Tuesday, 25 February 2020

तो पूरे देश में शाहीन बाग़ नजर आयेंगे




आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा था। दिल्ली में सीएए के विरोध और समर्थन में चल रहा धरना- प्रदर्शन आमने-सामने के संघर्ष में बदल गया। गत दिवस हालात और बिगड़े जिसमें अब तक एक पुलिस कर्मी सहित 6 और लोगों की मृत्यु हो चुकी है। अनेक लोग घायल हो गये जिनमें एक वरिष्ठ अधिकारी की हालत गम्भीर बनी हुई है। तोडफ़ोड़-आगजनी भी हुई। शाहीन बाग़ में चल रहे धरने को हटवाने के लिए प्रस्तुत याचिका के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्थों ने अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंप दी है। इसी बीच सीएए के समर्थकों ने भी धरना देना शुरू कर दिया जो निश्चित रूप से क्रिया की प्रतिक्रिया ही कही जा सकती है। लेकिन गत दिवस जो कुछ हुआ उसके बाद दिल्ली की पुलिस ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिये ये विचारणीय विषय है कि क्या किसी मुद्दे पर आंदोलनकारी महीनों तक सड़क पर कब्जा करते हुए बैठ सकते हैं? उन्हें महज इसलिए न हटाया गया कि उनमें महिलायें हैं और वह भी मुस्लिम समुदाय की तो दूसरे पक्ष को भी ये लगा कि जब सर्वोच्च न्यायालय तक ऐसे धरने के बारे में सीधे-सीधे कोई आदेश देने की हिम्मत नहीं जुटा सका तब हमें कौन रोकेगा? भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने शाहीन बाग़ के जवाब में धरना-प्रदर्शन शुरू किया। उसके बाद सीएए के विरोधियों और समर्थकों के बीच नारेबाजी का मुकाबला शुरू हुआ जो अंत में पत्थरबाजी से होते हुए और आगे बढ़ गया। देश के और किसी हिस्से में ये हुआ होता तब शायद उसे इतनी गम्भीरता से नहीं लिया जाता। और फिर जिस दिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सपरिवार दिल्ली पहुंचे उसी दिन राजधानी में दो सम्प्रदायों के बीच हिंसक संघर्ष से देश की छवि को कितना धक्का पहुंचा ये आकलन करना आसान नहीं है। कुछ लोग इसके लिए भाजपा नेता कपिल मिश्रा को दोष दे रहे हैं। उनका कहना है कि यदि शाहीन बाग़ के जवाब में वैसा ही आन्दोलन नहीं किया जाता तब ये हालात पैदा नहीं होते। लेकिन ऐसा कहने वाले ये भूल गए कि शाहीन बाग़ के बाद उस जैसा ही दूसरा धरना भी सीएए के विरोध में दिल्ली के दूसरे स्थान पर शुरू कर दिया गया जबकि सर्वोच्च न्यायालय पहले वाले धरने की वैधानिकता और औचित्य पर विचार कर ही रहा है। शाहीन बाग़ के धरने के प्रति जिस तरह की सहानुभूति और समर्थन एक वर्ग विशेष ने दिखाई और समाचार माध्यमों ने भी उसे सुर्खियाँ प्रदान कीं उससे एक गलत परिपाटी को प्रोत्साहन मिला। शाहीन बाग़ में बैठी महिलाओं को इस तरह महिमामंडित किया गया जैसे वे कोई स्वंतत्रता संग्राम सेनानी हों। ऐसी ही सोच कश्मीर घाटी के अलगाववादियों के बारे में रखी जाती थी। सुरक्षा बलों की छवि खलनायक की बनाने का प्रयास भी उसी तबके द्वारा किया जाता रहा जिसने शाहीन बाग़ को भी आजादी की लड़ाई जैसा महत्व दिया। घाटी में पत्थरबाजों से निपटने के लिए पैलट गन के उपयोग पर तो सर्वोच्च न्यायालय तक ने सवाल खड़े किये थे। यही वजह रही कि कश्मीर घाटी में भारत विरोधी भावनाएं मजबूत होती गईं। शाहीन बाग के धरने के पहले जामिया मिलिया विवि में हुई हिंसा को जायज ठहराते हुए पुलिस को कठघरे में खड़ा करने का अभियान चलाया गया। ये सब देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के कारण अलगाववादी ताकतों में जो खीझ उत्पन्न हुई वही दिल्ली और देश में सीएए के विरोध में शरू किये गए सुनियोजित आन्दोलन की जड़ है। शाहीन बाग में जो और जैसे हुआ वह महिलाओं और मुस्लिमों का ध्यान रखकर बर्दाश्त किया गया जिससे और लोगों को भी बल मिल गया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भेजे गए मध्यस्थों से जिस तरह बात की गई उससे इस बात की पुष्टि हुई कि आन्दोलनकारियों की आड़ में देश को अस्थिर करने वाली ताकतें सक्रिय हैं। कल हुई हिंसा के बाद केंद्र के गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस की उदासीनता को वे ही लोग कोस रहे हैं जो शाहीन बाग़ में सड़क कब्जाए बैठी महिलाओं की शान में कसीदे पढ़ा करते थे। चूँकि मामला सर्वोच्च न्यायालय में है जिसने शाहीन बाग़ के धरने को अवैध कब्जा बताकर तत्काल हटवाने का आदेश देने की बजाय आन्दोलन को अधिकार मानकर जनसुविधा का ध्यान रखने का उपदेश देते हुए मध्यस्थों को शंतिदूत बनाकर भेजा। लेकिन संविधान की दुहाई देने वाली आंदोलनकारी महिलाओं ने शान्ति प्रस्ताव को कमजोरी मानकर सड़क खाली करते हुए किसी दूसरे स्थान पर जाने से साफ इंकार कर दिया। कुछ देर के लिए सड़क का एक हिस्सा खोला तो गया लेकिन थोड़ी देर बाद ही उसे फिर अवरुद्ध कर दिया गया। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप पूरे देश में सीएए के समर्थन में धरने देने की भावना मजबूत होने लगी। ये कहना कदापि गलत नहीं होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में पेश की गईं याचिकाओं पर कानूनी प्रावधानों के अनुसार फैसला दे देता तब शायद दिल्ली के हालात इतने संगीन नहीं हुए होते। कश्मीर घाटी में भी जब अलगाववादी पाकिस्तान का झंडा लहराते हुए भारत विरोधी नारे लगाते निकलते और सुरक्षा बल खड़े-खड़े उन्हें देखते रहते थे तब पूरे देश में जो गुस्सा नजर आता था वही शाहीन बाग़ के धरने के प्रति बरती गई नरमी से पैदा हुआ। संविधान में दिए अधिकारों की भी एक सीमा है जिसमें किसी और के अधिकार का अतिक्रमण न होना जरूरी है। शाहीन बाग़ का समूचा जमावड़ा अधिकारी के दुरूपयोग का जीता-जागता उदाहरण है। बेहतर होता उसे शुरू होते ही हटवा दिया जाता। केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस विधानसभा चुनाव पूर्व जिस भी दबाव में रही हो लेकिन अब और देर की जाती रही तो पूरा देश 370 हटने के पहले वाली कश्मीर घाटी का रूप ले लेगा। कश्मीर में मुंह की खाने के बाद भी देश विरोधी ताकतें शांत नहीं बैठीं। सीएए का विरोध उसकी बानगी है। यदि इसके पीछे के खेल को नहीं समझा गया तो देश भर में जगह-जगह शाहीन बाग नजर आयेंगे। बेहतर हो सर्वोच्च न्यायालय भी स्थिति की गंभीरता को समझे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 February 2020

ट्रंप की यात्रा : अमेरिका को भी भारत की जरूरत है




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आज दो दिन की भारत यात्रा पर आए हैं। अहमदाबाद से शुरू होकर उनकी यात्रा आगरा होते हुए कल रात दिल्ली में समाप्त होगी।  इस यात्रा का समय अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।  इसी साल सर्दियों में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं जिसमें श्री ट्रंप दोबारा किस्मत आजमाने जा रहे हैं।  वे जीतेंगे या नहीं ये तो फिलहाल नहीं कहा जा सकता किन्तु उनके अब तक के कार्यकाल में भारत के प्रति अमेरिका का रवैया अनेक दृष्टियों से अनुकूल रहा।  हालाँकि इसके पीछे वहां रहने वाले भारतवंशियों का योगदान भी काफी है किन्तु आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका का जैसा समर्थन भारत को हाल के वर्षों में मिला वह अभूतपूर्व है। वैसे श्री ट्रंप की छवि एक सनकी और मुंहफट राजनेता की मानी जाती है जो राजनयिक मर्यादाओं से इतर टिप्पणियाँ कर बैठते हैं।  लेकिन ये भी उतना ही सच है कि पाकिस्तान के प्रति उनके शासन में जिस तरह की बेरुखी नजर आई उसकी वजह से भारत को वैश्विक स्तर पर बड़ा कूटनीतिक लाभ हुआ।  सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट ऑपरेशन, हाफिज सईद को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करना, पाकिस्तान की आर्थिक सहायता में कटौती, अनुच्छेद 370 हटाये जाने को भारत का आन्तरिक मामला मानने और रक्षा क्षेत्र में भारत के साथ रणनीतिक भागीदारी जैसे कदमों से दोनों देशों के बीच रिश्ते काफी दोस्ताना हुए हैं।  ट्रंप प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर  भारतवंशियों की मौजूदगी भी इस बात का परिचायक है कि अमेरिका के लिए भारत अब एक जरूरत बन गया है।  हालाँकि बराक ओबामा के दौर में भी दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहद अच्छे रहे परन्तु श्री ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से इनमें जो मजबूती आई वह आशा जगाने वाली रही।  यद्यपि ये कहना सच्चाई से आँखें चुराने वाली कोशिश होगी कि अमेरिका ने भारतीय हितों का पूरी तरह समर्थन और संरक्षण किया। वीजा नियमों में कड़ाई के साथ ही अमेरिकी युवाओं को नौकरी देने को लेकर बनाये दबाव की वजह से भारतीय अप्रवासियों और कारोबारियों को कतिपय दिक्कतें भी हुईं लेकिन कुल मिलकर श्री ट्रंप के आने के बाद अमेरिका की तरफ  से भारत को जो समर्थन और महत्व मिला वह उल्लेखनीय है।  सबसे बड़ी बात ये रही कि अमेरिका ने पश्चिम एशिया में इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध जो कड़ाई की उससे भारत का पक्ष सुदृढ़ हुआ।  ईरान और अमेरिका के बीच उपजे तनाव के कारण जरुर नुकसान की स्थिति बनी लेकिन अमेरिका के बदले रवैये की वजह से ही खाड़ी देशों के साथ ही सऊदी अरब जैसे इस्लामी देशों के साथ भारत के रिश्ते और मजबूत हुए।  अमेरिका की देखासीखी उसकी लॉबी के बाकी देश मसलन ब्रिटेन, कैनेडा, जापान, जर्मनी और इजरायल आदि ने भी विश्व मंचों पर भारत का समर्थन किया।  चीन के साथ व्यापार युद्ध शुरू करने की श्री ट्रंप की नीति ने भी अप्रत्यक्ष रूप से भारत को बल प्रदान किया।  इसकी वजह से दक्षिण एशिया में भारत की वजनदारी बढ़ी।  बीते कुछ सालों में चीन ने भी अनेक अवसरों पर भारत का विरोध करने में संकोच किया तो उसकी वजह भी अमेरिका का हमारे साथ खड़ा होना ही रहा।  वैसे बीच-बीच में अपनी आदतानुसार श्री ट्रंप ने ऐसे बयान दिए जिससे ऐसा लगा कि अमेरिका का मन साफ नहीं है। कश्मीर विवाद पर भारत-पकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की बात उन्होंने अनेक बार कही लेकिन भारत द्वारा साफ शब्दों में इसका विरोध करने पर उन्हें ये कहना पड़ा कि यदि दोनों देश चाहें तब। पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान ने श्री ट्रंप को पटाने की अनेक कोशिशें कीं किन्तु विफल रहे जिससे ये साबित हुआ कि अमेरिका भारत से रिश्तों में दोबारा कड़वाहट पैदा करने का खतरा नहीं उठाना चाहता।  इसकी एक वजह ये भी रही कि प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय कूटनीति को जिस तरह से बहुआयामी बनाते हुए रक्षा उपकरणों के साथ व्यापार समझौतों में गुटीय सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अमेरिकी दबाव को नजरअंदाज किया उससे भी वाशिंगटन में बैठे हुक्मरानों को ये समझ में आ गया कि भारत की उपेक्षा और पाकिस्तान को संरक्षण से उनके अपने हित प्रभावित होंगे।  अफगानिस्तान से निकलने की तैयारी के बीच अमेरिका के लिए दक्षिण एशिया में अपने हितों की रक्षा के लिए किसी ऐसे देश की जरूरत है जो चीन के मुकाबले खड़ा होने के साथ पाकिस्तान को भी नियंत्रण में रख सके।  सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका की आंतरिक परिस्थितियों में वहां रह रहे भारतवंशियों की जो प्रभावशाली भूमिका है उसकी वजह से अमेरिका का प्रशासन अब भारत की उपेक्षा करने की बजाय उसकी तरफ  मैत्री का हाथ बढ़ाने की नीति पर चल रहा है।  आगामी चुनाव में श्री ट्रंप को मिलने वाले चंदे में भी भारतवंशियों का सहयोग मायने रखता है।  उस दृष्टि से राष्ट्रपति ट्रंप का अपने कार्यकाल के अंतिम महीनों में भारत आना उनके अपने स्वार्थों के लिहाज से भी जरूरी लगता है। भारत के साथ किसी बड़े व्यापारिक समझौते की सम्भावना से भले ही उन्होंने इसीलिये इंकार कर दिया और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे विवादस्पद विषय उठाने का संकेत भी दिया। लेकिन ये बात भी सही है कि इमरान खान की अनेक कोशिशों के बाद भी पाकिस्तान के साथ कड़ाई से पेश आने और चीन पर व्यापारिक दबाव बनाने की ट्रंप प्रशासन की नीति से भारत को काफी लाभ हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप की यात्रा के प्रबंधों को लेकर भारत में एक वर्ग आलोचना में जुटा हुआ है।  अहमदाबाद में आयोजित कार्यक्रम को धन की बर्बादी भी बताया जा रहा है। उनके काफिले की राह में आने वाली झुग्गियों के सामने दीवार खड़ी करने को लेकर भी तरह-तरह के सवाल खड़े किये जा रहे हैं किन्तु इन सबसे अलग हटकर देखें तो भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में इतनी मधुरता और नजदीकी पहले कभी नहीं रही।  इसका श्रेय श्री मोदी को देना गलत नहीं होगा किन्तु राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इसमें अच्छा खासा योगदान दिया।  इसकी एक वजह उनकी व्यावसायिक पृष्ठभूमि भी हो सकती है। अपने अनिश्चित स्वभाव और कड़क रवैये के बावजूद उन्होंने वैश्विक स्तर पर जो नीतियाँ अपनाईं उनसे भारत भी लाभान्वित हुआ है। पाकिस्तान तो खैर, छोटी चीज है लेकिन चीन को जिस तरह से श्री ट्रंप ने घेरा उससे निश्चित तौर पर भारत को मजबूती मिली। उनकी यात्रा से भले ही सीधे तौर पर कुछ सामने न आये लेकिन कूटनीति में बहुत सारी बातें कभी बाहर नहीं आतीं। राष्ट्रपति ट्रंप की इस यात्रा के बारे में भी ऐसा होगा।  अनेक लोग इसे आगामी चुनाव में भारतीय मूल के मतदाताओं के समर्थन से जोड़ रहे हैं जो गलत भी नहीं है किन्तु अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा कूटनीतिक दृष्टि से सदैव महत्वपूर्ण होती है। उनके भारत आने से न सिर्फ  पाकिस्तान अपितु चीन सहित एशिया के बाकी देश भी प्रभावित होंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 22 February 2020

नसबंदी के बहाने जनसंख्या नियंत्रण पर निशाने




 मप्र की कमलनाथ सरकार में प्रशासनिक अव्यवस्था का बोलबाला साफ़ नजर आने लगा है | मध्यान्ह भोजन संबंधी निर्णय को लेकर मुख्य सचिव द्वारा कैबिनेट के निर्णय को पलटने जैसा आरोप लगने से सरकार की किरकिरी होने की बात अभी तक ताजा ही थी कि गत दिवस अवकाश के  बावजूद दफ्तर खुलवाकर राष्ट्रीय स्वस्थ्य मिशन की डायरेक्टर छवि भरद्वाज का वह आदेश र्द्द्द क्र दिया  गया जिसमें विभागीय कर्मचारियों को 5 से 10 पुरुष नसबंदी का लक्ष्य देकर ये चेतावनी दी गयी थी कि असफल रहने पर काम नहीं तो वेतन नहीं के आधार पर उनका वेतन काटने से लेकर अनिवार्य सेवा निवृत्ति जैसी कार्र्वायी तक की जावेगी | इस आदेश से कर्मचारी तो नाराज थे ही ऊपर से भाजपा ने इसे आपातकाल की पुनरावृत्ति बताते हुए विरोध के स्वर बुलंद कर दिए | इन बिन बुलाई मुसीबत से घबराई प्रदेश सरकार ने महाशिवरात्रि की छुट्टी के बाद भी कार्यालय खुलवाकर श्रीमती भरद्वाज के आदेश को वापिस ही नहीं लिया अपितु उनका तबादला भी कर दिया गया | वे फ़िलहाल प्राशिक्षण पर मसूरी गईं हुई हैं | प्राप्त जानकारी के मुताबिक उक्त विभाग ने गत वर्ष भी इस सम्ब्न्ध में आदेश जारी किये थे | जिनका पालन नहीं होने पर संदर्भित चेतावनी दी गयी | इस मामले में गलती सरकार की है या श्रीमती भरद्वाज की ये तो विस्तृत जांच से ही पता चलेगा किन्तु इस बारे में जो विवाद मचा उससे परिवार नियोजन के प्रति सरकारी स्तर पर बरती जाने वाली उदासीनता और लापरवाही एक बार फिर सामने आ गी है | सत्तर और अस्सी के दशक तक परिवार नियोजन एक ज्वलंत विषय था | 1975 में इंदिरा सरकार द्वारा थोपे गये आपातकाल के दौरान जबरन नसबंदी के अभुइयान की वजह से 1977 के चुनाव में कंग्रेस को जबर्दस्त नुक्सान हुआ | यहाँ तक कि इंदिरा जेई स्वयं चुनाव हार गईं | जनता पार्टी की सरकार ने परिवार नियोजन को परिवार कल्याण नाम देकर आपातकाल की कड़वी यादों को धूमिल करने का प्रयास किया लेकिन उसके बाद धीरे - धीरे छोटा प्ररिवार - सुखी परिवार , दो या तीन  बच्चे - होते हैं घर में अच्छे , बच्चे कम और पेड़ हजार जैसे नारे दीवारों से गायब से होते गये | जनसंख्या नियन्त्रण के लिए सरकारी स्तर पर व्यक्त की जाने वाली चर्चाएँ और निर्णय भी महज बैठकों और आंकड़ों तक सिमटकर रह गए | विकास की नई अवधारणा में मानव संसाधन विकास की बात पर तो जोर दिया जाने लगा किन्तु जनसंख्या विस्फोट राष्ट्रीय चिंताओं की सूची से लुप्त सा हो गया | परिवार नियोजन के लिए होने वाली नसबंदी , महिलाओं की शल्य क्रिया जैसे काम बंद तो नहीं हुए लेकिन इस बारे में शासकीय स्तर पर जैसा अभियान पहले कभी चलता था वह सुस्ती ओढ़कर बैठ गया | इस सबसे ये लगने लगा कि सरकार में बैठे लोगों ने जनता की नाराजगी  से बचने के लिए परिवार नियोजन को पूरी तरह लोगों की मर्जी पर छोड़ दिया | यद्यपि पढ़े - लिखे  विशेष रूप से मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग में छोटे परिवार का महत्त्व स्वीकार कर  लिया गया किन्तु निम्न आय वर्ग में अभी भी इस बारे में लापरवाही देखी जाती है | मुस्लिम समुदाय में तो धार्मिक कारणों से परिवार नियोजन के प्रति हिचक विद्यमान है | ऐसे में ताजा विवाद न हुआ होता तब शायद किसी का ध्यान इस तरफ जाता ही नहीं कि मप्र में  जनसंख्या वृद्धि की क्या स्थिति है और उसकी वजह से प्रदेश की अर्थव्यवस्था किस हद तक प्रभावित हो रही है | श्रीमती भारद्वाज की गिनती एक सक्षम अधिकारी के रूप में होती आई है | उनकी पदस्थापना जहां - जहां हुई वहां उन्होंने अपना असर छोड़ा | विवादित आदेश में जबरदस्ती तो झलकती थी किन्तु गौरतलब ये भी है कि सम्बन्धित विभाग के कर्मचारियों ने पिछले आदेशों का पालन नहीं किया जिससे कि लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया | एक सरकारी अधिकारी का अपने अविभागीय कर्मचारियों पर सख्ती करना सामान्य प्रक्रिया है | वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पहले राजस्व की वसूली को लकर भी इसी तरह  से दबाव बनया जाता है | लेकिन नसबंदी चूँकि अलग तरह का अभियान है इसलिए उसके बारे में किसी भी प्रकार की सख्ती सरकार के प्रति नाराजगी का सबब बन जाता है | हालाँकि दो बच्चों की सीमा विभिन्न शासकीय औपचारिकताओं में अनिवार्यता बनी हुई है लेकिन ये बात भी सही है कि श्रीमती भारद्वाज द्वारा जारी किया गया आदेश जोर - जबरदस्ती का कारण बनता या फिर आंकड़ों का फर्जीबाड़ा किया जाता | बहरहाल बात निकली है तो परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण पर सार्थक होना चाहिए क्योंकि सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाएं और कार्यक्रम बढती आबादी के सामने दम तोड़ देती हैं | बीते कुछ वर्षीं में भारत आर्थिक प्रगति के मामले में चीन से प्रतिस्पर्धा कर  रहा है लेकिन चीन की आर्थिक तरक्की में जनसँख्या नियंत्रण का सबसे बादा योगदान है | हालाँकि साम्यवादी शासन व्यवस्था की वजह से वहां तानाशाही है जिसमें आम जनता को सरकारी फैसलों की अवहेलना करने का अधिकार ही नहीं है | उसके ठीक उलट हमारे देश में प्रजातंत्र होने से  छोटी से छोटी बात का बतंगड़ बन जता है | जनसँख्या नियन्त्रण का समूचा कार्यक्रम भी इसीलिये वोटबैंक का शिकार होकर रह गया | बीते कुछ समय से इस बात पर चार्चा चल रही है कि केंद्र स्रकार जनसँख्या नियंत्रण पर कानून लेकर आ  रही है | मप्र में उठे नसबंदी विवाद के बाद ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वह  ऐसा कर सकेगी क्योंकि भाजपा विरोधी पार्टियां उसे अल्पसंख्यक विरोधी बताकर आसमान सिर् पर उठाने से नहीं चूकेंगी | वैसे कमलनाथ सरकार की कमजोरी भी लगातार सामने आ रहीं हैं | माफिया उन्मूलन , ,  किसानों की कर्ज माफी और ऐसे ही बाकी मामलों में वह निरंतर असफल होती दिख रही है | उसकी एकमात्र उपलब्धि कुछ है तो वह है आये दिन तबादलों की सूची जारी करना | तबादले सरकार का अधिकार् हैं लेकिन उनका औचित्य  साबित करना भी उसका दायित्व है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 February 2020

गड़करी आ जाएं तो अच्छा ही होगा



सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केन्द्र सरकार के किसी मंत्री को बिना सम्मन भेजे पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय पर सलाह हेतु आमंत्रित करना अच्छा निर्णय है। गत दिवस सार्वजनिक परिवहन हेतु इलेक्ट्रानिक वाहनों के उपयोग संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश एस.ए.बोवड़े ने सरकार के जवाब पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पटाखे और पराली से उत्पन्न प्रदूषण तो अस्थायी होता है जबकि वाहनों से होने वाला प्रदूषण हर समय जारी रहता है। चूँकि परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने पहल करते हुए सार्वजनिक परिवहन हेतु इलेक्ट्रानिक वाहनों के उपयोग पर काफी जोर दिया इसलिए अदालत ने उनसे सलाह करने का फैसला किया। यद्यपि सरकारी वकील ने मंत्री को बुलाने पर ऐतराज करते हुए कहा कि इसका राजनीतिक असर होगा किन्तु मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि श्री गड़करी को कोई लिखित आदेश नहीं भेजा जायेगा। ये महज आमंत्रण है और वे आने के लिए बाध्य नहीं हैं। विभागीय अधिकारी उनके आने के बारे में सुनिश्चित करें। यद्यपि बाद में अदालत ने मंत्री को बुलाने का आग्रह वापिस लेकर किसी अधिकारी को भेजने पर सहमति जताई। दरअसल अदालत ये जानना चाहती है कि सरकार के पास इलेक्ट्रानिक वाहनों को लेकर क्या योजना है? इस बीच ये खबर भी आ गई कि एक अप्रैल से देश में भारत चरण-6 के अंतर्गत सबसे स्वच्छ पेट्रोल-डीजल उपलब्ध होने लगेगा। चूँकि अप्रैल 2020 के बाद वाहन निर्माता बीएस-4 वाहन नहीं बेच सकेंगे और बीएस-5 को छोड़कर सीधे बीएस-6 वाहन ही सड़कों पर आएंगे इसलिए पेट्रोलियम कंपानियों ने अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ही बीएस-6 स्तर का ईंधन उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की है। इसके लिये 35 हजार करोड़ रु. खर्च किये जा चुके हैं। अभी वाहन कंपनियों के पास जो स्टाक है उसे अप्रैल तक बेचना ही होगा। इसी तरह जो वाहन इस समय चलन में हैं वे भी एक अवधि के बाद बाहर कर दिए जावेंगे। सार्वजनिक परिवहन हेतु इलेक्ट्रानिक वाहनों के उपयोग की दिशा में श्री गड़करी मंत्री बनने से पहले से काम करते आ रहे हैं। शायद इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए बजाय विभागीय अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली कागजी रिपोर्ट के सीधे मंत्री से ही बात करने का मन बनाया। ये भी कहा जा सकता है कि नागपुर के होने के कारण मुख्य न्यायाधीश श्री गड़करी से परिचित भी हैं इसलिए उन्होंनें ये उचित समझा कि क्यों न उन्हीं को अदालत में बुलाकर सरकारी योजना के बारे में जानकारी ली जावे। बहरहाल उक्त दोनों खबरें पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का प्रमाण हैं। सर्वोच्च न्यायालय का ये आकलन पूरी तरह सही है कि पटाखे और पराली जलने से होने वाला प्रदूषण तो कुछ समय तक ही रहता है जबकि वाहनों से होने वाला प्रदूषण पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी समस्या बन गया है। दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगरों में हजारों की संख्या में सार्वजनिक और लाखों की संख्या में निजी वाहन चलने से जो धुंआ निकलता है वह वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। इलेक्ट्रानिक सार्वजनिक वाहनों के जरिये इसमें काफी कमी लाई जा सकती है। इसी तरह बीएस -6 स्तर के वाहनों के सड़कों पर आने और उसी मानक के स्वच्छ पेट्रोल-डीजल की उपलब्धता से वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की दिशा में हो रहे प्रयास सफलीभूत होंगे ये उम्मीद भी की जा सकती है। बहरहाल भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने श्री गड़करी को बुलाने का आमन्त्रण वापिस ले लिया हो लेकिन अच्छा होगा यदि वे न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित होकर इलेक्ट्रानिक वाहनों संबंधी कार्ययोजना की जानकारी दें। मुख्य न्यायाधीश ने इस बारे में आश्वस्त किया कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता उनसे कोई प्रश्न नहीं करेंगे। वैसे इस विषय पर श्री गड़करी का अध्ययन और अनुभव इतना समृद्ध है कि वे किसी भी सवाल का जवाब दे सकते हैं। यद्यपि किसी मंत्री को अदालत में इस तरह आमंत्रित करना स्थापित परम्परा नहीं बननी चाहिए लेकिन जिस विषय पर मुख्य न्यायाधीश ने ये पहल की वह इतना सामयिक और संवेदनशील है कि यदि श्री गड़करी अदालत में आकर सरकार का पक्ष जाहिर करें तब पर्यावरण संरक्षण के प्रति पूरे देश में वैसी ही जागृति आने की सम्भावना बढ़ेगी जैसी स्वच्छता मिशन की शुरुवात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खुद झाड़ू उठाने से आई थी। अप्रैल माह में बीएस-6 वाहनों के सड़कों पर उतरने और वैश्विक मानक के अनुरूप स्वच्छतम ईंधन की उपलब्धता से वाहनों द्वारा फैलाये जाने वाले प्रदूषण पर काफी नियंत्रण हो सकेगा जिसके परिणामस्वरूप साँस के साथ फेफड़ों में जाने वाले जहर को रोका जा सकेगा। इलेक्ट्रानिक सार्वजनिक वाहनों का उपयोग भी बहुत ही क्रांतिकारी कदम होगा और इस दिशा में जितनी जल्दी काम हो सके उतना अच्छा रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सलाह लेने के लिये श्री गड़करी को आमंत्रित करने की बात खुलकर कहने से उनकी वजनदारी और बढ़ी है। मोदी सरकार के तमाम मंत्रियों में नितिन जी सफलतम मंत्री माने जाते हैं तथा जनता के बीच भी उनकी छवि लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने वाले शख्स की है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 February 2020

शाहीन बाग़ : यदि मध्यस्थों की भी नहीं सुनी गई तब ....




दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके की सड़क पर मुस्लिम महिलाओं द्वारा दिए जा रहे धरने से राहगीरों को हो रही परेशानी को दूर करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने तीन अधिवक्ताओं को बतौर मध्यस्थ नियुक्त करने की जो व्यवस्था की वह एक परिपाटी बन सकती है। न्यायालय ने सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के विरोध में शुरू हुए आन्दोलन को तो अधिकार मान लिया लेकिन उसकी वजह से लोगों को होने वाली परेशानी महसूस करते हुए उसे किसी वैकल्पिक जगह स्थानांतरित करने हेतु तीन अधिवक्ताओं को वार्ताकार बनाकर आन्दोलनकारियों से मिलने कहा। आज वे तीनों शाहीन बाग़ जाकर मुस्लिम महिलाओं को धरना स्थल बदलने के लिए सहमत करने का प्रयास करेंगे। लेकिन कुछ महिलाओं ने टीवी चैनलों पर दो टूक कहा कि वे उक्त कानून के हटने तक नहीं उठेंगी। जैसी चर्चा है उसके अनुसार यदि आन्दोलनकारी नहीं माने तब सर्वोच्च न्यायालय आगे की कार्रवाई पुलिस और प्रशासन पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेगा। प्रश्न ये है कि सर्वोच्च न्यायालय ने सड़क घेरकर बैठे जनसमूह को हटाने का आदेश देने की बजाय उनसे वार्ता करने जैसा विकल्प क्यों चुना? ऐसे मामलों में कार्रवाई करना तो प्रशासन और पुलिस का काम है क्योंकि किसी स्थान पर कुछ लोग अवैध रूप से बैठकर सार्वजनिक यातायात अवरुद्ध करते हुए हजारों लोगों की परेशानी का कारण बनें तो बात विरोध और आन्दोलन करने के मौलिक अधिकार से अलग हटकर जनसुविधा में बाधा उत्पन्न करने पर केन्द्रित हो जाती है। ये बात सोलह आने सच है कि सर्वोच्च न्यायालय का काम कानून व्यवस्था लागू करवाना नहीं है लेकिन वह ये तो कह ही सकता है कि दो महीने तक देश की राजधानी में बीच सड़क पर बैठकर धरना देना गैर कानूनी है। धरना पर बैठीं महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकार से किसी को ऐतराज नहीं है। लेकिन उन्हें सड़क रोककर यातायात में बाधा पैदा करने की छूट किस तरह का लोकतंत्र है, इसका जवाब भी मिलना चाहिए। ये बात बिलकुल सही है कि पुलिस और प्रशासन को इस धरने को खत्म करवाने या अन्यत्र कहीं स्थानांतरित करवाने की पहल करनी चाहिए थी लेकिन बीते कुछ समय से दिल्ली में पुलिस की कतिपय कार्रवाई को लेकर समाचार माध्यमों सहित सेकुलर लॉबी द्वारा जो बखेड़ा खड़ा किया गया उसकी वजह से पुलिस और प्रशासन दोनों ने अपने कदम रोककर रखे। ऊपर से मामला मुस्लिम महिलाओं का था जिनसे जऱा सी सख्ती किये जाने पर आसमान सिर पर उठा लिया जाता। चकाजाम और शाहर बंद करवाने के विरुद्ध न्यायालायों द्वारा अनेक निर्णय अतीत में दिए जा चुके हैं। जबलपुर में आयोजित बंद पर तो उच्च न्यायालय ने सम्बन्धित राजनीतिक दल के मुखिया पर आर्थिक दण्ड भी लगाया था। लेकिन शाहीन बाग़ में आयोजित धरने के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका पर सुनवाई भी बड़े ही आराम के साथ की गयी जबकि इस मामले में तत्काल सुनवाई और फैसले की अपेक्षा और जरूरत थी। देश में धरना प्रदर्शन, अनशन, जुलूस जैसे तरीके आम हैं। सड़क दुर्घटना में किसी की मृत्यु होने पर क्षेत्रीय जन सड़क घेरकर मुआवजा मांगने बैठ जाते है। पुलिस और प्रशासन अधिकतर अवसरों पर समझाइश देकर भीड़ को अलग करवा देते हैं। लेकिन शाहीन बाग़ के धरने को कुछ समाचार माध्यमों और राजनीतिक दलों ने इस तरह से पेश किया जैसे वह कोई राष्ट्रीय आन्दोलन हो। उसके साथ गांधीगिरी जैसा विशेषण जोड़कर उसकी गुणवत्ता भी प्रमाणित की जाती रही। जबकि सही बात तो ये है कि दिल्ली की पुलिस और प्रशासन ने अभूतपूर्व धैर्य का परिचय दिया। बावजूद इसके कि धरना स्थल पर भड़काऊ भाषण होते रहे। देश के पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद तक छीन के लेंगे आजादी जैसे नारे लगाते देखे गए। ये सब होने के बाद सर्वोच्च न्यायलय से उम्मीद थी कि वह शाहीन बाग के धरने को गैर कानूनी बताकर उसे हटवाने का रास्ता साफ करता। जबरदस्ती सड़क कब्जाए बैठी माहिलाओं से बात करने की लिए तीन अनुभवी अधिवक्ताओं की नियुक्ति का फैसला कितना सही है इस बहस में पड़े बिना ये कहना गलत नहीं होगा कि अब देश भर में इस तरह की किसी भी गतिविधि से निपटने में पुलिस और प्रशासन के समक्ष नई समस्या पैदा हो जायेगी। चंद सैकड़ा लोग यदि किसी भी सार्वजनिक स्थल पर डेरा जमाकर बैठ जाएं तो उन्हें बलपूर्वक हटाने की बजाय मध्यस्थ नियुक्त किये जाने का चलन बन जाएगा और उसके लिए सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था को आधार बनाया जावेगा। उससे भी बड़ी बात ये है कि यदि वार्ताकारों के समझाने बुझाने के बाद भी शाहीन बाग़ की आन्दोलनकारी महिलायें नहीं मानीं तब क्या सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली पुलिस और प्रशासन को नियमानुसार कार्रवाई करने का आदेश देगा और किसी भी तरह के बलप्रयोग के बाद मानवाधिकार और महिला आयोग जैसे संगठन कानून का साथ देंगे ? सवाल और भी हैं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के विवेक और न्यायप्रियता पर संदेह किये बिना इतना तो कहा ही जा सकता है कि देश की सर्वोच्च न्यायिक पीठ के कुछ फैसले नई समस्या को जन्म देने वाले भी होते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 February 2020

सिंधिया के बगावती तेवर खतरे का संकेत



मप्र कांग्रेस इन दिनों आपसी संघर्ष में उलझी हुई है। हालाँकि इसकी शुरुवात तो उसी दिन हो गयी था जब 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए कांग्रेस हाईकमान ने कमलनाथ को मप्र का मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय किया। स्मरणीय है 1993 में विधानसभा चुनाव के बाद ज्योतिरादित्य के पिता स्व. माधवराव सिंधिया भी स्व. अर्जुन सिंह की व्यूह रचना के चलते मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गये थे जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. पीवी नरसिम्हा राव उन्हीं को मप्र सरकार की कमान देना चाहते थे। माधवराव जी की असामयिक मृत्यु के बाद हालांकि कांग्रेस ने उनकी गुना सीट पर ज्योतिरादित्य को उतारकर सिंधिया घराने के आधिपत्य को तो स्वीकार किया लेकिन मप्र.की सियासत में उन्हें ज्यादा मजबूत नहीं होने दिया। मनमोहन सरकार में यद्यपि वे मंत्री भी बनाये गये किन्तु राहुल गांधी से जाहिर निकटता के बावजूद वे मप्र के मध्यभारत इलाके तक ही सीमित रखे गए। अर्जुन सिंह की मृत्यु के बाद दिग्विजय सिंह ने उनकी विरासत संभाली और कमलनाथ  के साथ मिलकर प्रदेश की कांग्रेसी राजनीति पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। हालाँकि ज्योतिरादित्य को भी दिखावे के लिए महत्व दिया जाता रहा और गत विधानसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस ने अपना चुनाव प्रचार प्रभारी बना दिया। भाजपा ने भी अपने प्रचार को माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराज के नारे पर केन्द्रित कर ये संकेत दिया कि वह श्री सिंधिया को ही अपना प्रतिद्वंदी मान बैठी थी। कांग्रेस ने भी उनके चेहरे को ही आगे किया। ग्वालियर-चंबल संभाग में कांग्रेस को मिली सफलता का श्रेय श्री सिंधिया के मुख्यमंत्री बनने की संभावना को ही दिया गया। लेकिन चुनाव के बाद कमलनाथ और दिग्विजय की जोड़ी ने एक बार फिर सिंधिया राजघराने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। कहा जाता है राहुल गांधी ज्योत्तिरादित्य को मुख्यमंत्री बनाये जाने के समर्थक थे किन्तु कमलनाथ ने सोनिया गांधी को अपनी तरफ  कर लिया। भले ही मंत्रीमंडल में सिंधिया समर्थकों को कुछ महत्वपूर्ण विभाग मिले लेकिन सत्ता के असली सूत्र कमलनाथ ने अपने हाथ में रखे वहीं दिग्विजय सिंह ने भी बाहर रहकर खुद को समानांतर शक्ति केंद्र के तौर पर प्रचारित कर दिया। कुछ समय तक श्री सिंधिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की उम्मीद में शांत रहे लेकिन कमलनाथ ने हाईकमान को लोकसभा चुनाव तक रुकने के लिए मना लिया। लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया की गुना सीट पर हुई हार ने पूरे देश को चौंका दिया। 2014 के चुनाव में प्रदेश की जिन दो लोकसभा सीटों पर कांग्रेस जीती उनमें कमलनाथ की छिंदवाड़ा और गुना थी। 2019 में मोदी लहर के बावजूद इन दोनों में कांग्रेस को पूरी उम्मीद थी किन्तु छिंदवाड़ा में कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ को तो जैसे-तैसे जितवा लाये लेकिन श्री सिंधिया गुना में अपने ही पुराने सहयोगी से लम्बे अंतर से हार गये। इस परिणाम के पीछे भी राजनीति के अनेक जानकार दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की जुगलबंदी देखते हैं। सिंधिया राजघराने को गुना और ग्वालियर में हराने की कल्पना भाजपा भी  नहीं करती थी। कहा तो यहाँ तक जाता रहा कि गुना के भाजपाई भी भीतर-भीतर महाराज का साथ देते थे। ज्योतिरादित्य की बुआ यशोधरा राजे भी गुना से विधायक हैं। बुआ-भतीजे एक दूसरे के सामने आने से कतराते रहे हैं। इस हार से श्री सिंधिया की राजनीतिक वजनदारी को जबरदस्त नुकसान हुआ। उधर कांग्रेस हाईकमान में भी राहुल गांधी की स्थिति कमजोर हो गयी। उनके पार्टी अध्यक्ष पद से हटने के बाद सोनिया जी ने फिर जिम्मेदारी संभाली और श्री सिंधिया को कांग्रेस महासचिव बनाये रखा लेकिन लोकसभा में गैर मौजूदगी की वजह से वे पूर्ववत आकर्षण का केंद्र नहीं रह सके। इधर मप्र में कमलनाथ शासन के साथ पार्टी संगठन पर अपनी पकड़ निरंतर मजबूत बनाते गये। कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष पद भी वे किसी न किसी तरह कब्जाए हुए हैं। ऐसे में श्री सिंधिया को अपना भविष्य खतरे में नजर आने लगा। केन्द्रीय स्तर पर कांग्रेस की हालत लगातार कमजोर होती जाने से भी वे चिंताग्रस्त होने लगे हैं। निकट भविष्य में राज्यसभा के चुनाव होने वाले हैं। ज्योतिरादित्य को लगा कि उच्च सदन के मार्फत ही कम से कम संसद में पुनप्र्रवेश करने से वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा सकेंगे। लेकिन जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने उनके मंसूबों पर पानी फेरने के लिए प्रियंका गांधी को मप्र से राज्यसभा में भेजने की गोटी चल दी है। ये एक ऐसा दांव है जिसके आगे श्री सिंधिया के सारे पांसे बेअसर होकर रह जायेंगे। चारों तरफ से घिरने के कारण ही महाराज ने आखिरकार आक्रामक रुख दिखाते हुए प्रदेश सरकार पर हमला बोलते हुए घोषणापत्र में किये वायदे पूरे नहीं होने पर सड़कों पर उतरने की धमकी दे डाली। इसके पहले  किसानों के कर्जे माफ होने में हो रही देरी पर भी श्री सिंधिया सार्वजानिक रूप से प्रदेश सरकार पर निशाना साधते रहे हैं। लेकिन जब उन्होंने सड़कों पर उतरने की धमकी दी तब कमलनाथ ने भी तैश में कह दिया कि उतरकर देखें। कांग्रेस की समन्वय समिति की बैठक में बीते दिनों काफी किचकिच हुई जिसकी वजह से श्री सिंधिया नाराज होकर बाहर आ गये। उनके समर्थक मंत्री जहां उनकी तरफदारी में जुटे हैं वहीं दूसरे गुट से उन्हें आलोचना झेलनी पड़ रही है। इस बीच ये संभावना भी व्यक्त की जाने लगी कि वे बगावत करते हुए भाजपा से हाथ मिलाकर मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा पूरी कर सकते हैं। यद्यपि इसका ठोस आधार नहीं है और इसे राज्यसभा सीट के लिए बनाये जा रहे दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन सिंधिया गुट के खुलकर मैदान में आने से मुख्यमंत्री के वर्चस्व को ठेस तो पहुंच रही है। प्रदेश की आर्थिक स्थिति बेहद चिंताजनक है। लगातार कर्ज लेने के बावजूद जरूरी काम रुके हैं। वेतन और अन्य भुगतानों पर भी रोक लगी है। विपक्ष लगातार हमलावर होता जा रहा है। भाजपा ने अपने  प्रदेश अध्यक्ष पद पर एक युवा को बिठाकर हमले को और धारदार बनाने के संकेत दे दिए हैं। ऐसे में कांग्रेस की गृहकलह उसके लिए नुकसानदायक हो सकती है। पंचायत और नगरीय निकाय के चुनाव के पहले इस तरह की महाभारत से भाजपा को नगद लाभ हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा। ज्योतिरादित्य को कांग्रेस राज्यसभा सदस्य या प्रदेश अध्यक्ष बनाकर शांत कर देगी या उन्हें इसी तरह उपेक्षित रखा जावेगा ये देखने वाली बात रहेगी। बहरहाल प्रदेश की राजनीति में एक बार गर्माहट पैदा हो रही है। लेकिन कमलनाथ सरकार पर बाहरी हमले की बजाय घर के भीतर से गोले दागे जा रहे हैं जो ज्यादा खतरनाक हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 17 February 2020

सीएए के फेर में मोहरे बन गए मुस्लिम



प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने गत दिवस वाराणसी में स्पष्ट कर दिया कि सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) किसी भी कीमत पर वापिस नहीं लिया जावेगा। उसी के साथ उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाये जाने के फैसले को भी देश हित में बताया। प्रधानमन्त्री की इस घोषणा से सरकार का रुख स्पष्ट हो गया। इस बारे में गृहमंत्री अमित शाह भी अनेक बार साफ़  कर चुके थे कि जिसे बात करना हो समय लेकर आ जाए लेकिन दबाव बनाकर सरकार को झुकाया नहीं जा सकता। संयोगवश कल ही दिल्ली के शाहीन बाग़ में धरना दे रही महिलाओं का जत्था श्री शाह से मिलने उनके निवास तक जाने के पहले ही रोक दिया गया। सही बात ये हैं कि 8 फरवरी को दिल्ली विधानसभा के लिए हुए मतदान के फौरन बाद ही उक्त कानून के विरोध को लेकर समाचार माध्यमों और नेताओं की रूचि घटने लगी थी। चुनाव परिणाम आने के बाद ये प्रचारित भी हुआ कि भाजपा द्वारा सीएए के बहाने हिन्दू-मुस्लिम का जो खेल खेला गया था वह विफल होकर रह गया। दिल्ली की मुस्लिम बहुल सभी सीटों पर आम आदमी पार्टी की भारी विजय को शाहीन बाग़ के आन्दोलन का प्रभाव बताया गया। लेकिन ताजा खबरों के मुताबिक शाहीन बाग़ में धरने पर बैठीं महिलाओं का उत्साह ठंडा पडऩे लगा है। बीते कुछ दिनों से धरने में संख्या घटने भी लगी है। गत दिवस श्री शाह के निवास पर प्रदर्शन करने भी पर्याप्त संख्या नहीं जुटी। नतीजों के बाद अनेक महिलाएं ये कहती टीवी पर दिखीं कि गृहमंत्री उन्हें मिलने का समय दें। इस पर श्री शाह का बयान आ गया कि जिसे मिलना हो वह समय लेकर आ जाए। बीती 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे पर तो धरना स्थल पर बाकायदे प्रधानमन्त्री को आमंत्रित करते हुए पोस्टर लहराए गए। लेकिन गत दिवस श्री शाह के निवास पर प्रदर्शन करने गया जत्था बिना समय लिए ही जा पहुंचा जिसकी वजह से पुलिस ने उसे आगे नहीं बढऩे दिया। सही बात ये है कि शाहीन बाग़ का आन्दोलन बेमौत मरने की कगार पर आ पहुंचा है। टीवी और सोशल मीडिया पर उस आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर का बताने का जो सुनियोजित प्रयास चल रहा था वह भी अचानक ठंडा पडऩे लगा। इस सबसे ये साबित होने लगा है कि वह एक प्रायोजित कार्यक्रम था जिसका उद्देश्य दिल्ली के चुनाव को प्रभावित करना था। आन्दोलन में बैठने वालों को धन और भोजन दिए जाने के आरोप भी अपनी जगह सही लगने लगे हैं क्योंकि दिल्ली के चुनावी नतीजे आते ही शाहीन बाग़ के धरने की जान निकलना शुरू हो गयी। लड़कर लेंगे आजादी के नारे लगने वाले अब किसी तरह इज्जत बचाने का रास्ता तलाश रहे हैं। केंद्र सरकार के कड़े रुख के कारण धरने पर बैठी महिलाएं किसी भी तरह श्री शाह से मिलकर धरना खत्म होने का बहाना ढूंढ़ रही हैं। एक मुस्लिम युवक को ये कहते भी सुना गया कि इस धरने का कोई नेता नहीं है इसलिए गृहमंत्री से मिलने का समय कौन मांगे ये तय करना कठिन है। जब धरना अपने शबाब पर था तब आंदोलनकारी प्रधानमन्त्री को वहां आकर बात करने जैसा दम्भ भरा करते थे लेकिन अब वे किसी तरह बचकर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। महिलाओं को आगे कर पर्दे के पीछे से मदद कर रहे मुस्लिम पुरुष और भाजपा विरोधी नेतागण भी 11 तारीख के बाद दिखाई नहीं दे रहे। कुल मिलाकर स्थिति चौबे जी द्वारा छब्बे बनने के फेर में दुबे बनने जैसी हो गयी है। तीन तलाक से मिली राहत की वजह से मुस्लिम समाज की महिलाओं के मन में भाजपा के प्रति बढ़ते लगाव की संभावना से चिंतित मुस्लिम समाज के धर्मगुरु और पुरुष वर्ग द्वारा सीएए के बहाने मुस्लिम महिलाओं को आगे करते हुए उस नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की गयी। पूरे देश में मुस्लिम समाज के मन में ये भय पैदा कर दिया गया कि सीएए के जरिये उनकी नागरिकता खत्म कर दी जायेगी जबकि इस कानून का उससे कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रस्तावित एनसीआर और एनपीआर को लेकर भी कपोलकल्पित आशंकाएं उत्पन्न करने का कुचक्र रचा गया। गैर मुस्लिम नेताओं ने भी इस बारे में जिस तरह आग में घी डालने का काम किया वह वाकई चौंकाने वाला था। अपने निहित तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थों के लिए देश में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा करने का ये तरीका बेहद खतरनाक है। उस दृष्टि से केंद्र सरकार द्वारा दबाव में न आते हुए जिस दृढ़ता का प्रदर्शन किया गया वह सही नीति है। प्रधानमन्त्री द्वारा गत दिवस वाराणसी में जिस साफगोई से सीएए वापिस लेने से इंकार किया उसके बाद अब ये मुस्लिम समुदाय को तय करना होगा कि वह  टकराव जारी रखना चाहता है या ठंडे दिमाग से सोचकर उन तत्वों के शिकंजे से आजाद होना चाहेगा जिन्होंने उसे मुख्यधारा से अलग करने का षडयंत्र रचा और उस पर देश विरोधी होने का ठप्पा लगवाकर दूर जा बैठे। शाहीन बाग़ के आन्दोलन को लेकर मुस्लिम समाज में जो विजेता भाव जगाया गया था वह बीते कुछ दिनों में लुप्त होता दिख रहा है। इस आधार पर ये कहना गलत नहीं होगा कि सीएए को मुद्दा बनाकर शुरू किया गया शाहीन बाग़ का आन्दोलन मुस्लिम समाज का जबरदस्त नुकसान कर गया क्योंकि बात केवल भाजपा के घाटे और उसके विरोधी दलों के फायदे तक सीमित नहीं रही अपितु मुस्लिम समाज के अलग-थलग पड़ जाने पर आकर केन्द्रित हो गई। सबसे बड़ी बात ये हुई कि मुसलमानों का नेतृत्व अनुभवहीन हाथों में चला गया। सर्वोच्च न्यायालय रद्द कर दे तो बात अलग वरना तो सीएए अब एक वास्तविकता बन चुका है जिसे मुस्लिम समुदाय जितनी जल्दी समझ ले उतना बेहतर है वरना वह इसी तरह राजनीतिक शोषण का शिकार होता रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी