Thursday, 14 May 2020

श्रम और संसाधनों के समन्वय से ही दूर होगा संकट




गत रात्रि एक टीवी चैनल पर 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज पर चर्चा में कांग्रेस और भाजपा के प्रतिनिधियों के बीच बहस के दौरान मौजूद औद्योगिक संगठन के एक प्रतिनिधि से एंकर ने पूछा कि इस बारे में राजनेताओं की प्रतिक्रिया पर आपके क्या विचार हैं तो वे हंसते हुए बोले कि किसी भी मुद्दे पर राजनीतिक लोगों की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर होती है कि वे कि सत्ता में हैं या विपक्ष में। उनका आशय कांग्रेस प्रतिनिधि द्वारा पैकेज की तीखी आलोचना से था। बात कुछ हद तक सही भी है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार को सुझाव दिया था कि गरीबों के खाते में 7500 रु. जमा करवा दें जिससे उनकी क्रय क्षमता बढ़े और बाजार में मांग पैदा हो सके। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने उन्हें सलाह दी थी कि 65 हजार करोड़ रु. गरीबों को दिलवा दिये जाएं तो अर्थव्यवस्था सुधर जायेगी। गत दिवस वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पैकेज में लिए गये फैसलों की पहली किश्त के बारे में बताया, जिसमें मुख्य रूप से एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी की इकाइयां) को सहारा देकर आर्थिक सुस्ती दूर करने पर जोर दिया गया। बजाय नगद राशि रूपी अनुदान देने के उन्हें बिना गारंटी कर्ज मिलने के अलावा इस श्रेणी में निवेश और टर्न ओवर की सीमा को भी कई गुना बढ़ा दिया गया जिससे वे अपना कारोबार बढ़ाने के बावजूद भी इससे मिलने वाले लाभों से वंचित न हों। इनके अलावा वित्तमंत्री ने कुछ और छूटों और प्रावधानों की जानकारी भी दी जिनसे बिल्डर, बिजली कंपनियां और कर्मचारी वर्ग को लाभ होगा। टीडीएस की कटौती में 25 फीसदी की कमी से बाजार में नगदी का प्रवाह बढ़ेगा वहीं भविष्य निधि संबंधी फैसलों से कर्मचारी और नियोक्ता दोनों कुछ राहत तो महसूस करेंगे ही। 200 करोड़ तक के सरकारी टेंडर में एमएसएमई को भी भाग लेने के सुविधा उनकी सेहत सुधारने में जहाँ सहायक होगी वहीं सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा  45 दिन में इन इकाइयों के लम्बित भुगतान करने का फैसला भी उनके व्यवसाय को चलायमान रखने में सहायक बनेगा। बिजली कम्पनियों के बिलों का भुगतान करने हेतु 90 हजार करोड़ का आवंटन देश में बिजली आपूर्ति बनाये रखने में मददगार होगा। कुल मिलाकर गत दिवस जो घोषणाएं हुईं उनसे आम जनता की जेब में सीधे पैसे डालने की कांग्रेस की मांग भले पूरी नहीं हुई किन्तु इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह तेज होगा। सबसे बड़ी संभावना सूक्ष्म , लघु , मध्यम इकाइयों में काम शुरू होते ही रोजगार का सृजन होने की है जो आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अब चूँकि इन इकाइयों को इसी दायरे में रहते हुए अपना आकार बढ़ाने का अवसर मिल गया है इसलिए देश में निजी क्षेत्र के सबसे ज्यादा रोजगार प्रदाता की क्षमता में विस्तार का सीधा लाभ बेरोजगारी दूर करने में मिलेगा। नतीजे आने में हालांकि थोड़ा  वक्त लग सकता है लेकिन लोगों की जेब में बिना काम किये नगद राशि डालने का सुझाव अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ाएगा क्योंकि बिना उत्पादकता बढ़ाये मौजूदा स्थिति को सुधारना असंभव है और उसके लिये उपलब्ध श्रम शक्ति का अधिकाधिक उपयोग ही बेहतर तरीका है। हाल ही में शराब दुकानें खुलने पर अनेक गरीब लोगों ने सरकार से मिला सस्ता और मुफ्त अनाज बेचकर शराबखोरी की। ये बात राहुल गांधी नहीं जानते ऐसा नहीं है किन्तु इसके बाद भी वे 7500 रु. खाते में डालकर अर्थव्यवस्था सुधारने का जो सपना देख रहे हैं वह चार दिन की चांदनी जैसा होगा। उस लिहाज से कारोबार बढ़ाना ही बेहतर विकल्प है। यदि गरीब मेहनत करके कमाता है तब वह उत्पादन और मांग दोनों में वृद्धि का हिस्सा बनता है जबकि बिना कुछ किये उसे मिलने वाले पैसे से बाजार में थोड़े समय ही रौनक रह सकती है। ये देखते हुए गत दिवस हुईं घोषणाएं यदि जमीन पर सही तरीके से उतर सकीं तो आने वाले कुछ महीनों में ही अर्थव्यवस्था गति पकड़ लगी। अभी वित्तमंत्री के पिटारे से कृषि, बड़े उद्योग और मध्यम वर्ग के लिए क्या-क्या निकलता है उसे देखने के बाद इस पैकेज की सही समीक्षा हो सकेगी। अभी तक जो सामने आया है उससे लगता है सरकार मुफ्त का चन्दन घिसवाने से बचते हुए श्रम और संसाधन के समन्वय से अर्थव्यवस्था को ठोस आधार देना चाह रही है जो सही कदम है। लेकिन हमेशा की तरह देखने वाली बात ये होगी कि प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री द्वारा की गईं अच्छी-अच्छी घोषणाओं को अमली जामा पहिनाने वाला सरकारी और बैंकों का अमला भी क्या उतना ही संवेदनशील और समर्पित है? पुराने अनुभव बताते हैं कि सत्ता के शीर्ष स्तर पर होने वाले जनहितकारी फैसले निचले स्तर पर आते-आते अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं जिसके कारण उनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। इस पैकेज के साथ ऐसा न हो इसकी भी चिंता साथ-साथ कर लेनी चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 13 May 2020

पैकेज : ग्लोबल की जगह लोकल क्रांतिकारी साबित होगा




प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी राष्ट्र के नाम संदेश देते हैं तब पूरे देश में एक आशंका सी तैर जाती है। नोट बंदी के बाद लॉक डाउन की घोषणा भी उन्होंने देश से बात करते हुए ही की। इसीलिये गत दिवस दिन के समय जब ये पता चला कि रात 8 बजे वे देश के नाम सन्देश देंगे तो सोशल मीडिया पर तरह-तरह के कटाक्ष होने लगे। तीन मई को जब डाउन बढ़ाया गया तब उसकी घोषणा करने श्री मोदी टीवी पर नहीं आये थे। उस पर उनके विरोधियों ने ये तंज कसा कि वे देश से मुंह छिपाते फिर रहे हैं। लेकिन गत दिवस उनके टीवी पर आने की खबर आई तब कुछ लोगों ने ये तक कहा कि जब मुख्यमंत्रियों से 15 मई तक लॉक डाउन संबंधी सुझाव मांगे गये हैं तब इतनी जल्दी क्या पड़ी है ऐलान करने की। और भी टिप्पणियाँ आईं किन्तु रात प्रधानमंत्री देश से मुखातिब हुए और अपनी बात रखना शुरू किया तब सभी आशंकाएं दरकिनार हो गईं। उद्योग-व्यापार जगत के अलावा विपक्ष भी लगातार मांग करता आ रहा था कि सरकार आर्थिक पैकेज की घोषणा करे। सोनिया गांधी ने इस आशय के पत्र लिखे और राहुल गांधी अमेरिका में बैठे भारतीय मूल के आर्थिक विशेषज्ञों से पूछ - पूछ्कर सरकार को सलाहें भेजते रहे। रघुराम राजन ने गरीबों में 65 हजार करोड़ बांट देने का सुझाव श्री गांधी को दिया जिससे उनकी क्रय शक्ति बढ़ सके और बाजार में मांग बढ़े। इस पर उन्होंने हर गरीब के खाते में 7500 रु. जमा करवाने की मांग भी सरकार से की। दूसरी तरफ उद्योग व्यापार जगत बेसब्री से सरकार द्वारा दी जाने वाली राहत का इन्तजार कर रहा था। विशेष रूप से छोटे व्यापारी और एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी उद्योग) को ये भय सता रहा है कि लॉक डाउन खुलने के बाद वे अपना कारोबार दोबारा कैसे शुरू करेंगे ? पूंजी का अभाव, बैंकों का दबाव और बाजार में कमजोर मांग के कारण व्यवसाय को दोबारा गतिशील बनाना बेहद कठिन होगा। रोज कमाने रोज खाने वाला कारोबारी तो बीते लगभग 50 दिनों में तबाही के कगार पर जा पहुंचा है। दिक्कत तो निजी क्षेत्र के उस नौकरपेशा मध्यमवर्ग के सामने भी आई जिसकी नौकरी या तो चली गई या फिर वेतन में कमी हो गयी। ऐसे में हर वर्ग सरकार से अपेक्षा कर रहा था कि वह उसके लिए कुछ करे। प्रधानमंत्री ने अपने आधा घंटे के भाषण में शुरुवाती समय में पूरी तरह से आत्मनिर्भरता पर बल दिया और बिना नाम लिए स्वदेशी का संदेश देते हुए ग्लोबल की बजाय लोकल को प्राथमिकता देने का आह्वान कते हुए बहुत बड़ा नीतिगत वक्तव्य दे डाला। उन्होंने जनता को ये बतलाने में तनिक भी संकोच नहीं किया कि जो आज ग्लोबल ब्रांड हैं वे भी कभी लोकल हुआ करते थे। श्री मोदी ने इस तरह से चीन को एक तरह से संदेश भेज दिया। और फिर 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की जो घोषण की वह चौंका देने वाली थी क्योंकि अभी तक सरकार और रिजर्व बैंक ने मिलकर जितनी भी राहत का ऐलान किया वे ऊँट की मुंह में जीरा मानकर मजाक का पात्र बन गईं। उद्योग और व्यापार जगत के प्रतिनिधि सरकार के साथ बैठकें करते हुए अपनी अपेक्षाएं बता चुके थे। लेकिन उन्हें भी लगता था कि पहले घोषित पैकेज की तरह ही झुनझुना पकड़ा दिया जावेगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने जब अपने उद्बोधन के उत्तरार्ध में 20 लाख करोड़ के पैकेज की बात की तो पूरे देश में उत्साह पैदा हो गया। हालांकि इसमें पहले घोषित पैकेज भी शामिल होने से लगभग 13 लाख 50 हजार करोड़ रु. अतिरिक्त मिलेंगे किन्तु श्री मोदी ने जिस तरह से सभी वर्गों का जिक्र किया उससे ये लगा कि पैकेज केवल बड़े लोगों तक सीमित नहीं रहेगा और उसमें किसान, मजदूर, मध्यमवर्ग, छोटे तथा मध्यम कारोबारी, एमएसएमई, और बड़े उद्योग सहित सभी को कुछ न कुछ न कुछ  देने का प्रावधान होगा। प्रधानमंत्री ने पैकेज की विस्तृत जानकारी देने के लिए वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमन को दायित्व सौंप दिया। अब सबकी नजर उन पर टिकी रहेगी। प्रधानमंत्री ने विदेशी ब्रांड के पीछे भागने की बजाय भारतीय उत्पादों को महत्व दिये जाने की जो बात कही उससे भारत में बनने वाले सामान के समक्ष मांग का संकट नहीं आयेगा। सबसे बड़ी बात ये होगी कि चीन में बने माल से तबाह हुआ घरेलू उद्योग पुनर्जीवित हो जाएगा। श्री मोदी ने खादी के ब्रांड बनने का जिक्र करते हुए आत्मनिर्भरता, आत्मबल और आत्मविश्वास का समन्वय बनाने की बात कही और कुटीर तथा घरेलू उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने पर बल दिया। साथ ही उन्होंने कुछ सुधार किये जाने पर भी जोर दिया। उनकी सरकार पर ये आरोप लग रहे थे कि दुनिया के तमाम देशों ने कोरोना संकट के समय आर्थिक गतिविधियों को बल देने के लिए अर्थव्यवस्था का 10 प्रतिशत तक बतौर राहत पैकेज दिया है। लेकिन भारत सरकार ने उसकी तुलना में बहुत ही मामूली राहत दी। लेकिन अर्थव्यवस्था का 10 फीसदी पैकेज देकर प्रधानमंत्री ने आलोचकों को फिलहाल तो ठंडा कर दिया। लेकिन वित्तमंत्री इस राशि का बंटवारा विभिन्न क्षेत्रों में किस तरह करती हैं ये आज शाम 4 बजे से पता लगना शुरू होगा। हालाँकि इस राशि का इंतजाम और राहत के लाभार्थी तक पहुंचने का समय और तरीका अभी तक स्पष्ट नहीं है। लेकिन 18 तारीख के बाद भी अलग रंगरूप वाले लॉक डाउन के स्पष्ट संकेत के साथ अर्थव्यस्था को दोबारा खड़ा करने में ये पैकेज प्राणवायु का काम करेगा ये उम्मीद कारोबारी जगत तो जता ही चुका है और आज सुबह शेयर बाजार ने भी अपनी खुशी जाहिर कर दी। यद्यपि अभी भी लोगों को आशंका है कि नौकरशाही का असहयोगात्मक रवैया इस खुशी को हवा में उड़ा देगा। ऐसे में सरकार को ये देखना होगा कि उसके द्वारा दिया गया पैसा सही हाथ में न सिर्फ  पहुंचे ही बल्कि पूरा हिस्सा उसे मिल सके। कोरोना के साथ जीने की बात दोहराकर श्री मोदी ने ये भी आगाह कर दिया कि मास्क, सैनिटाइजर, सोशल डिस्टेंसिंग और लॉक डाउन हमारी जिन्दगी से लम्बे समय तक जुड़े रहने वाले हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 May 2020

सारा दारोमदार आगामी 15 दिनों के नतीजों पर



अब ये तय हो गया है कि लॉक डाउन में शिथिलता आयेगी। विभिन्न राज्य रेड जोन में भी आर्थिक गतिविधियाँ शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। महाराष्ट्र के बाद कोरोना से सबसे ज्यादा पीड़ित गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने तो लॉक डाउन रखे जाने का ही विरोध प्रधानमंत्री के समक्ष कर दिया। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को केन्द्रीय हस्तक्षेप रास नहीं आ रहा लेकिन वे लॉक डाउन को जारी रखे जाने का समर्थन करती दिखीं। कांग्रेस के तमाम बड़े नेता लॉक डाउन को लेकर शुरू दिन से सवाल करते आये हैं लेकिन पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने उसे बढ़ाने का फैसला अपने स्तर पर ही कर लिया वहीं कांग्रेस की हिस्सेदारी वाली महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने तो यहाँ तक कह दिया कि लॉक डाउन हटाने का सवाल ही नहीं उठता। तेलंगाना सरकार श्रामिकों को उनके घर पहुँचाने वाली श्रमिक एक्सप्रेस चलाने का भी विरोध कर रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी भय है कि लाखों बिहारी प्रवासी श्रमिकों की लौटने से कहीं राज्य में कोरोना संक्रमण सामुदायिक स्तर पर न फैल जाए। जो पार्टी जहाँ सरकार में है वहां शराब बिकवाकर राजस्व बटोरने में लगी है लेकिन जहां विपक्ष में है वहां उसे शराब दुकानें खोलने पर सख्त ऐतराज है। कुल मिलाकर संघीय ढांचे के अंतर्गत भारत की विभिन्नता सामने आ रही है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि सभी राज्यों की परिस्थितियां अलग- अलग हैं। किसी राज्य के लिए लॉक डाउन में सख्ती बेहद जरूरी है तो कुछ को उसे बनाये रखने के साथ ही थोड़ी रियायतें दिया जाना जरूरी लग रहा है। गुजरात चाह रहा है कि सभी प्रवासी श्रमिक लौट जायें उसके पहले ही उसके यहाँ उद्योगों में काम शुरू हो जाए। मप्र में भी उद्योगों को काम करने कह दिया गया है। लेकिन सभी मुख्यमंत्रियों से सलाह के बाद केंद्र सरकार क्या फैसले लेती है इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगी। प्रधानमंत्री ने उनसे 15 मई तक अपने बचे हुए सुझाव लिखित में भेजने के बात भी कही। विगत दिवस लगभग 5 घंटे तक प्रधानमंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच हुए वीडियो संवाद में एक बात जरुर सभी ने स्वीकार की कि कोरोना का पूरी तरह खात्मा किये बिना भी आर्थिक गतिविधियाँ प्राथमिकता के साथ प्रारम्भ होना ज़रूरी हैं। दूसरी बात जिसका उल्लेख स्वयं नरेन्द्र मोदी ने किया वह है प्रवासी मजदूरों के उनके गाँव तक पहुँचने के बाद कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकना। क्योंकि अब तक गाँव कोरोना से काफी हद तक बचे हुए हैं लेकिन देश के विभिन्न शहरों से भीड़ के रूप में लौटे लाखों मजदूरों को क्या क्वारंटीन किया जा सकेगा ये बड़ा सवाल है। और उससे भी बड़ा ये कि उद्योग-धंधे दोबारा शुरू होने के बाद क्या वे उन्हीं नगरों में काम करने वापिस लौटेंगे जहाँ भूख और बदहाली से पीड़ित होकर वे अकल्पनीय मुसीबातें झेलते हुए जीवित अपने गाँव लौट सके, इस इच्छा के साथ कि मरना है तब क्यों न अपने घरों को लौटकर ही मरें। ये सब देखते हुए आगामी कुछ हफ्ते बेहद तनाव भरे होंगे क्योंकि श्रमिक एक्सप्रेसों के बाद अब नियमित रेल गाड़ियां  सीमित रूटों पर चलाई जा रही हैं जिनके जरिये अपने शहर से बाहर फंसे गैर श्रामिक भी घरों को लौट सकें। विभिन्न कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की जो सुविधा दी है उसे स्थायी बनाकर एक नई प्रबंधन शैली विकसित करने का प्रयोग चल पड़ा है। यदि ये सफल हुआ तब कार्यालयों की शक्ल और संस्कृति ही बदल जायेगी। लेकिन जब तक कोरोना का प्रसार नहीं रुकता तब तक कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। जिन राज्यों में लॉक डाउन जारी है उन्हें भी उसे खोलने के बारे में विचार करना पड़ सकता है। वहीं जो राज्य उसे शिथिल करने जा रहे हैं उन्हें हो सकता है कदम पीछे खींचना पड़ें। पूरे प्रदेश में तो क्या एक शहर के विभिन्न हिस्सों तक में स्थितियां भिन्न हैं। बीते एक सप्ताह में जिस तेजी से कोरोना के नए मरीज सामने आये उसके कारण खतरे की गम्भीरता और बढ़ गयी। लेकिन ये भी उतना ही जरूरी है कि लोगों की जि़न्दगी को सामान्य किया जाए। ऐसे में अगले दो सप्ताह बेहद निर्णायक होंगे। देश के बड़े भाग में उद्योग व्यापार के अलावा परिवहन भी शुरू किया जा रहा है। राजमार्ग अब सूने नहीं रहे क्योंकि उन पर वाहनों की कतारों के साथ ही मनुष्यों की भी भारी भीड़ है। मई खत्म होने तक आबादी का ये आवागमन तकरीबन पूरा हो जाएगा। और तब ग्रामीण इलाकों में कोरोना का संक्रमण फैलने से किस तरह रोका जा सकेगा इस पर भविष्य निर्भर करेगा। फिलहाल तो सब कुछ प्रायोगिक तरीके से ही हो रहा है। लॉक डाउन को लेकर सभी राज्यों के एकमत नहीं होने से केंद्र के सामने भी दुविधा की स्थिति है। आर्थिक गतिविधियों के बीच लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के अंतर्गत शारीरिक दूरी का पालन कैसे होगा ये देखने वाली बात है। यदि 30 मई तक कोरोना की रफ्तार में और तेजी नहीं आई तब तो उस पर नियन्त्रण करने की उम्मीदें बढ़ जायेंगीं अन्यथा लड़ाई का नया तरीका तलाशना पड़ेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 11 May 2020

कोरोना का टीका आने तक खतरा बना रहेगा



जैसे संकेत मिल रहे हैं उसके अनुसार 17 मई के बाद जनजीवन सामान्य बनाने के लिए अनेक निर्णय लिए जा सकते हैं। प्रवासी श्रमिकों को ले जाने वाली श्रमिक एक्सप्रेसों के जरिये तीन लाख से ज्यादा लोगों को उनके गन्तव्य तक पहुँचाने के बाद अब कल से प्रतिदिन तीस वातानुकूलित एक्सप्रेस चलाई जायेंगी। वहीं हवाई परिवहन प्रारम्भ करने के बारे में भी निर्णय लिया जा रहा है। देश भर में ग्रीन और ऑरेंज जोन के अंतर्गत उद्योग-व्यापार शुरू किया जा चुका है। हालाँकि श्रमिकों की कमी की वजह से अभी उनमें गति नहीं आई है लेकिन बाहर से लौट रहे श्रमिक इस कमी को दूर कर सकते हैं। आज प्रधानमन्त्री राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वीडियो कांफे्रंसिंग के जरिये चर्चा करने के बाद आगे की कार्ययोजना तय करेंगे। चूँकि परिवहन सेवा शुरू की जा रही है इसलिए ये उम्मीद है कि सरकार बाजार खोलने के बारे में भी लचीला रुख अपनायेगी। इस बारे में सबसे बड़ी बात ये है कि तीन चरणों के लॉक डाउन के बाद भी कोरोना का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। कल रविवार को 4500 नये संक्रमित निकल आये। बीते एक सप्ताह के अंदर देश भर में 25000 नये मामले मिलने से आंकड़ा एकदम ऊपर चला गया जिसके कारण अब ये आशंका मजबूत होने लगी है कि जून के महीने में कोरोना संक्रमण के चरमोत्कर्ष पर पहुँचने के बाद ही उसमें कमी आयेगी। लेकिन उससे पूरी तरह मुक्ति मिलने की कोई समय सीमा नहीं है। ऐसे में अब हमें उसके साथ सामंजस्य बिठाते हुए जीने की आद्त डालनी होगी। भले ही लम्बे लॉक डाउन के बावजूद कोरोना को पूरी तरह रोका नहीं जा सका लेकिन उसका ये सुपरिणाम तो हुआ ही कि अभी तक वह उस तीसरी पायदान तक नहीं पहुंचा जिसे सामुदायिक फैलाव कहा जाता है। देश में मिले कोरोना के कुल 67 हजार मरीजों में से एक तिहाई यानि 22 हजार तो केवल महाराष्ट्र अकेले के हैं। इसके अलावा गुजरात , दिल्ली और तमिलनाडू में 25 हजार संक्रमित पाए जा चुके हैं। इस प्रकार देश में कोरोना से पीडि़त तकरीबन दो तिहाई मरीज उक्त चार राज्यों में ही हैं। इनके बाद राजस्थान, उप्र और गुजरात में अब तक तकरीबन 11 हजार कोरोना संक्रमित पाए गये हैं। इनको भी जोड़ दें तो कुल 66 हजार में से 55 हजार तो कुल सात राज्यों के हैं। कुल संक्रमित मामलों का लगभग 85 फीसदी देश के इन सात राज्यों में ही रहा। बाकी राज्यों में उस अनुपात में संख्या काफी कम है। इससे साबित होता है कि लॉक डाउन के कारण संक्रमण को कुछ राज्यों तक सीमित रखने में सफलता हासिल हुई। जिन शहरों में कोरोना का असर ज्यादा रहा वहां भी कुछ क्षेत्र विशेष ज्यादा प्रभावित् हुए जिन्हें हॉट स्पॉट मानकर घेराबंदी करने के उपरांत सघन जाँच की गयी। ऐसे में लॉक डाउन नहीं होता तो संक्रमण पूरे शहर में फैलने का खतरा था। इस प्रकार लॉक डाउन की एक उपलब्धि तो उसके फैलाव को कुछ शहरों और उनके भी कुछ क्षेत्रों तक रोकने में मिली कामयाबी है और दूसरे इसके कारण आम जनता को सोशल डिस्टेसिंग के तौर तरीके, मास्क का उपयोग और बिना जरूरत घरों से से बाहर न निकलने जैसी बातें समझाने का अवसर भी मिल गया। हालांकि प्रवासी श्रमिकों के लौटने के बाद संक्रमण का विस्तार होने की आशंका भी है। ये प्रक्रिया लम्बी चलेगी। गाँव पहुचने के 10 से 15 दिनों बाद तक उनको क्वारन्टीन में रखने के बाद ही पता चलेगा कि वे संक्रमण साथ लेकर तो नहीं लौटे? इसी तरह बाजार खुलने के बाद भी ये जरूरी होगा कि शारीरिक दूरी का पालन किया जाता रहे, वरना अब तक की समूची मेहनत मिट्टी में मिल जायेगी। रेलगाडिय़ों के चलने से भी संक्रमण के यहाँ से वहां पहुंचने की सम्भावना बढ़ेगी। लेकिन जैसे कि विभिन्न राज्यों से संकेत आ रहे हैं उनके मुताबिक़ कुछ राज्य तो लॉक डाउन को 30 मई तक बढ़ाये जाने के पक्षधर हैं लेकिन शेष राज्य कुछ शर्तों के साथ कारोबार एवं आवागमन खोलने के समर्थक हैं। प्रवासी मजदूरों के अलावा भी हजारों लोग ऐसे हैं जो बीते डेढ़ महीने से अपने शहर से बाहर फंसे हुए हैं। अभी उन्हें प्रशासन से विशेष अनुमति के साथ ही डाक्टरी जाँच का प्रमाणपत्र भी लेना अनिवार्य था। लेकिन सुना है अब जाँच की शर्त हटा ली जाएगी। मुम्बई तथा दूसरी जगहों पर रहने वाले प्रवासी मजदूरों को श्रमिक एक्सप्रेस में बैठने की पात्रता के लिए जिस डाक्टरी प्रमाण्पत्र की जरूरत थी, उसका धंधा जमकर चला। आरोप है कि दलालों ने डाक्टरों के साथ मिलकर खूब पैसे बटोरे। सुना है अब ये शर्त भी वापिस ले ली गई है। सरकार द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम दर्जे के उद्योगों के लिये घोषित किये जाने वाले राहत पैकेज का भी कारोबारी जगत को बेसबरी से इन्तजार है। जहाँ-जहाँ उद्योग-व्यापार की अनुमति मिल गई है वहां भी उक्त पैकेज की प्रतीक्षा हो रही है। उस दृष्टि से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की आज की चर्चा में काफी कुछ स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। संतोष की बात ये है कि इलाज करा रहे कोरोना मरीजों के ठीक होने का प्रतिशत भी बढ़ रहा है। कुल मिलाकर ये मानकर चलना चाहिए कि लॉक डाउन भले ही खत्म हो जाये लेकिन कोरोना से बचाव के लिए सतर्कता आगे भी जारी रहना होगी क्योंकि अब तो चिकित्सा जगत भी कहने लगा है कि जब तक इसका टीका (वैक्सीन) नहीं बनता तब तक इसे पूरी तरह रोक पाना नामुमकिन है। चीन के वुहान शहर में अभी तक कोरोना के नये मरीज मिल रहे हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 May 2020

प्रवासी : क्योंकि ये वहां के मतदाता नहीं हैं




मप्र और महाराष्ट्र की सीमा के करीब रेल की पटरी पर सोये हुए 16 मजदूरों के मारे जाने से हर कोई दुखी है। वैसे तो ये एक दुर्घटना ही है क्योंकि रेल की पटरियां सोने की जगह भी हो सकती हैं ये बात सहसा गले से नहीं उतरती किन्तु जिस तरह सड़क पर चलता राहगीर थककर उसी के किनारे सुस्ताने लग जाता है ठीक वैसे ही मप्र के शहडोल और उमरिया के ये मजदूर चूँकि रेल की पटरियों पर चलते हुए ही अपने घरों को लौट रहे थे इसलिए उन्हें वहीं नींद लेने का ख्याल आया। रेलों की आवाजाही पूरी तरह से बंद होने के कारण उनके मन में किसी प्रकार का डर भी नहीं था लेकिन वही निडरता जानलेवा साबित हुई और सुबह सवा पांच बजे तेजगति से आती हुई एक मालगाड़ी ने उनके इस सफर का अंत कर दिया। जाँच शुरू हो गयी है। लेकिन उससे निकलेगा कुछ भी नहीं क्योंकि प्रथम दृष्ट्या गलती तो मारे गये मजदूरों की ही मानी जायेगी जो रेल की पटरी पर न सिर्फ चले बल्कि रात्रि विश्राम हेतु उसी पर सो भी गये। सवाल ये है कि देश में जब इतनी अच्छी सड़कों का जाल बिछा हुआ है तब वे रेल पटरियों पर क्यों आये? और इसका जवाब है कि पुलिस सड़क से जाने नहीं देती। वे पहले ऐसे प्रवासी मजदूर नहीं हैं जिन्होंने अपने घर लौटने का ये रास्ता चुना। हजारों-हजार मजदूर ऐसा ही कर रहे हैं। पुलिस भी उन्हें किसी शहर या बस्ती की सीमा पर ही रोक पाती है क्योंकि हर जगह तैनात रहना उसके लिए भी संभव नहीं है। जैसे समाचार आ रहे हैं उनके अनुसार लाखों मजदूर इस समय सड़कों पर हैं। उनके सिर पर गृहस्थी के सामान से ज्यादा बोझ गरीबी और बेबसी का है। उनमें से कुछ तो अपनी मंजिल तक पांच-सात दिन के सफर के बाद पहुँच भी जायेंगे लेकिन कुछ के लिए ये सफर नौ दिन चले अढ़ाई कोस जैसा साबित हो सकता है। लॉक डाउन के बाद बेरोजगार होते ही अपने घरों के लिए चल पड़े अनेक लोग बीच में ही दम तोड़ बैठे। एक दो तो अपने ठिकाने के बेहद करीब जाकर अंतिम सफर पर रवाना हो गये। गत दिवस जो दर्दनाक घटना हुई उसकी चर्चा भी तभी तक रहेगी जब तक दूसरा हादसा नहीं होता। मुआवजे के चैक सरकारें पहुंचा देंगीं और समाचार माध्यम अपनी स्टोरी बनाने के बाद दूसरी किसी ब्रेकिंग न्यूज की तलाश में जुट जायेंगे। लेकिन पटरियों पर चलना बंद नहीं होगा। लाखों की संख्या में प्रवासी श्रमिक सड़कों पर हैं और अब न तो उन्हें पीछे लौटाया जा सकता है और न ही आगे जाने से रोक पाना संभव होगा। सवाल ये है कि जहाँ ये कार्यरत थे क्या वहां इनके भोजन-पानी का इंतजाम नहीं हो सकता था ? और यदि ये चल ही पड़े हैं और शासन-प्रशासन सभी को इसके बारे में जानकारी है तब बीच-बीच में इनको भोजन और पीने का पानी भर दिया जाता रहे तब इनके सुरक्षित घर पहुंचने की सम्भावना बनी रहेगी। देश में लाखों एनजीओ हैं जो बरसों से प्रवासी मजदूरों के जीवन पर शोध कर रहे हैं। इन्हें देश विदेश से अच्छा खासा अनुदान मिलता रहा है। लेकिन एकाध अपवाद छोड़कर किसी ने भी अभी तक इनकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। शहरों में तो राजनीतिक दल सरकारी भोजन बांटकर अपनी संवेदनशीलता का प्रचार करते दिखते हैं लेकिन सुनसान रास्तों पर चले जा रहे इन प्रवासी मजदूरों की खोज-खबर लेने के लिए किसी को फुर्सत नहीं है। जबकि छोटे-छोटे गाँवों तक में भले ही काम धंधा कोई हो न हो लेकिन राजनीति की दो-चार दुकानें जरूर होती हैं। संचार क्रांति के इस दौर में क्या राजनीतिक दल अपने संपर्क सूत्रों को सूचित करते हुए इन श्रमिकों को रुखा-सूखा कुछ देने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। सवाल और भी हैं लेकिन ये प्रवासी चूंकि उन राज्यों के मतदाता नहीं हैं जहाँ ये मजदूरी करते थे इसलिए सियासत के सौदागरों को इनकी परवाह नहीं है वरना अभी तक तो इनको एक केला देते हुए दस-बीस का फोटो मीडिया पर तैरता नजर आता। इन्हें इस दुस्साहस के लिए किस तरह मजबूर किया गया ये भी अध्ययन का विषय है। फिल्मी दुनिया वाले इन प्रवासी मजदूरों की दर्दभरी दास्तानों में अपने लिए पटकथाएं तलाश रहे होंगे। वहीं टीवी धारावाहिक बनाने वालों को भी अपने लिए काफी मसाला मिल जाएगा लेकिन इस ऐतिहासिक पलायन ने ऐसे मुद्दों को देश के सामने लाकर खड़ा कर दिया है जो कोरोना के बाद की सामाजिक, आर्थिक और औद्योगिक संरचना को गहराई तक जाकर प्रभावित करेंगे। सड़कों पर चले जा रहे ये लाखों श्रमिक कब और कैसे अपने घरों तक पहुँच सकेंगे ये कहना कठिन है। उनमें से न जाने कितनों को घर की देहलीज दोबारा छूने का अवसर शायद मिले भी नहीं। लेकिन समय आ गया है जब मजदूरों की ये खानाबदोशी रोकी जाए। हालांकि ये कठिन होगा किन्तु इसके बाद भी यदि उनको काम की तलाश में अपना घर छोड़कर सैकड़ों मील दूर जाना पड़े तो इससे यही साबित होगा कि आर्थिक विकास की समूची परिकल्पना में संवेनशीलता नाम का भाव गायब है।

रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 May 2020

एहसास मर गया हो सारे शहर का जब .....पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर ,किससे कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे




आजाद हिंदुस्तान में ये संभवतः पहला अवसर है जब बिना किसी आन्दोलन के लाखों श्रमिक सड़कों  पर हैं | देश के सभी राजमार्गों पर गठरी में गृहस्थी समेटे  छोटे -  छोटे बच्चों के साथ मजदूरों के झुण्ड नजर आ रहे हैं | जब पुलिस ने उन्हें रोका तो वे रेल की पटरियों पर चलने मजबूर हुए और ऐसे ही हजारों में से  16 अभागे मजदूर गत दिवस  महाराष्ट्र - मप्र की सीमा के पास थककर रेल की पटरी पर ही नींद लेते हुए मालगाड़ी से कटकर मारे गए |

 जिन बड़े शहरों में कुछ कमाने की हसरत लिए वे आये थे , उनकी बेरुखी देखने के बाद पैदल ही अपने गाँव - देस चल पड़े हैं | किसी के पास खाना नहीं  है तो किसी के पास पानी की किल्लत | दवा तो बहुत बड़ी बात है | अधिकतर के जेब भी खाली है | किसी ने दया - धर्म दिखाते हुए कुछ दे दिया तो ठीक , वरना एक ऐसे सफर पर वे चले जा रहे हैं जिसका अंत कब होगा ये उन्हें नहीं पता | पूरी तरह से नाउम्मीद हो चुके इन मजदूरों से पूछने पर यही सुनने मिलता है कि मरना है  तो कम से कम गाँव जाकर अपनों के बीच मरें | ये एक अकल्पनीय स्थिति है | टीवी तथा बाकी माध्यमों से उनकी पीड़ा और लाचारी सब देख रहे हैं | यद्यपि उनके लिए कुछ किया नहीं जा रहा ये कहना तो गलत है लेकिन जो हो रहा है वह इतना कम है कि ऊँट के मुंह में जीरा भी  बड़ा प्रतीत  होता है |

 लॉक डाउन के बाद की परिस्थितियों में न तो उन्हें एक साथ उनके मूल स्थान तक पहुँचाना संभव था और न ही उचित | लेकिन रोजगार छिनने के बाद स्थानीय शासन और प्रशासन के साथ ही स्वयंसेवी संस्थाओं की उनके प्रति जो संवेदनशीलता थी वह भी धीरे  - धीरे ढलान पर आती गयी | पहला चरण तो किसी तरह कट गया लेकिन दूसरा शुरू  होते ही उनका धीरज जवाब देने लगा और तीसरा आते तक वह विस्फोटक स्थिति में आ गया |

 ऐसे में प्रश्न  है कि ये श्रमिक जिस भी नगर या महानगर में कार्यरत थे  , वहां सरकार के अतिरिक्त क्या ऐसे गैर सरकारी संस्थान पूरी तरह से निष्क्रिय या नकारा साबित हुए जो आये दिन अपने सेवा कार्यों का प्रचार करने में आगे - आगे नजर आते थे | इनके अलावा दर्जनों धार्मिक संगठन , मंदिर , सार्वजनिक  ट्रस्ट आदि भी हैं जिनके पास इतने संसाधन तो हैं ही जिनसे प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को दो समय का भोजन दिया जा सकता था | बाकी को छोड़ दें तो मुम्बई जो देश की व्यवसायिक राजधानी होने के साथ ही धनकुबेरों की बस्ती है वहां  भी यदि प्रवासी मजदूर भूख से बेहाल हो गए तो ऐसी सम्पन्नता किस काम की ?

हालांकि उद्योगपतियों ने मुक्तहस्त से सरकार को दान दिया | फ़िल्मी  सितारे भी पीछे नहीं रहे | कुछ ने सीधे दान की बजाय अप्रत्यक्ष रूप से मदद की घोषणा  की | किसी ने भोजन बाँटने की बात कही तो किसी ने बिस्किट , ब्रेड पानी जैसी चीजों की | मास्क और सैनीटाइजर भी  बहुतों ने दिए | लेकिन फिर भी ऐसा क्या हुआ जो प्रवासी मजदूर परेशान होकर पैदल ही निकल पड़े | मंदिरों में करोड़ों का दान एक दिन में देने वाले लक्ष्मीपुत्रों की लंबी कतार मायानगरी में है | एक हफ्ते में 200 - 300 करोड़ की कमाई करने वाली फ़िल्में बनाने वाले भी यहीं रहते हैं | देश में सबसे ज्यादा आयकर भी यही शहर देता है | इसकी महानगरपालिका का बजट अनेक राज्यों से भी ज्यादा है | ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब सभी स्कूल - कॉलेज बंद हो चुके थे तब क्या इन प्रवासी मजदूरों को वहां रहने की जगह और दो वक्त का भोजन मुम्बई नहीं दे सकती थी ? 

स्मरणीय है इसी शहर में दुनिया के सबसे धनी खेल संगठन बीसीसीआई का मुख्यालय भी है |

हालाँकि ये बात सही है कि मुम्बई में कोरोना का प्रकोप सबसे ज्यादा होने से वहां  का शासन - प्रशासन उसमें भी व्यस्त हो गया , लेकिन इस महानगर की  सम्पन्नता को देखते हुए प्रवासी मजदूरों को बेसहारा छोड़ना मानवीय दृष्टि से बेहद शर्मनाक है | और फिर ये वे मजदूर थे जिनके बिना मुम्बई की  सामान्य ज़िंदगी चल नहीं पाती थी | और कोरोना  संकट टलने के बाद यदि वे वापिस नहीं लौटे तब मुम्बई वालों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा  |

वैसे मुम्बई तो एक उदाहरण है | 
देश के राजधानी दिल्ली में वहां की  सरकार ने 20 से 25 लाख बेरोजगार प्रवासी मजदूरों को  रोजाना भोजन करवाने का आश्वासन दिया था । लेकिन मात्र तीन - चार दिन बाद ही  इस तरह के हालात बना दिए गये जिनसे  भगदड़  मच गई | यही हाल तीसरे सबसे ज्यादा संक्रमित अहमदाबाद का रहा | गुजरात में धार्मिक संस्थाओं और समाजसेवा के लिए कार्यरत ट्रस्टों की बड़ी संख्या है | गरबा के आयोजन में ये शहर करोड़ों रूपये रोज खर्च कर देता है लेकिन जिन श्रमिकों के बल पर यहाँ के कारखाने और व्यवसाय चलते थे  , उनको दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका गया | ये देखते हुए लोगों  की धार्मिकता पर संदेह होने लगता है |

और दक्षिण भारत , जहां धर्म का पालन बड़ी ही श्रद्धा से  किया जाता है तथा जहाँ के कुछ बड़े मन्दिरों के पास अरबों रु. का सोना है , क्या वे प्रवासी श्रमिकों  को मुसीबत के इन दिनों में सहारा नहीं दे सकते थे  ?

उक्त सभी उल्लेख सांकेतिक हैं | वैष्णो देवी मंदिर , अमृतसर का स्वर्ण  मन्दिर , दिल्ली और गांधीनगर का स्वामी नारायण मंदिर , शिर्डी का साईं बाबा मंदिर , मुंबई के सिद्धि विनायक और लालबाग के गणेश जी , तिरुपति देवस्थानम , तिरुवनन्तपुरम का पद्मनाभ मन्दिर आदि के पास अकूत दौलत है | कोरोना राहत हेतु इनके द्वारा  दान भी दिया गया | इनमें से कुछ में तो लाखों लोगों को नित्य निःशुल्क भोजन भी दिया जाता है | लॉक डाउन के बाद यहाँ  आने वालों की संख्या शून्य हो गयी | ऐसे में यदि इनके द्वारा निकटवर्ती इलाकों में भोजन व्यवस्था का जिम्मा लिया जाता तब शायद प्रवासी मजदूरों की ये दुर्दशा न होती |

धार्मिक संस्थानों और मंदिर प्रबंधनों की आलोचना करने का कोई उद्देश्य न होते हुए भी ये कहने को मजबूर होना  ही पड़ता है कि भगवान के नाम पर जमा ऐसी दौलत किस काम  की जो उसके ही  बन्दों  के काम न आये | उक्त बड़े नाम ही क्यों हमारे देश में और भी हजारों मंदिर - मठ और आश्रम हैं | इनके प्रमुख जो  भी साधु -  संत हैं उनके शिष्यों और अनुयायियों में बड़े - बड़े धनकुबेर हैं | इन सभी ने कोरोना  राहत कोष में कुछ न कुछ दिया है ,  और कहीं - कहीं राहत के काम में खुलकर हिस्सेदारी भी की | लेकिन किसी धर्मस्थान  के निर्माण या आध्यात्मिक आयोजन में करोड़ों खर्च करने वाले श्रद्धालुओं ने यदि अपने - अपने स्थान पर दायित्वबोध दिखाया होता तो भूखे प्यासे  मजदूर जिंदा लाश की तरह घिसटते हुए नजर नहीं आते |

भारत में धर्म के नाम पर इन्सान सब कुछ करने को तैयार हो जाता है | साधु , सन्यासियों , महंतों , मठाधीशों का जो  आभामंडल और प्रभाव है उसके कारण एक इशारे पर बड़े से बड़े काम  चुटकी बजाते हो जाया करते हैं | ऐसे में अपेक्षित ये  था कि  आध्यत्मिक विभूतियाँ पीड़ित  मानवता की सेवा के इस महत्वपूर्ण अवसर पर अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करवाते हुए आध्यात्म के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को प्रस्तुत करते हुए पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं से युक्त संस्कारों का परिचय देतीं | अनेक धर्मस्थलों , न्यासों , संतों आदि ने इस बारे में काफी योगदान दिया भी ।

देश के विभाजन के बाद पहली बार ऐसे हालात पैदा हुए  जब लाखों लोग जिनमें औरतें और बच्चे भी हैं, भूखे - प्यासे  बदहवासी   की स्थिति में एक ऐसे सफर पर निकल पड़े हैं जिसका अंत अनिश्चित है |

कहना  गलत नहीं होगा कि इन प्रवासी मजदूरों की  देखभाल और सलामती की जिम्मेदारी  सर्वप्रथम तो उस संस्थान की थी जहाँ ये काम करते थे |  उसके बाद सरकार का नम्बर आता है | लेकिन समाज की अपनी भूमिका भी तो है | यदि इन तीनों में थोड़ा सा भी समन्वय होता तब जो दर्दनाक स्थितियां बनीं , वे टाली जा सकती थीं |

देश पहले भी तरह - तरह  के संकट में फंसा और उन पर विजय भी प्राप्त की | सरकार के साथ समाज ने भी सदैव पूरी क्षमता से उसमें अपनी भमिका का निर्वहन किया | लेकिन ये  संकट अभूतपूर्व और अकल्पनीय होने के साथ ही बड़ा ही चुनौतीपूर्ण है 
 जिसमें एक साथ अनेक मोर्चों पर पूरे देश को लड़ना पड़ रहा है | प्रवासी  मजदूरों को उनके काम वाले स्थान पर रोके रखना कोरोना के फैलाव को थामने  के लिए अत्यावश्यक था | वरना तो शुरू में ही उन सबको रेलगाड़ियों में ठूंसकर उनके गाँवों तक पहुंचा दिया गया होता |

गत दिवस दिल्ली स्थित एम्स के डायरेक्टर ने जून और जुलाई के महीने में कोरोना के चरमोत्कर्ष की जो आशंका व्यक्त की उसके पीछे इन मजदूरों की  वापिसी भी हो सकती है |

प्रवासी मजदूरों के पलायन रूपी इस समस्या ने सत्ताधीशों  की ईमानदारी और प्रशासनिक अमले की क्षमता के साथ ही धर्म और आध्यात्म के नाम पर फैले आस्था के बड़े साम्राज्य के  अलावा  समाजसेवा के  तथाकथित ब्रांड एम्बैसडर्स का असली चेहरा भी उजागर कर दिया है , जो मास्क लगाने के बाद भी  अपनी फोटो खिंचवाने और छपवाने में तनिक भी नहीं झिझक रहे ।

प्रवासी मजदूरों की जगह यदि कोई नेता या साधु - संत सड़कों से गुजरता होता तो उनके काफिले के लिए अनगिनत स्वागत द्वार , चाय - नाश्ता , भोजन - पानी और  विश्राम की शानदार व्यवस्था हो जाती |  लोग फूल - माला लिए खड़े रहते |  यद्यपि कुछ जगहों पर लोगों ने श्रमिकों के लिए जो बन सका किया भी लेकिन उन्हें आगे जाने से नहीं रोका जा सका क्योंकि उनका भरोसा जवाब देने लगा था  |

ताज भोपाली का एक शेर मानों इन हालातों के लिए ही लिखा गया था | जिसमें पहली  पंक्ति मैं अपनी ओर से जोड़ने की गुस्ताखी कर रहा हूँ :-

एहसास मर गया हो   सारे शहर का जब .....

 पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर ,

किससे  कहें कि पाँव के  काँटे निकाल दे |

शिवराज सरकार के फैसले उम्मीद जगाने वाले



मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने गत दिवस औद्योगिक और श्रम कानूनों में संशोधनों का जो ऐलान किया वह समयोचित निर्णय है। कोरोना संकट से चरमरा गये औद्योगिक ढांचे को मजबूती देने के साथ ही यदि प्रदेश में नये उद्योगों को आकर्षित करना है तब हमें व्यवहारिक रवैया ही अपनाना पड़ेगा। इंस्पेक्टर राज से मुक्ति इस दिशा में पहली आवश्यकता है। आश्चर्य की बात है कि स्वयं उद्योगपति होते हुए भी पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस फैसले को बंधुआ मजदूरी बढ़ाने वाला बता दिया। अतीत में जब ऐसे कानून बनाये गये तब श्रमिक आंदोलन अपने शबाब पर हुआ करता था। उस समय के लिहाज से बहुत से कानून अपनी जगह ठीक भी थे लेकिन बदलते वक्त की जरूरतों के अनुसार उनमें सुधार और संशोधन नहीं होने से व्यवस्था में जड़ता आ गई और बजाय श्रमिक का कल्याण करने के वे सरकारी अमले की काली कमाई का जरिया बनते गये। अनेक लोग इससे सहमत नहीं होंगे किन्तु ये बात पूरी तरह सही है कि श्रम कानूनों की वजह से नये रोजगार सृजन होने में रूकावट आने लगी। यहाँ तक कि खुद सरकार ने संविदा और दैनिक वेतनभोगी जैसे श्रेणियां बना डालीं। सरकारी क्षेत्र रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत था। लेकिन श्रम कानूनों की पेचीदगियों से बचने के लिये वहां भी ठेके पर कर्मचारी रखे जाने लगे। लेकिन यही काम निजी क्षेत्र में होने पर श्रम विभाग के इंस्पेक्टर नियोक्ता का जीना दूभर कर देते हैं। किसी भी संस्थान में जहाँ श्रम कानून लागू होते हैं वहां कागजी औपचारिकतायें पूरी करने में ही बेशकीमती समय खर्च हो जाता है। एक तरफ तो मुक्त अर्थव्यवस्था का ढिंढोरा पीटा जाता है जबकि दूसरी तरफ श्रम कानूनों की बेड़ियों से जकड़ने की तरकीब भी निकाली जाती है। शिवराज सिंह इसके पहले किसानों को कृषि उपज मंडी की जंजीरों से आजादी दे चुके हैं। भले ही ये फैसले कोरोना से उत्पन्न परिस्थितियों का परिणाम हों लेकिन इन्हें पूरी तरह प्रगतिशील कहा जाएगा। लायसेंस का नवीनीकरण 10 साल के लिए किये जाने एवं एक दिन में नये कारोबार का पंजीयन जैसे निर्णय कारोबारियों को उत्साहित करने में सहायक होंगे। इंस्पेक्टर की दखलंदाजी से आजादी सबसे बड़ा कदम है। श्रमिकों की संख्या को लेकर लगाई गईं बंदिशें हटाने से ठेकेदार और उद्योगों को अनेक परेशानियों से आजादी मिल जायेगी। लॉक डाउन के कारण दूसरे राज्यों में कार्यरत हजारों श्रमिक प्रदेश में लौट रहे हैं। यदि ऐसे में नये उद्योग यहाँ आयें या पहले से कार्यरत इकाइयाँ अपना विस्तार करना चाहें तो श्रम कानूनों में हुए ताजा बदलाव प्रदेश में औद्योगिक और व्यापारिक प्रगति का आधार बन सकते हैं। यदि अन्य राज्यों से लौटे श्रमिकों को यहीं काम मिलने लगे तो वे दूर जाने की झंझट से बचे रहेंगे तथा उनके जीवन में भी स्थायित्व आयेगा। दरअसल हमारे देश में अधकचरी व्यवस्था के चलते कोई भी सोच अपना असर न दिखा सकी। पूंजीवाद, समाजवाद, उदारवाद को मिलाकर इस तरह से गड्डमगड्ड कर दिया गया कि समझ में ही नहीं आता भारत आखिर चल किस राह पर रहा है? श्रमिकों को शोषण से बचाना बेहद जरूरी है किन्तु उसकी आड़ में सरकारी अमला निरंकुश होकर ब्लैकमेलिंग करने की हैसियत में आ जाए ये ठीक नहीं है। यही वजह रही कि श्रम कानून श्रमिकों के हित संवर्धन से ज्यादा श्रम विभाग की अतिरिक्त कमाई का जरिया बन गये। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि वे पेशेवर श्रमिक नेताओं के लिए भी अपना रौब-रुतबा कायम रखने का औजार बन गए। और फिर एक कानून या प्रावधान हो तो उसका पालन करना आसान होता है लेकिन दर्जनों फार्म, दसियों रजिस्टर जैसी खानापूरी करने से बचने के कारण उद्योगपति, ठेकेदार या ऐसे ही अन्य कारोबरियों ने बचाव के अन्य रास्ते निकाल लिए जिनके कारण श्रमिक के हिस्से का पैसा भ्रष्ट सरकारी अमले के पास जाने लगा। कल ही जानाकारी आई कि उप्र की योगी सरकार ने भी आगामी 1000 दिनों के लिए श्रम कानून में ढेरों रियायतें दी हैं। आर्थिक आपातकाल के इस दौर में अधिकारों से ज्यादा अब कर्तव्यों की बात होना चाहिए। शिवराज सरकार ने प्रतिष्ठान प्रात: 6 से रात 12 बजे तक खोलने की अनुमति देकर भी सही कदम उठाया है। 8 घंटे की पारी को 12 घंटे करना भी फायदेमंद है। अतिरिक्त 4 घंटे के लिए ओवर टाइम का प्रावधान अत्यंत व्यवहारिक है। इससे उत्पादन बढ़ने के साथ ही श्रमिक की आय भी बढ़ेगी। वर्तमान हालत में अर्थव्यवस्था जिस तरह रसातल में चली गई है उसे उबारने के लिए न्यूनतम औपचारिकताओं के साथ व्यवहारिक कानूनों की महती आवश्यकता है। कम लागत पर ज्यादा से ज्यादा उत्पादन ही इस संकट से उबार सकता है। ऐसे में हमें बेहद व्यवहारिक होकर आगे बढ़ना होगा। यदि कारोबार ही बंद हो गये और कारखानों में ताले लटक गए तब श्रम कानून किसी काम के नहीं रह जायेंगे। पिछली कमलनाथ सरकार ने भी तमाम सुधारवादी निर्णय लिए जिनका कारोबारी जगत ने स्वागत किया था। ऐसे में अपेक्षा की जाती है कि वक्त की नजाकत देखते हुए शिवराज सरकार यदि कोई अच्छा कदम उठा रही है तो उसकी तारीफ  न सही लेकिन आलोचना तो न की जाए। किसानों को अपनी उपज कहीं भी बेचने की छूट के बाद उद्योग, व्यवसाय को श्रम कानूनों के मकड़जाल से बचाने के प्रदेश सरकार के फैसले सामयिक और विकासवादी हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी