Monday, 18 May 2020

कोरोना : एक लाख का आंकड़ा बड़ी चिंता का कारण



ये तो तय हो गया कि लॉक डाउन 31 मई तक रहेगा। जैसा प्रधानमंत्री ने बताया अब उसके रंग रूप में कतिपय बदलाव जरुर कर दिए जायेंगे। अर्थात पहले से ज्यादा छूट मिलेगी लेकिन वह कैसी और कितनी होगी ये राज्य सरकारें और उनके स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी निश्चित करेंगे। लेकिन लॉक डाउन का यह चौथा चरण भी कोरोना का विदाई सत्र नहीं लगता। जिस तरह से नए मरीज बढ़ रहे हैं वह देखते हुए आज रात तक कुल संक्रमित लोगों की संख्या एक लाख को छू जायेगी। लेकिन तीन हजार के करीब मौतों के बाद भी 38 फीसदी अर्थात 36 हजार मरीजों का स्वस्थ हो जाना आशा जगाने वाला है। ठीक होकर घर लौटने वालों का आंकड़ा निरंतर बढऩे से स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति विश्वास जागा है और अब लोग जाँच करवाने से भी नहीं डर रहे। जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार शहरों में हॉट स्पॉट बने हुए संक्रमित इलाकों में पूरी तरह सख्ती बनाये रखते हुए बाकी क्षेत्रों में नियन्त्रण के साथ व्यापारिक गतिविधियां सामान्य करने का फैसला लिया जा सकता है। बीते तकरीबन दो माह में जनता और शासन - प्रशासन कोरोना के साथ रहना सीख गये हैं। हालांकि अब भी लापरवाही कम नहीं है लेकिन जनजीवन को और लम्बे समय तक रोककर नहीं रखा जा सकता। किराना, दवाइयां, पेट्रोल, दूध, सब्जी - फल आदि की आपूर्ति होते रहने से भले ही लॉक डाउन के बावजूद जीवन चलता रहा लेकिन बाकी व्यवसायी इस दौरान आर्थिक संकट में फंसकर रह गये। ऐसे में भले ही सीमित अवधि के लिए ही क्यों न हो किन्तु दुकानें खुलनी चाहिए। इसी तरह सायकिल और ऑटो रिक्शा जैसे परिवहन भी शुरू हों। बाजार खुलने से उन मजदूरों को लाभ मिलेगा जो माल लाने - ले जाने का काम करते हैं। अनाज मंडी बंद रहने से वहाँ कार्यरत हम्मालों का रोजगार चला गया। कहने का आश्य ये है कि बाजार से केवल दुकानदार, उसके कर्मचारी और ग्राहक ही नहीं बल्कि एक लम्बी श्रृंखला आपस में जुड़ी होती है। दो महीने के अंतराल के बाद व्यवसाय को गति पकड़ने में समय लगेगा। कोरोना के भय से अनेक लोग खासकर बुजुर्गवार तो घरों से निकलने में संकोच करेंगे। इसी के साथ कड़वा सच ये भी है कि है आज के समाज में बड़ी संख्या में ऐसे बुजुर्ग दम्पत्ति रह रहे हैं जिनके बेटे - बेटी या तो विदेश में हैं या फिर शहर से बाहर। होम डिलीवरी का चलन इस दौरान काफी बढ़ा है और दुकानदार भी ग्राहकों से मोबाईल पर निरंतर सम्पर्क करते हुए ऑर्डर ले रहे हैं। लेकिन बाजार तो बाजार है और बिना उसके खुले जि़न्दगी में आया ठहराव दूर नहीं हो सकेगा। आवागमन के साधन भी शुरू होना ज़रूरी लगता है लेकिन लॉक डाउन के चौथे चरण में अपेक्षित छूट भी इस बात पर निर्भर करेगी कि जनता का उसके बाद कैसा आचरण रहता है ? कोरोना के फैलाव को रोकना अभी भी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। शारीरिक दूरी, मास्क और हाथ धोने जैसी चीजों के प्रति लोग जागरूक हुए हैं लेकिन अभी भी एक वर्ग ऐसा है जिसे नियमों का पालन करने में अपमान महसूस होता हैं। ऐसे लोगों पर नजर रखी जानी चाहिए। मुस्लिम समाज के ऐसे ही कुछ बददिमाग लोगों की वजह से आज इस समुदाय में कोरोना संक्रमण का फैलाव अत्यंत तेजी से हुआ। लेकिन ये आशंका भी है कि जनजीवान के सामान्य होते ही अभी तक बना रहा अनुशासन कहीं टूट न जाए। क्योंकि जरा सी चूक से ग्रीन ज़ोन कब रेड ज़ोन में तब्दील हो जायेगा कहना कठिन है। दरअसल दो माह की देशबंदी ने समाज के हर तबके को जबरर्दस्त मुसीबत में डाल दिया है। विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए तो ये हालात किसी डरावने सपने से कम नहीं हैं। एक अदृश्य भय सभी के मन में बैठ गया है। परिवार के साथ बाहर जाना खतरे से खाली होने से घर की चहारदीवारी के भीतर कैद रहना मजबूरी बन गयी है। जिस घर में बुजुर्ग ज्यादा हों वहां वैसे भी डर मन के भीतर घुसकर बैठ गया है। स्कूल बंद होने से बच्चे दो माह से कहीं जा नहीं सके। और छूट मिलने के बाद भी माता-पिता उन्हें बाहर ले जाने में हिचकेंगे। इस तरह लॉक डाउन का चौथा चरण भी एक तरह की परीक्षा ही है। इसमें उत्तीर्ण न होने पर लॉक डाउन भी बढ़ता जाएगा। जानकारों के अनुसार मई माह तो गाँव लौट रहे मजदूरों के इंतजाम में चला जायेगा। उसके बाद ये देखना होगा कि नए संक्रमित मरीजों की संख्या में कमी आती है या नहीं। क्योंकि अगर ये सिलसिला इसी तरह जारी रहा तब तो फिर जैसा एम्स दिल्ली के डायरेक्टर ने आशंका जताई कि कोरोना का सर्वोच्च जून और जुलाई में आयेगा। और उस स्थिति में लॉक डाउन में की जाने वाली शिथिलता वापिस भी की जा सकती है। ये सब देखते हुए जहां भी छूट मिलती है वहां के सभी लोगों को शारीरिक दूरी के साथ ही दूसरी जरूरी सावधानियां रखनी होंगी क्योंकि एक की गलती पूरे शहर को भारी पड़े बिना नहीं रहेगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि शुरुवाती दौर में तबलीगी जमात के अनुयायियों ने यदि अराजक हालात न पैदा किये होते तो बड़ी बात नहीं भारत कोरोना से जीतने के कगार पर आ गया होता। खैर, जो हो गया सो हो गया लेकिन आगे पूरी तरह सावधानी की जरूरत है। संक्रमितों की संख्या एक लाख तक पहुंचना बड़ी चिंता का कारण है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

गाँव - मोहल्ले में आत्मनिर्भरता के बाद भी सब एक दूसरे पर निर्भर थे परिवारों की टूटन से सामाजिकता के संस्कार भी कमजोर पड़े



मेरे बचपन का गाँव आत्मनिर्भर था किन्तु गाँव का हर व्यक्ति एक दूसरे पर निर्भर था | सहकारिता की अर्थव्यवस्था में गाँव में अमन - चैन और खुशहाली का भाव था , जो आज कहीं खो गया है | फेसबुक पर मित्रवर लक्ष्मीकांत शर्मा की उक्त पोस्ट ने मेरा ध्यान ही नहीं खींचा मानो एक  दिशा दिखा दी | मुझे ये स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि गाँवों से मेरा किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है | लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि बचपन से गाँवों में मेरा आना जाना रहा है | यहाँ तक कि मैं ऐसी कुछ बारातों में भी शामिल रहा जो किसी गाँव में आज  की तरह केवल एक रात नहीं अपितु तीन दिन ठहरीं | मेरे ननिहाल में पुरानी जमींदारी होने से गर्मियों की  छुट्टियों में नाना जी के साथ ग्रामीण इलाके देखने  का भी खूब मौका मिला किन्तु  उसके पीछे आकर्षण खुली जीप में धूल भरे रास्तों पर घूमना ज्यादा था | लेकिन ग्रामीण भारत का जो  रेखाचित्र किशोरावस्था से मानसपटल पर अंकित हुआ उसके रंग बहुत ही पक्के होने से आज तक हल्के नहीं पड़े |

और फिर बतौर अधिकारी लगभग साढ़े तीन वर्ष तक राष्ट्रीयकृत बैंक की ग्रामीण शाखा के प्रबन्धक के रूप में सेवाएं देने के दौरान भी गाँवों को निकट से देखने और जानने का अवसर मिला | बावजूद उसके ग्रामीण जीवन पर कुछ कहने या लिखने के लिए मैं स्वयं को पात्र नहीं मानता |

लेकिन लक्ष्मीकांत जी ने बहुत  ही कम शब्दों में गाँवों के सामाजिक ढांचे  के साथ आर्थिक नियोजन का जो खाका खींच दिया वह एक तरह का सूत्र है जिसकी सहायता से भारत की आत्मा से साक्षात्कार किया जा सकता है | लेकिन मैं इसके आधार पर  हमारी उस मोहल्ला व्यवस्था को स्मृत करना चाहूँगा जो मेरे जीवन से बेहद अंतरंगता से जुड़ी हुई है | हालाँकि मोहल्ले से कॉलोनी में आये भी 36 बरस का लम्बा अरसा बीत गया किन्तु 1956  में हमारा परिवार जबलपुर आया तो शहर के बीचों - बीच स्थित साठिया कुआ नामक मोहल्ले में पहली मंजिल पर किराये का एक मकान हमारा आश्रयस्थल बना | उस मोहल्ले की ख़ास बात ये थी कि उसमें उस जमाने के बहुत बड़े जमींदार , गांधीवादी राजनेता और साहित्यकार ब्यौहार राजेन्द्र सिंह की बखरी थी,  जिससे किसी राजप्रासाद का एहसास होता था   | महात्मा गांधी भी उसमें ठहर चुके थे | अपनी भूदान पदयात्रा के दौरान आचार्य विनोबा भावे को  बखरी में आते मैनें देखा और बाद में जयप्रकाश नारायण जी को भी | जबलपुर छोड़ने के पहले तक आचार्य  रजनीश भी उनसे मिलने आते थे , जो बाद में ओशो नाम से विख्यात हुए |

उस मोहल्ले की सामाजिक रचना इस तरह की थी मानो वह  किसी कम्यून की तरह हर दृष्टि से आत्मनिर्भर हो | सुनार , बढ़ई , नाई , धोबी , घरेलू काम करने वाली जातियां , खेलने हेतु दो मैदान , अखाड़ा  , मलखम्ब , मंदिर , पुजारी , हलवाई , किराना , आटे की चक्की , पान की दुकान ,सार्वजनिक कुए , लड़कियों और लड़कों के लिए माध्यमिक शिक्षा तक का अलग - अलग स्कूल  जैसी समस्त मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध थीं |

वहां रहने वालों में प्रोफेसर , शिक्षक , रक्षा कारखानों के कर्मचारी , वकील , चिकित्सक , पत्रकार , व्यवसायी सभी  पेशों से जुड़े हुए लोग थे | जैसा प्रारंभ में गाँव के बारे में कहा  गया , यहां भी सब अपने आप में आत्मनिर्भर होने के बाद भी एक दूसरे  पर निर्भर थे | सामाजिक समरसता इतनी थी कि किसी भी जाति या पेशे  का बड़ा - बुजुर्ग  आ रहा हो तो उसे हम सम्मान देते थे | और वह भी अधिकारपूर्वक हिदायतें देने या डांटने तक का अधिकार रखता था | जिस नाई से बाल कटवाते वह लाख निवेदन के बाद भी मशीन चला ही देता था | बढ़ई के पास जाकर कहते दादा गिल्ली खो  गयी तो वह थोड़ी सी ना  - नुकुर करने के बाद लकड़ी के किसी  टुकड़े से नई बनाकर चेतावनी भी देता कि अबकी बार गुम हुई तो नहीं बनाऊँगा | हालाँकि उसने अपनी चेतावनी पर कभी अमल नहीं किया |

मोहल्ले के सभी बच्चे साथ खेलते थे | दुर्गा जी की प्रतिमा के लिए एक चबूतरा था | पूरा मोहल्ला उसके लिए  चंदा देता और दशहरा जुलूस में मोहल्ले के लोग प्रतिमा को हनुमानताल में विसर्जित करने जाते | होली पर भी सार्वजनिक चन्दा होता था और जमकर रंग खेला जाता | मोहल्ला  पूरी तरह हिन्दुओं का था लेकिन मोहर्रम के समय एक सुनार और दो कायस्थ सवारी रखते थे जिसमें सभी शामिल होते |

छोटे - बड़े का आधार आयु होती थी , आर्थिक हैसियत नहीं | यही वजह थी ब्यौहार जी से , जिन्हें सब राजा भैया कहते थे , हम बच्चे भी निःसंकोच मिल लेते | स्कूल की छुट्टियों में उनकी विशाल बखरी हम बच्चों का क्रीड़ास्थल रहता था | हमारे मकान  मालिक का अपना एक प्रिंटिंग प्रेस था | 27 साल हमारा परिवार उनका किरायेदार रहा लेकिन कभी विवाद नहीं हुआ | जिस महिला ने बर्तन मांजने का काम शुरू से किया वह मोहल्ला छोड़ते तक काम करती रही |

अति साधारण परिवेश के बावजूद उस मोहल्ले से एक से एक प्रतिभाएं निकलीं | ब्यौहार जी के पुत्र स्व. राममनोहर सिन्हा विश्वप्रसिद्ध चित्रकार थे | आचार्य नन्दलाल बोस के शिष्य के रूप में उन्होंने भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी कला से संवारा था | कुल मिलाकर वह एक सम्पूर्ण इकाई थी जहाँ रहने वाले एक पारिवारिक भावना से बंधे हुए थे | फर्क था तो ये कि पुरुष बाबा , दादा , चाचा , काका या भैया थे तो महिलाएं बड़ी माँ , चाची , काकी या दीदी थीं | अंकल - आंटी संस्कृति का प्रवेश उस समय तक वहां  नहीं हुआ था | छोटे बच्चे पूरे  मोहल्ले में एक घर से दूसरे में खिलाये जाते थे |

वक्त बदला , पीढ़ी बदली , और फिर लोगों का वहां से जाना शुरू हो गया | सायकिल से स्कूटर युग आ चुका था | हम भाई - बहिन बड़े हुए और जगह कम पड़ने लगी तब 1984 में अपने नए मकान में आने को हुए तो पूरा मोहल्ला दुखी था | हम सब भी बेहद भावुक थे | मकान मालिक को पिताजी ने घर की चाबी सौंपते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया तो उलटे उन्होंने पिता जी का हाथ पकड़कर कहा कि आप अपने मकान में जा रहे हैं , ये खुशी की बात है लेकिन हमारी इच्छा तो थी , यहीं  रहते |

जिस कॉलोनी में हम रहने गये उसमें भी 27 साल बिताये  लेकिन उसमें मोहल्ले जैसे सम्बन्ध नहीं बन सके | और बीते  एक दशक से जिस कॉलोनी में रह रहे हैं यहाँ सामाजिक मेलजोल तो काफी है , लेकिन निःसंकोच कहूंगा  कि वह माहौल नहीं है जिसका जिक्र मोहल्ले के संदर्भ  में किया जा चुका है | हालाँकि बढ़ती उम्र इसका कारण हो सकती है किन्त्तु कॉलोनी के बच्चों और युवाओं में भी वैसी  पारिवारिकता नहीं दिखती |

हालांकि ये मेरे अकेले का अनुभव नहीं , अपितु हम  में से न जाने कितनों के मन में भी इसी तरह की अनुभूतियां भरी पड़ी हैं | मोहल्ला छोड़े हुए 36 साल बीत गए | अधिकतर लोग दूसरी  जगह रहने चले गये लेकिन जब भी किसी शादी - ब्याह में मिलना होता है तो थोड़ी देर का वह पुनर्मिलन भावनाओं की  अभिव्यक्ति और सुनहरी यादों को पुनर्जीवित करने  का अवसर बन जाता है | नई पीढ़ी के बच्चों से परिचय पुराने पड़ोसी के रूप में नहीं बल्कि रिश्ते का नाम लेकर करवाया जाता है |

दरअसल हमारे समाज में जो पारिवारिकता थी उसका स्रोत संयुक्त परिवार से मिले संस्कार ही थे | अब चूँकि परिवार हम दो , हमारे दो तक सिमट गए हैं और ताऊ - ताई , चाचा - चाची, मामा - मामी , बुआ - फूफा सब अंकल - आंटी में आकर केन्द्रित हो गये , इसीलिये समाज में संवेदनहीनता आती जा रही है |

मौजूदा संदर्भ में जो माहौल देश भर में दिखाई दे रहा है उसके पीछे गाँव और मोहल्लों की सामाजिक रचना में आया बदलाव भी है | उसे देखकर ये डर भी लग रहा है कि शहरों की बेरुखी से  हलाकान हो चुके जो श्रमिक गाँव लौट रहे हैं क्या उन्हें वह सब मिल सकेगा जिसकी उम्मीद लिए वे पांवों के छालों का दर्द भूलकर भी चले आ रहे हैं |

सवाल और भी हैं किन्तु जवाब किसी के पास नहीं क्योंकि गाँव में भी अब नीम की दातून करनी वाली पीढ़ी इतिहास बन गयी है और परिवार को फैमिली कहा जाने लगा है |

Saturday, 16 May 2020

दो गज की दूरी नदियों से भी जरूरी ...सिन्धु की पुकार पर , मिलन का उभार भर ,नर्मदा उमड़ रही सोलहों श्रृंगार कर

दो गज की दूरी नदियों से भी जरूरी  ...

सिन्धु  की पुकार पर , मिलन का उभार भर ,
नर्मदा उमड़ रही सोलहों श्रृंगार कर


मई का ही  महीना था | 17 साल पहले मैं अपने मित्र स्व.डॉ.सुधीर नेल्सन , और कमल ग्रोवर के साथ लद्दाख गया था | लेह तक की यात्रा यूँ तो मनाली होते हुए सड़क मार्ग से  करने की इच्छा थी किन्तु मौसम की अनिश्चितता की वजह से दिल्ली से हवाई यात्रा  का निश्चय किया , जिससे समय बचे तो लद्दाख को ज्यादा देख सकें | अलसुबह दिल्ली से उड़ान भरकर हम तीनों लगभग 7 बजे लेह की धरती पर थे | तापमान 2 डिग्री होने से ठिठुरन थी | दिल्ली से उड़ने के कुछ देर बाद ही हमारा विमान हिमाचल के पहाड़ों पर आ गया और फिर शुरू हुई बर्फ से ढंकी चोटियों की दृश्यावली जो एक तरफ तो लुभा रही थी दूसरी तरफ उनकी निर्जनता से मन में भय भी था | सूर्य की किरणों से कहीं  - कहीं बर्फ का रंग चटक पीला नजर आया जो अद्भुत था | अचानक विमान के कैप्टेन ने उद्घोषणा की कि कुछ ही मिनिट बाद हम लेह में लैंडिंग करेंगे | बर्फीले पहाड़ों के ऊपर इतनी लम्बी हवाई यात्रा का पहला अनुभव होने से पूरे समय खिड़की से बाहर ही देखता रहा | कुदरत के अनावृत सौन्दर्य और ईश्वर की अकल्पनीय सृजनशीलता का साक्षात दर्शन करते समय मानो अपने सांसारिक अस्तित्व को भूल सा गया था | और इसीलिये जब कैप्टेन की आवाज आई तो जैसे स्वप्न लोक से धरा पर लौट आया | सामान्य होते  ही  देखा विमान उस समय तक बर्फ से ढंके पहाड़ों के ऊपर ही था | हाँ , वह कुछ नीचे जरुर आ गया था | लेकिन अमूमन उतरने  के कुछ मिनिट पहले से ही शहर का नजारा दिखने लगता है और हवाई पट्टी भी , किन्तु विमान के लगातार नीचे आते जाने पर भी जमीन नजर नहीं  आ रही थी | दो - तीन दिन पहले लेह हवाई अड्डे पर उड़ान भरते समय एक विमान के टायर फट गए थे | गनीमत थी उसने हवाई पट्टी नहीं छोड़ी थी , इसलिए रुक गया | उस वजह से भी आशंकित होकर सोच रहा था  कि ये कैसा  हवाई अड्डा है जो उड़ान खत्म होने को आई पर दिख नहीं रहा | इतने में  चारों तरफ पहाड़ों से घिरी  हवाई पट्टी नजर आ गयी | विमान ने एक दो चक्कर लगाये और उतर गया |

हमारे  मेजबान ने टैक्सी से होटल जाने का प्रबंध किया | उसके पहले भी  मैं अनेक पहाड़ी जगहों पर घूम चुका  था किन्तु लेह उन सबसे अलग या यूँ कहें एक दूसरी दुनिया जैसा था | 1965 में स्व.चेतन आनंद ने 1962 के चीनी हमले पर हकीकत नामक जो फिल्म बनाई थी उसकी काफी आउटडोर शूटिंग लेह में हुई थी | उस फिल्म को देखने के  बाद ही लद्दाख जाने की इच्छा थी जो तकरीबन 38 साल बाद जाकर पूरी हुई | होटल पहुंचकर सोचा जल्दी  तैयार होकर शहर भ्रमण  पर निकल जाएं किन्तु होटल के वृद्ध मुस्लिम मालिक ने धूप में कुर्सी डालकर कहा  आराम करिए , ये मैदान नहीं है | ज्यादा  मशक्कत करने से पस्त हो जाओगे | तब तक हमें भी वहां ऑक्सीजन की कमी  महसूस होने लगी थी | उसका निर्देश मानकर दोपहर होटल में गुजारी | 

और शाम को शहर से कुछ दूर बहने वाली सिन्धु नदी देखने चल पड़े | बचपन से सिन्धु घाटी की सभ्यता सुनते आये थे | ये भी मालूम था कि वह पकिस्तान में जाकर  अरब सागर में मिलती है और उस देश की जीवन रेखा भी  है | लेकिन ये नहीं सोचा था उसके दर्शन का अवसर कभी मिलेगा  | सच कहूं तो लेह जाने के पहले तक यही नहीं पता था कि सिन्धु उसी शहर में बहती है | उसी के पास दलाई लामा का एक महल भी है | वैसे उनका मुख्यालय है तो धर्मशाला में किन्तु लद्दाख  बौद्ध बहुल है और काफी कुछ तिब्बत का एहसास करवाता है |

तकरीबन आधे घंटे बाद हम सिन्धु के करीब थे | उसका जल इतना साफ़ और निर्मल था कि देखता ही रह गया | सामने ऊंचे पहाड़ समूचे परिदृश्य को सौन्दर्य प्रदान कर रहे थे | जिस दिशा में वह बह रही थी उस तरफ निगाह घुमाने पर इस बात का दर्द हुआ कि प्रकृति की  ये अनमोल देन वहां से कुछ दूर बहकर पराई हो जायेगी | सिन्धु से यूँ तो कोई भावनात्मक लगाव न था | लेकिन गंगा , यमुना , मंदाकिनी और अलकनंदा जैसी हिमालय से निकली नदियाँ पहाड़ों पर भी मुझे इतनी स्वच्छ नहीं  दिखीं जितनी सिन्धु थी | बेहद ठंडा जल और तेज प्रवाह से उत्पन्न कलकल की आवाज ने एक दिव्य और अविस्मरणीय अनुभव से साक्षात्कार करवा दिया |

दूसरे दिन सुबह हम सिन्धु दर्शन करने दोबारा गये | उस समय वहां कुछ पर्यटक भी थे | सूर्य की किरणों से नदी का जल और चमक उठा था | लद्दाख की  उस  यात्रा में अनेक ऐतिहासिक बौद्ध स्तूपों के अलावा विश्व के सबसे ऊँचे मोटर मार्ग खरदूंगला तक का  रोमांचक सफर भी कभी  न भूलने वाला रहा । 

कोरोना संकट के कारण हमारे देश के पर्यावरण में जो आश्चर्यजनक सुधार हुआ उसने सहसा उस लेह यात्रा की स्मृतियाँ  ताजा कर दीं | विशेष रूप से सिन्धु नदी के स्वच्छ जल की तरंगें मानों दृष्टिपटल पर साकार हो उठीं |

हाल ही में किसी मित्र ने मुझे जबलपुर के समीप ग्वारीघाट का एक वीडियो भेजा जिसमें नर्मदा जिस अल्हड़पन से प्रवाहमान है वह देखकर 17 साल पहले के सिन्धु दर्शन का अनुभव सजीव हो उठा | उस मित्र का नाम मैं सहेज नहीं पाया किन्तु आलेख के अंत में वह वीडियो देखकर आप भी आनंदविभोर हो उठेंगे | उस दिन लेह में हमारे टैक्सी चालक  ने बताया था कि पर्यटक आते तो हैं लेकिन नदी के दर्शन मात्र करते है | कुछ लोग जल से आचमन करने के साथ ही उसे भरकर ले भी जाते हैं | इसलिए जल उतना स्वच्छ था |

संयोगवश बीते लगभग 50 दिन  से नर्मदा नदी भी जबलपुर शहर से सटी होने के बावजूद मानवीय सम्पर्क एवं हस्तक्षेप से दूर है | हालांकि उसके अत्यंत निकट अनेक आश्रम और बस्ती है |  इस दौरान कई  तीज - त्यौहार ऐसे निकल गए जो स्नान पर्व माने जाते हैं , लेकिन नर्मदा के जल में न किसी ने स्नान किया  न ही पूजन | अक्सर कहा जाता है कि प्रकृति अपना स्वभाव बदल रही है | लेकिन नर्मदा के जल में हुए अविश्वसनीय सुधार ने साबित कर  दिया कि प्रकृति का स्वभाव और तौर - तरीके यथावत हैं | बदला तो इन्सान है जिसने अपनी वासनाओं के वशीभूत प्रकृति प्रदत्त अनमोल धरोहरों के साथ अमानुषिक व्यवहार करते हुए  उनकी नैसर्गिकता छीन ली |

लेकिन न जाने कितने दशकों के बाद  मानवीय अत्याचारों से राहत मिलते ही प्रकृति ने अपना असली रूप पुनः धारण कर लिया | वाराणसी में गंगा  , दिल्ली में यमुना  और नासिक में गोदावरी  न केवल शुद्ध हुईं बल्कि उनका जलस्तर पिछली अनेक गर्मियों की अपेक्षा बढ़ गया है | हमारी संस्कृति में नदियों को माता मानकर पूजा जाता है | उनके दैवीय अस्तित्व को भी स्वीकृति है | उस आधार तो ये सोचना गलत नहीं होगा कि लॉक डाउन खत्म होने की कोई भी सम्भावना नदियों को  भयाक्रांत करती होगी |
जब इस बारे में सोचता हूँ तो मैं भी चिंतित के साथ ही दुखी हो जाता हूँ कि ज्योंही जन जीवन सामान्य होगा त्योंहीं इन नदियों का जीवन फिर खतरे में पड़ जाएगा | विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर चिकित्सा विज्ञान के जानकार तक कह रहे हैं कि कोरोना अब हमारे   साथ ही रहेगा और बचाव हेतु हमें सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात दो गज की  शारीरिक दूरी का पालन दैनिक जीवन में  करना ही होगा | तो फिर यही नियम क्यों न इन नदियों के साथ भी उपयोग में लाया जावे | यदि भविष्य में भी हम उनसे लॉक डाउन जैसी दूरी बनाए रख सके तो नदियाँ  अपने समूचे सौन्दर्य के साथ यूँ ही प्रवाहित होती रहेंगीं |

आखिर अपने प्राणों की रक्षा के प्रति हरसंभव सावधानी का पालन करने को तैयार मनुष्यों को नदियों के जीवन को खतरे में डालने का क्या  अधिकार है ?

संस्कारधानी के ओजस्वी कवि स्व. रामकृष्ण दीक्षित विश्व द्वारा लिखी गयी ये पंक्तियाँ इन दिनों साकार हो उठी हैं :-

सिन्धु  की पुकार पर , मिलन का उभार भर ,
नर्मदा उमड़ रही सोलहों श्रृंगार कर  ....

आइये इस श्रृंगार को बनाये रखें | 

चित्र परिचय : - 1. नर्मदा का वीडियो , 2. सिंधु तट पर स्व.डॉ. नेल्सन , कमल ग्रोवर और मैं।

प्रवासी पलायन से कारोबारी ढांचे में बड़े बदलाव होंगे



कोरोना संकट ने भारत में जिन बड़े बदलावों की बुनियाद रख दी उनकी वजह से प्रवासी मजदूर अब राष्ट्रीय विमर्श में शामिल हो गये हैं | तीज - त्यौहारों पर भी वे अपने घरों को लौटते थे | दुर्गा पूजा , दीपावली, छठ  के अलावा विवाह सीजन में पूर्वी और उत्तर भारत की और जाने वाली रेल गाड़ियों में पैर रखने की जगह नहीं होती थी | लेकिन मौजूदा स्थितियों में प्रवासी मजदूरों की  वापिसी ऐसी घटना है जो दहला देती है | लाखों श्रमिक अलग - अलग तरीकों से अपने मूल स्थान तक पहुंच गये हैं | लेकिन जितने पहुंचे उससे भी ज्यादा अभी या तो अटके पड़े हैं या रास्ते में हैं | चौतरफा आलोचना के बाद सरकारी तंत्र सक्रिय हुआ और बीते तीन - चार दिनों में काफी इंतजाम हुए भी किन्तु जैसी जानकारी  आ रही है उसके अनुसार अकेले गुजरात में ही लाखों प्रवासी फंसे हुए हैं | जहां कारखाने और निर्माण कार्य शुरू हो गये वहां रुके हुए श्रमिक भी एक बार गाँव जाने को तैयार हैं | महानगरों में पूर्वी और उत्तर भारतीय राज्यों के जो लाखों प्रवासी घरेलू काम करते थे  उनका रोजगार सुरक्षित होने के बाद भी उनके मन में गाँव जाने की ललक पैदा हो गई है | बड़े मकानों के अलावा अब फ्लैट में ही नौकर का कमरा बनाया जाने लगा है | ऐसे घरेलू कर्मचारी लॉक डाउन के दौरान आर्थिक तौर पर भी सुरक्षित रहे | बावजूद उसके उसी शहर में कार्यरत उनके गाँव के प्रवासी मजदूरों के वापिस लौटने की जानकारी  मिलने के बाद उनका भी मन काम से उचट गया और वे भी लौटने की सोच  रहे हैं | यद्यपि उनमें से अधिकतर को ये पता है कि गाँव उनका इन्तजार भले कर  रहा हो लेकिन पहुंचते ही उन्हें रोजगार दे देगा ये सुनिश्चित नहीं है | और उन्हें चाहे - अनचाहे लौटकर आना पड़ेगा ये भी वे जानते हैं | लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिन शहरों या राज्यों में वे कार्यरत थे उन्होंने इन श्रमवीरों को बोझ मान लिया | चूँकि उनके गृह राज्य में रोजगार के अवसर अभी भी पर्याप्त नहीं हैं फिर भी जिन दर्दनाक हालातों को झेलते हुए  वे किसी तरह जीवित हालत में अपने घर पहुंचे उसके बाद उनमें ऐसा सोचने वाले बहुत हैं कि अपने घर रहकर काम  ही काम मिले तो परदेस में जाने का क्या लाभ ? विशेष रूप से अधेड़ हो चुके लोगों को अब महानगरों में रहकर संघर्ष की बजाय अपने गाँव में छोटा सा कोई काम या  मजदूरी से मिलने वाले पैसे से गुजर करने जैसा संतोषी भाव जोर मारने लगा है | उनके मन में इस बात का आक्रोश भी है कि जिस मालिक के लिए वे काम करते थे उसने तनिक भी संवेदनशीलता नहीं दिखाई और लॉक डाउन होते ही उनको बेसहारा छोड़ दिया गया | हालंकि युवा और तकनीकी कौशल प्राप्त श्रमिक कुछ दिन रहकर वापिस लौटेंगे लेकिन  25 से 30 प्रतिशत मजदूर नहीं लौटे तब प्रवासियों के साथ अमानुषिक व्यवहार करने वाले राज्यों के कारोबारी और सरकारें दोनों को अपनी गलती का एहसास होगा | ऐसे राज्यों में यदि स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सका तो फिर उद्योग सुचारू रूप से चलेंगे अन्यथा प्रवासी मजदूरों की  मजबूरी का लाभ उठाने की भारी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी | दूसरी तरफ जिन राज्यों में ये प्रवासी श्रमिक लौटकर आये हैं वे भी इस बात को समझ रहे हैं कि उनका समुचित उपयोग किये  जाने पर उनके यहाँ विकास की संभावना मजबूत हो सकती हैं | लेकिन इस सब में सबसे बड़ी समस्या ये है  कि प्रवासी  मजदूरों के लौटने की प्रक्रिया अनवरत जारी है | भले ही हल्ला मचने के बाद शासन - प्रशासन उनकी खोज - खबर लेने सक्रिय हुए  हैं तथा समाजसेवी तबका भी  आगे आया है लेकिन  जिस तरह के हालात हैं उनमें आने वाले 30 दिनों में भी ये काम पूरा हो जाए ऐसा  संभव नहीं दिखता | और तब तक मानसून आ चुका  होगा | कुल मिलाकर प्रवासी मजदूरों का अपने गांव वापिस लौटने के बाद दोबारा काम वाली जगहों पर लौटना इस बात पर निर्भर करेगा कि गाँवों में  कोरोना फैलता है या नहीं ? यदि लाखों प्रवासी मजदूरों की गांवों में  वापिसी से वहां  भी संक्रमण  फैला तब फिर उन्हें काम  पर रखने के बारे में सम्बन्धित राज्य और कारोबारी दोनों  सोचेंगे | कुल मिलाकर हालत पूरी तरह से अनिश्चित हैं | जब तक प्रवासी मजदूरों का पलायन पूर्ण नहीं हो जाता तब तक उनके दोबारा लौटने की सम्भावना नहीं है और ऐसे में वे जिस काम में थे उसके शुरू होने में भारी दिक्कतें आएंगीं | गाँव पहुंचने के बाद इन मजदूरों के पास स्वरोजगार के अलावा केवल मनरेगा ही एकमात्र विकल्प है | लेकिन उसमें भी कितने  लोगों को काम मिल सकेगा ये तय नहीं है और तब ऐसे प्रवासी मजदूर जो मुम्बई - दिल्ली नहीं लौटना चाहते , वे पास वाले शहरों में काम तलाश सकते हैं | ये  सब देखते हुए देश के औद्योगिक और व्यवसायिक ढांचे में नये - नये बदलाव् देखने मिलेंगे | लेकिन इतना तय है कि जिन राज्यों से भी प्रवासी  पलायन हुआ उनकी औद्योगिक रफ्तार धीमी पड़ जायेगी जिसके  लिये वे  स्वयं जिम्मेदार है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 15 May 2020

महाराष्ट्र और गुजरात को महंगा पड़ेगा प्रवासी पलायन



अचानक सब कुछ बदला सा नजर आने लगा है | पूरे देश का ध्यान लाखों प्रवासी मजदूरों की दर्द भरी दास्तान पर केन्द्रित हो गया  | समाचार माध्यम उनके काफिलों के चित्रमय  समाचार दिखाकर शासन नामक व्यवस्था की असंवेदनशीलता को उजागर करने में लगे हैं | जिसे देखो वह इन मुसीबतजदा लोगों के प्रति सहानुभूति दिखा रहा  है | भले ही दंगा फसाद और खून खराबा न हुआ हो लेकिन कामोबेश हालत देश विभाजन के समय पाकिस्तान से हुए हिन्दुओं और सिखों के पलायन जैसी  ही है | यद्यपि बीते दो तीन दिन में स्थिति काफी संभली है | लाखों प्रवासी मजदूर रेल या सड़क मार्ग से अपने गाँव पहुंच चुके हैं | बाकी भी जल्द ही पहुँच जायेंगे | जो अभी भी पैदल चले  जा रहे हैं उनकी तरफ भी व्यवस्था का ध्यान गया है और आगे की यात्रा तथा भोजन आदि का प्रबंध भी हो रहा है | मुम्बई में टैक्सी और ऑटो चलाने वाले भी उन्हीं में निकल पड़े हैं | जो माध्यम प्रवासी मजदूरों की बदहाली दिखाकर पूरे देश को उनके प्रति भावुक बना रहे हैं उन्हें चाहिए था कि उन मानव सेवकों की खबरें भी प्रसारित करते जिन्होंने रास्तों में कई जगहों पर  भोजन - पानी की व्यवस्था की |जिससे और लोग भी प्रेरित होते | जैसी जानकारी आ रही है उसके मुताबिक़ प्रवासी पलायन सबसे ज्यादा  महाराष्ट्र से ही हुआ और उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी भी उसी राज्य में हुई | ऐसा नहीं है कि उद्धव ठाकरे की सरकार इस बारे में पूरी तरह अनजान थी | मुम्बई में रहने वाले लाखों उत्तर भारतीय शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी को फूटी  आँखों नहीं  सुहाते थे | लेकिन संख्याबल और परिश्रमी प्रवृति के कारण वे मुम्बई में अंगद के पाँव की तरह जम गए थे | स्व. बाल ठाकरे के समय से ही उत्तर भारतीय समुदाय को बाहरी और मुम्बईकरों के हक पर डाका डालने वाला समझा जाता रहा | भले ही बाद में वोट बैंक की लालच में उनकी  मिजाजपुर्सी की  जाने लगी तथा शिवसेना द्वारा सामना अखबार में सम्पादक पद पर उत्तर भारतीय पत्रकार्रों की  नियुक्ति भी की जाने लगी किन्तु मन ही मन उनकी बढती संख्या शिवसेना और एनसीपी दोनों को असहज लगने लगी थी | इसका एक कारण ये भी है कि किसी समय कांग्रेस का समर्थक रहा ये उत्तर भारतीय समुदाय धीरे - धीरे भाजपा के खेमे में आता गया | उसे लगने लगा कि कांग्रेस उसकी सुरक्षा में असमर्थ है | इस मानसिकता का प्रवासी पलायन के पीछे बहुत बड़ा हाथ है | मुम्बई और उसके निकटवर्ती नगरों में इन मजदूरों के रहने  खाने का इंतजाम महाराष्ट्र सरकार के साथ शिवसेना और एनसीपी मिलकर करते तो उन्हें कम से कम पैदल तो निकलना नहीं पड़ता | अनेक प्रवासियों की ज़ुबानी ये बात सामने आई है कि मध्यप्रदेश में आने के बाद अपेक्षाकृत उनका बेहतर  तरीके से ध्यान रखा गया | जिन राज्यों से भी प्रवासी मजदूर निकलने को बाध्य हुए वहां की राज्य सरकारों का रवैया बेहद गैर जिम्मेदाराना रहा | अगर बेरोजगार हुए इन मजदूरों को केवल दो वक़्त का साधारण भोजन और पानी मिलता रहता तो वे बदहवास होकर भागते नहीं | लॉक डाउन का तीसरा चरण घोषित होते ही उन्होंने अपने ठिकाने छोड़कर चलना  शुरू किया ही इसलिए कि उनको मिलने वाली सुविधा रहस्यमय तरीके से बंद कर दी गईं और भय का माहौल बनाया जाने लगा  | लेकिन इस पलायन ने मुम्बई सहित समूचे महाराष्ट्र में मजदूरों की जो कमी उत्पन्न कर दी वह  आने वाले दिनों में यहाँ के उद्योगों के लिए बड़ी समस्या बनेगी | जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार बहुत बड़ी संख्या ऐसे  मजदूरों की है जो कुछ समय तक तो इस सफर की दर्दनाक यादों से निकल ही नहीं सकेंगे | जिनके परिवार साथ थे उनका कष्ट तो कई गुना क्या ज्यादा था | विभिन्न क्षेत्रों से आ रही  जानकारी के अनुसार बड़ी संख्या उन प्रवासी मजदूरों की  है जो दोबारा मुम्बई जाने के बारे में सोचेगे तक नहीं | ऐसे में महाराष्ट्र और गुजरात का औद्योगिक ढांचा बुरी तरह हिल जाएगा | उस दृष्टि से उद्धव  सरकार ने जाने - अनजाने बहुत बड़ी गलती कर  दी | अभी भले ही केंन्द्र सरकार गालियाँ  खा रही हो लेकिन कोरोना की गर्द - गुबार बैठते ही महाराष्ट्र और गुजरात दोनों की राज्य सरकारें इस पलायन के कारण खून के आंसू बहाने मजबूर होंगी | गुजरात में हालाँकि राजनीतिक विद्वेष नहीं दिखा क्योंकि लॉक डाउन के दौरान हार्दिक पटेल जैसों की सियासत बंद पड़ी हुई है किन्तु विजय रूपानी की सरकार गुजरात की  परम्परागत सहिष्णुता का परिचय नहीं  दे सकी  | हालाँकि इस श्रम शक्ति के कारण प्रवासी मजदूरों के गृह राज्यों में ग्रामीण विकास का नया अध्याय शुरू होने की उम्मीदें बढ़ चली हैं | आज ही मप्र के बुन्देलखण्ड क्षेत्र से खबर आई कि अनेक गाँवों में बरसों बाद चहल - पहल दिखाई दी  | बंद घरों के ताले खोलने के बाद राहत की सांस लेते हुए अनेक मजदूरों ने दोबारा मुम्बई नहीं जाने की बात जिस अंदाज में कही उससे ये कहना गलत नहीं होगा कि महाराष्ट्र और गुजरात को ये पलायन काफी महंगा पड़ेगा |

Thursday, 14 May 2020

अब हवाएं ही करेगी रोशनी का फैसला , जिस दिये में जान होगी वो दिया रह जाएगाअब से भारत एक ब्रांड और हम सब उसके ब्रांड एम्बेसेडर





 कुछ समय पहले कागजों के बीच  अचानक विदेश से आया एक पुराना लिफाफा मिला | प्रेषक का नाम देखा तो डॉ. लक्ष्मी नारायण पिपरसानिया ( अब स्वर्गीय )  लिखा था | अचानक यादों की  सुई आधी सदी पीछे घूम गई  | डॉ. पिपरसानिया जबलपुर में साठिया कुआ मोहल्ले में हमारे पड़ोसी थे | पहले यहाँ एक निजी वाणिज्य महाविद्यालय में प्राध्यापक भी रहे | बाद में उनका चयन विदेश मंत्रालय में हो गया और 1965 में वे संरासंघ में भारतीय दूतावास में नियुक्ति पर न्यूयॉर्क चले गये | उनका वह पत्र पढ़ा जिसमें सितम्बर 1968 की तारीख थी |  पिताश्री को संबोधित उस पत्र में प्रारंभिक औपचारिकताओं के बाद कुछ घरेलू चीजों का नाम और मात्रा लिखते हुए निवेदन था कि वे सब उनके लिये लेते आयें | दरअसल पिताजी बतौर पत्रकार अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव का अवलोकन करने जा रहे थे | अक्टूबर 1968 में उनका वहां जाने का कार्यक्रम था | उन्होंने अपने अमेरिका आने की पूर्व सूचना डॉ . पिपरसानिया को पत्र द्वारा भेज दी थी | जिसके उत्तर में आये संदर्भित पत्र में न्यूयॉर्क में अपने घर पर ही ठहरने के आग्रह  के साथ ही  पापड़ , बड़ी , मसाले , तिथि - त्यौहार दर्शाने वाले पंचांग - कैलेंडर और पूजन सामग्री के  अलावा बाटा कम्पनी का  एक काले रंग का जूता भी साथ लाने  का आग्रह था |

पत्र पढ़ने के बाद मुझे ध्यान आया कि पिताजी वह सब सामान ले भी गए थे | लगभग डेढ़ महीने की यात्रा के दौरान अमेरिका में मिले भारतीय  समुदाय के व्यक्ति के यहाँ भोजन करने का अवसर उन्होंने कभी नहीं गंवाया | इसका कारण डॉलर बचाना नहीं वरन शाकाहारी भारतीय भोजन का लालच था | उस ज़माने में वहां भारतीय रेस्टॉरेंट इक्का - दुक्का होते थे | जबकि अमेरिका में तब तक भारतीय समुदाय की उपस्थिति महसूस होने लगी थी | 

लेकिन आज का माहौल पूरी तरह बदला हुआ है | अब केवल अमेरिका ही नहीं अपितु विश्व के  सभी प्रमुख देशों में भारतीय मूल के लोगों की अच्छी खासी संख्या है  | अमेरिका , ब्रिटेन , कैनेडा , यूएई इनमें प्रमुख कहे जा सकते हैं | इस कारण भारतीय परिवारों में उपयोग  होने वाली दैनिक उपयोग की हर चीज वहां आसानी से उपलब्ध हो जाती है | भारतीय भोजन के रेस्टॉरेंट भी बड़ी मात्रा में खुल गये  हैं | न्यूयॉर्क के न्यू जर्सी और लन्दन के साउथ हॉल इलाके में तो लगता है मानों  भारत में ही घूम रहे हों | कैनेडा के प्रमुख शहरों के कुछ हिस्सों को तो मिनी पंजाब तक कहा  जाने लगा है | कहते हैं वहां के अनेक भारतीय तो गुरुद्वारे के लंगर से ही काम चला लेते हैं।

इस वजह से भारत के तमाम लोकप्रिय घरेलू  ब्रांड विदेशी बाजारों में जगह बना चुके हैं | इनमें  ,मसाले , अचार , रेडी टु ईट सब्जियां , पापड़ , खाकरे , नमकीन , पान मसाला और रेडीमेड वस्त्र आदि शामिल हैं | वैसे इसमें अनोखा कुछ भी नहीं है क्योंकि जहाँ उपभोक्ता होते हैं वहां बाजार भी पीछे - पीछे चला ही आता है |

यहाँ तक तो ठीक था लेकिन भारत में विदेशी उतनी बड़ी संख्या में नहीं रहने के बाद भी बीते दो ढाई दशक में जो विदेशी ब्रांड भारत में आये उनका कारण समझने वाली बात है | फैशन और सौन्दर्य प्रसाधन को अलग कर दें लेकिन पिज्जा , बर्गर और चिकेन के शौकीनों के कारण अमेरिका से निकले ब्रांडों के विक्रय केंद्र मझोले श्रेणी के शहरों तक में खुल जाना चौंकाता भले न हो परन्तु अध्ययन का विषय अवश्य है | यद्यपि कोका कोला और बाद में पेप्सी नामक  अंतर्राष्ट्रीय सॉफ्ट ड्रिंक का प्रवेश भारत में काफी पहले हो चुका था |  1977 में जनता पार्टी सरकार ने कोका कोला का भारत से डेरा उठवा दिया लेकिन नब्बे का दशक आते - आते तक  कोका कोला और पेप्सी  भारत में अपने पैर ज़माने में  कामयाब क्या हुईं , घरेलू बाजारों में छाये भारतीय ब्रांड डबल सेवन , कैम्पा कोला , गोल्ड स्पॉट , थम्स  अप का भट्टा ही बैठ गया | कुछ को उन दोनों ने खरीद लिया |

संयोग से  पिज्जा , चिकेन और सॉफ्ट ड्रिंक्स का व्यवसाय करने वाली उक्त सभी कम्पनियां अमेरिका से निकली हुई हैं और इनकी गिनती विश्व के सबसे बड़े ब्रांड के तौर पर होती  है | भारत जैसे देश में जहाँ शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के व्यंजनों में  पाक कला का सर्वोत्कृष्ट रूप देखने मिलता हो और हर प्रदेश की अपनी स्वाद संबंधी विशिष्टता हो , वहां एकरूपता लिए इन  ब्रांडों को भारत जैसे  स्वाद की  बहुलता से सम्पन्न देश ने सहजता से कैसे अपना लिया ये मार्केटिंग के साथ ही समाज विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए विश्लेषण  का विषय है | सॉफ्ट ड्रिंक तो काफी  पहले से भारतीय समाज में पैठ बना चुके थे  लेकिन पिज्जा और चिकेन में ऐसा क्या था जिसके लिए भारत के लोगों ने विदेशी ब्रांड को पैर ज़माने की जगह दे दी |

दरअसल ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अनाप - शनाप कमाई का असर है | उनके प्रचार का बजट अकल्पनीय और रणनीति बेहद आक्रामक होने से आम जनता के दिमाग में ये बात बिठा दी जाती है कि उनका उपयोग करते ही आप वैश्विक सोच से जुड़ जाते हैं | भारत में पेप्सी ने पहले कुछ वर्षों तक पूरी कमाई प्रचार और  मार्केटिंग पर खर्च कर दी | क्रिकेट विश्व कप जैसे  आयोजन को प्रायोजित कर उसने भारतीय जनमानस में अपने लिए स्थायी जगह बना ली | कोका कोला तो पहले से ही जाना पहिचाना नाम था | ये दोनों  स्वास्थ्य वर्धक कुछ न होने के बाद भी  जिस तरह पैसा कमाते हैं वह चिन्तन का विषय हैं |

यही हाल पिज्जा और चिकेन बेचने वाली कम्पनियों का भी है जो समाज के अभिजात्य वर्ग से होते हुए भारत के विशाल मध्यमवर्गीय घरों में भी घुस गईं | 20  मिनिट में होम डिलीवरी न होने पर कीमत नहीं लेने जैसा तरीका उनका ट्रम्प कार्ड बन गया | ये चुटकुला तक चल पड़ा कि भारत में पुलिस , एम्बुलेंस , फायर ब्रिगेड के आने में भले देर हो जाए  लेकिन पिज्जा कम्पनी की डिलीवरी में देर नहीं  हो सकती | कहने का आशय ये है कि इन विदेशी ब्रांडों के कारण हम आज भी मानसिक तौर पर विदेशी श्रेष्ठता के सामने बौने बने हुए हैं |

दरअसल ये विदेशी ब्रांड ही नव उपनिवेशवाद के औजार हैं | इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के  संचालन में भारतीय मूल के लोगों को उच्च पदों पर रखकर भारतीय उपभोक्ताओं को  भावनात्मक तौर पर प्रभावित करने का खेल चलता है | अनेक देशों में तो ये वहां की सत्ता तक को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लेते हैं | जिस जनता पार्टी की  सरकार ने कोका कोला को भारत से निकाल बाहर किया उसी से जुड़े मंत्री ने 1989  में जनता दल सरकार के समय पेप्सी को अनुमति दी |

ये ब्रांड केवल खाने पीने , परिधान , फैशन , सौदर्य के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहते | उनके देश के  नर्तक , गायक , खिलाड़ी , अभिनेता , फ़िल्में सभी ब्रांड बना दी जाती हैं | मायकल जैक्सन के एक शो के लिए मुम्बई पागल हो गई थी और भारतीय संस्कृति के संरक्षक बने स्व.बाल ठाकरे को उसका समर्थन था | चाहे बीटल्स का कार्यक्रम  हो या जुबिन मेहता का आर्केस्ट्रा | हम भारतीय केवल उनकी ब्रांड छवि को प्रतिष्ठा सूचक मानकर पीछे चल पड़ते  हैं | इसीलिये भारत में करोड़ों कमाने और अवार्ड दर अवार्ड जीतने के बावजूद भारतीय फिल्मकार ऑस्कर जीतने के लिए घुटनों के बल खड़े होने तैयार रहते हैं |

कोरोना संकट के कारण अचानक ग्लोबल ब्रांड के मुकाबले भारतीय उत्पादों को खड़ा करने पर बहस शुरू हो  गई | आरोप - प्रत्यारोप , व्यंग्य , कटाक्ष  का दौर  भी चल पड़ा | लेकिन राजनीति से तनिक हटकर देखें और सोचें तो जिन विदेशी ब्रांडों का यहाँ जिक्र हुआ क्या वे भारत की जरूरत थे या जबरन जरूरत बनाये गए ? जिस चीज में हम पीछे हों वहां तो विदेशी विकल्प का औचित्य है भी किन्तु अमूल जैसे भारतीय ब्रांड ने दिखा दिया कि  गुणवत्ता बनाये रखते हुए आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरा जाये तो अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडो को शिकस्त दी जा सकती है |

हमें केवल अपनी मानसिकता बदलते हुए हीन भावना को  त्यागने  के  साथ ही मिथ्या श्रेष्ठता की चकाचौंध से भी बचना होगा | आने वाला दौर राष्ट्रीय बनाम बहुराष्ट्रीय के मुकाबले का होगा | कोरोना  के बाद की दुनिया में अलग तरह  के शीतयुद्ध के साथ ही अभिनव शक्ति संतुलन देखने मिलेंगे | ऐसे में प्रधानमंत्री न कहें तब भी हमें भारत को  एक विश्वसनीय वैश्विक ब्रांड बनाने के लिये जुटना होगा  | 135  करोड़ जनता अपने आप में एक विराट उपभोक्ता समूह है जिसके साथ उन करोड़ों अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों का भी समर्थन जुड़ सकता है जो दुनिया के कोने - कोने में फैले हुए हैं |

आइये , संकट की इस घड़ी में राजनीति से सर्वथा दूर रहते हुए संकल्प लें कि अब से हमारा ब्रांड भारत होगा और हम सभी इसके जीवंत ब्रांड एम्बेसेडर बनेंगे |  किसी व्यक्ति या विचारधारा से जोड़े बिना राष्ट्रीय सम्मान  को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का ये अनुष्ठान समय की मांग हैं |

महशर बदायुनी की ये पंक्तियाँ याद रहें :-

अब हवाएं ही करेंगी रोशनी  का फैसला , जिस दिये  में जान  होगी वो दिया रह  जायेगा |

क्या आत्मनिर्भर भारत अभियान राम मन्दिर जैसा आन्दोलन बन सकेगा ?मोदी समर्थकों के सामने बड़ी चुनौती





12 मई की रात जब प्रधानमंत्री देश से बात करने टीवी पर आये तब लगा था कि वे लॉक डाउन के अगले चरण के बारे में कुछ घोषणा करेंगे | लेकिन उन्होंने पूरा फोकस अर्थव्यवस्था को पुनः गतिशील  करने के लिए घोषित आर्थिक पैकेज पर केन्द्रित रखा | जिसकी राशि 20 लाख करोड़  है  , जो  देश की अर्थव्यवस्था  का 10 %  है | पैकेज से किसे क्या मिलेगा इसकी प्रारंभिक जानकारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बुधवार की शाम पत्रकार वार्ता में दी गई | दो दिनों में वे शेष निर्णयों के बारे में देश को बतायेंगी |

इससे अर्थव्यवस्था की मुसीबतें कितनी कम होंगीं और चीजों को दुरुस्त होने में कितना  समय लगेगा ये फ़िलहाल नहीं कहा जा सकता । क्योंकि अर्थशास्त्र काफी जटिल विषय है जिसे केवल घोषणाओं से नहीं समझा जा सकता |  उससे जनता को सीधे मिलने वाले फायदे पर भी  बहस भी शुरू हो गई है किन्तु नरेंद्र मोदी ने अपने स्वभावनुसार एक नया रणनीतिक मुद्दा छेड़ते हुए आत्मनिर्भर भारत अभियान के नाम से  एक नया नारा दिया , ग्लोबल की जगह लोकल | अर्थात विदेशी छोड़ स्वदेशी अपनाएं | और  ये भी बता दिया कि जो आज ग्लोबल ब्रांड है वह भी शुरुवात में लोकल ही हुआ करता था किन्तु लोगों ने वोकल ( मुखर  ) होकर उसे वैश्विक बना दिया |

इस तरह उन्होंने अर्थशास्त्र की शब्दावली में ही राष्ट्रवाद को राष्ट्रीय एजेंडा बनाने का दांव चल दिया | चूँकि भारत भी विश्व व्यापार  संगठन का सदस्य है इसलिए विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान  सरकार का मुखिया सार्वजनिक तौर पर नहीं कर सकता किन्तु कोरोना संकट ने जो चुनौतियां पेश की हैं उनके कारण भारत को अर्थव्यवस्था में उदारवाद के साथ राष्ट्रवाद भी सम्मिलित करना पड़ेगा | और जब चीन के साथ प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय खुलने जा रहा है तब  जरूरी हो जाता है कि हम अपने उपभोक्ता बाजार में विदेशी ब्रांड की बिक्री को घटायें | लेकिन कीमत और क्वालिटी दो ऐसे तत्व  हैं जो उपभोक्ता के निर्णय  को प्रभावित करते हैं | और इसी  का लाभ लेकर चीन का सामान भारतीय बाजारों से होता हुआ घर  - घर में घुस गया | 

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद ये उम्मीद थी कि वे चीनी सामान से हलाकान होकर दम तोड़ते जा रहे भारतीय उद्योगों को रक्षा कवच प्रदान करेंगे लेकिन उलटे चीन के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते मजबूत किये जाने लगे | उसके राष्ट्रपति जिनपिंग से याराना दिखाने के लिए कभी उनको अहमदाबाद में झूले पर झुलाया गया तो कभी महाबलीपुरम में आवभगत की गयी | मोदी जी भी चीन जाकर प्यार भरी बातें करके आ गए | इससे उनके अपने समर्थक वर्ग में भी असंतोष था | हालांकि चीन से आने वाले  कुछ सामानों  पर नियन्त्रण लगाये गए लेकिन प्रधानमंत्री के अपने वैचारिक परिवार के स्वदेशी जागरण मंच के प्रयासों के बावजूद भी चीनी  या अन्य विदेशी वस्तुओं का आयात जरा भी कम नहीं  हुआ | 

 बीते कुछ समय से चीन को अनेक मामलों में भारत के सशक्त विरोध का सामना करना पड़ा | विशेष रूप से अरुणांचल में भारत ने अपनी सैन्य शक्ति जिस तरह मजबूत की  उससे भी वह  काफी भन्नाया हुआ है | विशेष रूप से वन बेल्ट वन रोड वाले प्रोजेक्ट में शामिल नहीं  होने के हमारे  निर्णय ने उसको जबरदस्त नुकसान पहुँचाया | आतंकवाद और कश्मीर को लेकर भी चीन  द्वारा भारत के हितों के विरुद्ध सुरक्षा परिषद में वीटो के इस्तेमाल के कारण ऊपर से सामान्य दिखने वाले रिश्तों के बावजूद भीतर - भीतर शंकाएँ बढ़ती रहीं | लेकिन व्यापार के मोर्चे पर भारत सरकार ऐसा कुछ न कर सकी  जिससे घरेलू बाजारों में चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोका जा सके |

आखिर कोरोना ने वह अवसर दिया और उसका लाभ उठाते हुए श्री मोदी ने पहली बार अपने वैचारिक प्रतिष्ठान की सोच को इतनी वजनदारी से रखा | सबसे बड़ी बात कोरोना संकट के लिए चीन पर मंडरा रही आशंका के चलते उसकी वैश्विक साख को जबर्दस्त धक्का पहुंचा है |  अमेरिका सहित तमाम देश चीन से अपने उद्योग हटाने की तैयारी कर रहे हैं | इस कारण वह भारी दबाव में है | वही क्यों समूचे  पश्चिमी जगत का आर्थिक और औद्यगिक ढांचा कोरोना की वजह से चरमरा उठा है |

उसकी तुलना में भारत में स्थिति काफी संतोषजनक होने से दुनिया का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित होने की सम्भावना  है | यद्यपि उसका कितना लाभ हम उठा सकेंगे ये कह पाना तो कठिन है किन्तु अपने उत्पादन को बढ़ाकर अगर घरेलू जरूरतों को पूरा करने में भारत सक्षम हो सके तो अर्थव्यवस्था की गिरावट को उछाल में बदला जा सकता है | इससे व्यापार असंतुलन दूर होने के साथ  ही बेरोजगारी की समस्या भी हल होगी किन्तु ये तब तक संभव नहीं है जब तक स्वदेशी उत्पादों के प्रति भारत के लोगों में ही आग्रह न हो |

आर्थिक पैकेज को आत्मनिर्भर भारत अभियान का रूप देकर प्रधानमन्त्री ने जो पांसा फेंका है वह चमत्कारिक नतीजे दे सकता है , बशर्ते आर्थिक मोर्चे पर भी लोगों के मन में राष्ट्रीयता का भाव जगाया जा सके । 12 मई की रात प्रधानमन्त्री का सन्देश सुनने के बाद से ही देश भर से जो प्रतिक्रियाएं ग्लोबल के मुकाबले लोकल के समर्थन में आ रही हैं उनसे लगता है यदि भावनाओं के इस ज्वार की तीव्रता बनाये रखी जाए तो आत्मनिर्भर भारत अभियान को नारे से वास्तविकता  में बदला जा सकता है | प्रधानमंत्री ने जो आह्वान किया उसे अंजाम तक पहुंचाने की असली जिम्मेदारी अनगिनत मोदी समर्थकों की  है | वित्त मंत्री द्वारा 200 करोड़ तक की सरकारी खरीद के लिए ग्लोबल टेंडर नहीं निकालने की घोषणा करते हुए शुरुवात भी कर दी | उसके तुरंत बाद गृह मंत्री अमित शाह ने केन्द्रीय  पुलिस बलों के लिए संचालित कैंटीनों में केवल स्वदेशी उत्पाद ही उपलब्ध करवाने की घोषणा की तो थल सेनाध्य्क्ष ने सेना की कैंटीनों में वर्तमान  75 % की बजाय शत प्रतिशत भारतीय उत्पाद विक्रय हेतु रखे जाने पर सहमति दे दी |

 लेकिन जब तक आम जनता स्वदेशी के साथ भावनात्मक तौर पर नहीं जुड़ती तब तक ये अभियान महज सरकारी  औपचरिकता रह जाएगा | और यहीं शुरू होती है  भाजपा और रास्वसंघ  की भूमिका | दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी और  सबसे बड़े  संगठन का दावा करने वाली भाजपा और रास्वसंघ  यदि प्रधानमन्त्री के आह्वान को राममन्दिर की तरह का राष्ट्रीय आन्दोलन बना  सकें और उसके लिए वैसी ही मैदानी मेहनत करें तो अर्थ तंत्र बहुत जल्द व्यवस्थित होकर तेजी से आगे बढ़ने की स्थिति में आ जाएगा |

सवाल ये हैं कि क्या उक्त दोनों संगठन  भारतीय उपभोक्ता  को विदेशी छोड़कर स्वदेशी अपनाने और उसके लिए आवाज उठाने के लिए प्रेरित  कर  सकेंगे ? लेकिन इसी के साथ ही भारतीय उत्पादकों को भी क्वालिटी के मामले में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा ।

सबसे बड़ी बात ये भी है कि करोड़ों मोदी समर्थकों को  ईमानदारी  के साथ पहले खुद  स्वदेशी को अपनाना होगा | अन्यथा वे दूसरों से इस हेतु आग्रह नहीं कर सकेंगे | आर्थिक पैकेज की प्रशंसा या आलोचना से उपर उठकर स्वदेशी को भारतीय जनमानस में बिठाने के आह्वान की प्रशंसा होनी चाहिए | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने बड़ी ही चतुराई से सही  समय पर अपने समर्थकों के सामने एक चुनौती पेश कर दी है | यदि वे उसमें कामयाब हो सके तो 21 वीं सदी भारत की होने की भविष्यवाणी सच साबित हो सकती है |