Thursday, 21 May 2020

लॉक डाउन : ढील का गलत फायदा न उठायें



दुकानें खुलने लगीं, वाहन चलने लगे, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में भी चहल-पहल बढ़ गयी है। कुछ दिनों बाद हवाई यात्रा भी शुरू हो जायेगी और एक जून से श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा गैर वातानुकूलित रेलें चलाये जाने की तैयारी भी हो गई है। लॉक डाउन यूं तो 31 मई तक बढ़ गया है किन्तु उसमें ढिलाई या कड़ाई करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया गया। ये सब जनजीवन को सामान्य करने के उद्देश्य से किया गया है। आखिर वर्क  फ्रॉम होम हर किसी के लिए तो संभव नहीं है। जाहिर है लॉक डाउन में ढील से बाजार एवं बाकी स्थानों पर भीड़ बढ़ेगी और शारीरिक दूरी हेतु अपनाया जाने वाला सोशल डिस्टेसिंग भी काफी हद तक प्रभावित होगा। लेकिन बीते दो महीनों में कोरोना ने लगभग सभी को उससे बचाव के तौर-तरीके तो सिखा ही दिए हैं। सावधानी भी बरती जा रही है। अनेक ग्रामों में बाहर से आये परिजनों को क्वारंटीन किये जाने पर कोई उनसे मिलने नहीं जा रहा। हवाई जहाज में भी कुछ सीटें खाली रखे जाने की व्यवस्था रहेगी जिससे शारीरिक दूरी बनी रहे। रेलों में मिडिल बर्थ खाली रहेगी। मास्क हर जगह अनिवार्य कर दिया गया है। दुकानों के अलावा साग-सब्जी और फल बेचने वाले तक को मास्क बेचने की अनुमति दी गई है ताकि बिना मास्क के आये ग्राहक को पहले मास्क बेचा जा सके। व्यापारिक गतिविधियाँ दोबारा शुरू होने से लोगों में उदासी और डर तो बेशक कम होगा ही, व्यापारी को हो रहा घाटा भी काफी हद तक कम हो सकेगा, जो दो महीने से घरों में बैठा है। सरकार को राजस्व मिलने का रास्ता खुल जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखें तो नगर निगम जबलपुर लॉक डाउन शिथिल होते ही सम्पत्ति कर के रूप में एक करोड़ रु. रोज वसूलने की स्थिति में आ गई। सड़कों पर वाहन निकलने से पेट्रोल-डीजल की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। अदालतों में भी तकनीक के जरिये काम शुरू हो गया है। शिक्षा जगत ने तो शुरुवात में ही ऑन लाइन तकनीक का सहारा लेकर अपना काम जारी रखा। और अब तो सरकार और विश्वविद्यालय तक ऑन लाइन शिक्षा को बढ़ावा देने में जुट गये हैं। व्यापार में भी होम डिलीवरी एक अनिवार्यता बनती दिख रही है। रेस्टारेंट में जाकर लंच-डिनर करने के बजाय आर्डर देकर घर पर भोजन बुलवाने का चलन बढ़ चला है। कोरोना के बाद की जीवनशैली में ऑन लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग नामक तत्व अनिवार्य रूप से समाहित रहेंगे। अब तो इंडियन कॉफ़ी हाउस तक होम डिलीवरी देने लगे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि जब कोरोना के मामले मुट्ठी भर थे तब तो लोगों के घरों से बाहर आने पर बंदिश लगाई गयी और अब जबकि कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख दस हजार से भी ऊपर जा निकली है और प्रतिदिन 5 हजार से ज्यादा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं तब लॉक डाउन में ढील देना किस तरह की बुद्धिमत्ता है, ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि प्रवासी मजदूरों की वापिसी और उसी दौरान लॉक डाउन में शिथिलता से कहीं संक्रमण का फैलाव और तेज न हो जाए। लेकिन ये बात भी सही है कि इसके बाद सब कुछ बंद करके रखा जाना भी मुश्किल होता। दो महीने तक कोरोना के माहौल में जीने के बाद अब जनता को भी इस बीमारी से बचने के साधारण तरीके समझ में आ गये हैं। और इसीलिये ये ढील दी जा रही है जिससे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मजबूत बनाया जा सके। लेकिन ये जनता खास तौर पर शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे आत्मानुशासन का परिचय दें। घर से बाहर निकलने की सुविधा का अर्थ सैर-सपाटा न समझा जाए। बाजारों में भीड़ बढ़ाने की बजाय अपने नजदीकी छोटे दुकानदार से खरीदी की जाए। जाहिर तौर पर अभी तकलीफें रहेंगीं लेकिन आम जनता का व्यापक हित देखते हुए ये जरूरी है कि मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर की तरह से लॉक डाउन को भी हम अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं। कोरोना का प्रकोप भले धीरे-धीरे कमजोर होता जाए किन्तु वह खत्म नहीं होगा। और इसलिए हमें उससे बचाव के प्रति हर समय और हर जगह जागरूक और सतर्क रहना होगा। जैसा बताया जा रहा है उसके अनुसार कोरोना का चरमोत्कर्ष भारत में अभी आने को है। लेकिन ये भी सही है कि उससे मुकाबले का तन्त्र भी विकसित हो चुका है। कोरोना जानलेवा हो सकता है लेकिन हर संक्रमित की मौत हो जाए ये अवधारणा गलत साबित हो चुकी है। भारत में उससे संक्रमित लोगों में मृत्युदर का प्रतिशत बहुत कम होने से उम्मीद बढ़ी है। और उसी के कारण 1 लाख से ज्यादा संक्रमण हो जाने के बाद भी लॉक डाउन में ढील देने का साहस किया जा रहा है। लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि यदि शारीरिक दूरी की उपेक्षा की गई और उस वजह से संक्रमण बढ़ा तब लॉक डाउन पहले जैसा सख्त करना पड़ेगा जो किसी सजा से कम नहीं होगा।Y

लॉक डाउन : ढील का गलत फायदा न उठायें

दुकानें खुलने लगीं, वाहन चलने लगे, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में भी चहल-पहल बढ़ गयी है। कुछ दिनों बाद हवाई यात्रा भी शुरू हो जायेगी और एक जून से श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा गैर वातानुकूलित रेलें चलाये जाने की तैयारी भी हो गई है। लॉक डाउन यूं तो 31 मई तक बढ़ गया है किन्तु उसमें ढिलाई या कड़ाई करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया गया। ये सब जनजीवन को सामान्य करने के उद्देश्य से किया गया है। आखिर वर्क  फ्रॉम होम हर किसी के लिए तो संभव नहीं है। जाहिर है लॉक डाउन में ढील से बाजार एवं बाकी स्थानों पर भीड़ बढ़ेगी और शारीरिक दूरी हेतु अपनाया जाने वाला सोशल डिस्टेसिंग भी काफी हद तक प्रभावित होगा। लेकिन बीते दो महीनों में कोरोना ने लगभग सभी को उससे बचाव के तौर-तरीके तो सिखा ही दिए हैं। सावधानी भी बरती जा रही है। अनेक ग्रामों में बाहर से आये परिजनों को क्वारंटीन किये जाने पर कोई उनसे मिलने नहीं जा रहा। हवाई जहाज में भी कुछ सीटें खाली रखे जाने की व्यवस्था रहेगी जिससे शारीरिक दूरी बनी रहे। रेलों में मिडिल बर्थ खाली रहेगी। मास्क हर जगह अनिवार्य कर दिया गया है। दुकानों के अलावा साग-सब्जी और फल बेचने वाले तक को मास्क बेचने की अनुमति दी गई है ताकि बिना मास्क के आये ग्राहक को पहले मास्क बेचा जा सके। व्यापारिक गतिविधियाँ दोबारा शुरू होने से लोगों में उदासी और डर तो बेशक कम होगा ही, व्यापारी को हो रहा घाटा भी काफी हद तक कम हो सकेगा, जो दो महीने से घरों में बैठा है। सरकार को राजस्व मिलने का रास्ता खुल जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखें तो नगर निगम जबलपुर लॉक डाउन शिथिल होते ही सम्पत्ति कर के रूप में एक करोड़ रु. रोज वसूलने की स्थिति में आ गई। सड़कों पर वाहन निकलने से पेट्रोल-डीजल की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। अदालतों में भी तकनीक के जरिये काम शुरू हो गया है। शिक्षा जगत ने तो शुरुवात में ही ऑन लाइन तकनीक का सहारा लेकर अपना काम जारी रखा। और अब तो सरकार और विश्वविद्यालय तक ऑन लाइन शिक्षा को बढ़ावा देने में जुट गये हैं। व्यापार में भी होम डिलीवरी एक अनिवार्यता बनती दिख रही है। रेस्टारेंट में जाकर लंच-डिनर करने के बजाय आर्डर देकर घर पर भोजन बुलवाने का चलन बढ़ चला है। कोरोना के बाद की जीवनशैली में ऑन लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग नामक तत्व अनिवार्य रूप से समाहित रहेंगे। अब तो इंडियन कॉफ़ी हाउस तक होम डिलीवरी देने लगे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि जब कोरोना के मामले मुट्ठी भर थे तब तो लोगों के घरों से बाहर आने पर बंदिश लगाई गयी और अब जबकि कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख दस हजार से भी ऊपर जा निकली है और प्रतिदिन 5 हजार से ज्यादा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं तब लॉक डाउन में ढील देना किस तरह की बुद्धिमत्ता है, ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि प्रवासी मजदूरों की वापिसी और उसी दौरान लॉक डाउन में शिथिलता से कहीं संक्रमण का फैलाव और तेज न हो जाए। लेकिन ये बात भी सही है कि इसके बाद सब कुछ बंद करके रखा जाना भी मुश्किल होता। दो महीने तक कोरोना के माहौल में जीने के बाद अब जनता को भी इस बीमारी से बचने के साधारण तरीके समझ में आ गये हैं। और इसीलिये ये ढील दी जा रही है जिससे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मजबूत बनाया जा सके। लेकिन ये जनता खास तौर पर शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे आत्मानुशासन का परिचय दें। घर से बाहर निकलने की सुविधा का अर्थ सैर-सपाटा न समझा जाए। बाजारों में भीड़ बढ़ाने की बजाय अपने नजदीकी छोटे दुकानदार से खरीदी की जाए। जाहिर तौर पर अभी तकलीफें रहेंगीं लेकिन आम जनता का व्यापक हित देखते हुए ये जरूरी है कि मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर की तरह से लॉक डाउन को भी हम अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं। कोरोना का प्रकोप भले धीरे-धीरे कमजोर होता जाए किन्तु वह खत्म नहीं होगा। और इसलिए हमें उससे बचाव के प्रति हर समय और हर जगह जागरूक और सतर्क रहना होगा। जैसा बताया जा रहा है उसके अनुसार कोरोना का चरमोत्कर्ष भारत में अभी आने को है। लेकिन ये भी सही है कि उससे मुकाबले का तन्त्र भी विकसित हो चुका है। कोरोना जानलेवा हो सकता है लेकिन हर संक्रमित की मौत हो जाए ये अवधारणा गलत साबित हो चुकी है। भारत में उससे संक्रमित लोगों में मृत्युदर का प्रतिशत बहुत कम होने से उम्मीद बढ़ी है। और उसी के कारण 1 लाख से ज्यादा संक्रमण हो जाने के बाद भी लॉक डाउन में ढील देने का साहस किया जा रहा है। लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि यदि शारीरिक दूरी की उपेक्षा की गई और उस वजह से संक्रमण बढ़ा तब लॉक डाउन पहले जैसा सख्त करना पड़ेगा जो किसी सजा से कम नहीं होगा।


मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
-रवीन्द्र वाजपेयी


लॉक डाउन : ढील का गलत फायदा न उठायें

दुकानें खुलने लगीं, वाहन चलने लगे, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में भी चहल-पहल बढ़ गयी है। कुछ दिनों बाद हवाई यात्रा भी शुरू हो जायेगी और एक जून से श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा गैर वातानुकूलित रेलें चलाये जाने की तैयारी भी हो गई है। लॉक डाउन यूं तो 31 मई तक बढ़ गया है किन्तु उसमें ढिलाई या कड़ाई करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया गया। ये सब जनजीवन को सामान्य करने के उद्देश्य से किया गया है। आखिर वर्क  फ्रॉम होम हर किसी के लिए तो संभव नहीं है। जाहिर है लॉक डाउन में ढील से बाजार एवं बाकी स्थानों पर भीड़ बढ़ेगी और शारीरिक दूरी हेतु अपनाया जाने वाला सोशल डिस्टेसिंग भी काफी हद तक प्रभावित होगा। लेकिन बीते दो महीनों में कोरोना ने लगभग सभी को उससे बचाव के तौर-तरीके तो सिखा ही दिए हैं। सावधानी भी बरती जा रही है। अनेक ग्रामों में बाहर से आये परिजनों को क्वारंटीन किये जाने पर कोई उनसे मिलने नहीं जा रहा। हवाई जहाज में भी कुछ सीटें खाली रखे जाने की व्यवस्था रहेगी जिससे शारीरिक दूरी बनी रहे। रेलों में मिडिल बर्थ खाली रहेगी। मास्क हर जगह अनिवार्य कर दिया गया है। दुकानों के अलावा साग-सब्जी और फल बेचने वाले तक को मास्क बेचने की अनुमति दी गई है ताकि बिना मास्क के आये ग्राहक को पहले मास्क बेचा जा सके। व्यापारिक गतिविधियाँ दोबारा शुरू होने से लोगों में उदासी और डर तो बेशक कम होगा ही, व्यापारी को हो रहा घाटा भी काफी हद तक कम हो सकेगा, जो दो महीने से घरों में बैठा है। सरकार को राजस्व मिलने का रास्ता खुल जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखें तो नगर निगम जबलपुर लॉक डाउन शिथिल होते ही सम्पत्ति कर के रूप में एक करोड़ रु. रोज वसूलने की स्थिति में आ गई। सड़कों पर वाहन निकलने से पेट्रोल-डीजल की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। अदालतों में भी तकनीक के जरिये काम शुरू हो गया है। शिक्षा जगत ने तो शुरुवात में ही ऑन लाइन तकनीक का सहारा लेकर अपना काम जारी रखा। और अब तो सरकार और विश्वविद्यालय तक ऑन लाइन शिक्षा को बढ़ावा देने में जुट गये हैं। व्यापार में भी होम डिलीवरी एक अनिवार्यता बनती दिख रही है। रेस्टारेंट में जाकर लंच-डिनर करने के बजाय आर्डर देकर घर पर भोजन बुलवाने का चलन बढ़ चला है। कोरोना के बाद की जीवनशैली में ऑन लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग नामक तत्व अनिवार्य रूप से समाहित रहेंगे। अब तो इंडियन कॉफ़ी हाउस तक होम डिलीवरी देने लगे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि जब कोरोना के मामले मुट्ठी भर थे तब तो लोगों के घरों से बाहर आने पर बंदिश लगाई गयी और अब जबकि कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख दस हजार से भी ऊपर जा निकली है और प्रतिदिन 5 हजार से ज्यादा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं तब लॉक डाउन में ढील देना किस तरह की बुद्धिमत्ता है, ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि प्रवासी मजदूरों की वापिसी और उसी दौरान लॉक डाउन में शिथिलता से कहीं संक्रमण का फैलाव और तेज न हो जाए। लेकिन ये बात भी सही है कि इसके बाद सब कुछ बंद करके रखा जाना भी मुश्किल होता। दो महीने तक कोरोना के माहौल में जीने के बाद अब जनता को भी इस बीमारी से बचने के साधारण तरीके समझ में आ गये हैं। और इसीलिये ये ढील दी जा रही है जिससे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मजबूत बनाया जा सके। लेकिन ये जनता खास तौर पर शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे आत्मानुशासन का परिचय दें। घर से बाहर निकलने की सुविधा का अर्थ सैर-सपाटा न समझा जाए। बाजारों में भीड़ बढ़ाने की बजाय अपने नजदीकी छोटे दुकानदार से खरीदी की जाए। जाहिर तौर पर अभी तकलीफें रहेंगीं लेकिन आम जनता का व्यापक हित देखते हुए ये जरूरी है कि मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर की तरह से लॉक डाउन को भी हम अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं। कोरोना का प्रकोप भले धीरे-धीरे कमजोर होता जाए किन्तु वह खत्म नहीं होगा। और इसलिए हमें उससे बचाव के प्रति हर समय और हर जगह जागरूक और सतर्क रहना होगा। जैसा बताया जा रहा है उसके अनुसार कोरोना का चरमोत्कर्ष भारत में अभी आने को है। लेकिन ये भी सही है कि उससे मुकाबले का तन्त्र भी विकसित हो चुका है। कोरोना जानलेवा हो सकता है लेकिन हर संक्रमित की मौत हो जाए ये अवधारणा गलत साबित हो चुकी है। भारत में उससे संक्रमित लोगों में मृत्युदर का प्रतिशत बहुत कम होने से उम्मीद बढ़ी है। और उसी के कारण 1 लाख से ज्यादा संक्रमण हो जाने के बाद भी लॉक डाउन में ढील देने का साहस किया जा रहा है। लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि यदि शारीरिक दूरी की उपेक्षा की गई और उस वजह से संक्रमण बढ़ा तब लॉक डाउन पहले जैसा सख्त करना पड़ेगा जो किसी सजा से कम नहीं होगा।

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
-रवीन्द्र वाजपेयी


लॉक डाउन : ढील का गलत फायदा न उठायें

दुकानें खुलने लगीं, वाहन चलने लगे, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में भी चहल-पहल बढ़ गयी है। कुछ दिनों बाद हवाई यात्रा भी शुरू हो जायेगी और एक जून से श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा गैर वातानुकूलित रेलें चलाये जाने की तैयारी भी हो गई है। लॉक डाउन यूं तो 31 मई तक बढ़ गया है किन्तु उसमें ढिलाई या कड़ाई करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया गया। ये सब जनजीवन को सामान्य करने के उद्देश्य से किया गया है। आखिर वर्क  फ्रॉम होम हर किसी के लिए तो संभव नहीं है। जाहिर है लॉक डाउन में ढील से बाजार एवं बाकी स्थानों पर भीड़ बढ़ेगी और शारीरिक दूरी हेतु अपनाया जाने वाला सोशल डिस्टेसिंग भी काफी हद तक प्रभावित होगा। लेकिन बीते दो महीनों में कोरोना ने लगभग सभी को उससे बचाव के तौर-तरीके तो सिखा ही दिए हैं। सावधानी भी बरती जा रही है। अनेक ग्रामों में बाहर से आये परिजनों को क्वारंटीन किये जाने पर कोई उनसे मिलने नहीं जा रहा। हवाई जहाज में भी कुछ सीटें खाली रखे जाने की व्यवस्था रहेगी जिससे शारीरिक दूरी बनी रहे। रेलों में मिडिल बर्थ खाली रहेगी। मास्क हर जगह अनिवार्य कर दिया गया है। दुकानों के अलावा साग-सब्जी और फल बेचने वाले तक को मास्क बेचने की अनुमति दी गई है ताकि बिना मास्क के आये ग्राहक को पहले मास्क बेचा जा सके। व्यापारिक गतिविधियाँ दोबारा शुरू होने से लोगों में उदासी और डर तो बेशक कम होगा ही, व्यापारी को हो रहा घाटा भी काफी हद तक कम हो सकेगा, जो दो महीने से घरों में बैठा है। सरकार को राजस्व मिलने का रास्ता खुल जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखें तो नगर निगम जबलपुर लॉक डाउन शिथिल होते ही सम्पत्ति कर के रूप में एक करोड़ रु. रोज वसूलने की स्थिति में आ गई। सड़कों पर वाहन निकलने से पेट्रोल-डीजल की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। अदालतों में भी तकनीक के जरिये काम शुरू हो गया है। शिक्षा जगत ने तो शुरुवात में ही ऑन लाइन तकनीक का सहारा लेकर अपना काम जारी रखा। और अब तो सरकार और विश्वविद्यालय तक ऑन लाइन शिक्षा को बढ़ावा देने में जुट गये हैं। व्यापार में भी होम डिलीवरी एक अनिवार्यता बनती दिख रही है। रेस्टारेंट में जाकर लंच-डिनर करने के बजाय आर्डर देकर घर पर भोजन बुलवाने का चलन बढ़ चला है। कोरोना के बाद की जीवनशैली में ऑन लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग नामक तत्व अनिवार्य रूप से समाहित रहेंगे। अब तो इंडियन कॉफ़ी हाउस तक होम डिलीवरी देने लगे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि जब कोरोना के मामले मुट्ठी भर थे तब तो लोगों के घरों से बाहर आने पर बंदिश लगाई गयी और अब जबकि कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख दस हजार से भी ऊपर जा निकली है और प्रतिदिन 5 हजार से ज्यादा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं तब लॉक डाउन में ढील देना किस तरह की बुद्धिमत्ता है, ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि प्रवासी मजदूरों की वापिसी और उसी दौरान लॉक डाउन में शिथिलता से कहीं संक्रमण का फैलाव और तेज न हो जाए। लेकिन ये बात भी सही है कि इसके बाद सब कुछ बंद करके रखा जाना भी मुश्किल होता। दो महीने तक कोरोना के माहौल में जीने के बाद अब जनता को भी इस बीमारी से बचने के साधारण तरीके समझ में आ गये हैं। और इसीलिये ये ढील दी जा रही है जिससे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मजबूत बनाया जा सके। लेकिन ये जनता खास तौर पर शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे आत्मानुशासन का परिचय दें। घर से बाहर निकलने की सुविधा का अर्थ सैर-सपाटा न समझा जाए। बाजारों में भीड़ बढ़ाने की बजाय अपने नजदीकी छोटे दुकानदार से खरीदी की जाए। जाहिर तौर पर अभी तकलीफें रहेंगीं लेकिन आम जनता का व्यापक हित देखते हुए ये जरूरी है कि मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर की तरह से लॉक डाउन को भी हम अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं। कोरोना का प्रकोप भले धीरे-धीरे कमजोर होता जाए किन्तु वह खत्म नहीं होगा। और इसलिए हमें उससे बचाव के प्रति हर समय और हर जगह जागरूक और सतर्क रहना होगा। जैसा बताया जा रहा है उसके अनुसार कोरोना का चरमोत्कर्ष भारत में अभी आने को है। लेकिन ये भी सही है कि उससे मुकाबले का तन्त्र भी विकसित हो चुका है। कोरोना जानलेवा हो सकता है लेकिन हर संक्रमित की मौत हो जाए ये अवधारणा गलत साबित हो चुकी है। भारत में उससे संक्रमित लोगों में मृत्युदर का प्रतिशत बहुत कम होने से उम्मीद बढ़ी है। और उसी के कारण 1 लाख से ज्यादा संक्रमण हो जाने के बाद भी लॉक डाउन में ढील देने का साहस किया जा रहा है। लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि यदि शारीरिक दूरी की उपेक्षा की गई और उस वजह से संक्रमण बढ़ा तब लॉक डाउन पहले जैसा सख्त करना पड़ेगा जो किसी सजा से कम नहीं होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 May 2020

प्रवासी पलायन : ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो



देश की राजधानी दिल्ली के साथ ही व्यावसायिक राजधानी  मुबंई में विभिन्न राज्यों के जो मजदूर कार्यरत थे उनमें से अधिकतर वापिस चले गये और जो शेष  हैं वे  भी  मौका मिलते ही अपने - अपने गाँव चले जायेंगे | जैसे हालात बन रहे हैं उन्हें देखते हुए लम्बे समय तक उनकी वापिसी सम्भव नहीं दिखती | भले ही व्यापार और उद्योग फिर से शुरू  हो जाएँ लेकिन कोरोना संक्रमण का फैलाव जिस तरह बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए लौट गये लोगों  में से शायद ही कोई  जल्द वापिस आये | ये बात सही है कि बिना काम किये गुजारा भी नहीं है । लेकिन जान है तो जहान है वाली बात कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है | इन महानगरों में तमाम कोशिशों के बावजूद  भी नये मरीजों का पता लगने से ये स्पष्ट है कि वहां  के हालात  सामान्य होने में अभी लम्बा समय लगेगा | ये भी खबर है कि उनके गृहराज्य की सरकारें उनके लिए राशन -  पानी  के साथ ही रोजगार का इंतजाम भी कर रही हैं | केंद्र सरकार ने तो उनको तीन महीने तक बिना राशन कार्ड के भी  अनाज देने की बात कही है | दरअसल जिन  राज्यों में मजदूरों की वापिसी हुई उनकी सरकार को लग रहा है कि उन्हें अगर यहीं काम में लगा दिया जाए तो श्रमिकों की कमी दूर हो सकेगी जिसके कारण  विकास के कार्य या तो रुके पड़े रहते  हैं या फिर  कछुआ गति से चलते  हैं | आज ही मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी तदाशय का आश्वासन दिया है | उप्र में जिला स्तर पर ही नये उद्योगों की योजना योगी सरकार  बना रही  है | लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो दूसरा पहलू ये भी है कि बड़ी संख्या ऐसे मजदूरों की है जो हाल ही में हुए दर्दनाक अनुभवों के कारण अब गाँव के अलावा आसपास ही काम करना चाहेंगे | यदि ऐसा हुआ तब महानगरों के उद्योग - व्यापार ही नहीं अपितु अन्य क्षेत्रों में भी उसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा | उदाहरण के तौर पर मुम्बई से हजारों टैक्सी और ऑटो वाले अपने वाहन से ही सपरिवार गाँव लौट गए | उनमें से अनेक का कहना है कि उन पर  बैंक का जो कर्ज है वह तो चुकायेंगे ही किन्तु  मुम्बई में जाकर काम करने को लेकर अभी फैसला नहीं किया है |  मजदूरी करने वालों का मन भी बड़े शहरों से उचट गया है | ये नये प्रकार की स्थिति है। लेकिन इसका एक लाभ ये भी है कि महानगरों की भीड़ कुछ कम करते हुए स्थानीय लोगों को रोजगार देने की योजना पर क्रियान्वयन हो | दुनिया में  अनेक देश ऐसे हैं जो विदेशियों को काम करने के लिये परमिट जारी करते हैं | ये इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें कितना मानव संसाधन चाहिए | बेहतर  हो अब महानगरों में अन्य राज्यों से आने वाले मजदूरों को लेकर भी इस तरह के नियम बनें जिससे उनके आवास आदि की समुचित व्यवस्था की जा सके | यदि वे किसी ठेकेदार के माध्यम से आये हुए हों तो इन मजदूरों की कुशलता का दायित्व क़ानूनन उसी का हो | बाहर से आने वाले किसी भी  श्रमिक को झुग्गी - झोपड़ी में रहने  की अनुमत्ति नहीं देनी चाहिए  | मुम्बई और दिल्ली ही नहीं चेन्नई , अहमदाबाद , बेंगुलुरु जैसे शहरों से लाखों श्रमिकों के पलायन के बाद जिन बस्तियों में वे रहते थे उनका अवलोकन करते हुए वहां की नारकीय व्यवस्थाएं दुरस्त करने का ये बेहतरीन अवसर है |  आगे से इन महानगरों में नए उद्योग खोलने की अनुमति नहीं देना चाहिए | दिल्ली में जो अवैध बस्तियां हैं उनमें उप्र - बिहार से आये मजदूर ही सबसे ज्यादा थे | उनमें से अधिकतर दीपावली तक लौटने वाले नहीं है | इस समय का लाभ उठाकर बाहर से आने वाले श्रमिकों के बारे में  ऐसी व्यवस्था बनाई जावे जिससे दोबारा कभी ये स्थिति न बन सके | अपना राज्य छोड़कर अन्य किसी महानगर में मजदूरी करने  जाने वाले व्यक्ति के लिए ये अनिवार्य होना चहिये कि वह अपना गाँव या क़स्बा छोड़ते समय स्थानीय प्रशासन को तत्संबंधी लिखित जानकरी दे | जिससे ये पता हो कि वह गया कहाँ है ? इसी तरह किसी महानगर में जाने के बाद चाहे व्यक्ति मजदूरी करे या फिर चाय - पान  की दूकान खोले  लेकिन स्थानीय तौर पर प्रशासन  को उसकी जानकारी देनी चाहिए | लॉक डाउन के बाद बने हालातों में बड़े शहरों में काम करने वाले मजदूरों की जो दुर्दशा  हुई उसे देखते हुए यदि वे दोबारा वापिस लौटते हैं तब उनके बारे में विधिवत जानकारी होनी जरूरी है  | संघीय ढांचे के  नाम पर इसे आवाजाही की स्वतंत्रता पर पाबंदी कहकर उसका विरोध भी हो सकता है परंतु बीते कुछ दिनों में जो भी देखने मिला उसके बाद प्रवासी श्रमिकों को लेकर इस तरह  की व्यवस्था बननी चाहिये  जिससे किसी आपदा के समय वे  अनाथ न रहें  | इसके लिए  महानगरों में अस्थायी रूप से आने वालों के रहने का समुचित इंतजाम होना जरूरी है | जिस कारखाने , प्रतिष्ठान या ठेकेदार के यहाँ बाहरी मजदूर काम करें वह उनके रहने का इंतजाम करे अन्यथा फुटपाथ , अस्थायी झोपड़ी, रेलवे स्टेशन , बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थानों पर रहने की प्रथा बंद होनी चाहिए | महानगरों में बेतहाशा बढ़ती  आबादी से ही आवासीय समस्या पैदा होती है जो झुग्गियों के फैलाव के साथ ही गंदगी और बीमारियों को जन्म देती है | कोरोना संकट से मिले अवसर में इस तरफ भी ध्यान देना जरूरी है | वरना जिस तरह का पलायन देखने मिल रहा है उसकी पुनरावृत्ति होती रहेगी | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 19 May 2020

चीन भारत के बढ़ते महत्व से भन्नाया है




चीन के साथ लगी  सीमा पर आये दिन तनाव की खबरें आ रही हैं | यद्यपि बरसों से दोनों तरफ से एक भी गोली नहीं चली किन्तु चीन द्वारा  समय - समय पर भड़काऊ गतिविधियाँ होती रहती हैं | बीते कुछ दिनों में सिक्किम और लद्दाख क्षेत्र में भारतीय सैनिकों के साथ हाथापाई ,और  कहा सुनी के समाचार आये हैं | हिमाचल के स्पीती इलाके में वायु सीमा  के उल्लंघन की कोशिश भी चीन द्वारा की गयी | जैसा अभी तक होता आया है उसी तरह से मौके पर तैनात वरिष्ठ सैन्य अफसरों की बातचीत से विवाद आगे नहीं बढ़ा लेकिन चीन की ओर से कुछ न कुछ ऐसा किया जाता है जिससे भारतीय सैनिकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके | इस बारे में जो वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो  रहे हैं उनमें भारतीय पक्ष से बात कर  रहा अधिकारी जहाँ बड़े ही शांत भाव से चीनी सैनिकों को समझा रहा है वहीं चीनी सेना का एक अधिकारी बड़े ही तैश में धमकाने वाली शैली में चिल्लाता दिख रहा है | चीनी दुभाषिया दोनों पक्षों के बीच संवाद सेतु की भूमिका में है | रक्षा मंत्रालय के सूत्र इसे सामान्य घटना मानते हैं | इसकी वजह पिछले कई साल का अनुभव भी है | लेकिन अनेक अवसर ऐसे भी आए जब दोनों ही तरफ से सैन्य जमावड़ा होने की नौबत आई और लगा जैसे युद्ध होकर रहेगा लेकिन बातचीत से मामला सुलट गया | इसके दो कारण हैं | अव्वल तो भारत ने भी अग्रिम सीमाओं तक सैन्य बल और साजो - सामान पहुँचाने के लिए सड़क और हवाई पट्टी बना ली हैं और युद्ध संबंधी संसाधनों के मामले में भी वह पहले से कहीं बेहतर है | दूसरी बात चीन के भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते इतने गहरे हो गये कि वह छोटे - छोटे कारणों से उन्हें खराब नहीं करना चाहता | ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ने में व्यस्त है और खुद चीन भी उससे पूरी तरह उबर नहीं पाया है तब सीमा पर बेवजह तनाव पैदा करने का कारण क्या है ? और इसका  जवाब है  भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर चीन की घेराबंदी के अलावा गिलगित पर अपने आधिपत्य का ऐलान | लेकिन सबसे ज्यादा नाराजगी बीजिंग को है  चीन से उठकर बाहर आने वाले कम्पनियों को भारत द्वारा अपने यहाँ आने के लिए आकर्षित करना | प्रधानमन्त्री ने बीते दिनों देश के नाम अपने संदेश में आत्मनिर्भर भारत अभियान की  शुरुवात करते हुए  ग्लोबल ब्रांड की बजाय लोकल (स्थानीय) के प्रति वोकल ( मुखर ) होने का जो नारा दिया उसे अप्रत्यक्ष रूप से चीन के विरूद्ध ही माना जा रहा है | उसके बाद से स्वदेशी के पक्ष में जो प्रातिक्रियाएं आईं चीन सरकार ने उनका संज्ञान  अत्यंत ही  गम्भीरता से लेते हुए भारत को छेड़ने का काम शुरू कर  दिया | मानसरोवर यात्रा में समय की बचत करने के उद्देश्य से बनाई जा रही एक सड़क का नेपाल द्वारा जिस अंदाज में विरोध किया गया उसके पीछे भी चीन का हाथ होने की आशंका तो बिना नाम लिए थल सेनाध्यक्ष तक ने जताई है | विश्व स्वास्थ्य संगठन में भारत द्वारा चीन की अपेक्षा ताइवान को महत्व देने की जो रणनीति बनाई गयी उससे भी वह भन्नाया हुआ है | कोरोना को लेकर चीन की छवि पूरे विश्व में खराब हुई जबकि भारत ने जिस तरह से कोरोना का सामना किया और खुद संकट  में रहते  हुए भी दूसरे देशों की  सहायता की , उसकी वजह से उसकी छवि एक जिम्मेदार देश के तौर पर मजबूत हुई | ताजा खबर ये है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रबंधन में भी भारत को महत्वपूर्ण दायित्व मिलने वाला है | इन्हीं सब खिसियाहटों की वजह से चीन भारत के प्रति  खुन्नस निकालने का बहाना तलाश रहा है | उसे ये बात भी हजम नहीं हो रही कि भारत कोरोना का मुकाबला करते हुए भी सामान्य बना हुआ  है | लॉक डाउन के जरिये संक्रमण के फैलाव  को रोकने के साथ ही मृत्यु दर को काफी नियंत्रित किये जाने की भारतीय उपलब्धि से उसे  शर्मिन्दगी महसूस हो रही है | ये बात तो सर्वविदित है कि चीन भारत को अपना जन्मजात शत्रु मानता है | यद्यपि  उसे भी पता है कि आज का भारत 1962 वाला साधनहीन मुल्क नहीं है और हर मोर्चे पर चीन से भिड़ने में  सक्षम है | इसीलिये सीमा पर तनाव पैदा कर वह  भारत को बेवजह परेशानी में डालकर दबाव बनाने की  चाल चल रहा है | भारत ने चीन की तरफ से हो रही हरकतों का जवाब बेहद ही संयत तरीके से देते  हुए जाल में नहीं फंसने की जो नीति अपना रखी है उससे उलटा चीन तनाव में आ रहा है | लेकिन किसी भी प्रकार  की खुशफहमी पाल लेना गलत होगा | भारत ही नहीं पूरी दुनिया चीन को चालाक और धूर्त मानने लगी है | ऐसे में भारत का पलड़ा तो भारी है परन्तु चीन अविश्वसनीयता की प्रतिमूर्ति है | वह क्या कर बैठे  ये  कहना कठिन है | पाकिस्तान के साथ मिलकर वह ऐसी कोई स्थिति भी बना सकता है जिससे  भारत को दोहरे मोर्चे पर जूझना पड़े | इसलिए सतर्कता की बेहद जरूरत है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

 

Monday, 18 May 2020

कोरोना : एक लाख का आंकड़ा बड़ी चिंता का कारण



ये तो तय हो गया कि लॉक डाउन 31 मई तक रहेगा। जैसा प्रधानमंत्री ने बताया अब उसके रंग रूप में कतिपय बदलाव जरुर कर दिए जायेंगे। अर्थात पहले से ज्यादा छूट मिलेगी लेकिन वह कैसी और कितनी होगी ये राज्य सरकारें और उनके स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी निश्चित करेंगे। लेकिन लॉक डाउन का यह चौथा चरण भी कोरोना का विदाई सत्र नहीं लगता। जिस तरह से नए मरीज बढ़ रहे हैं वह देखते हुए आज रात तक कुल संक्रमित लोगों की संख्या एक लाख को छू जायेगी। लेकिन तीन हजार के करीब मौतों के बाद भी 38 फीसदी अर्थात 36 हजार मरीजों का स्वस्थ हो जाना आशा जगाने वाला है। ठीक होकर घर लौटने वालों का आंकड़ा निरंतर बढऩे से स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति विश्वास जागा है और अब लोग जाँच करवाने से भी नहीं डर रहे। जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार शहरों में हॉट स्पॉट बने हुए संक्रमित इलाकों में पूरी तरह सख्ती बनाये रखते हुए बाकी क्षेत्रों में नियन्त्रण के साथ व्यापारिक गतिविधियां सामान्य करने का फैसला लिया जा सकता है। बीते तकरीबन दो माह में जनता और शासन - प्रशासन कोरोना के साथ रहना सीख गये हैं। हालांकि अब भी लापरवाही कम नहीं है लेकिन जनजीवन को और लम्बे समय तक रोककर नहीं रखा जा सकता। किराना, दवाइयां, पेट्रोल, दूध, सब्जी - फल आदि की आपूर्ति होते रहने से भले ही लॉक डाउन के बावजूद जीवन चलता रहा लेकिन बाकी व्यवसायी इस दौरान आर्थिक संकट में फंसकर रह गये। ऐसे में भले ही सीमित अवधि के लिए ही क्यों न हो किन्तु दुकानें खुलनी चाहिए। इसी तरह सायकिल और ऑटो रिक्शा जैसे परिवहन भी शुरू हों। बाजार खुलने से उन मजदूरों को लाभ मिलेगा जो माल लाने - ले जाने का काम करते हैं। अनाज मंडी बंद रहने से वहाँ कार्यरत हम्मालों का रोजगार चला गया। कहने का आश्य ये है कि बाजार से केवल दुकानदार, उसके कर्मचारी और ग्राहक ही नहीं बल्कि एक लम्बी श्रृंखला आपस में जुड़ी होती है। दो महीने के अंतराल के बाद व्यवसाय को गति पकड़ने में समय लगेगा। कोरोना के भय से अनेक लोग खासकर बुजुर्गवार तो घरों से निकलने में संकोच करेंगे। इसी के साथ कड़वा सच ये भी है कि है आज के समाज में बड़ी संख्या में ऐसे बुजुर्ग दम्पत्ति रह रहे हैं जिनके बेटे - बेटी या तो विदेश में हैं या फिर शहर से बाहर। होम डिलीवरी का चलन इस दौरान काफी बढ़ा है और दुकानदार भी ग्राहकों से मोबाईल पर निरंतर सम्पर्क करते हुए ऑर्डर ले रहे हैं। लेकिन बाजार तो बाजार है और बिना उसके खुले जि़न्दगी में आया ठहराव दूर नहीं हो सकेगा। आवागमन के साधन भी शुरू होना ज़रूरी लगता है लेकिन लॉक डाउन के चौथे चरण में अपेक्षित छूट भी इस बात पर निर्भर करेगी कि जनता का उसके बाद कैसा आचरण रहता है ? कोरोना के फैलाव को रोकना अभी भी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। शारीरिक दूरी, मास्क और हाथ धोने जैसी चीजों के प्रति लोग जागरूक हुए हैं लेकिन अभी भी एक वर्ग ऐसा है जिसे नियमों का पालन करने में अपमान महसूस होता हैं। ऐसे लोगों पर नजर रखी जानी चाहिए। मुस्लिम समाज के ऐसे ही कुछ बददिमाग लोगों की वजह से आज इस समुदाय में कोरोना संक्रमण का फैलाव अत्यंत तेजी से हुआ। लेकिन ये आशंका भी है कि जनजीवान के सामान्य होते ही अभी तक बना रहा अनुशासन कहीं टूट न जाए। क्योंकि जरा सी चूक से ग्रीन ज़ोन कब रेड ज़ोन में तब्दील हो जायेगा कहना कठिन है। दरअसल दो माह की देशबंदी ने समाज के हर तबके को जबरर्दस्त मुसीबत में डाल दिया है। विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए तो ये हालात किसी डरावने सपने से कम नहीं हैं। एक अदृश्य भय सभी के मन में बैठ गया है। परिवार के साथ बाहर जाना खतरे से खाली होने से घर की चहारदीवारी के भीतर कैद रहना मजबूरी बन गयी है। जिस घर में बुजुर्ग ज्यादा हों वहां वैसे भी डर मन के भीतर घुसकर बैठ गया है। स्कूल बंद होने से बच्चे दो माह से कहीं जा नहीं सके। और छूट मिलने के बाद भी माता-पिता उन्हें बाहर ले जाने में हिचकेंगे। इस तरह लॉक डाउन का चौथा चरण भी एक तरह की परीक्षा ही है। इसमें उत्तीर्ण न होने पर लॉक डाउन भी बढ़ता जाएगा। जानकारों के अनुसार मई माह तो गाँव लौट रहे मजदूरों के इंतजाम में चला जायेगा। उसके बाद ये देखना होगा कि नए संक्रमित मरीजों की संख्या में कमी आती है या नहीं। क्योंकि अगर ये सिलसिला इसी तरह जारी रहा तब तो फिर जैसा एम्स दिल्ली के डायरेक्टर ने आशंका जताई कि कोरोना का सर्वोच्च जून और जुलाई में आयेगा। और उस स्थिति में लॉक डाउन में की जाने वाली शिथिलता वापिस भी की जा सकती है। ये सब देखते हुए जहां भी छूट मिलती है वहां के सभी लोगों को शारीरिक दूरी के साथ ही दूसरी जरूरी सावधानियां रखनी होंगी क्योंकि एक की गलती पूरे शहर को भारी पड़े बिना नहीं रहेगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि शुरुवाती दौर में तबलीगी जमात के अनुयायियों ने यदि अराजक हालात न पैदा किये होते तो बड़ी बात नहीं भारत कोरोना से जीतने के कगार पर आ गया होता। खैर, जो हो गया सो हो गया लेकिन आगे पूरी तरह सावधानी की जरूरत है। संक्रमितों की संख्या एक लाख तक पहुंचना बड़ी चिंता का कारण है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

गाँव - मोहल्ले में आत्मनिर्भरता के बाद भी सब एक दूसरे पर निर्भर थे परिवारों की टूटन से सामाजिकता के संस्कार भी कमजोर पड़े



मेरे बचपन का गाँव आत्मनिर्भर था किन्तु गाँव का हर व्यक्ति एक दूसरे पर निर्भर था | सहकारिता की अर्थव्यवस्था में गाँव में अमन - चैन और खुशहाली का भाव था , जो आज कहीं खो गया है | फेसबुक पर मित्रवर लक्ष्मीकांत शर्मा की उक्त पोस्ट ने मेरा ध्यान ही नहीं खींचा मानो एक  दिशा दिखा दी | मुझे ये स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि गाँवों से मेरा किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है | लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि बचपन से गाँवों में मेरा आना जाना रहा है | यहाँ तक कि मैं ऐसी कुछ बारातों में भी शामिल रहा जो किसी गाँव में आज  की तरह केवल एक रात नहीं अपितु तीन दिन ठहरीं | मेरे ननिहाल में पुरानी जमींदारी होने से गर्मियों की  छुट्टियों में नाना जी के साथ ग्रामीण इलाके देखने  का भी खूब मौका मिला किन्तु  उसके पीछे आकर्षण खुली जीप में धूल भरे रास्तों पर घूमना ज्यादा था | लेकिन ग्रामीण भारत का जो  रेखाचित्र किशोरावस्था से मानसपटल पर अंकित हुआ उसके रंग बहुत ही पक्के होने से आज तक हल्के नहीं पड़े |

और फिर बतौर अधिकारी लगभग साढ़े तीन वर्ष तक राष्ट्रीयकृत बैंक की ग्रामीण शाखा के प्रबन्धक के रूप में सेवाएं देने के दौरान भी गाँवों को निकट से देखने और जानने का अवसर मिला | बावजूद उसके ग्रामीण जीवन पर कुछ कहने या लिखने के लिए मैं स्वयं को पात्र नहीं मानता |

लेकिन लक्ष्मीकांत जी ने बहुत  ही कम शब्दों में गाँवों के सामाजिक ढांचे  के साथ आर्थिक नियोजन का जो खाका खींच दिया वह एक तरह का सूत्र है जिसकी सहायता से भारत की आत्मा से साक्षात्कार किया जा सकता है | लेकिन मैं इसके आधार पर  हमारी उस मोहल्ला व्यवस्था को स्मृत करना चाहूँगा जो मेरे जीवन से बेहद अंतरंगता से जुड़ी हुई है | हालाँकि मोहल्ले से कॉलोनी में आये भी 36 बरस का लम्बा अरसा बीत गया किन्तु 1956  में हमारा परिवार जबलपुर आया तो शहर के बीचों - बीच स्थित साठिया कुआ नामक मोहल्ले में पहली मंजिल पर किराये का एक मकान हमारा आश्रयस्थल बना | उस मोहल्ले की ख़ास बात ये थी कि उसमें उस जमाने के बहुत बड़े जमींदार , गांधीवादी राजनेता और साहित्यकार ब्यौहार राजेन्द्र सिंह की बखरी थी,  जिससे किसी राजप्रासाद का एहसास होता था   | महात्मा गांधी भी उसमें ठहर चुके थे | अपनी भूदान पदयात्रा के दौरान आचार्य विनोबा भावे को  बखरी में आते मैनें देखा और बाद में जयप्रकाश नारायण जी को भी | जबलपुर छोड़ने के पहले तक आचार्य  रजनीश भी उनसे मिलने आते थे , जो बाद में ओशो नाम से विख्यात हुए |

उस मोहल्ले की सामाजिक रचना इस तरह की थी मानो वह  किसी कम्यून की तरह हर दृष्टि से आत्मनिर्भर हो | सुनार , बढ़ई , नाई , धोबी , घरेलू काम करने वाली जातियां , खेलने हेतु दो मैदान , अखाड़ा  , मलखम्ब , मंदिर , पुजारी , हलवाई , किराना , आटे की चक्की , पान की दुकान ,सार्वजनिक कुए , लड़कियों और लड़कों के लिए माध्यमिक शिक्षा तक का अलग - अलग स्कूल  जैसी समस्त मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध थीं |

वहां रहने वालों में प्रोफेसर , शिक्षक , रक्षा कारखानों के कर्मचारी , वकील , चिकित्सक , पत्रकार , व्यवसायी सभी  पेशों से जुड़े हुए लोग थे | जैसा प्रारंभ में गाँव के बारे में कहा  गया , यहां भी सब अपने आप में आत्मनिर्भर होने के बाद भी एक दूसरे  पर निर्भर थे | सामाजिक समरसता इतनी थी कि किसी भी जाति या पेशे  का बड़ा - बुजुर्ग  आ रहा हो तो उसे हम सम्मान देते थे | और वह भी अधिकारपूर्वक हिदायतें देने या डांटने तक का अधिकार रखता था | जिस नाई से बाल कटवाते वह लाख निवेदन के बाद भी मशीन चला ही देता था | बढ़ई के पास जाकर कहते दादा गिल्ली खो  गयी तो वह थोड़ी सी ना  - नुकुर करने के बाद लकड़ी के किसी  टुकड़े से नई बनाकर चेतावनी भी देता कि अबकी बार गुम हुई तो नहीं बनाऊँगा | हालाँकि उसने अपनी चेतावनी पर कभी अमल नहीं किया |

मोहल्ले के सभी बच्चे साथ खेलते थे | दुर्गा जी की प्रतिमा के लिए एक चबूतरा था | पूरा मोहल्ला उसके लिए  चंदा देता और दशहरा जुलूस में मोहल्ले के लोग प्रतिमा को हनुमानताल में विसर्जित करने जाते | होली पर भी सार्वजनिक चन्दा होता था और जमकर रंग खेला जाता | मोहल्ला  पूरी तरह हिन्दुओं का था लेकिन मोहर्रम के समय एक सुनार और दो कायस्थ सवारी रखते थे जिसमें सभी शामिल होते |

छोटे - बड़े का आधार आयु होती थी , आर्थिक हैसियत नहीं | यही वजह थी ब्यौहार जी से , जिन्हें सब राजा भैया कहते थे , हम बच्चे भी निःसंकोच मिल लेते | स्कूल की छुट्टियों में उनकी विशाल बखरी हम बच्चों का क्रीड़ास्थल रहता था | हमारे मकान  मालिक का अपना एक प्रिंटिंग प्रेस था | 27 साल हमारा परिवार उनका किरायेदार रहा लेकिन कभी विवाद नहीं हुआ | जिस महिला ने बर्तन मांजने का काम शुरू से किया वह मोहल्ला छोड़ते तक काम करती रही |

अति साधारण परिवेश के बावजूद उस मोहल्ले से एक से एक प्रतिभाएं निकलीं | ब्यौहार जी के पुत्र स्व. राममनोहर सिन्हा विश्वप्रसिद्ध चित्रकार थे | आचार्य नन्दलाल बोस के शिष्य के रूप में उन्होंने भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी कला से संवारा था | कुल मिलाकर वह एक सम्पूर्ण इकाई थी जहाँ रहने वाले एक पारिवारिक भावना से बंधे हुए थे | फर्क था तो ये कि पुरुष बाबा , दादा , चाचा , काका या भैया थे तो महिलाएं बड़ी माँ , चाची , काकी या दीदी थीं | अंकल - आंटी संस्कृति का प्रवेश उस समय तक वहां  नहीं हुआ था | छोटे बच्चे पूरे  मोहल्ले में एक घर से दूसरे में खिलाये जाते थे |

वक्त बदला , पीढ़ी बदली , और फिर लोगों का वहां से जाना शुरू हो गया | सायकिल से स्कूटर युग आ चुका था | हम भाई - बहिन बड़े हुए और जगह कम पड़ने लगी तब 1984 में अपने नए मकान में आने को हुए तो पूरा मोहल्ला दुखी था | हम सब भी बेहद भावुक थे | मकान मालिक को पिताजी ने घर की चाबी सौंपते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया तो उलटे उन्होंने पिता जी का हाथ पकड़कर कहा कि आप अपने मकान में जा रहे हैं , ये खुशी की बात है लेकिन हमारी इच्छा तो थी , यहीं  रहते |

जिस कॉलोनी में हम रहने गये उसमें भी 27 साल बिताये  लेकिन उसमें मोहल्ले जैसे सम्बन्ध नहीं बन सके | और बीते  एक दशक से जिस कॉलोनी में रह रहे हैं यहाँ सामाजिक मेलजोल तो काफी है , लेकिन निःसंकोच कहूंगा  कि वह माहौल नहीं है जिसका जिक्र मोहल्ले के संदर्भ  में किया जा चुका है | हालाँकि बढ़ती उम्र इसका कारण हो सकती है किन्त्तु कॉलोनी के बच्चों और युवाओं में भी वैसी  पारिवारिकता नहीं दिखती |

हालांकि ये मेरे अकेले का अनुभव नहीं , अपितु हम  में से न जाने कितनों के मन में भी इसी तरह की अनुभूतियां भरी पड़ी हैं | मोहल्ला छोड़े हुए 36 साल बीत गए | अधिकतर लोग दूसरी  जगह रहने चले गये लेकिन जब भी किसी शादी - ब्याह में मिलना होता है तो थोड़ी देर का वह पुनर्मिलन भावनाओं की  अभिव्यक्ति और सुनहरी यादों को पुनर्जीवित करने  का अवसर बन जाता है | नई पीढ़ी के बच्चों से परिचय पुराने पड़ोसी के रूप में नहीं बल्कि रिश्ते का नाम लेकर करवाया जाता है |

दरअसल हमारे समाज में जो पारिवारिकता थी उसका स्रोत संयुक्त परिवार से मिले संस्कार ही थे | अब चूँकि परिवार हम दो , हमारे दो तक सिमट गए हैं और ताऊ - ताई , चाचा - चाची, मामा - मामी , बुआ - फूफा सब अंकल - आंटी में आकर केन्द्रित हो गये , इसीलिये समाज में संवेदनहीनता आती जा रही है |

मौजूदा संदर्भ में जो माहौल देश भर में दिखाई दे रहा है उसके पीछे गाँव और मोहल्लों की सामाजिक रचना में आया बदलाव भी है | उसे देखकर ये डर भी लग रहा है कि शहरों की बेरुखी से  हलाकान हो चुके जो श्रमिक गाँव लौट रहे हैं क्या उन्हें वह सब मिल सकेगा जिसकी उम्मीद लिए वे पांवों के छालों का दर्द भूलकर भी चले आ रहे हैं |

सवाल और भी हैं किन्तु जवाब किसी के पास नहीं क्योंकि गाँव में भी अब नीम की दातून करनी वाली पीढ़ी इतिहास बन गयी है और परिवार को फैमिली कहा जाने लगा है |

Saturday, 16 May 2020

दो गज की दूरी नदियों से भी जरूरी ...सिन्धु की पुकार पर , मिलन का उभार भर ,नर्मदा उमड़ रही सोलहों श्रृंगार कर

दो गज की दूरी नदियों से भी जरूरी  ...

सिन्धु  की पुकार पर , मिलन का उभार भर ,
नर्मदा उमड़ रही सोलहों श्रृंगार कर


मई का ही  महीना था | 17 साल पहले मैं अपने मित्र स्व.डॉ.सुधीर नेल्सन , और कमल ग्रोवर के साथ लद्दाख गया था | लेह तक की यात्रा यूँ तो मनाली होते हुए सड़क मार्ग से  करने की इच्छा थी किन्तु मौसम की अनिश्चितता की वजह से दिल्ली से हवाई यात्रा  का निश्चय किया , जिससे समय बचे तो लद्दाख को ज्यादा देख सकें | अलसुबह दिल्ली से उड़ान भरकर हम तीनों लगभग 7 बजे लेह की धरती पर थे | तापमान 2 डिग्री होने से ठिठुरन थी | दिल्ली से उड़ने के कुछ देर बाद ही हमारा विमान हिमाचल के पहाड़ों पर आ गया और फिर शुरू हुई बर्फ से ढंकी चोटियों की दृश्यावली जो एक तरफ तो लुभा रही थी दूसरी तरफ उनकी निर्जनता से मन में भय भी था | सूर्य की किरणों से कहीं  - कहीं बर्फ का रंग चटक पीला नजर आया जो अद्भुत था | अचानक विमान के कैप्टेन ने उद्घोषणा की कि कुछ ही मिनिट बाद हम लेह में लैंडिंग करेंगे | बर्फीले पहाड़ों के ऊपर इतनी लम्बी हवाई यात्रा का पहला अनुभव होने से पूरे समय खिड़की से बाहर ही देखता रहा | कुदरत के अनावृत सौन्दर्य और ईश्वर की अकल्पनीय सृजनशीलता का साक्षात दर्शन करते समय मानो अपने सांसारिक अस्तित्व को भूल सा गया था | और इसीलिये जब कैप्टेन की आवाज आई तो जैसे स्वप्न लोक से धरा पर लौट आया | सामान्य होते  ही  देखा विमान उस समय तक बर्फ से ढंके पहाड़ों के ऊपर ही था | हाँ , वह कुछ नीचे जरुर आ गया था | लेकिन अमूमन उतरने  के कुछ मिनिट पहले से ही शहर का नजारा दिखने लगता है और हवाई पट्टी भी , किन्तु विमान के लगातार नीचे आते जाने पर भी जमीन नजर नहीं  आ रही थी | दो - तीन दिन पहले लेह हवाई अड्डे पर उड़ान भरते समय एक विमान के टायर फट गए थे | गनीमत थी उसने हवाई पट्टी नहीं छोड़ी थी , इसलिए रुक गया | उस वजह से भी आशंकित होकर सोच रहा था  कि ये कैसा  हवाई अड्डा है जो उड़ान खत्म होने को आई पर दिख नहीं रहा | इतने में  चारों तरफ पहाड़ों से घिरी  हवाई पट्टी नजर आ गयी | विमान ने एक दो चक्कर लगाये और उतर गया |

हमारे  मेजबान ने टैक्सी से होटल जाने का प्रबंध किया | उसके पहले भी  मैं अनेक पहाड़ी जगहों पर घूम चुका  था किन्तु लेह उन सबसे अलग या यूँ कहें एक दूसरी दुनिया जैसा था | 1965 में स्व.चेतन आनंद ने 1962 के चीनी हमले पर हकीकत नामक जो फिल्म बनाई थी उसकी काफी आउटडोर शूटिंग लेह में हुई थी | उस फिल्म को देखने के  बाद ही लद्दाख जाने की इच्छा थी जो तकरीबन 38 साल बाद जाकर पूरी हुई | होटल पहुंचकर सोचा जल्दी  तैयार होकर शहर भ्रमण  पर निकल जाएं किन्तु होटल के वृद्ध मुस्लिम मालिक ने धूप में कुर्सी डालकर कहा  आराम करिए , ये मैदान नहीं है | ज्यादा  मशक्कत करने से पस्त हो जाओगे | तब तक हमें भी वहां ऑक्सीजन की कमी  महसूस होने लगी थी | उसका निर्देश मानकर दोपहर होटल में गुजारी | 

और शाम को शहर से कुछ दूर बहने वाली सिन्धु नदी देखने चल पड़े | बचपन से सिन्धु घाटी की सभ्यता सुनते आये थे | ये भी मालूम था कि वह पकिस्तान में जाकर  अरब सागर में मिलती है और उस देश की जीवन रेखा भी  है | लेकिन ये नहीं सोचा था उसके दर्शन का अवसर कभी मिलेगा  | सच कहूं तो लेह जाने के पहले तक यही नहीं पता था कि सिन्धु उसी शहर में बहती है | उसी के पास दलाई लामा का एक महल भी है | वैसे उनका मुख्यालय है तो धर्मशाला में किन्तु लद्दाख  बौद्ध बहुल है और काफी कुछ तिब्बत का एहसास करवाता है |

तकरीबन आधे घंटे बाद हम सिन्धु के करीब थे | उसका जल इतना साफ़ और निर्मल था कि देखता ही रह गया | सामने ऊंचे पहाड़ समूचे परिदृश्य को सौन्दर्य प्रदान कर रहे थे | जिस दिशा में वह बह रही थी उस तरफ निगाह घुमाने पर इस बात का दर्द हुआ कि प्रकृति की  ये अनमोल देन वहां से कुछ दूर बहकर पराई हो जायेगी | सिन्धु से यूँ तो कोई भावनात्मक लगाव न था | लेकिन गंगा , यमुना , मंदाकिनी और अलकनंदा जैसी हिमालय से निकली नदियाँ पहाड़ों पर भी मुझे इतनी स्वच्छ नहीं  दिखीं जितनी सिन्धु थी | बेहद ठंडा जल और तेज प्रवाह से उत्पन्न कलकल की आवाज ने एक दिव्य और अविस्मरणीय अनुभव से साक्षात्कार करवा दिया |

दूसरे दिन सुबह हम सिन्धु दर्शन करने दोबारा गये | उस समय वहां कुछ पर्यटक भी थे | सूर्य की किरणों से नदी का जल और चमक उठा था | लद्दाख की  उस  यात्रा में अनेक ऐतिहासिक बौद्ध स्तूपों के अलावा विश्व के सबसे ऊँचे मोटर मार्ग खरदूंगला तक का  रोमांचक सफर भी कभी  न भूलने वाला रहा । 

कोरोना संकट के कारण हमारे देश के पर्यावरण में जो आश्चर्यजनक सुधार हुआ उसने सहसा उस लेह यात्रा की स्मृतियाँ  ताजा कर दीं | विशेष रूप से सिन्धु नदी के स्वच्छ जल की तरंगें मानों दृष्टिपटल पर साकार हो उठीं |

हाल ही में किसी मित्र ने मुझे जबलपुर के समीप ग्वारीघाट का एक वीडियो भेजा जिसमें नर्मदा जिस अल्हड़पन से प्रवाहमान है वह देखकर 17 साल पहले के सिन्धु दर्शन का अनुभव सजीव हो उठा | उस मित्र का नाम मैं सहेज नहीं पाया किन्तु आलेख के अंत में वह वीडियो देखकर आप भी आनंदविभोर हो उठेंगे | उस दिन लेह में हमारे टैक्सी चालक  ने बताया था कि पर्यटक आते तो हैं लेकिन नदी के दर्शन मात्र करते है | कुछ लोग जल से आचमन करने के साथ ही उसे भरकर ले भी जाते हैं | इसलिए जल उतना स्वच्छ था |

संयोगवश बीते लगभग 50 दिन  से नर्मदा नदी भी जबलपुर शहर से सटी होने के बावजूद मानवीय सम्पर्क एवं हस्तक्षेप से दूर है | हालांकि उसके अत्यंत निकट अनेक आश्रम और बस्ती है |  इस दौरान कई  तीज - त्यौहार ऐसे निकल गए जो स्नान पर्व माने जाते हैं , लेकिन नर्मदा के जल में न किसी ने स्नान किया  न ही पूजन | अक्सर कहा जाता है कि प्रकृति अपना स्वभाव बदल रही है | लेकिन नर्मदा के जल में हुए अविश्वसनीय सुधार ने साबित कर  दिया कि प्रकृति का स्वभाव और तौर - तरीके यथावत हैं | बदला तो इन्सान है जिसने अपनी वासनाओं के वशीभूत प्रकृति प्रदत्त अनमोल धरोहरों के साथ अमानुषिक व्यवहार करते हुए  उनकी नैसर्गिकता छीन ली |

लेकिन न जाने कितने दशकों के बाद  मानवीय अत्याचारों से राहत मिलते ही प्रकृति ने अपना असली रूप पुनः धारण कर लिया | वाराणसी में गंगा  , दिल्ली में यमुना  और नासिक में गोदावरी  न केवल शुद्ध हुईं बल्कि उनका जलस्तर पिछली अनेक गर्मियों की अपेक्षा बढ़ गया है | हमारी संस्कृति में नदियों को माता मानकर पूजा जाता है | उनके दैवीय अस्तित्व को भी स्वीकृति है | उस आधार तो ये सोचना गलत नहीं होगा कि लॉक डाउन खत्म होने की कोई भी सम्भावना नदियों को  भयाक्रांत करती होगी |
जब इस बारे में सोचता हूँ तो मैं भी चिंतित के साथ ही दुखी हो जाता हूँ कि ज्योंही जन जीवन सामान्य होगा त्योंहीं इन नदियों का जीवन फिर खतरे में पड़ जाएगा | विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर चिकित्सा विज्ञान के जानकार तक कह रहे हैं कि कोरोना अब हमारे   साथ ही रहेगा और बचाव हेतु हमें सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात दो गज की  शारीरिक दूरी का पालन दैनिक जीवन में  करना ही होगा | तो फिर यही नियम क्यों न इन नदियों के साथ भी उपयोग में लाया जावे | यदि भविष्य में भी हम उनसे लॉक डाउन जैसी दूरी बनाए रख सके तो नदियाँ  अपने समूचे सौन्दर्य के साथ यूँ ही प्रवाहित होती रहेंगीं |

आखिर अपने प्राणों की रक्षा के प्रति हरसंभव सावधानी का पालन करने को तैयार मनुष्यों को नदियों के जीवन को खतरे में डालने का क्या  अधिकार है ?

संस्कारधानी के ओजस्वी कवि स्व. रामकृष्ण दीक्षित विश्व द्वारा लिखी गयी ये पंक्तियाँ इन दिनों साकार हो उठी हैं :-

सिन्धु  की पुकार पर , मिलन का उभार भर ,
नर्मदा उमड़ रही सोलहों श्रृंगार कर  ....

आइये इस श्रृंगार को बनाये रखें | 

चित्र परिचय : - 1. नर्मदा का वीडियो , 2. सिंधु तट पर स्व.डॉ. नेल्सन , कमल ग्रोवर और मैं।

प्रवासी पलायन से कारोबारी ढांचे में बड़े बदलाव होंगे



कोरोना संकट ने भारत में जिन बड़े बदलावों की बुनियाद रख दी उनकी वजह से प्रवासी मजदूर अब राष्ट्रीय विमर्श में शामिल हो गये हैं | तीज - त्यौहारों पर भी वे अपने घरों को लौटते थे | दुर्गा पूजा , दीपावली, छठ  के अलावा विवाह सीजन में पूर्वी और उत्तर भारत की और जाने वाली रेल गाड़ियों में पैर रखने की जगह नहीं होती थी | लेकिन मौजूदा स्थितियों में प्रवासी मजदूरों की  वापिसी ऐसी घटना है जो दहला देती है | लाखों श्रमिक अलग - अलग तरीकों से अपने मूल स्थान तक पहुंच गये हैं | लेकिन जितने पहुंचे उससे भी ज्यादा अभी या तो अटके पड़े हैं या रास्ते में हैं | चौतरफा आलोचना के बाद सरकारी तंत्र सक्रिय हुआ और बीते तीन - चार दिनों में काफी इंतजाम हुए भी किन्तु जैसी जानकारी  आ रही है उसके अनुसार अकेले गुजरात में ही लाखों प्रवासी फंसे हुए हैं | जहां कारखाने और निर्माण कार्य शुरू हो गये वहां रुके हुए श्रमिक भी एक बार गाँव जाने को तैयार हैं | महानगरों में पूर्वी और उत्तर भारतीय राज्यों के जो लाखों प्रवासी घरेलू काम करते थे  उनका रोजगार सुरक्षित होने के बाद भी उनके मन में गाँव जाने की ललक पैदा हो गई है | बड़े मकानों के अलावा अब फ्लैट में ही नौकर का कमरा बनाया जाने लगा है | ऐसे घरेलू कर्मचारी लॉक डाउन के दौरान आर्थिक तौर पर भी सुरक्षित रहे | बावजूद उसके उसी शहर में कार्यरत उनके गाँव के प्रवासी मजदूरों के वापिस लौटने की जानकारी  मिलने के बाद उनका भी मन काम से उचट गया और वे भी लौटने की सोच  रहे हैं | यद्यपि उनमें से अधिकतर को ये पता है कि गाँव उनका इन्तजार भले कर  रहा हो लेकिन पहुंचते ही उन्हें रोजगार दे देगा ये सुनिश्चित नहीं है | और उन्हें चाहे - अनचाहे लौटकर आना पड़ेगा ये भी वे जानते हैं | लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिन शहरों या राज्यों में वे कार्यरत थे उन्होंने इन श्रमवीरों को बोझ मान लिया | चूँकि उनके गृह राज्य में रोजगार के अवसर अभी भी पर्याप्त नहीं हैं फिर भी जिन दर्दनाक हालातों को झेलते हुए  वे किसी तरह जीवित हालत में अपने घर पहुंचे उसके बाद उनमें ऐसा सोचने वाले बहुत हैं कि अपने घर रहकर काम  ही काम मिले तो परदेस में जाने का क्या लाभ ? विशेष रूप से अधेड़ हो चुके लोगों को अब महानगरों में रहकर संघर्ष की बजाय अपने गाँव में छोटा सा कोई काम या  मजदूरी से मिलने वाले पैसे से गुजर करने जैसा संतोषी भाव जोर मारने लगा है | उनके मन में इस बात का आक्रोश भी है कि जिस मालिक के लिए वे काम करते थे उसने तनिक भी संवेदनशीलता नहीं दिखाई और लॉक डाउन होते ही उनको बेसहारा छोड़ दिया गया | हालंकि युवा और तकनीकी कौशल प्राप्त श्रमिक कुछ दिन रहकर वापिस लौटेंगे लेकिन  25 से 30 प्रतिशत मजदूर नहीं लौटे तब प्रवासियों के साथ अमानुषिक व्यवहार करने वाले राज्यों के कारोबारी और सरकारें दोनों को अपनी गलती का एहसास होगा | ऐसे राज्यों में यदि स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सका तो फिर उद्योग सुचारू रूप से चलेंगे अन्यथा प्रवासी मजदूरों की  मजबूरी का लाभ उठाने की भारी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी | दूसरी तरफ जिन राज्यों में ये प्रवासी श्रमिक लौटकर आये हैं वे भी इस बात को समझ रहे हैं कि उनका समुचित उपयोग किये  जाने पर उनके यहाँ विकास की संभावना मजबूत हो सकती हैं | लेकिन इस सब में सबसे बड़ी समस्या ये है  कि प्रवासी  मजदूरों के लौटने की प्रक्रिया अनवरत जारी है | भले ही हल्ला मचने के बाद शासन - प्रशासन उनकी खोज - खबर लेने सक्रिय हुए  हैं तथा समाजसेवी तबका भी  आगे आया है लेकिन  जिस तरह के हालात हैं उनमें आने वाले 30 दिनों में भी ये काम पूरा हो जाए ऐसा  संभव नहीं दिखता | और तब तक मानसून आ चुका  होगा | कुल मिलाकर प्रवासी मजदूरों का अपने गांव वापिस लौटने के बाद दोबारा काम वाली जगहों पर लौटना इस बात पर निर्भर करेगा कि गाँवों में  कोरोना फैलता है या नहीं ? यदि लाखों प्रवासी मजदूरों की गांवों में  वापिसी से वहां  भी संक्रमण  फैला तब फिर उन्हें काम  पर रखने के बारे में सम्बन्धित राज्य और कारोबारी दोनों  सोचेंगे | कुल मिलाकर हालत पूरी तरह से अनिश्चित हैं | जब तक प्रवासी मजदूरों का पलायन पूर्ण नहीं हो जाता तब तक उनके दोबारा लौटने की सम्भावना नहीं है और ऐसे में वे जिस काम में थे उसके शुरू होने में भारी दिक्कतें आएंगीं | गाँव पहुंचने के बाद इन मजदूरों के पास स्वरोजगार के अलावा केवल मनरेगा ही एकमात्र विकल्प है | लेकिन उसमें भी कितने  लोगों को काम मिल सकेगा ये तय नहीं है और तब ऐसे प्रवासी मजदूर जो मुम्बई - दिल्ली नहीं लौटना चाहते , वे पास वाले शहरों में काम तलाश सकते हैं | ये  सब देखते हुए देश के औद्योगिक और व्यवसायिक ढांचे में नये - नये बदलाव् देखने मिलेंगे | लेकिन इतना तय है कि जिन राज्यों से भी प्रवासी  पलायन हुआ उनकी औद्योगिक रफ्तार धीमी पड़ जायेगी जिसके  लिये वे  स्वयं जिम्मेदार है |

- रवीन्द्र वाजपेयी