Monday, 23 March 2020

जनता कर्फ्यू : मेरा देश वाकई बदल रहा है



बीते कुछ दिनों में अचानक समूचा देश मौत के भय से थर्रा उठा। कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में अचानक हुई वृद्धि और देश के अनेक प्रदेशों में उसका फैलाव होने से इस महामारी के भारत में पैर पसारने की आशंका प्रबल हो उठी। आबादी के अनुपात में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और करोड़ों लोगों के सामने गंदी बस्तियों में जीवन यापन करने की मजबूरी के कारण कोरोना का संक्रमण बेकाबू होने का खतरा पैदा हो गया। मुम्बई जैसे महानगर में इसके मरीजों की तेजी से बढ़ती संख्या ने चिंता और बढ़ा दी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी ये चेतावनी दी कि जरा सी चूक होने पर भारत भी चीन, ईरान और इटली की राह पर जा सकता है। अचानक प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित करते हुए 22 मार्च को जनता कफ्र्यू की अपील कर डाली। शाम को 5 बजे केवल 5 मिनट के लिए घर के दरवाजे, बालकनी या छत पर तालियां, घंटा, घंटी, थाली, शंख बजाकर उन समस्त लोगों का आभार व्यक्त करने का आह्वान भी किया जो-जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोरोना के आक्रमण से देशवासियों को बचाने के लिए अपनी जान खतरे में डालते हुए दिन रात जुटे हुए हैं। कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए वे अपने परिवार से दूर रहने में भी हिचकिचा नहीं रहे। शुरू में प्रधानमंत्री की वह सलाह और आह्वान लोगों को अटपटा लगा। कुछ तो ये भ्रम फैलाने में जुट गए कि श्री मोदी नोटबंदी जैसा कोई कदम उठाने की जमीन तैयार कर रहे हैं। लेकिन 22 मार्च आने के एक दो दिन पहले ही देश के अनेक हिस्सों से कोरोना के फैलाव की खबरें आने लगीं और कई शहरों में लॉक डाउन करने की नौबत आ गयी। नागपुर में तो पान की दुकानें तक बंद करवा दी गईं। 21 मार्च तक देश को समझ आ चुका था कि प्रधानमन्त्री का इशारा किस तरफ था। यद्यपि कुछ शहरों में तो 22 मार्च के पहले ही सब कुछ बंद हो चुका था लेकिन कल रविवार को आयोजित जनता कफ्र्यू के दौरान देश भर में जो हुआ वह अकल्पनीय था। प्रधानमंत्री के आह्वान पर बिना किसी ऐतराज या आपत्ति के लोगों ने घर में खुद को सीमित कर लिया। बिना जोर-जबरदस्ती के इस तरह का अनुशासन एक नया अनुभव था। दिन भर चारों तरफ  सुनसान रहा। न वाहनों का शोर और न और कोई आवाज। अनेक लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अरसे बाद उन्होंने चिडिय़ों की चहचहाहट सुनी। घर-परिवार के साथ समय गुजारने का अवसर पाने से भी लाखों लोग अभिभूत हो गए। लेकिन शाम ज्योंही घड़ी ने 5 बजाये पूरा देश सामूहिक रूप से अपने घर के सामने, या बालकनी पर खड़े होकर तालियां बजाने लगा, किसी के हाथ में घंटा था तो कोई पूजा की घंटी बजाने लग गया। कुछ ने शंख ध्वनि की तो कुछ उत्साही जन अपने वाहनों के हार्न बजाकर कोरोना से लड़ रहे जांबाज योद्धाओं के प्रति राष्ट्र द्वारा कृतज्ञता ज्ञापित करने के अभियान का हिस्सा बन गए। कुल मिलाकर ये एक अद्भुत नजारा था। तनाव के इस माहौल में भी पूरे देश को एकजुट होकर एक गम्भीर बीमारी से लडऩे के लिए पहले सतर्क और फिर एकजुट करने का यह प्रयास श्री मोदी की नेतृत्व क्षमता का ज्वलंत प्रमाण बन गया। जनता कफ्र्यू के साथ ही देश के बड़े हिस्से में लॉक डाउन कर दिया गया। पूरे देश में 31 मार्च तक रेल, बसें और हवाई सेवा बंद कर दी गयी। विदेश जाने और आने दोनों पर रोक है। शिक्षण संस्थाओं में अवकाश देते हुए परीक्षाएं भी रोक दी गईं। संक्षेप में कहें तो कमोवेश पूरे देश को घर में रहने मजबूर कर दिया गया। लेकिन जिस तरह जनता ने इन बंदिशों को स्वीकार करते हुए सरकार का साथ दिया वह देशवासियों के जिम्मेदार होने का ताजा प्रमाण है। ऐसे अवसरों पर भी कुछ लोग अपनी राजनीतिक कुंठाएं निकाले बिना नहीं रहते और कोरोना को लेकर भी ऐसा हो रहा है। लेकिन संतोष का विषय है कि देश का जनमानस इस समय अपने दायित्व के निर्वहन के प्रति गम्भीर है। उसके सामान्य जीवन में अनगिनत परेशानियां आ खड़ी हुई हैं। आगे हालत और भी खराब होने की आशंका से भी वह अवगत है। लेकिन न कोई विरोध, न अपेक्षा और न ही असंतोष। ये सब देखकर इस दावे पर विश्वास करने का मन हो जाता है कि मेरा देश वाकई बदल रहा है। आजादी के आन्दोलन में भी गांधी जी के आह्वान पर इसी तरह देशवासी लडऩे को तत्पर हो जाते होंगे। लालबहादुर शास्त्री द्वारा सप्ताह में एक समय के उपवास का आग्रह किस तरह राष्ट्रीय संकल्प बन गया ये भी देखने में आ चुका है। 22 मार्च के जनता कफ्र्यू ने कोरोना से लडऩे की इच्छाशक्ति और हौसले का जो प्रगटीकरण किया उसने नई उम्मीदें जगा दी हैं। कोरोना का प्रकोप कब तक रहेगा ये दावे के साथ कोई नहीं बता पा रहा। सबके अपने-अपने अनुमान हैं । लेकिन एक बात तय हो गयी कि भारत का आम नागरिक इस खतरे से अवगत होने के साथ ही उससे सतर्क भी हो गया है। जो निश्चित रूप से एक बड़ी बात है। इस तरह के संकट के वक्त किसी देश की जनता का नेतृत्व पर विश्वास बड़ा मददगार बनता है। और ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि नरेंद्र मोदी इस कसौटी पर एक बार फिर खरे साबित हुए हैं। मौत की आहट से आतंकित जनमानस में उत्साह, आत्मविश्वास और साहस का संचार मामूली बात नहीं होती किन्तु श्री मोदी ने यह कर दिखाया। कोरोना भारत में पैर फैला चुका है लेकिन देश उससे निपटने के लिए जिस तरह तैयार दिखाई दे रहा है वह शुभ संकेत है। सीमित चिकित्सा सुविधाओं और संसाधनों के बाद भी अभी कोरोना भारत में चीन, ईरान और इटली जैसे हालात भले न पैदा कर पाया हो किन्तु जरा सी चूक से भारी जनहानि हो सकती है। उस दृष्टि से सही समय पर सतर्कता और साहस दोनों का समन्वय कायम किया जा सका। इसके लिए पूरा देश बधाई का पात्र है। ये जज्बा और सावधानी आगे भी रहनी चाहिए क्योंकि कोरोना नामक अदृश्य शत्रु कब, कैसे और किस पर हमला करेगा इसका पूर्वानुमान लगाना असम्भव है। इससे बचने के लिए क्या किया जाना है ये बताने की जरूरत नहीं है। संचार और प्रचार माध्यमों से जरूरी जानकारी दी जा रही है। उम्मीद की जा सकती है कि अभी तक जिस सूझबूझ का परिचय लोगों ने दिया वह आगे भी जारी रहेगा। कोरोना से बचना भी देश सेवा है क्योंकि इसका एक मरीज अनगिनत लोगों की जि़न्दगी खतरे में डाल सकता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 March 2020

कोरोना : तीसरे विश्व युद्ध की पटकथा




मुझे 1962 के चीनी हमले की हल्की यादें हैं | सुरक्षा कोष में पिताजी अपनी सोने की अंगूठी दे आये थे | उससे मैं उत्साहित हुआ और बाद में जब विद्यालय में तिरंगे झंडे का बैज बिकने आया तब माताजी से मांगकर एक रुपये में मैनें उसे  खरीदा और बड़े ही गर्व के साथ अपने कोट पर लगाकर विद्यालय  जाता था | लेकिन उस युद्ध से जबलपुर में किसी खतरे का एहसास नहीं हुआ | बहुत बाद में जान पाया कि भारत  उस युद्ध में हार गया था | उसके बाद जब 1965 की लड़ाई हुई तब तक समझ का विस्तार हो चुका था | भारतीय सेना के विजय अभियान की खबरें अख़बारों और रेडियों पर सुनकर हर देशवासी की तरह मैं भी खुश होता था | पैटन टैंको  का कब्रिस्तान और सैबर जेट के मुकाबले हमारे छोटे से नैट विमानों के करतबों की जानकारी आत्त्म गौरव की अनुभूति करवाने वाली थी | चीनी हमले के कलंक को हमारी सेनाओं ने धो दिया | लेकिन उस समय भी जबलपुर में बैठे हुए कभी किसी खतरे का एहसास नहीं हुआ | 1971 की  बांग्ला देश वाली जंग तक महाविद्यालय में आ  चुका था | पूर्वी और पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेनाओं ने अपने युद्ध कौशल से इतिहास रच डाला | पहली बार भारत अंतर्राष्ट्रीय दबाव को ठुकराता दिखा | स्व. इंदिरा गांधी दुनिया की ताकतवर शासक बनकर उभरीं | उस युद्ध का विवरण भी रेडियो और अख़बारों में सुनने और पढने मिलता था | लेकिन तब तक युद्ध की आहट हमारे शहर में भी सुनाई देने लगी थी | रात में ब्लैक आउट होता | बिजली बंद कर  दी  जाती थी | आसमान से आती किसी भी आवाज को दुश्मन का विमान मानकर भय का माहौल बन जाता | जबलपुर में रक्षा उत्पादन के अनेक संस्थान होने से पाकिस्तान के हवाई हमले की आशंका बनी रहती | उसके बाद लम्बे समय तक पाकिस्तान से कोई   जंग नहीं हुई लेकिन आतंकवाद नामक समस्या गाहे बगाहे डराती रही | फिर भी कभी मौत सिर पर मंडराने का भी अंदेशा नहीं हुआ  | अनेक बीमारियों का दौर भी आया | नए नए वायरस जनित रोगों ने भी हमला बोला लेकिन वे भी आये और चले गये | पर  बीते कुछ दिनों से और ख़ास तौर पर कल रात से जबलपुर में भी कोरोना ग्रसित चार मरीज मिल जाने के बाद पूरा शहर जिस प्रकार खौफजदा है वह अभूतपूर्व मंजर है | संचार क्रांति के इस दौर में सूचना का विस्फोट खबरों के प्रवाह को सदैव गतिमान रखता है | उसमें अतिरेक भी कम नहीं है | खबरों की आड़ में भय का व्यापार भी जमकर होता है | न जाने कहां  - कहाँ से लाल बुझक्कड़ के आधुनिक अवतार व्हाट्स एप विवि के माध्यम से ज्ञान बांटते फिरते हैं | कोरोना के भय से घर में हूँ | बाहर  सन्नाटा है | न कोई  आ रहा है न जा रहा है | 

कुछ देर पहले पिता जी के पास बैठकर मौजूदा हालात पर चर्चा की तो वे अनायास दुसरे विश्व युद्ध का बारे में बताने लगे | तब रेडियो ही सहारा होता था | अख़बारों में भी उतनी विस्तार से खबरें नहीं आती थीं | जर्मनी के हमले की आशंका भी नहीं थी | लेकिन जरूरी चीजों का अभाव था | जो स्थानीय सैनिक अंगरेजी सेना के सदस्य बनकर विदेशों में लड़ने गये उनकी कुशलता जरुर चिंतित किया करती रही लेकिन अपनी जान  का खतरा नहीं होने से जीवन  सहज रूप से चलता रहा | वह  महायुद्ध छह वर्ष चला था | पिताजी ने उससे जुडी और भी बातें बताईं लेकिन सबसे बड़ी बात उनने ये बताई कि जैसा डर कोरोना का है ऐसा उनने कभी नहीं देखा | 

उनकी बात थी भी सही | दुनिया के नष्ट होने की भविष्यवाणियां समय समय पर होती रही हैं | लेकिन बजाय  डरने के लोग उसका मजा लेते हैं | टीवी चैनल तो इस तरह की खबरों का व्यापार ही  करते हैं | लेकिन कोरोंना अब वास्तविक खतरा बनकर आया है | अरबों - खरबों के अस्त्र शस्त्र गोदामों में धुल खाते रह गए और एक अदृश्य वायरस ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेकर विश्व युद्ध से भी बदतर हालात पैदा कर दिए | विज्ञान को अपने बस में करने का दावा करने वाले मुल्कों में जिस पैमाने पर लाशों के ढेर लगे वह चौंकाने के साथ ही नई चिंताएं पैदा कर  रहा है | 

कहती हैं कोरोना  का टीका तैयार होने वाला है | लेकिन तब तक ज़िन्दगी की गारंटी नहीं है | भारत जैसे देश में तो सब वैसे ही भगवान भरोसे चलता है | ऐसे  में ये सवाल पैदा हो गया है कि भले ही कोरोना जैविक यूद्ध के लिए तैयार किया वायरस न हो लेकिन इसने मानवता विरोधी मानसिकता वाले देशों के सिरफिरे शासकों को एक रास्ता दिखा दिया दुनिया को तबाह करने का | 

परमाणु हथियारों से पैदा हुआ खतरा कोरोना के सामने बौना नजर आ रहा है | बिना एक भी गोली चले और सेना के आगे बढ़े ही हजारों मारे जा चुके हैं और लाखों उसकी चपेट में आकर मौत से जूझ रहे हैं | अमेरिका और चीन एक दुसरे को  को कोरोना  के लिए दोषी  बता  रहे है | लेकिन इस सबसे अलग हटकर उत्तर कोरिया के किम जोंग जैसे तानाशाह यदि दुनिया को इस नई जंग में झोंकने पर आमादा हो गये तब क्या होगा ये वैश्विक चिंता का विषय होना चाहिए | एक वायरस क्या कर सकता  है ये दुनिया देख और भुगत रही है |

मजाक - मजाक में एक कहावत का उपयोग होता है कि बुढ़िया मर गई इसकी चिंता नहीं | डर इस बात का है मौत ने घर देख लिया | 

कोरोना अब तक जितनी जानें निगल गया उससे ज्यादा खतरा इस बात का है कि इसने भावी विश्व युद्ध के तौर तरीके दुनिया को बता दिए |

आलेख - रवीन्द्र वाजपेयी 

कमलनाथ : महत्वाकांक्षा भले पूरी हो गई लेकिन ....

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मेरी नजर में कमलनाथ कभी भी मप्र के नैसर्गिक नेता नहीं बन सके। इंदिरा जी ने उन्हें छिन्दवाड़ा की सियासी जागीर सौंपी थी। जिसकी उनने अच्छी तरह देखभाल की ये स्वीकार करना पड़ेगा।  लेकिन अगल - बगल के जिलों के प्रति उनका रवैया उपेक्षापूर्ण ही रहा। यही वजह है कि वे छिन्दवाड़ा के बाहर उतने प्रभावशाली नहीं रहे। कमलनाथ बीते 40 साल से मप्र की राजनीति में हैं लेकिन उसके बाद भी छिन्दवाड़ा में उनका किसी पर इतना विश्वास नहीं रहा कि वे उसे अपनी सीट पर बिठा देते। हवाला काण्ड के चलते जब टिकिट कटी तब उन्होंने बजाय किसी कांग्रेस नेता के अपनी गैर राजनीतिक पत्नी को लोकसभा हेतु लड़वाया जो जीत भी गईं। बाद में उनसे इस्तीफा दिलवाकर खुद लोकसभा में जाने के लिए उपचुनाव करवाया लेकिन उस समय के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की चालों के कारण कमलनाथ को हार का सामना करना पड़ा। भाजपा के कद्दावर नेता सुन्दरलाल पटवा ने उन्हें शिकस्त दी थी। हालाँकि अगले चुनाव में वे पुन: जीते। 2018 में वे मप्र के मुख्यमंत्री बन गए पर लोकसभा सीट उन्होंने अपनी मु_ी में रखी तथा अपने बेटे नकुल नाथ को टिकिट दिलवा दी। चूँकि नरेंद्र मोदी छिंदवाड़ा नहीं आये इसलिए नकुल मामूली अंतर से जीत गए। लेकिन ये बात एक बार फिर उजागार हो गयी कि छिंदवाड़ा के कांग्रेसियों ने भले ही बाहरी होने के बावजूद कमलनाथ पर आँख मूंदकर विश्वास किया किन्तु उन्हें आज भी वहां के लोगों पर यकीन नहीं रहा वरना लोकसभा सीट पर बजाय अपने बेटे के वे किसी कांग्रेसी नेता को उतारते। कल मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कमलनाथ का कद निश्चित्त रूप से छोटा हो गया। वैसे वे जिस दिन प्रदेश के मुखिया बने उसी दिन उनकी छवि राष्ट्रीय से प्रांतीय हो चुकी थी। बीते सवा साल में भी वे केवल मुख्यमंत्री रहे। मप्र के जनमानस पर भी कोई छाप नहीं छोड़ सके क्योंकि उनका स्थानीय लोगों से यहाँ तक कि कांग्रेसियों से भी जमीनी रिश्ता कभी नहीं रहा। अपने चंद प्रबंधकों के माध्यम से वे सियासत को रिमोट कंट्रोल से चलाते रहे। हाँ , एक बात जरुर थी कि उन्होंने अपनी सम्पन्नता का काफी पेशेवर तरीके से उपयोग करते हुए छिन्दवाड़ा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में अपना आभामंडल बनाये रखा। प्रदेश की सत्ता से बेदखल होने के बाद अब वह आभामंडल बरकरार रखना उनके लिये मुश्किल हो जाएगा। भाजपा ने जिस तरह से गुना में ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरा था और चुरहट में अजय सिंह राहुल का नूर उतारा बैठने ही अब छिंदवाड़ा उसका अगला निशाना होगा। कमलनाथ भले ही पूरी तरह धराशायी नहीं हुए हों लेकिन अब वे उस बूढ़े शेर की मानिंद होकर रह गये हैं जिसके नाखून और दांत घिस चुके हैं और वह खुद होकर शिकार करने की स्थिति में नहीं रहा। जब तक कमलनाथ ने खुद को केंद्र की राजनीति तक सीमित रखा तब तक दिग्विजय सिंह को वे प्रिय रहे लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही राघोगढ़ नरेश उनको पचा नहीं पा रहे थे। सरकार चलाने में दिग्विजय सिंह की दखलंदाजी का कमलनाथ ने सीधा विरोध नहीं किया लेकिन कुछ मंत्रियों से श्री सिंह पर हमले करवाए जिसके कारण दोनों में दूरी बढ़ी। जहां तक बात श्री सिंधिया की है तो उनके कमलनाथ से आत्मीय रिश्ते थे। दोनो गांधी परिवार के करीबी माने जाते थे। लेकिन दिग्विजय सिंह ने इन दोनों के बीच खाई बना दी जिसे वे निरंतर चौड़ा करते रहे। कमलनाथ सरकार चलाने में मशगूल रहे और दिग्विजय अपना और अपने बेटे का राजनीतिक भविष्य संवारने में जुट गये। अपने अनुज विधायक लक्षमण सिंह से सरकार विरोधी बयान दिलवाना राघोगढ़ परिवार का खेल था जिसे कमलनाथ समझ ही नहीं सके। यही वजह थी कि बागी विधायकों से उनका कोई संपर्क नहीं होने पाया और वे पूरी तरह दिग्विजय सिंह पर निर्भर रहे जिन्होंने काम बनाया कम बिगाड़ा ज्यादा। यद्यपि बतौर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अनेक साहसिक और सुधारवादी फैसले किये। विकास के प्रति ललक भी उनके कामों में झलकी लेकिन नौकरशाही के तबादलों को दैनिक कार्य बना लेने की वजह से वे प्रशासनिक ढांचे में स्थिरता और कसावट नहीं ला सके। उलटे नौकरशाही उनसे नाराज होती चली गई। ऐसा उनने दिग्विजय के दबाव में किया या ये उनका निर्णय था ये स्पष्ट नहीं हो सका परन्तु इससे उनकी छवि खराब हुई। उनकी एक कमजोरी छिंदवाड़ा के प्रति अतिरिक्त प्रेम भी रही। बतौर मुख्यमंत्री अपने क्षेत्र को विकसित करना गलत नहीं था लेकिन ऐसा करते समय वे बाकी जिलों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दे सके। और जो कुछ किया भी वह जमीन पर नहीं उतर सका। हालांकि अभी भी वे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर जाने जायेंगे लेकिन शिवराज सिंह जैसी गतिशीलता और दिग्विजय सिंह जैसा व्यापक सम्पर्क न होने के कारण वे अभूतपूर्व नहीं बन सके। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनके सत्ता से हटते ही उनका दौर भी खत्म होने को आ गया। यहीं नहीं तो मप्र में कांग्रेस एक बार फिर वहां लौट गई जहां उसे दिग्विजय सिंह ने 2003 में लाकर छोड़ा था। कमलनाथ और दिग्विजय का उम्रदराज होना , राहुल सिंह का पराजित योद्धा बन जाना, अरुण यादव का महत्वहीन हो जाना और इनके अलावा किसी अन्य नेता की प्रादेशिक स्तर पर पहिचान नहीं होने से कांग्रेस अब बिखरी हुई सेना बनकर रह गई है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को हाशिये  पर धकेलने की दिग्विजय सिंह की चालबाजी पार्टी को कितनी महंगी पड़ी ये बताने की जरूरत नहीं है। आखिऱी दिनों में भाजपा नेताओं के विरुद्ध बदले की कार्रवाई, राजनीतिक नियुक्तियां और अधिकारियों के ट्रान्सफर जैसे कदमों ने कमलनाथ की घबराहट उजागर कर दी थी। वे चाहते तो गरिमामय तरीके से सत्ता छोड़ सकते थे लेकिन उससे चिपके रहने का जो प्रयास किया उस वजह से उनकी भद्द पिट गयी। आखिर में तो वे इतने हताश हो गये कि विधानसभा का सामना करने का साहस तक नहीं बटोर सके। भले ही मुख्यमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा पूरी हो गई हो लेकिन प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में उनका उल्लेख आधे पन्ने से ज्यादा नहीं होगा और वह भी बतौर एक मजबूर सेनापति के जो अपने ही सैनिकों से घिरकर पराजित हो गया।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 20 March 2020

निर्भया काण्ड : दरिंदों के प्रति उदारता की भी सीमा हो



जब सारा देश सो रहा था तब सर्वोच्च न्यायालय खुला हुआ था। इसकी वजह राष्ट्रीय महत्व का कोई मामला न होकर चार बलात्कारियों की फाँसी रुकवाने की याचिका पर विचार करना था। आज सुबह निर्भया काण्ड के चारों दोषियों को लटकाना तय था। दिल्ली की जेल में जल्लाद भी आ चुका था। लेकिन दोषियों के वकील ने कल उच्च न्यायालय में अर्जी लगाकर फाँसी रुकवाने का दांव चला किन्तु उसे निराशा हाथ लगी। न्यायालय ने याचिका के साथ जरूरी दस्तावेज न होने पर ऐतराज जताया तो वकील साहब ने हास्यास्पद बहाने बनाते हुए फांसी टलवाने की गुहार लगाई। तब भर भी बात नहीं बनी तो सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेने का पैंतरा चला गया और न्याय में विलम्ब के लिए जानी जाने वाली हमारे देश की न्यायपालिका का सर्वोच्च प्रतिष्ठान आधी रात को तैयार होकर बैठ गया उन चार लोगों की अर्जी सुनने जिन्होंने दरिंदगी की सीमाएं तोड़ दीं। निर्भया काण्ड के वृत्तांत को दोहराने का कोई मतलब नहीं क्योंकि उसके बारे में इतना ज्यादा कहा, लिखा और पढ़ा जा चुका है कि वह अपने आप में एक इतिहास बनकर रह गया। आखिऱकार सर्वोच्च न्यायालय ने अर्जी ठुकरा दी और आज सुबह जब देश जागा तब तक वे चारों अपने किये की सजा पा चुके थे। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय आधी रात को क्यों खुला और देर रात तक उसने उन चार लोगों की सुनवाई क्यों की जिनका अपराध जघन्यतम की श्रेणी से भी ज्यादा जघन्य था। और जवाब में सुनाई दिया कि हमारी न्यायपालिका पूरी दुनिया को ये संदेश देना चाहती है कि वह न्याय प्रदान करने के मामले में बेहद उदार है और हरसंभव अवसर फरियादी को देती है। कुछ बरस पहले याकूब मेनन नामक आतंकवादी की फाँसी रुकवाने के लिए भी सर्वोच्च न्यायालय इसी तरह देर रात से भोर तक खुला रहा और याचिका नामंजूर किये जाने के कुछ घंटे बाद ही याकूब भी तख्ते पर लटक गया। कहते हैं न्याय होना ही नहीं होते हुए दिखना भी चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय की सम्वेदनशीलता उसी को प्रतिबिंबित करती है। लेकिन इस सदाशयता से एक नकारात्मक संदेश भी निकलता है। निर्भया कांड के दोषियों को 7 साल, 3 महीने, 4 दिन बाद उनके किये की सजा मिली। उनकी फाँसी कितनी बार टली ये भी लोग भूल चुके होंगे। दया याचिका के नाम पर अदालतों से राष्ट्रपति भवन तक जितनी कवायद हुई वह दोषियों के वकीलों की पेशेवर दक्षता का परिचायक है या हमारी न्याय व्यवस्था की कमजोरी, ये बहस का विषय है। किसी बेकसूर को सजा मिलना निश्चित रूप से कानून के नाम पर धब्बा होता है। और फिर मृत्युदंड मिलने के बाद तो गलती सुधारने का अवसर भी नहीं होता। इसीलिये निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय और उसके बाद भी राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगाने का प्रावधान है। लेकिन इसका दुरूपयोग नरपिशाचों की मौत को टलवाने के लिए जिस तरह किया जाता है, संदर्भित प्रकरण उसका जीता-जागता उदाहरण है। निर्भया काण्ड के दोषी अब दुनिया में नहीं रहे। थोड़े दिनों की चर्चा के बाद समूचा प्रकरण लोगों की स्मृति से लुप्त हो जायेगा। क़ानून के छात्र भले इसका अध्ययन करें किन्तु आम जनता में आज के बाद निर्भया काण्ड के प्रति रूचि घटते-घटते खत्म हो जायेगी। दोषियों के वकील और देश की न्याय प्रणाली भी उसे भूलकर अपने काम में लग जायेगी। जो टीवी चैनल निर्भया की बिलखती माँ को दिखाकर अपनी टीआरपी बढ़ाया करते थे वे भी दूसरे मुद्दों की तलाश में लग जायेंगे। लेकिन ये काण्ड अनेक ऐसे सवाल छोड़ गया है जिनका उत्तर तलाशकर न्याय प्रणाली में व्याप्त उन छिद्रों को भरना जरूरी है जिनका लाभ उठाकर दरिन्दे मौत से बचते रहे। इसके लिए अदालतों और न्यायाधीशों को दोषी ठहराना ही काफी नहीं है क्योंकि जघन्यतम अपराधों के कसूरवारों को उनके किये की सजा देते समय भी हमारी न्याय व्यवस्था अपनी चिर परिचित शैली में काम करती है। ये ठीक है कि हर मामले में विशेष अदालत नहीं बनाई जा सकती और जिस मामले में मृत्युदंड की सम्भावना हो उसमें अदालतों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होती है। लेकिन निर्भया काण्ड के अंजाम तक पहुँचने में लगा समय और दोषियों को बचाने के लिए उनके वकील द्वारा चली गयी चालों ने हमारी न्यायपालिका की निरीहता को उजागर कर दिया। शायद ही इसके पहले किसी फाँसी की तारीख तय होने के बाद इतनी बार आगे सरकाई गयी होगी। ऐसे में डर इस बात का है कि भविष्य में भी बलात्कार या उस जैसे ही किसी अपराध में मृत्युदंड पाने वाले को बचाने के लिए उसके अधिवक्ता निर्भया कांड में आजमाए गए कानूनी दांव पेचों को दोहराने का भरपूर प्रयास करंगे और हमारी न्याय प्रणाली सब कुछ जानते हुए भी लाचार बनी रहेगी। जिस या जिन वकीलों ने निर्भया के दोषियों को फाँसी के तख्ते पर लटकने से बचाने के लिये अपने विधिक ज्ञान का उपयोग किया, उनका व्यवसाय हो सकता है और चमक जाए। लेकिन उन्हें अपने बारे में जनता द्वारा व्यक्त की गयी प्रतिक्रियाओं का भी संज्ञान लेना चाहिए। उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि वे पहले एक मनुष्य हैं और बाद में वकील। किसी की जान बचाने के लिये अपने ज्ञान और क्षमता का उपयोग करना स्वागतयोग्य है लेकिन किसी नर पिशाच को जीवित रखने में सहायक बनना गैर मानवीय है। इसके पहले कि निर्भया काण्ड कानून की किताबों में कैद होकर विस्मृति का शिकार हो जाए, इस बारे में गम्भीर चिंतन जरूरी है कि जघन्यतम अपराध करने वालों को आखिर कितने अवसर दिए जाने चाहिए ? हमारे देश की न्याय प्रणाली में उदारता और मानवीयता का जो गुण है वह अपनी जगह ठीक है लेकिन उसका लाभ उठाते हुए यदि राक्षसी मानसिकता के हौसले बुलंद हों तब उसे बदलने की जरूरत है। इस दिशा में सोचने और कुछ करने का ये सही अवसर है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 March 2020

संवैधानिक पद : अधिकार ही नहीं मर्यादा भी याद रहे




मप्र की राजनीति बड़े ही नाटकीय मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। साम , दाम दंड , भेद सभी उपायों को खुलकर आजमाया जा रहा है। मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाने के बाद भी सडकों पर राजनीति का नुक्कड़ नाटक बदस्तूर जारी है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कांग्रेस के बागी विधायकों को मनाने सदल - बल बेंगुलुरु जा पहुंचे लेकिन उनकी कोशिश बेकार साबित हुई। विधायकों ने वीडियो जारी करते हुए उनसे मिलने से साफ मना कर दिया। ऊपर से पुलिस ने गिरफ्तार किया सो अलग। प्रचार जरुर उन्हें मिल गया हो लेकिन बागी विधायकों ने जिस तरह से उनका तिरस्कार किया उससे एक बात फिर उजागर हो गयी कि कमलनाथ सरकार को खतरे में डालकर कांग्रेस के लिए मुसीबत पैदा करने में दिग्विजय सिंह का ही हाथ रहा। उनको कहीं जाने आने की पूरी आजादी है लेकिन इस तरह की गतिविधियों से पूर्व मुख्यमंत्री हंसी के पात्र बनने लगे हैं। इसी तरह भोपाल में चल रहे जवाबी राजनीतिक दांव पेंचों का कोई औचित्य नहीं है। जब दोनों पक्ष सर्वोच्च न्यायलय जा पहुंचे हैं और वहां सभी विवादित मुद्दों पर बहस चल रही है तब अदालत के बाहर होने वाली नौटंकीनुमा राजनीति किसी काम की नहीं कही जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय में सभी पक्ष अपने-अपने तर्क रखते हुए खुद को पाक-साफ और दूसरे को गलत ठहराने में लागे हैं। आज भी सर्वोच्च न्यायालय में जो प्रश्न उठाए गये वे अधिकतर इस बात पर केन्द्रित थे कि क्या राज्य विधानसभा अध्यक्ष के जो संवैधानिक अधिकार हैं उनमें हस्तक्षेप किया जा सकता है ? न्यायाधीशों ने राज्यपाल द्वारा जारी फ्लोर टेस्ट के आदेश का पालन न किये जाने पर सवाल उठाते हुए अध्यक्ष द्वारा शेष 16 बागी विधायकों के इस्तीफे पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये विचार करने के बारे में सहमति माँगी गयी जिसे उनके अधिवक्ता ने नकार दिया। अदालत क्या फैसला देती है इस पर सभी की निगाहें लगी हैं। लेकिन इस सबके बीच एक बात जो सामने आई वह है संवैधानिक पदों पर विराजमान लोगों के असीमित विशेषाधिकार जिसके आधार पर वे स्वच्छन्द हो जाते हैं। नियन्त्रण और संतुलन का जो सिद्धांत ऐसी परिस्थितियों में ध्यान रखा जाना चाहिए है उसे पूरी तरह से उपेक्षित किया जाने लगा है। संविधान निर्माताओं ने जब संवैधानिक पदों के विशेषाधिकार निश्चित किये तब उनके मन में पक्ष - विपक्ष में बैठे देश के तत्कालीन राजनीतिक व्यक्तित्वों का चित्र था जो राजनीतिक नफे नुक्सान से उपर उठकर लोकतंत्र और देश के बारे में सोचते थे। उनका सोच और आचरण दोनों गरिमामय होता था और लोकनिंदा से उन्हें डर भी लगता था। संविधान सभा को भरोसा था कि इन विशेषाधिकारों का भस्मासुर को मिले वरदान की तरह दुरूपयोग नहीं होगा। आजादी के कुछ दशकों तक तो संसदीय प्रजातंत्र अपने आदर्श रूप का कुछ हद तक प्रदर्शन करता रहा लेकिन सत्तर के दशक के बाद से राजनीति में शुचिता , पवित्रता , मर्यादा , गरिमा ,और सबसे बढ़कर तो शर्म खत्म ही हो गयी। अधिकारों के नाम पर जो कुछ भी हुआ और हो रहा है वह पूरी तरह से स्वेच्छाचारिता है और इसीलिये बात - बात में अदालतों की शरण लेने की नौबत आ जाती है। मप्र में बीते एक सप्ताह के भीतर संविधान को जिस तरह से फुटबाल बनाकर लतियाया गया उसके बाद अब ये सोचने का वक्त आ गया है कि राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों को पुन: परिभाषित किया जाना चाहिए। यही नहीं तो इस जैसे दूसरे पदों के अधिकारों की भी समीक्षा हो। आज सर्वोच्च न्यायालय में विधानसभा अध्यक्ष की ओर से अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा यहाँ तक कहा गया कि अध्यक्ष के क्षेत्राधिकार में न्यायपालिका का हस्तक्षेप भी मान्य नहीं है। राज्यपाल के आदेश को लेकर भी अध्यक्ष की ओर से यही बात कही गई। ये विवाद अब रह - रहकर उठने लगा है। देश में बहुदलीय लोकतंत्र होने से अलग - अलग पदों पर परस्पर विरोधी दलों के लोग नियुक्त होते हैं। उनसे अपेक्षा होती है कि वे दलीय प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर संविधान द्वारा खींची गयी लक्ष्मण रेखा में रहते हुए कार्य करते हुए अपने अधिकारों का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए कर्तव्यों का निर्वहन करें। लेकिन बीते कुछ दशकों में स्थित्तियाँ बिगड़ते - बिगड़ते इस हद तक आ गईं कि अधिकार तो सभी को याद रहते हैं लेकिन उनसे जुड़ी मर्यादाएं और दायित्वबोध के प्रति उदासीन रवैया अपनाया जाता है।  मप्र के राजनीतिक दंगल में पहलवान लड़ते तो वह स्वाभाविक होता लेकिन यहाँ तो निर्णायक ही लंगोट कसकर आपस में उलझ गये हैं। ये हालात दुखद भी हैं और हास्यास्पद भी। विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल दोनों सम्मानित पद हैं। लेकिन उनके बीच चल रहा विवाद राजनीति को सब्जीमंडी के माहौल से भी बदतर साबित करने के लिए पर्याप्त है। कभी-कभी तो लगता है इन सफेद हाथियों की जरूरत ही क्या है ? विधानसभा का अध्यक्ष लोकतंत्र के मंदिर का संरक्षक होता है। वहीं राज्यपाल प्रदेश का शासन संविधान के अनुरूप चले इसकी निगरानी के लिए नियुक्त होते हैं। संविधान ने दोनों के अधिकार और सीमाएं भी तय कर रखी हैं। ऐसे में बेहतर हो ऐसे पदों के बीच सार्थक संवाद के माध्यम से संतुलन बना रहे लेकिन जातिगत छुआछूत मिटाने का दावा करने वाले राजनेताओं ने राजनीतिक छुआछूत रूपी नई बीमारी ऊपर से नीचे तक फैला रखी है। मप्र बीते अनेक दिनों से इसी से संक्रमित है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 March 2020

गोगोई : अब बात निकल ही पड़ी है तो .....





पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा में मनोनयन पर उठा विवाद बड़ा ही महत्वपूर्ण है। न्यायपालिका के उच्च पदों से निवृत्त होने के बाद किसी पद पर नियुक्ति का ये पहला मामला नहीं है। अनेक संवैधानिक और अन्य पदों पर केवल सेवानिवृत उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ही नियुक्त होते हैं। लोकपाल और लोकायुक्त के अलावा प्रेस काउन्सिल ऑफ  इंडिया सहित मानवाधिकार आयोग और उस जैसे अनेक संस्थानों में पूर्व न्यायाधीश की नियुक्ति अनिवार्य है। इन सब पर चयन राज्य या केंद्र की सरकारें ही करती हैं। तो क्या ये सभी राजनीति से प्रभावित नहीं हैं? अनेक विश्वविद्यालयों के कुलपति भी पूर्व न्यायाधीश बनाये गये। विभिन्न जांच आयोगों में भी उनकी नियुक्ति होती रही है। अब सवाल ये है कि क्या जब भी इस तरह की नियुक्ति होगी सम्बन्धित पूर्व न्यायाधीश की ईमानदारी और निष्पक्षता पर उंगलियां नहीं उठेंगीं ? श्री  गोगोई के मनोनयन की उनके साथ पत्रकार वार्ता में बैठे सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसफ  ने तो आलोचना की ही लेकिन उन मार्कंडेय काटजू ने भी तीखे शब्द इस्तेमाल किये जो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय से निवृत्ति उपरान्त प्रेस काउन्सिल ऑफ  इंडिया के अध्यक्ष के रूप में सरकारी सुविधाओं  के साथ रुतबे का लाभ उठा चुके हैं। वर्तमान में देश भर में न जाने कितने पूर्व न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद शासन द्रारा प्रदत्त किसी न किसी ऊंचे ओहदे पर बैठकर अच्छा खासा वेतन, सुविधाएं और रुतबे का मजा लूट रहे हैं। अब चूँकि श्री गोगोई की नियुक्ति पर विवाद उठ खड़ा हुआ है तो बेहतर होगा बाकी नियुक्तियों की भी विधिवत समीक्षा की जावे जिससे देश को ये पता चले कि न्याय की आसंदी से उतरकर कौन-कौन से मी लार्ड सरकारी खैरात का फायदा उठाते हुए बुढ़ापे का आनन्द ले रहे हैं। लगे हाथ ये भी स्पष्ट होना चाहिए कि देश के तमाम उच्च न्यायालयों के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय में पदस्थ वर्तमान न्यायाधीश किस राजनेता या न्यायाधीश के परिवार से हैं ? इस तरह के विवाद केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहें  और उनसे व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियां दूर हो सकें  तो ये देशहित में होगा। रंजन गोगोई राज्यसभा की सदस्यता लेने के बाद क्या कहने वाले हैं ये सभी सुनना चाहेंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

विधायकों को मतदाताओं से दूर रखना मौलिक अधिकार का हनन




मप्र की राजनीति में जो कुछ भी हो रहा है उसे देखकर हंसी भी आती है और दु:ख भी होता है। दोनों पक्षों की तरफ  से नैतिकता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की दुहाई दी जा रही है लेकिन इनके प्रति आस्था कहीं भी नहीं दिखाई देती। यदि कमलनाथ के पास बहुमत है तो बजाय कोरोना की आड़ लेकर मुकाबले से बचने के उन्हें उसे साबित करना था। और यदि नहीं है तो बिना लागलपेट के इस्तीफा देते हुए विपक्ष में आ बैठते। इसी तरह भाजपा भी जिन 22 विधायकों को बेंगुलुरु में बिठाये हुए है उन्हें भोपाल लाकर विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष पेश कर देती तो अब तक अनिश्चितता दूर हो जाती। विधानसभा अध्यक्ष भी पूरी तरह से दलीय राजनीति का हिस्सा बने दिखाई दे रहे हैं। 22 बागी विधायकों में से 6 के इस्तीफे उनके वीडियो देखकर उन्होंने स्वीकार कर लिए लेकिन बाकी के बारे में उनकी नीति और नीयत दोनों समझ से परे हैं। राज्यपाल महोदय संविधान के मुखिया के तौर पर हैं लेकिन उनको भी कोई निष्पक्ष नहीं मान रहा। उनके स्पष्ट निर्देशों की मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष दोनों ने खुले आम धज्जियां उड़ा दीं लेकिन वे ये कहते हुए रह गये कि मुझे आदेशों का पालन करवाना आता है। भाजपा सर्वोच्च न्यायालय में लोकतंत्र बचाने के नाम पर जा पहुंची तो पीछे - पीछे कांग्रेस ने भी बागी विधायकों को बेंगुलुरु से लाने के लिए अदालत में अर्जी लगा दी। उधर बेंगुलुरु में बैठे विधायक वहां क्यों रुके हैं इसका जवाब भी किसी के पास नहीं है। उनके जो वीडियो सामने आये उनमें वे किसी दबाव से मुक्त होकर स्वेच्छा से ठहरे होने की बात दोहरा रहे हैं किन्तु उनके पास इस बात का कोई ठोस आधार नहीं है कि वे लौट क्यों नहीं रहे ? विधायकों को दूसरे राज्य में जाकर छिपने की क्या जरूरत पड़ गई इसका जवाब कोई नहीं दे पा रहा। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा ने उन्हें जबरन बंधक बना रखा है। मुख्यमंत्री ने तो ये तक कहा कि वे सब अपने घर लौट आयें और खुली हवा में सांस लें उसके बाद फिर वे विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेंगे। लेकिन ये आरोप तो कांग्रेस पर भी है कि वह अपने विधायकों को अकेला नहीं छोड़ रही। यदि उनकी निष्ठा असंदिग्ध है तो पहले जयपुर और अब भोपाल के एक आलीशान होटल में उन्हें क्यों बिठा रखा है ? इसी तरह भाजपा भी अपने विधायकों को बटोरकर एक साथ रखे हुए है। कुल मिलाकर अविश्वास पूरे माहौल पर हावी है। न कोई नैतिक है और न ही निष्पक्ष। एक पक्ष सत्ता हासिल करने के लिए मरा जा रहा है तो दूसरा उससे चिपके रहने के लिए किसी भी हद तक जाने को आमादा है। संख्या बल हाथ से खिसक जाने के बाद भी बीते दो - तीन दिनों में जिस तरह से प्रशासनिक और राजनीतिक नियुक्तियां की गईं वे लूट सके सो लूट वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है। इस सबके लिए किसी एक को कसूरवार ठहराना तो अन्याय होगा क्योंकि सभी पक्ष किसी न किसी रूप में लोकतंत्र का चीरहरण करने पर आमादा हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपने विधायकों को भेड़-बकरी जैसा बना दिया है। बीते 10-15 दिनों से वे अपने मतदाताओं और परिजनों से दूर हैं। भोपाल से सर्वोच्च न्यायालय तक संविधान के पालन और उल्लंघन की चर्चा चल रही है लेकिन प्रदेश के करोड़ों मतदाता अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधि से जबरन दूर किये जाएं तो क्या ये उनके मौलिक आधिकारों का हनन नहीं है ? मामला चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में है इसलिए होगा तो वही जो वह चाहेगा लेकिन इस समूचे विवाद में जो मतदाता इस संसदीय प्रजातंत्र का आधार है उसकी न कोई भूमिका है और न ही पूछ-परख। हमारे देश में ये स्थिति गाहे बगाहे किसी न किसी राज्य में बनती ही रहती है इसलिए आम जनता भी उसे गंभीरता से नहीं लेती लेकिन अब उसे भी सामने आना चाहिए। जनप्रतिनिधि अपनी राजनीतिक पार्टी के प्रति वफादार रहें ये तो जरूरी है लेकिन इस दौरान जनता पूरी तरह उपेक्षित कर दी जाए ये कहां का लोकतंत्र है?

- रवीन्द्र वाजपेयी