Wednesday, 22 January 2020

सर्वोच्च न्यायालय की अपील है तो विचारणीय



सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण मुद्दे पर संसद से संविधान संशोधन की अपील करते हुए सांसदों या विधायकों की अयोग्यता सम्बन्धी प्रकरणों में विलंब को रोकने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला एक स्थायी ट्रिब्यूनल या अन्य कोई ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसे वैकल्पिक स्पीकर कहा जा सके। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने तत्सम्बन्धी कोई आदेश नहीं दिया लेकिन उसका संसद से संविधान संशोधन करने की अपीलऔर सुझाव की जो बात कही गई उसके पीछे निहित भावना और पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है। हुआ यूं कि मणिपुर विधानसभा के पिछले चुनाव के बाद त्रिशंकु की स्थिति बन गई। तब भाजपा ने कुछ क्षेत्रीय दलों के अलावा कांग्रेस के एक विधायक को तोड़कर मंत्री बना लिया। नियमानुसार उक्त विधायक को अयोग्य किया जाना चाहिए था। लेकिन उस स्थिति में सरकार अस्थिर हो जाती। लिहाजा विधानसभा अध्यक्ष उस प्रकरण को दबाकर बैठ गए। हालाँकि ये पहला प्रकरण नहीं था जिसमें स्पीकर ने अयोग्यता सम्बन्धी निर्णय को ठंडे बस्ते में डालकर सत्ताधारी दल को संजीवनी दे दी। बरसों पहले उप्र में कल्याण सिंह सरकार को बचाने के लिए केशरीनाथ त्रिपाठी ने भी ऐसा ही किया था। गत वर्ष कर्नाटक के कांग्रेस विधायकों के मामले में भी स्पीकर की भूमिका को लेकर विवाद मचा। अतीत में मप्र. में भी एक कांग्रेस विधायक द्वारा पार्टी से त्यागपत्र दिए जाने के बाद उसकी सदस्यता पर आए संकट को तत्कालीन स्पीकर स्व.ईश्वरदास रोहाणी लंबे समय तक टरकाते रहे। दरअसल इस बारे में स्पीकर के अधिकार असीमित होने से उन पर दबाव नहीं डाला जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी गत दिवस संसद से इस बारे में संविधान संशोधन का सुझाव ही दिया। लेकिन उसने ये अपेक्षा भी की कि अयोग्यता प्रकरणों का निबटारा अधिकतम तीन महीने के भीतर होना चाहिये। उन्होंने मणिपुर विधानसभा के स्पीकर से भी तीन माह में संदर्भित कांग्रेस विधायक की सदस्यता पर फैसला लेने कहा है। देखने वाली बात ये होगी कि संसद सर्वोच्च न्यायालय की अपील और उसके साथ दिए गए सुझावों पर क्या कदम उठाती है ? और उठाती भी है या नहीं क्योंकि ऐसे अनेक अवसर आए हैं अब संसद और न्यायपालिका के बीच अधिकारों और सर्वोच्चता को लेकर विवाद हुआ। जहां तक बात स्पीकर के अधिकारों की है तो जो भी दल सत्ता में होता है वह उनके दुरुपयोग में लेशमात्र भी शरम नहीं करता। यही नहीं तो आम तौर पर सभी दल ये मानते हैं कि न्यायपालिका को विधायिका के अधिकार क्षेत्र में दखलंदाजी नहीं करना चाहिए। हालाँकि संसद या विधानसभा द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय की समीक्षा करने का अधिकार न्यायपालिका को है। विधायिका के पास कानून बनाने का अधिकार तो है किंतु वह भी संविधान द्वारा खींच दी गई लक्ष्मण रेखाओं के अंदर ही होना चाहिए। संसद द्वारा लिए गए अनेक निर्णयों पर सर्वोच्च न्यायालय ने जहां रोक लगाने का साहस किया वहीं संसद ने भी शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने जैसा कार्य किया था। इसी तरह संसद द्वारा न्यायाधीशों के चयन हेतु प्रचलित न्यायिक चयन आयोग का जो गठन किया गया उसे सर्वोच्च न्यायालय ने सिरे से खारिज कर दिया। हालांकि शाहबानो मामले में संसद द्वारा की गई कार्रवाई पर सर्वोच्च न्यायालय ने कोई ऐतराज नहीं जताया। लेकिन संसद में अवश्य न्यायपालिका द्वारा विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप पर लगभग सभी दलों के सदस्यों ने काफी विरोध व्यक्त किया। फिर भी एक बात जरूर देखने वाली रही कि सरकार चाहे किसी की ही रही हो उसने सर्वोच्च न्यायालय के साथ सीधे टकराव नहीं किया। कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों में जरूर कानून मंत्री और प्रधान न्यायाधीश के बीच भाषण के जरिये कटाक्षों का आदान -प्रदान हुआ लेकिन फिर भी मर्यादा बनी रही। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर फैसले किये या सरकार को लताड़ा लेकिन सरकार ने न्यायपालिका के प्रति आलोचनात्मक प्रतिक्रियाओं से परहेज किया। गत दिवस न्यायमूर्ति श्री नरीमन ने यही सोचकर कोई पुख्ता फैसला करने की बजाय संसद से अपील करते हुए सुझाव देते हुए संतुलित रवैया अपनाया। संसद इस पर क्या रुख अपनाती है ये देखने वाली बात होगी। क्योंकि गठबंधन राजनीति के इस दौर कोई भी पार्टी सदन के अध्यक्ष को अधिकारविहीन करना नहीं चाहेगी। सरकार को समर्थन देने के बदले मंत्रीपद की सौदेबाजी के साथ ही अध्यक्ष पद की भी मांग इसीलिए की जाती है। जहां तक बात इस पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा अयोग्यता मामलों में निष्पक्षता और नैतिकता की धज्जियां उड़ाने के आरोप की तो वह पूरी तरह सही है। इसके लिए उदाहरण तलाशने की जरूरत नहीं है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि राज्यपाल और संसद तथा विधानसभा के अध्यक्ष सत्ता पक्ष के हितों का संरक्षण करते हैं। संवैधानिक पद होने के कारण भले ही उनके सम्मान के प्रति सतर्कता बरती जाती है लेकिन इन पदों की गरिमा बीते जमाने की तुलना में गिरी है। मणिपुर, गोवा, कर्नाटक जैसे अनेक मामलों में दलबदल करने वाले सदस्य को अयोग्य ठहराने में पीठासीन अधिकारी द्वारा किया गया विलंब या लिया गया निर्णय किसी भी स्थिति में न्यायोचित नहीं था। किसी सदस्य द्वारा दलबदल करने पर उसे अयोग्य ठहराना बहुत ही सरल होता है। लेकिन अध्यक्ष उसे सत्ता पक्ष या फिर अपने निजी राजनीतिक हितों के लिए टरकाते हैं। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ट्रिब्यूनल या वैसी ही वैकल्पिक व्यवस्था का सुझाव देते हुए संविधान में तदनुसार संशोधन की जो अपील की उस पर विचार करते हुए विधिसम्मत निर्णय लेना समय की मांग है। बेहतर हो इसके लिए सर्वसम्मति बने। प्रजातंत्र में संवैधानिक पदों की निष्पक्षता और गरिमामय आचरण बहुत महत्वपूर्ण होता है। आज देश में सर्वत्र विश्वसनीयता को जो संकट है उसके लिए इन पदों पर बिठाये जाने वाले व्यक्ति और उनका कार्य भी बड़ा कारण है। इसके लिए किसी एक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि अपने क्षणिक और निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए सभी दल नैतिकता और संवैधानिक मर्यादाओं की धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकते। वैसे इस तरह के आरोप तो न्यायपालिका पर भी लगने लगे हैं ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 21 January 2020

नड्डा : चुनौतियां स्वागत में खड़ी हैं



भारतीय जनता पार्टी ने जगत प्रकाश नड्डा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। पार्टी को सफलता के शिखर तक पहुंचाने वाले अमित शाह ने उन्हें संगठन का कार्यभार सौंपा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निकटतम सहयोगी और भरोसेमंद होने से यदि श्री शाह चाहते तो पार्टी के संविधान में मनमाफिक बदलाव करते हुए संगठन पर अपना कब्जा बनाये रख सकते थे। पार्टी के भीतर भी ये कहने वाले कम नहीं हैं कि मोदी-शाह की जोड़ी ने उस पर पूरी तरह कब्जा जमा लिया है। लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठों को किनारे बिठा देने के कारण भी इस जोड़ी को खूब आलोचना झेलनी पड़ी। जब श्री नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया तब भी कुछ लोगों का ये कयास था कि पार्टी को श्री शाह ही अपनी उंगलियों पर नचाते रहेंगे। हालांकि राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से श्री नड्डा को श्री शाह से वरिष्ठ कहा जा सकता है क्योंकि जब श्री शाह गुजरात में ही सीमित थे तब श्री नड्डा भाजपा की युवा इकाई भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर देशव्यापी पहिचान अर्जित कर चुके थे। 2014 के पहले जब श्री मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया उसके बाद वे श्री शाह को पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में लाये। 2014 की चुनावी सफलता को जहां श्री मोदी के व्यक्तित्व का जादू माना गया , उतनी ही श्री शाह की कुशल रणनीति की भी प्रशंसा हुई। विशेष तौर पर उप्र और बिहार में भाजपा की अकल्पनीय सफलता के बाद तो श्री शाह चाणक्य कहे जाने लगे। पूर्वोत्तर राज्यों में पार्टी का जो विस्तार उनके कार्यकाल में हुआ वह आश्चर्यजनक था। भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाकर उन्होंने विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाया। हालांकि 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को दिल्ली और बिहार में मुंह की खानी पड़ी लेकिन उसके बाद उप्र की बाजी जीतकर श्री शाह ने अपना दबदबा बनाये रखा। उसके बाद गुजरात की फीकी जीत, कर्नाटक में हाथ आई बाजी खिसकने और फिर मप्र, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में मिली हार से मोदी - शाह की जोड़ी की क्षमता पर संदेह के बादल मंडराने लगे। 2019 के लोकसभा चुनाव में 2004 को दोहराए जाने की बात भी होने लगी लेकिन तमाम आशंकाओं को झुठलाते हुए जब मोदी सरकार पहले से ज्यादा ताकत के साथ लौटी तो श्री मोदी के साथ ही श्री शाह का कद भी आसमान छूने लगा। वे मंत्रीमण्डल के सदस्य बने और गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग उन्हें दिया गया। चंद महीनों के भीतर उन्होंने जो बड़े कारनामे कर दिखाए उनकी वजह से उन्होंने संगठन से निकलकर एक दमदार शासक के रूप में भी अपनी धाक जमा ली। देश की राजनीति में वे प्रधानमंत्री के बाद सबसे ज्यादा चर्चित व्यक्ति बन बैठे। ऐसे समय उनका पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ देना उन पार्टियों के लिए एक संदेश है जहां संगठन पर कुछ व्यक्तियों और परिवार का स्थायी कब्जा है। यदि वामपंथियों को छोड़ दें तो शायद ही कोई पार्टी होगी जहां सत्ता और संगठन के सबसे ताकतवर लोग इस तरह से पद छोड़ते हों। कुछ लोगों का सोचना है कि श्री नड्डा तो दिखावटी रहेंगे तथा आगे भी नियंत्रण श्री शाह का रहेगा। लेकिन ऐसा होता तब मोदी-शाह की जोड़ी श्री नड्डा जैसे अनुभवी और सफल संगठनकर्ता की बजाय किसी ऐसे व्यक्ति की आगे कर देती जो जनधारविहीन हो। उल्लेखनीय है उप्र के चुनाव में बतौर प्रभारी श्री नड्डा ने बहुत ही शानदार काम किया था जिसके बाद से ही उनको भविष्य के नेता के तौर पर देखा जाने लगा। बहरहाल उन जैसे अनुभवी और सुलझे हुए व्यक्ति को पार्टी की कमान सौंपकर भाजपा ने नेतृत्व की निरंतरता को सिद्ध कर दिया जिसका कांग्रेस में घोर अभाव है। देश की सबसे बड़ी पार्टी ने बीते दो दशक में कुल जमा दो अध्यक्ष ही देखे जो माँ - बेटे ही हैं। नेतृत्व के अभाव की सबसे बड़ी बानगी बीती मई में लोकसभा चुनाव की जबरदस्त हार के बाद राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिए जाने के बाद देखने मिली। कई महीनों की मान-मनौव्वल के बाद भी जब श्री गांधी जिम्मेदारी उठाने राजी नहीं हुए तब ले-देकर फिर से सोनिया गांधी को ही पार्टी का अध्यक्ष बनाना पड़ा। उस दृष्टि से भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर लगातार नये नेतृत्व को आगे आने के अवसर दिए। राष्ट्रीय स्तर पर आज भाजपा ही है जिसके पास त्रिस्तरीय नेताओं की कतार है। लेकिन राज्यों में वह भी कांग्रेस संस्कृति पर चलते हुए ऊपर से नेता थोपने की बुराई से ग्रसित है। जिसके कारण उसे राज्यों में या तो असफलता हाथ लग रही है या सफलता अपेक्षानुसार नहीं रही। प्रदेश स्तर पर जो नेता जमे हैं वे दूसरे को बढ़ते नहीं देखना चाहते। बीते एक -डेढ़ वर्ष में इसीलिए पार्टी को अपने प्रभाव वाले अनेक राज्यों की सत्ता गंवानी पड़ गई। श्री नड्डा के सामने राज्यों में भाजपा को मजबूत बनाने की चुनौती है। उनकी छवि बेशक श्री शाह जैसी नहीं है। लेकिन जैसा पहले कहा गया राष्ट्रीय स्तर पर संगठन का कार्य करने का जो लंबा अनुभव है वह उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। पिछली मोदी सरकार में बतौर वरिष्ठ मंत्री काम करने के कारण वे प्रधानमंत्री के भी विश्वासपात्र रहे हैं। और फिर भाजपा के वैचारिक अभिभावक रास्वसंघ से भी श्री नड्डा करीब से जुड़े हुए हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि इसकी वजह है। श्री नड्डा की पहली अग्निपरीक्षा तो फरवरी में होने जा रहे दिल्ली विधानसभा चुनाव में होगी। उसके बाद बिहार और बंगाल जैसी बड़ी चुनौतियां उनके सामने आएंगी। उनके पूर्ववर्ती श्री शाह विपक्षी को उसी के घर में घुसकर ललकारने में यकीन करते थे। श्री नड्डा की शैली कुछ अलग है। लेकिन वे कुशल रणनीतिकार हैं इसलिए अपना रास्ता खुद बना सकते हैं। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे राज्यों में पार्टी के स्थापित नेताओं द्वारा फैलाई गई गुटबाजी और परिवारवाद को किस तरह रोक पाते हैं। केंद्रीय स्तर पर भाजपा ने विभिन्न स्तर पर नई पौध को विकसित किया लेकिन हर हाल में सफलता की हवस में नई भर्ती को जिस तरह जगह दी गई उससे पार्टी के समर्पित कैडर में भारी नाराजगी है। महाराष्ट्र में मिली हार में इसका बड़ा योगदान रहा। श्री नड्डा को भाजपा में आकर मिलने वाले बरसाती नालों को रोकना होगा। केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे दिल्ली में मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं होना विचारणीय विषय है। ये कहने में भी कोई बुराई नहीं है कि भाजपा में पूरी तरह न सही लेकिन काफी हद तक सत्ता से जुड़ी बुराइयां घर कर चुकी हैं। इस वजह से पार्टी विथ डिफरेंस का उसका दावा भी अहमियत खोता जा रहा है। महबूबा मुफ्ती से गठबंधन ने उसकी वैचारिक पवित्रता को भी बड़ी चोट पहुंचाई थी। अनुच्छेद 370 हटाने के निर्णय ने उस घाव को बहुत कुछ भर दिया लेकिन निशान उतनी आसानी से नहीं मिट सकते। श्री नड्डा के समक्ष एक चुनौती और भी है। केंद्र सरकार के साहसिक निर्णयों से बौखलाए विपक्ष ने जिस तरह की घेराबन्दी कर रखी है उसका मैदानी स्तर पर समुचित उत्तर देने के लिए विशेष रणनीति बनानी होगी। विशेष रूप से समाचार माध्यमों, शैक्षणिक, सांस्कृतिक संस्थानों में जमे वामपंथी विचारधारा के लोगों द्वारा की गई जबरदस्त मोर्चेबन्दी को तोडऩे वाली उसी स्तर की टीम पार्टी यदि तैयार नहीं कर पाई तब उसके बढ़ते कदम रुक सकते हैं। मोदी सरकार के अनेक अच्छे निर्णयों का अपेक्षित प्रचार नहीं हो पाने का कारण यही है कि वामपंथी दुष्प्रचार की समय रहते काट नहीं तलाशी गई। जामिया मिलिया और जेएनयू में जो हुआ वह इसका प्रमाण है। तीन तलाक पर रोक लगाकर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन हासिल करने के दावों को झूठा साबित करते हुए मुस्लिम समाज ने सीएए के विरोध में महिलाओं को आगे कर दिया। श्री शाह पर संगठन और सत्ता दोनों का भार था इसलिए वे जिन मोर्चों पर ध्यान नहीं दे सके उनकी तरफ  श्री नड्डा को विशेष प्रयास करने होंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव की जोरदार सफलता ने जहां भाजपा का हौसला बढ़ाया वहीं उसमें आत्ममुग्धता भी उत्पन्न कर दी है जिसकी वजह से उसके सहयोगी सशंकित हो चले हैं। महाराष्ट्र और झारखंड इसके ताजा उदाहरण हैं। दूसरी तरफ विपक्षी दलों को भी ये लगने लगा है कि यदि वे अभी भी शांत रहे तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा। इसलिए वे सब मौका मिलते ही दाना पानी लेकर भाजपा पर चढ़ाई करने में जुटे हैं। वर्तमान माहौल इसका गवाह है। ऐसे में श्री नड्डा को भीतरी बुराइयों और बाहरी खतरों से एक साथ निपटना पड़ेगा। वे जमीन से जुड़े माने जाते हैं तथा विनम्र भी हैं। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि पहले वाले खिलाड़ी की धमाकेदार बल्लेबाजी के बाद लोग वैसी ही अपेक्षा अगले खिलाड़ी से भी करते हैं। श्री नड्डा की तुलना भी इसीलिये श्री शाह से ही होगी। ये बात उन पर मानसिक बोझ न बन जाए उससे उन्हें बचना होगा। और फिर भारतीय राजनीति के इस स्थापित सत्य से भी उनका साक्षात्कार होता रहेगा कि सत्ता में रहते हुए पार्टी संगठन पृष्ठभूमि में चला जाता है। उस लिहाज से अमित शाह निश्चित रूप से अपवाद थे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

नड्डा : चुनौतियां स्वागत में खड़ी हैं



भारतीय जनता पार्टी ने जगत प्रकाश नड्डा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। पार्टी को सफलता के शिखर तक पहुंचाने वाले अमित शाह ने उन्हें संगठन का कार्यभार सौंपा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निकटतम सहयोगी और भरोसेमंद होने से यदि श्री शाह चाहते तो पार्टी के संविधान में मनमाफिक बदलाव करते हुए संगठन पर अपना कब्जा बनाये रख सकते थे। पार्टी के भीतर भी ये कहने वाले कम नहीं हैं कि मोदी-शाह की जोड़ी ने उस पर पूरी तरह कब्जा जमा लिया है। लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठों को किनारे बिठा देने के कारण भी इस जोड़ी को खूब आलोचना झेलनी पड़ी। जब श्री नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया तब भी कुछ लोगों का ये कयास था कि पार्टी को श्री शाह ही अपनी उंगलियों पर नचाते रहेंगे। हालांकि राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से श्री नड्डा को श्री शाह से वरिष्ठ कहा जा सकता है क्योंकि जब श्री शाह गुजरात में ही सीमित थे तब श्री नड्डा भाजपा की युवा इकाई भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर देशव्यापी पहिचान अर्जित कर चुके थे। 2014 के पहले जब श्री मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया उसके बाद वे श्री शाह को पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में लाये। 2014 की चुनावी सफलता को जहां श्री मोदी के व्यक्तित्व का जादू माना गया , उतनी ही श्री शाह की कुशल रणनीति की भी प्रशंसा हुई। विशेष तौर पर उप्र और बिहार में भाजपा की अकल्पनीय सफलता के बाद तो श्री शाह चाणक्य कहे जाने लगे। पूर्वोत्तर राज्यों में पार्टी का जो विस्तार उनके कार्यकाल में हुआ वह आश्चर्यजनक था। भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाकर उन्होंने विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाया। हालांकि 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को दिल्ली और बिहार में मुंह की खानी पड़ी लेकिन उसके बाद उप्र की बाजी जीतकर श्री शाह ने अपना दबदबा बनाये रखा। उसके बाद गुजरात की फीकी जीत, कर्नाटक में हाथ आई बाजी खिसकने और फिर मप्र, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में मिली हार से मोदी - शाह की जोड़ी की क्षमता पर संदेह के बादल मंडराने लगे। 2019 के लोकसभा चुनाव में 2004 को दोहराए जाने की बात भी होने लगी लेकिन तमाम आशंकाओं को झुठलाते हुए जब मोदी सरकार पहले से ज्यादा ताकत के साथ लौटी तो श्री मोदी के साथ ही श्री शाह का कद भी आसमान छूने लगा। वे मंत्रीमण्डल के सदस्य बने और गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग उन्हें दिया गया। चंद महीनों के भीतर उन्होंने जो बड़े कारनामे कर दिखाए उनकी वजह से उन्होंने संगठन से निकलकर एक दमदार शासक के रूप में भी अपनी धाक जमा ली। देश की राजनीति में वे प्रधानमंत्री के बाद सबसे ज्यादा चर्चित व्यक्ति बन बैठे। ऐसे समय उनका पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ देना उन पार्टियों के लिए एक संदेश है जहां संगठन पर कुछ व्यक्तियों और परिवार का स्थायी कब्जा है। यदि वामपंथियों को छोड़ दें तो शायद ही कोई पार्टी होगी जहां सत्ता और संगठन के सबसे ताकतवर लोग इस तरह से पद छोड़ते हों। कुछ लोगों का सोचना है कि श्री नड्डा तो दिखावटी रहेंगे तथा आगे भी नियंत्रण श्री शाह का रहेगा। लेकिन ऐसा होता तब मोदी-शाह की जोड़ी श्री नड्डा जैसे अनुभवी और सफल संगठनकर्ता की बजाय किसी ऐसे व्यक्ति की आगे कर देती जो जनधारविहीन हो। उल्लेखनीय है उप्र के चुनाव में बतौर प्रभारी श्री नड्डा ने बहुत ही शानदार काम किया था जिसके बाद से ही उनको भविष्य के नेता के तौर पर देखा जाने लगा। बहरहाल उन जैसे अनुभवी और सुलझे हुए व्यक्ति को पार्टी की कमान सौंपकर भाजपा ने नेतृत्व की निरंतरता को सिद्ध कर दिया जिसका कांग्रेस में घोर अभाव है। देश की सबसे बड़ी पार्टी ने बीते दो दशक में कुल जमा दो अध्यक्ष ही देखे जो माँ - बेटे ही हैं। नेतृत्व के अभाव की सबसे बड़ी बानगी बीती मई में लोकसभा चुनाव की जबरदस्त हार के बाद राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिए जाने के बाद देखने मिली। कई महीनों की मान-मनौव्वल के बाद भी जब श्री गांधी जिम्मेदारी उठाने राजी नहीं हुए तब ले-देकर फिर से सोनिया गांधी को ही पार्टी का अध्यक्ष बनाना पड़ा। उस दृष्टि से भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर लगातार नये नेतृत्व को आगे आने के अवसर दिए। राष्ट्रीय स्तर पर आज भाजपा ही है जिसके पास त्रिस्तरीय नेताओं की कतार है। लेकिन राज्यों में वह भी कांग्रेस संस्कृति पर चलते हुए ऊपर से नेता थोपने की बुराई से ग्रसित है। जिसके कारण उसे राज्यों में या तो असफलता हाथ लग रही है या सफलता अपेक्षानुसार नहीं रही। प्रदेश स्तर पर जो नेता जमे हैं वे दूसरे को बढ़ते नहीं देखना चाहते। बीते एक -डेढ़ वर्ष में इसीलिए पार्टी को अपने प्रभाव वाले अनेक राज्यों की सत्ता गंवानी पड़ गई। श्री नड्डा के सामने राज्यों में भाजपा को मजबूत बनाने की चुनौती है। उनकी छवि बेशक श्री शाह जैसी नहीं है। लेकिन जैसा पहले कहा गया राष्ट्रीय स्तर पर संगठन का कार्य करने का जो लंबा अनुभव है वह उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। पिछली मोदी सरकार में बतौर वरिष्ठ मंत्री काम करने के कारण वे प्रधानमंत्री के भी विश्वासपात्र रहे हैं। और फिर भाजपा के वैचारिक अभिभावक रास्वसंघ से भी श्री नड्डा करीब से जुड़े हुए हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि इसकी वजह है। श्री नड्डा की पहली अग्निपरीक्षा तो फरवरी में होने जा रहे दिल्ली विधानसभा चुनाव में होगी। उसके बाद बिहार और बंगाल जैसी बड़ी चुनौतियां उनके सामने आएंगी। उनके पूर्ववर्ती श्री शाह विपक्षी को उसी के घर में घुसकर ललकारने में यकीन करते थे। श्री नड्डा की शैली कुछ अलग है। लेकिन वे कुशल रणनीतिकार हैं इसलिए अपना रास्ता खुद बना सकते हैं। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे राज्यों में पार्टी के स्थापित नेताओं द्वारा फैलाई गई गुटबाजी और परिवारवाद को किस तरह रोक पाते हैं। केंद्रीय स्तर पर भाजपा ने विभिन्न स्तर पर नई पौध को विकसित किया लेकिन हर हाल में सफलता की हवस में नई भर्ती को जिस तरह जगह दी गई उससे पार्टी के समर्पित कैडर में भारी नाराजगी है। महाराष्ट्र में मिली हार में इसका बड़ा योगदान रहा। श्री नड्डा को भाजपा में आकर मिलने वाले बरसाती नालों को रोकना होगा। केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे दिल्ली में मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं होना विचारणीय विषय है। ये कहने में भी कोई बुराई नहीं है कि भाजपा में पूरी तरह न सही लेकिन काफी हद तक सत्ता से जुड़ी बुराइयां घर कर चुकी हैं। इस वजह से पार्टी विथ डिफरेंस का उसका दावा भी अहमियत खोता जा रहा है। महबूबा मुफ्ती से गठबंधन ने उसकी वैचारिक पवित्रता को भी बड़ी चोट पहुंचाई थी। अनुच्छेद 370 हटाने के निर्णय ने उस घाव को बहुत कुछ भर दिया लेकिन निशान उतनी आसानी से नहीं मिट सकते। श्री नड्डा के समक्ष एक चुनौती और भी है। केंद्र सरकार के साहसिक निर्णयों से बौखलाए विपक्ष ने जिस तरह की घेराबन्दी कर रखी है उसका मैदानी स्तर पर समुचित उत्तर देने के लिए विशेष रणनीति बनानी होगी। विशेष रूप से समाचार माध्यमों, शैक्षणिक, सांस्कृतिक संस्थानों में जमे वामपंथी विचारधारा के लोगों द्वारा की गई जबरदस्त मोर्चेबन्दी को तोडऩे वाली उसी स्तर की टीम पार्टी यदि तैयार नहीं कर पाई तब उसके बढ़ते कदम रुक सकते हैं। मोदी सरकार के अनेक अच्छे निर्णयों का अपेक्षित प्रचार नहीं हो पाने का कारण यही है कि वामपंथी दुष्प्रचार की समय रहते काट नहीं तलाशी गई। जामिया मिलिया और जेएनयू में जो हुआ वह इसका प्रमाण है। तीन तलाक पर रोक लगाकर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन हासिल करने के दावों को झूठा साबित करते हुए मुस्लिम समाज ने सीएए के विरोध में महिलाओं को आगे कर दिया। श्री शाह पर संगठन और सत्ता दोनों का भार था इसलिए वे जिन मोर्चों पर ध्यान नहीं दे सके उनकी तरफ  श्री नड्डा को विशेष प्रयास करने होंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव की जोरदार सफलता ने जहां भाजपा का हौसला बढ़ाया वहीं उसमें आत्ममुग्धता भी उत्पन्न कर दी है जिसकी वजह से उसके सहयोगी सशंकित हो चले हैं। महाराष्ट्र और झारखंड इसके ताजा उदाहरण हैं। दूसरी तरफ विपक्षी दलों को भी ये लगने लगा है कि यदि वे अभी भी शांत रहे तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा। इसलिए वे सब मौका मिलते ही दाना पानी लेकर भाजपा पर चढ़ाई करने में जुटे हैं। वर्तमान माहौल इसका गवाह है। ऐसे में श्री नड्डा को भीतरी बुराइयों और बाहरी खतरों से एक साथ निपटना पड़ेगा। वे जमीन से जुड़े माने जाते हैं तथा विनम्र भी हैं। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि पहले वाले खिलाड़ी की धमाकेदार बल्लेबाजी के बाद लोग वैसी ही अपेक्षा अगले खिलाड़ी से भी करते हैं। श्री नड्डा की तुलना भी इसीलिये श्री शाह से ही होगी। ये बात उन पर मानसिक बोझ न बन जाए उससे उन्हें बचना होगा। और फिर भारतीय राजनीति के इस स्थापित सत्य से भी उनका साक्षात्कार होता रहेगा कि सत्ता में रहते हुए पार्टी संगठन पृष्ठभूमि में चला जाता है। उस लिहाज से अमित शाह निश्चित रूप से अपवाद थे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 January 2020

सिब्बल की बात पर ध्यान दे कांग्रेस



कांग्रेस के वरिष्ठ और मुखर नेता कपिल सिब्बल के कानूनी ज्ञान को कोई चुनौती नहीं दी जा सकती । वे देश के बड़े वकीलों में गिने जाते हैं। गत दिवस उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून पर एक बयान में दो टूक कह दिया कि भले ही राज्य इसका विरोध करें और अपनी विधानसभा में इसके विरुद्ध प्रस्ताव पारित करें लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी वैध ठहराए जाने के बाद उसे लागू करने से इंकार नहीं किया जा सकता। श्री सिब्बल ने यद्यपि कानून के विरुद्ध हो रहे आंदोलन की प्रशंसा की लेकिन उसको लागू किये जाने सम्बन्धी राज्यों की बाध्यता को स्पष्ट करते हुए ये गलतफहमी भी दूर कर दी कि संसद द्वारा मंजूर किसी कानून को राज्य सरकार लागू करने से इंकार कर सकती है । श्री सिब्बल के बयान का उन्हीं की पार्टी के अन्य नेता और प्रख्यात अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने भी समर्थन किया है । यद्यपि दोनों ने अपनी पार्टी की राजनीतिक लाइन पर चलते हुए उक्त कानून के विरोध को जायज भी ठहराया लेकिन इस बात की पुष्टि भी कि राज्य सरकार ये नहीं कह सकती कि संसद द्वारा पारित किसी कानून को अपने राज्य में लागू नहीं करेगी। सर्वोच्च न्यायालय अवश्य उसकी समीक्षा कर उसे असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर सकता है लेकिन संसद से पारित होने , राष्ट्रपति द्वारा उसका अनुमोदन किये जाने तथा उसे लागू किये जाने संबंधी अधिसूचना जारी हो जाने के बाद किसी राज्य की सरकार या मुख़्यमंत्री का उसे लागू नहीं करने जैसी बात कहना संविधान और संघीय ढांचे के विरुद्ध है । चूंकि सीएए अब एक विधिवत कानून है इसलिए उसे लागू करना राज्यों की भी संवैधानिक बाध्यता और जिम्मेदारी है । जहां तक बात इसके विरोध की है तो इसके पीछे भी वोटबैंक की ही राजनीति है ये बात किसी से छिपी नहीं रही। देश के जिन हिस्सों में भी सीएए का विरोध चल रहा है उनमें असम सहित कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में ही उसके पीछे दिए जा रहे तर्क औचित्यपूर्ण हैं क्योंकि वहां के लोगों को अपनी भाषायी बहुलता के लिए खतरा महसूस हो रहा है । लेकिन दिल्ली के शाहीन बाग और कुछ विश्वविद्यालयों में हो रहे विरोध के पीछे केवल वे ताकतें हैं जो येन केन प्रकारेण देश में अस्थिरता फैलाकर उसे भीतर से कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रही हैं । जो बात श्री सिब्बल ने कही उसका निहितार्थ यही है कि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत बनाये कानून का विरोध भी उसी की मर्यादा में रहकर किया जाना चाहिए। लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि खुद श्री सिब्बल की पार्टी और उसके नेताओं ने सीएए को लेकर गलत रास्ता अख्तियार कर लिया। अब यदि पंजाब, राजस्थान, मप्र जैसे कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री इसे लागू नहीं करने की बात कहते हैं तब क्या वह गैर कानूनी और संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं है । विधानसभा में कानून के विरोध का प्रस्ताव पारित करना भी एक तरह से संघीय ढांचे के प्रति असहमति ही हुई। उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देना तो पूरी तरह विधिसम्मत प्रक्रिया है किन्तु जब किसी राज्य की सरकार और उसका मुखिया संसद द्वरा पारित किसी कानून के विरोध में जनता को उकसाने का कार्य करे तब वह अनुचित ही है। श्री सिब्बल की स्पष्ट टिप्पणी और उन्हीं के पार्टी सहयोगी श्री खुर्शीद द्वारा उसका समर्थन किये जाने के बाद कांग्रेस को इस बारे में गम्भीर और जिम्मेदार हो जाना चाहिये । विपक्षी दल सरकार के किसी निर्णय का सैद्धांतिक विरोध करे उसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन उसके कारण यदि अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाए तब उसे अपने तरीके में बदलाव करना चाहिये । जिस तरह शाहीन बाग के धरने को महिमामंडित किया जा रहा है वह भी अव्यवस्था फैलाने का ही हिस्सा है जिसे कांग्रेस पर्दे के पीछे रहकर समर्थन दे रही है । केंद्र सरकार द्वारा लिए गए अन्य निर्णयों के विरोध में मुस्लिम समाज ने वैधानिक तरीके अपनाने की जो समझदारी दिखाई ठीक वैसी ही सीएए को लेकर भी दिखाई जाती तब उस पर सार्थक बहस हो सकती थी लेकिन वामपंथियों ने अपने प्रचार तंत्र के जरिये मुस्लिम समुदाय को भयभीत कर दिया और कांग्रेस भी बिना सोचे-समझे उस षडयंत्र में फंसकर उनके साथ चल पड़ी। ममता बैनर्जी और केरल की वामपंथी सरकार द्वारा संसद द्वारा बनाए गये कानून को लागू नहीं करने जैसी बात कहना उतना अटपटा नहीं लगा क्योंकि उनकी पूरी राजनीति ही टकराव से प्रेरित है लेकिन जब कैप्टेन अमरिन्दर सिंह, कमलनाथ और अशोक गहलोत जैसे अनुभवी मुख्यमंत्री सीएए को लागू करने नहीं जैसी बात कहते हैं तब आश्चर्य होता है। बेहतर हो कांग्रेस अपने शासन वाले राज्यों को इस बात की सलाह दे कि वहां पार्टी भले ही सीएए का राजनीतिक स्तर पर विरोध करे किन्तु सरकार को ऐसी कोई बात कहनी नहीं चाहिए जिससे संवैधानिक संकट खड़ा हो । अनेक संविधान विशेषज्ञ कह चुके हैं कि कानून बन जाने और तत्संबन्धी अधिसूचना जारी होने के बाद किसी भी राज्य सरकार के लिए उसे लागू नहीं किया जाना असम्वैधानिक होगा और उस सूरत में केंद्र को वहां राष्ट्रपति शासन लगाने जैसा अप्रिय निर्णय लेना पड़ सकता है । इस बारे में एक छोटा सा उदाहरण प्रासंगिक होगा। बीते दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जबलपुर में कुछ ऐसे सिंधी परिवारों को भारत की नागरिकता प्रदान की जो बरसों पहले पाकिस्तान से प्रताडि़त होकर मप्र के बालाघाट में रह रहे थे लेकिन वैध नागरिकता नहीं होने से वे तमाम सुविधाओं और अधिकारों से वंचित थे । कमलनाथ सरकार ने उस कदम का कोई विरोध न करते हुए ये साबित कर दिया कि उसके पास वैसा करने का कोई अधिकार नहीं है । कपिल सिब्बल के बयान के बाद उम्मीद की जानी चाहिये कि कांग्रेस इस मामले में जिम्मेदारी का परिचय देते हुए ऐसा कोई कार्य नहीं करेगी जिससे उसकी राज्य सरकारें व्यर्थ के झमेले में फंस जाएं। देश के संघीय संवैधानिक ढांचे की सलामती के लिए विरोध के तौर - तरीकों को भी मर्यादा की रेखा में ही रहना चाहिए।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 17 January 2020

संजय राउत ने बयान पलटा लेकिन बात नहीं



शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत राजनेता होने के अलावा पार्टी के मुखपत्र सामना के संपादक भी हैं। लेकिन उनकी प्रसिद्धि विवादास्पद बयानों और तीखी टिप्पणियों से ही है। महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबन्धन टूटने में उनकी बयानबाजी को भी एक कारण माना जाता है। हालाँकि ये कहना गलत नहीं होगा कि संजय महज एक मोहरे हैं जिन्हें आगे बढ़ाकर ठाकरे परिवार अपनी चालें चला करता है। उनके पहले के प्रवक्ता भी सामना के संपादक रहे। इनमें एक संजय निरुपम कांग्रेस में जा घुसे और दूसरे प्रेम शुक्ल भाजपा में। बीते काफी समय से श्री राउत, ठाकरे परिवार के बाद शिवसेना के सबसे मुखर नेता के रूप में सामने आये। वे राज्यसभा सदस्य भी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा और शिवसेना में मुख्यमंत्री पद को लेकर छिड़ी जंग में उनकी शेरो-शायरी युक्त टिप्पणियाँ सुखिऱ्यों में रहीं। ये कहना भी काफी हद तक सही है कि भाजपा उनके बयानों के सामने निरीह नजर आई। लेकिन उद्दव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के बाद श्री राउत की बयानबाजी ठंडी पड़ गई। ये माना जाने लगा कि उद्धव के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद शिवसेना ने अपने प्रवक्ता को वाणी पर संयम रखने की हिदायत दे दी। लेकिन हाल ही में कुछ ऐसी राजनीतिक घटनाएँ हुईं जिनके बाद शिवसेना अपनी मौलिक शैली पर लौटती दिख रही है। गत 13 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा आयोजित विपक्षी दलों की बैठक में शिवसेना को आमंत्रण नहीं मिला। उसके पहले वीर सावरकर के विरुद्ध कांग्रेस के कतिपय नेताओं द्वारा छेड़े गये अभियान पर भी शिवसेना कड़ा ऐतराज जता चुकी थी। यही नहीं तो महाराष्ट्र सरकार में कांग्रेस के कुछ मंत्री उद्धव ठाकरे से मिलकर महत्वहीन मंत्रालय मिलने पर नाराजगी भी जता चुके थे। कहते हैं उस दौरान काफी गर्मागर्म वार्तालाप भी हुआ। शिवसेना की मुसीबत ये है कि भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी उसके पास हो लेकिन सत्ता के असली सूत्र एनसीपी प्रमुख शरद पवार के पास ही हैं। लेकिन वह चाहकर भी उनके विरुद्ध कुछ नहीं कह पाती। सावरकर संबंधी बयानबाजी में भी एनसीपी कांग्रेस के साथ नहीं दिखी। ऐसे में शिवसेना ने कांग्रेस को कमजोर गोटी मानकर उस पर निशाना साधने की रणनीति अपनाई और उसी के अंतर्गत दो-तीन दिन पहले ऐसा बयान दे दिया जिससे कांग्रेस पूरी तरह तिलमिला गयी। श्री राउत ने पुणे में एक भाषण के दौरान आज के माफिया सरगनाओं को बौने कद का बताते हुए कह दिया कि हाजी मस्तान के आने पर लोग खड़े हो जाया करते थे। लेकिन उनके इस बयान ने तहलका मचा दिया जिसमें प्रधानमन्त्री रहते हुए इंदिरा गांधी के माफिया डॉन करीम लाला से मिलने आने की बात थी। स्मरणीय है करीम एक ज़माने में मुम्बई में अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह हुआ करता था। इस बयान के कारण कारण कांग्रेस सकते में आ गयी। और समय होता तब कांग्रेस ही नहीं बल्कि दीगर लोग भी श्री राउत की बात को राजनीतिक स्टंट बताकर उपेक्षित कर देते लेकिन ऐसे समय जब महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की कुर्सी कांग्रेस की बैसाखी पर टिकी हुई है, उनकी पार्टी के प्रवक्ता द्वारा इतना सनसनीखेज बयान देना साधारण बात नहीं मानी जा सकती। हालाँकि कांग्रेस द्वारा बेहद तीखी प्रतिक्रिया के बाद उन्होंने बयान वापिस ले लिया लेकिन उसका खंडन करने की बजाय ये और जोड़ दिया कि इंदिरा जी करीम लाला के पठान नेता होने के कारण उससे मिलने जाती थीं। लेकिन तब तक सोशल मीडिया सहित दूसरे माध्यमों ने लाला की आपराधिक गतिविधियों का चि_ा खोल दिया। इंदिरा जी के साथ उसके चित्र भी प्रसारित हो गए। सवाल ये है कि संजय ने ये सब जान बूझकर किया या अनजाने में। क्योंकि अब तक उद्धव ठाकरे या अन्य किसी और शिवसेना नेता ने उस बयान के समर्थन या विरोध में कुछ नहीं कहा। कुछ लोगों का ये भी मानना है कि श्री राउत को महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार बनवाने में निभाई गयी महत्वपूर्ण भूमिका के बाद भी खाली हाथ रह जाने का रंज है। और वे विघ्नसंतोषी के तौर पर सामने आकर खुद को स्थापित करने में जुट गये हैं। गौरतलब है उनका नाम संभावित मुख्यमंत्री के तौर पर भी उभरा था। हालाँकि इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि पार्टी प्रवक्ता के मुंह से विवादास्पद बयान दिलवाकर उद्धव ठाकरे कांग्रेस को सन्देश देना चाहते हैं कि वह उनकी उपेक्षा और वीर सावरकर की चरित्र ह्त्या का दुस्साहस करेगी तो उसे उसी शैली में जवाब मिलेगा। सच्चाई जो भी हो लेकिन श्री राउत ने अपना बयान वापिस लेने के बाद भी इंदिरा जी और करीम लाला की मुलाकात का खंडन नहीं किया। उनके ये कह देने से कि वे उससे पठान नेता के रूप में मिलती थीं, पूर्व में दिए बयान में छिपा आरोप नष्ट नहीं होता। अब गेंद कांग्रेस की पारी में है। उसे ये स्पष्ट करना चाहिए कि इन्दिरा जी करीम लाला से किस वजह से मिलती थीं? इंदिरा जी जैसी शक्तिशाली कही जाने वाली नेत्री किसी तस्कर की छवि वाले व्यक्ति से क्यों मिलती थीं ये निश्चित रूप से रहस्यमय है। भले ही श्री राउत ने कांग्रेस की आपत्ति के बाद अपने बयान को वापिस ले लिया किन्तु उनकी संशोधित टिप्पणी में भी पूर्व प्रधानमंत्री पर आक्षेप यथावत है। राजनीति के जानकार शिवसेना प्रवक्ता की बात का विश्लेषण कर रहे हैं। कुछ को लग रहा है कि उद्धव ठाकरे को कांग्रेस के साथ रहना असहज लगने लगा है। दरअसल दोनों एक दूसरे को पचा नहीं पा रहे हैं। बड़ी बात नहीं ठाकरे परिवार कांग्रेस को छेड़कर दोबारा भाजपा के साथ गलबहियां करने की कार्ययोजना में जुट गया हो। कांग्रेस द्वारा सावरकर के विरुद्ध की गई बयानबाजी के बाद विपक्ष की बैठक में शिवसेना को न्यौता नहीं दिया जाना और उसके बाद संजय राउत द्वारा इंदिरा जी का अपराधिक छवि के व्यक्ति से मिलने का खुलासा साधारण बातें नहीं है। इनके पीछे छिपे राजनीतिक मंतव्य भी देर-सवेर सामने आ जायेंगे। फिलहाल तो कांग्रेस को सांप-छछूदर वाली स्थिति से गुजरना पड़ रहा है क्योंकि श्री राउत के दोनों बयानों में एक बात शामिल है कि इंदिरा जी उस करीम लाला से मिलती थीं जिसे अपराध की दुनिया का बड़ा नाम माना जाता था।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 January 2020

ई कॉमर्स : व्यापारी के साथ ग्राहक की चिंता भी जरूरी



समय के साथ बहुत कुछ बदलता है और व्यापार भी अपवाद नहीं है। तकनीक के विकास ने जो बदलाव किये उनके प्रभावस्वरूप ग्राहक के बाजार जाने की बजाय बाजार ग्राहक तक पहुँचने लगा। ऑनलाइन व्यापार या ई कॉमर्स के नाम से जानी जाने वाली इस प्रणाली ने परम्परागत व्यापार की समूची संस्कृति बदल डाली। इसमें ऐसे अनेक फायदे हैं जिनकी वजह से ग्राहक इसके साथ जुड़ता चला जाता है। अव्वल तो उसे बाजार जाने की झंझट से मुक्ति मिल जाती है और फिरर दाम भी कम देने पड़ते हैं। चीज पसंद नहीं आने पर लौटाने की सुविधा भी है। समय - समय पर निकलने वाले विशेष ऑफर्स के जरिये ग्राहकों को अकल्पनीय रियायतें भी दी जाती हैं। ऑनलाइन कम्पनियां ग्राहकों को संचार माध्यमों से नए उत्पादों के बारे में जानकारी भी उपलब्ध करवा देती हैं। ग्राहक के पास बिना बाजार में भटके ही किसी चीज के प्रतिस्पर्धात्मक दामों की तुलना करते हुए अपनी पसंद चुनने का अवसर भी रहता है। उपभोक्तावाद के विस्तार के साथ ही ऑनलाइन कंपनियों का कारोबार बढ़ता चला गया। पहले इसकी मौजूदगी केवल विकसित देशों में ही थी लेकिन इंटरनेट ने देशों की दूरियां मिटा दीं। नतीजतन आज पूरे विश्व में ई कॉमर्स फैल गया। लेकिन इससे व्यापार के परम्परागत ढांचे को जबर्दस्त नुकसान भी हो रहा है। भारत जैसे देश में जहां करोड़ों छोटे - छोटे व्यापारी अर्थव्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा हैं , ऑनलाइन व्यापार ने उनके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर दिया है। उदारीकरण के आगमन के बाद जब छोटे व्यापार में भी बड़े औद्योगिक घरानों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई तब इसका विरोध हुआ लेकिन बाजारवादी ताकतें सरकार पर हावी होती गईं और खुदरा व्यापार में भी बड़ी देशी कम्पनियां कूद पड़ीं। बात यहीं तक सीमित रहती तब भी ठीक था लेकिन उनके पीछे या यूँ कहें कि उनका साथ लेकर दुनिया की अनेक बड़ी ऑनलाइन कम्पनियां ही नहीं बल्कि रिटेल स्टोर्स की श्रंखला भी भारत में घुस बैठी। पहले इनकी मौजूदगी केवल महानगरों में थी लेकिन धीरे - धीरे मझोले शहरों में भी ये जम गए। बड़ी कम्पनियों के शो रूम के बाद मॉल संस्कृति आई। उसने भी छोटे और मध्यम व्यापारी की कमर तोड़ी। लेकिन सबसे बड़ा धक्का लगा ऑनलाइन व्यापार से। इन दिनों दुनिया की सबसे बड़ी ई कॉमर्स कम्पनी अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस भारत आये हुए हैं। गत दिवस उन्होंने भारत में अपने कारोबार के विस्तार के सम्बन्ध में रिटेल व्यापार से जुड़े औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधियों को संबोधित किया। वे एक उत्प्रेरक की तरह बोले। उनके विरोध में देश भर में व्यापारियों ने प्रदर्शन किये। श्री बेजोस ने अपने संबोधन में अरबों रूपये की निवेश की घोषणा भी कर डाली। भारत के अनेक औद्योगिक घराने उनके साथ व्यावसायिक भागीदारी करने के इच्छुक भी दिखाई दे रहे हैं। अमेजन के मालिक ने भारत में हो रहे विरोध को देखते हुए आने वाले कुछ वर्षों के भीतर मेक इन इण्डिया के अंतर्गत बनने वाले सामान के निर्यात का भी आश्वासन दिया जिसका मूल्य 71 हजार करोड़ होगा। यही नहीं उन्होंने भारत में छोटे और मध्यम कारोबारियों को डिजिटलाइज करने पर भी मोटी रकम खर्च करने की बात कही। लेकिन बात केवल अमेजन तक सीमित रखने से ही ऑनलाइन कारोबार को लेकर हो रही बहस और विरोध की चर्चा पूरी नहीं हो सकेगी। भारत में भी रिलायंस, टाटा, बिरला, बियाणी और अन्य जाने - अनजाने कारोबारियों ने भी रिटेल व्यापार में कदम बढ़ाकर छोटे और मझोले स्तर के व्यापारी को बर्बाद करने का इंतजाम कर दिया है। बीते दशहरा-दीपावली सीजन में जब व्यापार जगत आर्थिक मंदी का रोना रोते हुए ग्राहकों की कमी से परेशान था तब ऑनलाइन कंपनियों की बिक्री लगभग 50 हजार करोड़ के आसपास बताई गयी। एक महंगे मोबाइल फोन की ऑनलाइन बिक्री के महज 36 घंटे के भीतर ही 750 करोड़ के आंकड़े को छू जाना ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि एक अदृश्य बाजार तेजी से सक्रिय रहते हुए अपना दायरा बढ़ाने में जुटा हुआ है। इसके लिए केवल सरकारी नीतियों और बाजारवादी ताकतों को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि भारत के त्रिस्तरीय व्यापारिक ढांचे में मुनाफे के बंटवारे की जो प्रणाली प्रचलित है उसमें ग्राहकों की बजाय व्यापार करने वाले के फायदे पर ही ध्यान दिया जाता रहा। ऑनलाइन और रिटेल स्टोर्स ने ग्राहकों के लाभ पर ध्यान केन्द्रित कर बीच की अनेक कडिय़ों को अलग करते हुए उत्पादक और ग्राहक के बीच सीधा सम्बन्ध कायम किया जिसकी वजह से मुनाफे में हिस्सेदार घटे और उपभोक्ता को उम्मीद से ज्यादा फायदा होने लगा। ऑनलाइन कम्पनियों ने अब नई योजना भी बनाई है जिसके तहत वे दुकानदारों के नेटवर्क का उपयोग करते हुए अपना माल ग्राहकों तक पहुँचाने का तरीका लागू करेंगी। रिलायंस जियो और उस जैसी दूसरी कम्पनियां भी इस दिशा में आगे बढ़ रही हैं। अमेजन के मालिक ने भारत के छोटे और मध्यम कारोबार को डिजिटलाइज करने पर करोड़ों खर्च करने की जो बात की है उसके पीछे भी यही सोच है। लेकिन इस सबके बीच सोचने वाली बात ये है कि भारत में आज भी करोड़ों ऐसे छोटे व्यापारी हैं जो तकनीक और व्यापार के आधुनिक तौर तरीकों से अनजान हैं। सुदूर गाँव में बैठे खुदरा व्यापारी को रातों-रात आधुनिकता के सांचे में ढाल देना आसान नहीं होगा। और फिर हर छोटे-मध्यम कारोबारी के साथ कुछ कर्मचारी या उसके परिजन भी जुड़े होते हैं। यदि पूरा का पूरा व्यापार रिटेल स्टोर्स और ऑनलाइन में सिमटकर रह गया तब बेरोजगारी के आंकड़े कहाँ जाकर रुकेंगे ये सोचकर भी डर लगता है। लेकिन इसके लिए परम्परागत शैली के उत्पादकों और व्यापारियों को भी बदले हुए हालातों में ग्राहकों के हितों के प्रति अधिक संवेदनशील होना पड़ेगा। यदि ग्राहक को घर बैठे कोई चीज मिले और वह भी कम दाम पर तो वह व्यापारी के पास क्यों जाएगा? हाल ही के वर्षों में होटलों की बुकिंग और रेस्टारेंट से भोजन घर पहुँचाने का कारोबार जिस तेजी से बढ़ा उसके पीछे भी ग्राहक को मिल रही सुविधा और किफायत की बड़ी भूमिका है। ये बात सही है कि छोटे व्यापारी के लिए इस तरह की प्रतिस्पर्धा करना असम्भव है। इसलिए अब सरकार की भूमिका पर सबकी नजर जाती है। ये कहने में कोई गलती नहीं होगी कि बीते तीन दशक से केंद्र और राज्यों की सरकारों के दिमाग पर जिन आर्थिक सुधारों का भूत सवार है उसमें भारत की जमीनी हकीकत को पूरी तरह से उपेक्षित किया जाता रहा। यदि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़े औद्योगिक घरानों की घुसपैठ को समय रहते रोकते हुए ग्राहकों के लाभ की समुचित व्यवस्था की गयी होती तब अमेजन के मालिक भारत में आकर दरियादिली नहीं दिखा पाते। खैर , अभी भी देर नहीं हुई है। सरकार को चाहिए कि वह व्यापार के चंद हाथों में सीमित हो जाने के सिलसिले को रोकने के लिए कदम उठाये वरना विदेशी कम्पनियों के बढ़ते कदम पहले छोटे और मध्यम व्यापरियों को रौदेंगे और उसके बाद बड़े धनकुबेरों को। इसके पहले कि स्थिति बेकाबू होते हुए अराजकता को जन्म दे, संभल जाना चाहिए क्योंकि नया उपनिवेशवाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कंधों पर बैठकर आ रहा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 January 2020

आर्थिक मंदी में भी बढ़ रहा भ्रष्टाचार उद्योग



केन्द्रीय बजट आने के एक पखवाड़े पहले खुदरा महंगाई के जो आंकड़े आये हैं उनकी वजह से मोदी सरकार का मानसिक बोझ बढ़ गया है। आर्थिक मंदी में आम तौर पर मांग कम होने से दाम गिरते हैं। लेकिन बीते कुछ महीनों में रोजमर्रे की चीजों के मूल्यों में वृद्धि के कारण महंगाई बढ़ गई। हालाँकि इसका कारण अधिक वर्षा से खराब हुई सब्जियां एवं अन्य फसलें भी हैं। प्याज तो खैर, हर साल ही हड़कंप मचाता है लेकिन इस साल मानसून लंबा खिंच गया। महाराष्ट्र में इस वजह से गन्ने की पैदावार कम हुई है जिससे आने वाले समय में चीनी के दाम बढऩा तय है। रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बावजूद यदि महंगाई बीते पांच साल के उच्चतम स्तर तक आ गयी तब सरकार के लिए चिन्तन और चिंता दोनों की परिस्थितियाँ बन गई हैं। यद्यपि प्याज के अलावा बाकी हरी सब्जियों के दाम बीते कुछ दिनों में लगातार नीचे आने से हो सकता है बजट पेश होने तक तक महंगाई के आंकड़े कुछ नीचे आ जाएं लेकिन गन्ना और दलहन के साथ ही धान की फसल को अतिवृष्टि से हुए नुकसान से आने वाले दिनों में एक बार फिर खुदरा महंगाई सिरदर्द बन सकती है। सबसे बड़ी बात ये है कि रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं जहां घट रही हैं वहीं नगदी की कमी दूर करने के बारे में उसका लचीला रवैया भी कड़ाई में बदल सकता है। अर्थशास्त्री भी इस बात को लेकर भौचक हैं कि बाजार में नगदी की किल्लत के बावजूद महंगाई बढऩे की स्थिति कैसे बनी। अर्थशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार बाजार में मुद्रास्फीति (नगदी के अतिरिक्त चलन) की वजह से मांग बढ़ती है जो महंगाई का कारण बन जाती है। लेकिन भारतीय बाजार बीते दो-तीन साल से मुद्रा संकुचन की समस्या से जूझते आ रहे हैं। नोटबंदी को इसका सबसे प्रमुख कारण माना जाता रहा है। उससे उद्योग व्यापार जगत उबर पाता उसके पहले ही जीएसटी लागू हो जाने से समस्या और जटिल हो गई। वैसे उक्त दोनों कदमों का प्रारम्भिक तौर पर तो स्वागत हुआ लेकिन उनके अमल में जो अनिश्चितता और अव्यवस्था हुई उसकी वजह से परिणाम प्रतिकूल हो गए। वैसे इसका दूसरा पहलू ये भी है कि उक्त दोनों कदमों से काले धन से होने वाला कारोबार ठंडा पड़ गया जिसकी वजह से समानांतर अर्थव्यवस्था सिमटने को आ गई। लेकिन इससे बाजार में मांग घटी जिसका दुष्प्रभाव अंतत: उत्पादन और उसके साथ ही रोजगार गिरने के रूप में सामने आया। केंद्र सरकार की समूची राजनीतिक कामयाबी आर्थिक मोर्चे पर आकर सवालों के घेरे में इसलिए फंसकर रह जाती है क्योंकि इस स्थिति से निकलने की अवधि और तरकीब को लेकर सत्ता पक्ष पूरी तरह खामोश बना हुआ है। प्रधानमंत्री ने बीते दिनों उद्योगपतियों सहित कुछ जानकारों से प्रत्यक्ष बातचीत करते हुए सुझाव मांगे लेकिन वे सब बजट की दिशा तय करने के लिये थे जो अमूमन हर साल होता है। सवाल ये है कि इस स्थिति से देश निकलेगा कैसे? कुछ लोगों का ये भी कहना है कि मोदी सरकार ने बीते पांच वर्षों में रक्षा सौदों में जो बड़ी धनराशि खर्च कर दी उससे भी अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया लेकिन वह ऐसी जरूरत थी जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी बात जो समझ में आती है वह है आर्थिक मोर्चे पर दीर्घकालीन नीतियों के अभाव की। हमारे देश में करों को लेकर कोई ये नहीं बता सकता कि आज जो दरें हैं वे कब तक जारी रहेंगी? पिछले बजट में सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया था। इसका मकसद सोने की खरीदी पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा है। बीते कुछ महीनों में स्वर्ण आयात घटने की खबरें भी आईं लेकिन दूसरी तरफ  स्वर्ण आभूषणों का निर्यात घटने से इस व्यवसाय को जमकर घाटा हुआ। अब खबर है कि आगामी बजट में सोने के आयात पर शुल्क फिर से कम किया जा रहा है। इसी तरह से आयकर की दरों को लेकर भी अनिश्चितता बनी रहती है। आगामी बजट के पहले की परिस्थितियों में सरकार बेहद दबाव में है लेकिन उसे ऐसे फैसले लेने चाहिए जो ठोस हों और नीतिगत अनिश्चितता से मुक्त रहें। चंद उद्योगपतियों से मिली सलाह के आधार पर बजट बनाने की बजाय आम जनता को ध्यान में रखते हुए यदि आर्थिक नियोजन किया जावे तो उसके परिणाम कहीं बेहतर होंगे। देश में आलीशान कारों की बजाय छोटे दोपहिया वाहनों को सस्ता किया जाना कहीं जरूरी है। रही बात बेरोजगारी की तो सरकार को श्रम कानूनों में सुधार करना चाहिए जिनकी वजह से नौकरियों पर संकट है। न्यूनतम मजदूरी तय करने से श्रमिकों का शोषण रोकने के प्रयास का नकारात्मक प्रभाव भी हुआ। बेहतर हो इस बारे में मांग और पूर्ति के सिद्धान्त्त को भी ध्यान में रखा जावे। ऊंचे वेतनमान के कारण ही अंतत: सरकार भी नई नौकरी निकालने की बजाय संविदा नियुक्तियों और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों से काम चला रही है। लेकिन निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं पर दर्जनों श्रम कानूनों का बोझ लाद दिया गया है। खुदरा मंहगाई की दरों में वृद्धि का हल्ला तो कमजोर पड़ सकता है किन्तु बेरोजगारी दूर करने के लिए सरकार को श्रम कानूनों और सेवा शत्र्तों में लचीलापन लाना होगा। आर्थिक सुधारों के लिहाज से भी ये बेहद जरूरी हैं। रही बात बजट की तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पास सीमित विकल्प हैं। राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने के लिए सरकारी खर्च कम करना होगा और वैसा करने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। अच्छा तो यही होगा सरकार आर्थिक क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाए और इसके लिए आयकर की समाप्ति जैसे किसी क्रांतिकारी कदम की जरूरत है। सरकार माने या न माने लेकिन नोटबंदी इसी दिशा में बढ़ाया गया कदम था। बजट में करों की कमी से ज्यादा जरूरत सरकारी अमले के भ्रष्टाचार को रोकने की है। प्रधानमंत्री भले ही न खाउंगा के अपने दावे को सही साबित करते रहे हों लेकिन न खाने दूंगा वाली बात को वे लागू नहीं करवा पाए। भ्रष्टाचार रूपी दीमक समूची व्यवस्था को चाट रहा है। आगामी बजट में यदि सरकार आर्थिक नीतियों को भ्रष्टाचार से मुक्त करवाने का पुख्ता इंतजाम कर सके तभी निराशा का वर्तमान माहौल दूर हो सकेगा। सत्ता के शीर्ष पर विराजमान महानुभावों को ये बात अच्छी तरह से जान लेनी चाहिए कि आर्थिक मंदी के बाद भी सरकारी अमले के भ्रष्टाचार का कारोबार जमकर फल फूल रहा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी