Monday, 3 February 2020

बजट : रंगहीन , गंधहीन , स्वादहीन



बीते शनिवार को आगामी वित्तीय वर्ष का जो केन्द्रीय बजट लोकसभा में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया वह एक अबूझ पहेली बनकर रह गया है। विपक्ष को तो खैर उसकी आलोचना करनी ही थी लेकिन सत्ता पक्ष भी ये बताने की स्थिति में नहीं है कि बजट की तारीफ किस आधार पर की जाए। लगता है वित्तमंत्री की सोच में दार्शनिकता ज्यादा है जिसकी वजह से बजट को समझने के लिए ध्यान लगाने की जरूरत पड़े। लेकिन आम बजट कहलाने के कारण यह देश के आम जन को सीधे प्रभावित करता है इसलिए साधारण व्यक्ति भी उसमें अपने लाभ खोजता है। वैसे कड़वा सच तो ये है कि बजट बनता चंद औद्योगिक घरानों के हित संवर्धन के लिए है क्योंकि अर्थव्यवस्था का समूचा खाका उन्हीं पर निर्भर रहता है। जहां तक बात आयकर जैसे प्रत्यक्ष कर की है तो वह सरकारी राजस्व का बहुत ही छोटा हिस्सा है और उसे चुकाने वाले भी आबादी के लिहाज से बेहद कम ही हैं। बावजूद इसके बजट का यही पहलू सबसे ज्यादा चर्चित और विवादित होता है। उस दृष्टि से वित्तमंत्री ने बजाय राहत देने के बाजीगरी का सहारा लिया। एक हाथ से छूट बढ़ाई लेकिन दूसरे हाथ से उसे छीन भी लिया। ऐसा करने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं वे बाजारवाद से पे्ररित लगते हैं। करदाता को बचत पर कर छूट दिए जाने की बजाय उसे खर्च करने के लिए प्रेरित करना आर्थिक सुस्ती दूर करने के मद्देनजर एक उपाय हो सकता है लेकिन भारतीय मानसिकता आज भी पश्चिम की उपभोक्ता संस्कृति से सर्वथा भिन्न है। खाओ, पियो मौज करो की बजाय आज की बचत कल की सुरक्षा आम भारतीय के आर्थिक चिंतन का आधार सदियों से रहा है। उस दृष्टि से ऐसी कोई भी व्यवस्था भारतीय परिवेश में आदर्श नहीं हो सकती जो साधारण हैसियत के व्यक्ति को बचत के संस्कार से दूर भगाए। उस दृष्टि से वित्तमंत्री ने आयकर ढांचे में जो बदलाव किये वे अटपटे, अपर्याप्त और कुछ हद तक अनावश्यक भी लगते हैं। यद्यपि उन्होंने करदाताओं को आयकर विभाग द्वारा भयाक्रांत करते हुए प्रताडि़त किये जाने पर रोक लगाने के जो आश्वासन दिए वे जरुर स्वागतयोग्य हैं लेकिन लौट फिरकर बात फिर वहीं आ जाती है कि इससे मध्यमवर्ग को कोई राहत नहीं मिलेगी। इसी तरह निर्मला जी ने अन्य क्षेत्रों के लिए जो प्रावधान किये उनसे आर्थिक सुस्ती दूर हो सकेगी, उसमें भी संदेह है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण विकास के किये अवश्य बजट में जो घोषणाएं की गईं वे निश्चित रूप से असरकारक होगीं किन्तु उनसे तात्कालिक तौर पर राहत की उम्मीद करना बेमानी होगा। ऊर्जा क्षेत्र में एक सुधार अवश्य स्वागत योग्य है जिसके तहत किसान अपनी गैर उपजाऊ भूमि का उपयोग सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए कर सकेंगे तथा अतिरिक्त बिजली ग्रिड के जरिये सरकार खरीद लेगी। देश में ऊर्जा संकट हल करने के साथ ही किसान को सस्ती बिजली देने का ये प्रयास सही सोच है। इसी तरह ग्रामीण विकास के लिए किये गये अन्य प्रावधान भी दूरगामी लाभ देने वाले हैं। जहां तक बात इन्फ्रास्ट्रक्चर की है तो ये इस सरकार का प्रिय विषय रहा है और श्रीमती सीतारमण ने इस क्षेत्र को भरपूर राशि दी है जो सीमेंट, लोहा जैसे उद्योगों को सहारा देने के साथ ही रोजगार भी देगा। इसी तरह सस्ते आवासीय मकान बनाने और खरीदने वालों को करों में दी जा रही छूट की अवधि में वृद्धि भी राहत देने वाली है लेकिन हाऊसिंग क्षेत्र के जो प्रकल्प बंद पड़े हैं उन्हें पुनर्जीवित करने के बारे में बजट में ज्यादा कुछ नहीं है जो व्यापार और रोजगार दोनों के लिए बड़ा सहारा है। मोदी सरकार की दूसरी पारी के इस बजट में शिक्षा, विशेष रूप से चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पेश की गई जिसके तहत हर जिले में मेडिकल कालेज खोलकर उसे जिला अस्पताल से जोड़ा जाएगा। देश में डाक्टरों की कमी और बेहतर चिकित्सा सेवाओं को छोटे शहरों तक पहुँचाने की दिशा में ये एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है लेकिन अव्वल तो इसमें आर्थिक संसाधनों की कमी बाधक बनेगी वहीं दूसरी तरफ  शिक्षकों का अभाव भी समस्या पैदा करेगा। उल्लेखनीय है देश के अधिकतर मेडिकल कालेजों में अध्यापकों की कमी की वजह से उनकी मान्यता पर सदैव तलवार लटका करती है। विदेशी छात्रों को भारत में शिक्षा ग्रहण करने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने और विश्वस्तरीय संस्थान खोलने के लिए निवेश की राह खोलना भी अच्छा निर्णय है बशर्ते इसे ठीक से लागू किया जा सके। अनेक वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर घरेलू उद्योगों को प्राणवायु देने का निर्णय देर से उठाया गया सही कदम है जिसका दायरा और बढ़ाने की जरूरत है। इसी तरह मेक इन इंडिया को और विस्तार देते हुए असेम्बलिंग हब बनाने का प्रावधान भी उत्साहित करता है। ये सोच बड़ी ही सामयिक है क्योंकि अमेरिकी दबाव के कारण चीन से ढेर सारे उद्योग बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी में है। सस्ते श्रमिक की उनकी जरूरत भारत पूरी कर सकता है। कोरोना वायरस के कारण भी चीन में आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होना तय है। लेकिन सरकार को अपनी नौकरशाही पर लगाम लगानी होगी जो नये उद्यमियों को चप्पलें घिसवाने में अपनी शान समझती है। इस बजट की सर्वाधिक आलोचना जिस कारण से हो रही है वह है सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश का फैसला। एयर इंडिया, भारत पेट्रोलियम, आईडीबीआई और रेलवे के बाद भारतीय जीवन बीमा निगम में सरकार द्वारा अपनी हिस्सेदारी बेचकर राजस्व जुटाने को लेकर न केवल विपक्ष बल्कि वरन आम जनता भी सशंकित है। भारत जैसे परम्परावादी देश में तंगी के बाद भी साधारण व्यक्ति तक पुश्तैनी संपत्ति बेचने में शर्म और दर्द दोनों महसूस करता है। उक्त संस्थानों में जीवन बीमा निगम ऐसा है जिससे बड़ी संख्या में देशवासी अपना सुरक्षित भविष्य देखते हैं। इसी तरह रेलवे में निजी ट्रेन चलवाने से शुरू प्रक्रिया अंतत: उसके निजीकरण पर जाकर रुकेगी ऐसा भी प्रचारित हो रहा है। विनिवेश आर्थिक सुधारों की उस सोच पर आधारित है जिसमें घाटे वाली किसी भी इकाई को चलाते रहना निरी मूर्खता के साथ ही आत्मघाती माना जाता है। बीएसएनएल जैसे उपक्रमों का जब तक एकाधिकार रहा तब तक वे खूब फले फूले लेकिन प्रतिस्पर्धा में मात खा गए जिसके लिए सरकार भी कम दोषी नहीं है। एयर इंडिया भी उसी श्रेणी में है। अनेक अर्थशास्त्री घाटे वाले उद्यमों के विनिवेश के प्रशंसक हैं लेकिन आम जनता के मन में सरकार को ये भरोसा जगाना होगा कि वह ऐसा क्यों कर रही है और इससे देश को क्या लाभ होगा? इस बजट की तारीफ  और आलोचना दोनों के लिए गुंजाईश इसलिए कम है क्योंकि एक तो ये आर्थिक मंदी या सुस्ती के दौर का है दूसरी बात जो ज्यादा महत्वपूर्ण है वह है आम चुनाव में अभी चार साल का समय होना। जिन लोगों को ये लगता था कि मोदी सरकार दिल्ली विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर मध्यम आय वर्ग और व्यापारी समुदाय को लुभाने वाले निर्णय करेगी उन्हें निराशा हुई होगी लेकिन पिछले पांच साल का अनुभव ये बताता है कि प्रधानमन्त्री ऐसे फैसले लेने में विश्वास करते हैं जिनका दूरगामी असर पड़े। अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति के बाद भी अति साधारण बजट पेश करने के पीछे एक सोच ये भी है कि आगामी वर्ष में जीएसटी के कारण उत्पन्न समस्याएँ हल हो जायेंगीं और सरकार को पर्याप्त राजस्व मिलने से उसका खर्च बढ़ेगा जिसका असर बाजार में छाई सुस्ती दूर होने के रूप में सामने आयेगा। बहरहाल जैसा शुरू में कहा गया निर्मला सीतारमण के रिकार्ड लम्बाई वाले बजट भाषण में ज्यादातर नाउम्मीदी का एहसास हुआ। इसीलिये आम जनता की नजर में ये एक रंगहीन, गंधहीन और स्वाधीन बजट है। इसके फायदे जब होंगे तब होंगे लेकिन फिलहाल तो इसका आना न आना बराबर ही है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 1 February 2020

घोषणापत्र : घूस का वैधानिक तरीका



केन्द्रीय बजट पेश होने के एक दिन पहले ही भाजपा ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिये अपना संकल्प पत्र जारी करते हुए सौगातों की बौछार कर डाली। इनमें छात्राओं को मुफ्त स्कूटी, बेटी को 21 साल की होने पर 2 लाख रु. और गरीबों को 2 रु. प्रति किलो की कीमत पर शुद्ध आटा देने का वायदा है। केजरीवाल सरकार द्वारा दी जा रही पेयजल और बिजली की सब्सिडी यथावत रखने की बात भी संकल्प पत्र में शामिल है। समाज के बाकी तबकों को लुभाने वाले कुछ और वायदे भी संकल्प पत्र का हिस्सा हैं। चूँकि मुफ्त उपहार अब भारतीय चुनावी राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं इसलिए दिल्ली में भाजपा संगठन के कर्ताधर्ताओं को इसके लिए कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता किन्तु सवाल ये है कि देश की राजधानी में भी यदि इस तरह के लालच देने पड़ते हों तब सुदूर हिस्सों में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए क्या-क्या करना पड़ता होगा ये विश्लेषण का विषय है। आजादी के बाद जब चुनाव शुरू हुए तब ये बात सुनाई देती थी कि फलां प्रत्यशी ने शराब और कम्बल बांटे। किसी जाति विशेष को प्रभावित करने के लिए उनके संगठनों को सामान आदि देने की बातें सामने आती थीं। मतदाताओं पर नियंत्रण रखने वाले बाहुबलियों को खुश रखना भी चुनावी राजनीति का हिस्सा था। मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ढोकर लाने के लिए वाहन उपलब्ध करवाना भी आम था। धीरे-धीरे चुनाव आयोग की सख्ती और सुधारवादी कदमों की वजह से उक्त तौर-तरीकों में ये बदलाव हुआ कि जो काम खुले आम होता था वह छुपाकर होने लगा। और उसकी जगह वैधानिक घूसखोरी आ गयी जिसे चुनावी घोषणा पत्र या संकल्प अथवा वचन पत्र का नाम दिया जाने लगा। इसकी शुरुवात किसने की ये भले ही शोध का विषय हो लेकिन आज की भारतीय राजनीति इसके बिना संभव नहीं रही। किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था में आम जनता के हितों का संरक्षण शासक का कर्तव्य होता है। राजतंत्र के दौर में भी जो लोकप्रिय शासक हुए उन सबने जनता के हितार्थ अपने खजाने खोले। उस दृष्टि से यदि हमारे देश की राजनीतिक जमातें और उनके नेता चुनाव में मतदाताओं को मुफ्त में कुछ देने का वायदा करते हैं तो उसे गलत ठहराना आसान नहीं होता। प्रजातंत्र की समूची परिकल्पना आखिर है तो जनकल्याण पर केन्द्रित ही। जिन-जिन देशों में जनतांत्रिक प्रणाली सफलतापूर्वक संचालित हो रही है वहां भी जनता के कल्याण के लिए सरकार दिल खोलकर खर्च करती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन, आमोद प्रमोद जैसे विषय सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में होते हैं। चुनाव के दौरान वहां भी मतदाताओं को लुभाने के लिए अनेक नीतियों और कार्यक्रमों की घोषणा होती है। लेकिन हमारे देश में उसका स्वरूप बेहद घटिया हो गया है। मतदाता को एक तरह से उपभोक्ता मानकर जिस तरह के ऑफर दिए जाने लगे हैं उनकी वजह से चुनावों की पवित्रता नष्ट हुई जिसका दुष्परिणाम अंतत: अर्थव्यवस्था का कचूमर निकलने के तौर पर सामने आ रहा है। जिन राज्यों में सत्ताधीशों ने मुफ्तखोरी को अपनी राजनीति का आधार बनाया वे सत्ता में बने रहने में भले सफल रहे हों लेकिन उनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने बिजली-पानी पर जो सब्सिडी दी उससे लोगों को फायदा जरुर हुआ लेकिन दिल्ली सरकार के खजाने पर जो असर पड़ा उसके दूरगामी नुकसान सामने आने बाकी हैं। महानगर होने से दिल्ली में करों से भरपूर आय होती है लेकिन बाकी राज्यों के पास राजस्व वसूली के उतने स्रोत नहीं होने से वहां का आर्थिक प्रबंधन मुफ्तखोरी की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। आम जनता के नजरिये से देखें तो ऐसी योजनाएं स्वागतयोग्य हैं लेकिन उनको लागू करने की लिए राज्यों की सरकारें लगातार कर्ज लेती जा रही हैं। उनके भुगतान हेतु उन्हें नये कर लगाने पड़ते हैं। पेट्रोल और डीजल इसके उदहारण हैं। आजकल लगभग हर राजनीतिक दल चुनावों के दौरान किसानों को मुफ्त या सस्ती बिजली के अलावा उनके ऋण माफ करने जैसा वायदा करने में नहीं हिचकता। राहुल गांधी जैसे नेता तो चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता में आते ही दस-पंद्रह दिन के भीतर किसानों के कर्ज माफ करने का दावा करने से नहीं चूकते। इसका फायदा भी उनकी पार्टी को मिलता है लेकिन सत्ता में आने के बाद इस वायदे को पूरा करने में जो व्यावहारिक परेशानियां आती हैं उनकी जानकारी मप्र, राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से ली जा सकती है। दिल्ली में भाजपा ने स्कूटी और 2 रु. प्रति किलो की कीमत पर आटा देने का जो वायदा किया वह नई बात नहीं है। जिन राज्यों में उसका शासन रहा वहां भी सस्ते अनाज, मुफ्त सायकिल, लड़कियों के खाते में जन्म पर ही एक लाख रु. और मुफ्त शिक्षा जैसे कार्यक्रम चलाये गए लेकिन उसके बाद भी 2018 में पार्टी को अपने ऐसे कुछ राज्य गंवाने पड़ गए जहां वह 10 साल से भी ज्यादा सत्ता में रही। बावजूद इसके मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर चुनाव जीतने की प्रवृत्ति से बचने की बजाय उसे नये रूप में लागू करना ये दर्शाता है कि हमारी राजनीति दिशाहीन हो चुकी है। नब्बे के दशक में जातिवादी राजनीति का नया रूप सामने आया था उसके कारण सरकारी नौकरियों में आरक्षण को नई-नई पैकिंग में पेश किया जाने लगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई सीमा रेखा को लांघने का दुस्साहस भी हुआ। इसका जो चुनावी लाभ हुआ वह अपनी जगह है लेकिन सरकार ने नौकरियां बाँटने से ही ही परहेज करते हुए निजीकरण का रास्ता अपना लिया। राजनीतिक फैसलों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता ही है। आज देश जिस तरह के आर्थिक भंवर में फंसा है उसके लिए मुफ्त उपहार वाली राजनीति काफी हद तक जिम्मेदार है। गरीबों का उत्थान हर तरह से होना चाहिए लेकिन चुनाव जीतने के लिए मुफ्त उपहार बांटने की इस संस्कृति का कहीं न कहीं तो अंत करना ही पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग दोनों ही घोषणापत्र के नाम पर दी जाने वाली सौगातों पर दबी जुबान सवाल उठा चुके हैं। चुनाव सुधारों को लेकर होने वाली चर्चाओं में भी ये विषय उठता है लेकिन राजनीतिक दलों को इसकी चिंता कतई नहीं है। ऐसा लगता है सर्वोच्च न्यायालय को ही कुछ करना पड़ेगा। चुनाव प्रचार के दौरान किसी भिखारी को प्रत्याशी द्वारा कुछ रूपये दिए जाने पर आचार संहिता के उल्लंघन का प्रकरण दर्ज हो जाता हैं लेकिन घोषणापत्र के जरिये खुले आम लालच दिए जाने को गलत नहीं मानना मजाक नहीं तो और क्या है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 31 January 2020

बजट सत्र : हमेशा की तरह हंगामेदार रहेगा



संसदीय प्रणाली में कुछ परम्पराओं का पालन कर्मकांड की तरह से होता है। उन्हीं में से एक है संसद का सत्र शुरू होने से पहले अध्यक्ष द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए सबसे सहयोग का वायदा ले लेना। इस बैठक में सरकार विपक्ष को अपने मुद्दे उठाने का अवसर देने का आश्वासन देती है तो विपक्ष भी सहयोग का वायदा करता है। इसी कर्मकांड के निर्वहन हेतु गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष ने सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमें हमेशा की तरह सत्ता और विपक्ष की तरफ  से संसद की गरिमा बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई गई। बजट सत्र होने से  इसका विशेष महत्व है। जैसी संसदीय कार्य मंत्री ने जानकारी दी उसके मुताबिक सरकार 45 नए विधेयक इस दौरान पेश करना चाह रही है। नई लोकसभा बनने के बाद बीते दो सत्रों में सत्ता पक्ष ने जिस तरह की तेजी दिखाई वैसा ही इस बार भी उसका इरादा है वहीं विपक्ष ने कल की बैठक में संकेत कर दिया कि सीएए को लेकर जो उथलपुथल देश भर में है उस पर वह सरकार को घेरने का भरपूर प्रयास करेगा। पिछले सत्र में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित करवाकर सरकार ने विपक्ष को शिकस्त दे दी थी किन्तु उसके क़ानून बन जाने के बाद पहले पूर्वोत्तर राज्यों और उनके बाद देश के अनेक हिस्सों में जिस तरह का संगठित विरोध सामने आया उससे विपक्ष का हौसला मजबूत हुआ है। खास तौर पर दिल्ली के जामिया विवि और जेएनयू में हुई घटनाएं तथा शाहीन बाग़ में चल रहे मुस्लिम महिलाओं के धरने की प्रतिक्रियास्वरूप पूरे देश में जो आन्दोलन हो रहे हैं उसके कारण विपक्ष के पास आक्रामक होने के पर्याप्त मुद्दे होंगे। और फिर बजट तो वैसे भी अपने आप में सबसे बड़ा मुद्दा है। अर्थव्यवस्था की चिंताजानक स्थिति की वजह से यूँ भी सत्ता पक्ष रक्षात्मक ही रहेगा। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में छात्र संगठन सीएए की आड़ में उग्र बने हुए हैं। मुस्लिम समुदाय ने तो इस कानून के विरोध में आसमान सिर पर उठा रखा है। ऐसी स्थिति में सरकार पर लोक-लुभावन बजट पेश करने का दबाव है जो कि आर्थिक स्थिति के मद्देनजर काफी कठिन कार्य है। सरकार की चिंता का एक और कारण आगामी सप्ताह होने जा रहा दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी है। कुछ दिन पहले तक जितने भी अनुमान और आकलन आये उनके अनुसार वहां 2015 की ही तरह अरविन्द केजरीवाल की इकतरफा लहर थी लेकिन ताजा संकेतों के मुताबिक शाहीन बाग़ में चल रहे मुस्लिम महिलाओं के धरने की वजह से दिल्ली में मतों का धु्रवीकरण होने की संभावना भी है जिसके कारण भाजपा को लड़ाई में लौटने की उम्मीद नजर आ रही है। दिल्ली में अगर केजरीवाल सरकार पूर्वानुमानों के मुताबिक अच्छे-खासे बहुमत से लौटी तब बजट सत्र के उत्तरार्ध में विपक्ष के पास हमलावर होने का जबर्दस्त अवसर होगा। ये सब देखते हुए ये आशंका गलत नहीं है कि गत दिवस आयोजित सर्वदलीय बैठक में हुईं अच्छी-अच्छी बातें सत्र शुरू होते ही भुला दी जावेंगी। यूँ भी विपक्ष को गत दिवस जामिया मिलिया विवि में गोली चलने की घटना ने जबर्दस्त हथियार दे दिया है। सीएए को लागू नहीं किये जाने की घोषणा अनेक गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारों द्वारा किये जाने की वजह से भी सत्ता और विपक्ष के बीच आक्रमण और प्रत्याक्रमण का खेल चलेगा। जम्मू-कश्मीर की ताजा स्थिति पर भी सरकार के ऊपर जवाबदेही का दबाव रहेगा। चूँकि बिहार और बंगाल में विधानसभा चुनाव का माहौल बनने लगा है इसलिए भी विपक्ष सरकार पर हावी होने का कोई अवसर नहीं छोड़ेगा। ये भी देखने वाली बात होगी कि बीते दो सत्रों में विपक्षी एकता में सेंध लगाने में सफल हुआ सत्ता पक्ष इस सत्र में भी उस सफलता को दोहरा सकेगा या नहीं? खास तौर पर राज्यसभा में उसके लिए बहुमत का इंतजाम बड़ी समस्या हो सकती है। बावजूद इसके सरकार के पक्ष में भी अनेक बातें हैं। मसलन सीएए के विरोध को लेकर विपक्ष में एक राय नहीं है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस खुलकर इस मुद्दे पर केंद्र से टकराव ले रही है लेकिन वह कांग्रेस और और वामपन्थी दलों द्वारा किये जा रहे आन्दोलन से भी दूरी बनाये हुए है। इसी तरह शिवसेना भी भले ही कांग्रेस और एनसीपी के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार चला रही हैं लेकिन वीर सावरकर के विरुद्ध कांग्रेसी नेताओं द्वारा की गयी बयानबाजी और उसके बाद शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत द्वारा पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी के तस्कर सरगना करीम लाला से मिलने आने का खुलासा किये जाने से भी विपक्षी एकता की कमजोरी उजागर हुई है जिसका लाभ सत्ता पक्ष बेशक उठाएगा। खुदा न खास्ता दिल्ली के चुनाव में भाजपा ने विपक्ष के तौर पर भी यदि सम्मानजनक सीटें हासिल कर लीं तब प्रधानमंत्री का हौसला निश्चित रूप से बुलंद होगा। लेकिन ऐसा न हुआ तब विपक्ष सीएए को वापिस लेने के दबाव के अलावा एनपीआर और एनआरसी के बारे में प्रधानमन्त्री से सरकार की नीति स्पष्ट करने का दबाव बनाये बिना नहीं रहेगा। इन विषयों पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बयानों में थोड़ा अंतर होने से सरकार को शर्मसार होना पड़ा था। देश के मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि ये सत्र भी काफी हंगामेदार रहेगा। यदि निर्मला सीतारमण ने आर्थिक हालातों का हवाला देते हुए बजट में दरियादिली नहीं दिखाई तब सरकार को सदन और बाहर दोनों तरफ  से आलोचनाएं झेलनी पड़ सकती हैं। वैसे बजट अच्छा होने के बाद भी विपक्ष सरकार को बख्श देगा इसकी संभावना शून्य ही हैं क्योंकि वह इस समय अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। मोदी सरकार ने दूसरी पारी प्रारम्भ करते ही जिस ताबड़तोड़ तरीके से अपने घोषणापत्र के आधारभूत वायदों को जमीन पर उतारने का सिलसिला शुरू किया उसकी वजह से विपक्ष में घबराहट भरी सतर्कता है। जहां तक जनता की अपेक्षा है तो वह चाह रही है कि अर्थव्यवस्था के साथ ही अन्य ज्वलंत विषयों पर सार्थक बहस और देशहित में निर्णय हों। यद्यपि इसकी संभावना कम ही है क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में जिस कर्तव्यबोध की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है वह तो न जाने कब का हवा-हवाई हो चुका है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 27 January 2020

पद्म सम्मान का भी सम्मान रखा जाए



गणतंत्र दिवस पर पद्म सम्मानों की जो घोषणा की गई उसमें कुछ नामों को लेकर आलोचना के स्वर फिर सुनाई देने लगे हैं। ये पहला अवसर नहीं है जब पद्म अलंकरण के लिए चयनित कतिपय व्यक्तियों की पात्रता को लेकर सवाल उठे हों। यद्यपि मोदी सरकार ने चयन प्रक्रिया को बेहद पारदर्शी और युक्तियुक्त बनाया जिसके कारण बीते पांच वर्ष में अनेक ऐसी अनजानी शख्सियतें भी पद्म सम्मान से अलंकृत की जा सकीं जिन्होंने साधारण होते हुए भी असाधारण कार्य किये। समाज के लिए नि:स्वार्थ भाव से रचनात्मक कार्य करने वाले तमाम ऐसे लोग इस दौरान सामने आए जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व से देश पूरी तरह बेखबर था। पद्म सम्मानों के लिए चयन करने की पुरानी प्रक्रिया में किये बदलाव से उसमें निष्पक्षता भी आई और वह काफी हद तक सरकारी दबाव से मुक्त भी नजर आने लगी। उसके बावजूद भी हालांकि कुछ नामों को लेकर नुक्ताचीनी होती रही किन्तु कुल मिलाकर काफी हद तक पद्म सम्मानों के वितरण से लोग संतुष्ट नजर आए। लेकिन इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जब पद्म सम्मानों के लिए चुने गए लोगों की सूची आई तब एक बार फिर कुछ नामों पर प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं आईं। विशेष तौर पर फिल्म जगत से जुड़े कुछ नामों को लेकर सोशल मीडिया पर जनभावनाएं आलोचना और कटाक्षों से भरी हुईं दिखीं। ये भी कहा जाने लगा कि पिछली सरकारों की तरह से ही इस बार भी कुछ लोगों को तुष्टीकरण के लिए पद्म अलंकरण प्रदान किया गया । इनमें पाकिस्तान से आकर भारत की नागरिकता लेने वाले गायक अदनान सामी प्रमुख हैं । अदनान की प्रतिभा को कोई भी नहीं नकार सकता । लेकिन चंद बरस पहले भारत की नागरिकता लेने वाले इस कलाकार का भारतीय परिप्रेक्ष्य में ऐसा कोई योगदान नहीं रहा जिसकी वजह से उसे पद्मश्री दी जाती। यही वजह है कि उनके नाम का ऐलान होते ही आम राय ये सामने आई कि नागरिकता संशोधन कानून में मुस्लिमों को अलग किये जाने के कारण मचे बवाल को ठंडा करने के लिए केंद्र सरकार ने उनका चयन किया । अन्यथा फिल्मी दुनिया में न जाने कितने प्रतिभाशाली संगीतकार हैं जो पद्म सम्मान की कसौटी पर खरे साबित होते हैं । इसके अलावा कुछ और जो नाम हिन्दी फिल्म जगत के चुने गए उनको लेकर भी आलोचना हो रही है । यद्यपि चयनकर्ताओं के पास अपने तर्क और आधार हो सकते हैं किंतु पद्म सम्मान के साथ जुड़ी गरिमा के मद्देनजर वे उसके कतई लायक नहीं कहे जा सकते । कुछ वर्ष पूर्व एक वीडियो यू ट्यूब पर खूब चर्चित हुआ था जिसमें अनेक फिल्मी कलाकारों के बीच हो रही बेहद अश्लील और निम्नस्तरीय बातें सामने आईं । बाद में उन पर उसके लिए मुकदमा भी दर्ज किया गया था । उनमें से दो नाम इस वर्ष पद्मश्री पाने वालों में आने से इन सम्मानों की सार्थकता और उपयोगिता पर नए सिरे से प्रश्न उठ खड़े हुए हैं । पद्म सम्मान नागरिक सम्मान कहे जाते हैं । इनका उद्देश्य समाज में सेवा भाव और रचनात्मकता को विकसित करना है । देश और समाज के लिए विभिन्न क्षेत्रों में अपना नि:स्वार्थ और विशिष्ट योगदान देने वालों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के उद्देश्य से पद्म अलंकरणों की शुरुवात की गई थी। लेकिन शुरुवात से ही इनकी चयन पद्धति में पारदर्शिता का अभाव रहा । यहां तक कि देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न भी उस समय विवाद में फंसा जब कुछ प्रधानमंत्रियों ने खुद ही अपना चयन उस हेतु कर लिया । कालांतर में एमजी . रामचंद्रन जैसे को भारत रत्न दिया गया तब भी ये कहा गया कि उसके पीछे उनके द्वारा स्थापित तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक पार्टी का केंद्र सरकार के लिए समर्थन हासिल करने का उद्देश्य था। धीरे-धीरे इस हेतु राजनीतिक दबाव भी बनाये जाने लगे। क्षेत्रीय दलों ने अपने दिग्गजों के लिए पद्मभूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न तक के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया । इसके अलावा भी इस हेतु लॉबिंग किये जाने की जानकारी आती रही । यहां तक कि जब विश्व विख्यात सितार वादक पं. रविशंकर को भारत रत्न मिला तब पं. जसराज ने सार्वजनिक तौर पर उसका विरोध किया था । अन्य लोगों के चयन को लेकर भी काफी हल्ला मचा । सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न मिलने की टाइमिंग पर भी प्रश्न उठे। सब देखते हुए ही मोदी सरकार ने पद्म सम्मानों को लेकर सतर्कता बरतते हुए उसे सामान्य जन के लिए सुलभ बनाया । लेकिन लगता है इस बार कुछ ऐसे नाम भी पद्म सम्मान पा गए जिन्हें लेकर सरकार की निर्णय क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं । इस बारे में एक सुझाव ये भी आता रहा है कि पद्म पुरस्कारों के लिए खेल, फिल्म एवं साहित्य सहित अन्य क्षेत्रों के लोगों को शामिल न किया जावे क्योंकि उनके लिए उन क्षेत्रों में अलग से पुरस्कार दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, अर्जुन और राजीव गांधी खेलरत्न, साहित्य अकादमी-ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाते हैं । हालांकि ऐसा होना सम्भव होगा ये लगता नहीं क्योंकि पद्म पुरस्कार एक तरह का राजसी एहसास करवाते हैं । लेकिन ये भी सही है कि एक -दो अनुपयुक्त लोगों को सम्मान मिलने पर बाकी की भी अहमियत घटती है । सरकार किसी की हो किन्तु इस तरह के सम्मान में गुणवत्ता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए अन्यथा इनका महत्व धीरे - धीरे खत्म हो जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 January 2020

केवल अधिकार नहीं कर्तव्यों की भी सोचें



2019 के लोकसभा चुनाव के उपरान्त एनडीए संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद नरेंद्र मोदी ने संविधान की पुस्तक पर मत्था टेककर इस बात का संकेत दिया कि उनकी प्रतिबद्धता संविधान के प्रति है। दरअसल उनकी सरकार पर विपक्ष ही नहीं वरन  समाज का एक वर्ग विशेष ये आरोप लगाता रहा था कि वह संविधान की मूल भावना से खिलवाड़ करते हुए  समाज को बांटने का काम कर रही है। असहिष्णुता की आड़ लेकर हर जगह ऐसा वातावरण बना दिया गया जैसे देश में प्रजातंत्र खत्म करते हुए तानाशाही लादी जा रही हो। अभिव्यक्ति की आजादी को खतरे में बताकर भी खूब हल्ला मचा। ये भी कहा जाने लगा कि विभिन्न संस्थानों में एक ही विचारधारा के लोगों को स्थापित किया जा रहा है। शायद यही सब देख कर प्रधानमन्त्री ने दूसरी पारी की शुरुवात में संविधान की पुस्तक पर सिर रखकर आलोचकों को बिना कुछ कहे ही जवाब दे दिया। पहले से ज्यादा बड़ा जनादेश मिलने से उनका आत्मविश्वास भी निश्चित तौर पर बढ़ा जिसका प्रमाण नई लोकसभा के पहले सत्र में ही मिल गया। जिस तरह से जम्मू - कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला मोदी सरकार ने लिया उससे उसके विरोधियों को ये कहने का अवसर एक बार फिर मिल गया कि संविधान के ढांचे को तोडऩे का दुस्साहस किया जा रहा है। जिस तरह से वहां कर्फ्यू लगाकर संचार सुविधाएं अवरुद्ध की गईं उनसे भी सरकार पर तानाशाही के रास्ते पर चलने का आरोप लगा। लेकिन प्रधानमन्त्री इस सबसे बेपरवाह बने रहे और संसद के शीतकालीन सत्र  में सीएए ( नागरिकता संशोधन कानून ) पारित करवाकर अपने आलोचकों को आसमान सिर पर उठाने का एक अवसर और दे दिया। बीते काफी समय से देश भर में उक्त कानून के विरोध में आन्दोलन हो रहे हैं। राजनीतिक दलों के अलावा छात्र संगठन , बुद्धिजीवी, अभिनेता, कलाकार और अन्य वर्गों  से भी सरकार पर संविधान को ताक़ पर रखे जाने के आरोप उछलने लगे। ये भी कहा जा रहा है कि मोदी सरकार धार्मिक आधार पर भेदभाव करते हुए संविधान की समन्वयवादी सोच को दफन करने पर आमादा है। पूरे देश में ये प्रचार किया जा रहा है कि केंद्र सरकार संविधान के आधार को कमजोर करते हुए फासिस्टवादी व्यवस्था को लागू करना चाह रही है। इस सबके बीच एक बात जो देखने मिल रही है वह ये कि पूरा देश मोदी समर्थकों और मोदी विरोधियों में बंटकर रह गया है। विचारधारा महत्वहीन होती जा रही है और सुविधा के समझौतों के आधार पर राजनीतिक गठबन्धन बन रहे हैं। ऐसे माहौल में गणतंत्र दिवस का आगमन देश के बारे में सोचने का सही अवसर  है। संविधान लागू होने की वर्षगांठ का राष्ट्रीय जीवन में बहुत महत्व है क्योंकि लोकशाही की सफलता संविधान के पालन पर ही निर्भर होती है। संसदीय प्रजातंत्र में तो संवैधानिक मर्यादाओं की विशेष अहमियत होती है। लेकिन  कानून के अलावा कतिपय परम्पराएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण  हैं। इन परम्पराओं का पालन प्रजातंत्र की जड़ों को मजबूत करने में बहुत सहायक होता  हैं। उल्लेखनीय है भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। जबकि जिस ब्रिटेन के संविधान से यह प्रेरित और प्रभावित है वह अलिखित है। बावजूद उसके हमारे देश में संविधान के प्रति अपेक्षित गम्भीरता नहीं दिखायी देती। इसकी मुख्य वजह राजनीतिक स्वार्थ  ही हैं  जो राष्ट्रीय हितों पर भी भारी  पडऩे लगे हैं। संसद को प्रजातंत्र का सबसे जीवंत प्रतीक चिन्ह कहा जाता है लेकिन संविधान की शपथ लेकर उसमें बैठने वाले सांसद अपनी शपथ का कितना सम्मान करते हैं ये विचारणीय विषय है। संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देखने वाली जनता को जब ये लगता है कि कानून बनाने वाली संस्था के सदस्य ही नियम  कानूनों के पालन के प्रति  लापरवाह हैं तब वह क्यों उनकी चिंता करे। इसी आधार पर ये कहा जा सकता है कि हमारा गणतंत्र गैर जिम्मेदार व्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है। देश विरोधी नारे लगाने वाले को रोकने पर अभिव्यक्ति की आजादी के खतरे में पडऩे की बात जिस तरह उछाली जाती है वह बड़े खतरे का संकेत है। संविधान केवल सरकार को मर्यादा में रहने की नसीहत नहीं देता अपितु देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक आचार संहिता का निर्धारण करता है , जिसमें अधिकारों के साथ ही कर्तव्यों का भी संतुलन बनाए रखने की सीख है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि सही मायनों में संविधान कर्तव्यों को स्पष्ट करने वाला ऐसा दस्तावेज है जिसके प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव एक अनिवार्यता है। देश के मौजूदा वातावरण में जो लोग संविधान को खतरे में बताने का ढोल पीट रहे हैं वे ही उसकी धज्जियां उड़ाने पर आमादा हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग देश के टुकड़े करने की मंशा रखने वालों के  समर्थन के रूप में किया जा रहा है। आजादी के नए अर्थ गढ़े जाने लगे हैं। अनेक राज्यों की चुनी हुई सरकारें संसद द्वारा पारित क़ानून को लागू नहीं किये जाने का ऐलान कर रही हैं। संघीय ढांचे को  छिन्न - भिन्न  करने का षडयंत्र चल रहा है। जनादेश से बनी सत्ता को नकारने का जैसा दुस्साहस बीते कुछ महीनों में देखने मिला उसे केवल राजनीतिक असफलता की खीझ मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सही मायनों में ये जनतंत्र की उस मूल भावना का ही तिरस्कार है जो जनता के निर्णय को सर्वोपरि मानती है। संविधान की इस सालगिरह पर देश के वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए ऐसी सोच की जरूरत है जो राजनीतिक नफे-नुकसान की बजाय राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हो। कहने को हमारा गणतंत्र सात दशक पुराना हो चुका है लेकिन उसमें परिपक्वता का अभाव साफ़ देखा जा सकता है। चूंकि भारत विविधताओं से भरा देश है इसलिए इसका कोई एक विशिष्ट कारण नहीं है। विविधता में एकता, भारत की विशेषता का नारा चाहे जितना लगाया जाता हो किन्तु उस विविधता को देश की एकता के लिए खतरा बनाने वाली ताकतें खुलकर मैदान में हैं। गणतंत्र दिवस के इस राष्ट्रीय पर्व पर हर जिम्मेदार नागरिक को कुछ समय इस बात पर विचार करने के लिए  भी निकालना चाहिये कि इन ताकतों की कमर किस तरह तोड़ी जाए क्योंकि देश के कमजोर होने पर संविधान भी धीरे-धीरे अपना असर और महत्व खो बैठता है। और ऐसा होना हमारी सार्वभौमिकता को खतरे में डाल सकता है।

गणतंत्र दिवस की अनन्त शुभकामनाएं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 24 January 2020

कश्मीर घाटी में अलगाववाद की अंतिम विदाई की तैयारी



जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के निर्णय को असंवैधानिक बताने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से साफ शब्दों में कह दिया गया कि जो हो गया सो हो गया। 370 एक अस्थायी व्यवस्था थी और केंद्र उसे समाप्त करने के फैसले से पीछे नहीं हटेगा। याचिकाकर्ताओं के इस तर्क का केंद्र की तरफ  से जोरदार खंडन किया गया कि इस राज्य का भारत संघ में विलय हुआ ही नहीं था। अटार्नी जनरल ने साफ-साफ कहा कि विलय को लेकर किसी भी तरह का भ्रम गलत है। उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि ऐसा न हुआ होता तब अनुच्छेद 370 लागू ही क्यों होता? बहस में एक मुद्दा इस याचिका को सात सदस्यों वाली पीठ को सौंपने का भी रहा। याचिका का अन्त्तिम परिणाम क्या होगा ये अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन केंद्र द्वारा 370 हटाये जाने के फैसले को वापिस नहीं लिए जाने की जो दृढ़ता अदालत में दिखाई गई वह पूरी तरह सही है। जम्मू कश्मीर के भारत में विलय पर संदेह करने वाली मानसिकता का उजागर होना ये साबित करने के लिए काफी है कि कश्मीर घाटी में अभी भी भारत की प्रभुसत्ता को अस्वीकार करने वाली ताकतें आखिऱी कोशिश कर रही हैं। बीते कुछ महीनों में कश्मीर घाटी के भीतर अलगाववादी और आतंकवादियों शक्तियां काफी कमजोर हुई हैं। हालांकि आलोचकों के अनुसार विपक्षी नेताओं को कैद में रखने और संचार सुविधाओं पर प्रतिबंध की वजह से ही घाटी में ऊपरी तौर पर शांति दिखाई देती है लेकिन भीतर-भीतर सरकार विरोधी भावनाएं उबाल मार रही हैं जो नियंत्रण हटाये जाते ही बाहर आये बिना नहीं रहेंगी। यद्यपि केंद्र सरकार ने सुनियोजित रणनीति के अंतर्गत कफ्र्यू वगैरह में धीरे-धीरे ढील दी और हाल ही में संचार सुविधाएं भी बहाल कर दीं जिसके बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे जनता के स्तर पर किसी भी तरह की नाराजगी या असंतोष का पता चलता। बीच-बीच में कुछ आतंकवादी घटनाएं जरूर होती रहीं लेकिन किसी बड़ी वारदात का नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने का निर्णय सही साबित हुआ। केंद्र के रणनीतिकार इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने घाटी में हालात सामान्य बनाने के लिए शानदार काम किया। शुरुवात में लोगों को भड़काने का काफी प्रयास किया गया लेकिन जब आम जनता को लगा कि 370 को हटाने से उनको किसी भी तरह का नुकसान नहीं हुआ और कश्मीर घाटी के भीतर शांति बहाल हो गई तब वह भी बदली हुई व्यवस्था के साथ खुद को समायोजित करने लगी। लद्दाख में तो 370 हटाने का जबर्दस्त स्वागत हुआ क्योंकि वह इलाका कश्मीर घाटी के आधिपत्य में पूरी तरह उपेक्षित और अविकसित रह गया। जम्मू अंचल भी कश्मीर घाटी के वर्चस्व से असंतुष्ट था। हालांकि राज्य के विभाजन के बाद भी जम्मू को कश्मीर घाटी के साथ ही रखा गया है लेकिन राजनीतिक तौर पर घाटी का एकाधिकार खत्म करने के लिए विधानसभा सीटों का परिसीमन करने की योजना के कारण अब घाटी और जम्मू के बीच सियासी संतुलन बने रहने की सम्भावना बन रही है। इस तरह 370 हटाये जाने के फैसले का विरोध केवल घाटी के भीतर ही सिमटकर रह गया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 370 हटाने के बाद पेश हुई याचिकाओं पर सुनवाई में जल्दबाजी नहीं किये जाने के भी अनुकूल नतीजे निकले। इस दौरान जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के विकास के लिए विस्तृत योजनायें भी कागज से जमींन पर उतरने लगी हैं। लद्दाख के अलग केंद्र शासित राज्य बन जाने से वहां विकास को लेकर नया उत्साह जागा है। घाटी के भीतर भी आम जन के मन में ये बात भी धीरे-धीरे घर करती जा रही है कि नेशनल कांफे्रंस और पीडीपी के नेताओं ने भारत विरोधी भावनाएं भड़काते हुए अपना घर भरा। 370 हटाये जाने के बाद पहले-पहल लोगों को उकसाने का काम हुआ लेकिन केंद्र सरकार और सुरक्षा बलों की अच्छी तैयारी की वजह से देश विरोधी ताकतें सिर नहीं उठा सकीं। अनुच्छेद 370 हटाना कोई आसान फैसला नहीं था। लेकिन प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने ये साबित कर दिया कि देशहित में कड़े फैसले लेने से डरना नहीं चाहिए। सबसे बड़ी चिंता विश्व जनमत की थी लेकिन भारत सरकार ने इस मोर्चे पर भी बहुत ही अच्छा प्रदर्शन किया। पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर पर भारत के कदम का काफी विरोध किया लेकिन सिवाय चीन के उसे और किसी का समर्थन नहीं मिला। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी तरफ से मध्यस्थता की कई स्वयंभू कोशिशें कीं लेकिन भारत ने किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को अस्वीकार कर दिया। संरासंघ में भी चीन ने पाकिस्तान की वकालत करने का काफी प्रयास किया लेकिन उसे किसी का समर्थन नहीं मिला। इस मामले में सबसे बड़ी बात ये रही कि मुस्लिम देशों में मलेशिया और टर्की जैसे इक्का-दुक्का को छोड़कर और कोई अनुच्छेद 370 को हटाने के विरोध में नहीं खड़ा हुआ। इस सबसे निश्चित रूप से एक तरफ जहां केंद्र सरकार का हौसला बुलंद हुआ वहीं अलगाववादी ताकतें निराश हुईं। उन्हें उम्मीद थी कि पाकिस्तान सहित मुस्लिम देश तथा अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पकिस्तान के सरपरस्त रहे मुल्क भारत सरकार के विरोध में सामने आयेंगे। लेकिन उनकी सोच गलत साबित हो गयी। भारत सरकार ने 370 हटाये जाने के बाद की स्थितियों का जिस कुशलता से सामना किया उसमें सुरक्षा बलों की भूमिका भी अभिनन्दन योग्य है। सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार का ये कहना उसके दृढ़ इरादे और आत्मविश्वास को दर्शाता है कि 370 हटाये जाने के फैसले से पीछे हटना नामुमकिन है और जम्मू कश्मीर की वर्तमान स्थिति अब एक वास्तविकता है। इस मुद्दे पर सरकार को घेरने वाले विपक्ष को भी जब ये लगा कि कश्मीर घाटी में अब उसके पैर नहीं जम पाएंगे तब वह भी दूसरे मुद्दों में उलझ गया। यहां उल्लेखनीय है कि महबूबा मुफ्ती की पीडीपी में भी विभाजन की स्थिति है। केंद्र की सख्ती का परिणाम ये हुआ कि कश्मीर की आम जनता को ये बात पूरी तरह से समझ में आ चुकी है कि धारा 370 और उसके कारण राज्य को मिला विशेष दर्जा अब पुनर्जीवित नहीं सकेगा। सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वाले युवा भी समझ चुके हैं कि घाटी में भारत विरोधी गतिविधियां महंगी पड़ेंगी। कुल मिलाकर सर्दियां ख़त्म होने का बाद घाटी सहित पूरे राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो जायेगी। मौजूदा स्थिति में ये कहना गलत नहीं होगा कि आगामी चुनाव घाटी से अलगाववाद की विदाई पर अन्तिम मोहर लगा देगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 January 2020

सीएए : अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा ही विकल्प



सर्वोच्च न्यायालय ने सीएए ( नागरिकता संशोधन कानून ) पर तत्काल रोक लगाने से इनकार करते हुए केंद्र सरकार को जवाब देने हेतु चार सप्ताह का समय दे दिया। तकरीबन 141 याचिकाओं में इस कानून को रद्द करने के साथ ही ये मांग भी थी कि उसके क्रियान्वयन पर फौरन रोक लगाई जावे। याचिकाकर्ताओं की ओर से उपस्थित वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि उप्र में उक्त कानून के लागू होने वाले दिन ही हजारों लोगों को भारत की नागरिकता का प्रमाणपत्र जारी हो गया। यदि भविष्य में न्यायालय द्वारा कानून को रद्द कर दिया गया तब ऐसे प्रमाणपत्रों का क्या होगा? सवाल और भी उठाये गये। याचिकाओं में केरल जैसे राज्य की सरकार भी है। जिन बड़े वकीलों ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में दलीलें दीं उनमें से अधिकतर राजनीतिक तौर पर भी इस क़ानून का विरोध करते आये हैं। बहरहाल चार सप्ताह का समय देकर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को जहां राहत प्रदान की वहीं कानून का विरोध करने वालों के उत्साह पर पानी फेर दिया जो ये मानकर चल रहे थे कि संविधान की मूल भावनाओं के विरुद्ध होने से सर्वोच्च न्यायालय बिना देर किये उक्त क़ानून को लागू किये जाने पर स्थगन आदेश जारी कर देगा। न्यायालय द्वारा याचिकाकर्ताओं की मांग स्वीकार नहीं किये जाने का एक कारण याचिकाओं की बड़ी संख्या भी है। भले ही अधिकतर में एक जैसे मुद्दे शामिल होंगे लेकिन कुछ याचिकाओं में हटकर बातें भी होंगीं। ऐसे में प्रारम्भिक सुनवाई में ही स्थगन जैसा आदेश पारित करना व्यवहारिक तौर पर भी संभव नहीं था। इतने महत्वपूर्ण कानून के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने जैसा आदेश जारी करने के पहले प्रतिवादी की बात सुनना भी जरूरी था। यदि याचिकाएं कम संख्या में होतीं तब शायद न्यायालय याचिकाकर्ताओं की कुछ मांगों पर तत्काल कोई आदेश पारित कर भी देता किन्तु याचिकाकर्ताओं में कोई तालमेल नहीं होने से सरकार पर दबाव कम हो गया। ये भी लगता है कि कुछ को छोड़कर शेष याचिकाकर्ता गंभीर नहीं हैं। राम मंदिर मामले में भी ये देखने आया था कि अनेक ऐसे व्यक्ति और संस्थान मामले में कूद पड़े जिनका प्रकरण में पहले कभी अता-पता नहीं था। ऐसे याचिकाकर्ता प्रचार पाने के लिये भी अदालत का सहारा लेते हैं। सीएए मामले में भी ऐसा ही होता दिख रहा है। जहां तक इसके विरोध की बात है तो उसके पीछे कानूनी पक्ष कम और राजनीतिक उद्देश्य कहीं ज्यादा है। याचिकाकर्ता भी ये जानते हैं कि संसद द्वारा भारी बहुमत से पारित कानून के बारे में सर्वोच्च न्यायालय बिना समुचित विचार किये बिना कोई फैसला नहीं ले सकेगा लेकिन अपने विरोध को चर्चा में बनाये रखने के लिए अनेक याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय को जरिया बनाने की चाल चली जो फिलहाल तो विफल हो गयी। एक बात और जो प्रतीत हो रही है वह है याचिकाकर्ताओं में आत्मविश्वास की कमी। एक तरफ जहां केंद्र सरकार सीना ठोककर ये कह रही है कि वह किसी भी कीमत पर इस कानून को वापिस नहीं लेगी वहीं दूसरी तरफ कानून के मैदानी विरोध में विविधता नजर नहीं आ रही। इसकी वजह विरोध का मुस्लिम समुदाय तक केन्द्रित हो जाना है। दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में मुस्लिम महिलाओं द्वारा बीच सड़क पर बैठे रहकर महीने भर से दिया जा रहा धरना देश भर में चर्चित है। कातिपय समाचार माध्यमों में उसकी तुलना 2012 में दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए लोकपाल आन्दोलन से की जा रही है किन्तु ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि अन्ना के उस आन्दोलन पर किसी एक सम्प्रदाय का ठप्पा नहीं लगा था। देश भर में सीएए का जो विरोध सड़कों पर हुआ उसमें मुस्लिम समाज की भूमिका ही उभरकर सामने आई है। राजनीतिक स्तर पर चाहे कांग्रेस और वामपंथी हों या ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, सभी ने इस क़ानून के विरोध में कोई बड़ा जनांदोलन खड़ा करने की बजाय मुस्लिम समाज को भड़काकर पूरा बोझ उसी के कंधे पर डाल दिया। देश भर में जहां-जहां सीएए का उग्र विरोध देखने मिला वहां उसका पूरा बीड़ा मुस्लिम समुदाय ने उठाया। दिल्ली जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में भी जो कुछ हुआ उसके पीछे मुस्लिम छात्र ही ज्यादा थे। ऐसी ही स्थिति अलीगढ़ मुस्लिम विवि के बारे में भी कही जा सकती है। कांग्रेस देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। उसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्षी पार्टियों की बैठक सीएए का विरोध करने के लिए बुलवाई थी लेकिन वह विपक्षी फूट का प्रतीक बन गयी। संसद के दोनों सदनों में भी जब उक्त कानून पारित हो रहा था तब भी विपक्ष पूरी तरह बिखरा रहा। जिन पार्टियों की राज्य सरकारों ने उक्त कानून को अपने यहां प्रभावशील नहीं होने देने की बात कही उनमें से भी कुछ ने संसद में या तो उसका समर्थन किया या फिर मतदान के समय अनुपस्थित रहकर सरकार की मदद की। हाल ही में कपिल सिब्बल ने भी खुलकर ये बात स्वीकार की थी कि संसद द्वारा पारित क़ानून को लागू नहीं किये जाने जैसी बात गलत है बशर्ते सर्वोच्च न्यायालय उसे रद्द कर दे। लोकतंत्र में विरोध की अनुमति तो हर किसी को है लेकिन उसकी दिशा सही न हो तो वह असर खो देता है। नागरिकता कानून के बारे में भ्रम का वातावरण बनाकर मुस्लिम समाज को कांग्रेस और वामपंथियों ने बलि का बकरा बना दिया और खुद कोरी बयानबाजी करने लगे। शाहीन बाग़ और देश के दूसरे हिस्सों में हो रहे वैसे ही आन्दोलन ऐसे मोड़ पर आकर फंस गए हैं जहां से आगे बढना कठिन है वहीं कदम पीछे खींचना भी आत्मघाती होगा। सबसे बड़ी बात ये है कि राजनीतिक पार्टियां परदे के पीछे से भले माहिलाओं की पीठ थपथपा रही हैं लेकिन सामने आकर समर्थन करने की हिम्मत उनकी भी नहीं हो रही। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नागरिकता संशोधन क़ानून पर स्थगन नहीं दिए जाने के बाद मुस्लिम समाज को उन राजनीतिक पार्टियों के षडय़ंत्र को समझना चाहिए जो उन्हें अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर खुद दायें-बाएं हो गईं। बंगाल में ममता बैनर्जी सबसे ज्यादा इस क़ानून के विरोध में सक्रिय हैं लेकिन कांग्रेस और वामपंथी वहां भी आपनी अलग खिचड़ी पका रहे हैं। इसी तरह शाहीन बाग में बैठी मुस्लिम महिलाओं को धरना स्थल पर जाकर संबल देने की हिम्मत किसी भी विपक्षी पार्टी द्वारा इसलिए नहीं दिखाई जा रही क्योंकि दिल्ली विधानसभा के चुनाव में कहीं हिन्दू मतदाता उनसे छिटक न जाएं। मुस्लिम समाज को ये बात कम से कम अब तो समझ लेनी चाहिए कि वह जाने अनजाने एक बार फिर राजनीति के कुचक्र में फंसकर रह गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को चार सप्ताह आगे बढ़ा दिया है। सरकार का जवाब आने के बाद 141 याचिकार्ताओं के वकील बहस करेंगे। भारतीय न्याय व्यवस्था में ऐसे महत्वपूर्ण मामलों में अदालत भी जल्दबाजी नहीं दिखाती। यदि बहस लम्बी खिंची तब हो सकता है सर्वोच्च न्यायालय का ग्रीष्मावकाश आ जाए। ऐसे में बेहतर होगा सीएए के विरोधी अब संयम से काम लेते हुए न्यायालयीन प्रक्रिया का इन्तजार करें क्योंकि जब मामला देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष लंबित हो तब सड़क पर संघर्ष करने का कोई औचित्य नहीं बच रहता। वैसे भी हफ्ते भर बाद से संसद का बजट सत्र शुरू हो रहा है जिसमें विपक्ष अपनी बात रख सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी