Saturday, 8 February 2020

वर्दीधारियों पर भारी सफेदपोश साहब



मप्र में आईपीएस और आईएएस लॉबी के बीच चल रही रस्साखींच में एक बार फिर बाजी आईएएस के हाथ जाती दिख रही है। बीते दिनों राजगढ़ जिले की महिला कलेक्टर ने एक पुलिस कर्मी को चांटा रसीद कर दिया था। जिसकी डीएसपी स्तर के अधिकारी ने जांच की और कलेक्टर को दोषी ठहरा दिया। आईएएस लॉबी को खाकी वर्दी वालों का ये रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने अपनी चिर परिचित शैली में जाल बट्टा फैलाया जिसका नतीजा प्रदेश के डीजीपी वीके सिंह को हटाये जाने जाने की खबर के रूप में सामने आ गया। इस सम्बन्ध में अंतिम निर्णय आज कल में हो जाएगा। जिन राजेन्द्र कुमार का नाम श्री सिंह के उत्तराधिकारी के तौर पर चल रहा है वे इंदौर के चर्चित हनी ट्रैप मामले के लिए गठित एसआईटी के प्रमुख हैं। इसलिए उन्हें डीजीपी बनाने से पहले उच्च न्यायालय से अनापत्ति लेनी पड़ेगी। कलेक्टर द्वारा एक पुलिसकर्मी को सरे आम थप्पड़ मारे जाने पर कमलनाथ सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री तक ने ऐतराज जताया था। आईएएस लॉबी को इस बात की खुन्नस है कि कलेक्टर की जांच डीएसपी ने की और उसकी रिपोर्ट डीजीपी ने मंजूर करते हुए कलेक्टर के विरुद्द्ध कार्रवाई हेतु पत्र लिख दिया। आईएएस लॉबी चूंकि सरकार के ज्यादा मुंह लगी होती है इसलिए बताया जाता है मुख्यमंत्री भी डीजीपी से खुन्नस खा गए। श्री सिंह द्वारा बिना मुख्य सचिव से चर्चा किये कलेक्टर के विरुद्ध कार्रवाई किये जाने वाले पत्र को आईएएस बिरादरी ने अपनी शान में गुस्ताखी माना और अंतत: सफेदपोश नौकरशाही एक बार फिर वर्दीधारियों पर भारी साबित होती दिख रही है। प्रशासनिक ढांचे के भीतर चल रहे इस शीतयुद्ध से कमलनाथ सरकार की प्रशासनिक कमजोरी उजागर हो गई है। एक साल की सत्ता में दूसरी बार डीजीपी का बदला जाना ये दर्शाता है कि मुख्यमंत्री का अपने अमले पर या तो सही नियंत्रण नहीं है या फिर वे आईएएस और आईपीएस के बीच समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहे। प्रशासन के इन दो धड़ों के बीच अहं की जंग नई नहीं है। पुलिस विभाग में कमिश्नर प्रणाली लागू होने की मांग पुरानी है। इसके लागू होने पर पुलिस विभाग काफी हद तक आईएएस के प्रभुत्व से मुक्त हो जाता है। किन्तु आईएएस तबका इसमें अड़ंगा लगाया करता है। जिस भी पुलिस अधिकारी ने सफेदपोश नौकरशाहों की सर्वोच्चता को चुनौती देने की हिमाकत की उसकी हालत वीके सिंह जैसी कर दी गयी। संदर्भित प्रकरण में गलती किस तबके की है ये कह पाना कठिन है लेकिन बीते कुछ समय से पुलिस विभाग में तबादले एवं महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को लेकर जिस तरह से चूहा बिल्ली का खेल चल रहा है उससे पुलिस विभाग खुद को अपमानित महसूस करने लगा है। हनी ट्रैप काण्ड के जाँच में भी जिस प्रकार ताबड़तोड़ तरीके से अधिकारी बदले गये उससे भी प्रशासन से जुड़ी दोनों लॉबियों के बीच की टकराहट उजागर हो गयी थी। ताजा प्रकरण से एक बार फिर ये बात सामने आ गयी है कि कमलनाथ भी आईएएस के चक्रव्यूह में फंसकर रह गये हैं। वीके सिंह या पुलिस महकमे के अन्य अधिकारियों को पूरी तरह सक्षम या ईमानदार होने का प्रमाणपत्र देना तो अतिशयोक्ति होगी लेकिन ये भी सही है कि आईएएस लॉबी में अभी भी अंग्रेजों के जमाने में नजर आने वाली गोरी चमड़ी वाली नस्लीय श्रेष्ठता का अहंकार है जिसके आगे वे बाकी सभी को तुच्छ और हेय समझते हैं। वैसे दूध के धुले तो वर्दीधारी पुलिस वाले भी कतई नहीं हैं और जनता को खून के आंसू रुलाने में इन दोनों में से किसी को भी कम नहीं कहा जा सकता लेकिन सरकार में बैठे चुने हुए नेताओं में प्रशासनिक क्षमता यदि हो तो फिर आईएएस और आईपीएस दोनों की बीच समन्वय कायम रखते हुए सरकार का सुचारू संचालन संभव होता है। बीते एक साल की समीक्षा की जावे तो कमलनाथ अपने प्रशासनिक ढांचे में चूंकि स्थायित्व नहीं ला सके इसलिए उसमें कसावट का पूरी तरह अभाव है। नई सरकार आने के बाद सरकारी अमले का स्थानान्तरण तो साधारण प्रक्रिया है लेकिन इसका निरंतर जारी रहना ये दर्शाता है कि सरकार अपनी दिशा ही तय नहीं कर पा रही। मप्र में आईएएस और आईपीएस लॉबी के बीच ताजा जंग में कौन विजेता बनकर निकलेगा ये उतना मायने नहीं रखता जितना ये कि प्रशासन के दोनों पहियों के बीच का तालमेल बिगडऩे से प्रदेश की कानून और प्रशासनिक व्यवस्था चौपट हो सकती है जो पहले से ही बेहद खस्ता स्थिति में है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 February 2020

नेहरु जी का पत्र : गेंद कांग्रेस के पाले में



प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी अपने ऊपर होने वाले राजनीतिक हमलों का जवाब देने में जल्दबाजी भले नहीं करें लेकिन मौका आने पर छोड़ते भी नहीं। दो दिन पहले राहुल गांधी ने युवाओं द्वारा उनको डंडे मारे जाने संबंधी बयान पर श्री मोदी ने लोकसभा में बिना श्री गांधी का नाम लिए तीखी टिप्पणी कर डाली। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर होने वाली बहस यूँ तो महज औपचारिकता होती है लेकिन प्रधानमंत्री हर वर्ष उसका जवाब देते हुए सरकार का पक्ष रखने के साथ ही विपक्ष पर चौतरफा हमला करने में भी नहीं चूकते। गत दिवस भी ऐसा ही हुआ जब उन्होंने सीएए ( नागरिकता संशोधन कानून ) के विरोध पर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते हुए प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु के एक पत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि उसमें भी पाकिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यकों को ही भारत की नागरिकता देने संबंधी बात कही थी न कि हर व्यक्ति को। नेहरु - लियाकत समझौते से एक साल पहले असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री को लिखे उक्त पत्र में नेहरु जी ने अल्पसंख्यक शब्द का जो उल्लेख किया उस पर कांग्रेस का ध्यान आकर्षित करते हुए प्रधानमन्त्री ने ये तंज भी कसा कि कांग्रेस जिन नेहरु जी को अपना आदर्श मानती है उनकी मंशा भी पाकिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यकों को ही भारत में नागारिकता देने की थी, बाकी को नहीं। उनके इस पैंतरे का कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं था। एनपीआर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) को लेकर भी श्री मोदी ने गेंद कांग्रेस के पाले में डालकर इसकी शुरुवात के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया। दिल्ली का चुनाव कल खत्म हो जाएगा। जैसी उम्मीद की जा रही है उसके अनुसार तो शाहीन बाग़ और उसकी तर्ज पर देश भर में प्रायोजित धरने - प्रदर्शन आदि भी समाप्त कर दिए जायेंगे। लेकिन केन्द्र सरकार पर समाज को बाँटने का जो आरोप कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों ने लगाया उसके कारण मुस्लिम समाज पूरी तरह भ्रम की खाई में जा गिरा है। प्रधानमन्त्री ने लोकसभा में पं. नेहरु का जो पत्र पढ़कर सुनाया वह सरकारी दस्तावेज है इसलिए उसकी सत्यता पर संदेह नहीं किया जा सकता। ऐसे में कांग्रेस को अब स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वह नेहरु जी की इच्छा के विरुद्ध जाकर सीएए की मुखालफत कर रही है? भारत का विभाजन होने के बाद से ही पाकिस्तान में रह रहे हिन्दू, सिख, पारसी, जैन और ईसाई समुदाय के नागरिकों का उत्पीडऩ शुरू हो गया था। धीरे-धीरे वहां अल्पसंख्यक आबादी घटती चली गई। जान, माल और अस्मत बचाने के लिए बहुतों ने इस्लाम कबूल कर लिया, वहीं बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो किसी तरह बच-बचाकर भारत की सीमा में आ तो गये लेकिन बरसों - बरस बीत जाने पर भी उन्हें यहाँ की नागरिकता नहीं मिली जिससे वे बदहाली में अधिकारविहीन जि़न्दगी जी रहे हैं। ऐसे में इन लोगों को भारत की नागरिकता देने के लिए नेहरु जी की सरकार के समय बने कानून में समयानुकूल संशोधन किये जाने पर मचाया गया बवाल अनावश्यक ही नहीं औचित्यहीन और उससे भी बढ़कर देशहित के विरुद्ध है। प्रधानमंत्री द्वारा नेहरु जी के पत्र का खुलासा किये जाने के पहले पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह का राज्यसभा में दिया भाषण चर्चा में आ चुका था जिसमें उन्होंने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार की चर्चा करते हुए उन्हें भारत की नागरिकता देने का सुझाव दिया था। बेहतर हो कांग्रेस इस विषय में जिम्मेदारी का परिचय दे क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर जो पूर्वानुमान अभी तक आये हैं उनके मुताबिक कांग्रेस पूरी तरह हाशिये पर आ चुकी है। मुसलमानों में उसके प्रति झुकाव खत्म सा है वहीं हिन्दू-सिख सहित शेष समुदाय भी कांग्रेस को किसी तरह से भाव नहीं दे रहे। सीएए का विरोध जिस तरह दिशाहीन हुआ उससे कांग्रेस को जबर्दस्त नुकसान हुआ, जिसे उसके नेताओं को समझ लेना चाहिए। बेहतर हो पं. नेहरु एवं उसके बाद भी कांग्रेस के अनेक बड़े नेताओं द्वारा पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के सम्बन्ध में व्यक्त चिंताओं को पार्टी का मौजूदा नेतृत्व समझे और तदनुसार अपनी नीति का निर्धारण करे। सीएए अब एक हकीकत है जिसमें सुधार और संशोधन समय के साथ हों ये ग़लत नहीं होगा लेकिन मौजूदा हालात में उसको लागू होने से रोकना कश्मीर में अनुच्छेद 370 की वापिसी जैसा ही रहेगा जो देश के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 6 February 2020

मस्जिद : जमीन ठुकराने का कोई औचित्य नहीं



सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई समय सीमा समाप्त होने के पूर्व ही केंद्र सरकार ने राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने हेतु न्यास का विधिवत गठन कर दिया। न्यास में कानूनविद, धर्माचार्य, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रशासनिक अधिकारी रखे गए हैं। एक दलित सदस्य भी है। अच्छी बात ये है कि न्यास अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र रहेगा। कुछ न्यासियों की नियुक्ति भी उसी के द्वारा की जावेगी। अभी तक केवल एक आपत्ति आई है और वह भी मंदिर आन्दोलन के बड़े स्तम्भ रहे कल्याण सिंह की तरफ  से, जिन्होंने दलित के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग का एक सदस्य रखे जाने की मांग रखी है। यद्यपि जिन सदस्यों को न्यास में रखा गया गया वे सभी हर दृष्टि से सुयोग्य और सुपात्र हैं। गैर राजनीतिक चेहरों की वजह से न्यास को लेकर सियासी विवाद की गुंजाईश कम ही है लेकिन धार्मिक क्षेत्र के जिन लोगों को न्यासी बनाया गया उनमें से कुछ के बारे में अन्य धर्माचार्य नाक सिकोड़ सकते हैं। फिर भी कुल मिलाकर केंद्र सरकार ने बिना समय नष्ट किये न्यास का गठन करते हुए एक अनिश्चितता को खत्म कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने राम जन्मभूमि पर हिन्दुओं के अधिकार को मान्य करने के अलावा अयोध्या में ही मस्जिद हेतु 5 एकड़ शासकीय भूमि देने का निर्देश भी दिया था। गत दिवस मंदिर निर्माण हेतु न्यास के गठन की घोषणा के साथ ही सरकार ने अयोध्या के निकट मस्जिद हेतु भी भूमि आवंटित कर दी। लेकिन मुस्लिम समाज के दो प्रमुख संगठनों उप्र सुन्नी मुस्लिम वक्फ  बोर्ड और आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शरीयत का हवाला देते हुए मस्जिद हेतु आवंटित भूमि लेने से इंकार कर दिया। हालाँकि अयोध्या के अनेक मुस्लिमों ने इस फैसले को सराहा। कुछ मुस्लिम संगठनों ने आवंटित भूमि में अस्पताल, विद्यालय जैसे संस्थान बनाने की वकालत भी की। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के पहले ही सभी पक्षों ने उसे मानने की प्रतिबद्धता दिखाई थी। निर्णय वाले दिन उप्र सहित समूचे देश में सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता कर दी गई थी। लेकिन हिन्दुओं और मुस्लिमों की तरफ  से प्रदर्शित समझदारी और संयम की वजह से तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं। सबसे बड़ी बात ये रही कि न तो हिन्दू समाज ने विजयोल्लास मनाया और न ही मुसलमानों की तरफ से पराजय की खीझ जैसा एहसास देखने मिला। अयोध्या में दोनों समुदायों के लोगों ने इस लंबित मामले के निपटने पर खुशी भी जताई। फैसला आये हुए लगभग तीन महीने होने को आये लेकिन इस दौरान भी इस मुद्दे पर किसी भी तरह का सांप्रदायिक तनाव देखने नहीं मिला जिससे ये लगा कि दोनों पक्षों ने पिछली कड़वाहट भुलाकर सौजन्यता और सद्भावना का रास्ता चुनने का निर्णय किया है। लेकिन लगता है मुस्लिम समाज में कुछ विघ्नसंतोषी ऐसे हैं जिनके पेट में मंदिर मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के कारण दर्द हो रहा है। इसकी वजह अदालती फैसले के बाद उनकी दुकानदारी चौपट हो जाना ही है। पूरे देश में मुस्लिम समुदाय के छोटे-बड़े अनेक अनेक संगठन हैं। उन सभी ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जय-पराजय की भावना से ऊपर उठकर स्वीकार किया लेकिन उपर्युक्त दोनों संस्थाओं ने फैसले के फौरन बाद से ही नाराजगी दिखानी शुरू कर दी। मस्जिद के लिए 5 एकड़ शासकीय भूमि दिए जाने के अदालती फरमान पर कुछ हिन्दू संगठनों ने आपत्ति जताते हुए उसे अनावश्यक बताया लेकिन अधिकतर ने न्यायोचित बताकर उसका स्वागत किया। उप्र सरकार ने जहां मस्जिद हेतु भूमि प्रदान की है वह मुस्लिम आबादी वाला इलाका है। वहां प्रति वर्ष एक बड़ा उर्स भी भरा करता है। चूँकि अभी तक दोनों ओर से किसी भी तरह के तनाव के संकेत नहीं मिले हैं। इसलिए बेहतर होगा मुस्लिम समाज मस्जिद के लिए आवंटित भूमि को स्वीकार करते हुए वहां एक भव्य मस्जिद और उसके साथ ही समाज के शैक्षणिक उत्थान हेतु उच्च स्तरीय संस्थान बनाए। राम मन्दिर का निर्माण होने के साथ ही अयोध्या का समूचा क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन केंद्र बनने जा रहा है। केंद्र और उप्र सरकार द्वारा इसके लिए की जा रही तैयारियों को देखकर कहा जा सकता है कि पूरे अवध अंचल को अयोध्या के विकास का सीधा लाभ मिलेगा। ऐसे में मुस्लिम समाज यदि अपनी मस्जिद भी बना ले तब अयोध्या हिन्दुओं के अलावा मुसलमानों के बड़े आस्था केंद्र के तौर पर प्रसिद्ध होगा। मुस्लिम समाज की अपनी धार्मिक मान्यताओं का सम्मान होना पूरी तरह जायज है लेकिन समय के साथ थोड़ी व्यवहारिकता भी होनी चाहिए। शरीयत के पालन को लेकर कभी-कभी तो लगता है कि भारत के मुस्लिम समाज के नेता अरब के मुसलिम देशों की तुलना में ज्यादा कट्टर हैं। इसका कारण उनके मन में समाया ये डर है कि यदि भारत के मुसलमान भी प्रगतिशील हो गए तब उनकी पूछ-परख खत्म हो जायेगी। समय आ गया है जब मुस्लिम समाज के पढ़े लिखे वर्ग को सदियों पुरानी सोच से निकलकर बदलते समय की जरूरतों के मुताबिक अपने को ढालना चाहिये। आजादी के सात दशक बाद भी यदि मुसलमान शैक्षणिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़ गए तो इसके लिए उनके नेता ही जिम्मेदार हैं। इस बारे में जम्मू कश्मीर का उदाहरण सामने है। वहां के मुस्लिम नेताओं ने अपनी औलादों को तो पढऩे-लिखने विदेश भेज दिया लेकिन कश्मीर घाटी के युवकों को धार्मिक कट्टरता का पाठ पढ़ाकर हिंसा के रास्ते पर धकेल दिया। अयोध्या में मस्जिद की जमीन ठुकराने का निर्णय मुस्लिम नेताओं की हताशा हो सकती है लेकिन उसके कारण वे पूरे समाज को दांव पर लगा दें ये ठीक नहीं है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उप्र के सुन्नी वक्फ  बोर्ड के कर्ताधर्ताओं की हठधर्मिता की वजह से पहले ही मुसलमानों का बहुत नुकसान हो चूका है। अच्छा होगा युवा पीढ़ी के मुस्लिम सुधारवादी सोच के साथ आगे आयें। एक हाथ में कुरान और एक में कम्प्यूटर के नारे को अपनाने का ये सही समय है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 5 February 2020

शाहीन बाग़ जैसे तरीके ही देश विभाजन की नींव बने



एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) को लेकर लोकसभा में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय द्वारा दिए लिखित जवाब में स्पष्ट कर दिया गया कि अभी तक सरकार द्वारा उस बारे में कोई भी फैसला नहीं किया गया है। प्रधानमन्त्री भी पहले ही सार्वजानिक तौर पर इसे स्पष्ट कर चुके थे। जहां तक बात एनपीआर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) की है तो उसे लेकर भी ये सफाई आ चुकी है कि उसके लिए की जाने वाली पूछताछ में भी किसी से भी नागरिकता प्रमाणित करने वाले दस्तावेज या जानकारी नहीं माँगी जावेगी। श्री राय ने बताया कि एनआरसी लागू करने के पहले केंद्र सरकार राज्यों से विधिवत सलाह मशविरा करेगी। उन्होंने ये भी कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस बारे में कोई उल्लेख नहीं होने से भी सरकार के दावे की पुष्टि होती है। उल्लेखनीय है दिल्ली विधानसभा चुनाव में सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के साथ ही विपक्ष एनआरसी और एनपीआर का मुद्दा उछालकर भाजपा को घेरने का प्रयास कर रहा है। यही नहीं तो पूरे देश में मुस्लिमों को सामने रखकर ये प्रचार किया जा रहा है कि सीएए लागू करने के बाद एनपीआर और फिर एनसीआर लागू किया जावेगा। दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में बीते डेढ़ माह से भी ज्यादा समय से जारी मुस्लिम महिलाओं का धरना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है। देश के अनेक हिस्सों में उसकी देखासीखी मुस्लिम महिलाएं सड़क पर धरना देकर बैठी हुई हैं। दिल्ली के चुनाव में तो शाहीन बाग़ एक मुख्य मुद्दा बन चुका है। भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सभी उसे अपने-अपने नजरिये से भुनाने में लगी हुई हैं। प्रधानमन्त्री ने दो दिन पहले एक चुनावी सभा में शाहीन बाग़ के धरने को एक प्रयोग बताकर निशाना साधा। कुल मिलाकर ये स्पष्ट होता जा रहा है कि सीएए के विरोध से शुरू अभियान को एनआरसी और एनपीआर का डर दिखाकर जि़ंदा रखने की कोशिश की जा रही है। इसमें जेएनयू, जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विवि जैसे संस्थानों में सक्रिय भाजपा विरोधी वर्ग पूरी तरह से मदद दे रहे हैं। शाहीन बाग़ में गोली चलाने वाले युवक का जुड़ाव आम आदमी पार्टी के साथ निकल आने के बाद अब जामिया में गोली चलाये जाने वाले के बारे में भी ये संदेह गहरा रहा है कि वह भी प्रायोजित था। कहने वाले ये भी कह रहे हैं कि सारा बखेड़ा दिल्ली चुनाव को लेकर है और 8 फरवरी को मतदान होते ही सब शांत हो जाएगा फिर बिहार चुनाव के लिए विपक्ष नया मुद्दा तलाशने में जुटेगा। ये बात साफ है कि सीएए को लेकर सिवाय मुस्लिम समुदाय के किसी और को कोई शिकायत नहीं है। मुस्लिम समुदाय के धरने में इसीलिये चंद सियासी चेहरों के और कोई नहीं समर्थन करता नहीं दिखा। शाहीन बाग़ के आन्दोलन की तारीफ  करने वाले नेतागण भी धरना स्थल पर जाने से इसलिए डरते रहे जिससे दिल्ली का हिन्दू मतदाता कहीं नाराज न हो जाये। अब जबकि लोकसभा में गृह राज्य मंत्री ने लिखित रूप में एनसीआर के बारे में कोई विचार नहीं होने की बात कह दी गयी है तब विपक्ष को भी भय का भूत पैदा करने की अपनी रणनीति को छोड़कर जनता के हित में सही मुद्दे उछालना चाहिए। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार सारे काम अच्छे ही कर रही है। उसके अनेक निर्णय ऐसे हैं जिनके बारे में विपक्ष को जनता के बीच जाकर अपनी बात रखनी चाहिए। बेरोजगारी और आर्थिक मंदी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए उसके पास पर्याप्त मसाला और अवसर है। जनता भी ऐसे विषयों पर सियासी प्रतिबद्धता से उपर उठकर विपक्ष का साथ देती है। लेकिन बीते पांच वर्षों के दौरान ये देखने में आया है कि विपक्ष ऐसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करता रहा जिनसे जनता का सीधा सरोकार नहीं था। 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद ये उम्मीद थी कि वह अपनी रणनीति में अपेक्षित सुधार करते हुए देश और जनहित के मुद्दे उठायेगा। लेकिन ऐसा लगता है उसने पिछली गलतियों से सीख नहीं लेने की कसम खा रखी है। सीएए के दिशाहीन विरोध और एनआरसी तथा एनपीआर का हौआ खड़ा कर मुस्लिम समाज में कट्टरपंथी नेतृत्व को पनपने का अवसर देकर विपक्ष ने जो गलती की उसका खामियाजा उसे भविष्य में भुगतना पड़ेगा। सीएए का हल्ला तो देर सवेर ठंडा पड़ जाएगा और एनआरसी पर सरकार का स्पष्टीकरण आने के बाद इसे लेकर भी अनिश्चितता नहीं रहेगी। ऐसे में अब विपक्ष को भी अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीके से करना चाहिए। विशेष रूप से कांग्रेस के लिए ये जरूरी है कि वह राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर व्यवहार करना सीखे। सीएए और एनसीआर उसी के शासन काल में चर्चा में आये थे। बेहतर होता वह वामपंथियों के शातिरपने से बचे जो उसको सामने रखकर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। शाहीन बाग़ जैसे आन्दोलन का उसे विरोध करना चाहिए था क्योंकि इस तरह के तौर तरीकों से ही देश के विभाजन की नींव रखी गई थी।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 February 2020

अनावश्यक बयानबाजी से भाजपा को नुकसान



कर्नाटक के भाजपा नेता अनंत कुमार हेगड़े काफी फायरब्रांड माने जाते हैं। पूर्व में केन्द्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। विवादास्पद बयान देना उनकी आदत है या राजनीति करने की शैली ये तो वही जानते होंगे लेकिन उनके बड़बोलेपन से पार्टी को शर्मसार होना पड़ता है। अपने ताजे बयान में उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा किये गये स्वाधीनता संघर्ष को अंग्रेजों की सहमति और सहयोग से किया गया नाटक बता डाला। अब उनके फैलाये रायते को भाजपा नेतृत्व समेटने में लगा है। बिना शर्त माफी मांगने कहा गया है। श्री हेगड़े ने गांधी जी के अनशन वगैरह का भी मजाक उड़ाया। जैसा होता आया है उसे देखते हुए वे माफी मांग लेंगे और फिर बात आई-गई हो जायेगी। श्री हेगड़े पूर्व में भी इसी तरह के बयानों के लिए पार्टी द्वारा हड़काए जा चुके हैं। हालांकि वे अकेले भाजपा नेता नहीं हैं जो इस तरह की उल जलूल और अप्रासंगिक बयानबाजी करते हैं। एक तरफ  तो प्रधानमन्त्री हर भाषण में गांधी जी की प्रशस्ति किया करते हैं वहीं उनकी पार्टी की दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेतागण बिना सिर-पैर की बातें करते हुए अपनी और पार्टी दोनों की भद्द पिटवाने से बाज नहीं आते। गांधी जी और स्वाधीनता संग्राम एक दूसरे के समानार्थी हो चुके हैं। बापू से सैद्धांतिक मतभेद रखना या उनकी नीतियों की आलोचना करने में कुछ भी गलत नहीं है। आजादी की लड़ाई में भी अनेक नेताओं को उनके तौर-तरीके नापसंद थे। ये कहने वाले भी कम नहीं हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरु के प्रति उनका झुकाव ही सुभाषचन्द्र बोस और डा. भीमराव आम्बेडकर की नाराजगी का कारण बना। यहां तक भी माना जाता है कि मो.अली जिन्ना भी कांग्रेस में उंचा ओहदा पाने की महत्वाकांक्षा रखते थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि बापू पंडित नेहरु को ही कमान सौंपने का मन बना चुके हैं तब उन्होंने पाकिस्तान का राग अलापा। खैर, ये सब बातें आज के सन्दर्भ में शोधकर्ताओं के लिए रह गईं हैं क्योंकि इतिहास की अपनी जुबान तो होती नहीं और जो कुछ भी उसके हवाले से सामने आता है वह इतिहासवेत्ताओं द्वारा वर्णित होता है जिनकी निष्पक्षता सदैव सवालों के घेरे में रहा करती है। इसीलिये उसके ज्ञात - अज्ञात प्रसंगों पर हर कोई टीका-टिप्पणी करे तो फिर अनावश्यक विवाद उत्पन्न होते हैं। भाजपा एक सिद्धांतवादी पार्टी है जिसकी निश्चित दिशा है लेकिन राजनीति में आलोचना करते समय भी जिस मर्यादा और सौजन्यता की जरूरत होती है उसका ध्यान नहीं रखे जाने से उसकी छवि को धक्का पहुंचता है। विरोधी तो छोडिय़े उसके अपने समर्थक भी इस तरह की टिप्पणियों से खुद को असहज महसूस करते हैं। श्री हेगड़े के पहले भी अनेक भाजपा नेता बापू और उनके तरीकों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां कर चुके हैं। हर बार पार्टी नेतृत्व उन्हें सोच-समझकर बोलने की हिदायत के साथ माफी मांगने का निर्देश देता है लेकिन कुछ समय बाद कोई दूसरा नेता अनावश्यक विवाद को जन्म दे देता है। इस कारण से भाजपा के बारे में ये छवि भी बनती है कि उसकी गांधी भक्ति कोरा दिखावा है। नाथूराम गोडसे के बचाव में भी कुछ नेताओं की बयानबाजी के कारण भाजपा को लज्जित होना पडा है। जहां तक बात हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता की है तो ये बात किसी से भी छिपी नहीं है कि भाजपा हिन्दू हितों की संरक्षक पार्टी है। यद्यपि धर्मनिरपेक्षता के प्रति उसका कोई विरोध नहीं है लेकिन मंदिर आन्दोलन के चरमोत्कर्ष के दौर में लालकृष्ण आडवाणी ने धर्मनिरपेक्षता के प्रचलित मॉडल का मजाक उड़ाते हुए उसे छद्म करार दे कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नया नारा दिया जिसमें किसी समुदाय विशेष के तुष्टीकरण से परहेज की बात थी। भाजपा के वैचारिक स्रोत रास्वसंघ का तो स्पष्ट कहना है कि हर भारतीय नागारिक की राष्ट्रीयता हिन्दू है। संघ विरोधी वामपंथी इतिहासकार ये साबित करने में जुटे हुए हैं कि आर्य विदेशी नस्ल है और भारत का कोई प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास नहीं है। मोदी सरकार आने के बाद ये बहस योजनाबद्ध तरीके से और तेज हो गयी है। लेकिन भाजपा ने जिस तरह सरदार पटेल और महात्मा गंधी के प्रति अपना झुकाव प्रदर्शित किया उसके बाद उसके साथ अनेक ऐसे लोग और पार्टियां भी जुड़ीं जो कभी उसके साथ बैठने तक में सकुचाती थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले ही भाजपा ने जिस तेजी से अपने पैर पूरे देश में फैलाये उसमें उसकी समन्वयवादी नीतियां भी सहायक बनीं। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर कट्टर हिंदूवादी नेता की छवि रखने वाले नरेंद्र मोदी के साथ वे रामविलास पासवान भी आकर जुड़ गये जिन्होंने गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया था। नीतीश कुमार का भाजपा से अलग होकर लालू के पास चला जाना और फिर लौटकर आना भी मामूली बात नहीं थी। शिवसेना की कट्टर छवि की वजह से भाजपा द्वारा उससे दूरी बना लेना भी श्री मोदी के दौर में संभव हुआ। ऐसे में गांधी जी के बारे में व्यर्थ की बातें करने से श्री हेगड़े जैसे नेता समाचारों में सुर्खियां भले बन जाते हों लेकिन ऐसा करते हुए वे पार्टी और विचारधारा दोनों को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे नेताओं के कारण ही भाजपा केन्द्रीय सत्ता में मजबूती से जमी होने के बावजूद राज्यों की सत्ता गंवाती जा रही है। सही बात तो ये है कि महज चुनाव जीतने के लिए ऐरे-गेरे किसी को भी पार्टी में भर्ती करने के कारण भाजपा की छवि द्वितीय श्रेणी के उस अनारक्षित रेल डिब्बे जैसी होकर रह गयी जिसमें कोई भी आकर बैठ सकता है। भले ही श्री हेगड़े कर्नाटक के जाने-पहिचाने नेता हों लेकिन बापू के बारे में उनका ताजा बयान उनकी घटिया सोच को दर्शाता है जो राजनीतिक तो छोडिय़े साधारण स्तर का चातुर्य भी नहीं कहा जा सकता। बहरहाल पार्टी नेतृत्व ने उनको माफी मांगने का जो आदेश दिया वहीं पर्याप्त नहीं है। यदि भाजपा चाहती है कि उसकी कट्टरवादी छवि में सुधार हो तब उसे श्री हेगड़े और उसी तरह के दीगर नेताओं को शुद्ध हिन्दी में समझा देना चाहिए। प्रधानमन्त्री जिस कुशलता से पार्टी की नीतियों को एक के बाद एक लागू करने में लगे हैं उसके कारण भाजपा की छवि एक मजबूत और राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में स्थापित हो गई है लेकिन बीच-बीच में कुछ नेता आपत्तिजनक बयान देकर उस छवि को मटियामेट करने से नहीं चूकते। पार्टी के आला नेताओं को चाहिए कि ऐसे नेताओं को नियंत्रण में रखें वरना किसी दिन इनकी बकवास प्रधानमन्त्री की सारी उपलब्धियों पर पानी फेर देगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 February 2020

बजट : रंगहीन , गंधहीन , स्वादहीन



बीते शनिवार को आगामी वित्तीय वर्ष का जो केन्द्रीय बजट लोकसभा में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया वह एक अबूझ पहेली बनकर रह गया है। विपक्ष को तो खैर उसकी आलोचना करनी ही थी लेकिन सत्ता पक्ष भी ये बताने की स्थिति में नहीं है कि बजट की तारीफ किस आधार पर की जाए। लगता है वित्तमंत्री की सोच में दार्शनिकता ज्यादा है जिसकी वजह से बजट को समझने के लिए ध्यान लगाने की जरूरत पड़े। लेकिन आम बजट कहलाने के कारण यह देश के आम जन को सीधे प्रभावित करता है इसलिए साधारण व्यक्ति भी उसमें अपने लाभ खोजता है। वैसे कड़वा सच तो ये है कि बजट बनता चंद औद्योगिक घरानों के हित संवर्धन के लिए है क्योंकि अर्थव्यवस्था का समूचा खाका उन्हीं पर निर्भर रहता है। जहां तक बात आयकर जैसे प्रत्यक्ष कर की है तो वह सरकारी राजस्व का बहुत ही छोटा हिस्सा है और उसे चुकाने वाले भी आबादी के लिहाज से बेहद कम ही हैं। बावजूद इसके बजट का यही पहलू सबसे ज्यादा चर्चित और विवादित होता है। उस दृष्टि से वित्तमंत्री ने बजाय राहत देने के बाजीगरी का सहारा लिया। एक हाथ से छूट बढ़ाई लेकिन दूसरे हाथ से उसे छीन भी लिया। ऐसा करने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं वे बाजारवाद से पे्ररित लगते हैं। करदाता को बचत पर कर छूट दिए जाने की बजाय उसे खर्च करने के लिए प्रेरित करना आर्थिक सुस्ती दूर करने के मद्देनजर एक उपाय हो सकता है लेकिन भारतीय मानसिकता आज भी पश्चिम की उपभोक्ता संस्कृति से सर्वथा भिन्न है। खाओ, पियो मौज करो की बजाय आज की बचत कल की सुरक्षा आम भारतीय के आर्थिक चिंतन का आधार सदियों से रहा है। उस दृष्टि से ऐसी कोई भी व्यवस्था भारतीय परिवेश में आदर्श नहीं हो सकती जो साधारण हैसियत के व्यक्ति को बचत के संस्कार से दूर भगाए। उस दृष्टि से वित्तमंत्री ने आयकर ढांचे में जो बदलाव किये वे अटपटे, अपर्याप्त और कुछ हद तक अनावश्यक भी लगते हैं। यद्यपि उन्होंने करदाताओं को आयकर विभाग द्वारा भयाक्रांत करते हुए प्रताडि़त किये जाने पर रोक लगाने के जो आश्वासन दिए वे जरुर स्वागतयोग्य हैं लेकिन लौट फिरकर बात फिर वहीं आ जाती है कि इससे मध्यमवर्ग को कोई राहत नहीं मिलेगी। इसी तरह निर्मला जी ने अन्य क्षेत्रों के लिए जो प्रावधान किये उनसे आर्थिक सुस्ती दूर हो सकेगी, उसमें भी संदेह है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण विकास के किये अवश्य बजट में जो घोषणाएं की गईं वे निश्चित रूप से असरकारक होगीं किन्तु उनसे तात्कालिक तौर पर राहत की उम्मीद करना बेमानी होगा। ऊर्जा क्षेत्र में एक सुधार अवश्य स्वागत योग्य है जिसके तहत किसान अपनी गैर उपजाऊ भूमि का उपयोग सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए कर सकेंगे तथा अतिरिक्त बिजली ग्रिड के जरिये सरकार खरीद लेगी। देश में ऊर्जा संकट हल करने के साथ ही किसान को सस्ती बिजली देने का ये प्रयास सही सोच है। इसी तरह ग्रामीण विकास के लिए किये गये अन्य प्रावधान भी दूरगामी लाभ देने वाले हैं। जहां तक बात इन्फ्रास्ट्रक्चर की है तो ये इस सरकार का प्रिय विषय रहा है और श्रीमती सीतारमण ने इस क्षेत्र को भरपूर राशि दी है जो सीमेंट, लोहा जैसे उद्योगों को सहारा देने के साथ ही रोजगार भी देगा। इसी तरह सस्ते आवासीय मकान बनाने और खरीदने वालों को करों में दी जा रही छूट की अवधि में वृद्धि भी राहत देने वाली है लेकिन हाऊसिंग क्षेत्र के जो प्रकल्प बंद पड़े हैं उन्हें पुनर्जीवित करने के बारे में बजट में ज्यादा कुछ नहीं है जो व्यापार और रोजगार दोनों के लिए बड़ा सहारा है। मोदी सरकार की दूसरी पारी के इस बजट में शिक्षा, विशेष रूप से चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पेश की गई जिसके तहत हर जिले में मेडिकल कालेज खोलकर उसे जिला अस्पताल से जोड़ा जाएगा। देश में डाक्टरों की कमी और बेहतर चिकित्सा सेवाओं को छोटे शहरों तक पहुँचाने की दिशा में ये एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है लेकिन अव्वल तो इसमें आर्थिक संसाधनों की कमी बाधक बनेगी वहीं दूसरी तरफ  शिक्षकों का अभाव भी समस्या पैदा करेगा। उल्लेखनीय है देश के अधिकतर मेडिकल कालेजों में अध्यापकों की कमी की वजह से उनकी मान्यता पर सदैव तलवार लटका करती है। विदेशी छात्रों को भारत में शिक्षा ग्रहण करने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने और विश्वस्तरीय संस्थान खोलने के लिए निवेश की राह खोलना भी अच्छा निर्णय है बशर्ते इसे ठीक से लागू किया जा सके। अनेक वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर घरेलू उद्योगों को प्राणवायु देने का निर्णय देर से उठाया गया सही कदम है जिसका दायरा और बढ़ाने की जरूरत है। इसी तरह मेक इन इंडिया को और विस्तार देते हुए असेम्बलिंग हब बनाने का प्रावधान भी उत्साहित करता है। ये सोच बड़ी ही सामयिक है क्योंकि अमेरिकी दबाव के कारण चीन से ढेर सारे उद्योग बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी में है। सस्ते श्रमिक की उनकी जरूरत भारत पूरी कर सकता है। कोरोना वायरस के कारण भी चीन में आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होना तय है। लेकिन सरकार को अपनी नौकरशाही पर लगाम लगानी होगी जो नये उद्यमियों को चप्पलें घिसवाने में अपनी शान समझती है। इस बजट की सर्वाधिक आलोचना जिस कारण से हो रही है वह है सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश का फैसला। एयर इंडिया, भारत पेट्रोलियम, आईडीबीआई और रेलवे के बाद भारतीय जीवन बीमा निगम में सरकार द्वारा अपनी हिस्सेदारी बेचकर राजस्व जुटाने को लेकर न केवल विपक्ष बल्कि वरन आम जनता भी सशंकित है। भारत जैसे परम्परावादी देश में तंगी के बाद भी साधारण व्यक्ति तक पुश्तैनी संपत्ति बेचने में शर्म और दर्द दोनों महसूस करता है। उक्त संस्थानों में जीवन बीमा निगम ऐसा है जिससे बड़ी संख्या में देशवासी अपना सुरक्षित भविष्य देखते हैं। इसी तरह रेलवे में निजी ट्रेन चलवाने से शुरू प्रक्रिया अंतत: उसके निजीकरण पर जाकर रुकेगी ऐसा भी प्रचारित हो रहा है। विनिवेश आर्थिक सुधारों की उस सोच पर आधारित है जिसमें घाटे वाली किसी भी इकाई को चलाते रहना निरी मूर्खता के साथ ही आत्मघाती माना जाता है। बीएसएनएल जैसे उपक्रमों का जब तक एकाधिकार रहा तब तक वे खूब फले फूले लेकिन प्रतिस्पर्धा में मात खा गए जिसके लिए सरकार भी कम दोषी नहीं है। एयर इंडिया भी उसी श्रेणी में है। अनेक अर्थशास्त्री घाटे वाले उद्यमों के विनिवेश के प्रशंसक हैं लेकिन आम जनता के मन में सरकार को ये भरोसा जगाना होगा कि वह ऐसा क्यों कर रही है और इससे देश को क्या लाभ होगा? इस बजट की तारीफ  और आलोचना दोनों के लिए गुंजाईश इसलिए कम है क्योंकि एक तो ये आर्थिक मंदी या सुस्ती के दौर का है दूसरी बात जो ज्यादा महत्वपूर्ण है वह है आम चुनाव में अभी चार साल का समय होना। जिन लोगों को ये लगता था कि मोदी सरकार दिल्ली विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर मध्यम आय वर्ग और व्यापारी समुदाय को लुभाने वाले निर्णय करेगी उन्हें निराशा हुई होगी लेकिन पिछले पांच साल का अनुभव ये बताता है कि प्रधानमन्त्री ऐसे फैसले लेने में विश्वास करते हैं जिनका दूरगामी असर पड़े। अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति के बाद भी अति साधारण बजट पेश करने के पीछे एक सोच ये भी है कि आगामी वर्ष में जीएसटी के कारण उत्पन्न समस्याएँ हल हो जायेंगीं और सरकार को पर्याप्त राजस्व मिलने से उसका खर्च बढ़ेगा जिसका असर बाजार में छाई सुस्ती दूर होने के रूप में सामने आयेगा। बहरहाल जैसा शुरू में कहा गया निर्मला सीतारमण के रिकार्ड लम्बाई वाले बजट भाषण में ज्यादातर नाउम्मीदी का एहसास हुआ। इसीलिये आम जनता की नजर में ये एक रंगहीन, गंधहीन और स्वाधीन बजट है। इसके फायदे जब होंगे तब होंगे लेकिन फिलहाल तो इसका आना न आना बराबर ही है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 1 February 2020

घोषणापत्र : घूस का वैधानिक तरीका



केन्द्रीय बजट पेश होने के एक दिन पहले ही भाजपा ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिये अपना संकल्प पत्र जारी करते हुए सौगातों की बौछार कर डाली। इनमें छात्राओं को मुफ्त स्कूटी, बेटी को 21 साल की होने पर 2 लाख रु. और गरीबों को 2 रु. प्रति किलो की कीमत पर शुद्ध आटा देने का वायदा है। केजरीवाल सरकार द्वारा दी जा रही पेयजल और बिजली की सब्सिडी यथावत रखने की बात भी संकल्प पत्र में शामिल है। समाज के बाकी तबकों को लुभाने वाले कुछ और वायदे भी संकल्प पत्र का हिस्सा हैं। चूँकि मुफ्त उपहार अब भारतीय चुनावी राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं इसलिए दिल्ली में भाजपा संगठन के कर्ताधर्ताओं को इसके लिए कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता किन्तु सवाल ये है कि देश की राजधानी में भी यदि इस तरह के लालच देने पड़ते हों तब सुदूर हिस्सों में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए क्या-क्या करना पड़ता होगा ये विश्लेषण का विषय है। आजादी के बाद जब चुनाव शुरू हुए तब ये बात सुनाई देती थी कि फलां प्रत्यशी ने शराब और कम्बल बांटे। किसी जाति विशेष को प्रभावित करने के लिए उनके संगठनों को सामान आदि देने की बातें सामने आती थीं। मतदाताओं पर नियंत्रण रखने वाले बाहुबलियों को खुश रखना भी चुनावी राजनीति का हिस्सा था। मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ढोकर लाने के लिए वाहन उपलब्ध करवाना भी आम था। धीरे-धीरे चुनाव आयोग की सख्ती और सुधारवादी कदमों की वजह से उक्त तौर-तरीकों में ये बदलाव हुआ कि जो काम खुले आम होता था वह छुपाकर होने लगा। और उसकी जगह वैधानिक घूसखोरी आ गयी जिसे चुनावी घोषणा पत्र या संकल्प अथवा वचन पत्र का नाम दिया जाने लगा। इसकी शुरुवात किसने की ये भले ही शोध का विषय हो लेकिन आज की भारतीय राजनीति इसके बिना संभव नहीं रही। किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था में आम जनता के हितों का संरक्षण शासक का कर्तव्य होता है। राजतंत्र के दौर में भी जो लोकप्रिय शासक हुए उन सबने जनता के हितार्थ अपने खजाने खोले। उस दृष्टि से यदि हमारे देश की राजनीतिक जमातें और उनके नेता चुनाव में मतदाताओं को मुफ्त में कुछ देने का वायदा करते हैं तो उसे गलत ठहराना आसान नहीं होता। प्रजातंत्र की समूची परिकल्पना आखिर है तो जनकल्याण पर केन्द्रित ही। जिन-जिन देशों में जनतांत्रिक प्रणाली सफलतापूर्वक संचालित हो रही है वहां भी जनता के कल्याण के लिए सरकार दिल खोलकर खर्च करती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन, आमोद प्रमोद जैसे विषय सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में होते हैं। चुनाव के दौरान वहां भी मतदाताओं को लुभाने के लिए अनेक नीतियों और कार्यक्रमों की घोषणा होती है। लेकिन हमारे देश में उसका स्वरूप बेहद घटिया हो गया है। मतदाता को एक तरह से उपभोक्ता मानकर जिस तरह के ऑफर दिए जाने लगे हैं उनकी वजह से चुनावों की पवित्रता नष्ट हुई जिसका दुष्परिणाम अंतत: अर्थव्यवस्था का कचूमर निकलने के तौर पर सामने आ रहा है। जिन राज्यों में सत्ताधीशों ने मुफ्तखोरी को अपनी राजनीति का आधार बनाया वे सत्ता में बने रहने में भले सफल रहे हों लेकिन उनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने बिजली-पानी पर जो सब्सिडी दी उससे लोगों को फायदा जरुर हुआ लेकिन दिल्ली सरकार के खजाने पर जो असर पड़ा उसके दूरगामी नुकसान सामने आने बाकी हैं। महानगर होने से दिल्ली में करों से भरपूर आय होती है लेकिन बाकी राज्यों के पास राजस्व वसूली के उतने स्रोत नहीं होने से वहां का आर्थिक प्रबंधन मुफ्तखोरी की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। आम जनता के नजरिये से देखें तो ऐसी योजनाएं स्वागतयोग्य हैं लेकिन उनको लागू करने की लिए राज्यों की सरकारें लगातार कर्ज लेती जा रही हैं। उनके भुगतान हेतु उन्हें नये कर लगाने पड़ते हैं। पेट्रोल और डीजल इसके उदहारण हैं। आजकल लगभग हर राजनीतिक दल चुनावों के दौरान किसानों को मुफ्त या सस्ती बिजली के अलावा उनके ऋण माफ करने जैसा वायदा करने में नहीं हिचकता। राहुल गांधी जैसे नेता तो चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता में आते ही दस-पंद्रह दिन के भीतर किसानों के कर्ज माफ करने का दावा करने से नहीं चूकते। इसका फायदा भी उनकी पार्टी को मिलता है लेकिन सत्ता में आने के बाद इस वायदे को पूरा करने में जो व्यावहारिक परेशानियां आती हैं उनकी जानकारी मप्र, राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से ली जा सकती है। दिल्ली में भाजपा ने स्कूटी और 2 रु. प्रति किलो की कीमत पर आटा देने का जो वायदा किया वह नई बात नहीं है। जिन राज्यों में उसका शासन रहा वहां भी सस्ते अनाज, मुफ्त सायकिल, लड़कियों के खाते में जन्म पर ही एक लाख रु. और मुफ्त शिक्षा जैसे कार्यक्रम चलाये गए लेकिन उसके बाद भी 2018 में पार्टी को अपने ऐसे कुछ राज्य गंवाने पड़ गए जहां वह 10 साल से भी ज्यादा सत्ता में रही। बावजूद इसके मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर चुनाव जीतने की प्रवृत्ति से बचने की बजाय उसे नये रूप में लागू करना ये दर्शाता है कि हमारी राजनीति दिशाहीन हो चुकी है। नब्बे के दशक में जातिवादी राजनीति का नया रूप सामने आया था उसके कारण सरकारी नौकरियों में आरक्षण को नई-नई पैकिंग में पेश किया जाने लगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई सीमा रेखा को लांघने का दुस्साहस भी हुआ। इसका जो चुनावी लाभ हुआ वह अपनी जगह है लेकिन सरकार ने नौकरियां बाँटने से ही ही परहेज करते हुए निजीकरण का रास्ता अपना लिया। राजनीतिक फैसलों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता ही है। आज देश जिस तरह के आर्थिक भंवर में फंसा है उसके लिए मुफ्त उपहार वाली राजनीति काफी हद तक जिम्मेदार है। गरीबों का उत्थान हर तरह से होना चाहिए लेकिन चुनाव जीतने के लिए मुफ्त उपहार बांटने की इस संस्कृति का कहीं न कहीं तो अंत करना ही पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग दोनों ही घोषणापत्र के नाम पर दी जाने वाली सौगातों पर दबी जुबान सवाल उठा चुके हैं। चुनाव सुधारों को लेकर होने वाली चर्चाओं में भी ये विषय उठता है लेकिन राजनीतिक दलों को इसकी चिंता कतई नहीं है। ऐसा लगता है सर्वोच्च न्यायालय को ही कुछ करना पड़ेगा। चुनाव प्रचार के दौरान किसी भिखारी को प्रत्याशी द्वारा कुछ रूपये दिए जाने पर आचार संहिता के उल्लंघन का प्रकरण दर्ज हो जाता हैं लेकिन घोषणापत्र के जरिये खुले आम लालच दिए जाने को गलत नहीं मानना मजाक नहीं तो और क्या है?

-रवीन्द्र वाजपेयी