Tuesday, 3 March 2020

काश, निर्भया के आंसुओं के बारे में भी सोच लेते



जो न्यायपालिका किसी एक मामले में आशा की किरण बनकर सामने आती है वही दूसरे में अपनी लाचारी से निराशा पैदा कर देती है। निर्भया काण्ड के दोषियों की फाँसी की तारीख फिर बढऩे के बाद देश भर से जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं उनमें गुस्सा साफ देखा जा सकता है। न्याय शास्त्र की प्रसिद्ध उक्ति है कि भले ही सौ गुनहगार छूट जाएं किन्तु किसी बेगुनाह को सजा नहीं होना चाहिए। निश्चित रूप से ये एक आदर्श स्थिति है। नीर - क्षीर विवेक पर आधारित न्याय ही सही माना जाता है। इसीलिये अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचने से पूर्व न्याय प्रक्रिया विभिन्न पायदानों से गुजरती है। साक्ष्यों के बयान , उनका प्रति परीक्षण , परिस्थितियों का विश्लेषण और कृत्य के पीछे निहित भावना भी देखी जाती है। अपराधिक प्रकरण में तो और भी सावधानी बरतनी होती है। लेकिन एक बार निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद भी यदि सजा टलती जाए तो फिर उसकी गम्भीरता के साथ ही कानून और दंड प्रक्रिया का भय कम होता जाता है। हमारे देश में अपराध करने वालों के मन में ये बात गहराई तक जगह बना चुकी है कि कानून को वे अपनी उँगलियों पर नचा सकते हैं। इस सोच को वे अधिवक्ता भी मजबूती प्रदान करते हैं जो अपराधी के बचाव में तरह - तरह के पेंच फंसाते रहते हैं। ताजा संदर्भ निर्भया काण्ड के दोषियों के मृत्युदंड की तारीख फिर से टल जाने का है। आज उन्हें फांसी दी जानी थी। गत दिवस उनमें से एक की याचिका पर अदालत ने रहम दिखाते हुए न्याय की निष्पक्षता का हवाला देते हुए भगवान के यहाँ तक का हवाला दे दिया। न्याय में निष्पक्षता हर हाल में जरूरी है लेकिन उसकी गम्भीरता नष्ट हो जाये तो वह निरर्थक हो जाता है। निर्भया प्रकरण ने हमारे देश की दंड प्रक्रिया में सुराखों को उजागर कर दिया है। जहां तक बात अधिवक्ताओं के जमीर की है तो उसे उनकी पेशेगत जिम्मेदारी मानकर हवा में उड़ा दिया जाता है किन्तु किसी कू्रर अपराधी के साथ जब कानून रियायत और रहमत दिखता है तो समाज पर उसका बुरा असर पड़ता है। संदर्भित प्रकरण में अभी तक जो कुछ भी हुआ वह निराश करने वाला है। फांसी होगी ये तो हर कोई जानता है लेकिन जिस तरह उसकी तारीख बार-बार आगे बढ़ती जा रही है उससे न्यायपालिका के प्रति सम्मान और भरोसा भले ही कम नहीं हुआ लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि वह हंसी का पात्र बनती जा रही है। भगवान के यहाँ जाकर अपराधी कानून के  निष्पक्ष न होने की शिकायत न कर सके इसकी चिंता करने वाले न्यायाधीश महोदय को ये भी सोचना चाहिए था कि भगवान के पास बैठी निर्भया हमारी न्याय प्रणाली पर आंसू बहा रही होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी



केजरीवाल : अपने हुए पराये



जो अरविन्द केजरीवाल कुछ समय पहले तक भाजपा विरोधी समाचार चैनलों की आंख के तारे हुआ करते थे वे अचानक खलनायक बन बैठे। कांग्रेस भी दिल्ली चुनाव के बाद उनकी बलैयाँ लेती नहीं थक रही थी। लेकिन ज्योंही दिल्ली सरकार ने कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर राजद्रोह का आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति पुलिस को दी त्योंही अरविन्द क्रांतिकारी से फासिस्ट माने जाने लगे। वामपंथी प्रचारतंत्र श्री केजरीवाल द्वारा चार साल पहले किये गये ट्वीट को उछाल रहा है जिसमें उन्होंने कन्हैया के भाषण को शानदार बताया था। उन पर ये आरोप लग रहे हैं कि दिल्ली दंगों के दौरान जनता से कटे रहने की वजह से खराब हुई छवि को सुधारने के लिए उन्होंने कन्हैया को लेकर अपनी नीति बदल डाली। ये भी कहा जा रहा है कि बीते दिनों केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद अरविन्द ने यू टर्न ले लिया। सच्चाई तो वे खुद ही बता सकेंगे लेकिन कन्हैया पर आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति के बाद वे अपने ही समर्थकों की आलोचना के शिकार होने लगे हैं। कहने वाले तो यहाँ तक कह रहे हैं कि भाजपा के साथ उनकी कोई गोपनीय डील हुई है। वैसे श्री केजरीवाल को जानने वाले ये मानते हैं कि इसके पीछे भी उनकी कोई दूरगामी राजनीति है। दरअसल बीते पांच साल में वे केंद्र सरकार से पंगा लेकर काफी परेशानी महसूस करते रहे हैं। इसीलिये चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पर कोई राजनीतिक हमला भी नहीं किया। उन्हें लगता है कि बिजली, पानी, अस्पताल और स्कूल के बारे में वे आगे ज्यादा कुछ नहीं कर पायेंगे। ऐसे में अगली बार जनता के सामने जाने के लिए उन्हें कुछ बड़े काम भी करने होंगे जिनके लिए केंद्र की मदद लगेगी। लोकसभा चुनाव तो अभी बहुत दूर हैं लेकिन दिल्ली के आगामी नगर निगम चुनाव में उन्हें भाजपा से मुकाबला करना पड़ेगा। पिछले चुनाव में भाजपा ने आम आदमी पार्टी का सफाया कर दिया था। वर्तमान में शाहीन बाग और दिल्ली के दंगों की वजह से श्री केजरीवाल की छवि हिन्दू विरोधी नेता की होती जा रही थी। दंगों के दौरान उनकी अनुपस्थिति से हिन्दुओं को ये लगा कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराकर वे ठगे रह गए। ऐसे में श्री केजरीवाल के आत्मसमर्पण नुमा इस कदम से राजनीति के जानकार जहां सन्न हैं वहीं भाजपा इसे पसंद करने के बाद भी सतर्क है क्योंकि वे कब कौन सा पैंतरा चल जाएँ ये कोई नहीं जानता। कन्हैया पर आरोप पत्र दाखिल किये जाने की अनुमति देकर उन्होंने अपने ऊपर नक्सली होने के आरोप को भी धो डाला है। यद्यपि अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी लेकिन श्री केजरीवाल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे सामाजिक कार्यकर्ता की छवि से आगे बढ़कर अब विशुद्ध राजनेता बन चुके हैं जिसका हर निर्णय राजनीतिक नफे-नुकसान से प्रेरित होता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 March 2020

भारत के लिए उबरने का स्वर्णिम अवसर




कोरोना वायरस ने चीन को तो भारी नुकसान पहुँचाया ही लेकिन उससे पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। पूंजी बाजार जबरदस्त गोते लगा रहे हैं। इसके प्रभावस्वरूप भारत के शेयर बाजार में भी बीते कुछ दिनों से हिचकोले महसूस किये गये। निवेशकों का अरबों का नुकसान होना बताया जा रहा है। पहले से मंदी की शिकार चल रही अर्थव्यवस्था के लिए ये हालात दूबरे में दो आसाढ़ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। एक तरफ  तो उक्त वायरस से संक्रमण का खतरा है वहीं दूसरी ओर चीन में आर्थिक गतिविधियाँ ठप्प हो जाने की वजह से भारत जैसे देश में कच्चे माल और अन्य जरुरी चीजों का अभाव हो गया है। जिन भारतीय उद्योगपतियों ने चीन में अपने कारखाने स्थापित कर रखे हैं वे भी काम बंद हो जाने की वजह से मुसीबत में फंस गए। हालंकि चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी आने के आसार नजर आते ही अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ पहले से ही अपना कारोबार समेटकर भारत में जमने की सोचने लगी थीं किन्तु मौजूदा स्थितियों में अब ऐसा करना उनके लिए संभव नहीं रहा। चूँकि चीन से न कोई आ रहा है और न ही वहां जा रहा है इसलिए वहां की स्थिति कब तक सुधरेगी ये पता नहीं लग पा रहा। निश्चित रूप से ये एक बड़ा संकट है जो आर्थिक सुस्ती को और गम्भीर बना रहा है किन्तु मुश्किल के इस दौर में में भी नई उम्मीदें जागृत हो रही हैं। आर्थिक जगत की जानकारी रखने वाले अनेक विशेषज्ञ ये मान रहे हैं कि इस संकट में भारत के लिए उद्योग-व्यापार क्षेत्र में अपार संभावनाएं पैदा हुईं हैं। औद्योगिक संगठनों की प्रतिनिधि संस्था एसोचैम ने इस धारणा की पुष्टि करते हुए कहा है कि कोरोना वायरस से पैदा हुए हालात भारत के निर्यात बाजार को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कर सकते हैं। हालंकि ये बात भी याद रखनी होगी कि बीते दो दशक के दौरान भारतीय उद्योग कच्चे माल के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर करने लगे हैं। यही वजह है कि कोरोना संकट के बाद से भारत का मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर भी संकटग्रस्त हो गया। लेकिन जब ये तय हो गया कि चीन को उससे उबरने में लंबा समय लगेगा तब विश्व बाजार में उसकी जगह लेने वाला सबसे उपयुक्त देश भारत ही हो सकता है। ये उम्मीद कोई और जताता तब शायद उस पर भरोसा नहीं होता लेकिन एसोचैम जैसे संस्थान ने इस सम्भावना को विश्वसनीय माना तब उम्मीद की जा सकती है। लेकिन केवल खयाली पुलाव पकाने से भारत विश्व बाजार में चीन के स्थान को भरने में सफल नहीं हो सकेगा। अच्छा होगा केन्द्र और राज्य सरकारें उद्योगों के लिए विशेष पैकेज और रियायतें घोषित करें। वैसेे भी आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए ऐसे कदमों की उम्मीद और जरूरत थी। अब जबकि चीन से मिल रही प्रतिस्पर्धा में व्यवधान आ गया है इसलिए भारत के पास स्वर्णिम अवसर है अपनी अर्थव्यवस्था को ऊंचाइयों पर ले जाने का। भारत में कारोबारियों के पास खासा अनुभव है और काम करने वाले हुनरमंद कामगार भी। ऐसे में इस मौके को लपकने में भी यदि भारत चूक गया तब सिवाय हाथ मलने के और कुछ नहीं बचेगा। केंद्र सरकार कहने को तो आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए काफी कुछ करने के दावे कर रही है लेकिन कोरोना वायरस के बाद उत्पन्न हालातों में अब ऐसे उपाय करने की जरूरत है जिनका लाभ त्वरित मिलने लगे। किसी देश के राजनीतिक नेतृत्व और आर्थिक प्रबंधन की परीक्षा ऐसे ही अवसरों पर होती है। वैसे भी नरेंद्र मोदी सरकार को इसी मोर्चे पर सर्वाधिक आलोचना झेलनी पड़ रही है। ऐसे में यदि वह समय रहते देश में अनुकूल वातावरण बनाकर औद्योगिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए नीति निर्धारण करे तो बड़ी बात नहीं भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने का रास्ता खुल सकता है। यद्यपि कुछ लोगों का अभी भी ये मानना है कि चीन लम्बे समय तक इस स्थिति में नहीं रहेगा और जल्दी ही दोबारा मैदान में उसी हौसले के साथ खड़ा नजर आयेगा लेकिन वैश्विक शक्ति संतुलन के मद्देनजर ये कहा जा सकता है कि अमेरिका सहित पश्चिम के विकसित देश उसे पहले जैसा पनपने नहीं देंगे। सही बात ये है कि विश्व व्यापार संगठन के नाम पर आई मुक्त अर्थव्यवस्था जिन विकसित देशों ने अपनी मंदी दूर करने के लिए दुनिया भर पर थोपी थी वे उसका अपेक्षित लाभ नहीं ले पाये जबकि चीन ने अपने चारों तरफ  खींचे लौह आवरण को स्वयं होकर तोड़ते हुए अपने दरवाजे पूरे विश्व के कारोबारियों के लिए खोलकर अकल्पनीय तरक्की हासिल कर ली। अमेरिका के बाजारों तक में चीन का बना सामान धड़ल्ले से बिकने लगा। कोरोना वायरस ने चीन के उस दबदबे को पलक झपकते कमजोर कर दिया। विकसित देशों में चूँकि श्रमिक बहुत महंगे हैं इसलिए वे चीन में उत्पादन गतिविधियाँ ठप्प होने का लाभ चाहकर भी नहीं ले सकेंगे। सस्ते मानव संसाधन के मामले में भारत ही चीन के मुकाबले वैश्विक अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम है। एसोचैम द्वारा दिए संकेत के मर्म को समझकर केन्द्र सरकार को फौरन ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे उद्योग-व्यापार जगत निराशा से निकलकर उत्साह का प्रदर्शन करे। भाग्य में विश्वास नहीं करने वालों को भी ये तो मानना ही पड़ेगा कि कोरोना वायरस में जहां चीन का दुर्भाग्य निहित है तो वह भारत की किस्मत खोलने का अवसर भी लेकर आया है। अब ये हमारे ऊपर है कि हम उसका किस तरह फायदा उठा पाते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 February 2020

कन्हैया : चार साल में आरोप पत्र तो सजा कितने साल में



9 फरवरी 2016 अर्थात चार साल से भी ज्यादा पहले दिल्ली के जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाये जाने की घटना हुई थी। उसमें तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित अनेक लोगों पर देशद्रोह का मामला दर्ज हुआ था। कुछ समय तक वे सभी जेल में भी रहे। प्रकरण की जाँच के बाद पुलिस ने दिल्ली सरकार से अदालत में आरोप पत्र पेश करने की अनुमति माँगी लेकिन केजरीवाल सरकार उसे दबाकर बैठी रही। इससे उसके ऊपर आरोप लगते रहे कि वह देशद्रोह के आरोपियों को बचा रही है। उक्त प्रकरण में आरोपित बाकी लोगों के बारे में तो जनसाधारण को ज्यादा पता नहीं है लेकिन कन्हैया डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद राजनीति में उतर आया और अपने वामपंथी रुझान के अनुरूप विधिवत सीपीआई में शामिल होकर बिहार की बेगुसराय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ बैठा और बुरी तरह से हारा। लेकिन बीते कुछ समय से वह बिहार में घूम-घूमकर आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अभियान चला रहा है। राजनीति के अनेक जानकार उसे महत्व भी दे रहे हैं। गत दिवस अचानक खबर आई कि दिल्ली सरकार ने कन्हैया और उसके साथ के सभी आरोपियों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति पुलिस को दे दी है। इस पर कन्हैया ने व्यंग्यपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए केजरीवाल सरकार को बधाई दी और लगे हाथ ये मांग भी कर दी कि प्रकरण फास्ट ट्रैक अदालत में भेजा जाये जिससे जल्द फैसला हो सके। इस बारे में ज्ञात हुआ है कि दिल्ली सरकार ने 400 दिन अनुमति देने  में लगाये। वह भी तब जब सम्बन्धित अदालत ने इस बारे में दबाव बनाया। किसी भी अपराधिक प्रकरण में जब तक आरोप पत्र दाखिल न हो तब तक मुकदमा आगे नहीं बढ़ता। ये मामला चार साल पहले का है। अव्वल तो पुलिस ने जांच में भरपूर समय लगाया और फिर बची-खुची कसर पूरी कर दी केजरीवाल सरकार ने। अनुमति मिल जाने के बाद अब पुलिस आरोप पत्र अदालत में दाखिल करेगी जहां पेशी दर पेशी सुनवाई टलती रहेगी। निचली अदालत से होते हुए सर्वोच्च न्ययालय तक का सफर पूरा होते-होते कितना समय लगेगा ये बड़े-बड़े भविष्यवक्ता भी नहीं बता सकते। सवाल ये है कि तेज फैसले करने के लिए मशहूर केजरीवाल सरकार ने इतने चर्चित और संवेदनशील मामले में अनुमति देनी में 400 दिन क्यों लगाये ? मामला छात्र आन्दोलन के दौरान होने वाले सामान्य झगड़ों से जुड़ा होता तब इस विलम्ब पर ध्यान नहीं जाता किन्तु देशद्रोह जैसी संगीन धाराओं में दर्ज मुकदमे में आरोप पत्र दाखिल करने में की गई देरी चौंकाने वाली है। कन्हैया एक चर्चित शख्सियत बन चुका है। हालाँकि उसके राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि वह जिस सीपीआई से जुड़ा हुआ है वह अस्तित्वहीन होने की कगार पर है। दूसरी बात ये है कि बिहार में नीतीश सरकार के विरोधी दल उसे कितना भाव देंगे ये स्पष्ट नहीं है। लेकिन इन सबका देशद्रोह के प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है। राजनीति में उतरने के कारण कन्हैया को प्रताडि़त किया जाए ये अनुचित है। उसी तरह नेतागिरी में आने के बाद उसके अपराध को नजरंदाज किया जाना भी गलत है। कानून के सामने सभी बराबर होते हैं और कन्हैया भी अपवाद नहीं है। यही वजह है कि घटना के चार साल बाद जब गत दिवस उस पर आरोप पत्र पेश किये जाने की अनुमति दिल्ली सरकार से पुलिस को मिली और वह भी 400 दिन तक दबाए रखने के बाद तो कन्हैया और उसके साथ के बाकी आरोपी ही नहीं हर समझदार व्यक्ति को आश्चर्य के साथ गुस्सा भी आया। हमारे देश की न्याय व्यवस्था कितनी धीमी रफ्तार से चलती है उसका प्रमाण निर्भया प्रकरण के दोषियों की फांसी में हो रहे विलम्ब से मिल चुका है। दिल्ली के शाहीन बाग़ धरने को लेकर भी न्यायपालिका ने जिस तरह का टरकाऊ रवैया दिखाया वह भी शोचनीय है। लेकिन देशद्रोह के आरोपियों को सालों तक छुट्टा घूमने दिया जाए तो इससे कानून का मजाक उड़ता है। कन्हैया पर अब मुकदमे की शुरुवात होगी। गवाहों के बयान और उनका प्रति-परीक्षण चलेगा। इस सब में कितना समय लगेगा ये कोई नहीं बता सकता। अंतिम फैसला आते-आते कन्हैया युवा से प्रौढ़ हो चुका होगा। देश की राजनीति में भी न जाने कितना बदलाव आ जायेगा। लेकिन उससे भी बड़ी बात ये होगी कि लोगों की स्मृति से समूचा प्रकरण लुप्त होकर रह जाएगा। इस मामले में दिल्ली सरकार की मंशा सवालों के घेरे में आ गई है। इसके पीछे कारण राजनीतिक संरक्षण हैं या प्रतिशोध ये साफ होना चाहिए। जेएनयू को लेकर जितने भी विवाद हुए उनमें अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी ने दूर से देखने की नीति अपनाई। कन्हैया एंड कम्पनी चूँकि मोदी सरकार को पानी पी-पीकर कोसती है इसलिए वह आम आदमी पार्टी को अच्छी लगती रही लेकिन कथित देश विरोधी गतिविधियों के कारण वह अपना दामन बचाने के लिए उससे दूरी भी बनाये रही। देशद्रोह के आरोप पत्र की अनुमति में विलम्ब के पीछे केजरीवाल सरकार की राजनीतिक सोच थी या फिर सामान्य प्रशासनिक आलस्य ये स्पष्ट होना चाहिए। लेकिन इतने चर्चित और संवेदनशील मामले के चार साल बाद भी आरोप पत्र दाखिल न हो पाना शर्म और चिंता दोनों का विषय है। कन्हैया कसूरवार है या नहीं ये तो अदालत तय करेंगी किन्तु न्याय में जितनी देरी होगी उतनी ही उसे सहानुभूति मिलती रहेगी। देशद्रोह के मामले में जब ये हाल है तब बाकी का क्या होता होगा इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 28 February 2020

सहयोग की आड़ में मुसलमानों का उपयोग हो रहा



दिल्ली के दंगों के लिए कौन जिम्मेदार है ये बहस तब तक चलती रहेगी जब तक वैसा ही कोई दूसरा हादसा न हो जाए। लेकिन सीएए नामक जिस मुद्दे के कारण ये स्थिति बनी वह अभी भी कायम है और रहेगा क्योंकि उसे लेकर किये गये दुष्प्रचार ने पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव की जो स्थिति पैदा की है उसको बदलने में लम्बा समय लगेगा। इस कानून को मुस्लिम विरोधी बताकर जो राजनीति की गई उसकी वजह से भ्रम का वातावारण बन गया। चूंकि मुस्लिम समाज में आज कोई भी राजनीतिक चिन्तक-विचारक नजर नहीं आता इसलिए वह धर्मिक सोच से आगे निकल नहीं पा रहा। मुलायम सिंह और लालू यादव जैसे नेताओं ने मुसलमानों को यदि अपने साथ जोड़ा तो उसका कारण न तो उनका समाजवादी हो जाना था और न ही सामाजिक न्याय के नारे से सरोकार। दरअसल पहले मुस्लिम समाज मुख्यत: कांग्रेस का समर्थक था लेकिन आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में वह पहली बार उसके छिटका। हालांकि बाद के कुछ सालों में वह लौटकर फिर उसी के साथ गया किन्तु नब्बे के दशक में जब भाजपा ने हिंदुत्व को अपनी राजनीति का घोषित एजेंडा बनाकर राम मंदिर का मुद्दा हाथ में लिया तब मुसलमानों को ये लगने लगा कि केवल कांग्रेस से चिपके रहने से उनका भला नहीं होगा। लिहाजा वे अलग-अलग राज्यों में विभिन्न पार्टियों के पीछे चलने लगे किन्तु जैसा पूर्व में कहा गया उसके पीछे राजनीतिक सिद्धांत न होकर केवल अपनी धार्मिक पहिचान को सुरक्षित रखना ही एकमात्र मकसद था। इसी के चलते ये गलती हुई कि बजाय राजनीति की मुख्यधारा में आने के वे महज मतदाता बनकर सौदेबाजी का हिस्सा बन गए। आर्थिक, शैक्षणिक या समाजिक प्रगति तो रद्दी की टोकरी में फेंक दी गयी और शरीयत की आड़ लेकर उनके दिमाग में ये भर दिया गया कि उसके बाहर जाकर सोचने मात्र तक से वे इस्लाम विरोधी बन जायेंगे। ये कहना कुछ भी गलत नहीं होगा कि मुसलमानों के बड़े वर्ग में ये डर बिठा दिया गया है कि उनकी धार्मिक पहिचान खतरे में है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि मुसलमानों का नेतृत्व राजनेताओं के हाथ से निकलकर मुल्ला-मौलवियों के हाथ आ गया। धर्म में विश्वास नहीं करने वाले साम्यवादी और आधुनिकता के सांचे में ढले सुशिक्षित मुसलमान तक किसी भी सुधारवादी कदम के विरोध में खड़े नजर आये। बात शाहबानो के मामले से शुरू होकर तीन तलाक रोकने तक आ गई लेकिन शरीयत के नाम पर धार्मिक कट्टरता इस हद तक बढ़ा दी गई कि समाज के उत्थान के लिए होने वाले फैसलों तक का विरोध करने उन्हें मजबूर कर दिया गया। परिणामस्वरूप जो थोड़े बहुत मुस्लिम राजनेता थे या अन्य धर्मों के नेतागण मुस्लिम समाज के रहनुमा कहलाते थे उन सबको दरकिनार करते हुए पूरी तरह धार्मिक सोच को अपना लिया गया। यही वजह रही कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, लालू यादव और ऐसे ही बाकी नेताओं को छोड़कर मुस्लिम समाज असदुद्दीन ओवैसी जैसों में अपना भविष्य देखने लगा। भले ही ओवैसी अभी भी एक सीमित क्षेत्र में ही प्रभावशाली हैं किन्तु उनसे प्रभावित होकर देश के विभिन्न हिस्सों में मुस्लिम समुदाय में ऐसे नेतृत्व ने जन्म ले लिया जो मुसलमानों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दों से दूर रखते हुए शरीयत के नाम पर उनका भयादोहन करने में जुट गया। तीन तलाक पर रोक चूँकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर लगी और मुस्लिम समाज की कतिपय महिलायें ही इसके लिए प्रयासरत रहीं इस कारण मुसलमानों की रहनुमाई करने वाले चाहकर भी ज्यादा कुछ नहीं कर सके। लेकिन कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने को मुस्लिम विरोधी प्रचारित करने का सुनियोजित प्रयास किया गया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जब राम मन्दिर के पक्ष में फैसला सुनाया तो कट्टरपंथियों को मुसलमानों के बीच खौफ  फैलाने का एक मौका और मिल गया जबकि अयोध्या ही नहीं उसके बाहर के मुसलमान भी उक्त फैसले से राहत का अनुभव करने लगे और पूरे देश में एक पत्ता तक नहीं खड़का। उसके बाद नागरिकता संशोधन विधेयक ज्योंही आया त्योंही बड़े ही सुनियोजित तरीके से पूरे देश में ये हवा बना दी गई कि इसके जरिये मुसलमानों से उनकी नागरिकता छीन ली जायेगी। ऐसे मौकों पर किसी भी कौम के भीतर धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व का समन्वय और संतुलन रहे तो विघटनकारी तत्व कामयाब नहीं हो पाते। लेकिन मुस्लिम समाज में इसका सर्वथा अभाव होने से कभी वह ओवैसी बंधुओं की तरफ देखता है तो कभी उसे वारिस पठान में इस्लाम का संरक्षक नजर आता है। इसी का फायदा उठाकर शर्जील इमाम जैसे लोग मुस्लिमों के अघोषित हीरो बन जाते हैं। सीएए कानून से हिन्दुस्तान में रह रहे मुसलमानों का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बन्ध नहीं है। उसके लागू होने से न उन्हें कोई लाभ है और न ही नुकसान। लेकिन विपक्ष ने उन्हें भड़काया और धार्मिक नेताओं ने आग में घी डालकर उन्हें ऐसे रास्ते पर धकेल दिया जो कुछ दूर जाकर बंद हो जाता है। दिल्ली के जामिया मिलिया विवि में हुई घटना के बाद शाहीन बाग जैसा आयोजन पूरी तरह अतार्किक और औचित्यहीन था। उसे स्वस्फूर्त और स्वप्रेरित बताने से बड़ा झूठ भी कुछ नहीं हो सकता। मुस्लिम समाज में राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन की धारा चूँकि पूरी तरह सूख गई है इसलिए धजी का सांप बनाने वाले कामयाब हो गए। कहना गलत नहीं होगा कि नागरिकता जाने के मिथ्या प्रचार के फेर में मुस्लिम समाज एक बार फिर मुख्य धारा में आने से वंचित कर दिया गया। दिल्ली दंगों के पहले भी देश के अनेक शहरों में मुस्लिम समुदाय की ओर से हिंसक आन्दोलन हो चुके थे। उससे सबक लेकर शाहीन बाग़ के धरने को समय रहते उठा लिया गया होता तो मुस्लिम समाज विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा बना रहता लेकिन अधकचरी सोच और कौआ कान ले गया की अफवाह पर आँख मूंदकर भरोसा कर लेने की वजह से अब बात करने की हैसियत भी वह गंवा बैठा। सीएए एक वास्तविकता है जिसे नकारना दिन में आँखें बंद करते हुए रात की कल्पना जैसा है। मुस्लिम समाज को दिल्ली के दंगों के बाद तो कम से कम ये समझ लेना चाहिए कि उनका सहयोग करने वाले दरअसल उनका उपयोग कर रहे हैं। अब भी यदि वह कट्टर और गैर जिम्मेदार अनुभवहीन नेताओं के चंगुल से नहीं निकला तो वह उन स्वार्थी तत्वों के शिकार होता रहेगा जो उसे आग में धकेलकर दूर जा बैठते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 February 2020

शाहीन बाग़ को मिली शह ने दिल्ली को झुलसाया



देश की राजधानी दिल्ली में बीते तीन-चार दिनों में जो कुछ भी घटित हुआ उसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए ये बड़ा ही जटिल प्रश्न है। इसके लिए जरुरी है पूरे घटनाक्रम पर नजर डाली जाए । सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के विरोध को लेकर शुरू हुआ आन्दोलन जिस मुकाम पर जा पहुंचा था उसकी परिणति यही होना थी। दिल्ली पुलिस , प्रशासन , केंद्र सरकार और चंद नेताओं पर लग रहे आरोपों के बीच इस बात पर ध्यान देना भी जरूरी है कि जामिया मिलिया और उसके बाद शाहीन बाग़ में जिस तरह से उक्त कानून के विरोध में कानून हाथ में लिया गया उससे ये संकेत गया कि अल्पसंख्यकों के नाम पर समूची व्यवस्था को चुनौती देने की हिमाकत की जा सकती है। इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि जामिया मिलिया में दिल्ली पुलिस द्वारा की गई कार्रवाईको लेकर जिस प्रकार आलोचनाओं के पहाड़ खड़े किये गये उससे उसका मनोबल कमजोर हुआ जिसकी वजह से शाहीन बाग़ में सड़क पर दिए गये धरने को हटवाने के बारे में कड़ा कदम उठाने से वह हिचकती रही। वरना पहले दिन ही शाहीन बाग़ में शुरू हुआ धरना हटवा दिया जाता और दिल्ली का वातावरण इस कदर नहीं बिगड़ता। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय दोनों ने ही नेताओं के बयानों के अलावा पुलिस के गैरपेशेवर रवैये पर तीखी टिप्पणियाँ कीं। उनके बाद से राजनीति और तेज हो गयी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर सवालों की झड़ी लगाते हुए गृह मंत्री अमित शाह से इस्तीफा माँगा। लेकिन उच्च न्यायालय की उस टिप्पणी पर कुछ नहीं कहा कि बड़े ओहदों पर बैठे जेड सुरक्षा प्राप्त नेतागण उपद्रव से प्रभावित क्षेत्रों में जाकर लोगों में विश्वास जगाएं। उल्लेखनीय है पूरा गांधी परिवार इस इस श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला तो ऐसे अवसरों पर वैसे भी सामान्य है। लेकिन तीखी टिप्पणियों के जरिये अपना रुतबा कायम करने वाली न्यायपालिका को भी क्या आत्मावलोकन नहीं करना चाहिए ? शाहीन बाग़ के धरने के विरुद्ध प्रस्तुत याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय को साफ-साफ कहना था कि सड़क घेरकर यातायात अवरुद्ध करना गैर कानूनी है और पुलिस तथा प्रशासन तुरंत धरने को हटवाकर यातायात शुरू करवाएं। लेकिन जनहित के इतने महत्वपूर्ण मसले पर भी नोटिस और पेशियों का चिर-परिचित सिलसिला शुरू हुआ। और काफी समय गंवाने के बाद सड़क पर प्रदर्शन को गलत मानते हुए भी मध्यस्थों को भेजकर आन्दोलनकारियों के भाव बढ़ा दिए गए। उनसे किसी और स्थान पर जाकर आन्दोलन करने की मनुहार की जाती रही लेकिन वार्ताकारों को खरी-खोटी सुनाकर चलता किया गया। उन्होंने जो रिपोर्ट न्यायालय में पेश की उसे भी गोपनीय रखा गया जबकि उसे सार्वजानिक किये जाने से आन्दोलन की असलियत सामने आ जाती। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय में शाहीन बाग़ प्रकरण की सुनवाई पर पूरे देश की नजरें थीं। लेकिन उसने दिल्ली के ताजा हालात के मद्देनजर ये टिप्पणी करते हुए कि सड़कें प्रदर्शन के लिये नहीं होतीं और दिल्ली पुलिस पेशेवर नहीं है, सुनवाई होली के बाद तक टाल दी। उधर दिल्ली के उच्च न्यायालय ने भी एक लाइन से नेताओं , पुलिस, सरकार सभी को फटकारा लेकिन वहां से भी ऐसा आदेश जारी नहीं हुआ जिससे ये साफ़  होता कि न्यायपालिका चाहती क्या है? उसका ये कहना एकदम सही है कि पुलिस पेशेवर नहीं है। लेकिन क्या यही बात हमारी न्याय व्यवस्था पर भी लागू नहीं होती? विदेशों में पुलिस की निर्णय क्षमता का हवाला भी माननीय न्यायाधीशों द्वारा दिया गया किन्तु उन्हें ये भी तो सोचना चाहिए था कि शाहीन बाग़ का धरना खत्म करवाने में पुलिस क्यों आगे नहीं बढ़ी? जामिया मिलिया में उपद्रवियों पर की गई पुलिस कार्रवाई को लेकर जिस तरह का प्रलाप किया गया उसके बाद पुलिस भी ठंडी पड़ी। शाहीन बाग़ के आन्दोलन को मिले समर्थन के बाद दिल्ली के जाफराबाद में भी अचानक सड़क घेरने का दुस्साहस किया गया। यहाँ तक कि मेट्रो स्टेशन तक पर कब्ज़ा कर लिया गया। ये तब हुआ जब शाहीन बाग़ में वार्ताकार सड़क पर बैठी मुस्लिम महिलाओं से दूसरी जगह जाने का अनुनय-विनय कर रहे थे। फसाद जाफराबाद के धरने के बाद से ही शुरू हुए। शाहीन बाग़ का धरना लंबा खींचने के बाद जाफराबाद में भी सड़क पर कब्जे के स्थायी होने के अंदेशे में जब उसका विरोध हुआ तब आन्दोलनकारियों ने हिंसा का सहारा लेकर जो उग्र रूप दिखाया उसकी चिंगारी ही दूसरे क्षेत्रों में भड़की। जो कुछ भी हुआ या हो रहा है वह किसी भी दृष्टि से न तो स्वीकार्य है और न ही किसी के हित में है। लेकिन ऐसे मामलों में न्यायपालिका को भी अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। यदि शाहीन बाग़ से धरना उठवाना उसका काम नहीं है तब उसे संबंधित याचिकाओं की सुनवाई भी नहीं करनी चाहिए थी। और यदि उन्हें विचारयोग्य समझा तो फिर मामले की नजाकत समझते हुए ऐसा निर्णय करना था जिससे समस्या का त्वरित हल हो पाता। महिलाओं के धरने पर बल प्रयोग की सलाह कोई भी समझदार नहीं देगा। फिर भी सर्वोच्च न्यायालय सड़क घेरने को गैर कानूनी करार देता तब अन्दोलनकारियों का मनोबल टूटता और वे भी दूसरा स्थान तलाशते। लेकिन न्यायपलिका ने सांकेतिक शब्दों में धरने को गलत बताते हुई वार्ताकार भेजकर सड़क घेरकर बैठी महिलाओं को वीवीआईपी होने का एहसास करवा दिया। दिल्ली के समूचे घटनाक्रम का वस्तुवादी विश्लेषण होना जरूरी है। अमेरिका के राष्ट्रपति के आगमन के समय हुए फसाद के पीछे कोई षड्यंत्र था या नहीं ये भी विचारणीय है। सोनिया जी ने अमित शाह और केंद्र सरकार पर आरोप के साथं ही अरविंद केजरीवाल पर भी निशाना साधा है। आईबी के एक कर्मी की हत्या के लिए आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन पर आरोप लग रहे हैं। कल श्री केजरीवाल ने उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों का दौरा भी किया। वे इसके पहले शाहीन बाग़ की सड़क खुलवाने क्यों नहीं गये ये भी बड़ा सवाल है। केंद्र का गृह विभाग और उसके मातहत दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी से कोई इनकार नहीं करेगा लेकिन ये भी स्वीकार करना चाहिए कि शाहीन बाग़ को दी गई शह ने जाफराबाद पैदा किया जिसकी वजह से दिल्ली जल उठी। अच्छा होगा न्यायपालिका समझाइश देने के साथ ही सही-गलत का फैसला करने में समय न गंवाए जिससे समस्या का इलाज वक्त रहते किया जा सके।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 26 February 2020

ट्रंप के दौरे से भारत का कूटनीतिक वजन बढ़ा



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दो दिवसीय भारत यात्रा कल रात खत्म हो गयी। इस दौरे की सबसे अहम बात ये कही जा रही है कि वे लंबा सफर करते हुए केवल भारत आये। उनके बारे में प्रचलित है कि उन्हें इतनी लम्बी यात्रा से परहेज है। वैसे भी अमेरिका के राष्ट्रपति जब विदेश यात्रा पर निकलते हैं तब अनेक देश उनके दौरा कार्यक्रम में शामिल किये जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में तो वैसे भी अनेक राष्ट्रप्रमुख मिल जाते हैं। लेकिन भारत जैसे सुदूर देश की यात्रा और वह भी बिना किसी विशेष कार्यसूची के करना अमेरिकी कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण घटना है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात अमेरिका के अलावा अनेक सम्मेलनों में होती रही है। कुछ महीने पहले जब वे अमेरिका गए तब हाऊडी मोदी नामक जलसे में श्री ट्रंप के आने से दोनों नेताओं के सम्बन्ध कूटनीति से आगे निकलकर व्यक्तिगत निकटता का रूप लेते दिखे जिसका विस्तार इस दौरे में नजर आया। कुछ लोगों का मानना है कि ये दौरा आगामी नवंबर में होने जा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर था। अमेरिका में रहने वाले 40 लाख भारतीय मूल के मतदाताओं को लुभाने के लिए ही श्री ट्रंप ने भारत आने की तकलीफ  उठाई और श्री मोदी की तारीफों के पुल बाँध दिए। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी आदत के विपरीत विवादास्पद टिप्पणी से भी परहेज किया। भारत रवाना होने के पहले उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा उठाने की बात कहकर खलबली मचाई थी। भारत सरकार निश्चित रूप से उस बयान से खुद को असहज महसूस करने लगी थी। पाकिस्तान ही नहीं अपितु भारतीयों का भी एक वर्ग है जो सीएए मुद्दे का वैश्वीकरण करने में जुटा रहा लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत के आन्तरिक मसलों पर बोलते समय जिस तरह का संयम बरता वह न केवल चौंकाने वाला रहा बल्कि उसे भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता कहना गलत नहीं होगा। उनके आगमन के साथ ही दिल्ली में दंगे शुरू हो गए थे। जिनकी आड़ लेकर या तो उनके कुछ कार्यक्रम रद्द किये जा सकते थे या सुरक्षा कारणों से उनका प्रस्थान जल्दी हो जाता। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और श्री ट्रंप तथा उनके परिवार ने दिल्ली प्रवास के दौरान पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक ही प्रत्येक गतिविधि में हिस्सा लिया। प्रधानमंत्री से दोपहर हुई लम्बी बातचीत के दौरान रक्षा सौदे की जिस बड़ी डील की बात निकलकर आई उसके लिए ही श्री ट्रंप भारत आये ये बात गले नहीं उतरती क्योंकि इस तरह के सौदे लंबी प्रक्रिया के बाद अंतिम रूप लेते हैं। सेना से जुड़ी किसी भी खरीदी में सैन्य विशेषज्ञ भी अपनी राय रखते हैं। अमेरिका से जिन रक्षा सामग्रियों की खरीद का निर्णय गत दिवस हुआ वे काफी समय से विचाराधीन थीं। इसलिए उनके बारे में लिए गये निर्णय को इस यात्रा का प्रतिफल मान लेना सही नहीं होगा। लेकिन सबसे बड़ी बात ये हुई कि धार्मिक स्वतन्त्रता , कश्मीर , सीएए जैसे मुद्दों पर श्री ट्रंप ने जिस तरह अमेरिकी हस्तक्षेप से इंकार करते हुए श्री मोदी की क्षमताओं पर विश्वास व्यक्त किया उससे भारत में भले ही बहुत से लोगों को बुरा लगा होगा लेकिन कूटनीति के जानकार ये मानेंगे कि अमेरिकी राष्ट्रपति के इस रवैये से पाकिस्तान के सीने पर सांप जरुर लोटा जो ये मानकर चलता रहा है कि अमेरिका का दत्तक पुत्र होने से उसका संरक्षण उसकी मजबूरी है। हालाँकि श्री ट्रंप ने इमरान खान को भी अपना मित्र बताया लेकिन अपनी सरजमीं से आतंकवाद को मिटाने की बात कहकर पाकिस्तान को तो सन्देश दिया ही वहीं इस्लामिक आतंकवाद को खत्म करने की बात को कई अवसरों पर दोहराकर भी भारत के पक्ष को जोरदार समर्थन दिया जिससे श्री मोदी सरकार की कश्मीर नीति को परोक्ष समर्थन मिला। कुल मिलाकर राष्ट्रपति के रूप में श्री ट्रंप के प्रथम भारत दौरे को असाधारण और अभूतपूर्व तो तो नहीं कहा जा सकता किन्तु वह उन आशंकाओं से परे रहा जो उनके अनिश्चित स्वभाव के कारण अपेक्षित थीं। यदि वे कश्मीर , सीएए, धार्मिक स्वतंत्रता और ऐसे ही किसी दूसरे  विषय पर ऐसी टिप्पणी कर देते जो हमारे घरेलू मामलों में हस्तक्षेप मानी जाती तो श्री मोदी को जबर्दस्त आलोचना का शिकार तो होना ही पड़ता कितु उससे भी अधिक विदेश नीति के मोर्चे पर उनकी अब तक की सफलताओं के ऊपर पानी फिर जाता। राष्ट्रपति ट्रंप भारत के बाहर यदि कुछ बोलते हैं तब उसका उतना असर नहीं होता लेकिन हमारे मेहमान बनकर वे हमारे घरेलू मसलों पर ऐसा कुछ कह जाते जिससे भारत की वैश्विक छवि खराब होती तब वह कूटनीतिक दृष्टि से अपमानजनक होता। उनकी इस यात्रा से पाकिस्तान को भले ही प्रत्यक्ष तौर पर कोई नुक्सान नहीं हुआ हो क्योंकि श्री ट्रंप भी उसकी सीधी आलोचना से बचे लेकिन भारत आने के बाद पाकिस्तान का दौरा किये बिना उनका अमेरिका लौट जाना भी कूटनीतिक लिहाज से भारत की सफलता कही जायेगी, जिसके लिए प्रधानमन्त्री के अलावा विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी प्रशंसा के हकदार हैं क्योंकि अमेरिका जैसे देश के राष्ट्रप्रमुख के दौरे की तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती हैं जिनमें विदेश मंत्रालय की खासी भूमिका रहती है। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापिसी की संभावनाओं के बीच श्री ट्रंप का भारत दौरा और उसमें आपसी सहयोग की संभावनाओं पर सहमति  और निर्णयों से विश्व मंच पर भारत का महत्व बढ़ा है। अमेरिका के राष्ट्रपति से व्यक्तिगत सम्बन्ध बना लेना आसान काम नहीं है। भले ही किसी देश की विदेश नीति एक निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा होती है जो शासक के बदलने पर ज्यादा नहीं बदलती लेकिन राष्ट्रप्रमुखों के बीच निजी तौर पर स्थापित निकटता से कूटनीतिक मोर्चे पर काफी लाभ मिलता है। पंडित नेहरु ने इसका लाभ काफी लिया किन्तु वह दौर शीतयुद्ध का होने से वे कई मोर्चों विशेष रूप से चीन को लेकर मात खा गए। इत्तेफाक से श्री मोदी शीतयुद्ध के बाद की कूटनीति का हिस्सा बने इसलिए उनको उस छुआछूत  का सामना नहीं करना पड़ा। यही वजह है कि वे अपनी कट्टर हिन्दू छवि के बावजूद अनेक मुस्लिम देशों से मधुर रिश्ते बनाने में कामयाब हो गए। डोनाल्ड ट्रंप के ताजा दौरे से भारत की कूटनीतिक वजनदारी में और भी वृद्धि हुई जिसका श्रेय कोई चाहे या न चाहे लेकिन श्री मोदी के खाते में ही जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी