Thursday, 7 May 2020

कश्मीर घाटी : सेना की मानवीय क्षति को रोकना भी जरूरी



कश्मीर घाटी में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद बीते कुछ दिनों से फिर सिर उठाने लगा है। यद्यपि सुरक्षा बल ढूंढ - ढूंढकर उन्हें मार भी रहे हैं लेकिन इस दौरान हमारे अनेक जवान और सैन्य अधिकारी भी जान से हाथ धो बैठे। इस कारण देश में गुस्से के साथ ही हताशा भी है। आतंकवादी जानते हैं कि उनका अंजाम क्या है। लेकिन एक फौजी के मारे जाने से देश का बड़ा नुकसान होता है। युद्ध में वीरगति प्राप्त होना अलग बात है और छोटी-छोटी मुठभेड़ में मारा जाना अलग। जम्मू - कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद लम्बे समय तक वहां प्रतिबंध लगे रहे। मोबाईल और इन्टरनेट सेवा अवरुद्ध रखी जाने की वजह से घाटी में शांति रही। गत दिवस हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर रियाज नायकू के मारे जाने के पूर्व हंदवाड़ा में हुई मुठभेड़ में भी दो आतंकवादी मार गिराए गये । लेकिन कर्नल और मेजर रैंक के एक-एक अफसर सहित तीन जवानों की भी मौत हो गयी। उसके तुरंत बाद सीआरपीएफ  की टुकड़ी पर ग्रेनेड से हमला हुआ जिसमें तीन जवान मारे गये। कुछ दिन पहले भी एक नजदीकी मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के पांच लोगों की जान चली गयी। कोरोना संकट के दौरान इस तरह की गतिविधियों से पाकिस्तान की घटिया सोच जाहिर हो रही है। उसे ये मुगालता है कि इस समय भारत का समूचा ध्यान कोरोना से लड़ने में लगा है, इसलिए इसका लाभ उठाकर कश्मीर घाटी में दोबारा आतंकवाद की फसल उगाई जा सकती है। गत दिवस नायकू को बचाने के लिए भी स्थानीय लोगों ने सुरक्षा बलों पर पथराव किया। उल्लेखनीय है नायकू को बुरहान बानी की टक्कर का आतंकवादी सरगना माना जाता था। ये भी खबर है कि बर्फ  पिघलने का लाभ लेकर पाकिस्तान आतंकवादियों को सीमा पार से भारत में भेजने के काम में जुट गया है। सुरक्षा बलों की सतर्कता से यद्यपि उसे ज्यादा सफलता तो नहीं मिली लेकिन बीते एक माह में सेना और उसके सहयोगी बलों ने जिस तरह तलाशकर आतंकवादियों को मारा उससे ये साबित हो गया कि घाटी में आतंकवाद के बीज जमीन के भीतर दबे हुए हैं। 370 हटाये जाने के समय लगाये गये प्रतिबंध धीरे-धीरे शिथिल किये जाने के कारण जो आतंकवादी छिपे बैठे थे वे फिर सक्रिय होते लग रहे हैं। लम्बे समय तक घाटी के भीतर संचार सुविधा बंद रहने की वजह से भी देश विरोधी तत्वों का नेटवर्क कमजोर हो गया था। लेकिन हाल ही के दिनों में पत्थरबाजी की घटनाएं नए सिरे से होने लगीं। इसी के साथ आतंकवादी  कुछ हरकत में आये हैं। घुसपैठ भी तेज हुई है। लेकिन ये भी सच है कि आतंकवादी सरगना मारे भी जा रहे हैं। सुरक्षा बलों द्वारा उनके नाम घोषित नहीं किये जाने की नीति भी लागू की गयी है। जिससे क्षेत्रीयजनों को भड़काने का षडयंत्र कामयाब न हो। नायकू के शव को दफनाने का काम भी सेना द्वारा ही किया गया जिससे जनाजे में जनसैलाब न उमड़ पड़े। ये बुद्धिमात्तापूर्ण फैसला है। कश्मीर में निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव करवाए जाने की तैयारी केंद्र कर रहा है। यदि कोरोना न आया होता तो अभी तक वहां का राजनीतिक चित्र भी स्पष्ट होने लगता। डा.फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर की रिहाई और महबूबा मुफ्ती को अन्यत्र कहीं रखने की बजाय उनके घर में नजरबंद रखने के फैसले ने केंद्र की नरमी के संकेत दिए थे। बीच में अब्दुलला पिता - पुत्र के कुछ बयानों से ये लगा कि वे भी केंद्र से टकराने के मूड में नहीं हैं। नायकू के मारे जाने के बाद भी उमर की प्रतिक्रिया काफी संयत रही। लेकिन एक बात तय है कि जरा सी ढ़ील से घाटी के हालात बिगड़ सकते हैं। नायकू को बचाने के लिए किये गये पथराव से भी ये पता लगा कि वहां के लोगों को अभी भी पैसा मिल रहा है। हालाँकि इस बारे में एक बात ये भी विचारणीय है कि अनुच्छेद 370 हटाने के पहले ही अमरनाथ यात्रा बीच में ही रद्द कर दी गयी थी। उसके बाद लंबे समय तक घाटी कर्फ्यू के अंतर्गत रही और अब आ गया कोरोना संकट। इस वजह से वहां पर्यटन उद्योग पूरी तरह से ठप्प पड़ा हुआ है। इस वर्ष की अमरनाथ यात्रा तो प्रारंभ होने के पहले ही कोरोना के कारण रद्द कर दी गयी। पर्यटन घाटी के लोगों की आय का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में वहां युवकों के पास कोई काम भी नहीं है। ऊपर से घाटी में कोरोना भी जोर मार रहा है। जबकि जम्मू और लद्दाख में उसका प्रकोप काफी कम है। ये देखते हुए कश्मीर में सैलानियों का आना इस वर्ष तो असम्भव दिखाई देता है। परिणाम स्वरूप बेरोजगारी में वृद्धि होती जा रही है जिसका लाभ लेकर पाकिस्तान नये सिरे से वहां अशांति फैलाने की कोशिश कर रहा है। उसे लग रहा है कि कोरोना में उलझे रहने से शायद भारत सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कदम उठाने से बचेगा। लेकिन भारतीय सुरक्षा बल भी हर आतंकवादी घटना का कड़ा जवाब दे रहे हैं। और ये भी चर्चा है कि किसी बड़ी जवाबी कार्रवाई की रूपरेखा बन रही है जिससे घाटी के भीतर मौजूद पकिस्तान समर्थकों को कड़ा सन्देश मिलने के साथ ही सीमा पार से होने वाले घुसपैठ रुक सके। लेकिन आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में जवानों और सैन्य अधिकारियों का मारा जाना बड़ा नुकसान होता है। बेहतर हो सैन्य बल ऐसी रणनीति बनायें जिससे कि मानवीय क्षति कम से कम हो। आतंकवादी जिस जगह छिपे होते हैं उसे उड़ा देना बेहतर विकल्प है। इजरायल भी ऐसा ही करता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 May 2020

गाँवों में कोरोना के प्रवेश को रोकना बेहद जरूरी



बहुत लोग अभी तक इस बात की आलोचना कर रहे थे कि शहरों में फंसे प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक भेजने में सरकार उदासीन रही। ऐसे लोगों का कहना था कि लॉक डाउन लागू होने के पहले ही सबको उनके गाँव भेजने की व्यवस्था करनी चाहिए थी। लॉक डाउन के बाद शहरों में काम बंद होने से बेरोजगार हुए प्रवासी श्रमिकों को भोजन, आवास और नगदी की जो समस्या झेलने पड़ी वह किसी त्रासदी से कम नहीं थी। उसे लेकर कई जगह उपद्रव भी हुए। दिल्ली, मुम्बई और सूरत के अलावा भी अनेक शहरों में अपने घरों तक भेजे जाने की मांग लेकर श्रमिकों ने हंगामा मचाया। आज जो राजनीतिक नेता उनके घर भेजने का खर्च वहन करने की डींग हांक रहे हैं यदि वे वहीं उनके भरण-पोषण की व्यवस्था पर ध्यान देते तब उन्हें खून के आंसू नहीं रोना पड़ते। लेकिन हमारे देश में राजनीति का अर्थ खुद कुछ करने की बजाय दूसरे की आलोचना करना हो गया है। लेकिन बीते कुछ दिनों में तकरीबन 75 हजार श्रमिकों को उनके घर तक पहुँचाने के बाद अब चिकित्सा जगत इस बात को लेकर चिंतित है कि कहीं उनके साथ कोरोना भी दबे पांव ग्रामीण क्षेत्रों तक न पहुंच जाए जो ईश्वर की कृपा से अभी तक उससे अछूते बने हुए थे। हालाँकि शहरों से ग्रामीण क्षेत्रों को भेजे गये प्रवासी श्रमिकों का स्वास्थ्य परीक्षण करने के बाद ही उन्हें ट्रेन में बैठने की अनुमति दी जाती है किन्तु हजारों रिपोर्टों में एक-दो भी गलत हुई और ऐसा एक व्यक्ति भी ट्रेन में आ गया तब वह कितने लोगों को संक्रमित कर देगा ये बात चिंता में डालने वाली है। दरअसल लॉक डाउन शुरू किये जाने के पहले उन सबको गांवों तक भेजने की व्यवस्था की जाती तब न उनकी जांच हो पाती और न ही 14 दिन तक क्वारंटीन  करने का इंतजाम ही था। अभी जिस व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें शहरों से भेजा जा रहा है उसमें उन सबका विधिवत रिकार्ड सबंधित राज्य सरकारें बना रही हैं और उनके द्वारा चयनित लोग ही वापिस लौट रहे हैं। गन्तव्य तक पहुँचने के बाद उन्हें क्वारंटीन करते हुए उनके भोजन पानी की व्यवस्था भी की जा रही है। इसके बावजूद भी खतरा बना हुआ है किन्तु शुरुवात में यदि उनको आने की छूट मिलती तब अराजकता के हालात बने बिना नहीं रहते। जिन शहरों में वे श्रमिक कार्यरत थे वहां के स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार ने यदि ठीक तरह से उनकी व्यवस्था की होती तो उपद्रव की स्थिति न बनी होती। लेकिन ऐसा लगता है दो चार दिन भोजन पानी की व्यवस्था करने के बाद दिल्ली सरकार की तरह बाकी राज्य सरकारों ने भी जान बूझकर उनकी उपेक्षा की जिससे वे वापिस जाने का दबाव बनाएं। खैर, अब तो उनकी वापिसी का अभियान शुरू हो ही चूका है लेकिन ये कितने दिन तक जारी रहेगा कहना कठिन है, क्योंकि जो राज्य सरकारें अपने प्रवासी श्रमिकों के सूची बना रही हैं उसमें भी काफी समय लग रहा है। और फिर ये देखना भी जरूरी है कि जिन स्थानों पर वे जा रहे हैं वहां पूरी सावधानी बरती जा सकेगी या नहीं। बीते दो तीन दिनों में कोरोना का संक्रमण तेजी से बढ़ा है। और उसी समय प्रवासी श्रमिकों की वापिसी भी हो रही है। ऐसे में ये देखने वाली बात होगी कि उनके साथ कहीं संक्रमण भी ग्रामीण इलाकों तक न जा पहुंचे। वरना अब तक सरकार द्वारा बरती गईं तमाम सावधनियों पर पानी फिरते देर नहीं लगेगी और वह स्थिति भयावह होगी। शहरों में जांच और चिकित्सा की जो व्यवस्था अभी तक की गयी है वह भी सभी जगह पर्याप्त नहीं है। आइसोलेशन और क्वारंटीन के इंतजाम भी आसान नहीं हैं। ये देखते हुए मई का पूरा महीना बेहद महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि तब तक प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या लौट चुकी होगी और उसके परिणाम भी सामने आ जायेंगे। ये भी संभव है कि जिन शहरों में उद्योग-धंधे तथा निर्माण गतिविधियाँ प्रारम्भ हो गयी हैं वहां के प्रवासी श्रमिक गाँव लौटने का इरादा फिलहाल त्यागकर अपना रोजगार दोबारा हासिल कर लें। लेकिन ये बात सामने आ गयी है कि इन श्रमिकों को लॉक डाउन के पहले या तुरंत बाद वापिस भेजना बड़े संकट का कारण बन सकता था। उस समय तक तो कोरोना की जांच की पर्याप्त व्यवस्था मुम्बई तक में नहीं हो पाई थी। बीते कुछ समय से जांच कार्य में तेजी आने से ही नये संक्रमित तेजी से सामने आ रहे हैं। ये बात जगजाहिर है कि शहरों में रहने वाले अधिकांश बाहरी श्रमिक झुग्गियों में रहने मजबूर होते हैं। ऐसे में उनके संक्रमित होने का डर भी बना रहता है। भारत सरकार ने उनको वापिस भेजने में हुई देर के लिए खूब आलोचना सही किन्तु उससे विचलित हुए बिना सही समय पर योजनापूर्वक जो व्यवस्था की वह पूरी तरह से उचित निर्णय है। संबन्धित राज्य सरकारों द्वारा अपने नागरिकों का चयन करने के उपरान्त समस्त सावधानियां रखते हुए जिस तरह प्रवासी मजदूर वापिस लाये जा रहे हैं ऐसा करना शुरुवात में न संभव था और न ही सुरक्षित। लेकिन उन्हें घर तक ले आना ही पर्याप्त नहीं है। वहां पहुंचने के बाद क्वारंटीन अवधि में वे संक्रमण मुक्त रहें ये देखते रहना ज्यादा जरूरी है। वरना शहरों से भागकर तो लोग गाँव जा रहे हैं लेकिन गाँव भी यदि कोरोना की चपेट में आये तब वहां से लोग कहाँ जायेंगे, ये बड़ा सवाल है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 May 2020

शराब दुकानें खोलने की जल्दी क्या थी



वही हुआ जो होना था। एक बार में 5 लोगों की उपस्थिति, 2 गज की दूरी और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे निर्देश शराब की तलब के आगे हवा-हवाई हो गए। इतनी मारामारी तो मुफ्त भोजन वितरण में भी कहीं नहीं दिखी। सुबह 7 बजे दुकानें खुलना थीं लेकिन लोग 5 बजे से ही आकर खड़े हो गए। लॉक डाउन के बाद अनाज और किराना  खरीदने के लिए भी लोग इस तरह नहीं भागे थे। टीवी समाचारों के जरिये शराब दुकानों के जो दृश्य देश भर से देखने में मिले वे चौंकाने वाले कम चिंता में डालने वाले ज्यादा थे। लॉक डाउन के माध्यम से लोगों के बीच शारीरिक दूरी का एकमात्र उद्देश्य  कोरोना संक्रमण को रोकना था। उसमें काफी हद तक सफलता भी मिलती दिख रही थी लेकिन गत दिवस शराब दुकानें खुलते ही इतने दिनों की मेहनत पर शराब फिर गयी। अनेक लोग तो पूरा का पूरा बक्सा उठाकर ऐसे चले आ रहे थे जैसे इसके बाद शराब बनना बंद होने वाली हो। पुरुषों के अलावा आधी आबादी की कतारें महिला सशक्तीकरण का जीवंत प्रमाण पेश कर रहीं थी। टीवी चैनलों को भी एक विषय मिल गया कोरोना के कारण उत्पन्न बोरियत को दूर करने का। शराब खरीदने वाले बिना शरमाये या घबराए साक्षात्कार दिए जा रहे थे। कुल मिलाकर ऐसा लगा ही नहीं कि महामारी का कोई भय है। सरकार की मजबूरी ये है कि उसे राजस्व चाहिए और शराब उसके लिए सबसे सरल जरिया है। कल शाम तक ये आंकड़े भी आने लगे कि किस राज्य को कितनी कमाई हुई ? लेकिन इस निर्णय की जिस तरह आलोचना हो रही है उससे एक नई बहस  शुरू हो गई है। शराब बुराई का कारण है या सरकारी कमाई का जरिया , इसे लेकर मतभिन्नता सदैव रही है। उसके सार्वजनिक उपयोग को लेकर पहले जैसी झिझक या अपराधबोध भी नहीं रहा। अब तो वह आधुनिक जीवनशैली के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यवसायिक सफलता का पैमाना भी मानी जाने लगी है। कुछ लोग उसे स्वास्थ्यवर्धक मानकर भी उसके सेवन का औचित्य साबित करते हैं। लेकिन कोरोना संक्रमण के इस दौर में लगभग सवा महीने से शराब की बिक्री रुकी होने के बाद अचानक उसे शुरू करने से जो अव्यवस्था फैली उसने इस बात की जरुरत पैदा कर दी है कि उसको लेकर कोई स्थायी नीति बननी चाहिए। वह बिहार और गुजरात में बुरी क्यों है और बाकी राज्य उसे बुरा क्यों नहीं मानते ये भी स्पष्ट होना चहिये। गुजरात को छोड़ भी दें जो औद्योगिक दृष्टि से काफी विकसित है किन्तु बिहार जैसे राज्य को तो राजस्व की भरपूर जरूरत है। लेकिन उसने भी शराब पर रोक लगा रखी है। लोगों का कहना है कि लॉक डाउन के दौरान भी चूंकि शराब की बिक्री अवैध रूप से होती रही इसलिए सरकार को लगा कि इससे बेहतर है शराब दुकानें खोल दी जाएं जिससे उनसे होने वाली आय उसके खजाने में जमा हो सके। तर्कों और तथ्यों के आधार पर शराब के पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है लेकिन उसके जो सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभाव हैं उनके आधार पर उसके सेवन को नुकसानदेह माना जाता है। और वह गलत भी नहीं है। निम्न आय वर्ग के बीच शराब से किस तरह परिवार बर्बाद होते हैं इसके लिये किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। शराब से होने वाली राजस्व आय से ज्यादा उसके कारण पैदा होने वाली समस्याओं के समाधान पर खर्च हो जाता है। सामाजिक वातावरण खराब होता है , सो अलग। बीते सवा महीने से शराब बंदी की वजह से किसी भी प्रकार की शिकायत नहीं मिली। किसी राजनेता अथवा संगठन ने भी उसके बारे में कोई मांग नहीं की। कुछ राज्य सरकारों ने ही अपने राज्स्व में कमी के नाम पर प्रतिबन्ध हटाने का दबाव बनाया। लेकिन कल पहले दिन ही जो स्थितियां सामने आईं उन्हें देखते हुए ये साबित हो गया कि शराब की लत इंसान को किस तरह से विवेकशून्य बना देती है। बगैर पढ़े लिखे लोगों की बात न भी करें किन्तु सुशिक्षित वर्ग भी जिस तरह से शराब के लिए अपनी जि़न्दगी खतरे में डालने पर आमादा दिखा वह देखकर अचरज कम दु:ख ज्यादा हुआ। मजे की बात देखिये कि मप्र के जिन शहरों को रेड जोन में मानकर शराब बिक्री के लिए प्रतिबंधित किया गया उन्हीं के ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी अनुमति दे दी गई। लेकिन अब सुना है शराब विक्रेता दुकान नहीं खोलना चाहते जबकि सरकार की मंशा है शराब बेची जाए। हो सकता है विक्रेताओं को अवैध बिक्री वाली स्थिति रास आ रही हो। लेकिन इस सबसे हटकर अब सभी राज्य सरकारों को मिल बैठकर पूरे देश के लिए एक समान शराब नीति बना लेनी चाहिए। वह अच्छी है तो उसे लेकर होने वाला अपराधबोध खत्म हो और नहीं तो फिर खुलकर उसकी बुराई सामने लाई जाएं। शराब से कमाई करने वाली सरकार शराब बंदी का अभियान चलाये और नशा मुक्ति केंद्र में जाकर वे अधिकारी लोगों को समझाएं जो खुद शाम को ऑफीसर्स क्लब में पीकर धुत हो जाते हों, तो इस पाखंड से कोई लाभ नहीं है। शराब बिक्री पर अचानक प्रतिबंध हटाने से पैदा हुई अव्यवस्था को भले ही स्वाभाविक प्रक्रिया कहकर उसका बचाव किया जाए किन्तु इस बात का जवाब कौन देगा कि जब सब कुछ बंद है तो शराब की दुकानें खोलने की ऐसी कौन सी जल्दी पड़ी थी?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 May 2020

प्रवासी श्रामिक की वापिसी ग्रामीण भारत के लिए वरदान होगी



प्रवासी श्रमिकों को वापिस ले जाने वाली रेल गाडिय़ां अपने गंतव्य तक पहुँचने लगीं। इसके कारण देश भर में फंसे लाखों लोगों में उम्मीद की किरण जागी है। लेकिन उनका स्वास्थ्य प्ररीक्षण किया जाएगा और सब ठीक होने पर ही उन्हें घर जाने मिलेगा। वहां भी कुछ दिन क्वारन्टीन की स्थिति में रहने की मजबूरी रहेगी। लेकिन ये प्रक्रिया भी आसान नहीं है। एक ट्रेन बमुश्किल 1200 यात्रियों को ले जा पा रही है। ऐसे में प्रतिदिन 100 गाडिय़ाँ चलें तब भी अधिकतम सवा लाख लोग ही जा सकेंगे। जबकि मोटे अनुमान के मुताबिक कुल संख्या करोड़ों में बताई जा रही है। हालाँकि उसका सही अनुमान किसी के पास नहीं है। उनको घर पहुँचाने के लिए सरकार पर चौतरफा दबाव पडऩे लगा था। अनेक जगहों पर बलवे की नौबत तक आ गई। गत दिवस मप्र और गुजरात की सीमा पर जमा सैकड़ों मजदूरों ने बैरिकोड तोडकर भीतर घुसने की जबरिया कोशिश भी की। ये भी सही है कि हजारों लोग पहले ही पैदल या सायकिल जैसे किसी साधन से अपने गाँव तक पहुँच चुके थे। यद्यपि कुछ दुर्भाग्यशाली भी रहे जो बीच में ही दम तोड़ बैठे। प्रवासी मजदूरों का दर्द घर पहुँचते ही दूर हो जाएगा, ये मान लेना जल्दबाजी होगी। क्योंकि जिस दो वक्त की रोटी के लिए वे अपने गाँव से दूर मुम्बई, दिल्ली या किसी दुसरे शहर में खानाबदोशी की जि़न्दगी जीने गये वह उन्हें गाँव में मिलती होती तब वे जाते ही क्यों? और इसीलिये ये सवाल भी साथ ही साथ उठ खड़ा हुआ है कि क्या वे दोबारा लौटेंगे? यदि हाँ, तो कब तक और नहीं, तो करेंगे क्या? उधर लॉक डाउन के तीसरे चरण में उद्योग धंधे शुरू होने की अनुमति मिलते ही श्रामिकों की उपलब्धता का सवाल उठने लगा है। अकुशल मजदूर तो चलो जैसे तैसे मिल भी जाए किन्तु कुशल श्रमिकों का टोटा पडऩे की बात अभी से सुनाई देने लगी है। दूसरी बात ये है कि उद्योग शुरू होने के बाद भी क्या अब तक फंसे पड़े श्रमिक अपने गाँव लौटना चाहेंगे या वे इरादा बदलकर काम करने लगेंगे। प्रवासी श्रमिकों की ये समस्या केवल देश में नहीं अपितु खाड़ी देशों के साथ ही पश्चिम एशिया के तमाम मुल्कों में रह रहे भारतीयों को लेकर भी है। जो या तो लौट आये हैं या लौटने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में बेरोजगारी का ग्राफ  और उपर जाने का अंदेशा है। आने वाले कुछ दिनों में हालत काफी हद तक साफ़  होगी। उद्योगों के सामने फिलहाल मजदूरों के अलावा कच्चे माल की भी किल्लत है। हो सकता है सामान्य स्थित्ति आते - आते तक देश में मानसून दस्तक देने लगे। और तब खेती किसानी का काम भी शुरू हो जाएगा। ऐसे में जो प्रवासी श्रमिक लौटकर आये हैं उनमें से कुछ को खेतिहर मजदूर का काम मिल सकता है बशर्ते वे उसके लिए राजी हों। उनके शहर जाने के पीछे भी खेतों में काम न करने की प्रवृत्ति थी। विशेष तौर पर ग्रामीण युवा अब अपने किसान पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम नहीं करना चाहता। शहरों का आकर्षण उसे अपने घर से दूर ले तो जाता है लेकिन चंद अपवाद छोड़कर वहां भी उसके साथ संघर्षों की कभी न टूटने वाली श्रृंखला जुड़ी रहती है। कोरोना न होता तो अभी भी महानगरों से इतनी बड़ी संख्या में श्रमिकों की वापिस नहीं होती। लेकिन अब आगे की स्थिति क्या होगी इस पर अर्थशास्त्रियों में मंथन चलने लगा है। यहाँ तक कि वैश्विक स्तर पर भारत के बारे में सोचने वाले भी प्रवासी मजदूरों के घर लौटने के बाद के प्रभाव का पूर्वानुमान लगाने में व्यस्त हैं। वैसे इस बारे में एक सहज विश्लेषण तो यह है कि ऐसा होने से भारतीय अर्थव्यवस्था को नये पंख लग सकते हैं। मसलन ग्रामीण क्षेत्रों में श्रामिकों की कमी का रोना दूर हो जाएगा। शहरों से लौटे तमाम मजदूर वहां की हकीकत को समझने के बाद हो सकता है वापिस खेतों में उतरने का मन बनाएं। इससे वे किसान भी कृषि कार्य को विस्तार देने के लिए प्रेरित होंगे जो मजदूरों की किल्लत के कारण कृषि छोड़कर कुछ और करने की सोचने लगे थे। बड़ी संख्या में ऐसे किसान भी हैं जिन्होने या तो खेती की जमीन बेच दी या बेचने की सोच रहे हैं यदि उन्हें श्रम शक्ति का सहारा पहले जैसा मिलने लगे तो संभव है वे दुबारा कृषि करने लगें। इसी तरह ग्रामीण इलाकों में पशुपालन और दुग्ध व्यवसाय में भी कमी आई है। किसान पहले बैलों की खातिर गाय पालते थे। लेकिन हल और बैलगाड़ी का दौर खत्म होते ही गोपालन के प्रति भी रुझान कम होने लगा। एकाध पशु तो खैर कुछ लोग रखते भी हैं लेकिन इस कार्य में भी श्रमिकों का अभाव समस्या बन गया। ऐसे में शहरों से वापिस आये मजदूरों को ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार मिले तो उनमें से अनेक लौटने का इरादा त्याग सकते हैं। उनके गाँव में रुकने से शहरी उद्योगों को शुरुवात में कुछ परेशानी हो सकती है किन्तु बाद में ये कमी उन शहरी बेरोजगारों के लिए नए अवसर उत्पन्न करेगी जो ग्रामीण श्रमिकों की वजह से काम से वंचित रहते थे। कुल मिलाकर कोरोना के बाद के भारत में श्रम और श्रमिक को लेकर बड़े बदलाव देखने मिल सकते हैं। यद्यपि शुरुवाती दौर में कुछ व्यवहारिक परेशानियाँ आ सकती हैं किन्तु कुछ महीनों बाद परिवर्तन अपना असर दिखा सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में तमाम विरोधाभासों के बाद भी तकरीबन 48 फीसदी योगदान देने वाले ग्रामीण जगत को यदि काम करने वाले ज्यादा हाथ मिल जाएं तो वहां खेती के अलावा बाकी काम धंधे भी दोबारा जोर पकड़ सकते हैं। भारत के भविष्य के लिए ये परिवर्तन सुखद भी हो सकता है। शहरों की चकाचौंध के पीछे का अंधेरा देखकर लौटे व्यक्ति को इतना तो महसूस हो ही गया होगा कि गाँव में आज भी संवेदनाएं बची हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 May 2020

ऐसे में तो गरीबी और बेरोजगारी कभी नहीं मिटेगी :जिसमें परिश्रम की प्रवृत्ति हो वह भूखा नहीं रह सकता

ऐसे में तो गरीबी और बेरोजगारी कभी नहीं मिटेगी

 जिसमें परिश्रम की प्रवृत्ति हो वह भूखा नहीं रह सकता

 

कोरोना की वजह से हुए लॉक डाउन में हर किसी की निगाह भविष्य के भारत पर लगी हुई है | ये आशा भी बलवती है कि जल्द ही देश इस संक्रमण से मुक्त हो जाएगा | लेकिन उसका जो दुष्प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है उसके लिहाज से सामान्य स्थिति आने में लम्बा समय लगेगा | ये  कितना होगा , पक्के तौर पर कोई नहीं बता पा रहा | संकट विश्वव्यापी होने से भारत की अर्थव्यवस्था पर अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव पड़े बिना भी नहीं रहेगा | 

लॉक डाउन के बाद से विदेशी पूंजी जिस मात्रा में निकली उससे  चिंता के बादल गहराने लगे थे लेकिन बीते कुछ दिनों से शेयर बाजार फिर ऊँचाई की तरफ बढ़ने से लगने लगा है कि भारत में कोरोना के विरुद्ध बनाई जा रही रणनीति  काफी हद तक सफल है , इसीलिए पूरी दुनिया मान रही है कि भारत  विशाल जनसंख्या के बाद भी कम से कम नुकसान के साथ  कोरोना संक्रमण को घेरने में कामयाबी हासिल कर लेगा | 

लॉक डाउन का तीसरा चरण घोषित होने के साथ ही केंद्र  सरकार ने प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्य पहुँचाने के लिए विशेष रेलगाड़ियां चलाना भी शुरू कर दिया है | क्योंकि सामान्य दिनों में ऐसा  करने  से अव्यवस्था और अराजकता का खतरा था । इसी के साथ ही सरकार दूसरी किसी  जगह फंसे छात्रों , पर्यटकों तीर्थयात्रियों , तथा सामान्य जनों को भी उनके गन्तव्य तक भेजने के इंतजाम  कर रही है | रेड, ऑरेंज तथा ग्रीन ज़ोन नामक वर्गीकरण करते हुए लॉक डाउन में ढील देने की कार्ययोजना भी तय कर दी है । जिसका उद्देश्य कारोबार को शुरू करते हुए जनजीवन को सामान्य स्थिति में लाने के साथ ही अर्थव्यवस्था में आए ठहराव  को दूर करना है | 

लेकिन सबसे बड़ी समस्या करोड़ों उन गरीबों की रोजी - रोटी का इंतजाम करना है जिनके हाथ से रोजगार तो छिन गया ।  जिस गाँव को काम के अभाव की वजह से वे छोड़कर गये थे उसी में उन्हें बदहाली की स्थिति में लौटना पड़ रहा है |

विशेषज्ञों की मानें तो भारत में तकरीबन 20 करोड़ श्रमिकों का रोजगार इस दौरान गया । वहीं निजी क्षेत्र द्वारा वेतन में कटौती कर दी गई | भारत सरकार की अनेक नवरत्न कम्पनियों ने उच्च प्रबन्धन के भत्ते घटा दिए | कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि कोरोना उपरांत का परिदृश्य भारी अनिश्चितता का रहेगा | उद्योग - व्यापार के लिए तो बैंक तथा बाकी वित्तीय संस्थान और विदेशी निवेश से पूंजी का इन्तजाम सम्भव है लेकिन करोड़ों बेरोजगार मजदूरों के अलावा गरीबी रेखा के नीचे आने वालों की संख्या में हुई वृद्धि से निपटने के लिए सरकार के पास क्या योजना है ये फ़िलहाल तो अनिश्चित है | और यही चिंता का कारण  है |

 अनेक विशेषज्ञ ये चेतावनी दे चुके हैं कि बेरोजगारी के शिकार  लोग कोरोना से बच भी गये तो , भुखमरी से मर जायेंगे | हालाँकि लॉक डाउन के साथ ही जनधन खातों में कुछ नगदी रकम जमा करवा दी गई थी । साथ ही तीन महीने का राशन अग्रिम देने के अलावा मुफ्त में भी गेंहू , चावल और दाल गरीबों को दी गई | जिनके राशन कार्ड नहीं हैं उनको भी अनाज देने के निर्देश जारी हुए | लेकिन जो प्रवासी मजदूर हैं  वे उस सहायता से भी वंचित रह गए | जिन लोगों के खाते में 500 या कुछ  ज्यादा नगदी जमा भी हुई वह खत्म होने में देर नहीं लगी | भले ही सरकार सभी गरीबों को अनाज दे दे लेकिन उनके पास जब तक ऊपरी खर्च का पैसा नहीं होगा तब तक वे लाचार ही रहेंगे | इसीलिये चारों  तरफ से दबाव बन रहा है कि उनके खाते में कुछ और राशि  जमा की जाए जिससे आने वाले कुछ महीनों तक वे अपनी न्यूनतम जरूरतें पूरी कर सके |

हालाँकि ये मान लेना गलत होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें इस बारे में उदासीन  हैं | उप्र सरकार गरीब मजदूरों के खाते में नगद रकम जमा करवा रही है | केंद्र की तरफ से भी संकेत हैं कि वह दूसरा डोज  जल्द देने जा रही है | 30 जून तक का अनाज तो पहले ही दिया जा चुका  है | हालाँकि उसके दावों पर भी सवाल उठ रहे हैं | लेकिन जिस तत्परता से शुरुवाती कदम उठाये गये वे निश्चित रूप से कारगर हुए वरना अब तक पूरे देश में गरीब जनता सड़कों पर नजर आ जाती | प्रवासी मजदूरों को उनके गाँव तक पहुँचाने के बाद उनकी जरूरतें पूरी करने का इन्तजाम भी किये जाने की व्यवस्था हो रही है।

 लेकिन ये भी सही है कि सरकार उन्हें लम्बे समय तक बिठाकर नहीं खिला सकेगी क्योंकि इससे उत्पादन करने वाली इकाइयों का काम रुक जाएगा | माना जा  रहा है कि लॉक डाउन की यातना भोगकर घर लौटा श्रमिक जल्दी तो लौटने वाला नहीं है और इस दौरान उसे मानसिक सम्बल देने के लिए भूख शांत करने का इन्तजाम तो करना ही पड़ेगा | 

इसके अलावा जिन गरीबों के पास काम नहीं है उनकी न्यूनतम जरूरतें पूरी करने हेतु उन्हें पर्याप्त नगदी बैंक खाते के जरिये दी जाना भी फिलहाल तो जरूरी है | दो दिन पहले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन से इस बारे में चर्चा की तो श्री राजन ने बताया कि भारत सरकार 65 हजार करोड़ खर्च कर दे तो कोरोना संकट में गरीबों को दयनीय हालात से उबारा जा सकता है |  लेकिन उनने भी ये बात मानी कि लम्बे समय तक बिना काम किये सरकार उनके भरण पोषण की व्यवस्था नहीं कर सकेगी |

श्री गांधी और श्री राजन ने गरीबों की बात तो की जो सर्वथा उचित है किन्तु निजी क्षेत्र में भी तो मध्यमवर्गीय लोगों का रोजगार जा रहा है | वेतन - भत्ते में कटौती तो होने भी लगी है | सरकारी फरमानों के बावजूद भी निजी क्षेत्र अपने कर्मचारियों की नौकरी बचाने एवं लॉक डाउन के दौरान भी पूरा वेतन देने में असमर्थ है जिसे  पूरी तरह अनुचित भी नहीं कहा जाएगा | 

प्रश्न ये है कि सरकार ऐसे लोगों के लिए क्या करेगी ? और जो निजी संस्थान पूरी तरह से शासकीय आदेशों का पालन करेंगे क्या उन्हें उसके बदले टैक्स में किसी भी प्रकार की छूट मिलेगी ? सवाल तो बड़े उद्योगपतियों  के भी हैं | छोटे कारोबारी भी पूरी तरह से सड़क पर आ गये हैं जिनकी  मदद की जानी चाहिए | लेकिन ये सब कर पाना सरकार के बस में नहीं क्योंकि उसका अपना खजाना भी तेजी से खाली हो रहा है जबकि आवक नहीं के बराबर रह गयी है |

ऐसी स्थिति में अब तदर्थवाद से बचते हुए सबके विकास की और कदम बढ़ाना चाहिए | आखिर गरीबी रेखा से भी नीचे का कलंक कब तक देश के माथे पर रहेगा ? 1971 में इंदिरा  जी ने गरीबी हटाओ का नारा देकर ऐतिहासिक चुनावी सफलता हासिल की थी | तब से अब तक 50 साल होने आये किन्तु गरीबी हटना तो दूर करोड़ों लोग उससे भी नीचे चले गए |

कोरोना के बाद भारत के लिए लम्बी छलांग लगाने का जो अवसर मिला है उसमें गरीबी नाम के धब्बे को धो डालने पर पूरा जोर देना होगा | आर्थिक विषमता तो रहेगी लेकिन सरकार करोड़ों लोगों को बिना कुछ किये घर बिठाकर खाने के लिए राशन और नगद राशि देती रहे तो गरीबी कभी खत्म नहीं होगी | एक अर्थशास्त्री का ये कहना सत्य है कि भारत में जनसंख्या समस्या नहीं उसका उपयोग न कर पाना  समस्या है | चीन वह करने में कामयाब हो गया इसलिए विकसित देश बन बैठा | भारत तो एक अजीबोगरीब विरोधाभास का शिकार है | काम के लिए लोग मिल नहीं रहे और बेरोजगारी के आंकड़े बीते चार दशक में सबसे उपर आ गये |

अच्छा होगा सरकार कोरोना से निपटते ही देश भर में इन्फ्रा स्ट्रक्चर के लम्बित कार्यों को युद्धस्तर पर शुरू करवाए | इससे देश में उद्योगों को सहारा मिलेगा तथा मजदूरों को जहां वे रहते हैं उसी के आसपास काम भी मिलेगा | इसके साथ ही हमें धीरे - धीरे सब्सिडी संस्कृति से बाहर आना होगा | वृद्द्ध , निराश्रित , दिव्यांग या  अन्य किसी लाचारी वश कार्य करने में असमर्थ व्यक्ति की मदद तो जायज है लेकिन मुफ्तखोरी की आदत के कारण बैठकर खाने के आदी हो चुके प्रत्येक व्यक्ति के लिए काम अनिवार्य किया जावे | यदि उसे कोई काम मिलता है लेकिन वह उसे नहीं करना चाहता तो उसे ये बताना होगा कि उसका कारण क्या है ?

 समय आ गया है जब भारत को चुनावी  जीत हार की चिंता छोड़कर हर हाथ से काम लेने की नीति अपनानी चाहिए | बेरोजगारी और गरीबी एक मानसिकता है | इसे दूर करने के लिए ठोस और कुछ हद तक अप्रिय लगने वाले कदम उठाने होंगे |

वरना भले ही कितने भी 65 हजार और बंट जाएं लेकिन गरीबी का कलंक इस देश के माथे से नहीं हटेगा |

सुनने में भले कड़वा लगे लेकिन जिस व्यक्ति में परिश्रम करने की प्रवृत्ति है वह भूखा नहीं रह सकता।

कोरोना: डर से ज्यादा सतर्कता और सावधानी जरूरी



लॉक डाउन की अवधि में दो सप्ताह की वृद्धि के साथ रेड , ऑरेंज और ग्रीन ज़ोन का वर्गीकरण भी कर  दिया गया ।  राज्य  सरकारों को ये छूट दे दी गई कि वे केंद्र द्वारा दी गई  गाइड लाइन में चाहें तो और सख्ती बरत सकती है  लेकिन  रियायत नहीं कर सकेंगी।  विभिन  स्थानों  से प्रवासी मजदूरों , छात्रों तथा बाहर फंसे अन्य लोगों को उनके गृह राज्य तक पहुँचाने के लिये विशेष रेलगाड़ियों का परिचालन भी शुरू हो गया है।  हालाँकि ये बहुत बड़ा प्रकल्प है।  एक ट्रेन में अधिकतर 1200 लोगों को ही बिठाया जा सकेगा।  फिर भी इससे काफी दबाव कम होगा तथा घर से दूर पड़े लोगों के मन में छाया असंतोष और असुरक्षा का भाव भी कम होगा।  रेड जोन के अंतर्गत आये इलाकों में भी व्यापारिक , औद्योगिक , कार्यालयीन और परिवहन  गतिविधियां शुरू करने की अनुमति  दी जा रही है। ऑरेंज ज़ोन में कुछ ज्यादा और ग्रीन जोन में जनजीवन को पूरी तरह सामान्य करने का फैसला लिया गया है।  हालांकि सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क तथा सैनिटाईजर का उपयोग अब बतौर जीवन शैली हमारे साथ जुड़ा रहेगा ।  सही बात तो ये है कि कोरोना ने पूरी दुनिया को एक नई दिशा दे दी है।  जिसमें जीवन रक्षा के प्रति अतिरिक्त  सतर्कता के साथ शारीरिक दूरी बनाये रखने पर जोर देना अनिवार्य होगा।  इस कारण आने वाले समय में यात्रा करने के लिए रेल , बस और वायुयान का उपयोग करना अपेक्षाकृत महंगा होगा।  आने  वाले कम से कम एक साल तक दुनिया भर में यात्रा करने वालों की  संख्या में जबरदस्त कमी आयेगी।  इसका असर पर्यटन के साथ ही विश्व व्यापार पर भी पड़ना तय है।   जहां तक  भारत की  बात है तो यहाँ बड़ी आबादी और घनी बसाहट के कारण शारीरिक दूरी जैसी सावधानी का पालन करना बड़ी समस्या रहेगी।  मास्क तो एक बार लोग लगा भी लेंगे लेकिन सैनिटाईजर का उपयोग और बार - बार हाथ धोने का अभ्यास सभी के बस में नहीं होगा।  इसीलिये  लॉक डाउन में दी जा रही रियायत को प्रयोगात्मक ही मानना चाहिए क्योंकि देश में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या में रोजाना वृद्धि होने से जिस श्रृंखला को तोड़ने  के लिए लॉक डाउन किया गया वह अभी ही बनी हुई है ।  हालाँकि उसका प्रभावक्षेत्र सीमित हुआ है।  लेकिन प्रवासी मजदूरों की घर वापिसी के बाद अगले दो हफ्ते काफी महत्वपूर्ण रहेंगे।  हजारों लोगों के  एक साथ सफर करने से संक्रमण का खतरा बना रहेगा। महाराष्ट्र , गुजरात और तमिलनाडु  में कोरोना का संक्रमण तेज गति से बढ़ता जा रहा है।  चिकित्सा विशेषज्ञों की नजर उप्र और बिहार पर भी लगी है जहाँ लाखों प्रवासी श्रमिक अगले कुछ दिनों में लौट आएंगे।  उनको अलग रखते हुए उनकी जाँच बड़ी समस्या होगी।  वैसे देश के बड़े हिस्से में सामान्य स्थिति  बहाल  होने की खबरों से लोगों का मनोबल बढ़ेगा किन्तु आगे भी सावधानी बनी रहे इसके लिए वातावरण बनाते रहना  चाहिए।   वैसे एक बात तो हो गई कि लोग कोरोना से पहले जितने आतंकित नहीं हैं।  भारत में अपेक्षाकृत कम मौतों ने भी जनता के मन में समाये भय को निकाल फेंका है।  लोग ये समझ गये हैं कि कोरोना के संक्रमण से बचना बहुत मुश्किल नहीं है और संक्रमित होने वाला जीवित नहीं बचेगा ये आशंका भी गलत है।  भारत का मौसम और यहाँ की लोगों के रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कोरोना की गम्भीरता को घटाने  वाला  माना जा रहा है।  यद्यपि  इसे लेकर मत भिन्नता है।  लेकिन जैसी आशंका थी उसके अनुसार भारत में  कोरोना तीसरी पायदान अर्थात सामुदायिक संक्रमण तक नहीं पहुंचा तो ये भी शोध का विषय है।  3 मई से आगामी 14 दिनों के लिए बढाये  गये लॉक डाउन में राज्यों के स्तर पर भले ही छूट  दी जा रही  हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जब तक रेल , सड़क और हवाई यातायात पूर्ववत शुरू नहीं होता तब तक स्थिति सामान्य नहीं हो सकेगी।  इस गर्मी में होने वाली शादियों में से अधिकाँश रद्द हो गयी हैं।  शैक्षणिक संस्थान कब तक खुलेंगे ये निश्चित नहीं है।  जून आते तक देश में मानसून दस्तक देने लगेगा।  पर्यावरण की स्थिति में आये आश्चर्यजनक सुधार के कारण  हो सकता है इस साल मानसून समय से पहले आ जाए और बारिश  भी ज्यादा हो।  वह मौसम वैसे भी संक्रामक बीमारियाँ फैलने का होता है।  इसलिए आगामी महीने  भी सतर्कता और सावधानी के रहेंगे ।  खबर आ रही है कि शालाएं   खुलने पर बच्चों को मास्क लगाना अनिवार्य किया जाएगा।   वे इसके बारे में कितने गम्भीर रहेंगे ये कहना कठिन है।   इसलिए ये  मान लेना कि  ग्रीन या औरेंज जोन वाले कोरोना संकट से बाहर आ  गये , गलत होगा।  पूरी दुनिया में ये माना जा रहा है कि उससे पूरी तरह मुक्ति मिलने में साल - दो साल लग सकते हैं।  भारत में तो भीड़ वैसे भी एक संस्कृति है।  हमारे सामाजिक , धार्मिक और राजनीतिक आयोजन भीड़ के बिना अधूरे माने जाते हैं।  कुछ लोग पारिवारिक आयोजनों में भी ज्यादा लोगों को बुलाना शान समझते हैं।  उस दृष्टि से कोरोना को लेकर किसी भी तरह का अति आत्मविश्वास घातक हो सकता है।  कोरोना से डरना उतना जरुरी नहीं जितनी  सतर्कता जरूरी है।  जनजीवन सामान्य होने पर तो अतिरिक्त एहतियात की जरूरत होगी।  वरना लॉक डाउन को और बढ़ाने के सिवाय दूसरा चारा नहीं बचेगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 May 2020

गांव रूपी रीढ़ को मजबूत करने का सुनहरा मौका



गत दिवस प्रधानमंत्री ने एक उच्च स्तरीय बैठक लेकर कोरोना के बाद की परिस्थितियों में भारत के औद्योगिक विकास की रणनीति पर विचार किया। जो बातें सामने आई हैं उनसे लगता है सरकार चीन से कारोबार समेटने वाली औद्योगिक इकाइयों को ठीक उसी तरह भारत में स्थापित होने के लिए आकर्षित करने के लिए प्रयत्नशील है जैसा चीन ने अतीत में किया था। त्वरित निर्णय ऐसे मामलों में कारगर होता है। जमीन का आवंटन , शासकीय विभागों से जरुरी स्वीकृतियां, कम से कम औपचारिकताएं और सबसे बड़ी बात नौकरशाही की अड़ंगेबाजी से मुक्ति जैसे मुद्दों पर यदि सरकार बारीकी से ध्यान दे दे तो नये उद्योग लगाने के लिये विदेशी कंपनियों के साथ ही भारत के उद्यमी भी उत्साह दिखा सकते हैं। लॉक डाउन के कारण महानगरों से लाखों श्रमिक अपने गांव वापिस चले गये या जाने को तैयार बैठे हैं। कहा जा रहा है वे लम्बे समय तक वापिस नहीं लौटेंगे। उनमें से कुछ बढ़ती आयु के कारण हो सकता है गांव या निकटवर्ती क्षेत्र में रोजगार तलाशकर जीवनयापन करने लगें। ऐसे में अब सरकार को ये सोचना चाहिए कि वह विदेशी निवेश को तो आमंत्रित करे ही लेकिन ऐसे उद्योगों को प्रोत्साहित भी करे जो कम लागत से शुरू हो सकें और जिनमें अकुशल श्रमिक भी कार्य करें। इसका लाभ ये भी होगा कि फसल बोने और काटने के समय ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिकों की जो कमी होने लगी है वह भी दूर की जा सकेगी। अर्थशास्त्र की आधुनिक सोच में जो कुछ भी हो लेकिन भारत की आर्थिक प्रगति गांव की उपेक्षा करते हुए कर पाना असम्भव है। यदि बीते सात दशक के प्रयोगात्मक रवैये से मिले सबक ध्यान में रखकर गलतियां सुधारने पर जोर दिया जावे तो आने वाले कुछ सालों में ग्रामीण क्षेत्र नए भारत का शक्ति केंद्र बन सकता है। एक बात तो साफ है कि शहरी उद्योग भी बिना श्रमिकों के नहीं चल सकते। जिस तरह उत्पादन के लिये बाकी चीजें जरूरी होती हैं ठीक वैसे ही श्रम की जरूरत भी पड़ती है । जो मशीनी युग में भी बनी हुई है और आगे भी रहेगी। इसे देखते हुए प्रधानमंत्री और उनकी टीम को ये देखना होगा कि जिन राज्यों के श्रमिकों का महानगरों से पलायन हुआ है उन्हीं में नये रोजगार लगाने की पहल की जाए। इससे महानगरों की आवासीय समस्या भी हल हो सकेगी तथा विकास का विकेंद्रीकरण होने से असंतुलन की स्थिति भी खत्म की जा सकेगी। ग्रामीण भारत से श्रम शक्ति का शहरों में जाना नई बात नहीं है। लेकिन पहले व्यक्ति अकेला जाता और परिवार गाँव में रखता था। खेती की जरूरत के समय वह अपने गाँव चला आता था। और तो और वह ज्यादा दूर जाने से हिचकता था। धीरे-धीरे उसकी पहुंच लम्बी हुई। आवागमन और संचार सुविधाओं के विकास ने भी उसमें योगदान दिया। दूरी के कारण गांव आना कम हुआ तो वह अपने परिवार को भी साथ ले गया और इस तरह गांव से उसका संबंध घटता चला गया। शहरी चकाचौंध ने उस पर जो सम्मोहन किया उसके कारण वह नारकीय हालातों में भी वहीं बसर करने लगा। लेकिन लॉक डाउन ने उस चकाचौंध के पार का अन्धेरा दिखा दिया। उसके पास गांव लौटने की मजबूरी आ गयी लेकिन आवागमन के आधुनिक संसाधनों के बावजूद गांव की दूरी उसकी कल्पना से भी ज्यादा हो गई। हजारों श्रमिक किस तरह अपने गांव लौटे ये बताने की कोई जरूरत नहीं है। और इसी वजह से अब ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या वे दोबारा उन्हीं शहरों को लौटेंगे जिन्होंने मुसीबत के समय उनको बेसहारा छोड़ दिया। सही कहें तो ये बहुत ही सही अवसर है ग्रामीण भारत को भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार बनाने का। कोरोना के बाद पूरी दुनिया एक नए युग में प्रवेश करने जा रही है। ये मजबूरी भी है और जरुरी भी क्योंकि विकास की जो इमारत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद खड़ी हुई वह खजूर का पेड़ साबित होकर रह गयी जिससे पथिक को छाया भीं नहीं मिलती और फल भी पहुंच से बहुत बाहर हैं। पश्चिमी समाज की प्राथमिकताएं चूंकि भारत से सर्वथा अलग हैं इसलिए उनका अन्धानुकरण हमें महंगा पड़ गया। कोरोना ने विकास को शहरों तक सीमित रखे जाने की गलती का एहसास करवा दिया है। ऐसे में बुद्धिमत्ता यही होगी कि उसे दोहराने से बचा जाए। देश के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को ग्राम केन्द्रित बनाना ही समय की मांग है। कृषि और उद्योगों की नजदीकी से हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जो मजबूती मिलेगी वह भविष्य में किसी भी आपातकाल के समय पैदा होने वाली परेशानियों से निपटने में मददगार होगी और आबादी के पलायन जैसी समस्या से हम बचे रहेंगे। भारत की अधिकतर आबादी आज भी ग्रामीण इलाकों में बसती है। अटलबिहारी वाजपेयी ने ग्रामीण सड़क योजना बनाकर जो क्रांति की उसकी वजह से अब गांव तक आना जाना सुलभ हो गया है। मोदी सरकार ने बिजली पहुंचा दी। अब अगर वहां आर्थिक गतिविधियां बढ़ा दी जाएं तो जिस न्यू इण्डिया की बात प्रधानमंत्री सोच रहे हैं वह सही साबित हो सकती है। आज तक ' चलो गांव की ओर 'के नारे तो खूब लगे लेकिन जमीनी सच्चाई इसके ठीक उलट है। समय आ गया है जब पूरा फोकस महानगरों की बजाय भारत की रीढ़ को मजबूत करने पर केन्द्रित हो। महानगरों से हुए पलायन को केवल एक तात्कालिक घटना मानकर भुला देने की बजाय उसके गर्भ में छिपे भविष्य के संकेतों को भी समझना होगा। 
किसी शायर की ये पंक्तियां आज के माहौल में सहसा प्रासंगिक हो उठीं :-
अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूँ ,
अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूँ।

- रवीन्द्र  वाजपेयी