Saturday, 15 February 2020

फांसी के अलावा अन्य अपीलों की भी जल्द सुनवाई हो



सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस एक महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी करते हुए उच्च न्यायालय द्वारा फांसी की सजा प्राप्त व्यक्ति की अपील पर सुनवाई की अधिकतम समय सीमा छह महीने तय कर दी। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक अपील की सुनवाई में ही बरसों लग जाते हैं जिसका लाभ लेकर दोषी व्यक्ति के मृत्युदंड की तारीख टलती रहती है। इस दिशा निर्देश की जरुरत इसलिए पड़ी क्योंकि निर्भया कांड के दोषियों की फांसी जिस तरह टलती जा रही है उससे समूची न्याय व्यवस्था का मजाक उडऩे लगा है। मृत्युदंड की सजा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरकरार रखी जाने के बाद भी आरोपी के पास राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका का अंतिम विकल्प होता है। ये याचिका केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के मार्फत महामहिम के पास पहुंचती है। अब तक के अनुभव बताते हैं कि इस समूची प्रक्रिया में समय सीमा निर्धारित नहीं होने से बरसों बरस बीत जाते हैं। निर्भया काण्ड इसका सबसे ताजा उदाहरण है। जिन चार लोगों को फांसी दिए जाने की तारीख तक तय हो चुकी थी उनकी ओर से दया याचिका और अपील दर अपील के जरिये कानूनी पेंच इस तरह फंसा दिया गया जिससे ये समझ ही नहीं आ रहा कि उन्हें उनके किये की सजा आखिर कब मिलेगी। एक समय था जब निर्भया काण्ड पूरे देश में चर्चित था। उससे जुड़ी हर खबर पहले पन्ने पर छाई रहती थी। पूरे देश में उस काण्ड के दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने के लिए तरह-तरह के आन्दोलन होते रहे। लेकिन धीरे-धीरे केवल निर्भया की माता जी ही अकेले अदालत में खड़े होकर अपनी बेटी के साथ दरिंदगी करने वालों को उनके पाप की सजा दिलवाने की गुहार करती दिखाई देती हैं। समाचार माध्यमों और पूरे देश में मोमबत्तियां जलाने वालों ने भी इस काण्ड में पहले जैसे रूचि दिखानी बंद कर दी जो स्वाभाविक ही है। उक्त काण्ड के दोषी जिस चालाकी से एक के बाद एक याचिकाओं के माध्यम से मृत्युदंड की तारीख टलवाते जा रहे हैं उसके मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा दिशा निर्देश निश्चित रूप से भविष्य में ऐसे मामलों के जल्द निपटारे का आधार बनेंगे, ये उम्मीद की जा सकती है। कानून की भी अपनी सीमाएं होती हैं जिन्हें लांघना संभव नहीं होता। निर्भया काण्ड के चारों दोषियों को एक साथ फांसी दिए जाने की तिथि घोषित हो गई थी। उसके बाद उन्होंने अलग-अलग याचिकाएं लगाने शुरू कीं। जो एक के बाद एक खारिज होती जा रही हैं। लेकिन पूर्व में डेथ वारंट चूंकि एक साथ जारी किया गया था इसलिए फांसी भी एक साथ दिए जाने का नियम होने से जिनकी सभी अपीलें निरस्त हो चुकी हैं वे भी अब तक जि़ंदा बने हुए हैं। यदि उच्च न्यायालय द्वारा फांसी दिए जाने के बाद अपीलों का निराकरण जल्दी हो जाता तो चारों दोषी कभी के फांसी पर झूल चुके होते। हमारे देश में न्याय प्रणाली की मंथर गति पर सवाल तो रोज उठते हैं लेकिन सुधार करने के बारे में अपेक्षित प्रतिबद्धता नहीं दिखाई जाती। हाल ही में खबर आई थी कि देश भर के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के सैकड़ों पद रिक्त पड़े हैं। नियुक्ति संबंधी तमाम औपिचारिक्ताएं भी पूरी हो चुकी हैं लेकिन सरकार अंतिम फैसला नहीं कर रही। यद्यपि लंबित प्रकरण निबटाने की दिशा में तरह-तरह के तरीके न्यायपालिका ने निकाले जिनका लाभ भी हुआ लेकिन दीवानी के साथ-साथ अपराधिक प्रकरणों के निपटारे में होने वाले विलम्ब से न्यायपालिका की छवि खऱाब होती है। हालाकि सर्वोच्च न्यायालय के ताजा दिशा निर्देश केवल मृत्युदंड के विरुद्ध अपील के बारे में हैं। जिनके पीछे निर्भया काण्ड से उत्पन्न परिस्थितियां ही कही जाएंगीं। ऐसा लगता है इस काण्ड के दोषियों द्वारा कानून में मौजूद कमियों का लाभ लेकर जिस तरह से अपनी फांसी टलवाई जा आ रही है उससे सर्वोच्च न्यायालय भी सतर्क  हो उठा। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय को प्रकरण की गहराई में ज्यादा जाने की जरुरत नहीं होती। फांसी की सजा के विरुद्ध की जाने वाली अपील में शायद ही कोई बरी होता होगा। ज्यादा से ज्यादा फांसी को आजीवन कारावास में बदला जाता है। ऐसे में अपील की सुनावाई छह महीने में शुरू किये जाने की व्यवस्था एक सामयिक निर्णय है जिसके लिए सर्वोच्च न्यायालय प्रशंसा का पात्र है। न्याय में विलम्ब न्याय से इनकार है वाली युक्ति में अब ये भी जोड़ा जाना चाहिए कि न्याय में विलम्ब न्याय का मजाक है। न्याय प्रक्रिया में विलम्ब का एक नुकसान ये भी होता है कि मुकदमा लडऩे वाले पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। चूंकि वकीलों की फीस का कोई निर्धारित मापदंड नहीं है इसलिए पक्षकार की मजबूरी का जमकर फायदा उठाने की प्रवृत्ति इस क्षेत्र में खुलकर नजर आती है। इसीलिये त्वरित न्याय एक अपेक्षा ही नहीं आवश्यकता भी बन चुकी है। गत दिवस जारी हुए दिशा निर्देशों को फांसी के अलावा अन्य अपीलों के संदर्भ में भी लागू किया जावे तो न्यायिक सुधार की प्रक्रिया में और तेजी आ सकेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 14 February 2020

अपराध और राजनीति : चोली दामन का साथ



भारत में चुनाव सुधारों की दिशा में राजनीति का अपराधीकरण बड़ी बाधा बना हुआ है। एक समय था जब चुनाव जीतने के लिए राजनेता अपराधी तत्वों की मदद लिया करते थे जिसके एवज में उन्हें संरक्षण दिया जाता था। कालांतर में अपराधी तबके ने खुद ही चुनावी मैदान में हाथ आजमाने की सोची। इसके पीछे उद्देश्य बिलकुल साफ था। चुनाव जीतने के बाद जन प्रतिनिधि बनते ही उसकी छवि भले न बदले लेकिन हैसियत बदल जाती है और किसी नेता की अनुकम्पा पर निर्भर रहने की बजाय वह खुद दूसरे अपराधियों को संरक्षण प्रदान करने की ताकत अर्जित कर लेता है। धीरे-धीरे अपराध और राजनीति का चोली-दामन का साथ हो गया। जिस तरह भारतीय फिल्मों में डाकुओं को शोषित और पीडि़त बताकर महिमामंडित किया जाता है उसी तरह से राजनीति में भी अपराधी को सहानुभूति का पात्र बनाकर सांसद और विधायक बनाने का खेल शुरू हो गया और बात फूलन देवी के लोकसभा में पहुँचने तक जा पहुँची। मिर्जापुर सीट पर उसके सजातीय मतदाताओं की बड़ी संख्या के कारण वह धड़ल्ले से जीत गयी। लेकिन वह अकेला नाम नहीं है। उसके पहले और बाद में भी संगीन अपराधों में लिप्त सैकड़ों कुख्यात चेहरे विधानसभाओं और लोकसभा में ससम्मान विराजमान होते रहे। चुनाव आयोग के अलावा विभिन्न संगठनों ने इस दिशा में काफी प्रयास किये लेकिन चुनाव जीतने की क्षमता के अलावा भी अनेक बातें ऐसी हैं जिनके कारण अपराधी तत्व चुनावी राजनीति में लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे। किसी ने जातिवाद का लाभ उठाया तो किसी ने धन और बाहुबल का। कुछ समय  से चुनाव आयोग ने ये व्यवस्था कर रखी है कि नामांकन पत्र में प्रत्याशी को अपने ऊपर चल रहे अपराधिक प्रकरणों की जानकारी देनी होगी। उसके बाद ये नियम बना कि वह इस जानकारी को समाचार पत्र में भी प्रकाशित करवाए जिससे कि मतदाताओं को उसकी कर्मपत्री का पता चल सके। अपराधिक प्रकरण में दो वर्ष से ज्यादा की सजा सुनाये जाने पर सदस्यता चली जाने और चुनाव लडऩे से वंचित किये जाने का कानून भी प्रचलन में आया जिसके अंतर्गत लालू यादव का चुनावी सफर रुक गया। इस सबके बावजूद राजनीतिक दलों ने अपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों के चयन से परहेज करना बंद नहीं किया। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे किसी अपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार को टिकिट देने का कारण सार्वजनिक करें तथा बेदाग़ को क्यों वंचित रखा गया ये भी स्पष्ट करें। इसके साथ ही उसका विवरण वेबसाईट के अलावा समाचार पत्रों के माध्यम से भी उजागर किया जावे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसके पूर्व भी राजनीति को अपराधी तत्वों से मुक्त करवाने के लिए काफी निर्देश दिए थे। उनका आंशिक पालन भी हुआ लेकिन राजनीतिक दलों में ईमानदारी और इच्छाशाक्ति का अभाव होने से न्यायालय की भावना का सम्मान करने की बजाय बीच के रास्ते निकाल लिए गए। कानून की नजर में जब तक किसी को दण्डित नहीं किया जाए तब तक वह आरोपी तो हो सकता है किन्तु अपराधी नहीं माना जा सकता। लेकिन ह्त्या और उस जैसे अनेक गंभीर मामलों में जेल में बंद सांसद को राष्ट्रपति चुनाव में मत डालने लाया जाता है तब लोकतंत्र का चेहरा शर्म से झुक जाता है। इस बारे में किसी एक पार्टी या नेता को कसूरवार ठहराना अन्याय होगा क्योंकि वामपंथियों को छोड़कर बाकी सभी पार्टियां अपराधी पृष्ठभूमि को चुनावी टिकिट के लिए अयोग्यता नहीं मानतीं। वामपंथी दर अपराधियों को सांसद और विधायक तो नहीं बनाते लेकिन अपने विरोधियों से निपटने में उनका उपयोग नि:संकोच करते हैं। चूंकि किसी नेता और पार्टी की सफलता का मापदंड केवल और केवल चुनाव जिताना और सत्ता हासिल करना रह गया है इसलिए साम, दाम, दंड, भेद नामक सभी तरह के हथकंडे अपनाने में किसी को लज्जा नहीं आती। चाल, चरित्र और चेहरे की उत्कृष्टता का दावा करने वाली भाजपा हो या फिर नई राजनीति की जन्मदाता बन बैठी आम आदमी पार्टी, सभी की प्राथमिकता येन केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना है। हाल ही में संपन्न दिल्ली के चुनाव में सबसे ज्यादा अपराधिक प्रकरण वाले उम्मीदवार आम आदमी पार्टी ने ही उतारे जिनमें लगभग सभी जीत भी गये। सर्वोच्च न्यायालय ने दागी को टिकिट दिए जाने के कारण स्पष्ट करने का जो निर्देश दिया वह तो ठीक है लेकिन बेदाग और योग्य को उम्मीदवारी से क्यों वंचित कर दिया इसका स्पष्टीकरण देने का निर्देश अटपटा है। बहरहाल ताजा फैसला कितना कारगर होगा कह पाना कठिन है क्योंकि अपराधी तत्वों को सांसद और विधायक चुनने का काम जो मतदाता करते हैं वे भी तो इस बारे में उदासीन हैं। छोटी-छोटी बातों को लेकर अनेक गाँव और बस्ती के मतदाता चुनाव का बहिष्कार करने का ऐलान कर देते हैं लेकिन आज तक किसी भी क्षेत्र से ये आवाज नहीं आई कि उम्मीदवारों की अपराधिक पृष्ठभूमि के कारण मतदान नहीं करेंगे। सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग दोनों के प्रयास सैद्धांतिक तौर पर तो सही और शिरोधार्य हैं लेकिन राजनीतिक पार्टियों द्वारा उनकी काट निकालकर चुनावी राजनीति को जिस तरह से गलत लोगों के हवाले कर दिया गया उसकी वजह से अच्छी सोच और बेदाग पृष्ठभूमि के लोगों के लिए राजनीति बिना ऑक्सीजन के एवरेस्ट पर चढऩे से भी कठिन है। चुनाव सुधार और राजनीति के शुद्धिकरण में सबसे बड़ी समस्या धन के अनाप-शनाप उपयोग से भी उत्पन्न हुई। भले ही उम्मीदवार के खर्च की सीमा तय कर दी गयी है लेकिन साधारण बुद्धि वाला भी बता देगा कि लोकसभा-विधानसभा चुनाव हेतु खर्च की निर्धारित राशि जुटाना भी अच्छे-अच्छों के बस की बात नहीं है। जीते हुए उम्मीदवारों द्वारा दिये जाने वाले खर्च का ब्यौरा दरअसल शपथ लेकर बोला जाने वाला झूठ है। लेकिन सब जानते हुए भी कोई इससे रोक नहीं पा रहा। ऐसे में लोकतंत्र की इस मजबूरी के बाद भी उसके मजबूत होने का दावा वाकई मजाक है। इसीलिये सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय से विशेष बदलाव या सुधार की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी क्योंकि जिन्हें ये सुधार करना हैं उन्होंने तो हम नहीं सुधरेंगे की कसम खा रखी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 13 February 2020

चीन का संकट भारत के लिए वरदान




हर संकट कुछ न कुछ सिखाता और देकर जाता है। ये बात व्यक्ति और देश दोनों पर लागू होती है। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद भारत ने अपने रक्षा उत्पादन के साथ ही सीमा पर अधो  संरचना के विकास पर ध्यान देना शुरू किया। आज भारत रक्षा उपकरणों के मामले में भले ही पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हुआ हो लेकिन मिसाइलें, तोपें, गोला बारूद, छोटे युद्धक विमान जैसी चीजों के उत्पादन में काफी प्रगति हुई है। ब्रह्मोस जैसी मिसाइल तो निर्यात भी होने लगी है। सीमाओं पर आवाजाही के पर्याप्त साधन और सुविधाएं विकसित करते हुये सियाचिन जैसे दुर्गम इलाके तक नियमित आपूर्ति और आवाजाही की समुचित व्यवस्था कर ली गयी है। इसी तरह सत्तर के दशक में अन्न संकट के बाद देश में हरित क्रांति का विचार आया और धीरे-धीरे भारत अन्न उत्पादन में आत्म निर्भरता हासिल कर सका। यद्यपि अभी भी दलहन और तिलहन का आयात करना पड़ता है किन्तु किसी भी आपदा के बावजूद देश में खाद्यान्न का भरपूर भण्डार होना मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है। जरूरतों के मद्देनजर  भविष्य के लिए तैयारी करने के फायदे अन्य क्षेत्रों में भी हुए। आज का भारत साफ्टवेयर और अन्तरिक्ष के क्षेत्र में विश्वस्तरीय हैसियत अर्जित कर चुका है। लेकिन बीते दो-तीन दशक के दौरान मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर में काफी कमी आई। विशेष रूप से उदारीकरण के बाद ज्योंही भारत के द्वार विदेशी सामानों के लिए खुले त्योंहीं सस्ता चीनी माल घरेलू बाजार में छा गया। सुई से लेकर तो दवाइयां, फर्नीचर, खिलौने, इलेक्ट्रानिक्स और  बिजली का सामान, मशीनें, हार्डवेयर, वाहनों के कल पुर्जे, सेनेटरी फिटिंग्स जैसी अनगिनत चीजें चीन से धड़ल्ले से आयात की जाने लगीं। शुरू-शुरू में तो इनका आयात लाभप्रद लगा लेकिन जल्दी ही ये बात सामने आने लगी कि सस्ते चीनी सामान ने हमारे घरेलू उद्योग की कमर तोड़कर रख दी। चूंकि भारत में उत्पादन लागत अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ती थी इसलिए यहाँ बनी वस्तुएं महंगी होने से चीनी माल के सामने मात खा गईं। हालांकि उसमें गुणवत्ता नहीं होने के बाद भी कम दाम की वजह से उपभोक्ता बाजार पर उसका कब्जा हो गया। जिस चीन को आम भारतीय दुश्मन मानता था वही हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन बैठा लेकिन ये रिश्ता इकतरफा कहा जा सकता है क्योंकि आपसी व्यापार पूरी तरह असंतुलित है। मसलन हम जितना आयात चीन से करते हैं उसका बहुत छोटा हिस्सा निर्यात किये जाने से व्यापार घाटा खतरनाक स्तर तक जा पहुंचा। लेकिन घरेलू उद्योगों के चौपट हो जाने से चीन से आयात जरूरत से भी बढ़कर तो मजबूरी बन गयी। विश्व व्यापार संगठन से बंधे होने से आयात को पूरी तरह रोना संभव नहीं रहा। ज्यादा से ज्यादा चीनी माल पर आयात शुल्क बढ़ाकर उसकी आवक को नियंत्रित किया जा सकता है जैसा ताजा बजट में  केंद्र सरकार ने किया भी लेकिन उस सम्बन्ध में भी ज्यादा कुछ किये जाने की गुंजाइश नहीं है। अचानक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी जिसमें भारत अपने मृतप्राय घरेलू उद्योग धंधों को संजीवनी देकर पुनर्जीवित कर सकता है। चीन में कोरोना वायरस नामक संकट की वजह से वहां का पूरा जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया है। बड़ी आबादी घरों में बंद है। हजारों की संख्या में मौतों की वजह से भय का माहौल है। लाखों लोग संक्रमित होने से स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गईं हैं। औद्योगिक उत्पादन ठप होने से चीन का विदेशी व्यापार भी गड़बड़ा गया है। चीनी सामान के साथ कोरोना वायरस के विषाणु आ जाने के डर से वहां से आयात बंद कर दिया गया। न कोई चीन जा रहा है और न ही चीनियों को अपने यहाँ आने दे रहा है। भारत के आटोमोबाइल क्षेत्र में कल पुर्जों की कमी हो गई है। बनारसी साडिय़ों के कारोबार में भी सिल्क का आयात रुकने से परेशानी हो रही है। उपभोक्ता सामानों का आयात अवरुद्ध  हो जाने से व्यापारी परेशान हैं। आज खबर आ गई कि चीन से  दवाइयां नहीं आने से देश में दवा संकट पैदा हो सकता है। अप्रैल तक का स्टाक तो है लेकिन कोरोना संकट आगे भी खिंचा तो  भारत में  बनने वाली दवाइयों के लिए भी जरूरी कच्चा माल चीन से न आने के कारण घरेलू दवा उद्योग बीमार होने के कगार पर आ सकता है। कुल मिलाकर कोरोना वायरस ने चीन को तो बुरी तरह से हलाकान किया है। लेकिन भारत जैसे देश की अर्थव्यवस्था और जनजीवन पर भी इसका सीधा असर होने लगा है। ऐसे में बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के इस अवसर का लाभ लेते हुए देश में उत्पादन क्रांति लाने की तैयारी की जानी चाहिए। हालाँकि ये काम रातों-रात नहीं हो सकता लेकिन अतीत में ऐसे ही विपरीत हालातों में हौसले के साथ आगे बढऩे के कारण भारत ने अनेक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता अर्जित की जिससे हमारा अर्थतंत्र सुदृढ़ हुआ। चीन को इस संकट से उबरने में लम्बा समय लगेगा। अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चीन से पलायन करने की तैयारी कर रही हैं। भारत को ये अवसर लपक लेना चाहिए। स्वदेशी उद्योगों को अधिकतम प्रोत्साहन देकर हम चाहें तो अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर करते हुए बेरोजगारी की समस्या को भी काफी हद तक हल कर सकते हैं। हरित क्रांति की तरह से ही औद्योगिक उत्पादन क्रान्ति का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम चलाकर भारत दक्षिण एशिया के छोटे-छोटे देश वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, बांग्ला देश से आगे निकल सकता है जिन्होंने बीते दो दशक के भीतर जबर्दस्त तरक्की कर ली। लेकिन इसके लिए हमारे सरकारी तंत्र को ढर्रे से बाहर निकलना होगा। केंद्र और राज्य सरकारें निवेशकों के लिए लाल कालीन बिछाने के लिए तो सदैव तैयार रहती हैं लेकिन जब वे उद्योग लगाने आते हैं तब उनको खून के आंसू रुलाये जाते हैं। विदेशी निवेशकों को तो देवदूत मानकर उनकी आवभगत की जाती है लेकिन बड़े धनकुबेरों को छोड़ दें तो छोटा कारोबारी सरकारी चक्की में पिस जाता है। चीन का वर्तमान संकट लम्बा असर छोड़कर जाने वाला है। भारत के लिए ये प्रकृति प्रदत्त स्वर्णिम अवसर है। हमारे राजनेता चाहे केंद्र के हों या राज्यों के यदि इस समय ईमानदारी से औद्योगिक उत्पादन क्रान्ति का बिगुल फूंके तो आने वाले कुछ वर्षों में भारत का उद्योग व्यापार चीन को टक्कर देने की स्थिति में आ सकता है। जैसा प्रारंभ में कहा गया हर संकट कुछ न कुछ सबक देकर जाता है। भारत को चाहिए वह इच्छाशक्ति और निर्णय क्षमता का परिचय देकर आगे बढ़े क्योंकि ऐसे मौके बार-बार नहीं आते।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 February 2020

प्रशंसा और बधाई के हकदार हैं केजरीवाल



दिल्ली विधानसभा चुनाव में जैसा अनुमानित था वैसा ही हुआ। इस चुनाव से रहीम की लिखी ये बात एक बार सही साबित हो गई कि जहाँ काम आवे सुई कहा करे तलवार ? अर्थात एक महानगरीय राज्य में स्थानीय मुद्दों पर पिछली सरकार का वायदों पर खरा उतरना ज्यादा कारगर सिद्ध हुआ। भाजपा को लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम और काम का जो लाभ मिला ठीक वही फायदा अरविन्द केजरीवाल के खाते में आकर जुड़ा। मोदी के विरूद्ध जिस तरह विपक्ष ने खूब हायतौबा मचाया वैसा ही केजरीवाल के साथ हुआ। लोकसभा में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अपनी उपलब्धियों के नाम पर संसद की सीटें मांगीं लेकिन दिल्ली की जनता ने उसे तीसरे नम्बर पर धकेल दिया। लेकिन मात्र आठ महीने बाद ही उसी आम आदमी पार्टी को फिर सिर आँखों पर बिठा लिया और सातों लोकसभा सीटें जीत चुकी भाजपा को 8 सीटों पर समेट दिया। इस चुनाव परिणाम के दो संकेत हैं। पहला ये कि भाजपा को प्रादेशिक स्तर पर गंभीर किस्म के सक्षम नेतृत्व को आगे लाना होगा और वहीं आम आदमी पार्टी के लिए भी ये संदेश है कि अपनी सीमा से बाहर निकलकर हाथ पाँव मारने से बचें क्योंकि राष्ट्रीय स्तर तो बड़ी बात है किसी पड़ोसी राज्य में भी आम आदमी पार्टी को दिल्ली जैसी सफलता मिलना जागती आँखों से सपने देखने जैसा होगा। आम आदमी पार्टी में जाने के बाद लौटकर दोबारा पत्रकार बने आशुतोष की ये बात काबिले गौर है कि किसी और को ये अहंकार न रहे कि दिल्ली की जीत में उसका हाथ है क्योंकि ये केवल और केवल श्री केजरीवाल के करिश्मे और विश्वसनीयता की जीत है। जहां तक बात उनके राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर उभरने की है तो ये काफी मुश्किल है क्योंकि आम आदमी पार्टी एक क्षेत्रीय भी नहीं अपितु महानगरीय पार्टी ही है और उसका अस्तित्व भी तभी तक है जब तक वह दिल्ली में केन्द्रित रहेगी। भारतीय राजनीति की तासीर ये रही है कि क्षेत्रीय या स्थानीय पार्टी के नेता ने जब भी राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की कोशिश की उसका मूल जनाधार कमजोर होता गया। तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फार्मूले को अपनाते हुए  अपने प्रभावक्षेत्र को समझकर उससे बाहर निकलने का दुस्साहस नहीं किया जिसकी वजह से वे अनेक दशकों से अपनी ताकत संजोकर रख सकीं। वैसे दिल्ली के चुनाव में भाजपा ने एक तरह से अपनी वापिसी कर ली वरना ये आशंका भी थी कि कहीं केजरीवाल नामक करिश्मे में उसकी हालत भी कांग्रेस जैसी होकर न रह जाए। आम आदमी पार्टी आन्दोलन से निकली पार्टी और अरविन्द केजरीवाल ही उसके चेहरे हैं। उन्हें मालूम है कि आन्दोलन के साथियों को बराबरी से बिठाने पर उनकी महत्वाकांक्षाएं परवान चढऩे लगती हैं। और वे अपनी कीमत मांगने लगते हैं। इसीलिए 2015 की ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने बड़ी ही चतुराई से पार्टी खड़ी करने के लिए एक करोड़ का का चन्दा देने वाले शांति भूषण के अलावा प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास और प्रोफे. अरुण कुमार जैसे नींव के पत्थरों को निकाल बाहर किया। योगेंद्र यादव के साथ तो धक्का मुक्की तक की गई। इस चुनाव में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया का मतगणना में काफी देर तक पीछे बने रहना भी एक संकेत है कि दूसरे स्थान वाला अपने को पहले के लायक समझने की भूल न करे। चुनाव नतीजों को भाजपा और उसके द्वारा उठाये जा रहे राष्ट्रीय मुद्दों और हिन्दू मतों के धु्रवीकरण की पराजय मानने वाले दरअसल सतही आकलन करने की गलती कर रहे हैं। इस परिणाम को शाहीन बाग की जीत बताने वालों की राजनीतिक समझ पर भी हंसी आती है। एक राष्ट्रीय पार्टी किसी चुनाव में अपनी हैसियत के लिहाज से बात करे तो उसमें गलत क्या है ? कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दिल्ली की अपनी रैलियों में नरेंद्र मोदी की नीतियों की आलोचना की क्योंकि वे भी एक राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय नेता हैं। उन्होंने भी श्री केजरीवाल पर झूठे वायदे करने का आरोप लगाया। ये बात अलहदा है कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को इस लायक भी नहीं समझा कि उस पर कोई टिप्पणी की जाए। चुनावी नतीजे भाजपा के लिए तो निश्चित तौर पर विचारणीय हैं क्योंकि बीती मई में आम आदमी पार्टी को चारों खाने चित्त करने के बाद वह उस जन समर्थन को अपने साथ जोड़कर नहीं रख सकी। इसके लिए नेता का चेहरा न होना कारण बना या कमजोर संगठन ये जाँच का विषय हैं लेकिन कांग्रेस के लिए ये चिंता का विषय है जो 1998 से 2013 तक दिल्ली की सत्ता में रहने के बाद 2014 और 2019 के लोकसभा के अलावा 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव में शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी। यदि उसे इस बात की खुशी है कि भाजपा 1998 से लगातार पांच विधानसभा चुनाव हार गई तो उसे ये याद रखना चाहिए कि भाजपा ने अपना मत प्रतिशत काफी हद तक सुरक्षित रखा जबकि कांग्रेस तो दयनीयता के स्तर तक आ गई है। जहां तक बात पूरे देश में केजरीवाल फार्मूले को अपनाकर चुनाव जीतने की है तो ये गलतफहमी होगी। हर राज्य की अपनी प्राथमिकतायें, आवश्यकताएं और भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग हैं। दिल्ली में बीते पांच साल तक आम आदमी पार्टी सरकार ने बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर जो भी उल्लेखनीय कार्य किये उन्हें उसी तेजी से जारी रखना कठिन होगा। छत्तीसगढ़ और मप्र में तमाम कल्याणकारी योजनायें चलाने के बाद अंतत: भाजपा के हाथ से सत्ता खिसक ही गई। आम आदमी पार्टी सरकार के सामने असली चुनौती नए कार्यकाल में होगी। जनता की उम्मीदों को आसमान पर चढ़ाकर हमेशा के लिए राज नहीं किया जा सकता। शीला दीक्षित ने 15 साल के शासन में दिल्ली में जो विकास किया वह अभूतपूर्व था किन्तु आखिरकार वे खुद चुनाव हार गईं। दिल्ली के मुद्दे पूरी तरह से स्थानीय और नगरीय निकाय के स्तर के थे। चूंकि उनसे गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों को लाभ हुआ इस कारण आम आदमी पार्टी की वापिसी का रास्ता खुल गया। अब दूसरी पारी में केजरीवाल सरकार क्या करेगी इस पर उसका भविष्य निर्भर करेगा। जहां तक बात भाजपा की है तो ये नतीजे उसके लिए धक्का हैं क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद मोदी सरकार ने जिस प्रभावशाली तरीके से अपने घोषणापत्र के मुख्य वायदों को अमली जामा पहिनाया उसके बाद भी राज्यों के चुनाव में पार्टी का निराशाजनक प्रदर्शन शोचनीय है। इसकी वजह प्रादेशिक नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश है या प्रदेश स्तर के नेताओं का केन्द्रीय नेतृत्व पर पूरी तरह आश्रित हो जाना , इसका विश्लेषण होना जरूरी है। अरविन्द केजरीवाल ने लगातार दो बार अपना करिश्मा दिखा दिया लेकिन ऐसा करने वाले वे पहले नेता नहीं हैं। तमिलनाडु, आन्ध्र, तेलंगाना, उड़ीसा, बिहार, उप्र आदि में अनेक क्षेत्रीय नेता ऐसी ही सफलता अर्जित कर राष्ट्रीय पार्टियों को जमीन दिखा चुके हैं। केजरीवाल फिलहाल तो सुपर हीरो की तरह उभरे हैं। दो बार नरेंद्र मोदी के सामने जीतना बड़ी बात है। उनकी अपनी कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है जो उनका सबसे मजबूत पक्ष है। जिसके कारण उन्हें सभी दलों के समर्थकों का समर्थन मिला लेकिन कालान्तर में यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगी क्योंकि वे दिल्ली में किसी और को नहीं घुसने देना चाहेंगे और इसी तरह दूसरे नेता उनकी पार्टी को अपने इलाके में बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे। बावजूद इसके फिलहाल वे भाजपा विरोधी राजनीति के एक बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं। राष्ट्रीय राजधानी में होने की वजह से उन्हें समाचार माध्यमों के जरिये काफी प्रचार भी मिल जाता है वरना उड़ीसा जैसे राज्य में तो नवीन पटनायक लगातार पांचवी बार मुख्यमंत्री बने लेकिन उनको समाचारों में उतना महत्व नहीं मिलता। इस चुनावी सफलता के लिए श्री केजरीवाल निश्चित रूप से प्रशंसा और बधाई के हकदार हैं क्योंकि उन्होंने अर्जुन की तरह केवल अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखा।
-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 11 February 2020

यदि शाहीन बाग वीआईपी इलाके में होता तब ....??




दिल्ली का शाहीन बाग़ इलाका इसके पहले कभी इतना चर्चित नहीं हुआ। बीते डेढ़ महीने से वहां मुस्लिम महिलाएं बीच सड़क पर बाल-बच्चों सहित धरना दिये बैठी हैं। उसके कारण यातायात अवरुद्ध है। हजारों लोगों को रोज लम्बा चक्कर लगाकर अपने गन्तव्य तक पहुंचना पड़ रहा है। इस धरने का कारण सीएए का विरोध है। कुछ दिन पूर्व धरने पर बैठी महिला का चार महीने का शिशु सर्दी की वजह से जान गँवा बैठा। महिला अपने बच्चे के अंतिम संस्कार के बाद दोबारा धरने पर आ बैठी। आन्दोलन के समर्थकों ने उस महिला के जज्बे की तारीफ  की तो विरोधियों ने उसे निर्मोही बताते हुए आलोचना कर डाली। इस घटना से व्यथित एक बालिका ने सर्वोच्च न्यायालय को पत्र भेजकर ये सवाल उठाया कि क्या एक नौनिहाल को भीषण सर्दी में इस तरह आन्दोलन में ले जाना उचित था? इस सवाल का न्यायालय ने भी संज्ञान लिया और गत दिवस चार महीने के बच्चे को आन्दोलन का हिस्सा बनाये जाने पर तीखे सवाल दागे। शाहीन बाग़ में सड़क रोककर बैठे रहने पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि आखिर कितने दिनों तक आप लोगों को परेशान कर सकते हैं? धरना देने के लिए आम सड़क और सार्वजनिक पार्क  आदि के उपयोग पर भी अदालत ने ऐतराज जताया और पहले से पेश की गई एक याचिका पर दिल्ली और केंद्र दोनों सरकारों को नोटिस जारी करते हुए 17 फरवरी को सुनवाई रखी गई। शाहीन बाग़ का धरना दिल्ली विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बना रहा। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने जहां मुस्लिम मतों के लालच में धरने का समर्थन किया वहीं भाजपा ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए हिन्दू मतों को अपने पाले में खींचने की रणनीति पर काम किया। ये सवाल भी बार-बार उठा कि हजारों लोगों की परेशानी के सबब बने इस धरने को हटाने के लिए दिल्ली की पुलिस और प्रशासन ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया? उल्लेखनीय है पुलिस केंद्र सरकार के अधीन होने से दिल्ली की सरकार ने इस मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया। ये आरोप भी लगा कि भाजपा जानबूझकर शाहीन बाग़ के धरने को खत्म नहीं करवा रही जिससे हिन्दू मतदाता गोलबंद हो सकें। लेकिन राजनीति से अलग हटकर देखें तो क्या इस मामले में न्यायपालिका भी अपनी भूमिका के प्रति उदासीन नहीं रही? दिल्ली देश की राजधानी है जहां न्यायपालिका की सर्वोच्च पीठ भी विराजमान है। शाहीन बाग़ का धरना एक राष्ट्रीय खबर बना रहा। समाचार माध्यमों में इसे लेकर खूब बहस और चर्चा भी हुई। ऐसे में ये आश्चर्य की बात है कि छोटी-छोटी बातों का संज्ञान लेकर शासन और प्रशासन को हड़का देने वाले सर्वोच्च न्यायालय ने भी शाहीन बाग़ मामले में पेश के गई याचिका पर इतनी सुस्ती दिखाई? जो न्यायपालिका किसी आतंकवादी की फांसी रोकने के लिए देर रात बैठकर सुनवाई कर सकती है उसने देश की राजधानी में चल रहे एक ऐसे आन्दोलन को रोकने के लिए अपनी जागरूकता और प्रभाव का उपयोग क्यों नहीं किया जिसकी वजह से दिल्ली के हजारों लोगों को डेढ़ माह से जबर्दस्त परेशानी हो रही है। ये सवाल भी उठ सकता है कि दिल्ली का प्रशासन चला रही केजरीवाल सरकार और पुलिस का नियंत्रण करने वाली केंद्र सरकार ने भी शाहीन बाग़ में सड़क रोककर बैठी मुस्लिम महिलाओं को हटाने के लिए क्या किया? इसका जवाब ये है कि एक तो दिल्ली में चुनाव हो रहे थे और दूसरा धरने पर महिलाएं बैठी थीं जिन पर बल प्रयोग करना राजनीतिक दृष्टि से नुकसानदेह साबित होता। उससे भी बड़ी बात ये थी कि धरना स्थल पर बैठीं महिलाएं मुस्लिम थीं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय तो राजनीतिक हानि लाभ से उपर है। यदि वह शाहीन बाग़ के धरने का संज्ञान लेते हुए जनता को हो रही परेशानी के मद्देनजर दिल्ली और केंद्र दोनों सरकारों को निर्देशित करता तब आन्दोलनकारियों पर भी दबाव पड़ता। इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि यदि किसी माननीय न्यायाधीश का उस रास्ते से आना जाने होता और धरने की वजह से उन्हें लंबा चक्कर लगाना पड़ता तब शायद न्यायपालिका स्वत: संज्ञान लेकर अपना असर दिखाती। हालाँकि ये बात सही है कि न्यायपालिका की अपनी सीमायें हैं और शासन-प्रशासन के सामान्य कार्यों में उसकी दखलंदाजी उचित नहीं मानी जाती लेकिन अनेक ऐसे ज्वलंत मामले हैं जहां जनहित को देखते हुए न्यायालय ने पहल करते हुए शासन-प्रशासन को कार्रवाई करने कहा है। विधायिका के अधिकार क्षेत्र तक में उसने दखल देने से परहेज नहीं किया। ऐसे में शाहीन बाग़ में बीच सड़क पर चल रहे धरने को हटवाने में न्यायपालिका की सुस्ती समझ से परे है। शाहीन बाग़ का धरना केवल एक खबर नहीं अपितु एक नजीर बन गया। उसकी देखासीखी सीएए के विरोध में देश के अनेक शहरों में मुस्लिम महिलाओं द्वारा बीच सड़क या अन्य किसी सार्वजनिक स्थल पर धरना शुरू कर दिया गया। जहां-जहां पुलिस और प्रशासन ने रोकने की कोशिश वहां-वहां आन्दोलन के नाम पर हिंसा की गयी। जैसा शुरू में कहा गया चूँकि मामला महिलाओं और वह भी मुस्लिमों का था इसलिए सरकार में बैठे राजनेता तो बचते रहे लेकिन न्यायपालिका को तो खुलकर ऐसे प्रकरणों में अपना मत रखना चाहिए। इस बारे में ये सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या लुटियंस की दिल्ली कहे जाने वाले वीआईपी इलाकों में और सर्वोच्च न्यायालय के करीब शाहीन बाग जैसा नजारा होता तब क्या उसे इतने लम्बे समय तक बर्दाश्त किया जाता?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 February 2020

आरक्षण : दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा दी



बीते पांच साल पर नजर डालें तो जब भी देश में कहीं चुनाव होते हैं तब किसी एक विशेष मुद्दे को उछालकर विवाद खड़ा किया जाता है जिसके पीछे उद्देश्य केवल और केवल सियासी लाभ उठाना है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले योजनाबद्ध तरीके से सीएए और एनसीआर को लेकर भय का भूत खड़ा करते हुए दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में मुस्लिम महिलाओं के धरने को राष्ट्रीय खबर बना दिया गया। उसके पीछे का मंतव्य किसी से छिपा नहीं था। दिल्ली का दंगल समाप्त होते ही राजनीतिक जमात की नजर बिहार विधानसभा के चुनाव पर आकर टिक गयी। संयोगवश सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने उसे अवसर भी दे दिया जिसके अनुसार सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और न्यायपालिका इस बारे में सरकार को निर्देशित नहीं कर सकती। फैसला आते ही सियासी हलचल मच गयी। कांग्रेस ने बिना देर किये केंद्र की भाजपा सरकार के शासन में अनु.जाति और जनजाति के अधिकार खतरे में होने का हल्ला मचा दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता माल्लिकर्जुन खडग़े ने केंद्र से मांग की कि या तो वह सर्वोच्च न्यायालय में पुनार्विचार याचिका दायर करे या फिर संविधान में संशोधन करते हुए आरक्षण को मौलिक अधिकार बनाने की व्यवस्था करे। दूसरी तरफ केंद्र सरकार में शामिल रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से असहमति व्यक्त कर दी। दिल्ली के चुनाव परिणाम 11 तारीख को आ जायेंगे। उसके बाद बिहार की बिसात बिछने लगेगी। स्मरणीय है 2015 के चुनाव में भी वहां आरक्षण का मुद्दा जोरदारी से उठा था। चुनाव के कुछ पहले ही रास्वसंघ प्रमुख डा.मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा जैसा सुझाव दिया जिसे लालू यादव सहित अन्य भाजपा विरोधी पार्टियों ने बड़ा मुद्दा बना लिया। चुनाव परिणामों ने साबित कर दिया कि भाजपा को उस विवाद से भारी नुकसान हुआ। जब प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने आरक्षण जारी रखने संबंधी आश्वासन दिए तो भाजपा के परम्परागत सवर्ण मतदाता रुष्ट हो गए। वैसा ही नजारा मप्र में देखने मिला जब ग्वालियर, भिंड और मुरैना क्षेत्र में सवर्ण और अनु. जाति के गुटों में खूनी संघर्ष हुआ। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बयान कोई माई का लाल आरक्षण नहीं हटा सकता ने सवर्ण मतदाताओं में नाराजगी पैदा की जिसका खमियाजा भाजपा को प्रदेश सरकार गंवाने के रूप में उठाना पड़ा। सर्वोच्च न्यायालय का ताजा निर्णय अनेक राज्यों में पदोन्नति में आरक्षण के लंबित मामलों पर असर डालेगा। मप्र उच्च न्यायालय ने भी पदोन्नति में आरक्षण को रद्द किया था जिसके विरुद्ध शिवराज सरकार की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। इस कारण हजारों पदोन्नतियां रुकी पड़ी हैं। सैकड़ों लोग तो इन्तजार करते-करते सेवा निवृत्त तक हो गये। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय ने इस मसले को नया रूप दे दिया। चूँकि संसद चल रही है इसलिए इस पर हंगामा होने की पूरी सम्भावना है। केंद्र सरकार की मुसीबत ये है कि न तो वह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से सहमत हो सकती है और न ही उसका विरोध करने का साहस जुटा सकेगी। वैसे तो कोई भी पार्टी आरक्षण के मौजूदा ढांचे का विरोध नहीं कर सकती क्योंकि जातीय समीकरण भारत की चुनावी राजनीति का स्थायी आधार बन चुके हैं। अनु. जाति और जनजाति के बाद अब ये अन्य पिछड़ी जातियों तक जा पहुंचा है। राज्य स्तर पर नई-नई जातियों को आरक्षण की परिधि में लाने का फैसला भी चुनाव के समय होता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण की अधिकतम सीमा निश्चित किये जाने के बाद भी घुमा-फिराकर आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने का खेल चलता रहता है। नियुक्तियों में आरक्षण के बाद जब पदोन्नति में आरक्षण का फैसला हुआ तब यह अनारक्षित जातियों की नाराजगी का कारण बन गया। अपने परम्परागत मतदाताओं को संतुष्ट करने के लिए मोदी सरकार ने आरक्षण के लाभ से वंचितों के लिए आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने की व्यवस्था भी की जिसका लाभ भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिला भी लेकिन उसके साथ ही ये मांग भी उठने लगी कि आरक्षण का आधार जाति की बजाय आर्थिक स्थिति को बनाया जावे। सर्वोच्च न्यायालय के ताजे फैसले में चूँकि आरक्षण को मौलिक अधिकार मानने से मना कर दिया गया इसलिए अब आरक्षण समर्थक इसे मौलिक अधिकारों में शामिल करने का दबाव बनायेंगे। कांग्रेस नेता श्री खडग़े ने तो उसकी मांग भी कर दी। जहां तक बात संविधान की है तो उसके रचयिता डा. भीमराव आम्बेडकर ने आरक्षण को एक अस्थायी व्यवस्था माना था। वरना वे उसी समय उसे मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल करवा देते तो कोई उनका हाथ पकडऩे वाला नहीं था। जब-जब आरक्षण की समय सीमा बढ़ाई गई तब-तब संसद में किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया। रास्वसंघ प्रमुख डा. भागवत भी बिहार के झटके के बाद अनेक मर्तबा दोहरा चुके हैं कि जब तक आरक्षण का उद्देश्य पूर्ण न हो तब तक उसे जारी रखा जाए। ताजा फैसले के परिप्रेक्ष्य में विचारणीय बात ये है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को लेकर भी मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू वाली प्रवृत्ति राजनेताओं की मानसिकता पर हावी हो चुकी है। यदि सर्वोच्च न्यायालय आरक्षण को मौलिक अधिकार बता देता तो उसकी जय-जयकार हो रही होती। संसद द्वारा भारी बहुमत से पारित फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देते समय जो लोग उसकी निष्पक्षता और अधिकार सम्पन्नता का सम्मान करते दिखते हैं वे ही फैसला मनमाफिक नहीं आने पर उसे संसद में बदलने की मांग उठाने से बाज नहीं आते। आजादी के सात दशक बीत जाने पर भी आरक्षण प्राप्त एक बड़ा वर्ग यदि अब भी सामजिक और आर्थिक दृष्टि से वंचित है तो इस बात पर विचार होना चाहिए कि आरक्षण की व्यवस्था में कमी कहाँ रह गई? सर्वोच्च न्यायालय ने तो क्रीमी लेयर का सवाल उठाकर आरक्षण से लाभान्वित तबके को आगे लाभ नहीं मिलने जैसी बात भी कही थी लेकिन उसका भी विरोध हो गया। ये सब देखते हुए आरक्षण के बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि दर्द बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा दी। आरक्षण का मकसद बहुत ही पवित्र था। सदियों से उपेक्षित और दलित समाज के हिस्से को मुख्यधारा में शामिल किये जाने के लिए की गई अंतरिम व्यवस्था पूरी तरह कारगर नहीं हुई तो उसके कारण तलाशना समय की मांग है। जिस तरह किसी मरीज को सदैव के लिए जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जीवित नहीं रखा जा सकता उसी तरह आरक्षण भी है। यदि डा. आम्बेडकर को आभास होता कि उनकी नेकनीयती को आधार बनाकर वोटों की फसल काटी जायेगी तब वे भी शायद कोई और व्यवस्था करते। जाति की लकीरें मिटने की बजाय गहरी होती जाने का ही नतीजा है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के संत रैदास जयन्ती पर उनके मन्दिर जाने पर बसपा प्रमुख मायावती को ऐतराज हुआ। आरक्षण को मौलिक अधिकार बनाने की मांग पूरी होने के बाद जाति विहीन समाज की कल्पना बेमानी होकर रह जायेगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 February 2020

पूर्वोत्तर में राष्ट्रीयता का सूर्योदय



असम में चल रहे बोडो उग्रवादी आन्दोलन के शांतिपूर्ण समाधान के बाद गत दिवस प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी कोकराझार पहुंचे और बोडो आन्दोलन के केंद्र बने रहे जिलों के विकास हेतु आथिक पैकेज की घोषणा करते हुए विश्वास दिलाया कि इन इलाकों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के हरसंभव प्रयास किये जावेंगे। 54 सालों से चले आ रहे बोडो आन्दोलन में हजारों लोग मारे गए। असम का ये सबसे बड़ा आदिवासी तबका अलगाववादी ताकतों के प्रभाव में आकर हिंसा के रास्ते पर चल पड़ा था। इसके लिए विदेशी मदद मिलने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। अतीत में अनेक बार बोडो उग्रवादियों से समझौते हुए लेकिन किसी न किसी वजह से उनको लागू नहीं किया जा सका। हालांकि ये भी सही है कि सशस्त्र संघर्ष करने वालों की ताकत निरंतर कम होती जा रही थी। 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा के पैर जमे। असम, मणिपुर और त्रिपुरा में उसकी सरकार बन जाने के बाद से वहां राष्ट्रवादी ताकतें मजबूत हुईं। पूर्वोत्तर में आदिवासी समुदाय बड़ी संख्या में है। आजादी के बाद से ही इस क्षेत्र के विकास की उपेक्षा की जाती रही जिससे यहाँ के लोग देश की मुख्य धारा में शामिल नहीं हो सके। ईसाई मिशनरियों और नक्सलवादियों के बीच हुए गठजोड़ ने यहाँ भारत विरोधी भावनाओं को काफी गहराई तक फैला दिया किन्तु बीते पांच वर्ष में वहां के राजनीतिक समीकरण बदल गए। जिसकी वजह से अलगाववादी संगठनों की घेराबंदी हुई और उनमें से अनेक ने समर्पण भी कर दिया। लेकिन बोडो उग्रवादी अभी तक सक्रिय थे। हाल ही में केंद्र सरकार ने उनको हथियार रख देने के लिए राजी किया और वे मुख्यधारा में शरीक हो गए। कश्मीर घाटी में अलगाववाद की जड़ों में सफलतापूर्वक मठा डालने के बाद केंद्र सरकार का हौसला निश्चित तौर पर बुलंद हुआ जिसके बाद उसने बोडो उग्रवादियों को भी हिंसा छोड़कर शांति के रास्ते पर चलने के लिए राजी किया। पूर्वोत्तर की राजनीति के अलावा वहां के विकास में भी इस समझौते से बड़ी मदद मिलेगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि यूपीए सरकार के दौर में पूर्वोत्तर राज्यों की घोर उपेक्षा हुई। प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह असम से राज्यसभा के लिए चुने जाते रहे किन्तु उसके बाद भी पूर्वोत्तर में विकास का सूर्योदय नहीं आ सका। लेकिन मोदी सरकार ने सत्ता सँभालते ही न सिर्फ असम वरन समूचे पूर्वोत्तर के चौमुखी विकास की योजना शुरू की। बड़े पैमाने पर सड़कों का जाल बिछाये जाने से परिवहन आसान हुआ जिसकी वजह से व्यापार और पर्यटन दोनों में वृद्धि देखने मिली। अरुणाचल में चीन से सटी सीमा तक पक्की सड़कें, हवाई पट्टी बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से भारत विरोधी ताकतों का आधार कमजोर होता गया। हालाँकि अभी भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी लेकिन धीरे-धीरे जिस तरह से अलगाववादी संगठन समर्पण करते जा रहे हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में वहां राष्ट्रीय एकता के लिए चला आ रहा खतरा पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। प्रधानमन्त्री ने बोडो आन्दोलन के प्रभावक्षेत्र में जाकर विकास की जो घोषणाएं कीं वह समझदारी भरा कदम है। देश का पूर्वोत्तर इलाका अपने अप्रतिम प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण पर्यटन की दृष्टि से बेजोड़ है। इसे भारत का स्विटजरलैंड भी कहा जाता है लेकिन विदेशी ताकतों के षडयंत्र की वजह से ये क्षेत्र अलगाववाद की चपेट में आ गया। अब हालत सुधरती दिख रही हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि निकट भविष्य में समूचा पूर्वोत्तर विकास का नया प्रतीक बनकर मुख्यधारा के राज्यों की कतार में खड़ा नजर आएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी