Tuesday, 26 May 2020

चीन की हरकतों पर सतर्कता जरूरी



लद्दाख के गलवान क्षेत्र में चीनी सेना की मौजूदगी अब गश्त से आगे बढ़कर मोर्चेबंदी की शक्ल लेती जा रही है। इस निर्जन इलाके में भारत और चीन की सैन्य टुकड़ियाँ अपने-अपने क्षेत्र की निगरानी किया करती हैं। हालाँकि 1962 के बाद बड़ी लड़ाई तो नहीं हुई लेकिन बीच-बीच में दोनों देशों के सैनिकों के बीच आमने-सामने की बहस, कहासुनी और कभी-कभार धक्कामुक्की होती रहती है। सीमा का निर्धारण चूँकि अभी तक विवाद का विषय है इसलिए दोनों देश एक दूसरे पर उसके उल्लंघन का आरोप लगाते रहे हैं। अपवादस्वरूप छोड़कर अभी तक सैन्य कमांडर ही विवाद का हल निकालकर स्थिति सामान्य कर लिया करते थे किन्तु इधर कुछ दिनों से गलवान सेक्टर में पेंगोंग झील के निकट चीन ने अपनी सैन्य उपस्थिति जिस तरह से बढ़ाई और तकरीबन 100 तम्बू गाड़ दिए उससे पता चलता है वह किसी दूरगामी योजना पर काम कर रहा है। ये किसी युद्ध में तब्दील होगी या नहीं ये तो फिलहाल कहना कठिन है किन्तु दबाव बनाने में जरुर वह कामयाब हो गया है। वैसे चीन की इस सैन्य सक्रियता का कोई विशेष कारण तो समझ नहीं आता लेकिन कोरोना संकट के बाद विश्वव्यापी किरकिरी से भन्नाया चीन भारत के रवैये से और बौखलाया हुआ है। उसकी नाराजगी तब और बढ़ गयी जब भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगिट-बाल्टिस्तान इलाके के मौसम की नियमित जानकारी देनी शुरू कर दी। इसे एक सांकेतिक कूटनीतिक संकेत मानते हुए पाकिस्तान को लगा कि भारत सरकार बालाकोट जैसा कदम उठाकर इस इलाके पर कब्जा करने की कोशिश कर सकता है। जैसी कि खबर है उक्त इलाके में पाकिस्तान के विरूद्ध जन असंतोष तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसके बगल वाला अक्साई चिन क्षेत्र पाकिस्तान ने चीन को भेंट स्वरूप दे दिया था। चीन को लगने लगा है कि भारत ने यदि गिलगिट और बालटिस्तान पाकिस्तान से छीन लिया तो फिर वह अक्साई चिन पर भी दावा ठोकेगा। लेकिन इसके अलावा उसके आक्रामक रुख का कारण कोरोना के बाद दुनिया के कूटनीतिक और व्यापारिक संतुलन में आ रहा बदलाव भी है। दरअसल चीन विश्व का नेता बनने का खवाब देखने लगा था लेकिन उसका दांव गलत साबित होता लग रहा है। भले ही उसने अकूत सैन्य शक्ति अर्जित कर रखी हो लेकिन आर्थिक मोर्चे पर खड़े किये अपने साम्राज्य के बिखरने की आशंका ने उसकी नींद उड़ाकर रख दी है। विश्व के नामी ब्रांड अपने प्लांट उठाकर ले जाने लगे हैं। भारत चूँकि चीन से आने वाले उद्यमों को अपने यहाँ लाने की कोशिश में है इसलिए चीन ज्यादा सतर्क है। यद्यपि अभी तक की खबरों के अनुसार चीन से निकलने वाले अधिकतर कारखाने वियतनाम, इंडोनेशिया और सिंगापुर का रुख करते दिखाई दे रहे हैं लेकिन कुछ बड़े ब्रांड भारत को प्राथमिकता देने के मूड में भी हैं क्योंकि उन्हें यहाँ उत्पादन खपाने के लिए बड़ा उपभोक्ता बाजार भी साथ ही मिल जाएगा। चीन को भी चिंता इसी बात की है। वह किसी भी स्थिति में भारत को आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ नहीं देखना चाहता क्योंकि उसे एक बात समझ आ गई है कि सैन्य मोर्चे पर तो लड़ाई ज्यादा दिन नहीं चलती किन्तु आर्थिक जंग निरंतर जारी रखी जा सकती है। भारत चूँकि इस क्षेत्र में उसका निकटतम और ताकतवर प्रतिद्वंदी है इसलिए वह उस पर दबाव बनाने के लिए सीमा पर तनाव पैदा करने की चाल चल रहा है। नेपाल की वामपंथी सरकार के माध्यम से उसने सड़क निर्माण के बाद दोनों देशों के बीच तनातनी पैदा कर दी और अब खुद भी कभी लद्दाख तो कभी अरुणाचल में सैनिकों को आमने-सामने लाकर शरारत करता रहता है। भारत भी चूँकि उसी शैली में जवाब देने लगा है इसलिए बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाती। लेकिन मौजूदा विवाद के बारे में ये कहा जा सकता है कि ये सीमा पर आये दिन होने वाले झड़प या कहासुनी न होकर किसी ठोस योजना का हिस्सा है। कोरोना के बाद वैश्विक स्तर पर चीन को जिस तरह नीचा देखना पड़ रहा है उसमें भारत की कूटनीतिक रणनीति भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। कोरोना से लड़ने के मामले में शुरुवाती दौर में भारत को बचाव की चीजें चीन से आयात करना पड़ रही थीं किन्तु अब उनमें से अधिकतर का उत्पादन यहीं होने से चीन का निर्यात प्रभावित हुआ। इसी के साथ जिस तेजी से भारत में चीनी सामान के विरुद्ध जनता में भावना पैदा हुई वह भी चीन को चिंता में डाल रही है। इसीलिये उसने सीमा पर दबाव बढ़ाकर भारत सरकार से बातचीत करने का बहाना उत्पन्न किया है जिससे सीमा की आड़ में वह अपना व्यापार सुरक्षित रखने का आश्वासन प्राप्त करने के अलावा विश्व राजनीति में भारत द्वारा उसके विरोध को ठंडा करने की कोशिश कर सके। विश्व स्वास्थ्य संगठन में भारत द्वारा चली गयी चाल के कारण चीन को रूस ने भी झटका दे दिया। इस वजह से भी वह भारत को लेकर सतर्क हो गया है। भीतरखाने की खबर है कि सैन्य कमांडरों की बातचीत से भी सीमा पर तनाव कम नहीं होने के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्वयं कमान संभाली है लेकिन चीन की मंशा है राष्ट्रपति जिनपिंग और भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी में सीधी बातचीत हो जिससे चीन को भारत की सोच समझ आ सके। जब तक ये नहीं होता तब तक उसकी तरफ से भड़काने वाली हरकतें होती रहेंगीं जिनके प्रति हमें सतर्क रहने के अलावा किसी भी स्थिति में जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहना होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 May 2020

ग्रामीण भारत में प्रगति के द्वार खुलने का अवसर



कोरोना ने अर्थव्यवस्था को चौपट करने के साथ ही उसमें चारित्रिक बदलाव के रास्ते भी खोल दिए हैं। सबसे बड़ी बात बढ़ते शहरीकरण के दुष्परिणाम झेलकर लौटे विशाल श्रमिक समुदाय में से ज्यादा न सही लेकिन एक हिस्से को तो कम से कम ये समझ में आ ही गया है कि शहरों में सब कुछ होने के बाद भी बहुत कुछ ऐसा नहीं है जो गाँवों में आज भी सहजता से उपलब्ध है। आखिर जिस बदहाली में वे शहरों में गुजारा कर रहे थे , गाँव में वह तो नहीं रहेगी। विचारणीय है कि देश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाने वाले  कृषि क्षेत्र को बीते लम्बे समय से मजदूरों की किल्लत झेलनी पड़ रही थी। ग्रामीण कुटीर उद्योग के साथ ही परम्परागत हस्त शिल्प भी इससे प्रभावित हुआ। पहले खेती के साथ ही पशु पालन भी अनिवार्य रूप से होता था। खेती में बैल का उपयोग ज्यों-ज्यों कम होता गया आम किसान अपनी प्रिय गैया पालने से भी किनारा करने लगा। गाँव में दूध खरीदने का रिवाज ही नहीं था। अनेक किसानों ने ये स्वीकार किया कि गाय या भैंस उनके लिए आर्थिक दृष्टि से बेहद लाभप्रद हो सकती हैं। लेकिन नई पीढ़ी का खेती बाड़ी से उचटता मन और फिर गाँव छोड़ शहर चले जाने से उनके पास सहायक का अभाव हो गया। एक समय ऐसा था जब किसान की पत्नी और बच्चे भी मिलकर कृषि और उससे जुड़े समस्त कामों में हाथ बंटाते थे। शिक्षा और आधुनिकता के प्रसार ने भी कृषक परिवारों में कृषि के प्रति अरुचि पैदा की और ग्रामीण युवा भी शहरी ढंग में रंग गये। परिणाम ये हुआ कि खेती के प्रति पहले जैसा समर्पण भाव क्रमश: घटता गया। अनेक बड़े किसान अपनी खेती को अधबटाई पर देने लगे। पशुपालन से मुंह मोड़ लिया गया। इस वजह से जैविक की बजाय रासायनिक खाद का उपयोग मजबूरी बनी , जिसकी वजह से कहने को उत्पादकता तो बढ़ी लेकिन उससे लागत मूल्य बढ़ने के अलावा गुणवत्ता में कमी आई। इसका प्रमाण जैविक उत्पादनों की बढ़ती मांग है। कोरोना संकट से पैदा हुए हालात के बाद शहरों से श्रमिकों के पलायन के उपरान्त ही ये आशंका हुई कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और बेरोजगारी की भयावहता सामने आयेगी। अपराध और अराजकता में वृद्धि का भी खतरा जताया जाने लगा। सतही तौर पर ये आकलन गलत नहीं था किन्तु जब इसके सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान दिया गया तब ये तथ्य भी उभरकर सामने आने लगा कि न सिर्फ  देश के अन्य शहरों वरन विदेशों से अपने गाँव लौटे अनेक सुशिक्षित युवा भी पशुपालन के माध्यम से दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय करने का मन बना रहे हैं। इसका कारण गांवों में अचानक से बढ़ा मानव संसाधन है। शहरों से ठुकराए जाने के कारण श्रमिकों का एक बड़ा वर्ग इस बात को समझ चुका है कि गाँव भी उन्हें रोटी दे सकता है और वह भी कहीं ज्यादा इज्जत के साथ। और अब ग्रामीण इलाके सड़क और संचार के मामले में शहरों जैसे ही हैं। बिजली ने भी जीवन शैली में काफी बदलाव किये हैं। ऐसे में यदि शासन-प्रशासन और निर्वाचित जनप्रतिनिधि ईमानदारी से समन्वित प्रयास करें तो ग्रामीण भारत फिर से अपने पुराने सुनहरे दिनों को जीने के करीब पहुंच सकता है। शहरों के भीड़ भरे माहौल के बीच असंगठित की श्रेणी में बने रहने की बजाय गाँव लौटकर खेतिहर मजदूर बनना ज्यादा सुरक्षित और सुविधाजनक है। इससे जो सबसे बड़ा लाभ हो सकता है वह उद्योगों का ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ  आकर्षित होना , जहां सस्ती जमीन और मजदूर के अलावा शुद्ध पर्यावरण भी  है। शासन इन इलाकों में उद्योगों को भारी अनुदान भी देता है। और अब तो ग्रामीण क्षेत्रों तक सड़क, बिजली, मोबाईल फोन के साथ इंटरनेट सुविधा भी सहज उपलब्ध है। यदि इस सबका लाभ उठाते हुए कोरोना की आपदा को अवसर में बदलने के प्रधानमन्त्री के संकल्प को जमीन पर उतारा जावे तो आने वाले दो-तीन वर्षों में ही भारत के ग्रामीण क्षेत्र औद्योगिक क्रांति के नए केंद्र बन सकेंगे और ऐसा होना भारत की अर्थव्यवस्था के मेरुदंड को मजबूत करने में सहायक होगा। कोरोना पीड़ित जो श्रमिक वर्ग गाँव लौटा है उसे ये समझाए जाने की जरूरत हैं कि शहर के 500 से गाँव के 300 कहीं बेहतर हैं। बीते कुछ दशकों में शहरों पर आबादी का बोझ जहाँ बढ़ा वहीं गांवों के उजड़ने का दौर शुरू हो गया। एक ज़माने में श्रमिक केवल अकेला जाता था जबकि उसका परिवार गाँव में ही रहता। कालान्तर में उसने सपरिवार जाना शुरू कर दिया और यहीं से गाँवों का सामाजिक और आर्थिक ढांचा गड़बड़ होना शुरू हो गया। कोरोना की त्रासदी ने शहरों विशेष तौर पर महानगरों में रह रहे श्रमिकों को जिस तरह उनके अधिकार से वंचित करने के साथ ही प्रताड़ित और अपमानित किया गया, उसके घाव उनके मन-मष्तिष्क पर बहुत गहरे हैं। इसके पहले कि उनके नहीं लौटने की स्थिति में ग्रामीण इलाके बेरोजगारों का संग्रहालय बन जायें वहां उद्योग-व्यवसाय स्थापित करने का काम युद्धस्तर पर शुरू हो जाना चाहिए। प्राथमिकता तो कृषि आधारित उद्योगों को ही दी जाए। साथ ही कृषकों को भी खेती के काम में पूरा ध्यान देने हेतु प्रेरित और प्रोत्साहित किया जावे। सही मायने में ये समय देश में सकारात्मक बदलाव का है। यदि ये सही रूप में किया जा सका तो शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जो विषमता है उसे दूर करना मुश्किल नहीं होगा। सबका साथ, सबका विकास नारे के पीछे भी यही मंशा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 May 2020

लॉक डाउन अवधि का ब्याज माफ़ किया जाए




भारतीय रिजर्व बैंक इतना उदार पहले कभी नहीं रहा। कोरोना की वजह से अर्थव्यवस्था पर आये अभूतपूर्व संकट के समय वह लगातार उद्योग-व्यापार जगत की मदद कर रहा है। अमूमन वह प्रत्येक तीन महीने में मौद्रिक नीति की समीक्षा करता था किन्तु कोरोना से उत्पन्न हालातों में उसने बीते दो महीने में अनेक बार राहतों का पिटारा खोलते हुए एक तरफ  तो कर्ज सस्ता किया वहीं दूसरी तरफ  कर्जदारों को किश्तें चुकाने में आ रही दिक्कतों को दूर करने के लिए तीन महीने की जो मोहलत दी उसे भी गत दिवस तीन महीने और बढ़ा दिया। साथ ही कर्ज भी सस्ता करते हुए बैंकों के पास नये ऋण बाँटने के लिए और धन की उपलब्धता बढ़ा दी। केंद्र सरकार द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज में चूँकि अधिकतर प्रावधान बैंकों के कर्ज से जुड़े हैं इसलिए भी शायद ऐसा करना जरूरी हो गया था। लेकिन कर्ज की अदायगी में मिली मोहलत के बावजूद ब्याज में छूट नहीं दी गयी। जबकि कारोबारी अथवा निजी ऋण लेने वालों की अपेक्षा है कि लॉक डाउन के कारण व्यापारिक गतिविधियाँ चौपट होने से हुए नुकसान की भरपाई के लिए उस अवधि के ब्याज को माफ़  किया जाना चाहिए। दरअसल जो छोटे दुकानदार कम पूंजी से व्यवसाय करते हैं, बीते दो माह में उनकी पूंजी डूब गयी। नये सिरे से व्यवसाय शुरू करने के लिए उन्हें अतिरिक्त सहायता नहीं मिली तो उनकी कमर टूट जायेगी। चूँकि ऐसी स्थिति पहले कभी पैदा नहीं हुई इसलिए कारोबारी और नौकरपेशा सभी परेशान हैं। उद्योग जगत भी कारोबार ठप्प होने से मुसीबत में है। ऐसे में सामान्य अपेक्षा ये है कि व्यवसायिक एवं निजी कर्जों पर कम से कम तीन महीने के ब्याज को सरकार माफ़ करे। इससे व्यापार-उद्योग जगत के साथ ही अपनी निजी जरूरतों के लिये ऋण लेने वाले मध्यमवर्गीय कर्जदारों को मनोवैज्ञानिक राहत मिलेगी। लोगों का ये सोचना गलत नहीं है कि उन्होंने लॉकडाउन को सफल बनाने में चूँकि पूरी ईमानदारी से योगदान दिया इसलिए अब सरकार का फर्ज बनता है कि उनके लिए आभार स्वरूप वह अप्रैल से जून का ब्याज माफ कर दे। इस बारे में एक बात ध्यान देने योग्य है कि अब तक सरकार के किसी भी कदम से नौकरपेशा मध्यमवर्ग और उसी श्रेणी के कारोबारियों को कोई राहत नहीं मिली। किराना, दूध, दवाई, सब्जी और फलों का कारोबार तो चलता रहा लेकिन उसमें भी तुलनात्मक रूप से गिरावट रही क्योंकि मजदूरों के साथ ही निजी क्षेत्र में छटनी और वेतन कटौती के कारण उपभोक्ताओं के बड़े वर्ग की क्रय क्षमता में जबरदस्त कमी आ गयी। सरकार को भी यदि राजस्व चाहिए तो उसे बाजार को गुलजार करना पड़ेगा। आज की स्थिति में लॉक डाउन पूरी तरह से हट जाने के बाद भी उद्योग-व्यवसाय में गतिशीलता तब तक नहीं आयेगी जब तक उत्पादक , व्यापारी और उपभोक्ता तीनों तनावमुक्त न हों। मौजूदा हालात में तो असुरक्षा का भाव ही सर्वत्र व्याप्त है। जिसके पास कारोबारी पूंजी यदि है तब भी वह अनिश्चितता के चलते उसका इस्तेमाल करने से हिचकेगा और खरीददार भी किसी चीज के लिए तब तक रुका रहेगा जब तक उससे खरीदना उसके लिए अनिवार्य न हो जाए। अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के अलावा अब तो रिजर्व बैंक ने भी ये मान लिया है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में केवल कृषि क्षेत्र से ही अच्छे परिणाम मिले और बाकी सबमें गिरावट आई। इस कारण अब ये सुनिश्चित हो गया है कि भले ही सितम्बर से मार्च तक की आगामी छमाही में कारोबारी जगत कितने भी अच्छे नतीजे दे लेकिन विकास दर बढ़ना तो दूर उसके शून्य से भी नीचे जाने के आसार हैं। अब देखने वाली बात ये होगी कि वह कितने नीचे जाती है। हालांकि दुनिया भर के अर्थशास्त्री ये मानकर चल रहे हैं कि 2021-22 वाले वित्तीय वर्ष में भारत फिर वापिसी करेगा और विकास दर 5 से 7 फीसदी के लगभग हो जायेगी। लेकिन इसके लिए कारोबारी जगत के साथ ही उपभोक्ता के मन में उत्साह भरना जरूरी है। सरकार को ये बात समझ लेनी चाहिए कि उद्योग-व्यापार और उपभोक्ता तीनों का हौसला यदि नहीं बढ़ाया गया तब उसके खजाने में भी टैक्स कम आएगा और लगातार कारोबारी सुस्ती से विकास का पहिया जंग खाने के बाद लम्बे समय तक नहीं चल सकेगा। राज्यों में भी उद्योगों पर बिजली बिल का भार बढ़ गया है। स्थायी प्रभार के नाम पर बिजली कम्पनियां लॉक डाउन अवधि का भारी-भरकम बिल वसूलने का दबाव बना रही हैं। ये सब देखते हुए अब जो भी राहत दी जाए वह पिछले गड्ढे भरने की दृष्टि से होनी चाहिए क्योंकि एक बार काम चल निकला तो बाकी की व्यवस्था उद्योगपति-व्यापारी और मध्यमवर्गीय उपभोक्ता खुद ब खुद कर लेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 May 2020

छोटे बच्चों के स्कूल खोलने में जल्दबाजी न की जाए



सुना है 15 जुलाई से स्कूल खोलने पर विचार चल रहा है। लेकिन पूरे बच्चों को बुलाने की बजाय आधे या एक तिहाई को आने के लिए कहा जाएगा। साथ ही स्टाफ  को कोरोना से बचाव के तरीकों का प्रशिक्षण देने के बाद बच्चों को भी सैनिटाइजर, मास्क और  सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में समझाइश दी जायेगी तथा हर कक्षा के लिए अलग टॉयलेट एवं पानी पीने का स्थान तय किया जाएगा। इसके पहले जो संकेत थे उनके अनुसार इस वर्ष शैक्षणिक सत्र  एक सितम्बर से शुरू किये जाने की खबर थी। इसके पीछे सोच यह रही  कि एक तो स्कूल खुलते ही सड़कों पर भारी भीड़ हो जायेगी। दूसरे बच्चों से शारीरिक दूरी बनाये रखने की अपेक्षा किस हद तक पूरी हो सकेगी ये भी  निश्चित नहीं है। अधिकांश छोटे बच्चे आजकल ऑटो या बस से जाते हैं। ऐसे में डिस्टेंसिंग बनाये रखना आसान नहीं होगा। और यदि एक तिहाई और आधे बच्चे ही बुलाये जायेंगे तो फिर पढ़ाई भी  ढंग से नहीं हो सकेगी। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि ऐसा करना मात्र औपचारिकता होगी। सबसे बड़ी बात ये है कि जुलाई के मध्य में कोरोना संक्रमण चरमोत्कर्ष पर होने की बात कही जा रही है। ऐसे में कम उम्र के बच्चों का थोक में घरों से बाहर निकलना उनके लिए बेहद खतरनाक हो सकता है। लॉक डाउन के दौरान उनको बाहर  जाने से मना करने के पीछे संक्रमण से बचाना ही था। ऐसे में जब कोरोना अपने पूरे उफान पर होगा तब स्कूल खोलना अव्यवहारिक फैसला ही कहा जाएगा । जहाँ तक बात बच्चों का साल  खराब होने की है तो वह उनकी  जिन्दगी से बड़ा नहीं है। ये देखते हुए सरकार को किसी भी हाल में छोटे बच्चों की कक्षाओं के सितम्बर के पहले प्रारम्भ करने के बारे में तो सोचना भी नहीं चाहिए। जिस  तरह की व्यवस्थाओं के बारे में सरकार कह रही है वे तो महंगे स्कूलों तक में उपलब्ध नहीं होतीं । सरकारी स्कूलों की तो बात ही व्यर्थ है। इस तरह 50 फीसदी छात्रों को बुलाने पर सप्ताह में तीन दिन और 33 फीसदी पर दो दिन स्कूल में और बाकी समय घर बैठे ऑन लाइन पढ़ाई की व्यवस्था  अधकचरी सोच ही दर्शाती है। स्कूली बच्चे कोई प्रवासी मजदूर तो हैं नहीं जिन्हें मजबूरी वश किसी भी तरह से उनके घर पहुंचाने की बाध्यता सरकार के सामने हो। समाचार माध्यम या कोई राजनीतिक पार्टी अथवा उसके नेता ने भी 15 जुलाई से स्कूल खोलने की मांग नहीं की। ये तो ठीक है कि जितनी जल्दी  हो सके सभी व्यवस्थाओं को पटरी पर लाना जरुरी है किन्तु लॉक डाउन लगाने के पीछे का उद्देश्य लोगों को संक्रमण से बचाते हुए कोरोना के फैलाव को नियंत्रित करना ही तो था। निश्चित रूप से वह  अपने उद्देश्य में सफल रहा वरना भारत की विशाल आबादी को देखते हुए अब तक तो लाखों लोग कोरोना के शिकार हो चुके होते। वहीं मरने वालों  का आंकड़ा भी कई  गुना ज्यादा रहता। चौथा चरण आते तक लॉक डाउन में दी जा रही ढील भी अपनी जगह ठीक है। एहतियात बरतते हुए बाजार और दफ्तर शुरू करने की जरूरत से कोई इंकार भी नहीं करेगा किन्तु बच्चों का स्कूल खोलना तब तक तर्कसंगत नहीं होगा जब तक कोरोना पूरी तरह ढलान पर नहीं आ जाए। जिन राज्यों में अभी तक वह  नियन्त्रण में रहा वहां भी प्रवासी श्रमिकों के लौटने से अब नये संक्रमित सामने आने लगे हैं। इसीलिए ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि जून और जुलाई में संक्रमण का आंकड़ा सर्वोच्च स्तर तक जा पहुंचेगा। और उस स्थिति में बच्चों को स्कूल भेजने के लिए  उनके अभिभावक कितने राजी होंगे, ये बड़ा प्रश्न है। जहां तक बात हाई स्कूल और महाविद्यालयों की है तो वहां के छात्र इतने परिपक्व माने जा सकते हैं कि कोरोना से बचने के लिए अपेक्षित सावधानियों का पालन करें। लेकिन प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं के बच्चों का मानसिक स्तर देखते हुए उन्हें स्कूल बुलाना नई समस्या को जन्म दे सकता है। और फिर इस उम्र के बालक-बालिकाओं को बहुत ज्यादा डराना भी उन पर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बुरा प्रभाव डाल सकता है। सभी पहलुओं को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह हो सके तो एक सितम्बर से नया शैक्षणिक सत्र शुरू करने के बारे में निर्णय करे , वह भी इस शर्त के साथ कि तब तक कोरोना संकट खत्म हो जाएगा अथवा न्यूनतम स्तर पर जा पहुंचेगा। ये कहना कि हमें उसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए आसान है किन्तु किसी भी कीमत और कारण से छोटे बच्चों के प्राण संकट में डालने का दुस्साहस बुद्धिमानी नहीं होगी। शुरुवात में विवि अनुदान आयोग ने भी नये सत्र  हेतु एक सितम्बर की तारीख कुछ सोचकर ही निश्चित की थी। सीबीएसई को भी इस वर्ष का पाठ्यक्रम इस तरह से तय करने कहे जाने की जानकारी आई थी जो सितम्बर से मार्च तक पूरा हो सके। अचानक ऐसा क्या हो गया जिससे  सरकार का मन बदलने लगा। बेहतर हो बिना लागलपेट के वह अपने निर्णय को स्पष्ट करते हुए 15 जुलाई से स्कूल खोलने के फैसले को टाले। अधिकतर राज्य भी इतनी जल्दी सत्र शुरू करने सहमत नहीं होंगे। जिस तरह  की स्थितियां नजर आ रही हैं उन्हें देखते हुए तो अगस्त के पहले कोरोना का प्रकोप घटने की संभावना ही नहीं है और इसीलिये एक सितम्बर के पूर्व स्कूल खोले  जाने का कोई औचित्य नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 May 2020

लॉक डाउन : ढील का गलत फायदा न उठायें



दुकानें खुलने लगीं, वाहन चलने लगे, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में भी चहल-पहल बढ़ गयी है। कुछ दिनों बाद हवाई यात्रा भी शुरू हो जायेगी और एक जून से श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा गैर वातानुकूलित रेलें चलाये जाने की तैयारी भी हो गई है। लॉक डाउन यूं तो 31 मई तक बढ़ गया है किन्तु उसमें ढिलाई या कड़ाई करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया गया। ये सब जनजीवन को सामान्य करने के उद्देश्य से किया गया है। आखिर वर्क  फ्रॉम होम हर किसी के लिए तो संभव नहीं है। जाहिर है लॉक डाउन में ढील से बाजार एवं बाकी स्थानों पर भीड़ बढ़ेगी और शारीरिक दूरी हेतु अपनाया जाने वाला सोशल डिस्टेसिंग भी काफी हद तक प्रभावित होगा। लेकिन बीते दो महीनों में कोरोना ने लगभग सभी को उससे बचाव के तौर-तरीके तो सिखा ही दिए हैं। सावधानी भी बरती जा रही है। अनेक ग्रामों में बाहर से आये परिजनों को क्वारंटीन किये जाने पर कोई उनसे मिलने नहीं जा रहा। हवाई जहाज में भी कुछ सीटें खाली रखे जाने की व्यवस्था रहेगी जिससे शारीरिक दूरी बनी रहे। रेलों में मिडिल बर्थ खाली रहेगी। मास्क हर जगह अनिवार्य कर दिया गया है। दुकानों के अलावा साग-सब्जी और फल बेचने वाले तक को मास्क बेचने की अनुमति दी गई है ताकि बिना मास्क के आये ग्राहक को पहले मास्क बेचा जा सके। व्यापारिक गतिविधियाँ दोबारा शुरू होने से लोगों में उदासी और डर तो बेशक कम होगा ही, व्यापारी को हो रहा घाटा भी काफी हद तक कम हो सकेगा, जो दो महीने से घरों में बैठा है। सरकार को राजस्व मिलने का रास्ता खुल जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखें तो नगर निगम जबलपुर लॉक डाउन शिथिल होते ही सम्पत्ति कर के रूप में एक करोड़ रु. रोज वसूलने की स्थिति में आ गई। सड़कों पर वाहन निकलने से पेट्रोल-डीजल की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। अदालतों में भी तकनीक के जरिये काम शुरू हो गया है। शिक्षा जगत ने तो शुरुवात में ही ऑन लाइन तकनीक का सहारा लेकर अपना काम जारी रखा। और अब तो सरकार और विश्वविद्यालय तक ऑन लाइन शिक्षा को बढ़ावा देने में जुट गये हैं। व्यापार में भी होम डिलीवरी एक अनिवार्यता बनती दिख रही है। रेस्टारेंट में जाकर लंच-डिनर करने के बजाय आर्डर देकर घर पर भोजन बुलवाने का चलन बढ़ चला है। कोरोना के बाद की जीवनशैली में ऑन लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग नामक तत्व अनिवार्य रूप से समाहित रहेंगे। अब तो इंडियन कॉफ़ी हाउस तक होम डिलीवरी देने लगे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि जब कोरोना के मामले मुट्ठी भर थे तब तो लोगों के घरों से बाहर आने पर बंदिश लगाई गयी और अब जबकि कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख दस हजार से भी ऊपर जा निकली है और प्रतिदिन 5 हजार से ज्यादा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं तब लॉक डाउन में ढील देना किस तरह की बुद्धिमत्ता है, ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि प्रवासी मजदूरों की वापिसी और उसी दौरान लॉक डाउन में शिथिलता से कहीं संक्रमण का फैलाव और तेज न हो जाए। लेकिन ये बात भी सही है कि इसके बाद सब कुछ बंद करके रखा जाना भी मुश्किल होता। दो महीने तक कोरोना के माहौल में जीने के बाद अब जनता को भी इस बीमारी से बचने के साधारण तरीके समझ में आ गये हैं। और इसीलिये ये ढील दी जा रही है जिससे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मजबूत बनाया जा सके। लेकिन ये जनता खास तौर पर शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे आत्मानुशासन का परिचय दें। घर से बाहर निकलने की सुविधा का अर्थ सैर-सपाटा न समझा जाए। बाजारों में भीड़ बढ़ाने की बजाय अपने नजदीकी छोटे दुकानदार से खरीदी की जाए। जाहिर तौर पर अभी तकलीफें रहेंगीं लेकिन आम जनता का व्यापक हित देखते हुए ये जरूरी है कि मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर की तरह से लॉक डाउन को भी हम अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं। कोरोना का प्रकोप भले धीरे-धीरे कमजोर होता जाए किन्तु वह खत्म नहीं होगा। और इसलिए हमें उससे बचाव के प्रति हर समय और हर जगह जागरूक और सतर्क रहना होगा। जैसा बताया जा रहा है उसके अनुसार कोरोना का चरमोत्कर्ष भारत में अभी आने को है। लेकिन ये भी सही है कि उससे मुकाबले का तन्त्र भी विकसित हो चुका है। कोरोना जानलेवा हो सकता है लेकिन हर संक्रमित की मौत हो जाए ये अवधारणा गलत साबित हो चुकी है। भारत में उससे संक्रमित लोगों में मृत्युदर का प्रतिशत बहुत कम होने से उम्मीद बढ़ी है। और उसी के कारण 1 लाख से ज्यादा संक्रमण हो जाने के बाद भी लॉक डाउन में ढील देने का साहस किया जा रहा है। लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि यदि शारीरिक दूरी की उपेक्षा की गई और उस वजह से संक्रमण बढ़ा तब लॉक डाउन पहले जैसा सख्त करना पड़ेगा जो किसी सजा से कम नहीं होगा।Y

लॉक डाउन : ढील का गलत फायदा न उठायें

दुकानें खुलने लगीं, वाहन चलने लगे, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में भी चहल-पहल बढ़ गयी है। कुछ दिनों बाद हवाई यात्रा भी शुरू हो जायेगी और एक जून से श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा गैर वातानुकूलित रेलें चलाये जाने की तैयारी भी हो गई है। लॉक डाउन यूं तो 31 मई तक बढ़ गया है किन्तु उसमें ढिलाई या कड़ाई करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया गया। ये सब जनजीवन को सामान्य करने के उद्देश्य से किया गया है। आखिर वर्क  फ्रॉम होम हर किसी के लिए तो संभव नहीं है। जाहिर है लॉक डाउन में ढील से बाजार एवं बाकी स्थानों पर भीड़ बढ़ेगी और शारीरिक दूरी हेतु अपनाया जाने वाला सोशल डिस्टेसिंग भी काफी हद तक प्रभावित होगा। लेकिन बीते दो महीनों में कोरोना ने लगभग सभी को उससे बचाव के तौर-तरीके तो सिखा ही दिए हैं। सावधानी भी बरती जा रही है। अनेक ग्रामों में बाहर से आये परिजनों को क्वारंटीन किये जाने पर कोई उनसे मिलने नहीं जा रहा। हवाई जहाज में भी कुछ सीटें खाली रखे जाने की व्यवस्था रहेगी जिससे शारीरिक दूरी बनी रहे। रेलों में मिडिल बर्थ खाली रहेगी। मास्क हर जगह अनिवार्य कर दिया गया है। दुकानों के अलावा साग-सब्जी और फल बेचने वाले तक को मास्क बेचने की अनुमति दी गई है ताकि बिना मास्क के आये ग्राहक को पहले मास्क बेचा जा सके। व्यापारिक गतिविधियाँ दोबारा शुरू होने से लोगों में उदासी और डर तो बेशक कम होगा ही, व्यापारी को हो रहा घाटा भी काफी हद तक कम हो सकेगा, जो दो महीने से घरों में बैठा है। सरकार को राजस्व मिलने का रास्ता खुल जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखें तो नगर निगम जबलपुर लॉक डाउन शिथिल होते ही सम्पत्ति कर के रूप में एक करोड़ रु. रोज वसूलने की स्थिति में आ गई। सड़कों पर वाहन निकलने से पेट्रोल-डीजल की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। अदालतों में भी तकनीक के जरिये काम शुरू हो गया है। शिक्षा जगत ने तो शुरुवात में ही ऑन लाइन तकनीक का सहारा लेकर अपना काम जारी रखा। और अब तो सरकार और विश्वविद्यालय तक ऑन लाइन शिक्षा को बढ़ावा देने में जुट गये हैं। व्यापार में भी होम डिलीवरी एक अनिवार्यता बनती दिख रही है। रेस्टारेंट में जाकर लंच-डिनर करने के बजाय आर्डर देकर घर पर भोजन बुलवाने का चलन बढ़ चला है। कोरोना के बाद की जीवनशैली में ऑन लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग नामक तत्व अनिवार्य रूप से समाहित रहेंगे। अब तो इंडियन कॉफ़ी हाउस तक होम डिलीवरी देने लगे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि जब कोरोना के मामले मुट्ठी भर थे तब तो लोगों के घरों से बाहर आने पर बंदिश लगाई गयी और अब जबकि कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख दस हजार से भी ऊपर जा निकली है और प्रतिदिन 5 हजार से ज्यादा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं तब लॉक डाउन में ढील देना किस तरह की बुद्धिमत्ता है, ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि प्रवासी मजदूरों की वापिसी और उसी दौरान लॉक डाउन में शिथिलता से कहीं संक्रमण का फैलाव और तेज न हो जाए। लेकिन ये बात भी सही है कि इसके बाद सब कुछ बंद करके रखा जाना भी मुश्किल होता। दो महीने तक कोरोना के माहौल में जीने के बाद अब जनता को भी इस बीमारी से बचने के साधारण तरीके समझ में आ गये हैं। और इसीलिये ये ढील दी जा रही है जिससे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मजबूत बनाया जा सके। लेकिन ये जनता खास तौर पर शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे आत्मानुशासन का परिचय दें। घर से बाहर निकलने की सुविधा का अर्थ सैर-सपाटा न समझा जाए। बाजारों में भीड़ बढ़ाने की बजाय अपने नजदीकी छोटे दुकानदार से खरीदी की जाए। जाहिर तौर पर अभी तकलीफें रहेंगीं लेकिन आम जनता का व्यापक हित देखते हुए ये जरूरी है कि मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर की तरह से लॉक डाउन को भी हम अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं। कोरोना का प्रकोप भले धीरे-धीरे कमजोर होता जाए किन्तु वह खत्म नहीं होगा। और इसलिए हमें उससे बचाव के प्रति हर समय और हर जगह जागरूक और सतर्क रहना होगा। जैसा बताया जा रहा है उसके अनुसार कोरोना का चरमोत्कर्ष भारत में अभी आने को है। लेकिन ये भी सही है कि उससे मुकाबले का तन्त्र भी विकसित हो चुका है। कोरोना जानलेवा हो सकता है लेकिन हर संक्रमित की मौत हो जाए ये अवधारणा गलत साबित हो चुकी है। भारत में उससे संक्रमित लोगों में मृत्युदर का प्रतिशत बहुत कम होने से उम्मीद बढ़ी है। और उसी के कारण 1 लाख से ज्यादा संक्रमण हो जाने के बाद भी लॉक डाउन में ढील देने का साहस किया जा रहा है। लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि यदि शारीरिक दूरी की उपेक्षा की गई और उस वजह से संक्रमण बढ़ा तब लॉक डाउन पहले जैसा सख्त करना पड़ेगा जो किसी सजा से कम नहीं होगा।


मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
-रवीन्द्र वाजपेयी


लॉक डाउन : ढील का गलत फायदा न उठायें

दुकानें खुलने लगीं, वाहन चलने लगे, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में भी चहल-पहल बढ़ गयी है। कुछ दिनों बाद हवाई यात्रा भी शुरू हो जायेगी और एक जून से श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा गैर वातानुकूलित रेलें चलाये जाने की तैयारी भी हो गई है। लॉक डाउन यूं तो 31 मई तक बढ़ गया है किन्तु उसमें ढिलाई या कड़ाई करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया गया। ये सब जनजीवन को सामान्य करने के उद्देश्य से किया गया है। आखिर वर्क  फ्रॉम होम हर किसी के लिए तो संभव नहीं है। जाहिर है लॉक डाउन में ढील से बाजार एवं बाकी स्थानों पर भीड़ बढ़ेगी और शारीरिक दूरी हेतु अपनाया जाने वाला सोशल डिस्टेसिंग भी काफी हद तक प्रभावित होगा। लेकिन बीते दो महीनों में कोरोना ने लगभग सभी को उससे बचाव के तौर-तरीके तो सिखा ही दिए हैं। सावधानी भी बरती जा रही है। अनेक ग्रामों में बाहर से आये परिजनों को क्वारंटीन किये जाने पर कोई उनसे मिलने नहीं जा रहा। हवाई जहाज में भी कुछ सीटें खाली रखे जाने की व्यवस्था रहेगी जिससे शारीरिक दूरी बनी रहे। रेलों में मिडिल बर्थ खाली रहेगी। मास्क हर जगह अनिवार्य कर दिया गया है। दुकानों के अलावा साग-सब्जी और फल बेचने वाले तक को मास्क बेचने की अनुमति दी गई है ताकि बिना मास्क के आये ग्राहक को पहले मास्क बेचा जा सके। व्यापारिक गतिविधियाँ दोबारा शुरू होने से लोगों में उदासी और डर तो बेशक कम होगा ही, व्यापारी को हो रहा घाटा भी काफी हद तक कम हो सकेगा, जो दो महीने से घरों में बैठा है। सरकार को राजस्व मिलने का रास्ता खुल जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखें तो नगर निगम जबलपुर लॉक डाउन शिथिल होते ही सम्पत्ति कर के रूप में एक करोड़ रु. रोज वसूलने की स्थिति में आ गई। सड़कों पर वाहन निकलने से पेट्रोल-डीजल की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। अदालतों में भी तकनीक के जरिये काम शुरू हो गया है। शिक्षा जगत ने तो शुरुवात में ही ऑन लाइन तकनीक का सहारा लेकर अपना काम जारी रखा। और अब तो सरकार और विश्वविद्यालय तक ऑन लाइन शिक्षा को बढ़ावा देने में जुट गये हैं। व्यापार में भी होम डिलीवरी एक अनिवार्यता बनती दिख रही है। रेस्टारेंट में जाकर लंच-डिनर करने के बजाय आर्डर देकर घर पर भोजन बुलवाने का चलन बढ़ चला है। कोरोना के बाद की जीवनशैली में ऑन लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग नामक तत्व अनिवार्य रूप से समाहित रहेंगे। अब तो इंडियन कॉफ़ी हाउस तक होम डिलीवरी देने लगे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि जब कोरोना के मामले मुट्ठी भर थे तब तो लोगों के घरों से बाहर आने पर बंदिश लगाई गयी और अब जबकि कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख दस हजार से भी ऊपर जा निकली है और प्रतिदिन 5 हजार से ज्यादा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं तब लॉक डाउन में ढील देना किस तरह की बुद्धिमत्ता है, ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि प्रवासी मजदूरों की वापिसी और उसी दौरान लॉक डाउन में शिथिलता से कहीं संक्रमण का फैलाव और तेज न हो जाए। लेकिन ये बात भी सही है कि इसके बाद सब कुछ बंद करके रखा जाना भी मुश्किल होता। दो महीने तक कोरोना के माहौल में जीने के बाद अब जनता को भी इस बीमारी से बचने के साधारण तरीके समझ में आ गये हैं। और इसीलिये ये ढील दी जा रही है जिससे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मजबूत बनाया जा सके। लेकिन ये जनता खास तौर पर शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे आत्मानुशासन का परिचय दें। घर से बाहर निकलने की सुविधा का अर्थ सैर-सपाटा न समझा जाए। बाजारों में भीड़ बढ़ाने की बजाय अपने नजदीकी छोटे दुकानदार से खरीदी की जाए। जाहिर तौर पर अभी तकलीफें रहेंगीं लेकिन आम जनता का व्यापक हित देखते हुए ये जरूरी है कि मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर की तरह से लॉक डाउन को भी हम अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं। कोरोना का प्रकोप भले धीरे-धीरे कमजोर होता जाए किन्तु वह खत्म नहीं होगा। और इसलिए हमें उससे बचाव के प्रति हर समय और हर जगह जागरूक और सतर्क रहना होगा। जैसा बताया जा रहा है उसके अनुसार कोरोना का चरमोत्कर्ष भारत में अभी आने को है। लेकिन ये भी सही है कि उससे मुकाबले का तन्त्र भी विकसित हो चुका है। कोरोना जानलेवा हो सकता है लेकिन हर संक्रमित की मौत हो जाए ये अवधारणा गलत साबित हो चुकी है। भारत में उससे संक्रमित लोगों में मृत्युदर का प्रतिशत बहुत कम होने से उम्मीद बढ़ी है। और उसी के कारण 1 लाख से ज्यादा संक्रमण हो जाने के बाद भी लॉक डाउन में ढील देने का साहस किया जा रहा है। लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि यदि शारीरिक दूरी की उपेक्षा की गई और उस वजह से संक्रमण बढ़ा तब लॉक डाउन पहले जैसा सख्त करना पड़ेगा जो किसी सजा से कम नहीं होगा।

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
-रवीन्द्र वाजपेयी


लॉक डाउन : ढील का गलत फायदा न उठायें

दुकानें खुलने लगीं, वाहन चलने लगे, सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में भी चहल-पहल बढ़ गयी है। कुछ दिनों बाद हवाई यात्रा भी शुरू हो जायेगी और एक जून से श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा गैर वातानुकूलित रेलें चलाये जाने की तैयारी भी हो गई है। लॉक डाउन यूं तो 31 मई तक बढ़ गया है किन्तु उसमें ढिलाई या कड़ाई करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया गया। ये सब जनजीवन को सामान्य करने के उद्देश्य से किया गया है। आखिर वर्क  फ्रॉम होम हर किसी के लिए तो संभव नहीं है। जाहिर है लॉक डाउन में ढील से बाजार एवं बाकी स्थानों पर भीड़ बढ़ेगी और शारीरिक दूरी हेतु अपनाया जाने वाला सोशल डिस्टेसिंग भी काफी हद तक प्रभावित होगा। लेकिन बीते दो महीनों में कोरोना ने लगभग सभी को उससे बचाव के तौर-तरीके तो सिखा ही दिए हैं। सावधानी भी बरती जा रही है। अनेक ग्रामों में बाहर से आये परिजनों को क्वारंटीन किये जाने पर कोई उनसे मिलने नहीं जा रहा। हवाई जहाज में भी कुछ सीटें खाली रखे जाने की व्यवस्था रहेगी जिससे शारीरिक दूरी बनी रहे। रेलों में मिडिल बर्थ खाली रहेगी। मास्क हर जगह अनिवार्य कर दिया गया है। दुकानों के अलावा साग-सब्जी और फल बेचने वाले तक को मास्क बेचने की अनुमति दी गई है ताकि बिना मास्क के आये ग्राहक को पहले मास्क बेचा जा सके। व्यापारिक गतिविधियाँ दोबारा शुरू होने से लोगों में उदासी और डर तो बेशक कम होगा ही, व्यापारी को हो रहा घाटा भी काफी हद तक कम हो सकेगा, जो दो महीने से घरों में बैठा है। सरकार को राजस्व मिलने का रास्ता खुल जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखें तो नगर निगम जबलपुर लॉक डाउन शिथिल होते ही सम्पत्ति कर के रूप में एक करोड़ रु. रोज वसूलने की स्थिति में आ गई। सड़कों पर वाहन निकलने से पेट्रोल-डीजल की बिक्री भी प्रारम्भ हो गई। अदालतों में भी तकनीक के जरिये काम शुरू हो गया है। शिक्षा जगत ने तो शुरुवात में ही ऑन लाइन तकनीक का सहारा लेकर अपना काम जारी रखा। और अब तो सरकार और विश्वविद्यालय तक ऑन लाइन शिक्षा को बढ़ावा देने में जुट गये हैं। व्यापार में भी होम डिलीवरी एक अनिवार्यता बनती दिख रही है। रेस्टारेंट में जाकर लंच-डिनर करने के बजाय आर्डर देकर घर पर भोजन बुलवाने का चलन बढ़ चला है। कोरोना के बाद की जीवनशैली में ऑन लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग नामक तत्व अनिवार्य रूप से समाहित रहेंगे। अब तो इंडियन कॉफ़ी हाउस तक होम डिलीवरी देने लगे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि जब कोरोना के मामले मुट्ठी भर थे तब तो लोगों के घरों से बाहर आने पर बंदिश लगाई गयी और अब जबकि कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1 लाख दस हजार से भी ऊपर जा निकली है और प्रतिदिन 5 हजार से ज्यादा नये संक्रमित सामने आ रहे हैं तब लॉक डाउन में ढील देना किस तरह की बुद्धिमत्ता है, ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि प्रवासी मजदूरों की वापिसी और उसी दौरान लॉक डाउन में शिथिलता से कहीं संक्रमण का फैलाव और तेज न हो जाए। लेकिन ये बात भी सही है कि इसके बाद सब कुछ बंद करके रखा जाना भी मुश्किल होता। दो महीने तक कोरोना के माहौल में जीने के बाद अब जनता को भी इस बीमारी से बचने के साधारण तरीके समझ में आ गये हैं। और इसीलिये ये ढील दी जा रही है जिससे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मजबूत बनाया जा सके। लेकिन ये जनता खास तौर पर शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे आत्मानुशासन का परिचय दें। घर से बाहर निकलने की सुविधा का अर्थ सैर-सपाटा न समझा जाए। बाजारों में भीड़ बढ़ाने की बजाय अपने नजदीकी छोटे दुकानदार से खरीदी की जाए। जाहिर तौर पर अभी तकलीफें रहेंगीं लेकिन आम जनता का व्यापक हित देखते हुए ये जरूरी है कि मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर की तरह से लॉक डाउन को भी हम अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं। कोरोना का प्रकोप भले धीरे-धीरे कमजोर होता जाए किन्तु वह खत्म नहीं होगा। और इसलिए हमें उससे बचाव के प्रति हर समय और हर जगह जागरूक और सतर्क रहना होगा। जैसा बताया जा रहा है उसके अनुसार कोरोना का चरमोत्कर्ष भारत में अभी आने को है। लेकिन ये भी सही है कि उससे मुकाबले का तन्त्र भी विकसित हो चुका है। कोरोना जानलेवा हो सकता है लेकिन हर संक्रमित की मौत हो जाए ये अवधारणा गलत साबित हो चुकी है। भारत में उससे संक्रमित लोगों में मृत्युदर का प्रतिशत बहुत कम होने से उम्मीद बढ़ी है। और उसी के कारण 1 लाख से ज्यादा संक्रमण हो जाने के बाद भी लॉक डाउन में ढील देने का साहस किया जा रहा है। लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि यदि शारीरिक दूरी की उपेक्षा की गई और उस वजह से संक्रमण बढ़ा तब लॉक डाउन पहले जैसा सख्त करना पड़ेगा जो किसी सजा से कम नहीं होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 May 2020

प्रवासी पलायन : ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो



देश की राजधानी दिल्ली के साथ ही व्यावसायिक राजधानी  मुबंई में विभिन्न राज्यों के जो मजदूर कार्यरत थे उनमें से अधिकतर वापिस चले गये और जो शेष  हैं वे  भी  मौका मिलते ही अपने - अपने गाँव चले जायेंगे | जैसे हालात बन रहे हैं उन्हें देखते हुए लम्बे समय तक उनकी वापिसी सम्भव नहीं दिखती | भले ही व्यापार और उद्योग फिर से शुरू  हो जाएँ लेकिन कोरोना संक्रमण का फैलाव जिस तरह बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए लौट गये लोगों  में से शायद ही कोई  जल्द वापिस आये | ये बात सही है कि बिना काम किये गुजारा भी नहीं है । लेकिन जान है तो जहान है वाली बात कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है | इन महानगरों में तमाम कोशिशों के बावजूद  भी नये मरीजों का पता लगने से ये स्पष्ट है कि वहां  के हालात  सामान्य होने में अभी लम्बा समय लगेगा | ये भी खबर है कि उनके गृहराज्य की सरकारें उनके लिए राशन -  पानी  के साथ ही रोजगार का इंतजाम भी कर रही हैं | केंद्र सरकार ने तो उनको तीन महीने तक बिना राशन कार्ड के भी  अनाज देने की बात कही है | दरअसल जिन  राज्यों में मजदूरों की वापिसी हुई उनकी सरकार को लग रहा है कि उन्हें अगर यहीं काम में लगा दिया जाए तो श्रमिकों की कमी दूर हो सकेगी जिसके कारण  विकास के कार्य या तो रुके पड़े रहते  हैं या फिर  कछुआ गति से चलते  हैं | आज ही मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी तदाशय का आश्वासन दिया है | उप्र में जिला स्तर पर ही नये उद्योगों की योजना योगी सरकार  बना रही  है | लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो दूसरा पहलू ये भी है कि बड़ी संख्या ऐसे मजदूरों की है जो हाल ही में हुए दर्दनाक अनुभवों के कारण अब गाँव के अलावा आसपास ही काम करना चाहेंगे | यदि ऐसा हुआ तब महानगरों के उद्योग - व्यापार ही नहीं अपितु अन्य क्षेत्रों में भी उसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा | उदाहरण के तौर पर मुम्बई से हजारों टैक्सी और ऑटो वाले अपने वाहन से ही सपरिवार गाँव लौट गए | उनमें से अनेक का कहना है कि उन पर  बैंक का जो कर्ज है वह तो चुकायेंगे ही किन्तु  मुम्बई में जाकर काम करने को लेकर अभी फैसला नहीं किया है |  मजदूरी करने वालों का मन भी बड़े शहरों से उचट गया है | ये नये प्रकार की स्थिति है। लेकिन इसका एक लाभ ये भी है कि महानगरों की भीड़ कुछ कम करते हुए स्थानीय लोगों को रोजगार देने की योजना पर क्रियान्वयन हो | दुनिया में  अनेक देश ऐसे हैं जो विदेशियों को काम करने के लिये परमिट जारी करते हैं | ये इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें कितना मानव संसाधन चाहिए | बेहतर  हो अब महानगरों में अन्य राज्यों से आने वाले मजदूरों को लेकर भी इस तरह के नियम बनें जिससे उनके आवास आदि की समुचित व्यवस्था की जा सके | यदि वे किसी ठेकेदार के माध्यम से आये हुए हों तो इन मजदूरों की कुशलता का दायित्व क़ानूनन उसी का हो | बाहर से आने वाले किसी भी  श्रमिक को झुग्गी - झोपड़ी में रहने  की अनुमत्ति नहीं देनी चाहिए  | मुम्बई और दिल्ली ही नहीं चेन्नई , अहमदाबाद , बेंगुलुरु जैसे शहरों से लाखों श्रमिकों के पलायन के बाद जिन बस्तियों में वे रहते थे उनका अवलोकन करते हुए वहां की नारकीय व्यवस्थाएं दुरस्त करने का ये बेहतरीन अवसर है |  आगे से इन महानगरों में नए उद्योग खोलने की अनुमति नहीं देना चाहिए | दिल्ली में जो अवैध बस्तियां हैं उनमें उप्र - बिहार से आये मजदूर ही सबसे ज्यादा थे | उनमें से अधिकतर दीपावली तक लौटने वाले नहीं है | इस समय का लाभ उठाकर बाहर से आने वाले श्रमिकों के बारे में  ऐसी व्यवस्था बनाई जावे जिससे दोबारा कभी ये स्थिति न बन सके | अपना राज्य छोड़कर अन्य किसी महानगर में मजदूरी करने  जाने वाले व्यक्ति के लिए ये अनिवार्य होना चहिये कि वह अपना गाँव या क़स्बा छोड़ते समय स्थानीय प्रशासन को तत्संबंधी लिखित जानकरी दे | जिससे ये पता हो कि वह गया कहाँ है ? इसी तरह किसी महानगर में जाने के बाद चाहे व्यक्ति मजदूरी करे या फिर चाय - पान  की दूकान खोले  लेकिन स्थानीय तौर पर प्रशासन  को उसकी जानकारी देनी चाहिए | लॉक डाउन के बाद बने हालातों में बड़े शहरों में काम करने वाले मजदूरों की जो दुर्दशा  हुई उसे देखते हुए यदि वे दोबारा वापिस लौटते हैं तब उनके बारे में विधिवत जानकारी होनी जरूरी है  | संघीय ढांचे के  नाम पर इसे आवाजाही की स्वतंत्रता पर पाबंदी कहकर उसका विरोध भी हो सकता है परंतु बीते कुछ दिनों में जो भी देखने मिला उसके बाद प्रवासी श्रमिकों को लेकर इस तरह  की व्यवस्था बननी चाहिये  जिससे किसी आपदा के समय वे  अनाथ न रहें  | इसके लिए  महानगरों में अस्थायी रूप से आने वालों के रहने का समुचित इंतजाम होना जरूरी है | जिस कारखाने , प्रतिष्ठान या ठेकेदार के यहाँ बाहरी मजदूर काम करें वह उनके रहने का इंतजाम करे अन्यथा फुटपाथ , अस्थायी झोपड़ी, रेलवे स्टेशन , बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थानों पर रहने की प्रथा बंद होनी चाहिए | महानगरों में बेतहाशा बढ़ती  आबादी से ही आवासीय समस्या पैदा होती है जो झुग्गियों के फैलाव के साथ ही गंदगी और बीमारियों को जन्म देती है | कोरोना संकट से मिले अवसर में इस तरफ भी ध्यान देना जरूरी है | वरना जिस तरह का पलायन देखने मिल रहा है उसकी पुनरावृत्ति होती रहेगी | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 19 May 2020

चीन भारत के बढ़ते महत्व से भन्नाया है




चीन के साथ लगी  सीमा पर आये दिन तनाव की खबरें आ रही हैं | यद्यपि बरसों से दोनों तरफ से एक भी गोली नहीं चली किन्तु चीन द्वारा  समय - समय पर भड़काऊ गतिविधियाँ होती रहती हैं | बीते कुछ दिनों में सिक्किम और लद्दाख क्षेत्र में भारतीय सैनिकों के साथ हाथापाई ,और  कहा सुनी के समाचार आये हैं | हिमाचल के स्पीती इलाके में वायु सीमा  के उल्लंघन की कोशिश भी चीन द्वारा की गयी | जैसा अभी तक होता आया है उसी तरह से मौके पर तैनात वरिष्ठ सैन्य अफसरों की बातचीत से विवाद आगे नहीं बढ़ा लेकिन चीन की ओर से कुछ न कुछ ऐसा किया जाता है जिससे भारतीय सैनिकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके | इस बारे में जो वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो  रहे हैं उनमें भारतीय पक्ष से बात कर  रहा अधिकारी जहाँ बड़े ही शांत भाव से चीनी सैनिकों को समझा रहा है वहीं चीनी सेना का एक अधिकारी बड़े ही तैश में धमकाने वाली शैली में चिल्लाता दिख रहा है | चीनी दुभाषिया दोनों पक्षों के बीच संवाद सेतु की भूमिका में है | रक्षा मंत्रालय के सूत्र इसे सामान्य घटना मानते हैं | इसकी वजह पिछले कई साल का अनुभव भी है | लेकिन अनेक अवसर ऐसे भी आए जब दोनों ही तरफ से सैन्य जमावड़ा होने की नौबत आई और लगा जैसे युद्ध होकर रहेगा लेकिन बातचीत से मामला सुलट गया | इसके दो कारण हैं | अव्वल तो भारत ने भी अग्रिम सीमाओं तक सैन्य बल और साजो - सामान पहुँचाने के लिए सड़क और हवाई पट्टी बना ली हैं और युद्ध संबंधी संसाधनों के मामले में भी वह पहले से कहीं बेहतर है | दूसरी बात चीन के भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते इतने गहरे हो गये कि वह छोटे - छोटे कारणों से उन्हें खराब नहीं करना चाहता | ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ने में व्यस्त है और खुद चीन भी उससे पूरी तरह उबर नहीं पाया है तब सीमा पर बेवजह तनाव पैदा करने का कारण क्या है ? और इसका  जवाब है  भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर चीन की घेराबंदी के अलावा गिलगित पर अपने आधिपत्य का ऐलान | लेकिन सबसे ज्यादा नाराजगी बीजिंग को है  चीन से उठकर बाहर आने वाले कम्पनियों को भारत द्वारा अपने यहाँ आने के लिए आकर्षित करना | प्रधानमन्त्री ने बीते दिनों देश के नाम अपने संदेश में आत्मनिर्भर भारत अभियान की  शुरुवात करते हुए  ग्लोबल ब्रांड की बजाय लोकल (स्थानीय) के प्रति वोकल ( मुखर ) होने का जो नारा दिया उसे अप्रत्यक्ष रूप से चीन के विरूद्ध ही माना जा रहा है | उसके बाद से स्वदेशी के पक्ष में जो प्रातिक्रियाएं आईं चीन सरकार ने उनका संज्ञान  अत्यंत ही  गम्भीरता से लेते हुए भारत को छेड़ने का काम शुरू कर  दिया | मानसरोवर यात्रा में समय की बचत करने के उद्देश्य से बनाई जा रही एक सड़क का नेपाल द्वारा जिस अंदाज में विरोध किया गया उसके पीछे भी चीन का हाथ होने की आशंका तो बिना नाम लिए थल सेनाध्यक्ष तक ने जताई है | विश्व स्वास्थ्य संगठन में भारत द्वारा चीन की अपेक्षा ताइवान को महत्व देने की जो रणनीति बनाई गयी उससे भी वह भन्नाया हुआ है | कोरोना को लेकर चीन की छवि पूरे विश्व में खराब हुई जबकि भारत ने जिस तरह से कोरोना का सामना किया और खुद संकट  में रहते  हुए भी दूसरे देशों की  सहायता की , उसकी वजह से उसकी छवि एक जिम्मेदार देश के तौर पर मजबूत हुई | ताजा खबर ये है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रबंधन में भी भारत को महत्वपूर्ण दायित्व मिलने वाला है | इन्हीं सब खिसियाहटों की वजह से चीन भारत के प्रति  खुन्नस निकालने का बहाना तलाश रहा है | उसे ये बात भी हजम नहीं हो रही कि भारत कोरोना का मुकाबला करते हुए भी सामान्य बना हुआ  है | लॉक डाउन के जरिये संक्रमण के फैलाव  को रोकने के साथ ही मृत्यु दर को काफी नियंत्रित किये जाने की भारतीय उपलब्धि से उसे  शर्मिन्दगी महसूस हो रही है | ये बात तो सर्वविदित है कि चीन भारत को अपना जन्मजात शत्रु मानता है | यद्यपि  उसे भी पता है कि आज का भारत 1962 वाला साधनहीन मुल्क नहीं है और हर मोर्चे पर चीन से भिड़ने में  सक्षम है | इसीलिये सीमा पर तनाव पैदा कर वह  भारत को बेवजह परेशानी में डालकर दबाव बनाने की  चाल चल रहा है | भारत ने चीन की तरफ से हो रही हरकतों का जवाब बेहद ही संयत तरीके से देते  हुए जाल में नहीं फंसने की जो नीति अपना रखी है उससे उलटा चीन तनाव में आ रहा है | लेकिन किसी भी प्रकार  की खुशफहमी पाल लेना गलत होगा | भारत ही नहीं पूरी दुनिया चीन को चालाक और धूर्त मानने लगी है | ऐसे में भारत का पलड़ा तो भारी है परन्तु चीन अविश्वसनीयता की प्रतिमूर्ति है | वह क्या कर बैठे  ये  कहना कठिन है | पाकिस्तान के साथ मिलकर वह ऐसी कोई स्थिति भी बना सकता है जिससे  भारत को दोहरे मोर्चे पर जूझना पड़े | इसलिए सतर्कता की बेहद जरूरत है |

-रवीन्द्र वाजपेयी