Monday, 6 April 2020

जब उन्हें मालूम होगा कि हमने ,उस रात को देखा था.



 
किसी भी युद्ध में सेनापति का नेतृत्व सबसे महत्वपूर्ण होता है | ऐसे अवसर भी आते हैं जब शत्रु तुलनात्मक रूप से मजबूत होता है | लेकिन ऐसे क्षणों में कुशल सेनापति अपनी सेना में विजय का उत्साह भरता है  और उसकी प्रेरणा से सैनिक भी अभावों और परिस्थितिजन्य दबावों के बावजूद पूरे जोश से मैदान में कूदकर जीत हासिल करके ही मानते हैं | 

इस बारे में एक बड़ा ही प्रसिद्ध प्रसंग है | नेपोलियन बोनापार्ट की सेनाएं युद्ध हेतु जा रही थीं | बीच में आल्प्स पर्वत आ गया | सेना को उसे पार करने में परेशानी हुई तो उसने अपनी असमर्थता व्यक्त की | जैसे ही  नेपोलियन को ये पता चला , वह अपना घोड़ा लेकर आगे आया और बोला समझ लो आल्प्स है ही  नहीं और फिर उसके पीछे पूरी सेना उस पर्वत को पार कर गई |

 भारत भी एक युद्ध लड़ रहा है | और वह भी ऐसे शत्रु से जिसकी आक्रामक क्षमता जबरदस्त है और रणनीति भी कोई नहीं जानता | पौराणिक काल के युद्धों में मायावी तौर - तरीके भी इस्तेमाल होते थे | शत्रु अदृश्य होकर आक्रमण करता था जिसे पराजित करने के लिए दैवीय शक्तियों की मदद लेनी होती थी | आज का युग विज्ञान का है और उसने इस अत्यंत शक्तिशाली अदृश्य शत्रु का नामकरण किया है कोरोना वायरस |

 भारत पर आक्रमण करने से पहले ये शत्रु दुनिया  के अनेक ताकतवर देशों को लोहे के चने चबवा चुका है | इसलिए जब ये भारत पर आक्रमण करने आया तब हमारे पास उससे लड़ने की न तो रणनीति थी और न ही संसाधन | ये कहना भी गलत  नहीं होगा कि उसके आने की आहट होने के बाद भी उसका मुकाबला करने के बारे में हमारी तैयारी पर्याप्त नहीं थी | ये भी कहा जा सकता है कि हमने उसकी ताकत का सही अनुमान नहीं लगाया और ये भी कि अपनी स्वभावगत कमजोरी के चलते ,जब आएगा तब देखेंगे वाली प्रवृत्ति पर चलते रहे |

 लेकिन जब दो - दो हाथ करना मजबूरी हो गयी तब पता लगा कि कोरोना से लड़ाई लम्बी चलने के साथ केवल एक मैदान तक सीमित न रहकर पूरा देश ही युद्धभूमि में बदल जायेगा और ये शत्रु कभी आमने - सामने आकर लड़ेगा तो कभी छापामार शैली का सहारा लेगा |

 इस तरह के युद्ध के लिए न तो हमारे पास पर्याप्त सैन्य बल था और न ही लड़ने के लिए जरूरी अस्त्र - शस्त्र | सेना को रसद की आपूर्ति जारी रखना भी बहुत कठिन समस्या थी | ये भय भी बना हुआ था कि कहीं नेपोलियन  की तरह हमारी सेना भी पर्वत चढ़ने से इंकार न कर दे |

 लेकिन यहीं सेनापति का कौशल और आगे बढ़कर नेतृत्व करने की क्षमता कसौटी पर कसी गई और बीती रात देश ही नहीं अपितु दुनिया ने जो देखा उसके बाद कम से कम ये आत्मविश्वास तो मजबूत हुआ ही कि तमाम प्रतिकूलताओं के बाद हम जीतेंगे क्योंकि सेनापति में नीति बनाने और निर्णय करने की काबिलियत तो है ही लेकिन वह सैनिकों के साथ देश की जनता में भी विजय के प्रति आत्मविश्वास और उत्साह का संचार करने में सिद्धहस्त  है |

 गत रात्रि 9 बजे 9 मिनिट के लिए दीप, मोमबती , टॉर्च या मोबाईल  से प्रकाश उत्पन्न करने का जो आह्वान प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने किया उसकी सफलता तो छोड़िये सार्थकता पर भी अनगिनत सवाल उठाये गये | उसे अंधविश्वास , पागलपन , संकट के समय उत्सव मनाना , अपनी छवि को चमकाने हेतु किया गया इवेंट मैनेजमेंट जैसे विशेषण दिए गए | 9 मिनिट के बाद बिजली के ग्रिड में आने वाली खराबी को लेकर भी ज़माने भर का प्रपंच हुआ |

 ये आरोप भी लगा कि  कोरोना से जान गँवा बैठे लोगों की लाश पर जश्न मनाने जैसी अशोभनीय हरकत की जा रही है | दिन , तरीख , समय , गृह नक्षत्र की स्थिति आदि पर भी जमकर ज्ञान बघारा गया | उसके पहले प्रधानमन्त्री के आह्वान पर 22 मार्च की शाम 5 बजे थाली और ताली बजाने वाले आयोजन के लेकर भी अब तक मजाक उड़ाने का काम जारी है |

 लेकिन गत रात्रि जो हुआ उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि संकट की इस अभूतपूर्व घड़ी में भी देश का विश्वास अपने प्रधानमन्त्री पर है | उन 9 मिनिटों में पूरे देश में जो स्वस्फूर्त उत्साह , एकरूपता और उमंग दिखाई दी वह अधिकतर लोगों के लिए जीवन का ऐसा अनुभव बन गया जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी |

 अब सवाल ये है कि 9 मिनिट के इस आयोजन की जरूरत क्यों पड़ी ? और इसक सीधा जवाब है कोरोना के मरीजों की संख्या में अचानक आया उछाल | और इससे भी बढ़कर तबलीगी जमात से जुड़े लोगों का पूरे देश में फ़ैल जाना | पिछले कुछ दिनों में ही 2 हजार के आसपास झूल रहा कोरोना संक्रमित लोगों का आंकड़ा 3500 पार कर गया जिसमें 30 फीसदी जमात के लोग हैं |

 इसकी वजह से देश में जबरदस्त घबराहट और भय व्याप्त हो गया | 25 मार्च से घरों में बैठे करोड़ों देशवासियों को अनगिनत परेशानियों का जिस प्रकार सामना करना पड़ रहा है उसकी वजह से उनकी मानसिकता भी प्रभावित हो सकती थी | कुछ अप्रिय घटनाओं के कारण अफरातफरी और असंतोष बढ़ने का खतरा भी था | वहीं  सामाजिक स्तर पर विभाजन की आशंका भी प्रबल होने लगी | देश को भीतर से कमजोर करने में लगी   ताकतों के  लिए ये स्वर्णिम अवसर था | और उन्होंने अपने प्रयास शुरू भी कर  दिए थे |  

 ये सब देखते हुए  भावनात्मक एकता के प्रदर्शन के साथ ही विभाजनकारी शक्तियों को ये सन्देश देने की भी जरूरत थी कि देश को अपने नेतृत्व पर विश्वास है और जनता उसके बताये रास्ते पर चलने से इंकार नहीं करेगी |

 
प्रधानमन्त्री चाहते तो संचार माध्यमों के जरिये देश से रोज मुखातिब होते रहते । लेकिन उन्हें पता था कि वह कारगर नहीं होगा | और इसीलिए उन्होंने एक अभिनव तरीका निकला जिसके जरिये पूरे देश में बिना कुछ कहे ही आपसी संवाद कायम हो गया | दीप जलाकर पूरे देश के लोगों के मन में एक सैनिक का भाव श्री मोदी ने भर दिया |

 9 मिनिट के छोटे से समय में पूरे देश की जनचेतना को जगाने का ये चमत्कारिक तरीका पूरी दुनिया के लिए तो अचरज का कारण बना ही , घरों  में बंद भारत की विशाल  जनसँख्या के मन की उदासी और मानसिक तनाव भी काफूर हो गया | जिस उत्साह से लोगों ने समय का पालन करते हुए प्रधानमन्त्री के आह्वान को एक उत्सव की शक्ल दी वह लड़ाई के लम्बे खिंचने की स्थिति में जनता को धैर्य बनाये रखने में सहायक बनेगा |

 14 अप्रैल को लॉक डाउन खत्म हो जाएगा या उसकी अवधि और बढ़ेगी इसे लेकर अभी अनिश्चितता है | लेकिन ये भी सही है कि लॉक डाउन ज्यादा लम्बा होने से अनेक व्यवहारिक दिक्कतें आयेंगीं जिनकी वजह से अव्यवस्था फ़ैल सकती है | उस स्थिति को टालने के लिए जरूरी है कि नेता  और जनता के बीच भावनात्मक एकरूपता बनी रहे और  9 मिनिट के उस प्रयोग की ऐतिसासिक सफलता ने साबित कर  दिया कि श्री मोदी जनता के मन को पढ़ने की कला में पारंगत हैं |

 यदि चुनाव होता तब उनके इस पैंतरे को राजनीति प्रेरित बताकर उसकी आलोचना की जा सकती थी लेकिन वर्तमान माहौल में राजनीति करने का न तो सही समय है और न ही कोई गुंजाईश | प्रधानमन्त्री ने गरीब जनता तक हरसंभव मदद पहुंचाकर सामाजिक असंतोष की जड़ ही खत्म कर दी | इसका बड़ा लाभ हुआ | वरना लॉक आउट को लेकर जिस तरह की लापरवाही आये दिन देखने मिल रही है उसे देखते हुए तो अब तक अराजकता फ़ैल जानी थी |

 हालांकि 9 मिनिट के दौरान अति उत्साही लोगों ने पटाके फोड़कर गम्भीरता को कम किया लेकिन मूल भावना बरकरार रही | प्रधानमन्त्री के आह्वान पर लोग यदि बुझे मन से दीपक या मोमबत्ती  जलाकर रस्म अदायगी कर देते तब शायद पूरी कवायद व्यर्थ चली जाती | लेकिन ये कहने में संकोच नहीं होगा कि आम जनता ने श्री मोदी की उम्मीदों से भी ज्यादा उत्साह दिखाते हुए ये संकेत दे दिया कि वह प्रधानमंत्री का समर्थन ही नहीं सम्मान भी करती है |

 और यही इस जंग में भारत की सबसे बड़ी ताकत है | सेनापति की ईमानदारी और नेतृत्व क्षमता के प्रति सेना ही नहीं जनता के मन में भी भरोसा बनाये रखना सबसे अच्छी रणनीति होती है और सौभाग्य से प्रधानमन्त्री इसमें सफल रहे |

 कोरोना से जंग दीपक और मोमबत्ती जलाने से बेशक नहीं जीती जा सकती लेकिन इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रसंग यहाँ उल्लेखनीय है | प्लासी की लड़ाई में अंगरेज और सिराजुद्दौला की सेनाओं के बीच युद्ध चल रहा था | वह युद्ध देश के भविष्य के लिए निर्णायक था | लेकिन अंग्रेज उसे जीतने में इसलिये सफल रहे क्योंकि क्षेत्रीय जनता अपने सैनिकों की मदद करने नहीं आई | कहने का आशय ये कि निःसंदेह लड़ाई सेना लड़ती है लेकिन उसका मनोबल बढ़ाने के लिए समाज को भी अपना उत्साह प्रदर्शन और भागीदारी करनी होती है |

 कल की रात चंद मिनिटों के लिए भारत की जनता ने ये दिखा दिया कि वह दूर बैठकर नजारा नहीं देख रही बल्कि कोरोना नामक दुश्मन से लड़ रहे सैनिकों के योगदान के प्रति उसके मन में आदर और आभार दोनों का भाव है |

 वे 9 मिनिट कहने को तो बहुत ही छोटा समय था लेकिन उसने इस दौरान जन्मे नये भारत की हिम्मत  और हौसले का एक इतिहास रच डाला | वैसे तो भारत में प्रतिवर्ष परम्परागत तरीके से दीपावली मनाई जाती है लेकिन इस बेमौसम दीपावली के पीछे जो भावना थी उसमें लक्ष्मी की साधना से धन संपत्ति अर्जित करने की इच्छा न होकर देश के स्वस्थ होकर निकलने की प्रार्थना के अलावा कोरोना से लड़ रहे चिकित्सक , सरकारी अमला , ;पुलिस कर्मी , स्वच्छता मित्र , भोजन और जरूरी सामग्री जरुरतमंदों तक पहुंचा रहे निःस्वार्थ स्वयंसेवकों की  सलामती और उत्साह्वर्धन की कामना थी |

 इस अभूतपूर्व और अकल्पनीय दृश्य को देखकर हर भारतीय के मन में देशप्रेम और एकता का जो भाव जागा वह बहुत बड़ी शक्ति बनकर सामने आया है | जो इस लडाई में विजयी होकर निकलने का आधार बनेगा | 

अपने बुजुर्गों से अतीत की ऐतिहासिक घटनाओं का वृतान्त तो खूब सुना था। लेकिन अब हमें भी भावी पीढ़ियों को सुनाने के लिए कल की दीपावली का अकल्पनीय अनुभव मिल गया जिसे सुनकर उन्हें हम पर नाज जरूर होगा।

कोरोना से असली लड़ाई तो अब शुरू हुई है




बीती रात देश एक अभूतपूर्व अनुभव से गुजरा। इस दौरान साबित हो गया कि कोरोना नामक आपदा के बावजूद जनता का मनोबल ऊंचा बना हुआ है और वह लॉक डाउन से हो रही परेशानी के बावजूद व्यवस्था बनाये रखने में शासन - प्रशासन के साथ है। प्रधानमन्त्री ने लॉक डाउन के 12 दिन बीत जाने के बाद जनमानस का मनोवैज्ञनिक परीक्षण करने का जो अभिनव तरीका आजमाया वह अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रहा। चंद अपवादों को छोड़ दें तो प्रधानमन्त्री के अनुरोध पर पूरे देश ने ये दिखा दिया कि वह एकजुट है और इस महामारी से लडऩे के लिए सरकार के प्रयासों के साथ है। कुछ लोगों को इस तरीके में अवैज्ञानिकता नजर आई। ये बात तो दिया जलाने वाले अधिकतर लोगों को भी ज्ञात थी कि नौ मिनिट की यह दीपावाली इस आपदा का इलाज नहीं थी लेकिन इसका जो सांकेतिक महत्व था उसके प्रति आम सहमति से देश में एक आत्मविश्वास का सृजन हुआ जो ऐसे अवसरों पर बेहद कारगर रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जनास्था एक बार फिर पूरे जोशोखरोश के साथ सामने आई। यद्यपि इस जोश में पटाकों का उपयोग हर समझदार को नागवार गुजरा। बीते कुछ दिनों से देश में वायु प्रदुषण की मात्रा में जो कमी आई उसे देखते हुए इस तरह उत्साह का अतिरेक समूचे आयोजन का वह भाग था जिसकी कड़ी आलोचना की जानी चाहिए और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो इसका भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है। ये भी जानकारी में आया कि कुछ अति उत्साही लोगों ने तो अपनी बंदूकों से इस तरह गोलियां दागीं मानों वे जंग जीतकर आये हों। बहरहाल प्रधानमन्त्री की इस पहल से देश में जिस एकजुटता और हौसले का प्रमाण मिला वह भविष्य के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है लेकिन ये भी देखा जाना जरूरी है कि इसे विजयोल्लास मानकर लोग निश्चिन्त न हो जाएं। कोरोना का संक्रमण जिस स्थिति में आ चुका है उसे देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि अभी तक जो भी हुआ वह तो लड़ाई की प्रारम्भिक और आकस्मिक तैयारी थी। असली जंग तो अब शुरू हुई है क्योंकि बीते एक सप्ताह के भीतर ही संक्रमित लोगों का आंकड़ा तेजी से बढ़ते हुए 4 हजार को पार कर चुका है और मृतकों की संख्या में भी लगातार वृद्धि होती जा रही है। ये भी सही है कि संक्रमण का दायरा कमोवेश पूरे देश में फैल गया जिसके लिए दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में स्थित तबलीगी जमात में संक्रमित हुए  सदस्यों का देश के विभिन्न राज्यों में चले जाना है। संक्रमित लोगों के अलावा कोरोना के संदेह के चलते क्वारंटाइन किये गये लोगों की संख्या भी लगातार ऊपर उठ रही है। केंद्र सरकार द्वारा। अप्रैल से बड़े पैमाने पर कोरोना की जांच कराए जाने का कार्यक्रम बनाया गया है। जिसके अंतर्गत जो इलाके संक्रमण के मामले में अग्रणी हैं वहां के रहवासियों की सघन जांच के अलावा दूसरी जगहों से लौटे लोगों की भी जांच का इंतजाम किया जा रहा है। इस प्रकार अब तक जो हुआ वह एकाएक हुए हमले से बचाव का काम था लेकिन अब जो कुछ भी आगे होगा वह सही मायनों में कोरोना पर हमला करने जैसा कहा जा सकता है। क्योंकि अब तक बीमारी के बारे में काफी कुछ जानकारी मिल चुकी है। इलाज के तरीके और औषधियों के बारे में भी चिकित्सा जगत काफी अनुभवी होता जा रहा है। सावधानियों के लिए ज़रूरी उपकरण और सामग्री की आपूर्ति भी होने लगी है। शासन, प्रशासन और समाज के बीच अच्छा समन्वय भी देखा जा रहा है। किसी महामारी से लडऩे में ये सब काफी सहायक होता है किन्तु सबसे बड़ी बात है लॉक डाउन का कड़ाई से पालन होना। जरूरी सामान खरीदने के लिए दिए गये समय और छूट के दौरान जिस तरह की अव्यवस्था अनेक जगहों पर देखी जा रही है वह नुकसानदायक हो सकती है क्योंकि एक संक्रमित व्यक्ति अनगिनत लोगों को कोरोना के जाल में फंसाने की ताकत रखता है। कोरोना के बारे में लापरवाह रवैये का जो नुक्सान इटली , स्पेन और अमेरिका को उठाना पड़ा उससे सबक लेते हुए भारत को अगले चरण में और ज्यादा सावधानी की जरूरत है। इस समय पूरा देश कोरोना मरीजों से भरा हुआ है। तबलीगी जमात से निकले लोगों की पतासाजी करना कठिन कार्य बन गया है। उनके अलावा भी काफी संख्या ऐसे लोगों की है जो संदिग्ध होने के बाद प्रशासन को चकमा देकर गायब हो गए। 14 अप्रैल के बाद लॉक डाउन में कुछ छूट देना जरूरी होता जा रहा है। जरूरी चीजों का जो स्टाक था उससे अभी तक का काम तो चल गया किन्तु जल्द ही उत्पादन शुरू नहीं करवाया गया तो फिर आपूर्ति का संकट पैदा हो सकता है। ऐसे में कारखानों और व्यापारिक गतिविधियों को प्रारम्भ करवाने की कार्ययोजना बनाने के साथ ही ये भी देखना होगा कि इससे सोशल डिस्टेंसिंग नामक व्यवस्था चरमरा न जाए। प्रधानमंत्री बहुत ही सधे कदमों से जनता को मनोवैज्ञनिक तरीके से कोरोना के विरुद्ध मजबूती से खड़े रहने के लिए तैयार तो कर ले गये  लेकिन अब आगे की और भी कठिन लड़ाई के लिए उन्हें देश को मोर्चे पर डटे रहने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना पड़ेगा। लोगों को ये समझ लेना चाहिए कि अंधविश्वास और अति विश्वास दोनों ऐसे अवसरों पर बहुत ही नुकसानदेह होते हैं। भारत भावनाप्रधान देश है। यहां के लोग जितनी जल्दी उत्साहित होते हैं उतनी ही जल्दी उनमें निराशा भी घर कर जाती है। इसी तरह जरा सी ढिलाई होते ही वे अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लांघने को आतुर हो उठते हैं। इसलिए आगे की जंग बेहद महत्वपूर्ण है । अभी तक कोरोना का स्वरूप एक बड़ी बीमारी तक ही सीमित रहा लेकिन जरा सी असावधानी उसे महामारी में बदल सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 April 2020

कोरोना में छिपे संदेश और संकेत को समझना ज़रूरी



कोरोना वायरस से लगभग पूरी दुनिया पीडि़त हो गयी है। कुछ देशों तक इसका प्रकोप भले ही नहीं पहुंचा लेकिन कमोबेश अधिकतर में उसका पदार्पण हो चुका है। इसके परिणामस्वरूप सामान्य जनजीवन ठहर गया है। लोग घरों तक सीमित हैं। सड़कों पर यातायात न के बराबर है। वाहनों की कतारें नजर नहीं आती। न कहीं जाम है न ही पार्किंग की किल्लत। ट्रक, रेल, बस, हवाई जहाज सभी रुके पड़े हैं या उनका परिवहन बेहद सीमित हो गया है। कल-कारखानों में भी उत्पादन नहीं हो रहा। दुकानें, शॉपिंग माल, मल्टीप्लेक्स बंद पड़े हैं। लॉक डाउन ने लोगों को घरों की चहार दीवारी में सिमट जाने मजबूर कर दिया है। 21 वीं सदी की तेज गति से दौडऩे वाली दुनिया का इस तरह रुक जाना एक अकल्पनीय अनुभव है। क्या होगा इसका आभास कोई भी नहीं कर पा रहा। फिलहाल तो पूरा ध्यान कोरोना  से लडऩे पर केन्द्रित है। मानव जाति पर लगभग 100 वर्ष बाद इतना बड़ा खतरा आया है। कहते हैं पिछली महामारी में 5 करोड़ लोग जान से हाथ धो बैठे थे। लेकिन तब चिकित्सा विज्ञान और संचार माध्यम इतने विकसित नहीं होने से आपदा का मुकाबला करने की क्षमता भी नहीं थी। कोरोना के आने तक दुनिया काफी आगे बढ़ चुकी है। खबरों और जानकारियों का आदान-प्रदान पलक झपकते ही सम्भव है। यही वजह है कि महामारी से बचने और लडऩे के तौर-तरीके खोजने में तनिक भी समय खराब नहीं किया गया। ये भी कहा जा रहा है कि यदि चीन ने कोरोना के बारे में  शुरुवाती जानकारी देने में देर नहीं की होती तब शायद आपदा  इतनी गम्भीर नहीं हो पाती और उसका फैलाव भी रोका जा सकता था। लेकिन जैसे ही जानकारी बाहर आई वैसे ही पूरी दुनिया ने उसकी भयावहता को समझते हुए इस अदृश्य दुश्मन से मुकाबला  शुरू कर दिया। आये दिन इस आशय की  खबरें आती हैं कि कोरोना का टीका बना लिया गया है और जल्द ही उसकी आपूर्ति दुनिया भर में शुरू  हो सकेगी। कोरोना के इलाज की दवाइयां भी खोज ली गईं और उससे बचाव का सबसे कारगर तरीका मानव का एक दूसरे से शारीरिक दूरी बनाये रखना मान लिया गया। सोशल डिस्टेंसिंग नामक इस नये तरीके के साथ ही लॉक डाउन नामक व्यवस्था भी लागू कर दी गई। केवल अति आवश्यक कार्य से ही घर से बाहर आने के अनुमति इसके अंतर्गत है और वह  भी सीमित अवधि के लिए। ये एक अभूतपूर्व स्थिति है जिसकी कल्पना उन लोगों तक ने नहीं की थी जो समय-समय पर दुनिया के नष्ट होने की भविष्यवाणी किया करते थे। हालीवुड के वे फिल्म निर्माता जो स्टार वार जैसी काल्पनिक पटकथा पर भव्य फिल्में बना चुके हैं, उनके दिमाग में भी कोरोना जैसी महामारी की संभावना नहीं आई। लेकिन अब ये एक ऐसी  वास्तविकता है जिसने फिलहाल तो ज्ञान-विज्ञान और इंसान तीनों का घमंड तोड़कर रख दिया। एक अति सूक्ष्म अदृश्य वायरस के आगे पूरी दुनिया जिस तरह असहाय होकर रह गई उसने एक नई जीवन शैली की बुनियाद भी रख दी है। यद्यपि विकास की वासना के वशीभूत मनुष्य कोरोना से मुक्त होते ही फिर उसी ढर्रे पर लौट जाएगा, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन ये भी सही है कि लॉक डाउन के दौरान हर व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों से परिचित और अभ्यस्त  हो गया जो उसके लिए एकदम नई थीं। भले ही अब संयुक्त परिवार गिने-चुने रह गये हों लेकिन हम दो हमारे दो वाले छोटे परिवारों में भी सहजीवन का जो नया अनुभव बीते कुछ दिनों में हुआ उसका प्रभाव दूरगामी हो सकता है  चूंकि आगे भी भीड़भाड़ से बचने की एहतियात बरतनी होगी इसलिए पारिवारिकता की भावना और जुड़ाव लोगों की मानसिकता का हिस्सा बन जाएगा। सबसे बड़ी बात ये देखने में आई कि इस दौरान न सिर्फ भारत अपितु पूरी दुनिया का पर्यावरण पूरी तरह से अपेक्षित मानदंडों के अनुरूप आ गया। आज की एक खबर ने वाकई बहुत उत्साहित किया और वह है जलंधर से  200 किमी दूर स्थित धौलाधार पर्वत का नंगी आँखों से दिखाई देना। ये इसलिए सम्भव हो सका क्योंकि वातावारण में छाया धुंध पूरी तरह खत्म हो चुका है। इसी तरह दिल्ली जैसे सबसे प्रदूषित महानगर में स्वच्छ नीला आसमान देखना संभव हो सका। पूरी दुनिया में कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आने से जल , जंगल , जमीन सभी चैन की सांस ले रहे हैं। प्रकृति की खूबसूरती बयाँ करते पहाड़ भी सैलानियों की भीड़ और उनके वाहनों से निकलने वाले धुंए से मुक्ति के कारण अपने अस्तित्व को लेकर निश्चिन्त होने लगे हैं। ये एक आदर्श स्थिति है। लेकिन सवाल उठता है कि कोरोना से मुक्त होते ही  क्या मानव जाति दोबारा ऐसे ही आत्मसंयम का पारिचय देगी या फिर उसी आपाधापी भरी जि़न्दगी की तरफ  लौट जायेंगे जिसने प्रकृति और पर्यावरण को जबर्दस्त नुकसान पहुँचाया और हमारी साँसों को धीमा जहर खींचने को मजबूर किया। सवाल और भी हैं। कोरोना के बाद इससे भी खतरनाक आपदा आ सकती है क्योंकि मनुष्य अपनी सीमा का उल्लंघन करते हुए वह सब जानने और हासिल करने का दुस्साहस करने  पर आमादा है  जिसकी उसे कोई जरूरत नहीं थी। भारतीय संस्कृति में जिस जीवन शैली को प्रातिपादित किया गया वह प्रकृति के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं अपितु सामंजस्य पर जोर देती है। कोरोना के बाद की जि़न्दगी यदि उसी रास्ते पर चले तब इस आपदा से भी उपलब्धि हासिल की जा सकेगी। इस महामारी में छिपे सन्देश और  संकेत को उनके सही अर्थों में समझ लेना ही बुद्धिमत्ता होगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 April 2020

ये जाहिलपन इंसानियत पर हमला है



गत दिवस अनेक स्थानों से चिकित्सकों, नर्सों एवं कोरोना वायरस के प्रकोप से लड़ रहे शासकीय अमले के साथ मारपीट , दुव्र्यवहार की जो खबरें आईं उनको सुनने के बाद ये लगा कि इंसान की शक्ल में भेडिय़ा वाली उक्ति  ऐसे ही लोगों के लिए बनाई गई होगी। इंदौर की  एक बस्ती में जाँच हेतु गये दल पर पथराव किया गया जिससे उसे जान बचाकर भागना पड़ा। उल्लेखनीय है इंदौर मप्र में कोरोना का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है सबसे ज्यादा मौतें भी वहीं हो रही हैं तथा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं। शासन के कड़े रुख के बाद हमलावर पकड़े गए और उनके विरुद्ध रासुका के अंतर्गत कार्रवाई होने की बात कही गई है जो पूरी तरह जायज है। ऐसा ही दिल्ली में भी सुनाई दिया। वहां तबलीगी जमात के मुख्यालय मरकज से निकाले गये जिन जमातियों को क्वारंटाइन में रखा गया वे नियमों का उल्लंघन करने पर आमादा हैं। बजाय एक दुसरे  से दूर रहने के सामूहिक नमाज पढ़ रहे हैं। यही नहीं चिकित्सकों को जांच नहीं करने दे रहे और कह रहे हैं उन्हें कुछ नहीं है और  होगा भी तो अपने आप ठीक हो जायेंगे। गाजिय़ाबाद से खबर मिली कि जमात के जो लोग क्वारंटाइन हैं वे नग्नावस्था में घूमते हुए  ड्यूटी कर  रही नर्सों को अश्लील इशारे कर रहे हैं।  बीड़ी-सिगरेट की मांग  भी उनने  रखी। उनके आपत्तिजनक आचरण के विरुद्ध वहां के जिलाधिकारी ने लिखित शिकायत की। दिल्ली में तो नमाजियों के उत्पात को रोकने चिकित्सा स्टाफ  के साथ पुलिस तैनात करनी पड़ी। सिकंदराबाद में क्वारंटाइन किये अनेक जमातियों ने मनपसंद भोजन नहीं मिलने की शिकायत करते हुए हंगामा मचाया। बिहार , उप्र , गुजरात सहित अनेक राज्यों से भी कोरोना मरीजों की जांच और सेवा में लगे लोगों पर हमले , दुव्र्यहार और इलाज से इनकार की खबरें लगातार आने से पूरा देश चिंतित हो उठा। इस बीच निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मुख्यालय के मौलाना साद  का एक आडियो सन्देश प्रसारित हुआ जो उनके पूर्व में दिए उस भाषण के एकदम  विपरीत था जिसमें वे अपने अनुयायियों को दूर रहने की बजाय मस्जिद में पास-पास रहने की हिदायत देते हुए कोरोना से बचाव के तरीकों को इस्लाम के विरुद्ध साजिश बताकर कह रहे थे कि मरना ही है  तो मस्जिद में आकर मरो जो इसके लिए सबसे अच्छी जगह है। लेकिन अब वही मौलाना अपने ताजे बयान में सफाई दे रहे हैं कि उन्होंने खुद को क्वारंटाइन किया हुआ है। साथ ही ये अपील भी कर डाली कि कोरोना संबंधी सरकार की सलाह को मानकर सोशल डिस्टेसिंग का पालन करें। ऐसा लगता है सरकार द्वारा कसे गए शिकंजे के बाद जेल जाने के भय से वे पलटी मार गये लेकिन इसके पहले के अपने रवैये से उन्होंने  कोरोना के विरुद्ध लड़ाई को कितना नुकसान पहुंचाया ये किसी से छिपा नहीं है। उनके अडिय़ल रुख की वजह से ही देश भर में उनके अनुयायी अमानवीय व्यवहार करने लग गए। यही नहीं मुस्लिम समुदाय के बाकी तबके भी कोरोना के विरुद्ध चल रही लड़ाई को उनकी धार्मिक आस्था के विरुद्ध मानकर असहयोग पर उतारू हो गए। ये तो ठीक है कि देश भर में उन हरकतों की घोर निंदा हुई लेकिन इस वजह से अच्छा भला सामाजिक वातावारण भी  खराब हो गया। ऊपर से सुप्रसिद्ध शायर मुनव्वर राणा ने कोरोना को मुसलमान बनाये जाने जैसा तंज कसकर आग में घी डालने जैसा काम कर दिया। ये समय है जब मुस्लिम समुदाय के शिक्षित  और सुलझे हुए लोग सामज का नेतृत्व करने आगे आयें। धर्मगुरुओं के निर्देश यदि केवल धर्म पालन तक सीमित रहें  तब तो ठीक लेकिन वे यदि देश और मानवता के विरुद्ध हों तो उनका प्रतिकार बुद्धिजीवियों को करना चाहिए। संकट के समय ही समाज सुधार की प्रक्रिया जन्म लेती  है और भारत के मुस्लिम समाज के लिए भी ये सुनहरा अवसर है। लेकिन इसकी बागडोर बुद्धिजीवियों को संभालना पड़ेगी। इस बारे में भारत के मुसलमानों को संयुक्त अरब अमीरात से भी सीखना चाहिए जहां इस्लाम का पालन किये जाने के साथ ही आधुनिक सोच को भी बराबरी से स्वीकार करते हुए विकास की राह पर बढ़कर आधुनिकता और परम्परा का संतुलन बनाए रखा गया। ज्ञान-विज्ञान के रास्ते पर चलते हुए भी धर्म का पालन किया जा सकता है ये बात हर किसी को समझ लेनी चाहिए। कोरोना जैसी महामारी से लडऩे के लिए अंधविश्वास से ऊपर उठकर रचनात्मक और सहयोगात्मक सोच की जरूरत है। गत दिवस प्रधानमन्त्री ने मुख्यमंत्रियों से वीडियो चर्चा के दौरान भी इसीलिये धर्मगुरुओं की मदद लेंने की सलाह दी जिससे मौलाना साद जैसे विध्वंसक मानसिकता वाले तथाकथित धर्मगुरु मानवता विरोधी षडय़ंत्र में सफल न हो सकें। भारत में कोरोना जिस स्थिति में पहुंच गया है वहां से उसे रोकने के लिए पूरे देश के संयुक्त प्रयास जरूरी हैं। यदि कोई एक समुदाय या धर्मगुरु उन कोशिशों को बेअसर करने की कोशिश करता है तो उससे अब तक की गयी तमाम कोशिशों पर पानी फिर जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 1 April 2020

मरकज ने लॉक डाउन को विफलता के कगार पर ला खड़ा किया



कल जब दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाके में स्थित तबलीगी जमात के मुख्यालय मरकज़ में हजारों मुस्लिम धर्मप्रचारकों के जमा होने का मामला सामने आया और कोरोना  वायरस का संक्रमण फैलने की पुष्टि के बाद  मरकज के मौलाना पर लॉक डाउन के उल्लंघन का आरोप लगा तब परम्परानुसार एक वर्ग विशेष केंद्र सरकार के साथ  दिल्ली सरकार तथा पुलिस को कठघरे में खड़ा करने के अभियान में जुट गया। ऐसा प्रचारित करने का प्रयास हुआ मानो मौलाना साहब और मरकज के भीतर जमा हजारों देशी  - विदेशी मुस्लिम हालात  के मारे हैं जो प्रधानमंत्री के  उस निर्देश का पालन कर रहे थे  कि लॉक डाउन में जो जहां है वही रुका रहे। इसी के साथ मरकज ने ये सफाई  भी दी कि उसने प्रशासन से लोगों को हटाने के लिए सहायता माँगी लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया। ये बात भी उठी कि जब दिल्ली सरकार और पुलिस को  पता था कि मरकज में हजारों लोग बैठे हैं तब उसने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाया ? पहली नजर में  ये लगा कि मरकज को व्यर्थ में फंसाया जा रहा है। ये बात भी सही है कि यदि वहां ठहरे एक वृद्ध की तबियत खराब होने पर अस्पताल न ले जाया जाता और उसकी मृत्यु नहीं होती तब शायद कोई हल्ला नहीं मचता। उसके बाद से ही मरकज में छापामारी हुई और फिर जो हुआ वह देश के सामने है। मुस्लिम समुदाय का नाम आते ही धर्मनिरपेक्षता के तथाकथित प्रवक्ता हरकत में आ गये और मौलाना को बेचारा साबित करने  का सुनियोजित अभियान चल पड़ा। लेकिन शाम होते तक ये बात स्पष्ट होने लगी कि मरकज के कर्ताधर्ताओं ने सरकार द्वारा दिए गये सभी निर्देशों की जमकर अवहेलना की। दिल्ली सरकार ने लॉक डाउन के काफी पहले ही धार्मिक आयोजनों पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। मरकज का ये दावा तब गलत साबित हो गया जब मरकज से सटे निजामुद्दीन थाने  के प्रभारी का एक वीडियो सामने आ गया जिसमें वे मरकज के छह संचालकों को  साफ़ - साफ़ याद दिला रहे हैं कि आप लोगों को कई बार कह दिया गया कि मरकज खाली कर दिया जावे। प्रभारी ने उन्हें ये भी कहा कि वहां ठहरे लोगों को निकालने  के  लिए वाहन आदि भी उपलब्ध करवा दिए जायेंगे। इसी के साथ ही प्रभारी ने उन्हें बाकायदा नोटिस भी दिया तथा उसकी अवहेलना करने पर सख्त कार्र्वाई की चेतावनी के साथ ये समझाइश भी दी कि  ये सब वे अपने नहीं बल्कि उनकी जीवन रक्षा के लिए कह  रहे हैं। उक्त वीडियो 23 मार्च का है।  मरकज की और से उस वीडियों का अब तक तो खंडन नहीं  किया गया। उधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने उपराज्यपाल को पत्र लिखकर मरकज के विरूद्ध मामला दर्ज करने का आग्रह किया। जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने मौलाना और संस्थान के बाकी संचालकों के विरुद्ध अपराधिक प्रकरण दर्ज कर लिया। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। मरकज के मौलाना की हठधर्मिता के विरुद्ध मुस्लिम समाज के भीतर से भी कुछ आवाजें उठीं लेकिन अभी भी कुछ लोग इस जनविरोधी कृत्य का बचाव करने में लगे हैं , जो शर्मनाक है। मरकज का जमावड़ा  केवल धारा 144 और लॉक डाउन का उल्लंघन होता तो हालात के मद्देनजर एक बार नरमी की भी जा सकती थी किन्तु उसकी वजह से दिल्ली ही नहीं पूरे देश में कोरोना संक्रमण का जो खतरा पैदा हो गया उससे लॉक डाउन पूरी तरह विफल होने के कगार पर आ  गया है। अभी तक मिली जानकारी के अनुसार मरकज से लौटे अनेक लोगों की मौत हो चुकी है और दिल्ली सहित देश के  दूसरे  हिस्सों में उनकी वजह से सैकड़ों  लोग संक्रमित हो चुके हैं तथा हजारों के संक्रमित होने की आशंका बढ़ गई है। इस्लामी कट्टरपंथ का प्रचार करने वाली इस संस्था के आयोजन में पर्यटक वीजा लेकर आये विदेशी मुस्लिम वहां से  निकलकर देश के अन्य हिस्सों में मस्जिदों तथा दूसरी जगहों पर रुककर धर्म प्रचार में लगे रहे जो वीजा नियमों का उल्लंघन है। 12 हजार लोगों के ठहरने की क्षमतायुक्त मरकज में साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। कोरोना संकट आने के बाद जब लॉक डाउन के अलावा लोगों को  एक दूसरे से दूर रहने की सलाह दी गई तब मरकज के मौलाना ने अपने अनुयायियों को उसके विरुद्ध भड़काते  हुए इन व्यवस्थाओं को मुस्लिम  विरोधी बताया और मस्जिद में आने तथा मिलने जुलने की हिदायत दी। इसका भी वीडियो सार्वजनिक हो चुका है। पुलिस और प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई का भी जिस गंदे तरीकों से विरोध हुआ वह मरकज के लोगों की दुष्प्रवृत्ति का प्रमाण है। फिलहाल तो उसे सील कर दिया गया है। मामला पुलिस में दर्ज होने के बाद क्राइम ब्रांच इस समूचे मामले की जाँच करेगी लेकिन ऐसे धार्मिक केन्द्रों की पहिचान कर उन्हें बंद ही करवा देना चाहिए। कुछ सिरफिरे मौलाना पूरे  इस्लाम के प्रवक्ता नहीं हो सकते। ऐसे लोगों ने ही मुसलमानों की छवि   खराब करने का पाप किया है। इस बारे में सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे देश में वोटबैंक की राजनीति ने मरकज जैसे संस्थानों का हौसला बुलंद किया है। अरविन्द केजरीवाल को तो मुस्लिम विरोधी  नहीं माना जाता लेकिन वे भी ये कहते सुने गए कि जब मक्का खाली हो गया, मंदिर-मस्जिद बंद हो गये तब मरकज में हजारों के हुजूम को बनाये  कहना बहुत गलत था। बेहतर हो ऐसे मामलों में धर्म को बीच में न लाते हुए ये देखा जाए कि मरकज की हेकड़ी ने देश में हजारों लोगों की जि़न्दगी खतरे में डाल दी है। अच्छा होगा मुस्लिम समुदाय ऐसे शातिर और अव्वल दर्जे के गैर जिम्मेदार मुल्ला - मौलवियों से खुद को बचाए वरना ये खुद तो डूबेंगे ही साथ में उनको भी ले डूबेंगे। इस्लाम का नाम बदनाम होगा सो अलग। मुस्लिम कौम को उसके धर्म का पालन करने का पूरा अधिकार है लेकिन उन्हें ये बात समझ लेनी चाहिए कि देश कानून से चलता है न कि धर्मगुरुओं के फतवे या निर्देश से। और कोई भी धर्म इंसानी जि़न्दगी को खतरे में डालने का अधिकार नहीं रखता। एक कमरे में छींकते-खांसते आठ-दस लोगों को बिना इलाज रखने वाला मौलाना कुछ भी हो धर्मगुरु तो कतई नहीं हो सकता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 31 March 2020

मरकज के मौलवी मुसलमानों के दुश्मन हैं



भारत में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या कल शाम तक 1300 पार कर चुकी थी। बीते कुछ दिनों में जो रफ्तार है उसके मुताबिक वृद्धि का आंकड़ा अब प्रतिदिन 10 फीसदी की औसत रफ्तार से भी ज्यादा से बढ़ रहा है। इसकी वजह निश्चित रूप से जांच सुविधा का विस्तार होना भी है वहीं लॉक डाउन के प्रति अनेक जगह पर बरती गयी घोर लापरवाही भी। प्रवासी मजदूरों के पलायन के बाद संक्रमित लोगों के आंकड़े कितने बढ़ेंगे ये कहना कठिन है। लेकिन गत दिवस दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में मरकज नामक मुस्लिम धर्म के एक केंद्र में सैकड़ों ही नहीं हजारों  लोगों के लम्बे समय से जमा होने का खुलासा होने के बाद अब ये डर भी सताने लगा है कि कुछ लोगों की जिद और पागलपन लाखों की जान जोखिम में डाल सकता है। मरकज के बारे में पता चला है यह केंद्र मुस्लिम धर्मप्रचारक प्रशिक्षित करता है। यहां न सिर्फ भारत अपितु विदेश से भी लोग आते हैं। लॉक डाउन होने के बाद दिल्ली की पुलिस ने मरकज के मौलवी को बाकायदा जमावड़ा खत्म करने के नोटिस दिए लेकिन वे अपनी ऐंठ में रहे और कल जब वह केन्द्र खाली करवाकर जांच कराई गई तो लगभग 25 संक्रमित निकल आये। कुछ लोग पहले ही वहां से वापिस चले गये थे। उनमें से 6 तेलंगाना जाकर मर भी गये क्योंकि वे कोरोना संक्रमित हो चुके थे। गत दिवस मरकज से निकाले गये सैकड़ों मुस्लिम धर्मावलम्बी इस दौरान वहां आने वाले अन्य लोगों के भी संपर्क में आये होंगे। अब दिल्ली सरकार के सामने ये कठिन  समस्या है कि उन सबका पता कैसे लगाये जिससे उनकी भी जांच कराई जा सके। अनेक लोगों के उप्र लौटने की खबर मिलते ही वहां की सरकार विभिन्न जिलों में उनकी खोज खबर लेने में जुटी हुई है। मरकज में जमा हुए लोगों का बाहरी दुनिया से कोई सम्पर्क नहीं रहा होगा ये मान लेने का कोई आधार नहीं है। क्योंकि जैसा बताया गया वहां अनेक देशों के मुस्लिम धर्मावलम्बी जमा हुए थे। और जब उन्हें दिल्ली पुलिस द्वारा जमावड़ा खत्म करने का नोटिस दिया गया उसके बाद भी मौलवी साहब ने उसका पालन क्यों नहीं किया ये पूरी मुस्लिम कौम के लिए बड़ा सवाल है। दिल्ली के ही शाहीन बाग़ इलाके में सीएए विरोधी धरना को कोरोना के आगमन के बाद भी इस ऐलान के साथ जारी रखने की हठधर्मिता दिखाई गई कि इस्लाम के अनुयायी होने से कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। ऐसे लोगों को ईरान के भयावह मंजर को जान लेना चाहिए जहां इस्लामी कट्टरपंथी सरकार की धर्मान्धता ने बड़ी संख्या में लोगों को मौत के मुंह में धकेल दिया। लॉक डाउन के बाद जब सोशल डिस्टेंसिंग पर जोर दिया गया तब भी अनेक मस्जिदों में सामूहिक नमाज पढ़ी जाने की खबरें आईं जबकि मौलाना घरों में रहकर ही नमाज पढऩे की अपीलें करते रहे। लेकिन मरकज की घटना न केवल शर्मनाक बल्कि खतरनाक भी है। धर्म का पालन करना व्यक्तिगत आस्था का विषय है जिस पर बंदिश लगाना मानवीय स्वतन्त्रता पर कुठाराघात है लेकिन धर्म भी एक आचार संहिता है जिसमें अनुशासन का सबसे ज्यादा महत्व है परंतु मुस्लिम समुदाय में अधिकतर लोग बहुत ही धर्मभीरु होने से मुल्ला - मौलवियों की बातों को बिना विचारे स्वीकार कर लेते हैं जिसकी वजह से वे मुख्यधारा से अभी तक दूर ही बने रहे। यद्यपि टीवी चैनलों पर अनेक सुशिक्षित मुसलमानों ने मरकज मामले पर मुल्ला मौलवियों की जमकर आलोचना की और इस बात को साफ किया कि इस्लाम मानव की हिफाजत का पैगाम देता है , उनकी जान खतरे में डालने का नहीं। मस्जिदों में जमा होकर नमाज पढ़ने की बजाय अपने घरों में ही इबादत करने से इस्लाम कमजोर नहीं होगा। देश के तमाम बड़े मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी तदाशय का सन्देश दिया है। मरकज में लॉक डाउन की जिस तरह धज्जियां उड़ाई गईं और दिल्ली पुलिस के नोटिस को रद्दी की टोकरी लायक समझा गया उससे लगा कि वहां के मौलवी साहब को ये गुमान रहा होगा कि जैसी रियायत और नरमी शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों के साथ बरती गयी वैसी ही उनके साथ भी होगी। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना चाहिए था कि देशव्यापी लॉक डाउन लागू होते ही शाहीन बाग़ का तम्बू उखाड़ दिया गया। मरकज से बाहर आये मुस्लिम धर्मावलम्बियों में से कितने संक्रमित निकलेंगे ये तो जांच के बाद सामने आएगा लेकिन जो लोग कल के पहले वहां से वापिस चले गये। उन्होंने कितने लोगों को कोरोना का संक्रमण दिया होगा ये गंभीर चिंता पैदा करने वाला मसला है। इस घटना के बाद शासन और प्रशासन को न सिर्फ  मुस्लिम अपितु अन्य धर्मों के ऐसे संस्थानों पर नजर रखनी होगी जहां लोगों का जमावड़ा हो। धार्मिक क्रियाकलापों के लिए हमारा संविधान पूरी आजादी देता है लेकिन यदि उनसे समाज के हितों पर आघात होता हो तो उनकी इजाजत नहीं दी जा सकती। वर्तमान में हिन्दुओं का बड़ा पर्व नवरात्रि चल रहा है। कल अष्टमी और परसों रामनवमी है। शीघ्र ही महावीर जयन्ती आने वाली है। बैसाखी भी करीब है। जैसी कि खबर है उक्त सभी त्यौहार में सार्वजनिक तौर पर कोई आयोजन नहीं होने का निर्णय सम्बन्धित धर्म प्रमुखों ने किया है जिसे उनके अनुयायी मान रहे हैं। नवरात्रि पर देश के सभी छोटे - बड़े देवी मन्दिर सूने पड़े रहे। जैन समाज में नित्य मन्दिर जाने का जो रिवाज है उसे भी लॉक डाउन में शिथिल कर दिया गया। ऐसे में मरकज में धर्म की आड़ में देश-विदेश के हजारों मुस्लिमों का जमावड़ा करना मानवता विरोधी कृत्य है जिसके लिए आयोजकों के विरुद्ध इतनी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि कोई और इस तरह की जुर्रत न करे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 March 2020

अगले 15 दिन बेहद महत्वपूर्ण



बीते कुछ दिनों से भारत में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या में पूर्वपेक्षा ज्यादा वृद्धि चिंता का कारण है। हालांकि जानकार सूत्रों के अनुसार आंकड़े में बढ़ोत्तरी का कारण जाँच किट की उपलब्धता के बाद संदिग्ध लोगों के परीक्षण में तेजी आना है। सबसे अच्छी बात ये है कि अधिकतर मामलों में संक्रमण प्रारंभिक स्थिति में होने से मरीज का इलाज संभव है और यही वजह है कि अभी तक मरने वालों की संख्या काफी कम है। उनमें भी अधिकतर वे रहे जिन्हें डायबिटीज और किडनी की बीमारी थी। देश में सस्ती जांच किट आने और निजी पैथोलॉजी लैब को भी जांच हेतु अनुमति मिल जाने से जांच कार्य में तेजी आई है। इस कारण ये अनुमान है कि आने वाले दिनों में कोरोना संक्रमित लोगों का आंकड़ा और बढ़ेगा। लेकिन दूसरी तरफ  ये भी सही है कि प्रारंभिक अफरातफरी की बाद अब चिकित्सा का ढांचा पहले से बेहतर होता जा रहा है। अस्पतालों के अलावा दूसरी जगहों पर भी संदिग्धों को कोरोनटाइन करने के इंतजाम किये जा रहे हैं। खाली पड़े शासकीय भवन, छात्रावास, होटल, रेल के डिब्बे आदि का उपयोग करने की तैयारी से बिस्तरों की समस्या हल होने की उम्मीद बढ़ी है। बीते तीन-चार दिनों से प्रवासी मजदूरों के पलायन की वजह से जरूर खतरा बढ़ गया था लेकिन केंद्र तथा राज्य सरकारों ने स्थिति को सँभालने पर पूरा जोर लगाया जिससे हालात धीरे-धीरे ही सही किन्तु काबू में आ रहे है। पैदल अपने गावों को लौट पड़े गरीबों को रास्ते में भोजन और आश्रय के साथ उनके गंतव्य तक पहुँचाने के इंतजाम भी सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर चल रहे हैं। देश भर से जो खबरें आ रही हैं उनसे पता चलता है कि समाज भी अपनी रचनात्मक भूमिका का निर्वहन पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी से कर  रहा है। बड़े और छोटे शहरों में गरीबों और बेरोजगार हुए श्रमिकों को भोजन प्रदान करने का काम भी जमकर चल रहा है। ये एक अच्छा संकेत है। चारों तरफ  मंडराते मौत के खतरे के बीच लोग अपनी परेशानी भूलकर जरुरतमंदों की सहायता के लिए आगे आकर पूरी दुनिया को ये सन्देश दे रहे हैं कि भारत में मानवीय संवेदनाएं गहराई तक समाई हुई हैं। इस कारण शासन-प्रशासन का भी हौसला बुलंद हुआ है। बड़े उद्योगपतियों के अलावा, फिल्म अभिनेताओं, खिलाडिय़ों, कुमार विश्वास जैसे साहित्कारों, धार्मिक न्यासों, कर्मचारियों, राजनेताओं सहित समाज के हर वर्ग ने आर्थिक सहयोग देकर राहत एवं बचाव कार्यों में सहयोग हेतु हाथ आगे बढ़ाया है। किसी भी आपदा से लडऩे के लिए समाज की संगठित शक्ति की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। प्रारंभ में तो लोगों को लगा कोरोना भारत में नहीं आयेगा। लेकिन ज्यों - ज्यों इसके मरीज सामने आने लगे त्यों-त्यों लोग सतर्क हुए लेकिन फिर भी बेपरवाही बनी रही। खास तौर पर विदेशों से लौटे लोगों ने निर्देशों की अवहेलना करने की उपेक्षा की जिससे संक्रमण फैला। उसी के बाद देश में पूरी तरह लॉक डाउन करना पडा। लेकिन उसके प्रति भी अपेक्षित गम्भीरता नहीं बरती गयी। जिसके बाद गत दिवस प्रधान मंत्री ने मन की बात में लोगों से लॉक डाउन के लिए क्षमा मांगते हुए ये स्पष्ट कर दिया कि अब और कड़ाई बरती जायेगी। श्रमिकों के पलायन को रोकने के लिए जिलों और राज्यों की सीमाएं सील करते हुए प्रशासन को उसके लिए जरूरी कदम उठाने की जिम्मेदारी सौंप दी और पालन नहीं होने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दे डाली। मप्र के इंदौर नगर में उसके बाद आज से तीन दिन तक पूरी तरह कर्फ्यू लागू कर दिया। ये एक संकेत है कि यदि लॉक डाउन का पालन नहीं किया जाता तो फिर कर्फ्यू को उसके असली रूप में लागू किया जावेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में कोरोना से लड़ने के लिए हो रहे प्रयासों की सराहना तो की किन्तु लगे हाथ ये चेतावनी भी दे डाली कि ये समय बहुत ही सावधानी बरतने का है। जरा सी चूक से लॉक डाउन से हुआ फायदा मिट्टी में मिल जाएगा। बीते दो तीन दिनों में दिल्ली और गाजिय़ाबाद में जो भीड़ दिखाई दी यदि उसी तरह के हालात आगे भी जारी रहे तब कोरोना की स्टेज तीन आने का खतरा पैदा हो सकता है जिसमें बस्तियां की बस्तियाँ संक्रमित हो सकती हैं और इटली जैसे हालात बन सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि अब लॉक डाउन के महत्व और जरूरत को गम्भीरता से लिया जावे। आगामी दो सप्ताह बहुत ही निर्णायक होंगे। यदि इस दौरान संक्रमण और नहीं फैला तो फिर ये उम्मीद की जा सकती है कि 30 अप्रैल तक भारत कोरोना को काबू करने की स्थिति में आ सकेगा। वरना लॉक डाउन को आगे भी बढ़ाना पड़ सकता है। यद्यपि आज ही भारत सरकार ने लॉक डाउन की समयावधि बढ़ाने से इनकार कर दिया है। कोरोना कितना खतरनाक है और मानवीय संपर्कों से तेजी से फैलता है ये बात कमोबेश सबकी समझ में आ चुकी है लेकिन उसके बाद भी लापरवाही बरती जाती रही तो ये लड़ाई लंबी खिंचेगी और इंसानी जिंदगियों के रूप में देश को बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी