Saturday, 28 March 2020

सरकार के साथ ही समाज भी ऐसे लोगों की मदद करे



समाचार माध्यमों में उन प्रवासी मजदूरों का सिर पर गठरी रखे हुए अपने गांव-देस की तरफ  पैदल ही चल पडऩे के चित्र देखकर हर सम्वेदनशील इंसान की आँखें नम हो उठीं। गुजरात और दिल्ली से निकलकर बिहार जैसे सुदूर राज्य तक छोटे बच्चों को साथ लिए चल पडऩे की ये मजबूरी किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य के लिए लज्जा का विषय होना चाहिए। यद्यपि ये समय आलोचना और आरोपों का नहीं है लेकिन मुफलिसी का शिकार इन बेसहारा लोगों की ये बेबसी समाज की सम्वेदनशीलता पर भी प्रश्नचिन्ह है। दिल्ली , अहमदाबाद और सूरत जैसे बड़े शहरों में हजारों क्या लाखों धनकुबेर और सैकड़ों समाजसेवी संस्थाएं हैं। ये श्रमिक किसी कारखाने या निर्माण कार्य में मजदूरी करते थे। काम बंद होने से उनके सामने पेट भरने की समस्या पैदा हो गयी। लॉक डाउन ने समस्या और बढ़ा दी। ऐसे में उनको चारों तरफ  अन्धकार और असुरक्षा नजर आई और उसके कारण वे अपने मूल स्थान के लिए पैदल ही निकल पड़े। रास्ते में गुजरने वाले किसी वाहन में भी उनको इसलिए लिफ्ट नहीं मिल रही क्योंकि हर किसी के मन में कोरोना का खौफ  जो समा चुका है। जब चौतरफा हल्ला मचा तब सरकार जागी और अब जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक उन्हें रहने के लिए धर्मशालाओं आदि में व्यवस्था की जा रही है और वहीं उन्हें भोजन दिया जावेगा। लेकिन इतने लोगों का एक साथ समूह में रहना भी संक्रमण के फैलाव की वजह बन सकता है। चूँकि ये सब अलग-अलग परिवारों के हैं इसलिए किसी को ये नहीं पता कि उनमें से कौन सुरक्षित है कौन नहीं। कुपोषण की वजह से ऐसे लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अपेक्षाकृत कम ही होती है। दिल्ली सरकार ने रैन बसेरों में इनके रहने और भोजन का नि:शुल्क प्रबंध किया था लेकिन वहां भारी भीड़ उमडऩे के कारण बइन्तजामी फैैल गई। बताते हैं किसी शरारती ने ये अफवाह उड़ा दी कि दिल्ली और उप्र की सीमा पर कहीं से स्पेशल बसें चलने वाली हैं और ये सुनते ही भीड़ वहां भागी लेकिन निराशा हाथ लगते ही कोई रास्ता नहीं होने पर लोग पैदल ही चल पड़े। इसे लेकर सोशल मीडिया सहित अभिव्यक्ति के अन्य मंचों पर सरकार की जमकर खिंचाई हो रही है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोगों का पलायन और वह भी ऐसी विकट परिस्थिति में निश्चित रूप से दुखद है। केंद्र और राज्य की सरकारों ने तो इसका संज्ञान लेना शुरू किया है लेकिन समाज को भी देखना चाहिए कि ऐसे किसी भी जरूरतमंद की सहायता करने वह आगे आये। हालांकि देश भर से जो खबरें मिल रही हैं उनके अनुसार तो सहायता करने वाली संस्थाएं सामने आ रही हैं लेकिन इस कार्य में निरन्तरता की जरूरत है। ऐसे समय ही किसी समाज की चारित्रिक दृढ़ता और परोपकारी प्रवृत्ति सामने आती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

शिक्षण संस्थानों में 30 जून तक अवकाश कर दिया जावे



कोरोना वायरस के कारण तीन सप्ताह का लॉक डाउन आधा अप्रैल बीत जाने के बाद समाप्त होगा। इसके बाद विद्यालय स्तर के शिक्ष्ण संस्थानों में नए सत्र की शुरुवात होगी। लेकिन तब तक कोरोना का चक्र पूरी तरह टूट चुका होगा ये सोचकर निश्चिन्त होना मूर्खता होगी। पुरानी व्यवस्था में मार्च और अप्रैल में परीक्षा होने के बाद 30 अप्रैल को परीक्षाफल आ जाता था तथा पूरी मई और जून महीने ग्रीष्मावकाश रहता था। एक जुलाई से नए सत्र का शुभारम्भ होता था। लेकिन नई व्यवस्था में अब विद्यालयीन सत्र अप्रैल के प्रथम सप्ताह से शुरू होकर मई तक चलाया जाता है और केवल जून माह में अवकाश रहता है। कहा जाता है कि इसके पीछे निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों द्वारा सत्र के आरम्भ में मिलने वाले प्रवेश शुल्क के साथ ग्रीष्मावकाश की फीस अग्रिम रूप से वसूल लेने की सोच है। बहरहाल अब ये व्यवस्था लागू हो चुकी है जिसके कारण मई की भीषण गर्मी में भी बच्चों को विद्यालय जाना होता है। जहां तक जून की छुट्टी का सवाल है तो देश के अनेक हिस्सों में पहले सप्ताह से ही मानसून पूर्व का माहौल बनने लगता है। केरल में एक , मुम्बई में सात और नागपुर होते हुए मध्यप्रदेश आदि में 15 जून तक बरसात का आगमन अमूमन हो ही जाता है। भारत में गर्मियों की छुट्टियां नाना - नानी के घर जाने का पर्याय होती थी लेकिन नई व्यवस्था ने उस प्रथा में काफी अवरोध उत्पन्न कर दिए। हमारे देश में शादी ब्याह भी अधिकतर गर्मियों में किये जाने के पीछे भी शिक्षण संस्थानों में होने वाला अवकाश ही प्रमुख कारण था। नई शिक्षा और परीक्षा प्रणाली की वजह से शिक्षण सत्र में किये गये परिवर्तन के औचित्य और नुकसान-फायदे को लेकर बहस चला करती है लेकिन इस वर्ष जिस तरह की असाधारण परिस्थित्तियां पैदा हो गईं हैं उनके बाद लॉक डाउन समाप्त हो जाने पर भी अप्रैल माह में नये शिक्षण सत्र की शुरुवात किये जाने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता। देश भर में लाखों बच्चों का एक साथ घरों से बाहर निकलना नए खतरे का कारण बन सकता है। ये मान लेना गलत होगा कि उस समय तक कोरोना का संक्रमण पूरी तरह से लुप्त हो जाएगा। वैसे भी चिकित्सा जगत ये आशंका जता रहा है कि लॉक डाउन 15 अप्रैल के आगे भी बढ़ाया जा सकता है। कुछ तो जून तक की बात कर रहे हैं। कहने का आशय ये हैं कि हालात असामान्य तौर पर खतरनाक हैं और ऐसे में विद्यालयीन बच्चों की हिफाजत सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और उस दृष्टि से केंद्र सरकार को चाहिए बिना देर लगाए ये घोषणा कर दे कि नया शिक्षण सत्र अब एक जुलाई से प्रारंभ होगा। इससे अभिभावक भी निश्चिंत हो जायेंगे और विद्यालयों का प्रबन्धन भी तदनुसार नये सत्र की योजना बनाने में जुट सकेगा। ये निर्णय जितनी जल्दी हो जाए उतना अच्छा होगा क्योंकि ऐसी स्थितियों में भी अप्रैल के दूसरे हफ्ते में भले ही विद्यालय खुल जाएं किन्तु शायद ही कोई माँ- बाप अपने बच्चे को पढऩे भेजेगा। चूंकि ये स्वास्थ्य संबंधी आपातकाल है इसलिए बाकी सब बातें इस समय अर्थहीन होकर रह गईं हैं। जिस तरह सरकार ने आर्थिक मोर्च पर बीते दो दिनों में अनेक राहत पैकेज घोषित किये ठीक वैसे ही शिक्षण संस्थानों के ग्रीष्मावकाश को भी 30 जून तक बढ़ा दिया जावे। देश के भविष्य को बचाकर रखना बहुत जरुरी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 March 2020

अच्छा कदम : बशर्ते राहत गरीबों तक पहुंचे



जब राजा - महाराजाओं का शासन होता था तब किसी भी विपदा के समय अन्न के भण्डार खोलकर प्रजा के उदरपोषण की व्यवस्था के अलावा राहत कार्य प्रारम्भ कर श्रमिकों को मजदूरी भी दी जाती थी। आज के ज़माने में ये काम चुनी हुई सरकार करती है। जिसका ताजा उदाहरण गत दिवस केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा घोषित किया गया कोरोना राहत पैकेज है। 1.70 लाख करोड़ रु. की मदद से देश के करोड़ों गरीब लोगों के जीवन यापन को आसान बनाने की कोशिश इसके जरिये की गयी है जिसका विवरण समाचार माध्यमों से कल ही प्रचारित हो चुका था। इस पैकेज को राहुल गांधी ने भी सराहा और पहला अच्छा कदम बताया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संकट की इस घड़ी में सरकार का साथ देने का आश्वासन दिया है। 21 दिन का राष्ट्रीय लॉक डाउन घोषित होने के बाद करोड़ों गरीबों और दिहाड़ी मजदरों के समक्ष रोजी-रोटी का जो संकट उत्पन्न हो गया था उसे लेकर विपक्ष ही नहीं बल्कि गैर राजनीतिक तबके ने भी सरकार को आड़े हाथों लिया। ये भी कहा गया कि प्रधानमन्त्री ने बिना किसी पूर्व तैयारी के देश को तीन हफ्ते तक घरों में रहने की हिदायत तो दे दी लेकिन उनकी दैनिक आवश्यकताओं की आपूर्ति कहां से होगी इसका कोई ध्यान नहीं रखा गया। उसका परिणाम ये हुआ कि प्रधानमंत्री का संबोधन खत्म होते ही जनता बाजार में टूट पड़ी। यही आलम दूसरे दिन सुबह भी जारी रहा। हालंकि उसके फौरन बाद प्रशासन हरकत में आया और अब जो खबरें आ रही हैं वे आशा जगाती हैं लेकिन अभी भी सब्जी मंडियों में भीड़ अनुशासन का पालन नहीं कर रही। सरकार ने किराना और दवाई दुकानों के साथ ही दूध तथा पेट्रोल डीजल की आपूर्ति निर्बाध बनाये रखने के लिए उनके विक्रय केंद्र खुले रहने की व्यवस्था भी कर दी जिससे मारामारी थोड़ी कम हुई है लेकिन रसोई गैस सिलेंडर घर-घर पहुँचाने का काम अभी भी अव्यवस्थित है जिससे गैस डीलरों के गोदामों में जनता टूटी पड़ रही है। बावजूद इस सबके लॉक डाउन की वजह से अधिकतर लोग घरों में सिमटकर रह गये जिसके कारण ये विश्वास पैदा हुआ कि भारत इस महामारी पर काबू पाने में कामयाब हो जाएगा। चूंकि सारी दुनिया ये मान चुकी है कि कोरोना को रोकने का एकमात्र तरीका लोगों को आपस में मिलने से रोकना है इसलिए भारत के सामने भी दूसरा रास्ता नहीं था। कम आबादी वाले यूरोपीय देशों तक में जब कोरोंना का कहर टूट पड़ा तब भारत जैसे विशाल आबादी और घनी आवासीय व्यवस्था वाले देश में तो उसको रोक पाना बहुत बड़ी समस्या है। लेकिन भले ही कोई कुछ भी कहे पर सरकार ने समय रहते सख्त कदम उठाकर महामारी के विस्फोट पर तो फिलहाल नियंत्रण कर लिया। अभी तक की रिपोर्ट ये बताती है कि नए संक्रमित लोगों की संख्या बढऩे का प्रतिशत घटा है और जिनका इलाज चल रहा है उनमें से बहुत ही कम की स्थिति चिंताजनक है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार पचास से ज्यादा लोग ठीक भी हुए हैं। लेकिन इसके साथ ही गरीबों और रोज कमाने रोज खाने वालों को राहत देना जरूरी था। इस काम में और देरी होने पर अराजकता फैलने का भय भी था। इसलिए सरकार द्वारा गत दिवस की गयी घोषणाएं न केवल गरीबों के लिए वरन समूचे देश के लिए सुकून देने वाली हैं। इसके कारण दिहाड़ी मजदूर, निराश्रित वृद्ध और बेरोजगार गरीबों को जो सहायता मिलेगी उसकी वजह से समाज में शांति और कानून व्यवस्था बनी रहेगी। इस राहत पैकेज का सबसे बड़ा लाभ ये है कि गरीबों को न सिर्फ मुफ्त और अतिरिक्त राशन बल्कि आगामी तीन महीनों तक नि:शुल्क रसोई गैस दिए जाने के साथ ही उनके बैंक खाते में निश्चित धन राशि जमा करने की व्यवस्था की गयी है। मोदी सरकार ने जब गरीबों के जन - धन खाते खोले थे तब उनके औचित्य और आवश्यकता पर तरह-तरह के सवाल दागे गये किन्तु कोरोना से उत्पन्न हालातों में इन खातों की उपयोगिता प्रमाणित हो गयी। सरकार का काम भी आसान हो गया वरना जरुरतमंदों के हाथ में नगद रूपये पहुंचाने में होने वाली अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की कल्पना सहज रूप से की जा सकती है। लेकिन सरकार का काम इतने मात्र से खत्म नहीं होगा। बैंकों में नगद राशि तो आसानी से जमा हो जायेगी किन्तु मुफ्त राशन और रसोई गैस का वितरण समस्या पैदा कर सकता है। इसकी वजह सर्वविदित है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली जिन राशन दुकानों से संचालित होती है वे भ्रष्टाचार की नर्सरी हैं। इसी तरह रसोई गैस वाले भी ग्राहकों को परेशान करने के लिए कुख्यात हैं। स्थानीय प्रशासन यदि इस व्यवस्था को दुरुस्त कर ले गया तब राहत पैकेज की सफलता सुनिश्चित हो जायेगी और इससे लॉक डाउन को सफल बनाने में भी मदद मिलेगी। एक और मोर्चा जहां सरकार को ध्यान देना होगा वह है लॉक डाउन के दौरान जरूरी वस्तुओं की मुनाफाखोरी को रोकना। सब्जी, फलों तक तो बात समझ में भी आती हैं लेकिन दवाओं पर भी यदि मुनाफाखोरी हो तो ये एक अक्षम्य अपराध होना चाहिए। इसके अलावा निजी अस्पतालों में भी जनता का सस्ता इलाज हो सके इसका प्रबंध भी किया जाए तो सरकारी अस्पतालों का बोझ थोड़ा कम होगा। वैसे इस समय निजी अस्पतालों को भी कमाई की बजाय मानव सेवा के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। सरकार जो राहत दे रही है वह सरकारी योजनाओं से जुड़े गरीबों तक ही पहुंच पायेगी। ऐसे में ये समाज का सामूहिक दायित्व है कि वह ऐसे गरीब लोगों को जो अभी तक सरकारी योजनाओं से बाहर हैं, कम से कम भोजन ही प्रदान करता रहे जिससे कोई भूखा न सोये। कोरोना ने देश को एक नया अनुभव और उसके साथ एक अवसर भी दिया है, परोपकार के आदर्श रूप को प्रस्तुत करने का। सरकार और समाज जब एक साथ जुट जाते है तब बड़ी से बड़ी मुसीबत का सामना आसानी से किया जा सकता है। विश्वास है भारत ऐसा कर दिखाएगा क्योंकि ये उसकी परम्परा भी है और स्वभाव भी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 March 2020

भारत के भविष्य को सुरक्षित और सुखी बनाने का अवसर



कोरोना ने चीन को एक बार फिर दुनिया के सबसे चालाक, धोखेबाज और अविश्वसनीय देश की कतार में सबसे आगे खड़ा कर दिया है। आर्थिक महाशक्ति बन चुके इस देश ने कोरोना वायरस के फैलाव से लेकर उसके बचाव तक की प्रक्रिया को जिस तरह से गोपनीय बनाये रखा उससे उसकी रहस्यमय छवि और मजबूत हो गई है। विगत दिवस उसने दावा किया कि कोरोना संकट पर वह विजय प्राप्त कर चुका है और वहां जनजीवन सामान्य हो चला है। यहाँ तक कि जिस वुहान में कोरोना वायरस ने सबसे पहले हमला किया वहां के कारखानों में उत्पादन शुरू होने के चित्र भी चीन के सरकार नियंत्रित समाचार माध्यमों ने जारी किये। लेकिन इस दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन को वहां की स्थिति का अध्ययन करने की अनुमति न देकर चीन ने एक फिर ये साफ कर दिया कि वह दुनिया को जितना दिखाता है उससे ज्यादा छिपा लेता है। कोरोना से संक्रमित लोगों में से कितनों की मृत्यु हुई इस बारे में शेष विश्व को सही जानकारी नहीं मिल सकी। और शायद मिलेगी भी नहीं क्योंकि ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि मृतकों की जो संख्या उसने प्रचारित की वह ऊँट के मुंह में जीरे जैसी ही है। कहते हैं कोरोना से मरने वालों के शवों को थोक के भाव जला दिया गया। ताजा जानकारी के अनुसार कोरोना के बाद चीन में मोबाईल का उपयोग करने वालों की संख्या अचानक 90 लाख घट गयी। इसके साथ ही ये खबर भी है कि हजारों लोग लापता हैं। चीन में किसी के लम्बे समय तक लापता रहने पर ये मान लिया जाता है कि सरकार ने उसे ठिकाने लगा दिया या फिर वह किसी जेल में बंद है। मानवाधिकारों को फिजूल की बात मानने वाले चीन को लेकर ये संदेह पूरी दुनिया में व्यक्त किया जा रहा है कि कोरोना वायरस उसकी दूरगामी कार्ययोजना का हिस्सा था। हो सकता है किसी गड़बड़ी की वजह से दूसरों के लिए गड्ढा खोदने के फेर में वह खुद भी उसी में गिर गया। वैसे चीन में मानवीय जि़न्दगी हमेशा कीड़े मकोड़े जैसी रही है जिसकी वजह से उसे मरने वालों को लेकर लेशमात्र भी सहानुभूति या दु:ख नहीं हुआ। यहाँ तक कहा जा रहा है कि जिन बुजुर्गों को कोरोना संक्रमण हुआ उन्हें बिना इलाज ही मरने दिया गया। वैसे भी चीन में कोई काम नहीं करने वाले बुजुर्गों को शहरों के बजाय सुविधाविहीन गाँवों में भेजने की आघोषित नीति है। एक बात और जो पूरी दुनिया को परेशान किये हुए है वह है कोरोना का असर चीन के बहुत ही छोटे से हिस्से तक सीमित रहना। कहते हैं वह वुहान से आगे नहीं निकला। यद्यपि वुहान वैसे भी बहुत विशाल प्रान्त है जिसकी आबादी यूरोप के अनेक देशों से भी ज्यादा है। तानाशाही व्यवस्था के कारण चीन ने लॉक डाउन से भी बढ़कर तो लोगों के घर के सामने लकड़ी के पटिये ठोंककर उनका बाहर निकलना पूरी तरह से बंद कर दिया। उनकी जरूरतों की कोई चिंता भी वहां की सरकार ने नहीं की जैसी प्रजातांत्रिक देश कर रहे हैं। ये सब देखते हुए सवाल उठ रहा है कि कोरोना संकट खत्म होने के बाद चीन के साथ अमेरिका और उसके समर्थक माने जाने वाले देश किस हद तक व्यापारिक सम्बन्ध रखेंगे ? सोचना तो भारत को भी पड़ेगा क्योंकि कोरोना को लेकर चीन की नीयत में खोट होने के अंदेशे के बाद भारत को सतर्क होना चाहिए। ये बात भी सामने आने लगी है कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्था के चौपट होने का लाभ लेने की विस्तृत कार्ययोजना चीन ने तैयार कर ली है। ये भी खबर है कि वैश्विक पूंजी बाजारों में आई गिरावट के दौरान चीन ने बड़ी मात्रा में शेयरों की खरीदी करते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर नियंत्रण का दांव चल दिया है। ऐसा करके वह पश्चिमी देशों की आर्थिक रीढ़ तोड़ते हुए विश्व व्यापार पर एकाधिकार के अपने मास्टर प्लान को लागू करने की योजना पर आगे बढ़ रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर भारत जैसे देश पर पड़ेगा। इसलिए बेहतर होगा यदि हम संकट के इस दौर में ऐसा कुछ करें जिससे घरेलू उद्योग देश को आत्मनिर्भर बनाने में सक्षम हो सकें। किसी भी मुसीबत के समय बुद्धिमान लोग भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न होने पाए इसकी तैयारी में जुट जाते हैं। चीन उससे भी एक कदम आगे बढ़कर काम कर रहा है। चूँकि भारत का असली मुकाबला उसी से है इसलिए लॉक डाउन के इस कालखंड में देश के आर्थिक चिंतकों और व्यवसायिक प्रबंधकों को कोरोना के बाद की आर्थिक परिस्थितियों के बारे में ठोस सुझाव और कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए। चिकित्सा सुविधाओं में क्रांतिकारी सुधार भी आर्थिक विकास की नींव होती है और भारत में इसकी क्षमता विकसित करनी होगी। विश्व व्यापार संगठन से बंधे होने के बाद भी भारत को अपनी औद्योगिक और व्यापारिक नीतियों का भारतीयकरण करना होगा। ये कहना गलत नहीं है कि 135 करोड़ का देश यदि अपनी सम्पूर्ण क्षमता के साथ मैदान में उतर जाये तो इस संकट के बाद भी कम समय में अपनी अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे संकट के बादलों को छांटने में कामयाब हो जायेगा। कोरोना निश्चित रूप से अकल्पनीय मुसीबत लेकर आया है लेकिन जो देश प्रधानमन्त्री के कहने पर एक निश्चित समय पर थाली और ताली बजाकर अपनी एकजुटता दिखा सकता है वह असम्भव को संभव बनाने की क्षमता भी रखता है। लॉक डाउन का ये दौर चिंता से ऊपर उठकर चिन्तन का समय है। सभी विचारशील लोगों से निवेदन है कि वे इस समय का देशहित में उपयोग करते हुए सार्थक विचार प्रस्तुत करें। हमारे देश में कुछ नहीं हो सकता जैसी अवधारणा को दफनाने का ये बेहतरीन अवसर है। कोरोना निश्चित रूप से बड़ा खतरा है लेकिन मुसीबत से डरकर भागने की बजाय उसका सामना करने के साथ ही भविष्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित होने का प्रयास करना ही किसी कौम और देश के भविष्य को तय करता है। भारत के पास भी अपने भविष्य को सुरक्षित और सुखी बनाने का अवसर कोरोना ने दिया है।

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस: सम्पादकीय
-रवीन्द्र वाजपेयी

भारत के भविष्य को सुरक्षित और सुखी बनाने का अवसर

कोरोना ने चीन को एक बार फिर दुनिया के सबसे चालाक, धोखेबाज और अविश्वसनीय देश की कतार में सबसे आगे खड़ा कर दिया है। आर्थिक महाशक्ति बन चुके इस देश ने कोरोना वायरस के फैलाव से लेकर उसके बचाव तक की प्रक्रिया को जिस तरह से गोपनीय बनाये रखा उससे उसकी रहस्यमय छवि और मजबूत हो गई है। विगत दिवस उसने दावा किया कि कोरोना संकट पर वह विजय प्राप्त कर चुका है और वहां जनजीवन सामान्य हो चला है। यहाँ तक कि जिस वुहान में कोरोना वायरस ने सबसे पहले हमला किया वहां के कारखानों में उत्पादन शुरू होने के चित्र भी चीन के सरकार नियंत्रित समाचार माध्यमों ने जारी किये। लेकिन इस दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन को वहां की स्थिति का अध्ययन करने की अनुमति न देकर चीन ने एक फिर ये साफ कर दिया कि वह दुनिया को जितना दिखाता है उससे ज्यादा छिपा लेता है। कोरोना से संक्रमित लोगों में से कितनों की मृत्यु हुई इस बारे में शेष विश्व को सही जानकारी नहीं मिल सकी। और शायद मिलेगी भी नहीं क्योंकि ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि मृतकों की जो संख्या उसने प्रचारित की वह ऊँट के मुंह में जीरे जैसी ही है। कहते हैं कोरोना से मरने वालों के शवों को थोक के भाव जला दिया गया। ताजा जानकारी के अनुसार कोरोना के बाद चीन में मोबाईल का उपयोग करने वालों की संख्या अचानक 90 लाख घट गयी। इसके साथ ही ये खबर भी है कि हजारों लोग लापता हैं। चीन में किसी के लम्बे समय तक लापता रहने पर ये मान लिया जाता है कि सरकार ने उसे ठिकाने लगा दिया या फिर वह किसी जेल में बंद है। मानवाधिकारों को फिजूल की बात मानने वाले चीन को लेकर ये संदेह पूरी दुनिया में व्यक्त किया जा रहा है कि कोरोना वायरस उसकी दूरगामी कार्ययोजना का हिस्सा था। हो सकता है किसी गड़बड़ी की वजह से दूसरों के लिए गड्ढा खोदने के फेर में वह खुद भी उसी में गिर गया। वैसे चीन में मानवीय जि़न्दगी हमेशा कीड़े मकोड़े जैसी रही है जिसकी वजह से उसे मरने वालों को लेकर लेशमात्र भी सहानुभूति या दु:ख नहीं हुआ। यहाँ तक कहा जा रहा है कि जिन बुजुर्गों को कोरोना संक्रमण हुआ उन्हें बिना इलाज ही मरने दिया गया। वैसे भी चीन में कोई काम नहीं करने वाले बुजुर्गों को शहरों के बजाय सुविधाविहीन गाँवों में भेजने की आघोषित नीति है। एक बात और जो पूरी दुनिया को परेशान किये हुए है वह है कोरोना का असर चीन के बहुत ही छोटे से हिस्से तक सीमित रहना। कहते हैं वह वुहान से आगे नहीं निकला। यद्यपि वुहान वैसे भी बहुत विशाल प्रान्त है जिसकी आबादी यूरोप के अनेक देशों से भी ज्यादा है। तानाशाही व्यवस्था के कारण चीन ने लॉक डाउन से भी बढ़कर तो लोगों के घर के सामने लकड़ी के पटिये ठोंककर उनका बाहर निकलना पूरी तरह से बंद कर दिया। उनकी जरूरतों की कोई चिंता भी वहां की सरकार ने नहीं की जैसी प्रजातांत्रिक देश कर रहे हैं। ये सब देखते हुए सवाल उठ रहा है कि कोरोना संकट खत्म होने के बाद चीन के साथ अमेरिका और उसके समर्थक माने जाने वाले देश किस हद तक व्यापारिक सम्बन्ध रखेंगे ? सोचना तो भारत को भी पड़ेगा क्योंकि कोरोना को लेकर चीन की नीयत में खोट होने के अंदेशे के बाद भारत को सतर्क होना चाहिए। ये बात भी सामने आने लगी है कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्था के चौपट होने का लाभ लेने की विस्तृत कार्ययोजना चीन ने तैयार कर ली है। ये भी खबर है कि वैश्विक पूंजी बाजारों में आई गिरावट के दौरान चीन ने बड़ी मात्रा में शेयरों की खरीदी करते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर नियंत्रण का दांव चल दिया है। ऐसा करके वह पश्चिमी देशों की आर्थिक रीढ़ तोड़ते हुए विश्व व्यापार पर एकाधिकार के अपने मास्टर प्लान को लागू करने की योजना पर आगे बढ़ रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर भारत जैसे देश पर पड़ेगा। इसलिए बेहतर होगा यदि हम संकट के इस दौर में ऐसा कुछ करें जिससे घरेलू उद्योग देश को आत्मनिर्भर बनाने में सक्षम हो सकें। किसी भी मुसीबत के समय बुद्धिमान लोग भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न होने पाए इसकी तैयारी में जुट जाते हैं। चीन उससे भी एक कदम आगे बढ़कर काम कर रहा है। चूँकि भारत का असली मुकाबला उसी से है इसलिए लॉक डाउन के इस कालखंड में देश के आर्थिक चिंतकों और व्यवसायिक प्रबंधकों को कोरोना के बाद की आर्थिक परिस्थितियों के बारे में ठोस सुझाव और कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए। चिकित्सा सुविधाओं में क्रांतिकारी सुधार भी आर्थिक विकास की नींव होती है और भारत में इसकी क्षमता विकसित करनी होगी। विश्व व्यापार संगठन से बंधे होने के बाद भी भारत को अपनी औद्योगिक और व्यापारिक नीतियों का भारतीयकरण करना होगा। ये कहना गलत नहीं है कि 135 करोड़ का देश यदि अपनी सम्पूर्ण क्षमता के साथ मैदान में उतर जाये तो इस संकट के बाद भी कम समय में अपनी अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे संकट के बादलों को छांटने में कामयाब हो जायेगा। कोरोना निश्चित रूप से अकल्पनीय मुसीबत लेकर आया है लेकिन जो देश प्रधानमन्त्री के कहने पर एक निश्चित समय पर थाली और ताली बजाकर अपनी एकजुटता दिखा सकता है वह असम्भव को संभव बनाने की क्षमता भी रखता है। लॉक डाउन का ये दौर चिंता से ऊपर उठकर चिन्तन का समय है। सभी विचारशील लोगों से निवेदन है कि वे इस समय का देशहित में उपयोग करते हुए सार्थक विचार प्रस्तुत करें। हमारे देश में कुछ नहीं हो सकता जैसी अवधारणा को दफनाने का ये बेहतरीन अवसर है। कोरोना निश्चित रूप से बड़ा खतरा है लेकिन मुसीबत से डरकर भागने की बजाय उसका सामना करने के साथ ही भविष्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित होने का प्रयास करना ही किसी कौम और देश के भविष्य को तय करता है। भारत के पास भी अपने भविष्य को सुरक्षित और सुखी बनाने का अवसर कोरोना ने दिया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 March 2020

21 दिन : परीक्षा की घड़ी




देश के सामने परीक्षा की घड़ी एक बार फिर आ खड़ी हुई है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि 130 करोड़ आबादी वाले इस देश को दुनिया के समक्ष अपनी एकता, परिपक्वता, अनुशासन और समर्पण भाव प्रदर्शित करने का यह बेहतरीन अवसर है। कोरोना वायरस के हमले ने पूरी दुनिया को हलाकान कर दिया है। संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। हजारों मारे जा चुके हैं। स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ और वैज्ञानिक हतप्रभ हैं। कोरोना क्या है ये तो सब समझ चुके हैं किन्तु उसको रोकने का उपाय और उससे संक्रमित व्यक्ति का इलाज करने की माकूल दवा अभी तक नहीं खोजी जा सकी। हालांकि ऐसा दावा किया जा रहा है कि वैज्ञानिक सफल हो गये हैं लेकिन पूरी दुनिया तक टीके और दवाइयां पहुंचने में लम्बा वक्त लगेगा और तब तक कोरोना चुपचाप नहीं बैठेगा। चूंकि इसका संक्रमण मानवीय सम्पर्क  से फैलता है अत: इससे बचाव का सबसे प्रारम्भिक और सटीक इलाज संपर्कों की श्रृंखला को तोडऩा है और इसीलिये गत रात्रि प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में आगामी 21 दिनों तक लॉक डाउन लागू करने की घोषणा के साथ ये भी बता दिया कि यदि इस दौरान लापरवाही बरती गई तो देश 21 साल पीछे चला जाएगा। भारत एक प्रजातांत्रिक देश है जहां व्यक्तिगत आजादी और मौलिक अधिकारों का बड़ा सम्मान है। लेकिन जब इंसानी जिन्दगी पर खतरा मंडरा रहा हो तब निजी स्वतंत्रता गौण हो जाती है। बीते कुछ दिनों से देश के बड़े हिस्से में लॉक डाउन लागू होने पर भी एक वर्ग उसे गम्भीरता से नहीं ले रहा था। ऐसे लोग पूरे समुदाय के लिए जानलेवा बन सकते थे। शायद यही वजह रही कि प्रधानमन्त्री को हाथ जोड़ते हुए अपील करनी पड़ी कि अपने घरों के सामने लक्ष्मण रेखा खींचकर उसके भीतर ही रहें। उन्होंने साफ कहा कि वे प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं अपितु परिवार के सदस्य के रूप में ऐसा कह रहे हैं। कोरोना की श्रृंखला को तोडऩे का यही उपाय लगभग सभी देश अपना रहे हैं। पूरी दुनिया इस समय ठहरी हुई है। संक्रमण को बढऩे से रोकने का यही एकमात्र तरीका फिलहाल नजर आ रहा है और इसकी सफलता चीन में प्रमाणित भी हो चुकीं है। ऐसे में भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में बीमारी के फैलाव पर रोक लगाने का और कोई तरीका था भी नहीं। बीते कुछ दिनों में संक्रमित लोगों की संख्या में हुई तेज वृद्धि से स्थिति गम्भीर होने लगी थी। यद्यपि भारत में अभी तक लगभग 550 मरीज ही सामने आये हैं और उनमें से भी 10 फीसदी ठीक भी हो गए लेकिन हजारों ऐसे हैं जो विदेश से लौटने के बाद एहतियात के तौर पर 14 दिनों तक एकान्त में रखे गये हैं। ऐसा माना जाता है कि दो सप्ताह के भीतर संक्रमण असर दिखाने लगता है। इस प्रकार अभी संक्रमित लोगों की संख्या के बारे में सही आंकड़ा नहीं आया है। लेकिन इसे ईश्वर की कृपा कहना गलत नहीं होगा कि विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश, जहां घनी बस्तियों की भरमार है में कोरोना का असर अब तक तो काफी कम हुआ किन्तु जऱा सी असावधानी इसके विस्फोट का कारण बन सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी भारत से अपेक्षा की है कि वह चेचक और पोलियो जैसी विजय कोरोना पर हासिल कर दुनिया के समक्ष एक उदाहरण पेश करे। इस बारे में काबिले गौर एक बात ये भी है कि आज का भारत विश्व समुदाय से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। भारतीय अब विश्व समुदाय बन चुके हैं। पृथ्वी के सभी हिस्सों में भारतीय मूल के लोग रह रहे हैं। ऐसे में हमारा अंतर्राष्ट्रीय संपर्क चाहे-अनचाहे कायम रहना अवश्यम्भावी है। व्यापार और पर्यटन के कारण भी दुनिया भर में हमारा आना-जाना बढ़ा है। उस दृष्टि से भारत को केवल अभी नहीं अपितु आगे भी सतर्क रहना होगा। प्रधानमंत्री ने गत दिवस 15 हजार करोड़ की राशि इस आपदा से निपटने के लिए घोषित की जो अपेक्षित भी थी और आवश्यक भी किन्तु समय आ गया है जब भारत में चिकित्सा सुविधाओं को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखा जावे। भारत जैसे विशाल देश में जहां बड़ी आबादी अभी भी गरीबी रेखा से नीचे बसर करने मजबूर हो, विकसित देशों जैसी स्वास्थ्य सेवाएं सपना भले ही प्रतीत होती हों लेकिन इसे साकार करना ही होगा। कोरोना एक मुसीबत बनकर जरुर आया है लेकिन इसके कारण हमें बहुत कुछ सोचने और करने का अवसर भी मिला है। आगामी 21 दिन निश्चित रूप से किसी तपस्या से कम नहीं होंगे। पूरा देश घरों में रहेगा। कारोबार ठप होने से करोड़ों लोगों के समक्ष रोजी रोटी और पेट भरने की सामस्या आ खड़ी हुई है। ऐसे हालात किसी भी देश और समाज को अपनी ईमानदारी और एकजुटता साबित करने का अवसर प्रदान करते हैं। अपने निजी हितों से बाहर आकर सामूहिक सोच के साथ जीवन जीने के इस मौके का सही उपयोग करना ही समय की मांग है। प्रधानमन्त्री ने जिस अंदाज में बीती रात देश से अपील की उसमें सख्ती और समझाइश दोनों थीं। उनके सम्बोधन में खतरे की गहराई को खुलकर दिखाया गया साथ ही ये उम्मीद भी जताई गई कि संकट के इन क्षणों में एक नया भारत उभरकर सामने आयेगा। आने वाले 21 दिन भारत की क्षमता और संकल्पशक्ति को प्रमाणित करने वाले होंगे। कोरोना पर विजय अब एक राष्ट्रीय अभियान है जिसको लेकर किसी भी तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए। प्रबन्धन का एक सूत्र है कि गलतियों से सीखो। कोरोना से भी हम बहुत कुछ सीखेंगे। इन 21 दिनों में इस देश का कायाकल्प होगा इस अवधारणा को मजबूत करने की जरूरत है।
-रवींद्र वाजपेयी


Tuesday, 24 March 2020

हिटलर को संदेश भेज दो ..



द्वितीय विश्वयुद्ध का समय:-
जर्मनी के बमवर्षकों का खौफ।
लन्दन में दूध की लंबी लाईन।
वितरण कर रहे व्यक्ति ने घोषणा की , केवल एक बोतल और है , बाकी के लोग
कल आयें।
आखिरी दूध की बोतल जिस शख्स के हाथ आई उसके ठीक पीछे एक महिला खड़ी थी जिसकी गोद में छोटा बच्चा था। उसके चेहरे पर अचानक चिंता की लकीरें उभर आईं लेकिन अचानक उसने देखा वितरण करने वाला व्यक्ति उसके हाथ में बोतल थमा रहा था। वह चौंकी । उसके आगे खड़ा व्यक्ति  बिना दूध लिए लिए लाईन से हट गया था ताकि छोटे बच्चे को गोद में  लिए वह महिला दूध हासिल कर सके।
अचानक तालियों की  आवाज आने लगी।
लाईन में खड़े सभी व्यक्ति उस शख्स का करतलध्वनि से अभिनन्दन कर रहे थे।लेकिन उस शख्स ने उस महिला के पास जाकर कहा आपका बच्चा बहुत ही प्यारा है । वह इंग्लैंड का भविष्य है उसकी अच्छी परवरिश करिए।
इस घटना की खबर प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के पास जब पहुंची तो वे जर्मनी के जबरदस्त हमलों की विभीषिका से उत्पन्न चिंता से उबरकर बोल पड़े।
हिटलर को संदेश भेज दो , ब्रिटेन की जीत को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि यहां के लोग देश पर मंडरा रहे संकट के समय अपना निजी हित भूलकर देश के बारे में सोचते हैं।
चर्चिल का विश्वास सच निकला। ब्रिटेन विश्वयुद्ध में विजेता बनकर उभरा ।

# हमारे देश पर भी संकट मंडरा रहा है।
क्या हम अपनी चारित्रिक श्रेष्ठता प्रमाणित करने तैयार हैं??

घर में रहिये : कोरोना से बचिये




कोरोना के बढ़ते मरीजों के कारण देश के 500 से अधिक शहरों में लॉक आउट के बाद भी जब हालात नहीं सुधरे तब क र्यू लगाने की नौबत आ गई।  पंजाब और महाराष्ट्र सरकार ने पूरे राज्य में क र्यू का फैसला लिया। मप्र के भी कुछ शहरों में क र्यू लगा दिया गया  है। ये इस बात का संकेत है कि आम जनता ने इस महामारी से लडऩे के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई। अशिक्षित वर्ग यदि ऐसे अवसरों पर लापरवाही दिखाए तो बात समझ में आती है किन्तु जब पढ़े लिखे और हर दृष्टि से जानकार लोग भी आपदा के समय गैर जि मेदाराना आचरण  करें तब शासन और प्रशासन को स त होना ही पड़ेगा। कोरोना कोई  सा प्रदायिक दंगा नहीं है। न ही ये किसी प्रकार के आन्दोलन  से उपजी क़ानून व्यवस्था की परिस्थिति है। यह एक ऐसी  महामारी है जिसके आगे दुनिया के विकसित देश तक असहाय नजर आ रहे है। चीन से शुरू हुई इस बीमारी से  अमेरिका , फ्रांस , इटली , स्पेन , इंग्लैण्ड और जर्मनी जैसे विकसित देश तक नहीं बच सके जहां स्वास्थ्य सेवाएँ काफी उच्च स्तरीय हैं। जबकि  भारत में इसका मुकाबला करने की क्षमता तुलनात्मक रूप से बहुत ही कम है। ऊपर से ये बीमारी मानवीय संपर्क से फैलती है। भारत में जनसं या का घनत्व ज्यादा होने से लोगों का एक दूसरे से संपर्क में आना बहुत ही सामान्य है। सार्वजानिक स्थलों पर भीड़ की वजह से उसे रोक पाना और भी कठिन है। बसों , रेलगाडिय़ों आदि में जिस तरह लोग ठूंस - ठूंसकर  भरे होते हैं उसकी वजह से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। ये हमारी खुशकिस्मती है कि अभी तक भारत में कोरोना उक्त देशों की तुलना में खतरे  के निशान से ऊपर नहीं गया लेकिन जिस तरह के समाचार नित्यप्रति मिल रहे हैं उन्हें देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि यदि फौरन आपातकालीन आचरण नहीं किया गया तो भारत में वह अपना असली रौद्र रूप दिखाने से बाज नहीं आयेगा। केरल और महाराष्ट्र में देश के एक तिहाई मामले सामने आये हैं। लेकिन जिस राज्य में इक्का - दुक्का मरीज भी हैं उनमें भी खतरा उतना ही है। क्योंकि एक मरीज के स पर्क में आने वाला हर व्यक्ति कोरोना के विस्तार का कारण बन सकता है। जबलपुर में एक आभूषण  व्यवसायी की लापरवाही ने आधा  दर्जन लोगों को संक्रमित कर दिया। उसके स पर्क में आये बाकी लोगों के बारे में अभी जानकारी नहीं है जिससे प्रशासन और जनता दोनों आशंकित है। ऐसी ही लापरवाही देश में कोरोना  के मरीजों  की सं या में लगातार हो रही बढ़ोतरी का कारण बन रही है। देश में मौजूद स्वास्थ्य सेवाओं के मद्देनजर ये जरूरी हो गया है कि पूरा देश कुछ दिनों के लिए घरों में बंद रहे। हालाँकि ऐसा कहना आसान है लेकिन इसके  सिवाय अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बच रहा। प्रधानमन्त्री ने भी कल लॉक डाउन का पालन नहीं होने पर नाराजगी जताते हुए स ती बरतने के  लिए कहा। उसी के बाद महाराष्ट्र और पंजाब में क र्यू लगा वहीं कुछ राज्यों ने चुनिन्दा शहरों में निषेधाज्ञा पूरी तरह से लागू करने का निर्णय लिया जो हर दृष्टि से उचित है। दिल्ली में अनेक महीनों से चले आ रहे शाहीन बाग के धरने का त बू भी हटा दिया गया। हालाँकि क र्यू के बावजूद आवश्यक सेवाओं को रियायत दी  गई है लेकिन उसकी आड़ लेकर कुछ लोग अनुशासन तोडऩे का जो दुस्साहस करते हैं वह एक तरह से देश विरोधी कार्य है। शासन औरर प्रशासन तो ऐसे लोगों के विरुद्ध कार्रवाई कर  ही रहा है लेकिन जनता  को खुद होकर भी उनका विरोध करना चाहिए। सामाजिक बहिष्कार और तिरस्कार का बड़ा असर होता है। कोरोना कोई एक दो दिन में लौट जाने वाली मुसीबत नहीं है उ मीद की जा रही है कि  ज्यों - ज्यों गर्मी बढ़ेगी भारत में उसका असर घटता जाएगा लेकिन अव्वल तो चिकित्सा जगत ने इसकी  पुष्टि नहीं की और दूसरी बात ये है कि दुनिया के  तमाम देशों में गर्मियों का तापमान भी हमारे देश की सर्दियों जैसा रहता है। ऐसे में ज्योंही विदेशों से आवागमन दोबारा प्रारंभ होगा त्योंही इस बीमारी के आयात की संभावना बढ़ जायेगी। बेहतर होगा कि हम भारतीय इस तरह की आपदा से निपटने का चरित्र विकसित करें जो अनुशासन से ही आता है। जन स्वास्थ्य की चिंता केवल शासन करे और हम अपने स्तर पर पूरी तरह लापरवाही बरतें ये ल बे समय तक चलने वाला नहीं है। चीन में कोरोना के आतंक की खबर मिलते ही यदि शेष  दुनिया सतर्क होकर बचाव के इंतजाम कर लेती तब हजारों मौतें रोकी जा सकती थीं । गत दिवस टीवी चैनलों पर यूरोप के एक देश में सैकड़ों लोग समुद्री  बीच पर वाटर स्पोर्ट का मजा लूटते दिखाए गये। अमेरिका तक में पार्टियां चल रही हैं। आज ही खबर आई कि चीन के चिकित्सा जगत में  कोरोना द्वारा पलटवार किये जाने की आशंका व्यक्त की  जा रही है। ऐसे में भारत सरीखे देश के सामने सामूहिक मौतें देखने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा। इसलिए कोरोंना को पूरी ग भीरता से लेने का समय आ चुका है। भारत के प्रत्येक नागरिक को इस लड़ाई में  अपना योगदान देना पड़ेगा। केवल कुछ मिनिट तक थाली और ताली बजाकर अपने  कर्तव्य की इतिश्री मान लेने वाले महानुभावों से अपेक्षा है कि वे इस नाजुक घड़ी में व्यवस्था के अनुरूप आचरण करें। लॉक   डाउन या क र्यू का जो मकसद है उसे समझकर घर में रहने की आदत डालनी ही होगी। कई दिनों से बिना घर  जाए 24 घंटे अस्पताल में रहकर कोरोना से संक्रमित मरीजों की सेवा कर  रही किसी महिला डाक्टर का ये ट्वीट इस स बन्ध में विचारणीय है कि हम आपके लिए ही अपने घर से बाहर हैं तो क्या  आप हमारे लिए घरों के अंदर नहीं रह सकते ? सोचिये और खुद को ही इस प्रश्न का जवाब भी दीजिये।

-रवीन्द्र वाजपेयी