़े गैंग नहीं होती थी। जयशंकर भारतीय विदेश सेवा के बेहतरीन अधिकारी माने जाते हैं। जब उन्हें मोदी सरकार में विदेश सचिव बनाया गया तब विपक्ष ने भी उनके चयन की तारीफ़  की थी। दोबारा सत्ता में आने पर नरेंद्र मोदी ने उन्हें विदेश मंत्री बना दिया। उन पर आज तक किसी विचारधारा का ठप्पा नहीं लगा। ऐसे में उनकी ताजा टिप्पणी का संज्ञान लिया जाना जरूरी है। जेएनयू का ताजा बवाल दरअसल किसी तात्कालिक घटना का नतीजा न होकर वामपंथी प्रभुत्व को मिल रही कड़ी चुनौती का परिणाम है। परिसर में सीसी कैमरे लगाने, महिला छात्रवासों में पुरुष छात्रों का बेरोकटोक प्रवेश और देर रात तक स्वछंदता के माहौल पर रोक जैसे क़दमों को अभिव्यक्ति की आजादी पर आघात मानकर प्रलाप करने वाले लोग दरअसल कुंठाग्रस्त हैं। कन्हैयाकुमार को रातों-रात राष्ट्रीय नेता बनाने की कार्ययोजना फ्लॉप हो चुकी है। गुजरात में हार्दिक पटेल का आकर्षण भी ढलान पर है। बंगाल का वामपन्थी किला मलबे में तब्दील हो चुका है। त्रिपुरा में भी साम्यवादी सत्ता पतन का शिकार हो गयी। केरल में ही उसका बचा खुचा आधार है जिसे जबरदस्त चुनौती मिलने लगी है। ऐसे में दुष्प्रचार ही एकमात्र सहारा बच रहा है, वामपंथियों के पास। रही बात बाकी पार्टियों और नेताओं की तो उनकी नीतिगत पहिचान नष्ट होने से वे भी अंधे विरोध की राह पर चल पड़ते हैं। जेएनयू में हुई मारपीट के विरोध में आसमान सिर पर उठाने वालों को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि विवि के सैकड़ों छात्रों को परीक्षा देने रोकने का षडयंत्र रचने वाले क्या असामाजिक तत्व नहीं हैं और उन्हें संरक्षण देना किस तरह की सियासत है? जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विवि के छात्रों का बिना देर किया जेएनयू जा पहुंचना महज संयोग नहीं हो सकता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 January 2020

ईरान में लगी आग से झुलस सकते हैं भारतीय हित



ऐसा लगता है पश्चिम एशिया की किस्मत में शांति से रहना नहीं है। बीते तकरीबन तीन दशक से इस्लाम के प्रभाव वाले इस इलाके में बारूदी धुंआ थमने का नाम ही नहीं ले रहा। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी जैसे ताकतवर नेताओं को मौत के घाट उतारने के बाद अमेरिका ने सीरिया पर निगाहें जमाईं और आईएसआईएस नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन को नेस्तनाबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। इस संगठन के मुखिया बगदादी को ओसामा बिन लादेन के बाद सबसे खतरनाक मानकर अमेरिका ने जबर्दस्त अभियान चलाया। उसके चलते सीरिया गृहयुद्ध की चपेट में आ गया और लाखों बेगुनाह लोग मारे गए। जान बचाकर लाखों शरणार्थी यूरोप के अनेक देशों में समुद्री मार्ग से जा पहुंचे। हालात यहाँ तक बने कि रूस भी बीच में कूद पड़ा। यहाँ तक लगने लगा कि सीरिया संकट तीसरे विश्व युद्ध का कारण बन जाएगा। फ्रांस में हुए आतंकी हमले के बाद वह भी जंग में कूदा। वैसे भी सद्दाम के पतन के बाद ईराक में अमेरिका की मौजूदगी बनी हुई है। एक तरह से पश्चिम एशिया में अमेरिका ने वैसे ही हालात पैदा कर दिए जैसे साठ और सत्तर के दशक में वियतनाम में उसने बनाये थे। हालाँकि इस सबके पीछे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हेकड़ी मानी जा रही है लेकिन सही बात ये है कि उनके पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भी पश्चिम एशिया में अपनी दादागिरी कायम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे चंद देशों के अलावा अधिकतर अरबी देश अमेरिका की हिट लिस्ट में ही रहते आये हैं। इसके पीछे दरअसल तेल का खेल बताया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिम एशिया के देशों में कच्चे तेल के कारण जो समृद्धि आई उसने इस्लामिक कट्टरता को जन्म दिया। हालांकि इसे खाद-पानी भी अमेरिका ही देता रहा। दूसरी तरफ इजरायल के पुनर्जन्म ने पश्चिम एशिया में एक स्थायी युद्धभूमि तैयार कर दी। ये बात भी सही है कि अन्य विश्व शक्तियाँ अरब जगत में उतना प्रभाव नहीं जमा सकीं। इसके पीछे उनकी अपनी समस्याएं हैं। फिलहाल अमेरिका की प्रभुत्ववादी सोच का ताजा शिकार ईरान हुआ है। बीते सप्ताह उसके एक कमांडर को अमेरिका ने मार गिराया। उस घटना के बाद ईरान भी बेहद आक्रामक हो उठा है और प्रतिक्रियास्वरूप अनेक अमेरिकी ठिकानों पर उसने भी धावा बोला है। उस वजह से पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध के कगार पर खड़ा हो गया है। ईरान के साथ अमेरिका का झगड़ा काफी लंबे समय से चला आ रहा है। उसके तेल बेचने पर भी प्रतिबन्ध लगा है। अमेरिका चाहता है ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद कर दे। भारत जैसे कई देशों के साथ उसका तेल को लेकर जो अनुबंध था उसे भी अमेरिका ने बाधित कर दिया। एक समय ऐसा ही उसने सद्दाम हुसैन के विरोध में ईराक के साथ किया था। वाशिंगटन का मकसद इस मामले में बेहद साफ है। वह पश्चिम एशिया की तेल संपदा पर अपना आधिपत्य ज़माने के साथ ही अरब देशों को संगठित होकर पश्चिमी जगत के मुकाबले खड़े नहीं होने देना चाहता। इसके पीछे इस्लामिक वर्चस्व को रोकना भी है। जिस अरब देश ने अमेरिकी हितों के अनुरूप नीति निर्धारित की वह तो सुरक्षित रहा लेकिन जिसने भी उसकी मर्जी के विरुद्ध जाने की हिमाकत की उसका हश्र सद्दाम हुसैन और गद्दाफी जैसा हुआ। आतंकवादी सरगना ओसामा और बगदादी ने बचने का बहुत प्रयास किया लेकिन अंतत: अमेरिका ने उन्हें निशाना बना ही लिया। ईरान के साथ उसका ताजा विवाद पूरी दुनिया के लिए चिंता का कारण बन गया है। ईरान ने भी जो जवाबी तेवर दिखाए हैं उनको देखते हुए पश्चिम एशिया की स्थिति विस्फोटक हो गई है। रूस और चीन ने राष्ट्रपति ट्रंप से जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाने की अपील की है। लेकिन ईरान ने अपने कमांडर की हत्या के बदले में जो कार्रवाई की उसके बाद अमेरिका ने अपनी फौजें पश्चिम एशिया में जमा करना शुरू कर दिया है। यदि लड़ाई छिड़ी तो ईरान कितना टिक सकेगा ये कहना कठिन है किन्तु पूरी दुनिया इस बात से भयभीत है कि वह मरता क्या न करता वाली स्थिति में कहीं परमाणु अस्त्रों का उपयोग न कर दे। लेकिन इस सबसे अलग हटकर भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो ईरान पर आई मुसीबत भारत के लिए भी बहुत भारी पड़ेगी। सस्ते तेल का अनुबंध तो अमेरिकी दबाव में पहले ही खटाई में पड़ गया। ईरान में चाबहार बंदरगाह बनाकर पाकिस्तान और चीन के ग्वादर बंदरगाह का रणनीतिक जवाब देने की भारतीय योजना भी अधर में लटक गयी। इस वजह से भारत को आर्थिक नुकसान तो हो ही रहा है लेकिन उससे भी बड़ी समस्या ईरान में कार्यरत लाखों भारतीय हैं जो युद्ध के हालात में देश लौटने को मजबूर होंगे। अमेरिका द्वारा की गई आक्रामक कार्रवाई की त्वरित प्रतिक्रियास्वरूप कच्चे तेल के दाम बढऩा अवश्यंभावी है जिसका जबर्दस्त दुष्प्रभाव पहले से मंदी की मार झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़े बिना नहीं रहेगा। उल्लेखनीय है भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ईरान उसका बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा है और उसके साथ हमारे कारोबारी और कूटनीतिक रिश्ते भी बहुत ही आत्मीय रहे हैं। ऐसे में अमेरिका द्वारा उत्पन्न संकट में भारत को बहुत ही संतुलित दृष्टिकोण के साथ आगे बढऩा पड़ रहा है। अमेरिका के साथ भी मोदी सरकार ने काफी अच्छे सम्बन्ध विकसित कर लिए हैं। ये देखते हुए विदेश नीति के लिए भी यह कठिन परीक्षा की घड़ी है। क्योंकि हमारे आर्थिक और कूटनीतिक हितों के साथ ही लाखों भारतीय अप्रवासियों का भविष्य भी इस संकट से प्रभावित होगा। ईरान और अमेरिका दोनों से मधुर रिश्तों के बाद भी भारत इस स्थिति में नहीं है कि वह दोनों के बीच सुलह करवा सके। अमेरिका में इस वर्ष राष्ट्रपति चुनाव होना है। डोनाल्ड ट्रंप दोबारा मैदान में उतरने के लिए प्रयासरत हैं। ऐसे में वे इस संकट में पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन नौबत युद्ध की आती है या केवल छुटपुट तनाव बना रहेगा ये कोई नहीं बता सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर को समूचे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखनी होगी क्योंकि ईरान में लगी आग से भारतीय हितों के झुलसने का खतरा भी कम नहीं है। इस्लाम के नाम पर होने वाला आतंकवाद नए सिरे से सामने आ जाये तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी