Friday, 10 April 2020

क्या आप नहीं चाहेंगे गंगा ऐसी ही बनी रहे ?और क्या मनुष्य तथा मशीन की तरह प्रकृति को भी अवकाश और विश्राम नहीं मिलना चाहिए ?



 मैं न तो पर्यावरण विशेषज्ञ हूँ और न ही इसके संरक्षण के लिए सक्रिय किसी संस्था या गतिविधि से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ा ही हूँ | 

लेकिन प्रकृति के साथ हो रहे  अत्याचार से उत्पन्न स्थितियां मुझे सदैव  पीड़ा पहुंचाती हैं | मेरे जैसे अनगिनत लोग देश और दुनिया में और होंगे जिनके  मन  भी पर्यावरण की निरंतर बिगड़ती सेहत देखकर दर्द का अनुभव करते हैं | जल , जंगल , जमीन के अलावा जल स्रोतों के संरक्षण के लिए हमारे देश में भी दुनिया के बाकी देशों जैसी चिंता जताई जाती है | उसके लिए दिखावे भी खूब होते हैं और ईमानदार  प्रयास भी | करोड़ों - अरबों का खर्च होने एवं अनेक कानून बन जाने के बाद भी  पर्यावरण को हो रहे नुकसान को रोक पाने में अब तक विफलता ही हाथ लगी |

 इसका सबसे बड़ा उदाहरण है गंगा नदी को शुद्ध करने का अभियान | स्व. राजीव गांधी ने इसकी शुरुवात  की थी | तब से अब तक आई हर केंद्र सरकार ने गंगा शुद्धिकरण पर जी भरकर पैसा खर्च किया | 

2014 में वाराणसी से लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद नरेंद्र  मोदी ने भी नमामि गंगे नामक एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई और उमाश्री भारती को उसका मंत्री बना दिया | लेकिन वे भी कुछ नहीं कर  पाईं | उसके बाद ये काम दिया गया मोदी सरकार के सफलतम मंत्री कहे जाने वाले नितिन गडकरी को | उनके दौर में गंगा की सफाई के साथ उसमें जल परिवहन की संभावनाएं भी आकार लेती दिखीं | लेकिन अविरल और निर्मल गंगा का सपना अधूरा ही है |

 गंगा क्यों गंदी है और उसकी सफाई के सारे प्रयास अपेक्षित सफलता तक क्यों नहीं पहुँच सके इस बात का प्रश्न गंगा को करीब से जानने वाला साधारण इंसान भी दे सकता है |

 स्व. राज कपूर की फिल्म का ये गीत बड़ा ही प्रसिद्ध हुआ था :- राम तेरी गंगा मैली हो गई , पापियों के पाप धोते - धोते | हालांकि उस फिल्म का गंगा  के मैले होने से दूर दराज तक सम्बन्ध न था | और भी  फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों में गंगा को कथानक का हिस्सा बनाया लेकिन वह दर्शकों की भावनाओं को भुनाने की व्यवसायिक सोच से आगे कुछ भी नहीं था | 

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ऋषिकेश में ज्योंहीं वह मैदान में उतरती है वहां से लेकर गंगासागर तक उसके किनारे पर देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य और उनके बड़े शहर पड़ते हैं | ये नगर ज्यों - ज्यों विकास की सीढ़ियां चढ़ते गये त्यों - त्यों गंगा विनाश का शिकार होने मजबूर होती गई |

 अब ये बताने की जरूरत नहीं है कि नालों और सीवर के पानी के अलावा औद्योगिक इकाइयों का कचरा इसमें मिलकर इसके अमृत तुल्य जल की विलक्षण पवित्रता को लुप्त होने  के लिए मजबूर करता रहा है | सतह पर तैरती लाशें और उसे नोचते कुत्ते तो मैनें अपनी आँखों से देखे जिसके बाद उस दिन मैं बिना गंगा स्नान किये ही लौट आया | काफी बरस पहले वाराणसी में गंगा स्नान के समय डुबकी लगाते समय मेरे हाथ से कुछ टकराया और जब उसे पकड़कर निकाला तो वह एक मानव खोपड़ी थी | जिसके बाद मैं गंगा स्नान के प्रति उदासीन हो गया |

 यद्यपि गंगा के प्रति मेरी श्रद्धा जन्मजात संस्कार है | ऋषिकेश में कई बार  अनेक दिनों तक रहने के दौरान उससे निकट साक्षात्कार का भी अवसर मिला | गंगा के पृथ्वी  पर अवतरण की साक्षी  गंगोत्री तक भी मैं गया | पूरे मार्ग में गंगा घाटी की अलौकिक सुन्दरता ने मन को गहराई तक मोह भी लिया किन्तु उसके बाद गंगा  की जो दुर्दशा उसके भक्तों द्वारा की गई उसे देखकर  ये लगने लगा कि  अब अपने जीवन काल में हमें शुद्ध गंगा जल नसीब नहीं हो सकेगा | 

हालाँकि जैसा दावा होता है उसके अनुसार अलाहाबाद , वाराणसी और कानपुर में इस दिशा में काफी काम हुआ हुआ है  लेकिन उसके बाद भी गंगा की प्रकृति प्रदत्त निर्मलता धार्मिक ग्रंथों में दिए वर्णन तक ही सिमटकर रह गयी लगती है |

 लेकिन अचानक ऐसा कुछ हुआ जिसे किसी  चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता | वाराणसी में शहर के बीच बने घाटों पर गंगा जल इतना साफ़ हो  गया कि देखने वाले चौंक गए | यही नहीं तो मछलियां चहल कदमी करते हुए घाटों की सीढ़ियों तक आकर  जल में साफ़ नजर आने लगीं | गंगा की सफाई से जुड़े विभागों के  लोगों ने जब प्रदूषण का स्तर मापने वाले यंत्र डुबोये तो जल में आक्सीजन की मात्रा में आश्चर्यजनक वृद्धि पाई गयी | ये भी तब जबकि नालों का पानी बदस्तूर उसमें मिलता दिख रहा है | टीवी चैनलों पर ये समाचार देखकर मन को जो संतोष हुआ वह अवर्णनीय है | और मैं अकेला नहीं वरन दुनिया में कहीं भी बैठा हिन्दुस्तानी गंगा की निर्मलता के लौट आने पर उतना ही खुश हुआ होगा |

 और फिर दिल्ली से खबर आ गयी कि नाक पर रुमाल रखने के लिए मजबूर कर  देने वाली यमुना की दशा में भी आश्चर्यजनक सुधार हुआ है | राजधानी की आवोहवा भी आजादी के बाद पहली बार इतनी शुद्ध हुई | कोई आसमान की नीलिमा को देखकर मंत्रमुग्ध है तो किसी को लग रहा है कि रात के समय आसमान में इतने तारे उसने पहले कभी नहीं देखे |

 उधर जलंधर से 200 किमी दूर स्थित धौलाधार पर्वतमाला नंगी आँखोँ से दिखाई देने लगीं | अनेक बुजुर्गों ने ये स्वीकार किया कि ऐसा लगभग चार दशक बाद उन्होंने देखा | चंडीगढ़ से शिवालिक पर्वत माला की चोटियों पर जमी बर्फ साफ़ नजर आने से युवा पीढ़ी को रोमांचकारी अनुभव हुआ वहीं बुजुर्गों को लगा जैसे बरसों पहले खो गया उनका अजीज उन्हें फिर मिल गया हो |

 पूरे देश से ऐसी ही खबरें आने लगीं | बताने की जरूरत नहीं है ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि देश में बीते दो सप्ताह से इंसानी  ज़िन्दगी घरों की चहार दीवारी  में सिमटकर रह गई है और प्रकृति को अपनी मर्जी से जीने की आजादी दोबारा हासिल हो सकी | 

सवाल ये उठ रहा है कि लॉक डाउन  हटने  बाद भी क्या कुदरत को चैन से जीने का ऐसा अवसर दोबारा मिल सकेगा ? और उसका उत्तर सोचते ही मन एक बार फिर खिन्न हो जाता है |

 कोरोना नामक  महामारी से इंसानी जिन्दगी बचाने के लिए दुनिया भर का ज्ञान - विज्ञान  पूरी ताकत से लगा है । लेकिन जिस प्रकृति की कृपा से हम सांस लेते हैं उसका दम घोंटने में हमारे हाथ क्यों नहीं कांपते , इसका उत्तर कोई नहीं देता क्योंकि अपराधबोध ऐसा  करने से रोक जो देता है |

गंगा जल में आक्सीजन की मात्रा बढ़ने से उसकी गुणवत्ता में हुए सुधार ने मछलियों को नवजीवन दे दिया | बीते अनेक दिनों से श्रद्धालुओं के न आने से घाटों के किनारों पर गंदगी नहीं होने से मछलियां  बिना डरे वहां विचरण करती दिखने लगीं | ये भी कहा  जा सकता है कि मनुष्य की गैर मौजूदगी में गंगा को खुलकर सांस लेने का अवसर मिल गया |

 और अकेले गंगा को ही क्यों देश की सभी नदियों को एक तरह से अपनी मर्जी से जीने  का अवसर इस लॉक डाउन ने मानो दे दिया है | नदी के अलावा भी प्रकृति के तमाम प्रतिनिधि इस समय अभूतपूर्व राहत का अनुभव कर रहे हैं | आसमान में भरने वाला धुआं गायब  होने से पर्यावरण संबधी  मापदंड पहली मर्तबा पूरी तरह खरे साबित हुए हैं |

 लेकिन ये दौर अस्थायी है | कोरोना से जारी जंग जब भी खत्म होगी और मानव जीवन फिर से पहले जैसी स्थिति में लौटेगा तब प्रकृति और पर्यावरण के बुरे दिन लौट आयंगे |  न मीलों दूर की बर्फीली चोटियाँ नजर आएंगी और न ही नीले आसमान में चमकते तारों की कतारें | दिल्ली जैसे महानगरों  की हवा में जहर फिर लौट आयेगा और यमुना से  दुर्गन्ध आने लगेगी | गंगा तट  पर जल क्रीड़ा  कर रही मछलियों से उनकी मस्ती छीन ली जायेगी |

 इसका अर्थ तो यही हुआ न कि प्रकृति और पर्यावरण के साथ हुए अत्याचार के लिए मानव जाति ही अकेली कसूरवार है | दूसरी तरफ ये भी सही है कि आज की ज़िन्दगी में प्रकृति को पूरी तरह  बचाकर रखना असम्भव न सही लेकिन बेहद मुश्किल तो है ही |

 ऐसे में ये सवाल तो उठेगा ही कि क्या महामारी से मुक्ति  पाते ही सब कुछ पूर्ववत हो जायेगा या इस दौरान प्रकृति से मिले मित्रता संदेशों का सम्मान करने की सौजन्यता हम दिखायेंगे ? ज्यादा न सही केवल इतना ही कर दिया जावे कि कोरोना से उबरने के बाद गंगा सहित बाकी नदियों के शुद्धिकरण के  सरकारी कर्मकांड को यथावत रखते हुए उसमें स्नान को लेकर कुछ बंदिशें लगाई जाएं | 

लॉक डाउन के दौरान हिन्दू , जैन , मुस्लिम , इसाई और सिख सभी धर्मों के कुछ प्रमुख त्यौहार आये और कुछ जल्द आ रहे हैं | चूँकि इनके भव्य आयोजन से इंसानी जिंदगियों को खतरा था इसलिए बड़े से बड़े धार्मिक लोगों ने घरों के भीतर रहकर ही अपनी आस्था का निर्वहन किया |

 लेकिन और कोई वजह होती  तब धार्मिक आजादी छीने जाने का बवाल सड़क से संसद और सर्वोच्च न्यायालय तक मच गया होता | इससे ये बात तो साबित हो ही गई कि प्रकृति प्रदत्त धरोहरों को नुकसान पहुंचाए बिना भी हमारी धार्मिकता अक्षुण्ण रह सकती है |

 हम सबका  विश्वास है कि पूरी दुनिया ईश्वर ने बनाई है और प्रकृति भी उसी का अभिन्न हिस्सा है | ब्रह्माण्ड में केवल पृथ्वी ही ऐसा  गृह है जहां प्रकृति अपने सम्पूर्ण सौन्दर्य के साथ  मौजूद है | और वह इसलिए क्योंकि उसके सान्निध्य के बिना मानव जाति का अस्तित्व असमभव है | ऐसे में सवाल है कि किस धर्म का भगवान अपने बनाये मानव की रक्षा तो चाहेगा लेकिन अपनी ही बनाई प्रकृति को धीमा जहर देकर मारने की अनुमति देगा ?

 कोरोना से जूझती हुई दुनिया में अब ये विचार - विमर्श चल पड़ा है कि इस महामारी के गुजर जाने के बाद भी क्या सब कुछ पहले जैसा चलता रहेगा या फिर ज़िन्दगी जीने के तौर - तरीके बदलने के लिए इंसानी सोच भी बदलेगी | यहाँ तक कि ईसा पूर्व और ईसा पश्चात जैसे ही कोरोना पूर्व और पश्चात दो कालखंड माने जायेंगे |

 लेकिन इस महामारी के दौरान घरों में सीमित रहकर मानव जाति ने प्रकृति को खुलकर जीने का जो अवसर दिया वह भले ही परिस्थितिजन्य मजबूरी हो किन्तु  भविष्य में भी ये इतनी ही जरुरी बने इसके लिए हमें कमर कसनी होगी | चाहे गंगा - यमुना हों या देश भर में प्रवाहित होने वाली अन्य सरिताएँ , चाहे हिमालय की बर्फीली चोटियां हों या विंध्याचल , सतपुड़ा या सह्याद्री  के पहाड़ , और बचे -खुचे जंगल | इन सभी को कुछ समय के लिए मानवीय हस्तक्षेप से क्या हम आजाद रख सकेंगे ?

यदि कोरोना संकट के दौरान हम अपनी धार्मिक क्रियाओं को संक्षिप्त और सीमित करते हुए प्रकृति और पर्यावरण को नवजीवन दे सकते हैं तो ये पुण्य कार्य आगे भी  जारी क्यों नहीं रह सकता ? 

और क्या प्रकृति की सेवा ईश्वर की आराधना नहीं बन सकती ?

 गंगा के किनारे बने तीर्थों पर जगह - जगह लिखा होता है “ गंगा तव दर्शनात मुक्तिः “ , इसका अर्थ है “ गंगा तेरे दर्शन मात्र से ही मुक्ति है “ तो फिर उस पर अनाचार किसलिए ?

 यहाँ गंगा को हम प्रकृति का जीवंत प्रतीक मानकर उसके बाकी प्रतिनिधियों के संरक्षण को भी अपनी चिंताओं में  शामिल करें तो कोरोना पश्चात् का भारत वाकई एक नया  भारत होगा | जिस तरह मनुष्य और मशीन दोनों को अवकाश और आराम की जरुरत होती है ठीक वैसे ही प्रकृति को भी कभी - कभार चैन  की सांस लेने के लिए मुक्त करने का संकल्प अत्यावश्यक है  | लेकिन ये कैसे होगा इस पर गहन विचार की जरूरत है |

 एक बात और याद रखनी चाहिए कि प्रकृति भले ही व्यक्त न करे कितु उसकी भी सहनशक्ति होती है | इसके पहले कि वह उसके साथ हुए  अत्याचारों का बदला लेने पर उतारू हो जाए , हमें उसके साथ सामंजस्य बनाकर अपनी भावी पीढ़ियों के लिए एक सुंदर और सुरक्षित संसार छोड़ने की प्रतिबद्धता लेनी चाहिए । 

वरना आज कोरोना आया कल को कुछ और आयेगा और हम अदृश्य कीटाणु के सामने अपने परमाणु जखीरे लिए बचते फिरेंगे | 

सोचकर खुद को ही जवाब दीजिये , क्या हम इसके लिये तैयार हैं ?

Thursday, 9 April 2020

नई औद्योगिक क्रांति के लिए कर ढांचे में सुधार जरूरी



अब ये मान ही लेना चाहिए कि लॉक डाउन 14 अप्रैल के बाद और आगे बढ़ेगा। गत दिवस संसद के अनेक विपक्षी नेताओं से वीडियो कांफे्रंसिंग के जरिये प्रधानमंत्री ने कई घंटों तक चर्चा की। सभी दलों ने अपने - अपने सुझाव और अपेक्षाएं इस दौरान उन्हें बताईं और अंत में लॉक डाउन में वृद्धि का अधिकार उन पर छोड़ दिया। इस समर्थन के बाद 11 अप्रैल को श्री मोदी यही प्रक्रिया राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ दोहराएंगे और उसी के बाद देश को ये पता चल सकेगा कि लॉक डाउन के दूसरे चरण की अवधि और स्वरूप क्या होगा ? बीते एक पखवाड़े में कोरोना को रोकने के अभियान को मिली - जुली सफलता की बात कही जा सकती है। देश के कुछ हिस्सों में तो बहुत ही बढिय़ा तरीके से उस पर काबू कर लिया गया वहीं कुछ जगहों पर हालात बेहद खराब हैं। इसके लिए सरकार और जनता दोनों की लापरवाही को जिम्मेदार माना जा सकता है। लेकिन ये समय आलोचना करने की बजाय आत्मलोचन का है। कोरोना से राष्ट्रीय जीवन में जो ठहराव आया है उसका दूरगामी प्रभाव चिंतित करने वाला है। निराशावाद के प्रवर्तक अनेक समूह इस अवसर पर जनमानस को भयभीत करने के अपने परम्परागत पेशे के अनुरूप भविष्य को पूरी तरह अंधकारमय बताने अभियान चला रहे हैं। यदि वे सरकार और जनता को आने वाली वास्तविकता से अवगत करवाने के लिये ऐसा करें तब वह दायित्वबोध के अंतर्गत आयेगा लेकिन उनका मकसद इस माध्यम से देश में अस्थिरता और उसके बाद अराजकता फैलाना ही है। इसलिए सरकार को इस मोर्चे पर प्राथमिकता के साथ ध्यान देना चाहिए। विभिन्न औद्योगिक और व्यापारिक संगठनों ने केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के समक्ष अपनी दिक्कतें पेश करते हुए राहत की मांग की है। जैसी आज खबर मिली उसके अनुसार लॉक डाउन की अवधि बढ़ाने के साथ ही केंद्र सरकार किसी बड़े राहत पैकेज का ऐलान करने जा रही हैं। ये क्या और कितना होगा इसके बारे में कोई अधिकृत जानकारी तो नहीं है लेकिन इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों को तात्कालिक तौर पर संबल देना है जो बिना देर किये रोजगार सृजन करने में सक्षम हैं। कारखाने और प्रतिष्ठान बंद रहने पर भी बिजली के फिक्स बिल आने से कारोबारी जगत परेशान है। ऐसे में जरूरत है इस तरह की कार्ययोजना लागू करने की जिससे उत्पादन बढ़ाने के काम में तेजी आ सके और इसके लिए केंद्र सरकार को कम से कम 5 साल के लिए कर पर्व (टीए एण्ड हॉलीडे) घोषित कर देना चाहिए। उत्पादन करने वाली इकाइयों और संस्थानों पर न्यूनतम कर लगाए जाएं। जीएसटी की दरों के विभिन्न स्तर अलग करते हुए अधिकतम दो किये जावें जो 5 से 10 फीसदी के भीतर रहें। इससे उत्पादन लागत घटेगी और उत्पादक पर बोझ कम होने से वह अपनी पूरी क्षमता से काम करते हुए उत्पादन में वृद्धि करेगा। लगात कम होने का असर चीजों के बिक्री मूल्य पर भी पड़ेगा। उनके और सस्ती होने से मांग और खफत में भी खासी वृद्धि होगी। ऐसा होने से सरकार को भी तुलनातमक रूप से उतना ही राजस्व मिलेगा जितना अधिक दरों से प्राप्त होता था। भारत की विशाल आबादी को बतौर बाजार मानकर विदेशी कम्पनियां यहां पैर फैला रही हैं। उसकी वजह से देश के उद्योगों के साथ ही छोटे व्यापार को भी जबरदस्त नुकसान हुआ है और आगे भी होगा। ऐसे में भारतीय सामान को सस्ता करने से वह आयातित चीजों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा में तो आसानी से टिकेगा ही विदेशी बाजारों में भी उसकी पकड़ मजबूत होगी। सवाल ये है कि सरकार के पास कर की आय घटने से उसका काम कैसे चलेगा? और इसका जवाब ये है कि मौजूदा हालात में तो उत्पादन में वृद्धि और रोजगार सृजन नामुमकिन होने से राजस्व की आवक तो वैसे भी थम गयी है। और इस कर ढांचे में उत्पादन वृद्धि के लिए उद्योगों से अपेक्षा करना भी निरी मूर्खता होगी। कम मुनाफे से ज्यादा बिक्री वाले आधारभूत सिद्धांत का उपयोग करते हुए एक नई औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात करने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिल सकता। केंद्र सरकार ने इस समय जरुरतमंदों के लिए अपना खजाना जिस तरह खोला है वही एक कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य है। बेहतर हो इसी श्रेणी में व्यापार और उद्योग जगत को भी शामिल कर लिया जावे क्योंकि उसके पहियों पर ही विकास रूपी गाड़ी चलती है। सामान्य समय में बड़े निर्णय लेने में अनेक व्यवहारिक परेशानियां आती हैं लेकिन ऐसे वक्त में लीक से हटकर क्रांतिकारी फैसले लेने से भविष्य में किये जाने वाले सुधारों और बदलावों की बुनियाद मजबूत होती है। प्रधानमंत्री श्री मोदी का संगठन से सत्ता की राजनीति में पदार्पण गुजरात में आये विनाशकारी भूकम्प के फौरन बाद हुआ था। वहां का मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने खंडहरों की जगह पर विकास की जो अट्टालिका तानी उसी वजह से वे दुनिया की नजर में आये। उनकी कार्यप्रणाली से अवगत लोग जानते हैं कि वे छोटी-छोटी बात को भी गम्भीरता से लेते हैं। उद्योग और व्यापार जगत की समस्याओं से वे अनभिज्ञ होंगे ये सोचने का प्रश्न ही नहीं उठता। उम्मीद की जा सकती है कि कोरोना संकट प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया अभियान को सफलीभूत करने में सहायक होगा। कोरोना के बाद के भारत में नई आर्थिक और औद्योगिक क्रांति की अपार संभावनाएं नजर आ रही हैं। दुनिया के तमाम विकसित देशों की अर्थव्यवस्था जिस तरह से तबाह हुई है उसके बाद भारत विश्व बाजार में एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर पैर जमा सकता है। रही बात चीन से प्रतिस्पर्धा की तो कोरोना वायरस को लेकर उसकी संदिग्ध भूमिका से पूरी दुनिया खार खाए बैठी है। जबकि भारत की छवि एक जिम्मेदार और विश्वसनीय देश के तौर पर और मजबूत हुई है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

धार्मिक आस्था और ईश्वर में विश्वास भारत की आत्मा है और आत्मा अमर होती है




 पत्थर में भगवान का एहसास करने वाले इस देश को दुनिया भर में सपेरों और मदारियों के देश के रूप में प्रचारित करते हुए इसका उपहास लम्बे समय तक होता रहा | नदी , तालाब , कुए , समुद्र सभी में देवताओं का वास मानकर उनके प्रति श्रद्धा भाव को भी अंधविश्वास का नाम देकर मजाक उड़ाया जाता रहा | वृक्ष और पर्वत की पूजा को पागलपन  मानकर आलोचना करने वाले भी कम नहीं हैं | प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के संस्कार को   विकास विरोधी बताकर  उसको पोंगापंथ की संज्ञा दे दी गई | हमारी जीवन पद्दति , आचार और व्यवहार सभी में पिछड़ेपन की झलक भी कुछ लोगों को नजर आती है | खान पान - पहिनावा , रीति रिवाज , भाषा , बोली , लोक संस्कृति सभी को दकियनूसी मानकर उसके विरुद्ध दुश्प्राचार भी कम नहीं हुआ | परिवार नामक संस्था और सामजिक ताने - बाने को छिन्न - भिन्न करने का सुनियोजित षड्यंत्र भी अनवरत  रूप से चला आ  रहा है |  भारतीय संस्कृति और संस्कारों को धीमा जहर देकर  खत्म करने की कार्ययोजना भी अमल में लाई जाती रही | इसके परिणाम किसी से छिपे नहीं हैं | लेकिन कोरोना वायरस के हमले से उत्पन्न हालात में भारतीय जीवन मूल्यों की अहमियत को जब पूरी दुनिया अपनाने   की मानसिकता बना रही है तब हमारे देश के कुछ अति बुद्धिजीवी इस बात को प्रचारित करने में लग गये हैं कि ईश्वर नाम की कोई चीज है ही नहीं | देश के सुप्रसिद्ध मंदिरों और तीर्थस्थलों में तालाबंदी किये जाने से अभिप्राय निकाला जा रहा है कि उनमें  विराजमान मूर्तियों में अपने भक्तों की रक्षा का सामर्थ्य चूँकि नहीं है  इसलिए भगवान को भी लॉक डाउन में रख दिया गया | मस्जिद , गुरुद्वारे , चर्च आदि बंद होने को भी इसी श्रेणी में रखा जा रहा है | 

सवाल ये है कि ईश्वरीय सत्ता के प्रभाव और अस्तित्व को नकारने की इस कोशिश के पीछे उद्देश्य क्या है ? और फिर ऐसे समय जब कोरोना से आतंकित लोगों का मनोबल बढाने के लिए उनको हौसला देने की आवश्यकता है तब उनको मानसिक सुरक्षा और संबल देने वाले विश्वास के प्रति अविश्वास उत्पन्न करना महज कुंठा है या भारतीय समाज की एकता , समन्वयवादी सोच और हर संघर्ष में ईश्वर की शक्ति के  सहारे विजयी होने के आत्मिविश्वास को कमजोर करने का घिनौना प्रयास , ये विचारणीय  सवाल है | 

आम भारतीय कर्म के साथ ही ईश्वरीय कृपा में आस्था रखता है | उसके ईश्वर भी अनगिनत हैं | वह हिमालय की चोटियों में भी उनकी उपास्थिति  का एहसास कर लेता है  तो  श्मसान की वीरानगी  में भी | अपने गाँव या कस्बे की किसी छोटी सी नदी में  स्नान करते समय भी वह गंगा जल की पवित्रता को महसूस करते हुए संतुष्टि के चरम तक चला जाता है |

 कण - कण में भगवान की कल्पना उसके लिए केवल शब्दों तक सीमित न होकर अखिल ब्रम्हांड के प्रति उसके जुड़ाव का प्रतीक है | यही दृष्टिकोण वर्तमान आपदा को पराजित करने के आत्मविश्वास का आधार है वरना भारत जैसे देश में जहां अस्पातालों में कुत्ते के काटने पर लगाया  जाने वाला रैबीज का इंजेक्शन तक सुलभ न हो वहां इतनी बड़ी महामारी को लेकर तो अकल्पनीय हालात बन जाते | यद्यपि ऐसा नहीं है कि स्थिति  पूरी तरह नियन्त्रण  हों तथा सब कुछ व्यवस्थित और अपेक्षित तरीके से चल रहा हो लेकिन अचानक घरों में सिमट जाने के सरकारी फरमान को अधिकतर  लोगों ने  जिस सहजता से स्वीकार किया वह इस बात का परिचायक है कि इस देश का मानस विपरीत  पारिस्थितियों में भी धैर्य नहीं छोड़ता जो उसकी आध्यात्मिक आस्था  और विश्वास के कारण कायम है |

 यद्यपि अनेक या यूँ कहें कि काफी जगह लोगों ने व्यवस्था भंग की लेकिन ये भी सही है कि वे समझाने पर मान भी गये | इसकी  वजह भी यही है कि वे मानवीय जीवन का शत्रु बनकर आये कोरोना जैसे अदृश्य शत्रु को पराजित करने के लिए ज्ञान - विज्ञान द्वारा सुझाये रास्ते पर चलने  के साथ ही उस ईश्वरीय शक्ति में अपनी आस्था को भी मजबूती से थामे हुए है जिससे उनका  बचपन से ही नाता जुड़ा हुआ है |

 इस कठिन समय में जब मृत्यु का खौफ समूचे वातावारण में मंडरा रहा है और पूरा देश घरों में सीमित हो गया है तब आध्यात्मिक विश्वास से प्राप्त होने वाली ऊर्जा एक  अतिरिक्त शक्ति  स्रोत बनकर अपना प्रभाव छोड़ती है | बड़े - बड़े चिकित्सक भी इलाज के दौरान मरीज के परिजनों को दवा के साथ दुआ करने की सलाह देते हैं  , तो  क्या उनको भी अन्धविश्वासी मान लिया जावे | देश के  नामी - गिरामी अस्पतालों तक में ध्यान और प्रार्थना हेतु कक्ष बनाये जाते हैं | जो इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इस वास्तविकता  को मानता है कि आध्यत्मिक विश्वास भी  उपचार में सहायक होता है |

 ये बात तो ठीक है कि धर्म के व्यापारियों और कलियुगी भगवानों ने श्रद्धालुओं के विश्वास का गलत फायदा उठाकर धर्म को बदनाम करते हुए आस्था को ठेस  पहुंचाई किन्तु जहां तक बात उस परम अलौकिक शक्ति में विश्वास की है तो वह यदि यथावत है तो मान लेना गलत न होगा कि हमारे संस्कार और संस्कृति का आधार जिस चिंतन पर आधारित है वह वैज्ञानिकता से परिपूर्ण है | भले ही उसे प्रतिपादित करने की योग्यता रखने वाले पूर्वापेक्षा कम होते गये | लेकिन जिस तरह कृष्णपक्ष आने के बाद चन्द्रमा की चमक प्रतिदिन कम होने के बाद भी उसके प्रति आस्था कम नहीं होती ठीक वैसे ही अध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वरीय शक्ति को कमतर बताने के प्रयास भी अमावश्या के पूर्ण अन्धकार को अपनी विजय मानकर उछलने  के बाद शुक्लपक्ष की पहली रात में ही पराजय की ओर बढने मजबूर हो जाते हैं |

 मौजूदा दौर पूरी मानव जाति के अस्तित्व पर संकट बनकर आया है | भारत के बारे में ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि कोरोना के फैलाव के लिए ये आसान देश है | लेकिन ये भी सही है कि तमाम विसंगतियों  और विरोधाभासों के बावजूद आध्यात्म और ईश्वरीय शक्ति में अटूट विश्वास के कारण आम भारतीय मानसिक तौर पर पूरी तरह मजबूत है और यही मानसिकता किसी भी व्यक्ति और समाज की संघर्ष क्षमता का मापदंड होता है |

 तर्क देने वाले कह सकते हैं कि जिन देशों में कोरोना का तांडव मचा हुआ है उनमें चीन को छोड़कर तो बाकी सभी आस्तिकता में यकीन रखते हैं | तब उनके यहाँ ईश्वर ने कृपा क्यों नहीं की ? प्रश्न स्वाभाविक है किन्तु ऐसा कहने वाले भारत और यहाँ के लोगों को या तो ठीक से समझते नहीं या फिर उनकी सोचने की शक्ति  ही विकृति का शिकार होकर रह गई है |

 स्व. देव आनंद की 'गाइड'  नामक एक फिल्म सत्तर  के दशक में आई थी जो सुप्रसिद्ध लेखक आर.के नारायणन के उपन्यास  पर  आधारित थी | फिल्म के पूरे कथानक की बजाय उसके अंतिम भाग का उल्लेख मैं यहाँ करना चाहूँगा | जेल से सजा काटकर निकला नायक लोकनिंदा और शर्मिंदगी से बचने के लिए बजाय अपनी माँ और प्रेमिका के  पास लौटने के बजाय भटकता हुआ एक गाँव के मंदिर में जाकर थका हारा लेट जाता है | गांव वाले उस पर दया कर उसे वहीं रहने की जगह दे देते हैं | चूँकि वह पढ़ा - लिखा था इसलिए कुछ दिनों में ही लोग उसके प्रशंसक  हो जाते हैं | वह उन्हें उन पाखंडियों से बचकर रहने की शिक्षा देता है जो  भोले - भाले गाँव वालों की भावनाओं को भुनाते थे | एक दिन वह उन्हें कहानी सुनाता है जिसमें किसी गाँव में सूखा  पड़ने पर एक साधु वर्षा के लिए उपवास शुरू कर देता है | और कुछ दिन बाद गाँव में खूब बरसात होती है | कहानी के माध्यम से  देव आनन्द ये सन्देश देते हैं कि  साधु को ये विश्वास था कि वर्षा होगी और विश्वास में  बड़ी शक्ति होती है ।

 संयोगवश जल्द ही उस गाँव में सूखा पड़ जाता है और तब गाँव वाले उस कहानी के आधार पर देव आनंद के  पास आकर आग्रह करते हैं कि वह भी उपवास करे | वह उन्हें काफ़ी समझाता है कि साधु - वाधु नहीं है  और कहानी सच हो ,  ये जरूरी नहीं है | लेकिन गाँव वाले उसके  पैर पकड़ लेते हैं और संकोचवश वह उनको न नहीं बोल पाता | 

उपवास शुरू  होते ही दूर - दूर तक खबर फ़ैल जाती है | जनता देव आनंद के दर्शन  करने आने लगती है | उसकी माँ और प्रेमिका भी अखबार में पढकर वहां आती हैं | इस दौरान एक विदेशी महिला पत्रकार देव आनंद का साक्षात्कार लेते हुए पूछती है , स्वामी , क्या आपको विश्वास है कि बरसात होगी और तब देव आनंद भूख से कमजोर हो चुकी आवाज में जवाब देते हैं कि मुझे गाँव वालों के  विश्वास पर विश्वास है | अंत में देव आंनद की मौत हो जाती है | लेकिन उसकी सांस रुकते ही जोरदार बारिश आ जाती है | सब लोग  ये खुशखबरी सुनाने मन्दिर के भीतर जाते हैं लेकिन उसका निर्जीव  शरीर देखकर दुखी हो जाते हैं |

 पाठक सोच रहे होंगे कि गाइड फिल्म के उल्लेख का यहाँ क्या औचित्य है ? लेकिन मैं केवल देव आनंद द्वारा विदेशी पत्रकार को दिए उत्तर को संदर्भ बनाना चाहता हूँ कि गाँव वालों के  विश्वास पर मुझे विश्वास है | 

आज की विषम परिस्थिति में हमें भी अपने विश्वास और आस्था को सुद्रढ़ रखना चाहिए | इसे डिगाने वाले किसी भी तरह से हमारे शुभचिंतक नहीं है | ऐसे लोगों को ये नहीं भूलना चाहिए कि धार्मिक आस्था और ईश्वर में  विश्वास भारत की आत्मा है और हमारा दर्शन हमें बताता आया है कि 
आत्मा अमर है |

Wednesday, 8 April 2020

कौन कहता है भारत गरीब देश है ?अनेक सम्पन्न देशों की अबादी से ज्यादा तो रोज यहाँ भंडारे और लंगर में भोजन करते हैं




 बात लगभग डेढ़ दशक पुरानी है | जबलपुर में एक व्याख्यान का आयोजन हम मित्रों ने किया | जिनमें कमल ग्रोवर और शरद अग्रवाल प्रमुख थे | उस समय विश्व व्यापार संगठन (WTO) को लेकर देश भर में बड़ा विरोध चल रहा था | वैश्वीकरण के नाम से आई उदारवादी अर्थव्यवस्था की शुरुवात पीवी नरसिम्हा राव के शासन काल में उनके वित्त मंत्री डा. मनमोहन सिंह द्वारा की जा चुकी थी | 

उस सरकार के बाद आई तमाम सरकारों ने भी चाहे - अनचाहे उसी नीति को आगे बढाया | इनमें भाजपा की भी सरकार थी जिसका प्रेरक संगठन रास्वसंघ  और उसकी   अनुषांगिक संस्था स्वदेशी जागरण मंच भारत द्वारा उन नीतियों को अपनाये जाने के घोर विरोधी रहे | 

व्याख्यान का विषय था वैश्वीकरण का भारत पर प्रभाव | और वक्ता थे स्वदेशी के प्रखर प्रवक्ता के. एन. गोविन्दाचार्य , जो उस समय तक राजनीति से अध्ययन अवकाश लेकर वैश्वीकरण के  भारतीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय जीवन पर संभावित प्रभाव के शोधपरक विश्लेषण में पूरी तरह डूबे हुए थे |

 गोविन्दाचार्य जी से पुराना परिचय होने से जबलपुर में अपने एक कार्यक्रम के बाद वे हमारे आमंत्रण पर पधारे और एक बौद्धिक संगोष्ठी जैसा आयोजन सम्पन्न हुआ | अपने प्रभावशाली व्याख्यान में उनने  वैश्वीकरण के विभिन पहलुओं पर बहुत ही विस्तार से श्रोताओं को अवगत कराया | उस दौरान उनके द्वारा व्यक्त की गईं चिंताएं भले ही उदारीकरण के कारण आई मुक्त अर्थव्यवस्था के दीवानों को नागवार गुजरी हों किन्तु कालान्तर में उनकी कही प्रत्येक बात अक्षरशः सत्य साबित हुई |

 लेकिन उस व्याख्यान में भारत की मानवतावादी सामाजिक व्यवस्था के बारे में कही गई  उनकी ये बात मेरे स्मृति पटल पर  पत्थर की लकीर की तरह अंकित होकर रह गई कि यूरोप के अनेक सम्पन्न कहे जाने देशों की जितनी आबादी है उससे ज्यादा लोग तो हमारे देश में रोज भंडारों और लँगरों में निःशुल्क  भोजन करते हैं |

 
उनकी वह बात मुझे रह - रहकर सोचने को बाध्य करती रही | हालाँकि भंडारों की बाढ़ और उनके कारण होने वाली अव्यवस्था बड़ा सिरदर्द भी बन गई है | खासकर शहरों में उनके आयोजन के बाद जो गंदगी बिखर जाती है वह उनके  पीछे निहित पवित्र भावना पर पानी  फेर देती है | बावजूद इसके गोविन्द जी की उस बात से भारतीय समाज की समन्वयवादी सोच और परोपकारी प्रवृत्ति का परिचय तो मिलता ही है |

 पाठक सोच रहे होंगे कि ये कौन सा विषय निकालकर ले आये | लेकिन बीते एक पखवाड़े में पूरे देश में जो दिखाई  दे रहा है उसने भारत को गरीब या विकासशील मानने के मापदंड की वैज्ञानिकता पर सवाल उठा दिए हैं | 

कोरोना के आतंक से पूरे देश में कुछ घंटे की सूचना पर देशबंदी कर दी गई | आवागमन के सभी साधन एक झटके में बंद कर दिए गये| जो जहां था उसे वहीं ठहर जाने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा |

 इस अप्रत्याशित कदम से करोड़ों गरीबों और दिहाड़ी श्रमिकों के अलावा छोटा - मोटा कारोबार करते हुए अपनी रोजी चलाने वालों के सामने अकल्पनीय संकट आ खड़ा हुआ | चाय - पान की दूकान से लगाकर तो आलीशान मॉल भी बंद करवा दिए गए | सभी प्रकार के कारखाने , दफ्तर सहित किसी भी प्रतिष्ठान को खोलने पर रोक लगा दी गयी | इसका सबसे ज्यादा असर हुआ उस तबके पर जिसके पास न पैसा था और न ही पेट भरने को दाना |

 समस्या बहुत बड़ी और विकट थी | मानव शास्त्र ये कहता है कि भूख इंसान का स्वभाव बदल सकती है | और फिर भारत जैसे देश में जहां एक साथ करोड़ों लोगों के सामने पेट भरने की समस्या खड़ी हो जाए ,  वहां अराजकता फैलने में भला कितनी देर लगती | और फिर बात एक - दो दिन की तो थी नहीं | लगातार 21 दिन तक ऐसे लोगों को भोजन प्रदान करना जिनसे आपका न कोई सम्बन्ध हो न ही किसी भी प्रकार का स्वार्थ , तब आज के भौतिकतावादी युग में भला ऐसे लोगों के पेट भरने का सिर दर्द कौन मोल लेगा ? लेकिन ज्योंहीं लोगों को समझ में आया कि स्थिति गंभीर है और हमारे चारों तरफ ऐसे अनगिनत लोग मौजूद हैं जिनके लिये सूखी रोटी तक बड़ी बात है उसके साथ दाल सब्जी तो छोड़िये।

 बस फिर क्या था समाज के भीतर दबे संस्कारों के बीज अंकुरित होने लगे और देखते ही  देखते परोपकार की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी | सरकार के अपने इंतजाम तो जो हैं सो हैं ही लेकिन समाजसेवी व्यक्तियों और संस्थाओं ने कुम्भ मेले की तर्ज पर मानो अन्नक्षेत्र ही खोल दिए | जिसकी जैसी  क्षमता उसने वैसा ही जिम्मा लिया | कोई दो को तो कोई सौ को खिलाने के काम में लीन  हो गया | घूम - घूमकर जो गरीब दिखा उसे भोजन दिया जाने लगा | झुग्गियों में जाकर राशन की आपूर्ति भी होने लगी | घुमंतू किस्म के लोगों ने जहां जगह मिली वहीं आपना डेरा जमा लिया तो उनके ठिकाने पर लोग भोजन लेकर पहुंचने लगे |

 जो खुद कुछ नहीं कर पा रहा वह शासन या किसी और द्वारा किये जा रहे परोपकार के काम में सहयोगी बनकर अपनी भूमिका का निर्वहन करने जुट गया | ये संवेदनशीलता केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं रही | सड़कों पर घूमते आवारा पशुओं से परेशान लोगों ने इस घड़ी में उन मूक प्राणियों की जरूरत को भी समझा और उनके लिए चारा , भोजन और पानी की व्यवस्था कर अपने मानव होने का प्रमाण दिया |

इस बारे में एक उल्लेखनीय वाकया ये रहा कि जबलपुर के कुछ प्रेस छायाकार नागपुर रोड पर मंडराने वाले बंदरों की खोज खबर लेने गये | आम दिनों में वहां से गुजरने वाले ट्रक चालक उनके लिए दाने वगैरह फेंकते जाते हैं लेकिन लॉक डाउन  के बाद वे बंदर भोजन देने वाले वाहनों की राह तकते रह गये |  

जब छायाकारों का दल पहुंचा तो बंदर उनकी तरफ उम्मीद से निहारने लगे | वे लोग अपने साथ अनाज के दाने सहित  जो कुछ ले गये थे वह  उन्होंने उन भूखे प्राणियों के तरफ बढ़ा दिया | लेकिन एक छोटा बन्दर राजेश मालवीय नामक छायाकार के हाथ में पानी की बोतल देख दो पैरों पर खड़ा हो गया । उसके उस अंदाज को भांपकर राजेश ने बोतल उसके   मुंह से लगा दी और उस बंदर ने उससे अपनी प्यास बुझा ली | 

प्रेस छायाकार अपने जीवन में बड़ी से बड़ी हस्तियों के चित्र उतारते हैं पर उनके चित्र कोई नहीं खींचता | लेकिन इन्सान के पूर्वज कहे जाने वाले बन्दर के बच्चे की प्यास बुझाते राजेश का चित्र साथ में गये छायाकार छोटू ने खींच लिया |

 इंसानों के साथ ही पशुओं और पक्षियों की भी चिंता करने  के ये दृश्य भारतीय समाज के उन मानवीय गुणों का ताजा प्रमाण है जिसमें समूचे प्राणी  जगत के  साथ सहअस्तित्व के  सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करना चाहिए |

 जैसी की संभावना है लॉक डाउन अभी और बढ़ेगा | इस प्रकार समाज की सम्वेदनशीलता को अभी औरपरीक्षा देनी है | लेकिन ऐसे अवसरों पर भारत का सामूहिक सोच के साथ खड़े हो जाना ही इसकी विशेषता रही है | गरीब से गरीब आदमी भी अपना पेट भरने के साथ ही अपने पालतू कुत्ते - बिल्ली की भी फ़िक्र किये बिना नहीं रहता |

 इसी तरह भारत की परम्परागत व्यापार प्रणाली भी ऐसे संकट में समाज को एकजुट रखने में मददगार होती आई है  | किराना दुकानों पर आने वाले नियमित गरीब ग्राहक की मुसीबत को समझकर छोटा कहा जाने वाला व्यापारी सौ - पचास रु. का सामान उधार  दे देता है | हर , गली , नुक्कड़ पर चलने वाली ये छोटी - छोटी दुकानें न हों तो ऐसे मौके पर क्या मॉल और बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर उन्हें पांच रु. का भी सामान उधार दे सकते हैं ? सबसे बड़ी बात मोहल्ले पड़ोस के इन दुकानदारों और उनके ग्राहकों के बीच सहयोग और भरोसे की जो भावना है उसने भी हमारी सामाजिकता को कायम रखा है |

 लॉक डाउन के दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी आम आदमी को यदि दैनिक जीवन की जरूरी चीजों की किल्लत नहीं हुई तो वह इन छोटे दुकानदारों के कारण | इसके ठीक उलट अमेरिका जैसे विकसित देश में लोगों को ऐसे ही काम के लिए मीलों दूर स्थित मॉल या स्टोर में लम्बी - लम्बी कतार लगानी पड़ रही है | क्योंकि वहां आर्थिक उदारीकरण ने छोटे  कारोबारी जैसी व्यवस्था को लगभग खत्म ही कर दिया |

 बात गोविन्दाचार्य जी द्वारा यूरोप के अनेक सम्पन्न देशों की जनसंख्या से ज्यादा भारत में नित्यप्रति भंडारों या लंगर में निःशुल्क भोजन करने से शुरू हुई थी | इन दिनों  देश भर के गुरुद्वारों में कुल मिलकर लाखों लोगों का भोजन रोजाना बनकर बंट रहा है | जरा , सोचिये यदि खुद मुसीबत में होने के बाद भी वैसी ही परेशानी से जूझ रहे लोगों की सहायता की ये भावना भारतीय जनमानस में न होती तब क्या देश और राज्यों की सरकारें लॉक डाउन बढ़ाने की बात सार्वजानिक विमर्श में लाने का साहस कर सकती थीं ?

 यदि कोई कोरोना संकट के दौरान अन्य देशों से भारत की तुलना करना चाहे तो भी उसे इस वास्तविकता को तो स्वीकार करना ही होगा कि हमारे देश में करोड़ों लोग गरीब ही नहीं उससे भी ज्यादा नीचे के हालात में बसर करने मजबूर हैं | और तो और चीन को अलग कर दें अमेरिका और समूचे यूरोप को मिलाने पर भी आबादी के लिहाज से भारत बहुत  बड़ा है | और इसीलिये इस विषम परिस्थिति में भूखे को भोजन और प्यासे को पानी के साथ प्राणी मात्र की चिंता करने का संस्कार ही भारत को मजबूती के साथ खड़ा रखने का आधार बन सका |

अभी भी  संकट के बादल केवल मंडरा ही नहीं अपितु गहरा भी रहे हैं | इस वजह से आगे की परीक्षा और कठिन होगी | लेकिन इसी के साथ ये बात भी गौरवान्वित करती है कि वैश्विक संकट के समय भारत दूसरे देशों की मदद करने की दरियादिली दिखाने में पीछे नहीं है |

 कोरोना का दायरा जिस तेजी से बढ़ रहा है उसी मात्रा में  समाज का दायित्व बोध भी परवान चढ़ रहा है | ये एक सकारात्मक और उम्मीद जगाने वाले संकेत है , जिनसे ये विश्वास और मजबूत हुआ है कि इस विपत्ति से निकलने के बाद का भारत और परिपक्व , और जिम्मेदार तथा और भी ज्यादा संवेदनशील होगा |

 महर्षि अरविन्द और स्वामी विवेकानंद ने 21 वीं सदी में भारत के पुनरुत्थान की जो भविष्यवाणी की थी उसकी लालिमा आकाश में महसूस की जाने लगी है | महापुरुष और योगी  त्रिकालदर्शी होते हैं और उक्त दोनों की आध्यात्मिक  साधना तो थी ही भारत के भविष्य पर केन्द्रित | 

लॉक डाउन : अगला हफ्ता बेहद महत्वपूर्ण



महाराष्ट्र से खबर आई है कि दिल्ली के मरकज से लौटे तबलीगी जमात के 60 सदस्य लापता हैं। उन्होंने अपने मोबाईल भी बंद कर दिए हैं जिससे उनका ठिकाना पता नहीं लग पा रहा। ये स्थिति पूरे देश में देखी जा रही है। जमात के अलावा भी अनेक लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपनी-अपनी बीमारी को छिपाए रखा और अपने अलावा औरों को भी संक्रमित करने का कारण बन गए। भोपाल में तो मप्र शासन के स्वास्थ्य विभाग की एक वरिष्ठ महिला अधिकारी की बीमारी समय पर उजागार नहीं होने से न सिर्फ  उनके अपने विभाग बल्कि सचिवालय के अनेक अधिकारी और कर्मचारी भी कोरोना संक्रमित या संदिग्धों की श्रेणी में आ गए। मैदानी रूप से तैनात अमले में संक्रमण फैलना स्वाभाविक है लेकिन प्रशासन के उच्च स्तर पर बैठे अधिकारियों की लापरवाही कितनी महंगी पड़ेगी ये कहना कठिन है। मप्र देखते - देखते जिस स्थिति में आ गया है वह बेहद चिंताजनक है। इंदौर के बाद भोपाल में जो हालात पैदा हो गए उनसे पूरे प्रदेश में घबराहट है। क्योंकि सूबे की सरकार जहाँ से चलती हो वहां यदि सब कुछ बंद हो जाये तब निर्णय लेने में भारी परेशानी होना स्वाभाविक है। इसे लेकर आलोचना के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। जिस महिला अधिकारी के कोरोना संक्रमित होने से स्वास्थ्य विभाग के तमाम लोग संक्रमण और संदेह के घेरे में आ गये उनका बेटा विदेश से लौटा था। अधिकारी का कहना था उसे कोई तकलीफ  नहीं होने से उन्होंने उस तरफ ध्यान नहीं दिया। तब सवाल उठता है कि उन्हें संक्रमण आखिर कहाँ से हुआ? इसके बाद ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि शासन आम जनता और वीआईपी में भेद कर रहा है। किसी बस्ती में एक संक्रमित होने पर सभी लोगों पर शिकंजा कस दिया जाता है लेकिन अधिकारी द्वारा संक्रमण को छिपाने के बाद भी उसके प्रति रियायत बरती जाती है। निश्चित रूप से ये दोहरा रवैया है। यद्यपि मौजूदा हालात में शासन और प्रशासन का मनोबल तोडऩा उचित नहीं है लेकिन प्रदेश सरकार को अपनी बीमारी छिपाने वाली अधिकारी के विरुद्ध कुछ न कुछ तो ऐसा करना ही चाहिए जिससे आम जनता में ये सन्देश जाए कि गलती करने की सजा आम और खास के लिए एक जैसी है। गनीमत ये है कि अब तक लॉक डाउन के दौरान नेतागण सदल - बल नहीं निकल रहे। हालांकि राहत कार्यों में अनेक पूरी तरह सक्रिय हैं किन्तु दंगे फसाद के समय अपने और अपने समर्थकों के लिए थोक के भाव कफ्र्यू पास का जुगाड़ कर अपना रुतबा दिखाते हुए यहाँ - वहां मंडराने वाले नेता इस समय ठंडे हैं। इसे उनकी अनुशासनप्रियता नहीं मजबूरी कहना ज्यादा सही होगा क्योंकि सबके मन में ये बात बैठ चुकी है कि जान है तो जहान है। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा और राज्यों के मुख्यमंत्री भी इसी आधार पर लॉक डाउन बढ़ाने के पक्षधर हैं। और इसमें कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि कोरोना की श्रृंखला को तोड़े बिना उसका खात्मा संभव नहीं होगा। और इसलिए ये आवश्यक है कि कोरोना वॉरियर्स के नाम से जाने जा रहे तमाम प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सक और उनका सहयोगी स्टाफ , पुलिस महकमा, स्थानीय निकायों का अमला तथा नि:स्वार्थ भाव से मानव सेवा कर रहे समाजसेवी पूरी तरह सुरक्षित रहें। कोरोना से लड़ाई उतनी आसान नहीं जितनी शुरुवात में लग रही थी। मरकज काण्ड ने पूरे अभियान की हवा निकाल दी। पहले कोरोना रोगी सप्ताह में दोगुने हो रहे थे लेकिन मरकज से निकले जमातियों की वजह से अब चार दिन में ही संख्या दोगुनी होती जा रही है। ऐसे में ये जरूरी हो गया है जो भी लोग बचाव और इलाज में लगे हैं वे स्वस्थ और सुरक्षित रहें। और इसके लिए दायित्वबोध बहुत जरूरी है। जिस किसी को अपने बारे में तनिक भी शंका हो उसे फौरन अपनी जाँच करवाते हुए जो भी जरूरी हो करना चाहिए क्योंकि बीमारी छिपाने वाला खुद को तो नुकसान पहुंचाएगा ही अपने साथ सैकड़ों और हजारों को संक्रमित करने का कारण भी बनेगा। मरकज से निकले जमाती भी पता नहीं क्यों छिपे - छिपे फिर रहे हैं। मौलाना साद भले ही अज्ञातवास में चले गए हों लेकिन तबलीगी जमात के जो प्रवक्ता टीवी चैनलों पर आकर मरकज का बचाव करने में जुटे हैं उन्हें चाहिए वे मस्जिदों और बस्तियों में दुबके जमातियों से बाहर आकर जाँच में सहयोग करने की अपीलें करें क्योंकि ऐसा करने से ही वे बीमारी तथा कानूनी कार्रवाई से बच सकेंगे। यदि अभी भी वे ऐसा नहीं करते तब ये माना जायेगा कि कोरोना फैलाना तबलीगी जमात की कार्ययोजना का हिस्सा था। लॉक डाउन खत्म होने में अभी 6 दिन शेष हैं। यदि इस अवधि में भी कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या इसी तरह से बढ़ती रही तब देशवासियों को आगे भी घरों में रहने की मजबूरी झेलनी होगी। बीते एक दो दिन में जैसी जानकारी मिली है उसके आधार पर ये माना जाने लगा है कि जरा सी चूक होने पर कोरोना सामुदायिक संक्रमण वाले पायदान पर जाकर बैठ जाएगा और वह स्थिति भयावह होगी। इसलिए बेहतर होगा कि कोरोना को लेकर किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरती जाए। ये केवल तबलीगी जमात के लोगों को ही शिकंजे में लेगा ये सोचकर निश्चिन्त हो जाना मूर्खता है । आने वाला हफ्ता बहुत ही निर्णायक होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 April 2020

देश को समझने जन के मन को पढ़ना जरुरी तकलीफें देकर भी दिल जीत ले वही सफल नेता



 किसी देश को समझने के लिए वहां के लोगों का मनोवज्ञानिक अध्ययन करना आवश्यक होता है | दक्षिण अफ्रीका में गोरों की सत्ता से अपमानित होकर लौटे बैरिस्टर एम . के गांधी ने जब स्वाधीनता संग्राम की प्रारम्भिक तैयारी के सिलसिले में समाज  के विभिन्न वर्गों से मुलाकातें शुरू कीं तब कुछ समय के भीतर ही वे जान गए थे कि  बैरिस्टर वाला रूप उन्हें जनता से नहीं जोड़ सकेगा और यही सोचकर उन्होंने घुटनों से ऊपर चढ़ी धोती ज्योंही पहनी और बदन को चादर से ढंककर लोगों के बीच  गये तो उन्हें देखते ही देखते महात्मा जैसी जनता द्वारा दी गई उपाधि मिल गयी और ये प्रक्रिया कालांतर में उनके  राष्ट्रपिता कहलाने पर जाकर पूरी हुई |

 कहने का आशय ये है कि जनता के बीच  वही नेता असर छोड़ सकता है जो उनके मनोभावों को समझ सके और उनसे उन्हीं की शैली में संवाद स्थापित कर सके | 

आजादी मिलने की बाद बापू तो जल्दी ही चले गए और उनकी वैचारिक धरोहर के वारिस राज्याश्रय  देकर किसी आश्रम में बिठा दिए गये | जिस गांधी ने ब्रिटिश सत्ता से टकराने में कभी डर महसूस नहीं किया उनके उत्तराधिकारी ने तानशाही को अनुशासन पर्व कहने में कोई हिचक नहीं दिखाई |

 लेकिन कुछ ऐसे भी हुए जिनका इस देश की मिट्टी और मानुष दोनों से सीधा सम्पर्क और सामंजस्य तो  रहा लेकिन या तो वे गैर महत्वाकांक्षी बनकर अपनी ही बनी दुनिया में खोकर रह गये या फिर राजनीति की जुएबाजी में जीतने के लिए जरूरी शकुनी ब्रांड पांसे उनके पास  नहीं होने से  बिना खेले ही पराजित करार दिए गए |  जो थोड़े बहुत हुए भी वे अपनी सोच को अपने और अपनों से बाहर नहीं निकाल सके या फिर बड़े मैदान में खेलने की क्षमता न होने से क्षेत्रीय बनकर रह गए |

 बीच - बीच में ऐसे अवसर आये जब राष्ट्रीय नेतृत्व के पीछे जनता आँख मूंदकर खड़ी हो गयी लेकिन कुछ समय बाद ज्योंही उसे एहसास हुआ कि निजी या क्षुद्र स्वार्थों के लिए उसका भावनात्मक शोषण किया गया त्योंही उसने  मोहभंग का संकेत देकर उस दौर की इतिश्री कर दी |

 लेकिन मौजूदा संकट के समय एक बार फिर ये देखने में आ रहा है कि नेतृत्व और जनता के बीच विश्वास की डोर काफी मजबूत हुई है | कहने वाले कह  सकते हैं कि इसका प्रमाण तो लोकसभा के पिछले  दो चुनाव दे चुके हैं लेकिन चुनाव और राष्ट्रीय आपदा दो अलग विषय हैं | 

कोरोना संकट के समय देश के 135 करोड़ लोगों में हिम्मत और हौसला बनाये रखना बहुत बड़ी चुनौती थी | मुसीबत जितनी गम्भीर और खतरनाक थी  उसे  देखते हुए तमाम जिम्मेदार लोगों ने आपातकाल लगाने का सुझाव दिया | वे अपनी जगह पूरी तरह सही थे | हालात इसके औचित्य को साबित भी कर  रहे थे | चीन तो अपनी जगह था लेकिन इटली और ईरान में कोरोना की शक्ल में  जिस तरह मौत का तांडव हुआ उसके बाद भारत को भी कड़े कदम उठाना जरूरी हो गया था | और उसके लिए यदि आपातकाल लगाकर सरकार और ज्यादा अधिकार संपन्न होकर  परिस्थितियों का हवाला देते हुए जनता के अधिकारों पर कैंची  चला देती तो उसे समयोचित मजबूरी मानकर स्वीकार किया जाता | कोरोना की पदचाप सुनाई देने के बाद तो यहाँ तक कहा गया कि महज आपातकाल ही कारगर नहीं होगा | उसके साथ ही सेना को तैनात किया जाना भी जरूरी है जिससे कि लोगों को बेकाबू होने से रोका जा सके |

 लेकिन इस सुझावों से अलग हटकर 22 मार्च को जनता को  उसी के नाम वाले कर्फ्यू  में रहने के लिए प्रेरित करते हुए शाम 5 बजे कोरोना के विरुद्ध लड़ रहे डाक्टर्स ,उनके सहयोगी  स्वास्थ्यकर्मी , पुलिस और  प्रशासन आदि के लिए बतौर आभार थाली , ताली , घंटी आदि बजाने की अपील की गयी | बताने की जरूरत नहीं है कि उसका किस तरह सुनियोजित तरीके से  मजाक उड़ाया  गया |

 लेकिन मजाक उड़ाने वाले भूल गये कि वह एक अभिनव प्रयास था  जनता के मन को पढ़ने और समझने का | पहले तो लोगों ने दिन भर घर में रहकर अभूतपूर्व आत्मानुशासन का परिचय दिया और फिर शाम के पांच बजते ही पूरे देश में थाली , ताली , घंटे - घंटी की जो ध्वनि गुंजायमान हुई उसने न केवल इतिहास ही रच  डाला अपितु भविष्य का रास्ता भी खोल दिया | 

इस तरीके को ईजाद करने वाले प्रधानमन्त्री ने सुबह  से शाम के बीच ही देशवासियों के स्वस्फूर्त सह्योगत्मक रवैये से ये निष्कर्ष निकाल लिया कि वे उनकी बात की कद्र करते हैं और बिना आपातकाल लगाये तथा  सेना तैनात किये भी कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में बड़ा कदम उठाया जा सकता है |

 और इसी के बाद  उन्होंने 24 मार्च की रात 8 बजे राष्ट्र के नाम सन्देश  देते हुए उसी रात 12 बजे से पूरे देश में 21 दिन की लॉक डाउन नामक व्यवस्था लागू कर दी और साफ़ कर  दिया  कि उस दौरान दैनिक जरूरतें पूरी करने के लिए छूट और सुविधाएँ दी जायेंगी लेकिन लॉक डाउन भी कर्फ्यू ही होगा | प्रधानमन्त्री ने दो टूक कह  दिया कि जान है तो जहान है और इन 21 दिनों में किसी भी तरह की लापरवाही आपके और परिजनों के साथ ही देश को 21 बरस पीछे ले जायेगी |

 उसके बाद से जो हुआ वह सर्वविदित ही है | बीच में दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मुख्यालय मरकज में दो हजार से ज्यादा लोगों के जमा होने वाला मामला सामने आ गया | चूँकि वहां से एक मरीज अस्पताल लाने पर मर गया तो बाकी की खोज खबर हुई और पता चला कि मरकज के मौलाना की मूर्खता से मरकज़ कोरोना की शरणस्थली बन गया था | 

हालांकि उसे खाली करवा लिया गया किन्तु इसके बाद सरकार पर भी आरोपों की बौछार होने लगी | गुप्तचर एजेंसियों और मरकज की दीवार से सटे थाने की अनभिज्ञता पर भी सवाल उठे | मरकज से निकले जमातियों ने जिस तरह से देश भर में कोरोना फैलाया  उससे सरकार के समूचे परिश्रम पर पानी फिरता लगा लेकिन तेज गति से कड़े निर्णय लेते हुए जिस तरह देशव्यापी आपरेशन चलाया गया उससे कोरोना  के फैलाव को रोकने का काम तो हो ही रहा है वहीं दूसरी तरफ   देश और समाज विरोधी मानसिकता का पर्दाफाश  भी हो  गया |

 इस बारे में एक तथ्य जो जिसका संज्ञान नहीं लिया गया वह था दिल्ली की स्थिति | मरकज को पहले ही  खाली करवा लिया जाता किन्तु उसके पहले ही दिल्ली में लाखों प्रवासी मजदूरों के पलायन से उत्पन्न हालातों ने पुलिस और प्रशासन को उलझा दिया | उसी  समय यदि मरकज का मोर्चा खोला जाता और आपरेशन ब्लू स्टार की पुनरावृत्ति करते हुए मरकज में भी कमांडो कार्रवाई की जाती तो दिल्ली के दंगों की राख में  दबी चिंगारी फूटने का खतरा बढ़ जाता और तब जो होता वह अकल्पनीय था |

 उस विषम स्थिति में से सुरक्षित निकल आना सामान्य नहीं था | मरकज की गलती  हालंकि देश को बहुत  महंगी पड़ी लेकिन दिल्ली की तत्कालीन परिस्थितियों  में थोड़ी सी भी जल्दबाजी या अपरिपक्वता पूरे देश को आग में झोंक सकती थी और मरकज का मौलाना साद भी यही चाहता हो तो आश्चर्य नहीं है  |

 अचानक देश में कोरोना का ग्राफ ऊपर उठने से जनमानस में भय का भाव घर करने के कारण कोरोना अपराजेय लगने लगा | इटली और ईरान के बाद स्पेन , ब्रिटेन , फ़्रांस और सबसे बढकर तो अमेरिका से आ रही खबरों ने यहाँ भी हताशा के बीज बिखेर दिए | 

ये बहुत ही निर्णायक मोड़ था तब तक की लड़ाई का और ऐसे में प्रधानमंत्री ने एक बार फिर जनता के विश्वास को मापने का जोखिम उठाया | पहले तो टीवी पर आकर लॉक  डाउन से  हो रही परेशानियों की लिये माफी माँगी और फिर उसके बाद एक नया प्रयोग किया 5 अप्रैल को रात 9 बजे 9 मिनिट के लिए दिए जलाने के अनुरोध के रूप में |

 तब तक लॉक डाउन के 12 दिन बीत चुके थे | मरकज कांड से  पूरे देश में ये धारणा जोर पकड़ने लगी कि कोरोना को रोक पाने के प्रयासों पर पानी फिर गया है | एक बार फिर सेना तैनात करने की मांग उठने लगी । ऐसे में नरेंद्र मोदी ने जनता को भावनात्मक एकता में बांधते हुए जो आह्वान  किया उसे भी पहले  जैसी बल्कि और भी तीखी आलोचना झेलनी पड़ी | लेकिन 5 अप्रैल  की रात 9 बजे से अगले 9 मिनिट जो हुआ उसने प्रधानमन्त्री को तो हौसला दिया ही लेकिन  आम जनता के मन को भी हर प्रकार के भय से मुक्त कर दिया |

 उसके बाद से  लॉक डाउन  को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार करने में सरकार दबाव मुक्त हो गई | ये सन्देश पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि प्रधानमन्त्री में  लोगों की श्रद्धा और उनकी कोशिशों की सफलता के प्रति विश्वास बदस्तूर कायम है और यदि वे 14 अप्रैल के बाद भी बंदिशें जारी रखंगे तब जनसमर्थन उनके साथ रहेगा |

 मौजूदा हालात में जबकि विरोध के लिए अनेक स्वतंत्र माध्यम उपलब्ध हैं तब किसी भी नेता के लिए अपनी लोकप्रियता और विश्वसनीयता बनाये रखना बहुत ही कठिन होता है | साधारण स्थितियों में तो जनता को अपने  साथ रखना आसान है लेकिन मुसीबत के समय उसका धैर्य बनाये रखना ही नेतृत्व की असली परीक्षा होती है |

 ये सौभाग्य का विषय है  कि देश के मौजूदा नेतृत्व ने पूरी तरह विपरीत हालातों में पूरे देश को इस लड़ाई में अपना यथासंभव योगदान देने के लिये तैयार कर  लिया | किसी भी नेता की अग्निपरीक्षा ऐसे ही समय  होती है  जब वह लोगों को तकलीफ देकर भी उनका अजीज बना रहे |

 प्रधानमन्त्री ने इस पूरे घटनाक्रम के दौरान देश की जनता को घरों में रहने के लिए मजबूर करने  के बाद भी जिस तरह अपने साथ बनाये रखा उसे देखकर 1962 के चीनी हमले में भारत की शर्मनाक पराजय की वास्तविकता को  परदे पर उतारने वाली स्व. चेतन आनन्द की क्लासिक फिल्म “हकीकत” का वह दृश्य याद आ जाता है जब  युद्ध में बुरी तरह हारने के बाद शारीरिक और मानसिक रूप से टूट चुके सैनिकों  की टुकड़ी को ब्रिगेडियर ( अभिनेता स्व. जयंत ) दीपावली पर वायरलेस से संबोधित करते हुए अपना संदेश इन शब्दों से शुरू करते  हैं :-

“ जवानों , दिवाली मुबारक , घाव , तकलीफें और सदमे मुबारक |

आज तुम्हारे मुल्क ने तुम्हें हमदर्दी का तोहफा भेजा है |”

 उक्त संदेश देने वाले ब्रिगेडियर का बेटा ( धर्मेन्द्र ) युद्ध में मारा जा चुका था | लेकिन उन्होंने जवानों की हौसला अफजाई करने में जरा सी भी हिचक नहीं दिखाई |

 आज के संदर्भ में उस संदेश के एक - एक शब्द को मानों वास्तविकता में दोहराया जा रहा है | देश तकलीफ में है | रोजाना मौतें हो रही हैं | मुसीबत बढ़ती दिख रही है लेकिन नेता अपनी जनता से सम्वाद बनाये हुए उससे और तकलीफ सहने की अपील करता है और जनता खुशी - खुशी  राजी हो जाती  है | जो लोग इसमें भी राजनीति देखते हैं उनके  बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं हैं क्योंकि वे जनमानस को पढने में पहले की तरह इस बार भी विफल साबित हो रहे हैं |

देश को अराजकता में धकेलने की साजिश गृहयुद्ध की आशंका फैला रही रुदाली गैंग - आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी



 
आज जब देश एक असाधारण संकट में फंसा हुआ है और कोरोना नामक महामारी का प्रकोप चंद शातिर षड्यंत्रकारियों की वजह से अचानक देशव्यापी होने के साथ ही दोगुनी रफ्तार से बढ़ने लगा तब जरुरत है लोगों को हिम्मत और हौसला देने की क्योंकि इस अदृश्य दुश्मन से लड़ना उतना आसान नहीं जितना समझा गया था | 

बीते  तकरीबन दो सप्ताह से पूरा देश घरों में सीमित है | बहुत ही जरूरी होने पर बाहर जाने की अनुमति है और वह भी बहुत ही कम समय के लिए | पहले ये समझा जा रहा था कि 14 अप्रैल  तक कोरोना की श्रृंखला  को तोड़कर उससे आजादी हासिल कर ली जावेगी किन्तु बीते  एक सप्ताह के भीतर दिल्ली स्थित तबलीगी जमात के मुख्यालय मरकज से निकले जमाती कोरोना के संवाहक बन गये और आज पूरे पूरे देश में कुल संक्रमित लोगों में से तकरीबन 40 फीसदी लोग मरकज से  निकले हुए हैं | गत दिवस तमिलनाडू में जो 50 नए संक्रमित निकले उनमें 48 जमात से हैं | इसी तरह उप्र में 28 में 21 नए कोरोना  ग्रसित मरकज से वापिस आये थे |

 ये सब देखते हुए 14 अप्रैल से लॉक  डाउन हटाने को लेकर संशय की  स्थिति बन गयी है | अनेक राज्य इसे धीरे  - धीरे हटाने की प्रक्रिया पर विचार करने लगे हैं | उनका मानना है कि आखिर कब तक ये स्थिति बनाकर रखी जायेगी | अभी तक तो जनता ने धैर्य दिखाया लेकिन आगे क्या होगा ये सोचना मुश्किल है | सबसे बड़ी दिक्कत दिहाड़ी मजदूरों और रोज कमाने , रोज खाने वाले छोटे कारोबारी की है | इसके विपरीत तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने प्रधानमन्त्री से मांग की है कि लॉक डाउन बढ़ाया जाए | उनका कहना  है अर्थव्यवस्था तो बाद में भी सुधारी  जा सकती है लेकिन लोगों की जान वापिस नहीं लाई जा सकती |

 
अनिश्चय के इस माहौल में ये आवश्यक है कि जनता का हौसला बनाये रखा जावे और इसीलिये गत रविवार को प्रधानमंत्री के आह्वान पर पूरे देश में सामूहिक प्रकाशोत्सव जैसा आयोजन हुआ | केंद्र  और राज्यों की सरकारें बिना किसी राजनीतिक मतभेद के कोरोना से लड़ने में जुटी हैं | समाज  भी पूरी  संवेदनशीलता के साथ अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है | दैनिक जीवन में अकल्पनीय परेशानियों के बाद भी  हर वर्ग अपने जिम्मेदार नागरिक  होने का परिचय दे रहा है |

 लेकिन इस माहौल के बीच एक तबका ऐसा है जो बजाय लोगों को प्रोत्साहित करने के  भय और आशंकाओं का प्रसार करने के काम में लगा है | संचार माध्यमों के जरिये  इस तरह की सामग्री प्रसारित की जा रही है  जिससे लोगों में घबराहट फ़ैल जाए और वे आपा खो बैठें |

लॉक डाउन के बावजूद कोरोना ग्रसित लोगों की संख्या में वृद्धि से पता चलता है कि कुछ गड़बड़ है | चंद लोगों की बेवकूफी और असहयोग के कारण वातावरण भी बिगड़ने लगा है |

 इस स्थिति में एक वर्ग विशेष को जनता की शांतिप्रियता और अनुशासन लगता है रास नहीं आ रहा और इसीलिये वह निराशावाद के प्रसार के माध्यम से लोगों को भड़काने का तानाबाना बुनने के अपने परंपरागत कार्य में  लग गया है | 

एक तरफ तो भारत जिस बहादुरी और धीरज के साथ इस महामारी से देशवासियों को बचाने के प्रयास कर रहा है , पूरी दुनिया उसकी तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रही है | विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो यहाँ तक कहा कि कोरोना को  अब भारत ही परास्त कर  सकता है | आलम ये है कि अमेरिका के राष्ट्रपति भारत से दवाइयां भेजने की अपील कर रहे हैं | ईरान को तो भारत ने एक टेस्टिंग लैब बनाकर ही उपहार में भेज दी |

 इसी के साथ भारत उन चुनिन्दा देशों में है जिसने कोरोना के जन्म स्थान चीन के वुहान में फंसे भारतीयों को तब निकाला जब वहां कदम - कदम पर मौत मंडरा रही थी | इसी तरह ईरान और इटली जैसे देशों में कोरोना का जबर्दस्त प्रकोप होने के बाद भी वहां मुसीबत में फंसे भारतीयों को हमारे विमान वापिस लाये | जबकि पाकिस्तान ने चीन में फंसे अपने लोगों की सुध तक नहीं ली |

 भारत में कोरोना की चिकित्सा और जांच के पर्याप्त साधन नहीं  होने के बाद भी आपदा प्रबन्धन का हर सम्भव प्रयास किया गया और कोरोना की रोकथाम के साथ संक्रमित लोगों के समुचित इलाज का इंतजाम करते हुए मृत्यु दर को काबू में रखने में कामयाबी भी मिली |

 135  करोड़ की आबादी को चंद घंटे की अल्प सूचना पर तीन सप्ताह के लिए लॉक डाउन कर  देना आसान नहीं था | लेकिन प्रधानमन्त्री ने इतना बड़ा निर्णय करने के तीन  दिन पहले 22 अप्रैल  को जनता कर्फ्यू जैसा प्रयोगात्मक कदम उठाकर लोगों  की मानसिकता का पता किया और जब वे आश्वस्त हो गये कि जनता देश पर आये इस संकट से लड़ने में उनके साथ है तब उनने  बड़ा फैसला किया | अचानक घरों में सिमटकर रह जाने के निर्देश का  प्रारंभिक अफरातफरी के बाद लोगों ने पूरी तरह से पालन किया और इससे कोरोना से लड़ने के लिए बनाई गई टीम का मनोबल बढ़ा और उनका काम  भी आसान हुआ |

 जरूरी चीजों की आपूर्ति बनी रहने से जनता को काफी राहत मिली | गरीबों  को भोजन , तीन महीने के राशन के अलावा अतिरिक्त कोटा , तीन  महीने तक प्रतिमाह एक रसोई गैस सिलेंडर के अलावा बैंक खातों  में सीधे नगद राशि ट्रांसफर  किये जाने जैसे कदमों से जनता की  तकलीफें दूर करने का प्रयास भी तेजी से किया गया जिसका अनुकूल परिणाम भी मिला |

 सरकार लगातार ये आश्वासन देती जा रही है कि वह जल्द ही देश को इस महामारी से उबारकर पहले जैसी  स्थिति कायम करने में सफल होगी बशर्ते जनता लॉक डाउन के अंतर्गत लगाई गयी पाबंदियों का सही तरीके से पालन करते हुए कोरोना  को फैलने से रोके | सरकार क्या पूरी तरह सफल रही और उसके  द्वारा किये गये प्रयास लोगों की परेशानियां दूर करने में सहायक बने ये समीक्षा  का विषय है लेकिन उसके लिए ये सही समय नहीं है | 

आज आवश्यकता है उन जांबाज लोगों का साहस बढ़ाने और सहयोग करने की जो अपनी जान जोखिम में डालकर भी कोरोना को हराने के काम में  दिन - रात जुटे  हुए हैं |

 लेकिन इससे अलग कुछ लोग नकारात्मक खबरें फैलाकर समाज का मनोबल तोड़ने के गंदे खेल में लग गये हैं | उन्होंने ये प्रचारित करना शुरू कर दिया है कि कोरोना संकट खत्म होते ही देश में बड़े पैमाने पर नौकरियां छिन जायेंगी , जो श्रमिक लौटकर गाँव गए हैं उन्हें दोबारा शहरों में रहना और खाना दूभर हो जायेगा | भुखमरी फैलेगी जिससे वर्ग संघर्ष बढ़ेगा और तो और दो सम्प्रदायों के झगड़े की वजह से गृहयुद्ध की स्थिति तक बन सकती है |

 इस दुष्प्रचार के पीछे वही लोग हैं जो बीते छह बरस से मुख्य धारा से निकलकर बाहर हो गए और जिनकी प्रासंगिकता अब नाममात्र की रह गई है | ये लोग हर उस कोशिश को पलीता लगाने की कूटरचना करते हैं जिससे भारत मजबूत हो सके | एक तरफ जहां विश्व की प्रमुख वित्तीय संस्थाए कोरोना के बाद के दौर को भारत का दौर बताने की भविष्यवाणी कर रही  हैं वही ये तबका समाज में नैराश्य फ़ैलाने से बाज नहीं आ रहा |

 पुरानी  बात नहीं है जब केंद्र  सरकार ने जम्मू कश्मीर में भारत विरोधी तत्वों की संरक्षक बनी हुई धारा 370 को एक झटके में हटाने का साहस दिखाते हुए  कश्मीर घाटी में अलगाववाद की जड़ें खोदकर फेंकने का ऐतिहासिक फैसला किया तब यही वर्ग रुदाली गैंग बनकर पूरे देश में छाती  पीटता फिरा | यहां तक कि विदेशों तक में देश हित के विरूद्ध माहौल बनाने जैसा घिनौना कार्य  किया | 

उस समय भी ये लोग यही प्रचारित करते रहे कि जैसे ही वहां कर्फ्यू हटेगा और संचार सुविधाएँ बहाल होगीं त्योंहीं जनता केंद्र के विरुद्ध सड़कों पर उतर आयेगी | लेकिन उनका वह आशावाद मिथ्या साबित हुआ  |

 कोरोना संकट की वजह से घरों में रहने को मजबूर लोगों की मदद  करने या उनका हौसला बढ़ाने की बजाय आने वाले दिनों में अराजक हालात पैदा होने का भय पैदा कर उन्हें भड़काने का पाप ये गिरोह कर  रहा है |

 हालांकि इसकी आवाज और असर अब सीमित रह गए हैं और  जनता इनके घ्रणित इरादे समझकर जिम्मेदार हाथों में बागडोर दे चुकी है लेकिन जहर की खेती करने वाले इन कुंठाग्रस्त विघ्नसंतोषियों के इरादों का पर्दाफाश जरूरी हैं | संकट की घड़ी में जब देश का साधारण व्यक्ति तक इस विपदा से लड़ने में सरकार के साथ खड़ा नजर आ रहा है तब मंथरा के ये कलियुगी अवतार अपनी अपशकुनी सोच का परिचय देने से बाज नहीं आ रहे |

 ये कहने में कोई हिचक नहीं है कि कोरोना से चल रही लड़ाई को नुक्सान पहुँचाने में लगे ये लोग किसी ऐसी विदेशी ताकत की कठपुतली हैं जो इस अवसर का फायदा उठाकर अव्यवस्था और अराजकता फ़ैलाने पर आमादा हैं |

 ऐसे लोगों के दुष्प्रचार के पीछे के मकसद को समझना हर जिम्मेदार देशवासी के लिए जरूरी है | कोरोना के साथ देश को कमजोर करने वाली इन ताकतों से भी लड़ना होगा जिनका उद्देश्य येन केन प्रकारेण भारत में गृह युद्ध की स्थितियां उत्पन्न कर  देना है |   कोरोना जिस देश से आया वह भारत में बैठे अपने मानसपुत्रों के जरिये जो चक्रव्यूह रच रहा है उसे बनने के पहले ही ध्वस्त करना जरूरी है ।