Tuesday, 7 April 2020

तबलीगी जमात पर रुख साफ़ करें मुस्लिम संगठन



गलती करने वाला जब उसे जायज ठहराने का प्रयास करता है तब उसका  अपराध और गम्भीर बन जाता है। इसी तरह जुर्म करने के बाद कानून से भागने वाले के प्रति संदेह की सहज पुष्टि हो जाती है। इसके विपरीत जिस व्यक्ति से जाने - अनजाने में गलती हो जाती है और वह उसे स्वीकार कर ले तो कानून और समाज दोनों उसके प्रति सदाशयता और रियायत बरतते हैं। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात नामक इस्लामी संगठन के मुख्यालय मरकज के कारण बीते एक सप्ताह में कोरोना वायरस के विरुद्ध चल रही जंग को  कितना नुकसान  हुआ ये बताने की जरूरत नहीं है। कोरोना  संक्रमित और संदिग्ध मरीज जिस तेजी से बढ़ते जा रहे हैं उनमें अधिकांश वे लोग हैं जो मरकज से निकलकर देश भर में बिखर गये। उनमें  से कुछ तो अपने स्थानों पर लौटकर मर भी गये। उसीके बाद से जब पड़ताल शुरू ही तब ये खुलासा हुआ कि मरकज कोरोना की नर्सरी बना हुआ था। इसे लेकर सरकार ने जो किया और मरकज ने जो सफाई दी उससे भी सभी अवगत हैं। लेकिन रहस्य तब गहराया जब पता चला मरकज के मौलाना साद पुलिस से बचने के लिए फरार हो गये। ज्यादा हल्ला मचा तब उनका एक ऑडियो सन्देश प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने खुद को क्वारंटाइन किये जाने का हवाला देते हुए पुलिस द्वारा पूछे गये सवालों का जवाब बाद में देने की बात कही। दिल्ली पुलिस ने उनके और मरकज के प्रबन्धन से जुड़े कुछ लोगों के विरूद्ध अपराधिक प्रकरण दर्ज कर लिया है। क्राईम ब्रांच जिन बिन्दुओं पर जांच कर रही है उनकी वजह से तबलीगी जमात को लेकर संदेह और भी गहराने लगा है। मौलाना साद के भूमिगत होने के बाद से इस संगठन  की गतिविधियों की अधिकृत जानकारी नहीं मिल पा रही। लेकिन दो - तीन दिन से जमात की तरफ  से अनेक कथित प्रवक्ता टीवी चैनलों पर बेहद आक्रामक अंदाज में मरकज को बलि का बकरा बनाये जाने का आरोप लगाते हुए यहां तक कहते सुने  गए  कि  मंदिरों भी लोग जमा हैं लेकिन छापेमारी केवल मस्जिदो में  की जा रही है। गत दिवस जमात से जुड़े एक मौलवी ने तो अनेक  टीवी चैनलों और उनके पत्रकारों का नाम लेकर धमकी दे डाली। ये भी कहा कि चैनलों पर होने वाली बहस में आमंत्रित मुल्ला  - मौलवी मुस्लिम समाज के वाजिब प्रवक्ता नहीं हैं और ये बिके हुए हैं। दरअसल मरकज काण्ड के बाद कोरोना संक्रमितों की संख्या में हुई बेतहाशा वृद्धि में बड़ी संख्या मरकज से लौटे जमातियों की होने से पूरे देश में मुस्लिम समाज निशाने पर आ गया। जमातियों  के मस्जिदों और बस्तियों में छिपे होने से भी स्थिति और बिगड़ी। यदि मरकज से शुरू  में ही ये अपील जारी हो जाती कि वहां  से लौटे जमाती अपनी जांच करवा लें तब  न संदेह पैदा होता और न ही इस समुदाय के प्रति गुस्सा बढ़ता। लेकिन मरकज से पूरे देश में लौटे जमाती बजाय सामने आने के मस्जिदों और अन्य जगहों पर जाकर दुबक गए और इस तरह उनके संपर्क में आये और लोग भी कोरोना की चपेट में आते गए। यदि ये अज्ञानवश हुआ होता और जमात की हिमायत करने वाले कथित प्रवक्ता समझदारी के साथ पेश आते हुए जांच दलों का सहयोग करते तब  जनाक्रोश नहीं बढ़ता किन्तु  न जाने कहां से निकलकर आ रहे उसके प्रवक्ता जिस तरह से धौंस देने के अंदाज में मरकज का बचाव कर  रहे हैं और समाचार माध्यमों को धमका रहे हैं उससे चोरी तो चोरी ऊपर  से सीनाजोरी वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। हास्यास्पद बात ये है कि  मौलाना साद की तरफ  से एक तरफ  तो ये सफाई आ रही है कि वे स्वस्थ हैं लेकिन फिर वे क्वारंटाइन में क्यों चले गए इसका कोई  संतोषजनक जवाब उनकी या जमात की तरफ से नहीं आया। क्राइम ब्रांच द्वारा  दो बार प्रश्नावली भेजने के बाद भी वे जवाब नहीं दे रहे जिससे दाल में काले की शंका बढ़ रही है। ऐसा  लगता है मौलाना साद इस खुशफहमी में थे कि उनकी मजहबी हैसियत को देखते हुए पुलिस और सरकार उनके गिरेबां पर हाथ नहीं डालेगी लेकिन ज्योंहीं उन्हें ये लगा कि पांसे उलटे पडऩे वाली हैं तो वे अपने अनुयायियों को अकेला छोड़कर निकल लिए। तबलीगी जमात को लेकर मुस्लिम समाज भी असमंजस में है। उसकी कार्यप्रणाली और सीख से बहुत ज्यादा सहमत न होते हुए भी इस्लाम के नाम पर उसका खुला विरोध नहीं किये जाने की नीति अपनाई जाती है। लेकिन अब समय आ गया है जब मुस्लिम समाज को खुलकर तबलीगी जमात के बारे में अपना दृष्टिकोण सामने रखना चाहिए। आज की  स्थिति में मरकज द्वारा किये गये अपराध के छींटे पूरे मुस्लिम समाज के दामन पर पड़ रहे हैं। ऊपर से देश भर से डाक्टरों तथा पुलिस पर थूकने और पथराव किये जाने की खबरें आने से भी मुस्लिम समाज आलोचना के घेरे में आ गया है। गत रात्रि एक टीवी एंकर ने ठीक कहा कि मुस्लिम समाज अपने संगठनों और उनके प्रवक्ताओं के बारे में जानकारी सार्वजनिक करे जिससे स्वयंभू प्रवक्ताओं का पर्दाफाश हो सके। दूसरी बात तबलीगी जमात को लेकर मुस्लिम समाज की धारणा भी साफ  होनी चाहिए। भारत में मुस्लिमों के अनेक संगठन हैं। लेकिन उनके बारे में समाचार माध्यम भी ज्यादा जानकारी नहीं रखते। ऐसे में सदैव एक संदेह बना रहता है। कोरोना के फैलाव में मरकज  जिस तरह से आरोपों के घेरे में आया उसे सरकार की मुस्लिम विरोधी नीति का परिणाम बताकर खुद को बेक़सूर साबित करने की जो कोशिश तबलीगी जमात द्वारा हो रही  है वह किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा लगता है। इसका खुलासा जितनी जल्दी हो जाए उतना अच्छा होगा। यद्यपि मौलाना साद के पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद ही वे राज खुलेंगे जिन पर अभी तक पर्दा पड़ा रहा। बेहतर हो कोरोना फैलाने के जिम्मेदार जमातियों के विरूद्ध मुस्लिम समाज ही आवाज उठाये और जो अभी भी मस्जिदों और मुस्लिम बस्तियों में छिपे बैठे हैं उनको पकड़वाने में मददगार बने। ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश में जितने भी कोरोना संक्रमित हैं उनमें तकरीबन 40 फीसदी या तो मरकज से लौटे है या फिर उनके सम्पर्क में आये हुए लोग। ऐसे में उसे खलनायक मना जा रहा है तो गलत क्या है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 April 2020

है अपना हिंदुस्तान कहाँ वह बसा हमारे गाँवों में,जरूरत है स्मार्ट गाँवों की ताकि पलायन रुक सके



 
कुछ दिन पहले मैनें ‘ अपने ही बोझ से झुके जा रहे  महानगरों के कंधे ‘ शीर्षक से जो आलेख लिखा था उस पर पाठकों की बड़ी ही  उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएं आईं | महानगरों में कोरोना  जिस तेजी  से फैला उसके कारण बड़े शहरों की संरचना की बजाय छोटे और मझोले आकार के शहरों को सर्वसुविधायुक्त बनाकर बड़े शहरों का बोझ कम करने की सोच को भी समर्थन मिलने लगा है | लेकिन विभिन प्रतिक्रियाओं में से एक मेरे अनुज अविनाश वाजपेयी की भी आई जो भारत सरकार की एक  नवरत्न कम्पनी में महाप्रबंधक पद वर्तमान में मुम्बई में पदस्थ हैं | मुम्बई महाराष्ट्र के सबसे आधिक कोरोना प्रभावित नगरों में है | विदेशों से आई ये बीमारी जब वहां की धारावी झोपड़ पट्टी तक जा पहुंची तब उसके सामुदायिक विस्तार का खतरा बढ़ गया | फोन पर अविनाश से कुशल क्षेम पूछते हुए महानगर की ज़िन्दगी में आये इस ठहराव को लेकर भी चर्चा होती रही है | लेकिन मेरे संदर्भित आलेख पर प्रतिक्रिया में शहरों पर बढ़ते  आबादी के बोझ को लेकर आविनाश ने सुझाव  दिया कि यदि स्मार्ट सिटी के साथ ही स्मार्ट विलेज पर भी जोर दिया जावे तो गाँवों  से होने वाले पलायन को एक स्तर तक रोका  जा सकता है |

 इस सुझाव से इस विषय को उसके मूल तक ले जाने की प्रेरणा मिली और दिमाग में गांधी जी के 'ग्राम स्वराज' से लेकर नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ ‘सांसद आदर्श ग्राम ‘ तक की समूची यात्रा घूमने लगी | माध्यमिक स्तर की शिक्षा के दौरान एक कविता पढ़ी थी जिसकी निम्नलिखित  पंक्ति आज भी कभी - कभार स्मृति  पटल पर टहलते हुए आ जाती है :-

 है अपना हिंदुस्तान कहाँ , वह बसा हमारे गाँवों में ...

 शिक्षा की ऊँची पायदान पर पहुंचने के बाद मालूम हुआ कि भारत की अधिकतर आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में  रहती है और ये भी जाना कि भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा खेती ही रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है | 

ग्रामीण भारत का प्रभाव हमारी सोच पर इस हद तक हावी था कि फिल्म उद्योग भी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्में बनाने में नही शरमाया और वे खासी सफल भी रहीं | ये फ़िल्में   मुंशी प्रेमचंद की कहानियों तक सीमित नहीं रहीं बल्कि उनमें बाकायदा मसाला भी होता था | साठ के दशक में दिलीपकुमार की गंगा जमुना फिल्म आई थी जिसमें भोजपुरी भाषा का जमकर इस्तेमाल हुआ और वह फिल्म बहुत सफल रही |

 
लेकिन आज  स्थिति कुछ अलग है | ग्रामीण भारत तक स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने सड़क तो पहुंचा दी लेकिन वहां से शहरों के लिए होने वाला पलायन नहीं रुका | कहने को गाँव और खेती आज भी समानार्थी हैं लेकिन किसान के बेटे की रूचि अब उस कार्य में नहीं रही | वह शहर आकर किसी चाय की दुकान में काम कर लेगा लेकिन गाँव में उसे रहना मंजूर नहीं |

 ऐसा नहीं कि गाँवों के लिए कुछ नहीं किया गया | वहां सड़कें हैं , बिजली भी पहुंच गई है | झोपड़ियों के उपर लगे टीवी एंटीना और अधिकतर युवाओं के हाथ में मोबाईल बदलते गाँवों की तस्वीर बयान कर  देते हैं | बैलगाड़ी तो छोड़िए अब सायकिल भी कम होती जा रही हैं | मोटर  सायकिल की भरमार दिखती  है | गाँव के युवा अब जींस और टी शर्ट पहनना  ही नहीं सीखे उन्हें ये  भी पता है कि मोबाईल के नए माडल में कितने  फिक्सल का कैमरा और आधुनिक फीचर्स हैं ?

 
संक्षेप में कहें तो गाँव अब शहर बनने को लालायित और प्रयासरत हैं | सरकार ग्रामीण विकास पर करोड़ों लुटाती है | देश की संसद और विधानसभाओं में अधिकतर सदस्य ग्रामीण जनता की नुमाइन्दगी  करते हैं | उनकी तकरीरों में गाँव   और किसान  का दर्द टपकता है | चुनावी  घोषणापत्र  में भी गांवों के उत्थान और खेती को लाभ का व्यवसाय बनाकर किसान की आय बढ़ाने के  सुनहरे वायदे होते हैं |

 और तो और किसानों को कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए ऋण माफी की सौगात भी दी जाती  है | प्राक्रतिक आपदा में फसल खराब होने पर मुआवजे बांटे जाते हैं | मोदी सरकार ने एक तयशुदा राशि  हर तिमाही किसान के खाते में जमा करने की योजना भी चला रखी है | कहने का आशय ये कि गाँव और किसान की बेहतरी के लिए हरसंभव कोशिश चला करती है |

 
लेकिन इसके बाद भी ग्रामीण इलाकों से पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा और उसकी वजह से नगरों और महानगरों में आबादी का बोझ बढ़ता जा रहा है | ये देखने वाली बात है कि बापू के ग्राम स्वराज से मोदी जी की  ‘ सांसद आदर्श ग्राम ‘ योजना तक की गयी कोशिशों में आखिर क्या कमी रह गई जो गाँवों के उजड़ने का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा |

 
और इसका जवाब है कि इसके लिए एक नहीं प्रत्येक ग्राम को न्यूनतम मूलभूत सुविधाओं से सम्पन्न करना होगा | गांधी जी तो रहे नहीं लेकिन प्रधानमन्त्री से तो ये पूछा  ही जा सकता है कि एक आदर्श गाँव बनाने की जो जिम्मेदारी उन्होंने सांसदों को सौंपी थी वह किस हद तक सफल हुई  ? ऐसा लगता है वह योजना या तो अपनी मौत मर गई या फिर मरने की कगार पर है |

 कोरोना के बाद शहरों से जिस बड़ी संख्या में  प्रवासी मजदूरों का पलायन हुआ उसने अनेक अनछुए पहलुओं को उजागर कर दिया | बरसों तक शहर में  रहने के बाद भी अधिकतर के पास न सिर ढंकने  की छत बन पाई और न ही दो चार दिन बैठकर खाने का इंतजाम | शिक्षा , चिकित्सा , आमोद प्रमोद , अच्छा रहन सहन सब उनके लिए सपना ही रहा | हफ्ता भर भी वे शहर में  बिना काम के नहीं रह सके | उधर गांवों में हर किसान का ये रोना हैं कि खेतिहर मजदूर नहीं मिलने से खेती करना कठिन और   महंगा होता जा रहा है |

 कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि इतनी बड़ी आबादी का सही - सही नियोजन करने में हमारा तंत्र पूरी तरह विफल रहा | 

नगर और महानगरों में तो गाँव समां गया लेकिन गाँव नगर नहीं बन सके | वरना बिना किसी संरक्षण और आश्वासन के ग्रामीण युवा शहरों की तरफ क्यों भागता ?

 राजनीति से जुड़े लोगों ने कोरोना की वजह से शहरों से पलायन के लिए मजबूर हुए हजारों मजदूरों की बदहाली पर घड़ियाली आंसू तो खूब बहाए लेकिन किसी ने भी इसके लिए अपनी बिरादरी की नाकामी के लिए प्रायश्चियत करने  की ईमनदारी नहीं दिखाई |

 
लेकिन अब इस विषय पर गम्भीर रस्मी चिन्तन - मनन से उपर उठकर परिणाममूलक प्रयास होना चाहिए | मनरेगा के अंतर्गत 100 दिन के रोजगार की गारंटी मिलने के बाद भी गाँव से मजदूर शहरों की समस्या भरी ज़िन्दगी जीने के लिए क्यों भागा ये केवल आर्थिक ही नहीं सामजिक विज्ञान के लिए भी विचारणीय विषय है |

 
वर्तमान संकट से गुजरने के बाद भारत की तस्वीर में नये रंग  भरने  होंगे | आपदा प्रबंधन को नये सिरे से आकार देना जरूरी हो गया है | हमें अपनी चिकित्सा सुविधाओं और बीमारियों की जाँच हेतु प्रयोगशालाओं के साथ अनुसंधान को भी नई दिशा देनी पड़ेगी | 

इसी के साथ देश की बड़ी आबादी की ऐसी बसाहट  को अमली जामा पहिनाना होगा जिसमें ग्रामीण भारत से पलायन रुक सके | इससे भी बढकर हमें अपने  गाँवों को इतना साफ़ - सुथरा , सुव्यवस्थित और आधारभूत ढांचे से जुड़ी सुविधाओं से युक्त बनाना चाहिए कि गाँवों में रहने वाले महानगरों की और देखना बंद करें | और तो और जो ग्रामीण जन अपना गाँव छोडकर शहरों में बदहाली का जीवन झेल रहे हैं उनमें भी गाँव लौटने का आकर्षण उत्पन्न हो |

ये कार्य आसान नहीं है क्योंकि सचिवालय में बैठे नेता और बड़े बाबू बात चाहे जैसे करें लेकिन वे ग्रामीण भारत के हिस्से के संसाधनों में डकैती मारकर विकास को शहर और महानगरों के शिकंजे में फंसाए रखना चाहते हैं |

 कोरोना ने ये साबित कर दिया कि जितना बड़ा शहर उतनी बड़ी समस्या | बेहतर हो ग्रामीण भारत की क्षमताओं का समुचित उपयोग करने की बुद्धिमत्ता दिखाई जाए | जितना धन स्मार्ट सिटी की योजना पर खर्च हो चुका है उससे बहुत कम में सैकड़ों ऐसे ग्राम बतौर मॉडल विकसित किये जा सकते थे जिन्हें देखने शहर से लोग जाते |

 
और फिर सबसे बड़ा  प्रश्न ये है कि जिस गाँव और खेती का हमारी अर्थव्यवस्था में काफ़ी बड़ा योगदान  है और आज भी जो करोड़ों को रोजगार देने की ताकत  रखता हो , यदि वह विकास के लिए तरसे तो ये किसी भी देश के लिए शर्मनाक बात होगी |

 कोरोना के कारण वायुमंडल का माहौल बदला है | आसमान की नीलिमा अपने मूल रूप में नजर आने लगी है | हवा में शुद्धता का अनुभव होने लगा है , लोगों की जीवन शैली और विशेष रूप से पारिवारिक जीवन नई शक्ल में ढलने की तैयारी कर रहा है | हम अनुशासित होना सीख रहे हैं | अभाव में भी अपने स्वभाव को सहज और सामान्य बनाए रखने की विद्या में प्रवीण हो चले हैं | निजी जीवन में आत्मनिर्भरता के नए - नए पाठ सीखने की उत्सुकता जागी है | और सबसे बढ़कर हम एक जिम्मेदार भारतीय बनकर सामने आये हैं | तब हमें ये भी देखना होगा कि भारत की आबादी के बीच रहन - सहन संबंधी विषमता को किस तरह  कम किया जा सके | और इसका सबसे कारगर तरीका है ग्रामीण भारत पर फोकस करते हुए अपने गाँवों को भी उस स्तर तक विकसित कर देना जिससे उनका पुराना दबदबा , गौरव  और आकर्षण वापिस लाया जा सके | आधुनिक सोच के मुताबिक अब भारत में स्मार्ट गाँवों की स्थापना राष्ट्रीय  प्राथमिकता होगी तो  एक नई क्रांति का आधार बनेगा |

 शहरों में ठंडक और हरियाली की तलाश में पार्कों में जाने वाले शहरियों को उन अमराइयों में बैठने का  अनुभव ही कहाँ है जिनकी  छाँव में शीतलता और हवा में मिठास होती है | मोदी जी ने शौचालय बनवाकर जो कदम उठाया उसने ज्यादा न सही ग्रामीण क्षेत्रों में  बदलाव की शुरुवात तो की है | अब दूसरे चरण में उनका कायाकल्प करने का बीड़ा उठाना चाहिए |

 जिस दिन ये अनुष्ठान पूरा होगा उस दिन भारत सही अर्थों में एक विकसित देश कहलाने लायक बन  जाएगा |

जब उन्हें मालूम होगा कि हमने ,उस रात को देखा था.



 
किसी भी युद्ध में सेनापति का नेतृत्व सबसे महत्वपूर्ण होता है | ऐसे अवसर भी आते हैं जब शत्रु तुलनात्मक रूप से मजबूत होता है | लेकिन ऐसे क्षणों में कुशल सेनापति अपनी सेना में विजय का उत्साह भरता है  और उसकी प्रेरणा से सैनिक भी अभावों और परिस्थितिजन्य दबावों के बावजूद पूरे जोश से मैदान में कूदकर जीत हासिल करके ही मानते हैं | 

इस बारे में एक बड़ा ही प्रसिद्ध प्रसंग है | नेपोलियन बोनापार्ट की सेनाएं युद्ध हेतु जा रही थीं | बीच में आल्प्स पर्वत आ गया | सेना को उसे पार करने में परेशानी हुई तो उसने अपनी असमर्थता व्यक्त की | जैसे ही  नेपोलियन को ये पता चला , वह अपना घोड़ा लेकर आगे आया और बोला समझ लो आल्प्स है ही  नहीं और फिर उसके पीछे पूरी सेना उस पर्वत को पार कर गई |

 भारत भी एक युद्ध लड़ रहा है | और वह भी ऐसे शत्रु से जिसकी आक्रामक क्षमता जबरदस्त है और रणनीति भी कोई नहीं जानता | पौराणिक काल के युद्धों में मायावी तौर - तरीके भी इस्तेमाल होते थे | शत्रु अदृश्य होकर आक्रमण करता था जिसे पराजित करने के लिए दैवीय शक्तियों की मदद लेनी होती थी | आज का युग विज्ञान का है और उसने इस अत्यंत शक्तिशाली अदृश्य शत्रु का नामकरण किया है कोरोना वायरस |

 भारत पर आक्रमण करने से पहले ये शत्रु दुनिया  के अनेक ताकतवर देशों को लोहे के चने चबवा चुका है | इसलिए जब ये भारत पर आक्रमण करने आया तब हमारे पास उससे लड़ने की न तो रणनीति थी और न ही संसाधन | ये कहना भी गलत  नहीं होगा कि उसके आने की आहट होने के बाद भी उसका मुकाबला करने के बारे में हमारी तैयारी पर्याप्त नहीं थी | ये भी कहा जा सकता है कि हमने उसकी ताकत का सही अनुमान नहीं लगाया और ये भी कि अपनी स्वभावगत कमजोरी के चलते ,जब आएगा तब देखेंगे वाली प्रवृत्ति पर चलते रहे |

 लेकिन जब दो - दो हाथ करना मजबूरी हो गयी तब पता लगा कि कोरोना से लड़ाई लम्बी चलने के साथ केवल एक मैदान तक सीमित न रहकर पूरा देश ही युद्धभूमि में बदल जायेगा और ये शत्रु कभी आमने - सामने आकर लड़ेगा तो कभी छापामार शैली का सहारा लेगा |

 इस तरह के युद्ध के लिए न तो हमारे पास पर्याप्त सैन्य बल था और न ही लड़ने के लिए जरूरी अस्त्र - शस्त्र | सेना को रसद की आपूर्ति जारी रखना भी बहुत कठिन समस्या थी | ये भय भी बना हुआ था कि कहीं नेपोलियन  की तरह हमारी सेना भी पर्वत चढ़ने से इंकार न कर दे |

 लेकिन यहीं सेनापति का कौशल और आगे बढ़कर नेतृत्व करने की क्षमता कसौटी पर कसी गई और बीती रात देश ही नहीं अपितु दुनिया ने जो देखा उसके बाद कम से कम ये आत्मविश्वास तो मजबूत हुआ ही कि तमाम प्रतिकूलताओं के बाद हम जीतेंगे क्योंकि सेनापति में नीति बनाने और निर्णय करने की काबिलियत तो है ही लेकिन वह सैनिकों के साथ देश की जनता में भी विजय के प्रति आत्मविश्वास और उत्साह का संचार करने में सिद्धहस्त  है |

 गत रात्रि 9 बजे 9 मिनिट के लिए दीप, मोमबती , टॉर्च या मोबाईल  से प्रकाश उत्पन्न करने का जो आह्वान प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने किया उसकी सफलता तो छोड़िये सार्थकता पर भी अनगिनत सवाल उठाये गये | उसे अंधविश्वास , पागलपन , संकट के समय उत्सव मनाना , अपनी छवि को चमकाने हेतु किया गया इवेंट मैनेजमेंट जैसे विशेषण दिए गए | 9 मिनिट के बाद बिजली के ग्रिड में आने वाली खराबी को लेकर भी ज़माने भर का प्रपंच हुआ |

 ये आरोप भी लगा कि  कोरोना से जान गँवा बैठे लोगों की लाश पर जश्न मनाने जैसी अशोभनीय हरकत की जा रही है | दिन , तरीख , समय , गृह नक्षत्र की स्थिति आदि पर भी जमकर ज्ञान बघारा गया | उसके पहले प्रधानमन्त्री के आह्वान पर 22 मार्च की शाम 5 बजे थाली और ताली बजाने वाले आयोजन के लेकर भी अब तक मजाक उड़ाने का काम जारी है |

 लेकिन गत रात्रि जो हुआ उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि संकट की इस अभूतपूर्व घड़ी में भी देश का विश्वास अपने प्रधानमन्त्री पर है | उन 9 मिनिटों में पूरे देश में जो स्वस्फूर्त उत्साह , एकरूपता और उमंग दिखाई दी वह अधिकतर लोगों के लिए जीवन का ऐसा अनुभव बन गया जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी |

 अब सवाल ये है कि 9 मिनिट के इस आयोजन की जरूरत क्यों पड़ी ? और इसक सीधा जवाब है कोरोना के मरीजों की संख्या में अचानक आया उछाल | और इससे भी बढ़कर तबलीगी जमात से जुड़े लोगों का पूरे देश में फ़ैल जाना | पिछले कुछ दिनों में ही 2 हजार के आसपास झूल रहा कोरोना संक्रमित लोगों का आंकड़ा 3500 पार कर गया जिसमें 30 फीसदी जमात के लोग हैं |

 इसकी वजह से देश में जबरदस्त घबराहट और भय व्याप्त हो गया | 25 मार्च से घरों में बैठे करोड़ों देशवासियों को अनगिनत परेशानियों का जिस प्रकार सामना करना पड़ रहा है उसकी वजह से उनकी मानसिकता भी प्रभावित हो सकती थी | कुछ अप्रिय घटनाओं के कारण अफरातफरी और असंतोष बढ़ने का खतरा भी था | वहीं  सामाजिक स्तर पर विभाजन की आशंका भी प्रबल होने लगी | देश को भीतर से कमजोर करने में लगी   ताकतों के  लिए ये स्वर्णिम अवसर था | और उन्होंने अपने प्रयास शुरू भी कर  दिए थे |  

 ये सब देखते हुए  भावनात्मक एकता के प्रदर्शन के साथ ही विभाजनकारी शक्तियों को ये सन्देश देने की भी जरूरत थी कि देश को अपने नेतृत्व पर विश्वास है और जनता उसके बताये रास्ते पर चलने से इंकार नहीं करेगी |

 
प्रधानमन्त्री चाहते तो संचार माध्यमों के जरिये देश से रोज मुखातिब होते रहते । लेकिन उन्हें पता था कि वह कारगर नहीं होगा | और इसीलिए उन्होंने एक अभिनव तरीका निकला जिसके जरिये पूरे देश में बिना कुछ कहे ही आपसी संवाद कायम हो गया | दीप जलाकर पूरे देश के लोगों के मन में एक सैनिक का भाव श्री मोदी ने भर दिया |

 9 मिनिट के छोटे से समय में पूरे देश की जनचेतना को जगाने का ये चमत्कारिक तरीका पूरी दुनिया के लिए तो अचरज का कारण बना ही , घरों  में बंद भारत की विशाल  जनसँख्या के मन की उदासी और मानसिक तनाव भी काफूर हो गया | जिस उत्साह से लोगों ने समय का पालन करते हुए प्रधानमन्त्री के आह्वान को एक उत्सव की शक्ल दी वह लड़ाई के लम्बे खिंचने की स्थिति में जनता को धैर्य बनाये रखने में सहायक बनेगा |

 14 अप्रैल को लॉक डाउन खत्म हो जाएगा या उसकी अवधि और बढ़ेगी इसे लेकर अभी अनिश्चितता है | लेकिन ये भी सही है कि लॉक डाउन ज्यादा लम्बा होने से अनेक व्यवहारिक दिक्कतें आयेंगीं जिनकी वजह से अव्यवस्था फ़ैल सकती है | उस स्थिति को टालने के लिए जरूरी है कि नेता  और जनता के बीच भावनात्मक एकरूपता बनी रहे और  9 मिनिट के उस प्रयोग की ऐतिसासिक सफलता ने साबित कर  दिया कि श्री मोदी जनता के मन को पढ़ने की कला में पारंगत हैं |

 यदि चुनाव होता तब उनके इस पैंतरे को राजनीति प्रेरित बताकर उसकी आलोचना की जा सकती थी लेकिन वर्तमान माहौल में राजनीति करने का न तो सही समय है और न ही कोई गुंजाईश | प्रधानमन्त्री ने गरीब जनता तक हरसंभव मदद पहुंचाकर सामाजिक असंतोष की जड़ ही खत्म कर दी | इसका बड़ा लाभ हुआ | वरना लॉक आउट को लेकर जिस तरह की लापरवाही आये दिन देखने मिल रही है उसे देखते हुए तो अब तक अराजकता फ़ैल जानी थी |

 हालांकि 9 मिनिट के दौरान अति उत्साही लोगों ने पटाके फोड़कर गम्भीरता को कम किया लेकिन मूल भावना बरकरार रही | प्रधानमन्त्री के आह्वान पर लोग यदि बुझे मन से दीपक या मोमबत्ती  जलाकर रस्म अदायगी कर देते तब शायद पूरी कवायद व्यर्थ चली जाती | लेकिन ये कहने में संकोच नहीं होगा कि आम जनता ने श्री मोदी की उम्मीदों से भी ज्यादा उत्साह दिखाते हुए ये संकेत दे दिया कि वह प्रधानमंत्री का समर्थन ही नहीं सम्मान भी करती है |

 और यही इस जंग में भारत की सबसे बड़ी ताकत है | सेनापति की ईमानदारी और नेतृत्व क्षमता के प्रति सेना ही नहीं जनता के मन में भी भरोसा बनाये रखना सबसे अच्छी रणनीति होती है और सौभाग्य से प्रधानमन्त्री इसमें सफल रहे |

 कोरोना से जंग दीपक और मोमबत्ती जलाने से बेशक नहीं जीती जा सकती लेकिन इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रसंग यहाँ उल्लेखनीय है | प्लासी की लड़ाई में अंगरेज और सिराजुद्दौला की सेनाओं के बीच युद्ध चल रहा था | वह युद्ध देश के भविष्य के लिए निर्णायक था | लेकिन अंग्रेज उसे जीतने में इसलिये सफल रहे क्योंकि क्षेत्रीय जनता अपने सैनिकों की मदद करने नहीं आई | कहने का आशय ये कि निःसंदेह लड़ाई सेना लड़ती है लेकिन उसका मनोबल बढ़ाने के लिए समाज को भी अपना उत्साह प्रदर्शन और भागीदारी करनी होती है |

 कल की रात चंद मिनिटों के लिए भारत की जनता ने ये दिखा दिया कि वह दूर बैठकर नजारा नहीं देख रही बल्कि कोरोना नामक दुश्मन से लड़ रहे सैनिकों के योगदान के प्रति उसके मन में आदर और आभार दोनों का भाव है |

 वे 9 मिनिट कहने को तो बहुत ही छोटा समय था लेकिन उसने इस दौरान जन्मे नये भारत की हिम्मत  और हौसले का एक इतिहास रच डाला | वैसे तो भारत में प्रतिवर्ष परम्परागत तरीके से दीपावली मनाई जाती है लेकिन इस बेमौसम दीपावली के पीछे जो भावना थी उसमें लक्ष्मी की साधना से धन संपत्ति अर्जित करने की इच्छा न होकर देश के स्वस्थ होकर निकलने की प्रार्थना के अलावा कोरोना से लड़ रहे चिकित्सक , सरकारी अमला , ;पुलिस कर्मी , स्वच्छता मित्र , भोजन और जरूरी सामग्री जरुरतमंदों तक पहुंचा रहे निःस्वार्थ स्वयंसेवकों की  सलामती और उत्साह्वर्धन की कामना थी |

 इस अभूतपूर्व और अकल्पनीय दृश्य को देखकर हर भारतीय के मन में देशप्रेम और एकता का जो भाव जागा वह बहुत बड़ी शक्ति बनकर सामने आया है | जो इस लडाई में विजयी होकर निकलने का आधार बनेगा | 

अपने बुजुर्गों से अतीत की ऐतिहासिक घटनाओं का वृतान्त तो खूब सुना था। लेकिन अब हमें भी भावी पीढ़ियों को सुनाने के लिए कल की दीपावली का अकल्पनीय अनुभव मिल गया जिसे सुनकर उन्हें हम पर नाज जरूर होगा।

कोरोना से असली लड़ाई तो अब शुरू हुई है




बीती रात देश एक अभूतपूर्व अनुभव से गुजरा। इस दौरान साबित हो गया कि कोरोना नामक आपदा के बावजूद जनता का मनोबल ऊंचा बना हुआ है और वह लॉक डाउन से हो रही परेशानी के बावजूद व्यवस्था बनाये रखने में शासन - प्रशासन के साथ है। प्रधानमन्त्री ने लॉक डाउन के 12 दिन बीत जाने के बाद जनमानस का मनोवैज्ञनिक परीक्षण करने का जो अभिनव तरीका आजमाया वह अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रहा। चंद अपवादों को छोड़ दें तो प्रधानमन्त्री के अनुरोध पर पूरे देश ने ये दिखा दिया कि वह एकजुट है और इस महामारी से लडऩे के लिए सरकार के प्रयासों के साथ है। कुछ लोगों को इस तरीके में अवैज्ञानिकता नजर आई। ये बात तो दिया जलाने वाले अधिकतर लोगों को भी ज्ञात थी कि नौ मिनिट की यह दीपावाली इस आपदा का इलाज नहीं थी लेकिन इसका जो सांकेतिक महत्व था उसके प्रति आम सहमति से देश में एक आत्मविश्वास का सृजन हुआ जो ऐसे अवसरों पर बेहद कारगर रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जनास्था एक बार फिर पूरे जोशोखरोश के साथ सामने आई। यद्यपि इस जोश में पटाकों का उपयोग हर समझदार को नागवार गुजरा। बीते कुछ दिनों से देश में वायु प्रदुषण की मात्रा में जो कमी आई उसे देखते हुए इस तरह उत्साह का अतिरेक समूचे आयोजन का वह भाग था जिसकी कड़ी आलोचना की जानी चाहिए और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो इसका भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है। ये भी जानकारी में आया कि कुछ अति उत्साही लोगों ने तो अपनी बंदूकों से इस तरह गोलियां दागीं मानों वे जंग जीतकर आये हों। बहरहाल प्रधानमन्त्री की इस पहल से देश में जिस एकजुटता और हौसले का प्रमाण मिला वह भविष्य के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है लेकिन ये भी देखा जाना जरूरी है कि इसे विजयोल्लास मानकर लोग निश्चिन्त न हो जाएं। कोरोना का संक्रमण जिस स्थिति में आ चुका है उसे देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि अभी तक जो भी हुआ वह तो लड़ाई की प्रारम्भिक और आकस्मिक तैयारी थी। असली जंग तो अब शुरू हुई है क्योंकि बीते एक सप्ताह के भीतर ही संक्रमित लोगों का आंकड़ा तेजी से बढ़ते हुए 4 हजार को पार कर चुका है और मृतकों की संख्या में भी लगातार वृद्धि होती जा रही है। ये भी सही है कि संक्रमण का दायरा कमोवेश पूरे देश में फैल गया जिसके लिए दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में स्थित तबलीगी जमात में संक्रमित हुए  सदस्यों का देश के विभिन्न राज्यों में चले जाना है। संक्रमित लोगों के अलावा कोरोना के संदेह के चलते क्वारंटाइन किये गये लोगों की संख्या भी लगातार ऊपर उठ रही है। केंद्र सरकार द्वारा। अप्रैल से बड़े पैमाने पर कोरोना की जांच कराए जाने का कार्यक्रम बनाया गया है। जिसके अंतर्गत जो इलाके संक्रमण के मामले में अग्रणी हैं वहां के रहवासियों की सघन जांच के अलावा दूसरी जगहों से लौटे लोगों की भी जांच का इंतजाम किया जा रहा है। इस प्रकार अब तक जो हुआ वह एकाएक हुए हमले से बचाव का काम था लेकिन अब जो कुछ भी आगे होगा वह सही मायनों में कोरोना पर हमला करने जैसा कहा जा सकता है। क्योंकि अब तक बीमारी के बारे में काफी कुछ जानकारी मिल चुकी है। इलाज के तरीके और औषधियों के बारे में भी चिकित्सा जगत काफी अनुभवी होता जा रहा है। सावधानियों के लिए ज़रूरी उपकरण और सामग्री की आपूर्ति भी होने लगी है। शासन, प्रशासन और समाज के बीच अच्छा समन्वय भी देखा जा रहा है। किसी महामारी से लडऩे में ये सब काफी सहायक होता है किन्तु सबसे बड़ी बात है लॉक डाउन का कड़ाई से पालन होना। जरूरी सामान खरीदने के लिए दिए गये समय और छूट के दौरान जिस तरह की अव्यवस्था अनेक जगहों पर देखी जा रही है वह नुकसानदायक हो सकती है क्योंकि एक संक्रमित व्यक्ति अनगिनत लोगों को कोरोना के जाल में फंसाने की ताकत रखता है। कोरोना के बारे में लापरवाह रवैये का जो नुक्सान इटली , स्पेन और अमेरिका को उठाना पड़ा उससे सबक लेते हुए भारत को अगले चरण में और ज्यादा सावधानी की जरूरत है। इस समय पूरा देश कोरोना मरीजों से भरा हुआ है। तबलीगी जमात से निकले लोगों की पतासाजी करना कठिन कार्य बन गया है। उनके अलावा भी काफी संख्या ऐसे लोगों की है जो संदिग्ध होने के बाद प्रशासन को चकमा देकर गायब हो गए। 14 अप्रैल के बाद लॉक डाउन में कुछ छूट देना जरूरी होता जा रहा है। जरूरी चीजों का जो स्टाक था उससे अभी तक का काम तो चल गया किन्तु जल्द ही उत्पादन शुरू नहीं करवाया गया तो फिर आपूर्ति का संकट पैदा हो सकता है। ऐसे में कारखानों और व्यापारिक गतिविधियों को प्रारम्भ करवाने की कार्ययोजना बनाने के साथ ही ये भी देखना होगा कि इससे सोशल डिस्टेंसिंग नामक व्यवस्था चरमरा न जाए। प्रधानमंत्री बहुत ही सधे कदमों से जनता को मनोवैज्ञनिक तरीके से कोरोना के विरुद्ध मजबूती से खड़े रहने के लिए तैयार तो कर ले गये  लेकिन अब आगे की और भी कठिन लड़ाई के लिए उन्हें देश को मोर्चे पर डटे रहने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना पड़ेगा। लोगों को ये समझ लेना चाहिए कि अंधविश्वास और अति विश्वास दोनों ऐसे अवसरों पर बहुत ही नुकसानदेह होते हैं। भारत भावनाप्रधान देश है। यहां के लोग जितनी जल्दी उत्साहित होते हैं उतनी ही जल्दी उनमें निराशा भी घर कर जाती है। इसी तरह जरा सी ढिलाई होते ही वे अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लांघने को आतुर हो उठते हैं। इसलिए आगे की जंग बेहद महत्वपूर्ण है । अभी तक कोरोना का स्वरूप एक बड़ी बीमारी तक ही सीमित रहा लेकिन जरा सी असावधानी उसे महामारी में बदल सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 April 2020

कोरोना में छिपे संदेश और संकेत को समझना ज़रूरी



कोरोना वायरस से लगभग पूरी दुनिया पीडि़त हो गयी है। कुछ देशों तक इसका प्रकोप भले ही नहीं पहुंचा लेकिन कमोबेश अधिकतर में उसका पदार्पण हो चुका है। इसके परिणामस्वरूप सामान्य जनजीवन ठहर गया है। लोग घरों तक सीमित हैं। सड़कों पर यातायात न के बराबर है। वाहनों की कतारें नजर नहीं आती। न कहीं जाम है न ही पार्किंग की किल्लत। ट्रक, रेल, बस, हवाई जहाज सभी रुके पड़े हैं या उनका परिवहन बेहद सीमित हो गया है। कल-कारखानों में भी उत्पादन नहीं हो रहा। दुकानें, शॉपिंग माल, मल्टीप्लेक्स बंद पड़े हैं। लॉक डाउन ने लोगों को घरों की चहार दीवारी में सिमट जाने मजबूर कर दिया है। 21 वीं सदी की तेज गति से दौडऩे वाली दुनिया का इस तरह रुक जाना एक अकल्पनीय अनुभव है। क्या होगा इसका आभास कोई भी नहीं कर पा रहा। फिलहाल तो पूरा ध्यान कोरोना  से लडऩे पर केन्द्रित है। मानव जाति पर लगभग 100 वर्ष बाद इतना बड़ा खतरा आया है। कहते हैं पिछली महामारी में 5 करोड़ लोग जान से हाथ धो बैठे थे। लेकिन तब चिकित्सा विज्ञान और संचार माध्यम इतने विकसित नहीं होने से आपदा का मुकाबला करने की क्षमता भी नहीं थी। कोरोना के आने तक दुनिया काफी आगे बढ़ चुकी है। खबरों और जानकारियों का आदान-प्रदान पलक झपकते ही सम्भव है। यही वजह है कि महामारी से बचने और लडऩे के तौर-तरीके खोजने में तनिक भी समय खराब नहीं किया गया। ये भी कहा जा रहा है कि यदि चीन ने कोरोना के बारे में  शुरुवाती जानकारी देने में देर नहीं की होती तब शायद आपदा  इतनी गम्भीर नहीं हो पाती और उसका फैलाव भी रोका जा सकता था। लेकिन जैसे ही जानकारी बाहर आई वैसे ही पूरी दुनिया ने उसकी भयावहता को समझते हुए इस अदृश्य दुश्मन से मुकाबला  शुरू कर दिया। आये दिन इस आशय की  खबरें आती हैं कि कोरोना का टीका बना लिया गया है और जल्द ही उसकी आपूर्ति दुनिया भर में शुरू  हो सकेगी। कोरोना के इलाज की दवाइयां भी खोज ली गईं और उससे बचाव का सबसे कारगर तरीका मानव का एक दूसरे से शारीरिक दूरी बनाये रखना मान लिया गया। सोशल डिस्टेंसिंग नामक इस नये तरीके के साथ ही लॉक डाउन नामक व्यवस्था भी लागू कर दी गई। केवल अति आवश्यक कार्य से ही घर से बाहर आने के अनुमति इसके अंतर्गत है और वह  भी सीमित अवधि के लिए। ये एक अभूतपूर्व स्थिति है जिसकी कल्पना उन लोगों तक ने नहीं की थी जो समय-समय पर दुनिया के नष्ट होने की भविष्यवाणी किया करते थे। हालीवुड के वे फिल्म निर्माता जो स्टार वार जैसी काल्पनिक पटकथा पर भव्य फिल्में बना चुके हैं, उनके दिमाग में भी कोरोना जैसी महामारी की संभावना नहीं आई। लेकिन अब ये एक ऐसी  वास्तविकता है जिसने फिलहाल तो ज्ञान-विज्ञान और इंसान तीनों का घमंड तोड़कर रख दिया। एक अति सूक्ष्म अदृश्य वायरस के आगे पूरी दुनिया जिस तरह असहाय होकर रह गई उसने एक नई जीवन शैली की बुनियाद भी रख दी है। यद्यपि विकास की वासना के वशीभूत मनुष्य कोरोना से मुक्त होते ही फिर उसी ढर्रे पर लौट जाएगा, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन ये भी सही है कि लॉक डाउन के दौरान हर व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों से परिचित और अभ्यस्त  हो गया जो उसके लिए एकदम नई थीं। भले ही अब संयुक्त परिवार गिने-चुने रह गये हों लेकिन हम दो हमारे दो वाले छोटे परिवारों में भी सहजीवन का जो नया अनुभव बीते कुछ दिनों में हुआ उसका प्रभाव दूरगामी हो सकता है  चूंकि आगे भी भीड़भाड़ से बचने की एहतियात बरतनी होगी इसलिए पारिवारिकता की भावना और जुड़ाव लोगों की मानसिकता का हिस्सा बन जाएगा। सबसे बड़ी बात ये देखने में आई कि इस दौरान न सिर्फ भारत अपितु पूरी दुनिया का पर्यावरण पूरी तरह से अपेक्षित मानदंडों के अनुरूप आ गया। आज की एक खबर ने वाकई बहुत उत्साहित किया और वह है जलंधर से  200 किमी दूर स्थित धौलाधार पर्वत का नंगी आँखों से दिखाई देना। ये इसलिए सम्भव हो सका क्योंकि वातावारण में छाया धुंध पूरी तरह खत्म हो चुका है। इसी तरह दिल्ली जैसे सबसे प्रदूषित महानगर में स्वच्छ नीला आसमान देखना संभव हो सका। पूरी दुनिया में कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आने से जल , जंगल , जमीन सभी चैन की सांस ले रहे हैं। प्रकृति की खूबसूरती बयाँ करते पहाड़ भी सैलानियों की भीड़ और उनके वाहनों से निकलने वाले धुंए से मुक्ति के कारण अपने अस्तित्व को लेकर निश्चिन्त होने लगे हैं। ये एक आदर्श स्थिति है। लेकिन सवाल उठता है कि कोरोना से मुक्त होते ही  क्या मानव जाति दोबारा ऐसे ही आत्मसंयम का पारिचय देगी या फिर उसी आपाधापी भरी जि़न्दगी की तरफ  लौट जायेंगे जिसने प्रकृति और पर्यावरण को जबर्दस्त नुकसान पहुँचाया और हमारी साँसों को धीमा जहर खींचने को मजबूर किया। सवाल और भी हैं। कोरोना के बाद इससे भी खतरनाक आपदा आ सकती है क्योंकि मनुष्य अपनी सीमा का उल्लंघन करते हुए वह सब जानने और हासिल करने का दुस्साहस करने  पर आमादा है  जिसकी उसे कोई जरूरत नहीं थी। भारतीय संस्कृति में जिस जीवन शैली को प्रातिपादित किया गया वह प्रकृति के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं अपितु सामंजस्य पर जोर देती है। कोरोना के बाद की जि़न्दगी यदि उसी रास्ते पर चले तब इस आपदा से भी उपलब्धि हासिल की जा सकेगी। इस महामारी में छिपे सन्देश और  संकेत को उनके सही अर्थों में समझ लेना ही बुद्धिमत्ता होगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 April 2020

ये जाहिलपन इंसानियत पर हमला है



गत दिवस अनेक स्थानों से चिकित्सकों, नर्सों एवं कोरोना वायरस के प्रकोप से लड़ रहे शासकीय अमले के साथ मारपीट , दुव्र्यवहार की जो खबरें आईं उनको सुनने के बाद ये लगा कि इंसान की शक्ल में भेडिय़ा वाली उक्ति  ऐसे ही लोगों के लिए बनाई गई होगी। इंदौर की  एक बस्ती में जाँच हेतु गये दल पर पथराव किया गया जिससे उसे जान बचाकर भागना पड़ा। उल्लेखनीय है इंदौर मप्र में कोरोना का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है सबसे ज्यादा मौतें भी वहीं हो रही हैं तथा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं। शासन के कड़े रुख के बाद हमलावर पकड़े गए और उनके विरुद्ध रासुका के अंतर्गत कार्रवाई होने की बात कही गई है जो पूरी तरह जायज है। ऐसा ही दिल्ली में भी सुनाई दिया। वहां तबलीगी जमात के मुख्यालय मरकज से निकाले गये जिन जमातियों को क्वारंटाइन में रखा गया वे नियमों का उल्लंघन करने पर आमादा हैं। बजाय एक दुसरे  से दूर रहने के सामूहिक नमाज पढ़ रहे हैं। यही नहीं चिकित्सकों को जांच नहीं करने दे रहे और कह रहे हैं उन्हें कुछ नहीं है और  होगा भी तो अपने आप ठीक हो जायेंगे। गाजिय़ाबाद से खबर मिली कि जमात के जो लोग क्वारंटाइन हैं वे नग्नावस्था में घूमते हुए  ड्यूटी कर  रही नर्सों को अश्लील इशारे कर रहे हैं।  बीड़ी-सिगरेट की मांग  भी उनने  रखी। उनके आपत्तिजनक आचरण के विरुद्ध वहां के जिलाधिकारी ने लिखित शिकायत की। दिल्ली में तो नमाजियों के उत्पात को रोकने चिकित्सा स्टाफ  के साथ पुलिस तैनात करनी पड़ी। सिकंदराबाद में क्वारंटाइन किये अनेक जमातियों ने मनपसंद भोजन नहीं मिलने की शिकायत करते हुए हंगामा मचाया। बिहार , उप्र , गुजरात सहित अनेक राज्यों से भी कोरोना मरीजों की जांच और सेवा में लगे लोगों पर हमले , दुव्र्यहार और इलाज से इनकार की खबरें लगातार आने से पूरा देश चिंतित हो उठा। इस बीच निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मुख्यालय के मौलाना साद  का एक आडियो सन्देश प्रसारित हुआ जो उनके पूर्व में दिए उस भाषण के एकदम  विपरीत था जिसमें वे अपने अनुयायियों को दूर रहने की बजाय मस्जिद में पास-पास रहने की हिदायत देते हुए कोरोना से बचाव के तरीकों को इस्लाम के विरुद्ध साजिश बताकर कह रहे थे कि मरना ही है  तो मस्जिद में आकर मरो जो इसके लिए सबसे अच्छी जगह है। लेकिन अब वही मौलाना अपने ताजे बयान में सफाई दे रहे हैं कि उन्होंने खुद को क्वारंटाइन किया हुआ है। साथ ही ये अपील भी कर डाली कि कोरोना संबंधी सरकार की सलाह को मानकर सोशल डिस्टेसिंग का पालन करें। ऐसा लगता है सरकार द्वारा कसे गए शिकंजे के बाद जेल जाने के भय से वे पलटी मार गये लेकिन इसके पहले के अपने रवैये से उन्होंने  कोरोना के विरुद्ध लड़ाई को कितना नुकसान पहुंचाया ये किसी से छिपा नहीं है। उनके अडिय़ल रुख की वजह से ही देश भर में उनके अनुयायी अमानवीय व्यवहार करने लग गए। यही नहीं मुस्लिम समुदाय के बाकी तबके भी कोरोना के विरुद्ध चल रही लड़ाई को उनकी धार्मिक आस्था के विरुद्ध मानकर असहयोग पर उतारू हो गए। ये तो ठीक है कि देश भर में उन हरकतों की घोर निंदा हुई लेकिन इस वजह से अच्छा भला सामाजिक वातावारण भी  खराब हो गया। ऊपर से सुप्रसिद्ध शायर मुनव्वर राणा ने कोरोना को मुसलमान बनाये जाने जैसा तंज कसकर आग में घी डालने जैसा काम कर दिया। ये समय है जब मुस्लिम समुदाय के शिक्षित  और सुलझे हुए लोग सामज का नेतृत्व करने आगे आयें। धर्मगुरुओं के निर्देश यदि केवल धर्म पालन तक सीमित रहें  तब तो ठीक लेकिन वे यदि देश और मानवता के विरुद्ध हों तो उनका प्रतिकार बुद्धिजीवियों को करना चाहिए। संकट के समय ही समाज सुधार की प्रक्रिया जन्म लेती  है और भारत के मुस्लिम समाज के लिए भी ये सुनहरा अवसर है। लेकिन इसकी बागडोर बुद्धिजीवियों को संभालना पड़ेगी। इस बारे में भारत के मुसलमानों को संयुक्त अरब अमीरात से भी सीखना चाहिए जहां इस्लाम का पालन किये जाने के साथ ही आधुनिक सोच को भी बराबरी से स्वीकार करते हुए विकास की राह पर बढ़कर आधुनिकता और परम्परा का संतुलन बनाए रखा गया। ज्ञान-विज्ञान के रास्ते पर चलते हुए भी धर्म का पालन किया जा सकता है ये बात हर किसी को समझ लेनी चाहिए। कोरोना जैसी महामारी से लडऩे के लिए अंधविश्वास से ऊपर उठकर रचनात्मक और सहयोगात्मक सोच की जरूरत है। गत दिवस प्रधानमन्त्री ने मुख्यमंत्रियों से वीडियो चर्चा के दौरान भी इसीलिये धर्मगुरुओं की मदद लेंने की सलाह दी जिससे मौलाना साद जैसे विध्वंसक मानसिकता वाले तथाकथित धर्मगुरु मानवता विरोधी षडय़ंत्र में सफल न हो सकें। भारत में कोरोना जिस स्थिति में पहुंच गया है वहां से उसे रोकने के लिए पूरे देश के संयुक्त प्रयास जरूरी हैं। यदि कोई एक समुदाय या धर्मगुरु उन कोशिशों को बेअसर करने की कोशिश करता है तो उससे अब तक की गयी तमाम कोशिशों पर पानी फिर जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 1 April 2020

मरकज ने लॉक डाउन को विफलता के कगार पर ला खड़ा किया



कल जब दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाके में स्थित तबलीगी जमात के मुख्यालय मरकज़ में हजारों मुस्लिम धर्मप्रचारकों के जमा होने का मामला सामने आया और कोरोना  वायरस का संक्रमण फैलने की पुष्टि के बाद  मरकज के मौलाना पर लॉक डाउन के उल्लंघन का आरोप लगा तब परम्परानुसार एक वर्ग विशेष केंद्र सरकार के साथ  दिल्ली सरकार तथा पुलिस को कठघरे में खड़ा करने के अभियान में जुट गया। ऐसा प्रचारित करने का प्रयास हुआ मानो मौलाना साहब और मरकज के भीतर जमा हजारों देशी  - विदेशी मुस्लिम हालात  के मारे हैं जो प्रधानमंत्री के  उस निर्देश का पालन कर रहे थे  कि लॉक डाउन में जो जहां है वही रुका रहे। इसी के साथ मरकज ने ये सफाई  भी दी कि उसने प्रशासन से लोगों को हटाने के लिए सहायता माँगी लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया। ये बात भी उठी कि जब दिल्ली सरकार और पुलिस को  पता था कि मरकज में हजारों लोग बैठे हैं तब उसने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाया ? पहली नजर में  ये लगा कि मरकज को व्यर्थ में फंसाया जा रहा है। ये बात भी सही है कि यदि वहां ठहरे एक वृद्ध की तबियत खराब होने पर अस्पताल न ले जाया जाता और उसकी मृत्यु नहीं होती तब शायद कोई हल्ला नहीं मचता। उसके बाद से ही मरकज में छापामारी हुई और फिर जो हुआ वह देश के सामने है। मुस्लिम समुदाय का नाम आते ही धर्मनिरपेक्षता के तथाकथित प्रवक्ता हरकत में आ गये और मौलाना को बेचारा साबित करने  का सुनियोजित अभियान चल पड़ा। लेकिन शाम होते तक ये बात स्पष्ट होने लगी कि मरकज के कर्ताधर्ताओं ने सरकार द्वारा दिए गये सभी निर्देशों की जमकर अवहेलना की। दिल्ली सरकार ने लॉक डाउन के काफी पहले ही धार्मिक आयोजनों पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। मरकज का ये दावा तब गलत साबित हो गया जब मरकज से सटे निजामुद्दीन थाने  के प्रभारी का एक वीडियो सामने आ गया जिसमें वे मरकज के छह संचालकों को  साफ़ - साफ़ याद दिला रहे हैं कि आप लोगों को कई बार कह दिया गया कि मरकज खाली कर दिया जावे। प्रभारी ने उन्हें ये भी कहा कि वहां ठहरे लोगों को निकालने  के  लिए वाहन आदि भी उपलब्ध करवा दिए जायेंगे। इसी के साथ ही प्रभारी ने उन्हें बाकायदा नोटिस भी दिया तथा उसकी अवहेलना करने पर सख्त कार्र्वाई की चेतावनी के साथ ये समझाइश भी दी कि  ये सब वे अपने नहीं बल्कि उनकी जीवन रक्षा के लिए कह  रहे हैं। उक्त वीडियो 23 मार्च का है।  मरकज की और से उस वीडियों का अब तक तो खंडन नहीं  किया गया। उधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने उपराज्यपाल को पत्र लिखकर मरकज के विरूद्ध मामला दर्ज करने का आग्रह किया। जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने मौलाना और संस्थान के बाकी संचालकों के विरुद्ध अपराधिक प्रकरण दर्ज कर लिया। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। मरकज के मौलाना की हठधर्मिता के विरुद्ध मुस्लिम समाज के भीतर से भी कुछ आवाजें उठीं लेकिन अभी भी कुछ लोग इस जनविरोधी कृत्य का बचाव करने में लगे हैं , जो शर्मनाक है। मरकज का जमावड़ा  केवल धारा 144 और लॉक डाउन का उल्लंघन होता तो हालात के मद्देनजर एक बार नरमी की भी जा सकती थी किन्तु उसकी वजह से दिल्ली ही नहीं पूरे देश में कोरोना संक्रमण का जो खतरा पैदा हो गया उससे लॉक डाउन पूरी तरह विफल होने के कगार पर आ  गया है। अभी तक मिली जानकारी के अनुसार मरकज से लौटे अनेक लोगों की मौत हो चुकी है और दिल्ली सहित देश के  दूसरे  हिस्सों में उनकी वजह से सैकड़ों  लोग संक्रमित हो चुके हैं तथा हजारों के संक्रमित होने की आशंका बढ़ गई है। इस्लामी कट्टरपंथ का प्रचार करने वाली इस संस्था के आयोजन में पर्यटक वीजा लेकर आये विदेशी मुस्लिम वहां से  निकलकर देश के अन्य हिस्सों में मस्जिदों तथा दूसरी जगहों पर रुककर धर्म प्रचार में लगे रहे जो वीजा नियमों का उल्लंघन है। 12 हजार लोगों के ठहरने की क्षमतायुक्त मरकज में साल भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। कोरोना संकट आने के बाद जब लॉक डाउन के अलावा लोगों को  एक दूसरे से दूर रहने की सलाह दी गई तब मरकज के मौलाना ने अपने अनुयायियों को उसके विरुद्ध भड़काते  हुए इन व्यवस्थाओं को मुस्लिम  विरोधी बताया और मस्जिद में आने तथा मिलने जुलने की हिदायत दी। इसका भी वीडियो सार्वजनिक हो चुका है। पुलिस और प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई का भी जिस गंदे तरीकों से विरोध हुआ वह मरकज के लोगों की दुष्प्रवृत्ति का प्रमाण है। फिलहाल तो उसे सील कर दिया गया है। मामला पुलिस में दर्ज होने के बाद क्राइम ब्रांच इस समूचे मामले की जाँच करेगी लेकिन ऐसे धार्मिक केन्द्रों की पहिचान कर उन्हें बंद ही करवा देना चाहिए। कुछ सिरफिरे मौलाना पूरे  इस्लाम के प्रवक्ता नहीं हो सकते। ऐसे लोगों ने ही मुसलमानों की छवि   खराब करने का पाप किया है। इस बारे में सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे देश में वोटबैंक की राजनीति ने मरकज जैसे संस्थानों का हौसला बुलंद किया है। अरविन्द केजरीवाल को तो मुस्लिम विरोधी  नहीं माना जाता लेकिन वे भी ये कहते सुने गए कि जब मक्का खाली हो गया, मंदिर-मस्जिद बंद हो गये तब मरकज में हजारों के हुजूम को बनाये  कहना बहुत गलत था। बेहतर हो ऐसे मामलों में धर्म को बीच में न लाते हुए ये देखा जाए कि मरकज की हेकड़ी ने देश में हजारों लोगों की जि़न्दगी खतरे में डाल दी है। अच्छा होगा मुस्लिम समुदाय ऐसे शातिर और अव्वल दर्जे के गैर जिम्मेदार मुल्ला - मौलवियों से खुद को बचाए वरना ये खुद तो डूबेंगे ही साथ में उनको भी ले डूबेंगे। इस्लाम का नाम बदनाम होगा सो अलग। मुस्लिम कौम को उसके धर्म का पालन करने का पूरा अधिकार है लेकिन उन्हें ये बात समझ लेनी चाहिए कि देश कानून से चलता है न कि धर्मगुरुओं के फतवे या निर्देश से। और कोई भी धर्म इंसानी जि़न्दगी को खतरे में डालने का अधिकार नहीं रखता। एक कमरे में छींकते-खांसते आठ-दस लोगों को बिना इलाज रखने वाला मौलाना कुछ भी हो धर्मगुरु तो कतई नहीं हो सकता।

-रवीन्द्र वाजपेयी