Friday, 15 May 2020

महाराष्ट्र और गुजरात को महंगा पड़ेगा प्रवासी पलायन



अचानक सब कुछ बदला सा नजर आने लगा है | पूरे देश का ध्यान लाखों प्रवासी मजदूरों की दर्द भरी दास्तान पर केन्द्रित हो गया  | समाचार माध्यम उनके काफिलों के चित्रमय  समाचार दिखाकर शासन नामक व्यवस्था की असंवेदनशीलता को उजागर करने में लगे हैं | जिसे देखो वह इन मुसीबतजदा लोगों के प्रति सहानुभूति दिखा रहा  है | भले ही दंगा फसाद और खून खराबा न हुआ हो लेकिन कामोबेश हालत देश विभाजन के समय पाकिस्तान से हुए हिन्दुओं और सिखों के पलायन जैसी  ही है | यद्यपि बीते दो तीन दिन में स्थिति काफी संभली है | लाखों प्रवासी मजदूर रेल या सड़क मार्ग से अपने गाँव पहुंच चुके हैं | बाकी भी जल्द ही पहुँच जायेंगे | जो अभी भी पैदल चले  जा रहे हैं उनकी तरफ भी व्यवस्था का ध्यान गया है और आगे की यात्रा तथा भोजन आदि का प्रबंध भी हो रहा है | मुम्बई में टैक्सी और ऑटो चलाने वाले भी उन्हीं में निकल पड़े हैं | जो माध्यम प्रवासी मजदूरों की बदहाली दिखाकर पूरे देश को उनके प्रति भावुक बना रहे हैं उन्हें चाहिए था कि उन मानव सेवकों की खबरें भी प्रसारित करते जिन्होंने रास्तों में कई जगहों पर  भोजन - पानी की व्यवस्था की |जिससे और लोग भी प्रेरित होते | जैसी जानकारी आ रही है उसके मुताबिक़ प्रवासी पलायन सबसे ज्यादा  महाराष्ट्र से ही हुआ और उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी भी उसी राज्य में हुई | ऐसा नहीं है कि उद्धव ठाकरे की सरकार इस बारे में पूरी तरह अनजान थी | मुम्बई में रहने वाले लाखों उत्तर भारतीय शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी को फूटी  आँखों नहीं  सुहाते थे | लेकिन संख्याबल और परिश्रमी प्रवृति के कारण वे मुम्बई में अंगद के पाँव की तरह जम गए थे | स्व. बाल ठाकरे के समय से ही उत्तर भारतीय समुदाय को बाहरी और मुम्बईकरों के हक पर डाका डालने वाला समझा जाता रहा | भले ही बाद में वोट बैंक की लालच में उनकी  मिजाजपुर्सी की  जाने लगी तथा शिवसेना द्वारा सामना अखबार में सम्पादक पद पर उत्तर भारतीय पत्रकार्रों की  नियुक्ति भी की जाने लगी किन्तु मन ही मन उनकी बढती संख्या शिवसेना और एनसीपी दोनों को असहज लगने लगी थी | इसका एक कारण ये भी है कि किसी समय कांग्रेस का समर्थक रहा ये उत्तर भारतीय समुदाय धीरे - धीरे भाजपा के खेमे में आता गया | उसे लगने लगा कि कांग्रेस उसकी सुरक्षा में असमर्थ है | इस मानसिकता का प्रवासी पलायन के पीछे बहुत बड़ा हाथ है | मुम्बई और उसके निकटवर्ती नगरों में इन मजदूरों के रहने  खाने का इंतजाम महाराष्ट्र सरकार के साथ शिवसेना और एनसीपी मिलकर करते तो उन्हें कम से कम पैदल तो निकलना नहीं पड़ता | अनेक प्रवासियों की ज़ुबानी ये बात सामने आई है कि मध्यप्रदेश में आने के बाद अपेक्षाकृत उनका बेहतर  तरीके से ध्यान रखा गया | जिन राज्यों से भी प्रवासी मजदूर निकलने को बाध्य हुए वहां की राज्य सरकारों का रवैया बेहद गैर जिम्मेदाराना रहा | अगर बेरोजगार हुए इन मजदूरों को केवल दो वक़्त का साधारण भोजन और पानी मिलता रहता तो वे बदहवास होकर भागते नहीं | लॉक डाउन का तीसरा चरण घोषित होते ही उन्होंने अपने ठिकाने छोड़कर चलना  शुरू किया ही इसलिए कि उनको मिलने वाली सुविधा रहस्यमय तरीके से बंद कर दी गईं और भय का माहौल बनाया जाने लगा  | लेकिन इस पलायन ने मुम्बई सहित समूचे महाराष्ट्र में मजदूरों की जो कमी उत्पन्न कर दी वह  आने वाले दिनों में यहाँ के उद्योगों के लिए बड़ी समस्या बनेगी | जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार बहुत बड़ी संख्या ऐसे  मजदूरों की है जो कुछ समय तक तो इस सफर की दर्दनाक यादों से निकल ही नहीं सकेंगे | जिनके परिवार साथ थे उनका कष्ट तो कई गुना क्या ज्यादा था | विभिन्न क्षेत्रों से आ रही  जानकारी के अनुसार बड़ी संख्या उन प्रवासी मजदूरों की  है जो दोबारा मुम्बई जाने के बारे में सोचेगे तक नहीं | ऐसे में महाराष्ट्र और गुजरात का औद्योगिक ढांचा बुरी तरह हिल जाएगा | उस दृष्टि से उद्धव  सरकार ने जाने - अनजाने बहुत बड़ी गलती कर  दी | अभी भले ही केंन्द्र सरकार गालियाँ  खा रही हो लेकिन कोरोना की गर्द - गुबार बैठते ही महाराष्ट्र और गुजरात दोनों की राज्य सरकारें इस पलायन के कारण खून के आंसू बहाने मजबूर होंगी | गुजरात में हालाँकि राजनीतिक विद्वेष नहीं दिखा क्योंकि लॉक डाउन के दौरान हार्दिक पटेल जैसों की सियासत बंद पड़ी हुई है किन्तु विजय रूपानी की सरकार गुजरात की  परम्परागत सहिष्णुता का परिचय नहीं  दे सकी  | हालाँकि इस श्रम शक्ति के कारण प्रवासी मजदूरों के गृह राज्यों में ग्रामीण विकास का नया अध्याय शुरू होने की उम्मीदें बढ़ चली हैं | आज ही मप्र के बुन्देलखण्ड क्षेत्र से खबर आई कि अनेक गाँवों में बरसों बाद चहल - पहल दिखाई दी  | बंद घरों के ताले खोलने के बाद राहत की सांस लेते हुए अनेक मजदूरों ने दोबारा मुम्बई नहीं जाने की बात जिस अंदाज में कही उससे ये कहना गलत नहीं होगा कि महाराष्ट्र और गुजरात को ये पलायन काफी महंगा पड़ेगा |

Thursday, 14 May 2020

अब हवाएं ही करेगी रोशनी का फैसला , जिस दिये में जान होगी वो दिया रह जाएगाअब से भारत एक ब्रांड और हम सब उसके ब्रांड एम्बेसेडर





 कुछ समय पहले कागजों के बीच  अचानक विदेश से आया एक पुराना लिफाफा मिला | प्रेषक का नाम देखा तो डॉ. लक्ष्मी नारायण पिपरसानिया ( अब स्वर्गीय )  लिखा था | अचानक यादों की  सुई आधी सदी पीछे घूम गई  | डॉ. पिपरसानिया जबलपुर में साठिया कुआ मोहल्ले में हमारे पड़ोसी थे | पहले यहाँ एक निजी वाणिज्य महाविद्यालय में प्राध्यापक भी रहे | बाद में उनका चयन विदेश मंत्रालय में हो गया और 1965 में वे संरासंघ में भारतीय दूतावास में नियुक्ति पर न्यूयॉर्क चले गये | उनका वह पत्र पढ़ा जिसमें सितम्बर 1968 की तारीख थी |  पिताश्री को संबोधित उस पत्र में प्रारंभिक औपचारिकताओं के बाद कुछ घरेलू चीजों का नाम और मात्रा लिखते हुए निवेदन था कि वे सब उनके लिये लेते आयें | दरअसल पिताजी बतौर पत्रकार अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव का अवलोकन करने जा रहे थे | अक्टूबर 1968 में उनका वहां जाने का कार्यक्रम था | उन्होंने अपने अमेरिका आने की पूर्व सूचना डॉ . पिपरसानिया को पत्र द्वारा भेज दी थी | जिसके उत्तर में आये संदर्भित पत्र में न्यूयॉर्क में अपने घर पर ही ठहरने के आग्रह  के साथ ही  पापड़ , बड़ी , मसाले , तिथि - त्यौहार दर्शाने वाले पंचांग - कैलेंडर और पूजन सामग्री के  अलावा बाटा कम्पनी का  एक काले रंग का जूता भी साथ लाने  का आग्रह था |

पत्र पढ़ने के बाद मुझे ध्यान आया कि पिताजी वह सब सामान ले भी गए थे | लगभग डेढ़ महीने की यात्रा के दौरान अमेरिका में मिले भारतीय  समुदाय के व्यक्ति के यहाँ भोजन करने का अवसर उन्होंने कभी नहीं गंवाया | इसका कारण डॉलर बचाना नहीं वरन शाकाहारी भारतीय भोजन का लालच था | उस ज़माने में वहां भारतीय रेस्टॉरेंट इक्का - दुक्का होते थे | जबकि अमेरिका में तब तक भारतीय समुदाय की उपस्थिति महसूस होने लगी थी | 

लेकिन आज का माहौल पूरी तरह बदला हुआ है | अब केवल अमेरिका ही नहीं अपितु विश्व के  सभी प्रमुख देशों में भारतीय मूल के लोगों की अच्छी खासी संख्या है  | अमेरिका , ब्रिटेन , कैनेडा , यूएई इनमें प्रमुख कहे जा सकते हैं | इस कारण भारतीय परिवारों में उपयोग  होने वाली दैनिक उपयोग की हर चीज वहां आसानी से उपलब्ध हो जाती है | भारतीय भोजन के रेस्टॉरेंट भी बड़ी मात्रा में खुल गये  हैं | न्यूयॉर्क के न्यू जर्सी और लन्दन के साउथ हॉल इलाके में तो लगता है मानों  भारत में ही घूम रहे हों | कैनेडा के प्रमुख शहरों के कुछ हिस्सों को तो मिनी पंजाब तक कहा  जाने लगा है | कहते हैं वहां के अनेक भारतीय तो गुरुद्वारे के लंगर से ही काम चला लेते हैं।

इस वजह से भारत के तमाम लोकप्रिय घरेलू  ब्रांड विदेशी बाजारों में जगह बना चुके हैं | इनमें  ,मसाले , अचार , रेडी टु ईट सब्जियां , पापड़ , खाकरे , नमकीन , पान मसाला और रेडीमेड वस्त्र आदि शामिल हैं | वैसे इसमें अनोखा कुछ भी नहीं है क्योंकि जहाँ उपभोक्ता होते हैं वहां बाजार भी पीछे - पीछे चला ही आता है |

यहाँ तक तो ठीक था लेकिन भारत में विदेशी उतनी बड़ी संख्या में नहीं रहने के बाद भी बीते दो ढाई दशक में जो विदेशी ब्रांड भारत में आये उनका कारण समझने वाली बात है | फैशन और सौन्दर्य प्रसाधन को अलग कर दें लेकिन पिज्जा , बर्गर और चिकेन के शौकीनों के कारण अमेरिका से निकले ब्रांडों के विक्रय केंद्र मझोले श्रेणी के शहरों तक में खुल जाना चौंकाता भले न हो परन्तु अध्ययन का विषय अवश्य है | यद्यपि कोका कोला और बाद में पेप्सी नामक  अंतर्राष्ट्रीय सॉफ्ट ड्रिंक का प्रवेश भारत में काफी पहले हो चुका था |  1977 में जनता पार्टी सरकार ने कोका कोला का भारत से डेरा उठवा दिया लेकिन नब्बे का दशक आते - आते तक  कोका कोला और पेप्सी  भारत में अपने पैर ज़माने में  कामयाब क्या हुईं , घरेलू बाजारों में छाये भारतीय ब्रांड डबल सेवन , कैम्पा कोला , गोल्ड स्पॉट , थम्स  अप का भट्टा ही बैठ गया | कुछ को उन दोनों ने खरीद लिया |

संयोग से  पिज्जा , चिकेन और सॉफ्ट ड्रिंक्स का व्यवसाय करने वाली उक्त सभी कम्पनियां अमेरिका से निकली हुई हैं और इनकी गिनती विश्व के सबसे बड़े ब्रांड के तौर पर होती  है | भारत जैसे देश में जहाँ शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के व्यंजनों में  पाक कला का सर्वोत्कृष्ट रूप देखने मिलता हो और हर प्रदेश की अपनी स्वाद संबंधी विशिष्टता हो , वहां एकरूपता लिए इन  ब्रांडों को भारत जैसे  स्वाद की  बहुलता से सम्पन्न देश ने सहजता से कैसे अपना लिया ये मार्केटिंग के साथ ही समाज विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए विश्लेषण  का विषय है | सॉफ्ट ड्रिंक तो काफी  पहले से भारतीय समाज में पैठ बना चुके थे  लेकिन पिज्जा और चिकेन में ऐसा क्या था जिसके लिए भारत के लोगों ने विदेशी ब्रांड को पैर ज़माने की जगह दे दी |

दरअसल ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अनाप - शनाप कमाई का असर है | उनके प्रचार का बजट अकल्पनीय और रणनीति बेहद आक्रामक होने से आम जनता के दिमाग में ये बात बिठा दी जाती है कि उनका उपयोग करते ही आप वैश्विक सोच से जुड़ जाते हैं | भारत में पेप्सी ने पहले कुछ वर्षों तक पूरी कमाई प्रचार और  मार्केटिंग पर खर्च कर दी | क्रिकेट विश्व कप जैसे  आयोजन को प्रायोजित कर उसने भारतीय जनमानस में अपने लिए स्थायी जगह बना ली | कोका कोला तो पहले से ही जाना पहिचाना नाम था | ये दोनों  स्वास्थ्य वर्धक कुछ न होने के बाद भी  जिस तरह पैसा कमाते हैं वह चिन्तन का विषय हैं |

यही हाल पिज्जा और चिकेन बेचने वाली कम्पनियों का भी है जो समाज के अभिजात्य वर्ग से होते हुए भारत के विशाल मध्यमवर्गीय घरों में भी घुस गईं | 20  मिनिट में होम डिलीवरी न होने पर कीमत नहीं लेने जैसा तरीका उनका ट्रम्प कार्ड बन गया | ये चुटकुला तक चल पड़ा कि भारत में पुलिस , एम्बुलेंस , फायर ब्रिगेड के आने में भले देर हो जाए  लेकिन पिज्जा कम्पनी की डिलीवरी में देर नहीं  हो सकती | कहने का आशय ये है कि इन विदेशी ब्रांडों के कारण हम आज भी मानसिक तौर पर विदेशी श्रेष्ठता के सामने बौने बने हुए हैं |

दरअसल ये विदेशी ब्रांड ही नव उपनिवेशवाद के औजार हैं | इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के  संचालन में भारतीय मूल के लोगों को उच्च पदों पर रखकर भारतीय उपभोक्ताओं को  भावनात्मक तौर पर प्रभावित करने का खेल चलता है | अनेक देशों में तो ये वहां की सत्ता तक को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लेते हैं | जिस जनता पार्टी की  सरकार ने कोका कोला को भारत से निकाल बाहर किया उसी से जुड़े मंत्री ने 1989  में जनता दल सरकार के समय पेप्सी को अनुमति दी |

ये ब्रांड केवल खाने पीने , परिधान , फैशन , सौदर्य के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहते | उनके देश के  नर्तक , गायक , खिलाड़ी , अभिनेता , फ़िल्में सभी ब्रांड बना दी जाती हैं | मायकल जैक्सन के एक शो के लिए मुम्बई पागल हो गई थी और भारतीय संस्कृति के संरक्षक बने स्व.बाल ठाकरे को उसका समर्थन था | चाहे बीटल्स का कार्यक्रम  हो या जुबिन मेहता का आर्केस्ट्रा | हम भारतीय केवल उनकी ब्रांड छवि को प्रतिष्ठा सूचक मानकर पीछे चल पड़ते  हैं | इसीलिये भारत में करोड़ों कमाने और अवार्ड दर अवार्ड जीतने के बावजूद भारतीय फिल्मकार ऑस्कर जीतने के लिए घुटनों के बल खड़े होने तैयार रहते हैं |

कोरोना संकट के कारण अचानक ग्लोबल ब्रांड के मुकाबले भारतीय उत्पादों को खड़ा करने पर बहस शुरू हो  गई | आरोप - प्रत्यारोप , व्यंग्य , कटाक्ष  का दौर  भी चल पड़ा | लेकिन राजनीति से तनिक हटकर देखें और सोचें तो जिन विदेशी ब्रांडों का यहाँ जिक्र हुआ क्या वे भारत की जरूरत थे या जबरन जरूरत बनाये गए ? जिस चीज में हम पीछे हों वहां तो विदेशी विकल्प का औचित्य है भी किन्तु अमूल जैसे भारतीय ब्रांड ने दिखा दिया कि  गुणवत्ता बनाये रखते हुए आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरा जाये तो अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडो को शिकस्त दी जा सकती है |

हमें केवल अपनी मानसिकता बदलते हुए हीन भावना को  त्यागने  के  साथ ही मिथ्या श्रेष्ठता की चकाचौंध से भी बचना होगा | आने वाला दौर राष्ट्रीय बनाम बहुराष्ट्रीय के मुकाबले का होगा | कोरोना  के बाद की दुनिया में अलग तरह  के शीतयुद्ध के साथ ही अभिनव शक्ति संतुलन देखने मिलेंगे | ऐसे में प्रधानमंत्री न कहें तब भी हमें भारत को  एक विश्वसनीय वैश्विक ब्रांड बनाने के लिये जुटना होगा  | 135  करोड़ जनता अपने आप में एक विराट उपभोक्ता समूह है जिसके साथ उन करोड़ों अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों का भी समर्थन जुड़ सकता है जो दुनिया के कोने - कोने में फैले हुए हैं |

आइये , संकट की इस घड़ी में राजनीति से सर्वथा दूर रहते हुए संकल्प लें कि अब से हमारा ब्रांड भारत होगा और हम सभी इसके जीवंत ब्रांड एम्बेसेडर बनेंगे |  किसी व्यक्ति या विचारधारा से जोड़े बिना राष्ट्रीय सम्मान  को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का ये अनुष्ठान समय की मांग हैं |

महशर बदायुनी की ये पंक्तियाँ याद रहें :-

अब हवाएं ही करेंगी रोशनी  का फैसला , जिस दिये  में जान  होगी वो दिया रह  जायेगा |

क्या आत्मनिर्भर भारत अभियान राम मन्दिर जैसा आन्दोलन बन सकेगा ?मोदी समर्थकों के सामने बड़ी चुनौती





12 मई की रात जब प्रधानमंत्री देश से बात करने टीवी पर आये तब लगा था कि वे लॉक डाउन के अगले चरण के बारे में कुछ घोषणा करेंगे | लेकिन उन्होंने पूरा फोकस अर्थव्यवस्था को पुनः गतिशील  करने के लिए घोषित आर्थिक पैकेज पर केन्द्रित रखा | जिसकी राशि 20 लाख करोड़  है  , जो  देश की अर्थव्यवस्था  का 10 %  है | पैकेज से किसे क्या मिलेगा इसकी प्रारंभिक जानकारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बुधवार की शाम पत्रकार वार्ता में दी गई | दो दिनों में वे शेष निर्णयों के बारे में देश को बतायेंगी |

इससे अर्थव्यवस्था की मुसीबतें कितनी कम होंगीं और चीजों को दुरुस्त होने में कितना  समय लगेगा ये फ़िलहाल नहीं कहा जा सकता । क्योंकि अर्थशास्त्र काफी जटिल विषय है जिसे केवल घोषणाओं से नहीं समझा जा सकता |  उससे जनता को सीधे मिलने वाले फायदे पर भी  बहस भी शुरू हो गई है किन्तु नरेंद्र मोदी ने अपने स्वभावनुसार एक नया रणनीतिक मुद्दा छेड़ते हुए आत्मनिर्भर भारत अभियान के नाम से  एक नया नारा दिया , ग्लोबल की जगह लोकल | अर्थात विदेशी छोड़ स्वदेशी अपनाएं | और  ये भी बता दिया कि जो आज ग्लोबल ब्रांड है वह भी शुरुवात में लोकल ही हुआ करता था किन्तु लोगों ने वोकल ( मुखर  ) होकर उसे वैश्विक बना दिया |

इस तरह उन्होंने अर्थशास्त्र की शब्दावली में ही राष्ट्रवाद को राष्ट्रीय एजेंडा बनाने का दांव चल दिया | चूँकि भारत भी विश्व व्यापार  संगठन का सदस्य है इसलिए विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान  सरकार का मुखिया सार्वजनिक तौर पर नहीं कर सकता किन्तु कोरोना संकट ने जो चुनौतियां पेश की हैं उनके कारण भारत को अर्थव्यवस्था में उदारवाद के साथ राष्ट्रवाद भी सम्मिलित करना पड़ेगा | और जब चीन के साथ प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय खुलने जा रहा है तब  जरूरी हो जाता है कि हम अपने उपभोक्ता बाजार में विदेशी ब्रांड की बिक्री को घटायें | लेकिन कीमत और क्वालिटी दो ऐसे तत्व  हैं जो उपभोक्ता के निर्णय  को प्रभावित करते हैं | और इसी  का लाभ लेकर चीन का सामान भारतीय बाजारों से होता हुआ घर  - घर में घुस गया | 

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद ये उम्मीद थी कि वे चीनी सामान से हलाकान होकर दम तोड़ते जा रहे भारतीय उद्योगों को रक्षा कवच प्रदान करेंगे लेकिन उलटे चीन के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते मजबूत किये जाने लगे | उसके राष्ट्रपति जिनपिंग से याराना दिखाने के लिए कभी उनको अहमदाबाद में झूले पर झुलाया गया तो कभी महाबलीपुरम में आवभगत की गयी | मोदी जी भी चीन जाकर प्यार भरी बातें करके आ गए | इससे उनके अपने समर्थक वर्ग में भी असंतोष था | हालांकि चीन से आने वाले  कुछ सामानों  पर नियन्त्रण लगाये गए लेकिन प्रधानमंत्री के अपने वैचारिक परिवार के स्वदेशी जागरण मंच के प्रयासों के बावजूद भी चीनी  या अन्य विदेशी वस्तुओं का आयात जरा भी कम नहीं  हुआ | 

 बीते कुछ समय से चीन को अनेक मामलों में भारत के सशक्त विरोध का सामना करना पड़ा | विशेष रूप से अरुणांचल में भारत ने अपनी सैन्य शक्ति जिस तरह मजबूत की  उससे भी वह  काफी भन्नाया हुआ है | विशेष रूप से वन बेल्ट वन रोड वाले प्रोजेक्ट में शामिल नहीं  होने के हमारे  निर्णय ने उसको जबरदस्त नुकसान पहुँचाया | आतंकवाद और कश्मीर को लेकर भी चीन  द्वारा भारत के हितों के विरुद्ध सुरक्षा परिषद में वीटो के इस्तेमाल के कारण ऊपर से सामान्य दिखने वाले रिश्तों के बावजूद भीतर - भीतर शंकाएँ बढ़ती रहीं | लेकिन व्यापार के मोर्चे पर भारत सरकार ऐसा कुछ न कर सकी  जिससे घरेलू बाजारों में चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोका जा सके |

आखिर कोरोना ने वह अवसर दिया और उसका लाभ उठाते हुए श्री मोदी ने पहली बार अपने वैचारिक प्रतिष्ठान की सोच को इतनी वजनदारी से रखा | सबसे बड़ी बात कोरोना संकट के लिए चीन पर मंडरा रही आशंका के चलते उसकी वैश्विक साख को जबर्दस्त धक्का पहुंचा है |  अमेरिका सहित तमाम देश चीन से अपने उद्योग हटाने की तैयारी कर रहे हैं | इस कारण वह भारी दबाव में है | वही क्यों समूचे  पश्चिमी जगत का आर्थिक और औद्यगिक ढांचा कोरोना की वजह से चरमरा उठा है |

उसकी तुलना में भारत में स्थिति काफी संतोषजनक होने से दुनिया का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित होने की सम्भावना  है | यद्यपि उसका कितना लाभ हम उठा सकेंगे ये कह पाना तो कठिन है किन्तु अपने उत्पादन को बढ़ाकर अगर घरेलू जरूरतों को पूरा करने में भारत सक्षम हो सके तो अर्थव्यवस्था की गिरावट को उछाल में बदला जा सकता है | इससे व्यापार असंतुलन दूर होने के साथ  ही बेरोजगारी की समस्या भी हल होगी किन्तु ये तब तक संभव नहीं है जब तक स्वदेशी उत्पादों के प्रति भारत के लोगों में ही आग्रह न हो |

आर्थिक पैकेज को आत्मनिर्भर भारत अभियान का रूप देकर प्रधानमन्त्री ने जो पांसा फेंका है वह चमत्कारिक नतीजे दे सकता है , बशर्ते आर्थिक मोर्चे पर भी लोगों के मन में राष्ट्रीयता का भाव जगाया जा सके । 12 मई की रात प्रधानमन्त्री का सन्देश सुनने के बाद से ही देश भर से जो प्रतिक्रियाएं ग्लोबल के मुकाबले लोकल के समर्थन में आ रही हैं उनसे लगता है यदि भावनाओं के इस ज्वार की तीव्रता बनाये रखी जाए तो आत्मनिर्भर भारत अभियान को नारे से वास्तविकता  में बदला जा सकता है | प्रधानमंत्री ने जो आह्वान किया उसे अंजाम तक पहुंचाने की असली जिम्मेदारी अनगिनत मोदी समर्थकों की  है | वित्त मंत्री द्वारा 200 करोड़ तक की सरकारी खरीद के लिए ग्लोबल टेंडर नहीं निकालने की घोषणा करते हुए शुरुवात भी कर दी | उसके तुरंत बाद गृह मंत्री अमित शाह ने केन्द्रीय  पुलिस बलों के लिए संचालित कैंटीनों में केवल स्वदेशी उत्पाद ही उपलब्ध करवाने की घोषणा की तो थल सेनाध्य्क्ष ने सेना की कैंटीनों में वर्तमान  75 % की बजाय शत प्रतिशत भारतीय उत्पाद विक्रय हेतु रखे जाने पर सहमति दे दी |

 लेकिन जब तक आम जनता स्वदेशी के साथ भावनात्मक तौर पर नहीं जुड़ती तब तक ये अभियान महज सरकारी  औपचरिकता रह जाएगा | और यहीं शुरू होती है  भाजपा और रास्वसंघ  की भूमिका | दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी और  सबसे बड़े  संगठन का दावा करने वाली भाजपा और रास्वसंघ  यदि प्रधानमन्त्री के आह्वान को राममन्दिर की तरह का राष्ट्रीय आन्दोलन बना  सकें और उसके लिए वैसी ही मैदानी मेहनत करें तो अर्थ तंत्र बहुत जल्द व्यवस्थित होकर तेजी से आगे बढ़ने की स्थिति में आ जाएगा |

सवाल ये हैं कि क्या उक्त दोनों संगठन  भारतीय उपभोक्ता  को विदेशी छोड़कर स्वदेशी अपनाने और उसके लिए आवाज उठाने के लिए प्रेरित  कर  सकेंगे ? लेकिन इसी के साथ ही भारतीय उत्पादकों को भी क्वालिटी के मामले में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा ।

सबसे बड़ी बात ये भी है कि करोड़ों मोदी समर्थकों को  ईमानदारी  के साथ पहले खुद  स्वदेशी को अपनाना होगा | अन्यथा वे दूसरों से इस हेतु आग्रह नहीं कर सकेंगे | आर्थिक पैकेज की प्रशंसा या आलोचना से उपर उठकर स्वदेशी को भारतीय जनमानस में बिठाने के आह्वान की प्रशंसा होनी चाहिए | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने बड़ी ही चतुराई से सही  समय पर अपने समर्थकों के सामने एक चुनौती पेश कर दी है | यदि वे उसमें कामयाब हो सके तो 21 वीं सदी भारत की होने की भविष्यवाणी सच साबित हो सकती है |

जितना बड़ा शहर उतना बड़ा कहर हॉट स्पॉट बनी बस्तियां महामारी का स्थायी ठिकाना बनेंगे



भारत में कोरोना के संक्रमित लोगों की संख्या 70 हजार पार कर चुकी है | लेकिन संतोष का विषय ये है कि मृत्यु दर अभी भी 3 फीसदी के आसपास स्थिर है वहीं कोरोना संक्रमित लोगों के स्वस्थ होने का प्रतिशत बढ़ते हुए 31हो गया है | कोरोना का फैलाव  और बढ़ेगा या कम होना शुरू हो जायेगा ये कोई नहीं  बता सकता क्योंकि देश भर से लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौट रहे हैं | उनके वहां पहुंचने के बाद  संक्रमण गाँवों में नहीं फैला तब ये उम्मीद की जा सकेगी कि महामारी  ढलान पर आ गई है |

लेकिन इस  वायरस  ने एक बात स्पष्ट कर दी कि यह देश के सभी महानगरों में ज्यादा तेजी से न केवल फैला अपितु वहीं ज्यादा मौतें भी हो रही हैं | महाराष्ट्र और गुजरात क्रमशः कोरोना के शिकार दो सबसे बड़े राज्य हैं | लेकिन उसमें भी ध्यान देने योग्य बात ये है कि इन राज्यों के कुल कोरोना संक्रमित लोगों में  आधे से भी ज्यादा उनकी राजधानियों  मसलन मुम्बई और अहमदाबाद में हैं | कोरोना पीड़ित तीसरा सबसे बड़ा राज्य है दिल्ली जो अपने आप में महानगर तो है ही साथ में उप्र के नोएडा और गाज़ियाबाद तथा हरियाणा के गुरुग्राम को भी अपने में समेटे हुए एनसीआर की शक्ल ले चुका है | दिल्ली में भी तमाम प्रयासों के बावजूद कोरोना के नए मरीज मिलते ही जा रहे हैं | यही हाल तमिलनाडु  का है जो चौथे नम्बर पर है और यहाँ भी राजधानी चेन्नई कोरोना का सबसे प्रमुख केंद्र है | कर्नाटक  के बेंगुलुरु में  भी  यही स्थिति है | बंगाल के आंकड़ों को लेकर भ्रम की स्थिति है लेकिन वहां कोलकाता ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा हुआ है |

महानगरों से नीचे उतरें तो पुणे , नागपुर , इंदौर , भोपाल ,लखनऊ , जयपुर , कोची जैसे बड़े कहे जाने वाले  शहरों में कोरोना का कहर छोटे जिलों की तुलना में कहीं ज्यादा है | इसकी सफाई में कहा जा सकता हैं कि जहां आबादी ज्यादा होगी वहां संक्रामक बीमारियों का फैलाव होना स्वाभाविक है लेकिन इसकी असली वजह है वे बस्तियां हैं जिनमें घनी बसाहट की वजह से इंसान कीड़े - मकोड़ों की तरह रह रहे हैं | मुम्बई की धारावी झोपड़पट्टी में मात्र ढाई - तीन किलोमीटर  में  8 लाख लोगों  का निवास अपने आप में बहुत कुछ कहता है | 

मुम्बई में कोरोना का सबसे बड़ा हॉट स्पॉट  धारावी ही है | कमोबेश यही स्थिति अहमदाबाद , दिल्ली ,  लखनऊ , इन्दौर , भोपाल आदि की भी है | इन शहरों में भी घनी और बेतरतीब बसी आवासीय बस्तियों में कोरोना का संक्रमण सर्वाधिक है |  मेरे अपने शहर जबलपुर में ही जिन क्षेत्रों से कोरोना के नए मरीज रोजाना निकल रहे हैं वे भी सब बेहद सघन बसाहट वाले हैं |

कोरोना तो खैर , नई बीमारी है लेकिन मौसम बदलते ही जो भी संक्रामक बीमारियाँ आती हैं  उनका सबसे ज्यादा प्रभाव बड़े शहरों की इन बस्तियों में ही देखने मिलता है | अभी भले ही हॉट स्पॉट और कन्टेनमेंट क्षेत्र बनाकर वहां आवाजाही रोक दी गई तथा सैनिटाइजर का छिड़काव चल रहा हो लेकिन कोरोना का प्रकोप समाप्त होते ही ये इलाके फिर उसी दुर्दशा में लौट जायंगे | ऐसा नहीं है कि छोटे और  मध्यम श्रेणी के शहरों में संक्रामक बीमारियाँ नहीं फैलतीं लेकिन कोरोना जैसी बीमारी का संक्रमण जिन कारणों से होता है  वे शारीरिक स्पर्श या निकटता से उत्पन्न होते हैं | मास्क और  सैनिटाइजर का उपयोग इसीलिये सुझाया  जा रहा है | सोशल डिस्टेंसिंग जैसी मूलभूत जरूरत तो  घनी बस्तियों में  वैसे भी नामुमकिन है | कोरोना के कारण अपने शहर या गाँव लौटे अनेक लोगों ने अब छोटे शहर में जिंदगी बसर करने का मन बना लिया है | प्रवासी मजदूरों में से भी बहुत ऐसे हैं जिनका मुम्बई - दिल्ली की चकाचौंध से मोहभंग हो गया है |

ये वाकई बड़ा बदलाव है | झुग्गी - झोपड़ी यूँ तो हर शहर और कस्बों  में हैं लेकिन जितना बड़ा शहर , उतनी ही अधिक झुग्गियां देखने मिलती हैं | इनमें सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे से बने मकानों का नक्शा स्वीकृत नहीं होता | बावजूद इसके नगर निगम या नगर पालिकाएं इन्हें हटा नहीं सकतीं क्योंकि नेता लोग  बचाव में खड़े हो जाते हैं | और यदि हटाया भी जाता है तो दूसरी सरकारी जमीन कब्जाने दे दी जाती है | सभी चुनावी घोषणा पत्रों  में अवैध कालोनी को वैध बनाने और गरीबों को जमीन के पट्टे देने का वायदा स्थायी  तौर पर होता ही है |

भारत में कोरोना का आयात तो विदेश से लौटे व्यक्तियों के माध्यम से ही हुआ किन्तु उसको बड़े पैमाने पर फ़ैलाने का शुरुवाती काम तबलीगी जमात के लोगों ने मुस्लिम बस्तियों और मस्जिदों में छिपकर किया । और जब एक बार संक्रमण ने रफ़्तार पकड़ी तो फिर शेष घनी बस्तियों में उसने हल्ला बोला जो ऐसी किसी भी संक्रामक बीमारी की सबसे पसन्दीदा शरणस्थली होती हैं |

 इस विश्लेषण से ये निष्कर्ष निकलता है कि महानगरों और उनके बाद वाले बड़े नगरों में आबादी का बोझ कम करते हुए  झोपड़पट्टी जैसे इलाके खत्म हों | प्रवासी मजदूरों का  बड़े शहरों से हुआ पलायन इन शहरों के लिए एक राहत का कारण भी बन सकता है | यद्यपि उनके चले जाने से उद्योगों में  कामकाज शुरू करना बहुत मुश्किल हो गया है लेकिन मुम्बई , दिल्ली , अहमदाबाद , चेन्नई , बेंगुलुरु जैसे महानगरों  से लाखों श्रमिकों तथा अन्य कर्मचारियों के लौट जाने से जो खालीपन आया उसे स्थानीय स्तर पर ही भरा जावे | यूँ भी ये शिकायत हमेशा  सुनाई  देती है कि बाहरी  मजदूर आकर वहां की लोगों का हक छीन लेते हैं |

हालाँकि कम समय में इतने  मानव संसाधन की व्यवस्था आसान नहीं  है लेकिन बड़े शहरों और उनमें रहने वाले लोगों की सेहत को सुरक्षित रखना है तब इस तरह के कदम उठाना ही पड़ेंगे | और फिर जन स्वास्थ्य के साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए भी महानगरों की जनसंख्या और बसाहट में बड़े बदलाव जरूरी होंगे | बीते डेढ़ महीने में महानगरों की आबोहवा में जिस तरह के सुखद परिवर्तन हुए वे भी इस तरफ इशारा कर रहे हैं | नदियाँ अपने आप साफ़ हो गईं और वायु  प्रदुषण कम होने से मई महीने की तपन भी सहने योग्य बन गयी है |

ये कहना गलत नहीं होगा कि जिन महानगरों और अन्य बड़े शहरों का ऊपर उल्लेख किया गया , वहां यदि घनी बस्तियों में संक्रमण का विस्तार नहीं हुआ होता तो अब तक कोरोना काफी हद तक काबू में आ  जाता | लॉक डाउन में रहना तो इन बस्तियों के लोगों के लिए खैर , एक तरह की मजबूरी बन गयी किन्तु सोशल डिस्टेंसिंग , मास्क  और हाथ धोने  जैसी सावधानियों के प्रति लापरवाही के कारण यह महामारी चिंताजनक स्थिति में पहुँच गई है |

तत्काल कुछ करना न तो व्यवहारिक होगा और न ही संभव लेकिन कोरोना के बाद तमाम बड़े शहरों की घनी बस्तियों का नये सिरे से नियोजन करना जरूरी है | प्रधानमन्त्री से लेकर अनेक प्रख्यात वैज्ञानिक और चिकित्सक ये कह रहे हैं कि कोरोना जल्दी जाने वाला नहीं है | और इसलिए हमें इसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए |

सलाह गलत तो नहीं है लेकिन जब उसके साथ ही जीना है तो क्यूँ न ढंग से जिया जाए ? बुद्धिमत्ता तो यह है कि कोरोना को दोबारा गर्दन दबोचने का कोई  भी मौका नहीं मिले | जैसे खबरें  आ रही हैं उनके अनुसार कोरोना के उद्गम स्थल  चीन के वुहान शहर में कुछ नए मरीज मिले हैं | जिससे ये आशंका प्रबल हो उठी है कि एक बार शांत हो जाने के बाद वायरस दबे पाँव फिर लौट सकता है | भारत तो अभी तक पहले चरण की लड़ाई में ही उलझा हुआ है | इसमें जीतने के बाद यदि वह  अदृश्य वायरस कहीं फिर लौटा तो  उसकी शुरुवात ही तीसरी पायदान अर्थात सामुदायिक फैलाव ( Community spread ) से होगी | ये देखते हुए अक्लमंदी इसी में है कि महानगरों और बाकी बड़े शहरों में संक्रमण के  जो हॉट स्पॉट घनी  आबादी और अवैध बस्तियों के कारण सामने आये , उनको हटाकर भावी खतरे के प्रति सचेत रहा जावे |

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि मौत ने भारत में अपने लिए अनुकूल स्थान भीतर तक घुसकर देख लिए हैं | यदि हम वोटरों की  नाराजगी से बचने के लिए  हाथ पर हाथ  धरे बैठे रहे तो न जाने कब अमेरिका , इटली , ब्रिटेन और स्पेन जैसी हालत भारत में भी  बन जाये |

 क्या हम इसके लिए तैयार हैं ?

जनसंख्या की तेज रफ्तार पर स्पीड ब्रेकर जरूरी दो से अधिक बच्चों पर सुविधाएं बन्द हों : चीन से सीखें





देश इस समय जिस संकट से जूझ रहा है वह अप्रत्याशित और अकल्पनीय तो है ही जिसकी वजह से शुरुवात में सरकारी और निजी क्षेत्र को उससे निपटने में भारी तकलीफ उठानी पड़ी | जैसे - तैसे ये लगा कि मामला नियन्त्रण में आ जायेगा तब ही चिर  - परिचित समस्या सामने आकर खड़ी हो गई जिसका नाम है जनसंख्या | हमारे प्रधानमंत्री दुनिया में जहां जाते हैं भारत  के सवा सौ करोड़ लोगों का जिक्र करते हुए उन्हें देश की ताकत बताते हैं | हालाँकि अधिकृत आंकड़ा 138 करोड़ का है | लेकिन सच्चाई ये है कि  ये जनसंख्या उस  मोटे व्यक्ति जैसी है जो देखने में भले ताकतवर  लगे  लेकिन अधिक वजन ही उसकी समस्या बन जाता है जिसके कारण वह चार कदम चलने में ही थकने लगता है और यदि सीढ़ियों से एक मंजिल चढ़ना हो तो हिम्मत हार जाता है | भारत की जनसंख्या आज के संदर्भ में वैसी ही स्थिति उत्पन्न कर रही है |

कोरोना शुरू होते ही चौतरफा दबाव बनने लगा कि लोगों की जांच करवाई जाए जिससे संक्रमण फैलने से पहले ही रोका जा सके | सुझाव  गलत नहीं था किन्तु अव्वल तो जाँच किट नहीं थीं , फिर आईं तो लेबोरेट्रीज का टोटा  पड़ गया और अंत में  जांच क्षमता पर आकर बात अटकने लगी | कहा  जा रहा है कि फिलहाल प्रतिदिन 90 हजार जांच करने के क्षमता है लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ नहीं होने से अधिकतम  75 हजार ही हो रही  हैं |

जाहिर हैं इस गति से पूरे देश की  जाँच करते - करते कोरोना के बाद वाली महामारी  भी आ जायेगी | उसने सबसे पहले जहाँ दस्तक दी वह है चीन जिसकी आबादी तकरीबन  170 करोड़ है | आबादी के लिहाज से  तीसरा सबसे बड़ा देश जो कोरोना से सर्वाधिक पीड़ित हुआ वह है अमेरिका | चीन चूँकि साम्यवादी शासन व्यवस्था के अंतर्गत है इसलिए वहां मानवाधिकार , अभिव्यक्ति की आजादी , स्वतंत्र न्यायपालिका जैसी  बातें निरर्थक हैं | आप सरकार के समर्थक भले न हों लेकिन विरोधी नहीं हो सकते | कोरोना  को लेकर भी चीन  की ये पहिचान बरकरार रही | आज तक कोई ये नहीं जान सका कि  उसके  वुहान शहर में ये बीमारी कैसे आई , उसमें  कितने लोग बीमार हुए और कितनों ने दम तोड़ा ?  कहा जा रहा है कि हजारों लाशों का  का अंतिम संस्कार उनके परिवार को बिना बताये कर दिया गया और  अवशेष भी  अभी तक  नहीं दिए गए | लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं होने के कारण चीन में किसी तरह का होहल्ला नहीं मचा | इसलिए ये कहना तर्कसंगत नहीं है कि चीन ने तो भारत से ज्यादा जनसंख्या होते हुए भी कोरोना को कुछ ही  महीने  में नियंत्रित कर लिया जबकि  हमारी आबादी तो उससे काफी कम है |

चीन और भारत की शासन व्यवस्था में चूँकि जमीन आसमान का अंतर है इसलिए भारत को इस महामारी पर नियन्त्रण करने में जो सबसे बड़ी परेशानी आ रही है वह है विशाल जनसंख्या | वैसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कारण भारत अपनी तुलना अमेरिका से कर सकता है | लेकिन यहाँ भी  जबरदस्त विरोधाभास और विषमता है | अमेरिका की  जनसंख्या 33 करोड़ होने के बाद भी उसका क्षेत्रफल भारत से तकरीबन तीन गुना ज्यादा है | अर्थव्यवस्था के मामले में भी ऐसी ही विषमता है | दुनिया की दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश के बीच 105 करोड़ जनसंख्या का अंतर है | वहीं संसाधनों के मामले में तो अमेरिका वैसे भी हमसे कई गुना आगे है |

ऐसे में अमेरिका जैसे विशाल भूभाग और सबसे सम्पन्न देश में जब 13 लाख 53 हजार लोग कोरोना  संक्रमित हो गए और 80 हजार से भी ज्यादा मारे जा चुके हों तब भारत सरीखे देश में  अब तक लगभग 70 हजार ही संक्रमित मामले सामने आये जिनमें से लगभग 2500 की मृत्यु हुई  वहीं लगभग 22 हजार  ठीक होकर घर जा चुके हैं | अपनी सम्पन्नता और उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा पर इतराने वाला अमेरिका भारत के इन आंकड़ों को देखकर मन ही मन कुढ़ता तो जरुर होगा | 

लेकिन दुनिया की दूसरी  और तीसरी सबसे ज्यादा  आबादी वाले देश के बीच यदि जनसंख्या  का अंतर इतना ज्यादा नहीं होता तब कोरोना संबंधी आंकड़ों में अमेरिका से कई गुना बेहतर होते  हुए भी भारत जिन दूसरी  समस्याओं से जूझ रहा है उनके कारण कोरोना से पूरी ताकत से लड़ने की बजाय अन्य मोर्चों पर शासन और प्रशासन को उलझना पड़ रहा  है | इनमें सबसे बड़ी है   असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों को उनके मूल निवास तक पहुंचाना | लॉक डाउन के कारण जो जहाँ था उसे वहीं रुकने का निर्देश मिलने के महज कुछ दिनों बाद दिल्ली सहित देश के अनेक हिस्सों से जो जनसैलाब सड़कों पर निकल पड़ा उसने उन तमाम एहतियातों और सावधानियों को कचरे की टोकरी में फेंक दिया जो कोरोना से लड़ने के लिए आधारभूत जरूरत थीं | प्रधानमंत्री ने  ग्रामीण भारत को कोरोना से बचाए रखने के बारे में मुख्यमंत्रियों के समक्ष जो चिंता जताई वह उस भावी खतरे का संकेत है जिसकी कल्पना तक रोंगटे खड़े कर देती है | पहले सरकार इस बात के लिए घेरी जा रही थी कि वह बेरोजगार हुए मजदूरों को उनके घर तक पहुँचाने का इंतजाम नहीं कर रही | जब श्रमिक एक्सप्रेस चलने लगीं तब कहा जा रहा है इससे कोरोना देश भर में फैल जायेगा |

गरीबों  को राशन और नगद राशि के साथ ही मुफ्त रसोई गैस भी दी गई | लेकिन दावा किया  जा रहा है प्रवासी मजदूरों को ऐसा कोई लाभ नहीं मिल सका  क्योंकि उनका पता - ठिकाना स्पष्ट नहीं होने से वैसा करना संभव नहीं हुआ | जिन राज्यों में  वे कार्यरत थे उनकी सरकारों को भी वे दो चार दिन में ही बोझ लगने लगे |

पूरा मंजर हम सबके सामने है | कोई सरकार का बचाव कर रहा है तो कोई उसे कठघरे में  खड़ा करने पर आमादा है | लेकिन इस विषम स्थिति में एक बार फिर बढ़ती  जनसंख्या का मुद्दा बिना कुछ  कहे  प्रासंगिक हो चला है | विकास दर और सकल घरेलू उत्पादन के आंकड़ों की फसल चाहे जितनी भी लहलहाये किन्तु कोरोना के कारण उत्पन्न हालातों में गरीबों का अपने गांवों की ओर चिलचिलाती गर्मी में चल पड़ना महज कुछ दिनों की हेड लाइन न होकर इस बात की चेतावनी है कि इस बोझ को यूँ ही बढ़ने दिया तब भविष्य में छोटी - छोटी आपदाएं भी भयंकर साबित होंगीं |

प्रश्न है , किया क्या जाए और सीधा सपाट उत्तर है जनसंख्या नियन्त्रण क़ानून | समय - समय पर इसकी चर्चा तो चला करती है लेकिन होता कुछ नहीं है | दरअसल इसे अल्पसंख्यक  विरोधी मान लिये जाने के कारण उसका जिक्र होते ही सियासी  तलवारें म्यान से बाहर आने लगती हैं | लेकिन कोरोना ने साबित कर दिया कि हमारे सारे इंतजाम और कार्य कुशलता  आबादी का  बोझ कंधो पर लादते ही लड़खड़ा जाते हैं |

ऐसे में जब कोरोना  के बाद भारत का आर्थिक , और सामाजिक ढांचा काफी कुछ बदलना  तय है तब आबादी के असीमित विस्तार को रोकने के लिए जनसंख्या नियन्त्रण कानून लाकर अर्थव्यवस्था के साथ ही बाकी  व्यवस्थाओं पर पड़ने वाले बोझ को हल्का करना भारत के सुखद भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है |

कुछ लोग ये भी कहेंगे कि फिलहाल इस विषय को छेड़ने की क्या  जरूरत है क्योंकि इसकी चर्चा शुरू होते ही पक्ष - विपक्ष में तू - तू , मैं  - मैं शुरू हो जायेगी | लेकिन जिस तरह कोरोना के चलते ही भविष्य के संकटों का सामना करने का तंत्र तैयार करने की कार्ययोजना बनाई जा रही है ठीक उसी तरह जनसँख्या के विस्तार को नियोजित करने की तैयारी भी तत्काल प्रारम्भ होनी चाहिए |

संसद के मॉनसून सत्र में इसे पेश करना पूरी तरह से देश के हित में होगा | इसके अंतर्गत नव दंपत्तियों को अधिकतम दो बच्चों की अनुमति होनी चाहिए और इससे ज्यादा वाले को सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित रखने का प्रावधान किया जावे | चीन ने तो एक समय सरकार की अनुमति लिए बिना नव दम्पत्तियों द्वारा संतान उत्पन्न करने पर ही रोक लगा रखी थी | उसका उसे लाभ भी हुआ और जनसंख्या वृद्धि की उसकी दर भारत से काफी कम हो गई | वहीं हमारे देश में वोटबैंक खिसक जाने के भय से परिवार कल्याण कार्यक्रम पर विस्मृति की धूल जमती गई |

कोरोना के बाद  भारतीय  अर्थव्यवस्था में उछाल की जो उम्मीदें लगाई जा रही हैं वे आबादी की अनियंत्रित वृद्धि के चलते हवा हवाई होकर रह जायेंगी | कोरोना  के हॉट स्पॉट जहां - जहाँ भी हैं वहां की ज्यादा जनसँख्या संक्रमण फ़ैलाने में मददगार हुई है | कोरोना ने चिकित्सा तंत्र को सुदृढ़ करने की जो आवश्यकता बताई  उसके लिए भी जनसंख्या के विस्तार का विकास दर के साथ समन्वय बिठाना  पड़ेगा | चीन ने ये कर दिखाया जिसके कारण वह तेजी से तरक्की कर सका |

ये ऐसा विषय है जिसका आम जनता समर्थन करेगी | आर्थिक प्रगति  और प्राकृतिक  संसाधनों के न्यायोचित बंटवारे के लिए जनसंख्या वृद्धि को राष्ट्रीय कर्तव्य के साथ जोड़ना होगा | वरना गरीबी  के बाद गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी तो हमने बना ली लेकिन आबादी इसी तरह बढ़ती  गयी तो इसके बाद कौन सी श्रेणी बनाई  जायेगी ये समझ से परे है |

कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए कठोर फैसले करना राष्ट्रहित में होता है | कोरोना ने जो घाव हमें दिए हैं उन्हें भरने के लिए जिन उपायों को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ अमल में लाना चाहिए उनमें जनसँख्या नियन्त्रण कानून  फेहरिस्त में  सबसे ऊपर है | इसके पारित होने पर हंगामा करने वाले जब देखेंगे कि हेकड़ी दिखाने पर उन्हें मिलने वाली सरकारी खैराते बंद  हो जायेंगीं तब वे भी उस कानून का पालन करने प्रेरित और प्रोत्साहित होंगे |

शिक्षा और स्वास्थ्य को पूरी तरह निःशुल्क करने के सुझाव भी यदा - कदा  आया करते हैं और सरकार इस दिशा में सोचती भी है लेकिन ज्योंही उसकी नजर आबादी में वृद्धि की तेज रफ्तार पर जाती है तो उसके पाँव ठिठक जाते हैं |   जनसंख्या नियन्त्रण करने के लिए कानून बनाने का ये सबसे अच्छा समय है क्योंकि अधिकतर को समझ में आ गया है कि आबादी का विस्फोट कितना खतरनाक है ?

मध्यम वर्ग के मन में अफ़सोस भी है और आक्रोश भीबिना उसमें उत्साह जगाए बाजार गुलजार नहीं हो सकते




सोशल मीडिया पर प्रसारित हर जानकारी प्रामाणिक और विश्वसनीय नहीं होती | व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी नामक  व्यंग्य खूब सुनने में आता है | कोई मैसेज आते ही बिना उसकी सत्यता परखे उसे आगे बढ़ाने के कारण भ्रम की  स्थिति भी बन जाती है | लेकिन ये भी सही है कि विचारों और सूचनाओं के आदान - प्रदान के  इस माध्यम ने संपर्कों को जो वैश्विक स्वरूप प्रदान किया वह अकल्पनीय और अत्यंत क्रांत्तिकारी है | तमाम विसंगतियों के बावजूद सोशल  मीडिया कोरोना संकट के दौरान लॉक डाउन में विचारों के सम्प्रेषण के साथ ही विभिन्न विषयों पर जीवंत बहस एवं विमर्श का सशक्त माध्यम बन गया | अख़बारों के वितरण में आई रुकावटों एवं टीवी समाचारों में दोहराव के साथ ही एकरूपता से लोग सोशल मीडिया की और उन्मुख होते गये |

बड़ी - बड़ी हस्तियों ने इस माध्यम  की ताकत और पहुंच को महसूस करते हुए इसके जरिये लोगों तक अपनी बात पहुँचाने का जो प्रयास किया वह आने वाले समय में समाचार और विचार संप्रेषण के नये तौर - तरीके ईजाद करने का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा | सबसे बड़ी बात ये है कि इस माध्यम में अभिव्यक्ति पर पर कोई बंदिश नहीं है | स्वछ्न्दता और गैर जिम्मेदारी का परिचय देने वाले भी बहुतेरे हैं लेकिन उसके बाद भी सकारात्मक सोच और वैचारिक मंथन को इसकी वजह से जो अवसर और अधिकार मिला वह अपने आप में बड़ी उपलाब्धि है |

और ऐसा ही एक विचार आज एक वीडियो के माध्यम से मेरे संज्ञान में आया जिसमें निजी कम्पनी में कार्यरत एक मध्यमवर्गीय  युवा और उसकी पत्नी मौजूदा हालात और उसके बाद की परिस्थितियों पर आपस में बातचीत करते दिखाए गये  थे | उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण कर्ज की वे किश्तें हैं जिन्हें भरने के लिए बैंक ने तीन महीने की छूट  तो दे  दी थी लेकिन किश्त नहीं भरने से उन पर ब्याज का बोझ  और बढ़ जाएगा | सरकारी निर्देश पर बिजली का बिल भरने के लिए भी लॉक डाउन रहने तक की  छूट मिल गयी थी लेकिन बिजली वाले फोन करते हुए ऑन लाइन भुगतान का दबाव बनाये हुए हैं | ऊपर से अप्रैल महीने का बिल बिना मीटर रीडिंग किये ही पिछले साल के बराबर आ गया जबकि अभी तक  उनका एयर कंडीशनर चालू नहीं हुआ | इलेक्ट्रिशियन नहीं मिलने से विंडो कूलर भी नहीं लगा | जब इस ओर ध्यान दिलाया गया तो बिजली वाले बोले अभी जमा कर दीजिये , जब रीडिंग होगी  तब अगले बिल में समायोजन हो जाएगा | लॉक डाउन के कारण  मार्च के  अंत  में नगर निगम का टैक्स भी जमा  नहीं हो सका और अब निगम वाले भी दिन भर मैसेज भेज कर याद दिलवा रहे हैं |

बच्चों का स्कूल बंद होने के बावजूद ऑन लाइन क्लास लगाकर फीस वसूल ली गयी | जिस फ़्लैट में वे रहते हैं उसका मकान मालिक यूँ तो बहुत ही सज्जन है लेकिन किसी न किसी बहाने किराया वसूल ही लेता है | सबसे बड़ी चिंता का विषय ये है कि अप्रैल का वेतन अभी तक खाते में जमा नहीं हुआ जबकि लॉक डाउन के बाद भी वर्क फ्रॉम होम के अंतर्गत  सुबह  से शाम तक काम  करना पड़ रहा  है | और अब संकेत हैं कि वेतन कुछ कटकर मिलेगा और हो सकता है मई के बाद कुछ स्टाफ कम भी हो जाये | ये भी पता चला है कि कम्पनी दरअसल कर्मचारियों को नौकरी जाने का भय दिखाकर कम वेतन पर काम करने के लिए राजी करने की योजना बना रही है |

चूँकि मौजूदा समय में कोई विकल्प  नहीं है इसलिए कर्मचारी कम्पनी की सभी शर्तें मानने राजी हो जायेंगे | क्योंकि नौकरी बची रहना  भी  बड़ी राहत का विषय है किन्तु बात अचानक दूसरी ओर घूम जाती है | पत्नी ने बताया  कि अपने यहाँ जो नौकरानियाँ  काम करती है उनको  सस्ती दरों  पर अनाज के अलावा कुछ मात्रा में चावल - गेंहू मुफ्त भी मिले और रसोई गैस के तीन सिलेंडर भी निःशुल्क सरकार दे रही है | उनके मोहल्ले में सरकारी गाड़ियाँ आकर भोजन के पैकेट भी  दे जाती हैं | और कुछ नगदी उनके बैंक खातों में भी जमा हुई है | लेकिन अपने जैसों को क्या कुछ भी नहीं मिलेगा ? इस पर पति ने ऊंचे स्वर में कहा कि सरकार इन लोगों की ही परवाह करती है | फिर उसने बताया कि व्यापारी - उद्योगपति भी एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाकर राहत पैकेज मांग रहे हैं } सुना है एक दो दिन में ही उसका ऐलान भी हो जायेगा | बैंक इस संकट से निपटने के लिए उनको कम ब्याज दर पर और कर्ज देने को तैयार हैं | रिजर्व बैंक नें भी इस बारे में काफी फैसले हाल में किये हैं | लेकिन गरीबों और उद्योग - व्यापार जगत के बीच जो भारत की विशाल  मिडिल क्लास है उसकी तरफ सरकार देख तक नहीं रही | जबकि लॉक डाउन ने उसकी कमर  भी तोड़ी है |

ये कहते हुई पति - पत्नी आने  वाले कुछ महीनों का हिसाब लगाने  बैठे तब उनके माथे पर चिंता की लकीरें और गहरी हो गईं | अपने गृहनगर में बन रहे  मकान के  लोन की किश्त शुरू होते  ही वाहन लोन अटक जायेगा | दोनों भरें तो जीवन बीमा प्रीमियम और उसके अगले महीने हैल्थ इंश्योरेंस की प्रीमियम में परेशानी आयेगी | आगामी  दीपावली पर पुराना फर्नीचर हटाकर नया लेने की ख्वाहिश भी पूरी होने से रही |  |

उसके बाद दोनों ने विवाह के बाद की ज़िन्दगी से आज तक की यादों का पिटारा खोला तो निष्कर्ष ये निकला कि उनका जीवन  किश्त चुकाते ही बीतता आया है | घरेलु उपकरणों से शुरु होकर कार तक उन्होंने किशतों में खरीदी | परिवार और मित्रों में उनके अच्छे रहन - सहन की चर्चा भी होती है | लेकिन सुख - सुविधा के सारे साधन उन्होंने कर्ज की किश्तें चुकाकर ही जुटाए हैं | शायद वे ऐसा नहीं भी करते लेकिन गरीबों के मुकाबले बड़े आदमी दिखने और अमीरों की निगाह में गरीब नजर नहीं आने की  सोच ने उन पर किश्तों का कभी न खत्म होने वाला बोझ लाद दिया | भविष्य की उनकी योजना में बेटे को उच्च शिक्षा हेतु विदेश भेजने की भी है जिसके लिए कर्ज लेने की मानसिकता उन्होंने  अभी से बना ली है |

उक्त वीडियो और उसमें दिखाई गई बातें किसी लघु फिल्म का हिस्सा जैसी हैं लेकिन ये भारत के उस मध्यम वर्ग का सही चित्रण है जो गरीब और संपन्न वर्ग के बीच में अपनी  सम्मानजनक स्थिति बनाये रखने  की जद्दोजहद में ही उलझा रहता है | तकरीबन चार दशक पहले प्राणनाथ सेठ नामक लेखक की एक पुस्तक न्यूयॉर्क से होनोलुलू पढ़ी थी | उसमें भी एक युवा दम्पत्ति के बीच की बातचीत का विवरण देते हुए बताया गया कि पति किश्तों पर कुछ नई चीज खरीदने के लिए कर्ज लेने की बात करता है तो पत्नी उससे आग्रह करती है कि क्यों न उसके पहले हम नर्सिंग होम की बकाया किश्तें चुका दें जिससे अपना बच्चा पूरी तरह  हमारा हो जाये | हो सकता है वह बातचीत लेखक के अपने दिमाग  की कल्पना  हो लेकिन मध्यमवर्गीय परिवारों की ज़िन्दगी ऐसी ही सच्चाइयों से भरी रहती है |

लॉक डाउन से उत्पन्न हालातों में इस वर्ग के मन में इस बात का अफ़सोस भी है और आक्रोश भी कि संकट के इस दौर में सरकार का ध्यान या तो गरीबों पर जा रहा है या फिर अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने के लिए उद्योगपति - व्यवसायी पर , जबकि कोरोना संकट ने उसके भविष्य को भी अनिश्चित और असुरक्षित बना दिया है | उसे इस बात की भी शिकायत है कि वह भी करदाता है लेकिन समूची व्यवस्था में उसके लिए ऐसा कुछ नहीं होता जिससे उसे लगे कि व्यवस्था उसकी तकलीफों के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील है | इस वर्ग में केवल नौकरपेशा ही नहीं लघु और मध्यम कारोबारी भी शमिल हैं |

इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत में उदारवाद को सफल बनाने में इस मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा योगदान रहा है , जिसने कर्ज लेकर आसान किश्तों को ही अपना जीवन बना लिया | बड़े लोगों के पास तो पहले भी कार होती थी | लेकिन भारत में औटोमोबाइल उद्योग को कल्पनातीत सफलता दिलवाने में इसी मध्यमवर्ग का  हाथ है | माइक्रोवेव , रेफ्रिजरेटर , वाशिंग मशीन , दो पहिया वाहन , एयर कंडीशनर , कम्प्यूटर , लैपटॉप , मोबाईल , एलईडी टेलीविजन  जैसे उपकरण का बाजार भी विकसित नहीं होता यदि मध्यमवर्ग इन्हें नहीं अपनाता |

एक -  दो दशक पहले तक यही वर्ग लघु बचत का सबसे बड़ा स्रोत हुआ करता था लेकिन  अब उसका स्थान किश्तों या ईएमआई ने ले लिया जो कि एक बहुत बड़ा बदलाव है | मौजूदा संदर्भ में इस वर्ग की अपेक्षाएं गलत नहीं हैं | गरीब की मदद करना तो इंसानियत का फर्ज  है और कारोबारी वर्ग की सहायता देश की आर्थिक सेहत के लिए जरूरी है | ऐसे में मध्यम वर्ग का ये सोचना गलत नहीं है कि उसे घर की मुर्गी दाल बराबर और Take for Granted मान  लिया गया है |

ये बात भी सही है कि इस वर्ग की कोई सामूहिक आवाज नहीं है |   लेकिन कोरोना के बाद की सामाजिक रचना को लेकर हो रहे विचार मंथन में मध्यम वर्ग के सामाजिक और आर्थिक महत्व को समझकर उसके हितों के संरक्षण की भी बराबरी से व्यवस्था होनी चाहिए |

अन्यथा सबका साथ भले मिल जाए लेकिन सबका विकास नहीं हो सकेगा | 

क्योंकि मध्यम वर्ग में उत्साह जगाए बिना बाजारों में रौनक नहीं लौट सकती |

प्रवासी मजदूर : न चंदा देने की हैसियत और न हड़ताल की हिम्मत ट्रेडयूनियनों की साख और धाक दोनों खतरे में

प्रवासी मजदूर : न चंदा देने की हैसियत  और न  हड़ताल की हिम्मत

टेड यूनियनों  की  साख और धाक दोनों खतरे में

यदि लॉक डाउन की वजह से देश के विभिन्न हिस्सों से प्रवासी श्रामिकों की वापिसी राष्ट्रीय समस्या न बनती तब शायद देश के लोगों को इस सच्चाई का पता ही नहीं चलता कि अपना गाँव -  देस छोडकर सैकड़ों मील दूर पूरी तरह अपरिचित माहौल में बतौर मजदूर काम करने वालों की संख्या  सैकड़ों , हजारों नहीं बल्कि लाखों से भी ऊपर  है | लॉक डाउन के बाद की  स्थितियां जब असहनीय होने लगीं और कोई  विकल्प नहीं मिला तो लाखों लोग पैदल ही लौट पड़े | 

उनके साथ घटी दुर्घटनाओं ने देश का ध्यान आकर्षित किया और तब उनकी गरीबी और बेबसी का बखान हुआ | उनके प्रति हर किसी की सहानुभूति इसलिए है क्योंकि वे श्रमिक हैं और तब सहसा याद आया कि इस देश में श्रमिक संगठनों की भी भरमार है | कांग्रेस , भाजपा , वामपंथी , समाजवादी खेमे के अपने - अपने श्रमिक संगठन हैं | वामपंथियों के दो हिस्से हुए तो श्रमिक संगठन भी  दो हो गए | लेकिन समाजवादी खेमा इतनी बार बिखरा कि उससे जुड़े श्रमिक संगठनों की पहिचान ही नष्ट हो गयी | इनके अलावा शिवसेना , द्रमुक और अद्रमुक तथा तृणमूल जैसे क्षेत्रीय दलों ने भी मजदूरों के बीच अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए संगठन बना रखे हैं |

इन संगठनों के जरिये राजनीतिक दल कर्मचारी वर्ग के साथ ही श्रमिकों को भी अपनी तरफ खींचने का प्रयास करते हैं | हालांकि मजदूर आंदोलनों से उपजे ये संगठन मुख्य रूप से कार्मिक वर्ग के हितों की रक्षा करने के लिए बनाये गये जिससे वेतन या मजदूरी पाने वाले का शोषण न हो | 

सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में जिस तरह का वेतनमान लागू होता गया  उसमें इन संगठनों का योगदान भुलाया नहीं  जा सकता | सेवा निवृत्ति लाभ , अनुकम्पा नियुक्ति , न्यूनतम मजदूरी , काम के घण्टे , अवकाश , चिकित्सा सुविधा , मुआवजा और ऐसे ही अनेक लाभ श्रमिक आंदोलनों की  ही देन है | इसीलिए बैंक , जीवन बीमा , रक्षा उत्पादन जैसे बड़े संस्थानों में राष्ट्रीय स्तर पर हड़ताल करवाने की ताकत इन संगठनों के पास रही  है |

लेकिन इसमें जो धार अस्सी के दशक तक दिखाई देती थी वह अब महसूस नहीं होती | इसकी एक वजह ये भी है कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में वेतन भत्ते इतने आकर्षक  हो गये कि अब लोगों  को ट्रेड यूनियन के आन्दोलन में सड़क पर आकर इंकलाब जिंदाबाद और बोल मजूरा हल्ला बोल जैसी नारेबाजी करने में अपराधबोध की अनुभूति होती  है | यही वजह है कि श्रमिक या कर्मचारी आन्दोलन अब पहले जैसा प्रभाव समाज और सरकार दोनों पर नहीं छोड़ पाते |

इसके पीछे एक बड़ी वजह श्रमिक संगठनों का राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बन जाना भी रहा | जिसके कारण अपना मुख्य लक्ष्य भूलकर वे दलीय विचारधारा के प्रसार में लग गये | श्रमिक नेताओं का उपयोग  करने के लिए उनकी पालक पार्टी ने उन्हें विधायक , सांसद और मंत्री बनाना शुरू कर दिया | सत्ताधारी पार्टी से जुड़े श्रमिक नेताओं को श्रम विभाग के अंतर्गत अनेक समितियों में मनोनीत करते हुए उपकृत किया जाना आम है  | सरकारी सुविधाएँ  भी दी जाने लगीं | अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में विदेश घुमाया जाने लगा। और धीरे - धीरे ट्रेड यूनियनों पर पेशेवर नेताओं का आधिपत्य होता गया |  सरकार अथवा प्रबंधन के साथ निकटता के कारण हितों के आदान प्रदान का सिलसिला भी इसी के चलते शुरू हुआ |

कहने का आशय ये कि  राजनीतिक दलों  के साथ -  साथ श्रमिक संगठन भी ईमानदारी , समर्पण , निःस्वार्थ सेवा तथा जनता के हितों के लिए संघर्ष की क्षमता जैसे गुणों से दूर होते - होते केवल संगठित क्षेत्रों तक ही सिमटकर रह जो कि सुविधाभोगी माना जाने लगा है | इस वर्ग के  छोटे - बड़े  कर्मचारी या अधिकारी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के प्रस्ताव का इंतज़ार करते रहते हैं |  लेकिन इसके चलते श्रमिक आन्दोलन अपनी राह से भटक गया जिसका उदाहरण आज देश में सड़कों पर चले जा रहे वे  प्रवासी मजदूर हैं जो असंगठित क्षेत्र के होने की वजह से श्रमिक संगठनों की अनदेखी और उपेक्षा के शिकार होकर निराशा में डूबकर अपनी बदकिस्मती का बोझ कंधे पर उठाये चले जा रहे हैं , उस रास्ते पर जिसका अंत कब , कहां और कैसे होगा ये उन्हें नहीं पता | 

जिन जगहों पर ये काम करते थे वहां इनकी दुर्दशा देखने कोई श्रमिक संगठन या नेता नहीं आया | न ही किसी ने राज्य सरकार से मिलकर उन्हें राहत दिलवाने की पहल की | राष्ट्रीय स्तर पर भले ही चिट्ठियाँ और ज्ञापन भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई हो लेकिन कोई मैदानी प्रयास देखने नहीं मिला | प्रश्न ये है कि लाखों की संख्या वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बिना श्रमिक आंदोलन की कल्पना कैसे की  जा सकती है ? श्रमिक  नेताओं के रूप में स्थापित राजनीतिक दलों के कृपापात्र इस दौर में जिस तरह किसी मांद में जाकर छिपे उससे प्रवासी मजदूर नेतृत्व और दिशाविहीन होने के साथ ही खुद को असहाय और ठगा सा महसूस कर रहे हैं  |

राजनीतिक दलों के तौर - तरीके केवल अपने नफे नुकसान तक सीमित रहते हैं | जबकि श्रमिक संगठन शोषण के विरुद्ध और मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए हर समय संघर्ष करने के लिए बनाये गये थे | लेकिन इन लाखों असंगठित प्रवासी मजदूरों को शायद इसलिये बेसहारा छोड़ दिया गया क्योंकि वे यूनियन को चंदा देने की स्थिति में नहीं होते | रोज कमाने और रोज खाने की उनकी मजबूरी उन्हें किसी भी  हड़ताल , धरना या प्रदर्शन में हिस्सा लेने से भी रोक देती है |

पूंजीवाद , समाजवाद , उदारवाद जैसे शब्द उनकी जिन्दगी रूपी शब्दकोश में हैं ही नहीं | बुर्जुआ और सर्वहारा भी वे नहीं समझते | और इसी कारण वे किसी श्रमिक संगठन की भीड़ बढ़ाने का जरिया नहीं बन पाये  | बीते लगभग डेढ़ महीने में श्रमिक आन्दोलन की उपस्थिति कहीं नहीं दिखाई दी | यदि किसी से पूछें कि राष्ट्रीय स्तर के किसी ट्रेड यूनियन नेता का नाम बताओ तो वह सोच में पड़ जाएगा | स्थानीय  स्तर पर भी पहले कर्मचारी और श्रमिक नेताओं का जो दबदबा  था , वह भी नहीं दिखता |

ये स्थिति खतरनाक संकेत दे रही है | जो लाखों  प्रवासी श्रमिक इन दिनों सड़कों पर नजर आ  रहे हैं , उनके भविष्य के बारे में नहीं सोचा गया तो वे देश के भविष्य पर भारी पड़ जायेंगे | असंगठित होना भले ही आज  इनका अपराध और कमजोरी लग रही  हो लेकिन इनके प्रति उपेक्षा  का भाव कोरोना के बाद के हालातों को  और चिंताजनक बना देगा | 

श्रमिक संगठनों द्वारा इनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाना उनमें आये चारित्रिक बदलाव का प्रमाण तो है ही लेकिन उससे ये संकेत भी  मिल रहा है कि भारत में श्रमिक संगठन  क्रमशः समाप्ति की ओर बढ़ चले है | इसका एक प्रमुख कारण सोवियत संघ का विघटन होने के बाद चीन का पूंजीवादी हो जाना भी है जिसके परिणामस्वरूप भारत में साम्यवादी पार्टियों का प्रभावक्षेत्र लगातार सिमटता जा रहा है | एक समय उनकी समूची राजनीति किसान और मजदूर के नाम पर चलती थी | किसानों के अपने नेता बन गये और बढ़ते वेतन के कारण संगठित क्षेत्र खुद को श्रमिक कहलाने में लजाने लगा |

2004 में जब सीपीएम महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत ने इस देश में पूंजीवादी उदारवाद और पश्चिमी देशों के हितों को सुरक्षित रखने  वाली मुक्त अर्थव्यवस्था के  जनक डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन देने के लिए वामपंथी दलों को राजी किया , उसी दिन से साम्यवादी पार्टियों का वैचारिक भटकाव शुरू हो गया । जिसकी वजह से श्रमिक आंदोलन पर वामपथी पकड़ कमजोर पड़ते - पड़ते समाप्ति पर आ गयी | जहाँ तक कांग्रेस के मजदूर संगठनों की हालत है तो वे उसी की तरह कमजोर होते जा रहे हैं और भाजपा समर्थक श्रमिक संगठन न चाहते हुए भी चुप रहने मजबूर  हैं |

ऐसे में राजनीतिक स्वार्थ दूर रखकर सभी दलों को इन मौन प्रवासी कर्मवीरों के भविष्य को सुरक्षित बनाने का पक्का इंतजाम करना चाहिए | रही बात श्रमिक संगठनों की तो वे अपनी प्रासंगिकता खो ही चुके हैं | और आखिर में वे भी करेंगे तो वही जो उनके राजनीतिक आका हुक्म देंगे |