Wednesday, 3 June 2020

उपचुनाव रद्द हुए तो आसमान टूट नहीं पड़ेगा




मप्र भी उन राज्यों में से हैं जहाँ कोरोना के नये मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। मौतें भी कम होने का नाम नहीं ले रहीं। प्रवासी मजदूरों की घर वापिसी के बाद अभी तक अछूते माने जा रहे जिलों तक भी संक्रमण पहुँच चुका है। यद्यपि इंदौर और उसके आसपास के जिलों के साथ ही भोपाल तथा सागर में संक्रमितों की संख्या काफी है किन्तु आगामी कुछ दिनों में जैसी आशंका है मरीजों की संख्या में वृद्धि होगी। बाहर से लौटे मजदूरों का क्वारंटाइन अभी चल ही रहा है। वह खत्म होने में समय लगेगा। और फिर प्रवासियों के लौटने का सिलसिला भी तो जारी है। ऐसे में प्रदेश सरकार का पूरा ध्यान कोरोना संकट का मुकाबला करने में लगा हुआ है। स्थानीय प्रशासन भी राहत और बचाव के कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर अंजाम देने में जुटा है। लॉक डाउन हटते ही जिस तरह से लोग घरों से निकलकर सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं वह भी खतरे को न्यौता देने वाला है। ऐसे में ये आशंका भी जाहिर की जा रही है कि लॉक डाउन कहीं फिर से नहीं लगाना पड़ जाए। इन हालातों में सियासत का अखाड़ा सजाना अटपटा लग सकता है। फिलहाल शादी-ब्याह बंद हैं, समारोह-जलसों और राजनीतिक कार्यक्रमों पर भी रोक लगी है। यहाँ तक कि संसदीय समितियों की बैठकें तक रुकी हुई हैं। संसद और विधानसभाओं के अधिवेशन कैसे आयोजित हों उस पर माथापच्च्ची चल रही है। और ऐसे में मप्र विधानसभा के 24 उपचुनाव करवाने की उधेड़बुन शुरू हो गयी है। कांग्रेस से त्यागपत्र देकर भाजपा में आये 22 के अलावा दो अन्य विधायकों की मृत्यु से रिक्त हुए स्थान को भरने के लिए उपचुनाव होना हैं। संविधान के अनुसार लोकसभा या विधानसभा की कोई सीट रिक्त होने पर छह महीने के भीतर उपचुनाव करवाना जरुरी है। उस दृष्टि से मप्र में उपचुनाव की प्रक्रिया पूरी तरह विधि सम्मत है किन्तु मौजूदा परिस्थितियों में जब प्रदेश की करोड़ों जनता की जान दांव पर लगी हो तब एक साथ 24 उपचुनाव कराने का अर्थ है सत्ता और विपक्ष ही नहीं चुनाव वाले स्थानों की पुलिस और प्रशासन चुनाव चक्कर में फंसकर कोरोना के विरूद्ध हो रही मोर्चेबन्दी से मुंह मोड़ लेंगे। भले ही कितना भी दावा किया जा रहा हो कि सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार होने से शारीरिक दूरी बनी रहेगी लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से ये नामुमकिन होगा। और फिर दोनों पक्षों से पानी की तरह पैसा बहाया जाएगा। सरकारी अमले को चुनाव ड्यूटी में लगाना होगा। मतदान के दिन दोनों खेमे ज्यादा से ज्यादा मतदान के लिए प्रयास करेंगे जिससे उनकी विजय सुनिश्चित हो जाए। और ऐसा करते समय दो गज की दूरी का पालन करना असमभव रहेगा। मतदाता जिस ईवीएम का बटन दबायेंगे क्या उसे हर बार सैनिटाइज करना संभव होगा ? सवाल और भी है लेकिन जिस संविधान के अंतर्गत थोक के भाव उपचुनाव करवाना जरुरी माना जा रहा है वह हम भारत के लोग से शुरू होता है और दरअसल उन्हीं के लिए बना भी है। ये देखते हुए जब भारत के लोगों के प्राण संकट में हों तब उपचुनावों को स्थिति सामान्य होने तक टालने से आसमान नहीं फट पड़ेगा। ऐसे समय में जब प्रदेश सरकार के सभी समन्धित विभाग कोरोना वारियर बनकर मानवता की सेवा और सुरक्षा में लगे हुए हैं तब उनका ध्यान उस ओर से हटाकर उपचुनाव में लगा देना अमानवीय होगा। माना, कि ये उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए जीवन मरण का प्रश्न हैं जिनके परिणाम से तय होगा कि शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहेंगे या फिर सत्ता लौटकर कमलनाथ के पास आयेगी। लेकिन भाजपा-कांग्रेस या किसी और पार्टी के भविष्य से ज्यादा मूल्यवान मप्र के करोड़ों लोगों की जि़न्दगी है। ऐसे में उपचुनाव वाले क्षेत्रों में कोरोना जांच पर विपरीत असर तो पड़ेगा ही इसी के साथ-साथ यदि किसी क्षेत्र विशेष में तब संक्रमण फैला रहा तो वहां न प्रचार सम्भव होगा और न ही मतदान। ऐसे अनेक कारण हैं जिनके आधार पर इन उपचुनावों की निरर्थकता सिद्ध हो सकती है। लेकिन पता नहीं क्यों दिन रात जनता के लिए जान न्यौछावर करने का दावा करने वाले नेतागण उसी जनता की जान खतरे में डालने पर क्यों आमादा हैं ? आखिर चुनाव लड़ने वाली पार्टियों के कार्यकर्ता भी तो चुनाव में सक्रिय होंगें। उनके भी संक्रमित होने का खतरा बना रहेगा। ये सब देखते हुए बेहतर यही है कि केवल मप्र के ही नहीं अपितु देश के और किसी राज्य में होने वाले उपचुनाव भी कोरोना संकट के पूरी तरह दूर होने तक स्थगित रखे जाएं। रही बात संवैधानिक बाध्यता की तो जिस तरह सभी दलों के सांसद अपने वेतन-भत्ते बढ़ाते समय सभी वैचारिक मतभेद भुलाकर एकजुट हो जाते हैं वैसे ही इस मुद्दे पर एकमत होकर संसद से वैधानिक औपचरिकता पूर्ण करवाने एक साथ आयें। यदि कोरोना का खतरा बना रहता है तब बिहार विधानसभा के आसन्न चुनाव भी टाले जाना चाहिए क्योंकि जनतंत्र जिस जन के लिए बना है उसकी जि़न्दगी कुछ लोगों की सियासत से ज्यादा कीमती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 June 2020

वाटर हार्वेस्टिंग को भी जनांदोलन बनाना होगा



कोरोना की बढ़ती चिंताओं के बीच केरल में मानसून का ठीक समय पर आ जाना राहत देना वाला है। मौसम विभाग का अनुमान है कि इस साल मानसून से 102 प्रतिशत वर्षा होगी। इसका आशय ये है कि औसत बरसात से ही संतोष नहीं करना पड़ेगा। अपितु नदियाँ लबालब होंगीं, जलाशय भर जायेंगे, कुओं में खूब पानी होगा और इसके कारण भूजल स्तर में भी सुधार होगा जिससे वर्षा उपरांत सिचाई और पीने के लिए भरपूर पानी उपलब्ध रहेगा। भारत में चूंकि अभी भी खेती का बड़ा हिस्सा मानसूनी बरसात पर निर्भर है इसलिए ज्योंही अच्छी बरसात की भविष्यवाणी होती है त्योंहीं उससे बाजार में भी उम्मीद की किरण नजर आने लगती है। इसकी वजह भारत की अर्थव्यवस्था का कृषि पर आधारित होना है। यद्यपि पहले जैसी हिस्सेदारी न रही हो लेकिन खेती न सिर्फ अर्थव्यवस्था अपितु सामाजिक गतिविधियों पर भी असर डालती है। अच्छी फसल मतलब अच्छा शादी सीजन और अच्छा शादी सीजन यानि बाजार में रौनक। सर्वविदित है कि कोरोना के कारण ग्रीष्मकालीन विवाह या तो रद्द हो गये या फिर बेहद सादगी से हुए जिससे कपड़ा, किराना, आभूषण, होटल, कैटरिंग से लेकर तो बैंड, घोड़ी और आतिशबाजी वालों तक का व्यवसाय ठप्प पड़ गया। अर्थव्यवस्था को लगे झटके का एक कारण ये भी है। अब चूँकि मानसून को लेकर अच्छी खबर आई है इसलिए किसान के साथ ही उद्योग-व्यापार जगत भी आने वाले भविष्य में सुखद एहसास की कल्पना करने लगा है। लेकिन अच्छे मानसून की खुशी तब जाकर कमतर हो जाती है जब ये खुलासा होता है कि कुदरत से मिलने वाली इस अमूल्य दौलत को हम सहेजकर नहीं रख पाते और जो भी अतरिक्त वर्षा होती है वह बाढ़ के रूप में तबाही मचाते हुए अंतत: सागर में जाकर समा जाती है। जहां तक बांधों का सवाल है तो उनमें जल एकत्र करने की एक सीमा है। तालाबों और कुओं की भी अपनी क्षमता होती है किन्तु वाटर हार्वेस्टिंग नामक वर्षा जल को संग्रहित करने की जो प्रणाली भवनों की छतों पर लगई जाती है उससे होने वाला जल संग्रहण सीधे भूजल स्तर को ऊपर उठाता है। आजकल घरों में पहले जैसे आंगन नहीं होते और होते भी हैं तो कच्चे  नहीं होने से वर्षा जल उसके जरिये घर के कुए या बोरिंग में न जाकर नालियों में बह जाता है। विकास के नये पैमाने के तहत अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी सीमेंटेड सड़कें बनने से वर्षा जल जमीन में समाने के बजाय व्यर्थ चला जाता है। सौर उर्जा की तरह ही वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था नये निर्माणों में अनिवार्य कर दी गई है। स्थानीय निकाय इस हेतु नक्शा स्वीकृत करते समय कुछ राशि बतौर सुरक्षा निधि जमा भी करवाते हैं जिसका उद्देश्य ये है कि निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद किये जाने वाले निरीक्षण के दौरान यदि ये पाया जाए कि वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली नहीं लगाई गई तब उस सुरक्षा निधि से वह काम करवा दिया जावे। लेकिन ऐसा अपवादस्वरूप ही होता है। स्थानीय निकाय सुरक्षा निधि को बैंक में जमा रखते हुए ब्याज खाते हैं किन्तु इतने महत्वपूर्ण उद्देश्य की अनदेखी कर दी जाती है। मन की बात के पिछले प्रसारण में प्रधानमंत्री ने इस बारे में बात भी की लेकिन प्रचार माध्यमों ने इसे ज्यादा महत्व नहीं दिया। हर साल मानसून के पहले इसकी जरूरत पर विमर्श होता है लेकिन जमीन पर पर्याप्त प्रयास नहीं होते। ऐसे में जरूरी है स्वच्छता मिशन की तरह से ही वर्षा जल संग्रहण को भी जनांदोलन बनाया जाए। देश में अन्न के भण्डार तो इतने होते हैं जिनसे एक वर्ष देश की खाद्यान्न जरूरतें पूरी की जा सकती हैं परन्तु जल के मामले में ये स्थिति नहीं बन पा रही। जल के क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में आगे आना चाहिए। हालाँकि लोग अब इसकी जरूरत को समझने लगे हैं लेकिन अभी भी गम्भीरता का अभाव है। भारत में जल की बर्बादी को रोकने का जो संस्कार था वह आधुनिक जीवनशैली के चलते विलुप्त होता जा रहा है। उसे पुनर्जीवित करते हुए जल संग्रहण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। प्रकृत्ति से मिलने वाले अनमोल तोहफे को नालियों में बहने देना किसी अपराध से कम नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 June 2020

ताकि लॉक डाउन की नौबत दोबारा न आये



जैसी कि उम्मीद थी ठीक वैसा ही हुआ। आज से कुछ राज्यों को छोड़कर लॉक डाउन काफी हद तक वापिस ले लिया गया। हालांकि बाजार वगैरह शाम जल्दी बंद हो जायेंगे और रात 9 बजे से सुबह तक कर्फ्यू  रहेगा किन्तु शॉपिंग माल, सिनेमा, पार्लर जैसे व्यवसाय बंद रहेंगे। होटल, रेस्टारेंट आदि 8 जून से खुल जायेंगे जबकि स्थानीय सार्वजनिक परिवहन भी कुछ बंदिशों के साथ शुरू करने की छूट दी जायेगी। आज से रेल गाड़ियों का संचालन भी बढ़ाया जा रहा है। लेकिन उल्लेखनीय बात ये रहेगी कि साधारण डिब्बे में भी उतने ही यात्री बैठ सकेंगे जितनी उसकी वास्तविक सीट संख्या है। अर्थात ठसाठस भरे यात्री वाले नज़ारे नहीं होंगे। राज्यों के भीतर और बाहर आवागमन पर भी रोक तकरीबन हटा ली गयी है। हवाई सेवा सीमित क्षेत्रों में शुरू हो ही चुकी है। विद्यालय और महाविद्यालय खोलने का फैसला जुलाई में किया जाएगा। लॉक डाउन के दौरान सवा दो महीने देश ने जो देखा और भोगा उसके बाद मिली ये छूट वैसे तो राहत भरी है लेकिन जब प्रतिदिन 7 से 8 हजार नये संक्रमित मामले आ रहे हों तब लॉक डाउन को बड़े पैमाने पर शिथिल करने के फैसले पर सवाल भी उठ रहे हैं। दरअसल चौतरफा मांग के बाद ही राज्यों से सलाह लेकर केंद्र ने ये कदम उठाया जिसके पीछे मुख्य उद्देश्य कारोबारी गतिविधियाँ शुरू करना है। सरकारी और निजी क्षेत्र के दफ्तर भी आज से पूरी तरह काम कर सकेंगे। कारखानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खुलने से क्रमश: उत्पादन और बिक्री दोनों को सहारा मिलेगा। सबसे बड़ी बात ये होगी कि रोजनदारी वाले श्रमिकों के अलावा निजी क्षेत्र के छोटे कर्मचारियों की बेरोजगारी दूर हो सकेगी। रबी फसल के बाद इन दिनों अनाज मंडियों में जबरदस्त कारोबार रहता है जिसको काफी नुकसान हुआ। मानसून देश में प्रवेश कर चुका है। ऐसें में जून माह अनाज व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। पूरे शादी सीजन में लॉक डाउन बने रहने से कपड़ा और जेवर की बिक्री भी बुरी तरह प्रभावित हुई। उसी तरह, कूलर, एयर कंडीशनर आदि का व्यवसाय भी मार खा गया। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि एक भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें इस दौरान जबरदस्त नुकसान न हुआ हो। लेकिन लॉक डाउन जरूरी से ज्यादा मजबूरी बन गया था। भले ही कोई कुछ भी कहे किन्तु उसका विकल्प नहीं था और लोगों की जान बचाने से बड़ी प्राथमिकता दूसरी नहीं हो सकती थी। इस दौरान कारोबार बंद रहने से अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ वह तो अपनी जगह है परन्तु अल्प आय वर्ग के सामने जो मुसीबतें आ गईं उनके मद्देनजर ये जरूरी हो चला था कि धीरे - धीरे ही सही लेकिन जनजीवन के साथ ही शासन और प्रशासन भी पूरी क्षमता के साथ काम करें। और आज से अनेक बंदिशों के बावजूद लॉक डाउन काफी हद तक वापिस ले लिया गया। लेकिन इसके साथ ही आम जनता की जिम्मेदारी और बढ़ गयी है, क्योंकि मास्क, सैनीटाइजर, सोशल अथवा शारीरिक डिस्टेंसिंग जैसी सावधानियों का पालन करना अब हमारे ऊपर निर्भर होगा। दफ्तरों में ऐसा करते हुए काम करना आसान नहीं होगा लेकिन कोरोना से बचाव करने के लिए उक्त छोटी-छोटी बातों को नजरंदाज करना बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। भारत सरीखे विशाल जनसंख्या वाले देश में शारीरिक दूरी बनाये रखना बहुत कठिन काम है किन्तु मौजूदा हालात में उसका विकल्प भी नहीं है। इसलिए उसे अनिवार्य आवश्यकता के तौर पर देखना चाहिए। बाकी सावधानियां भी रोजमर्रे की जि़न्दगी में मोबाईल फोन जैसे साथ चलेंगी। लॉक डाउन ऐसे समय हटाया गया है जब देश में कोरोना निरंतर बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ  ये भी सही है कि दर्जन भर शहरों में चूँकि 70 से 75 फीसदी संक्रमित सिमटे हुए हैं इसलिए पूरे देश को तालाबंदी में रखना कठिन भी है और औचित्यहीन भी। फिर भी देखने वाली बात ये होगी कि अगर जनता ने वैसा ही नजारा पेश किया जैसा शराब दुकानें खुलने के बाद दिखाई दिया तब फिर लॉक डाउन रूपी ताला दोबारा लटकने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। आगामी एक महीना इस लिहाज से परीक्षण का होगा। यदि सब ठीक - ठाक रहा तभी सामान्य स्थिति की उम्मीद की जा सकेगी। भले ही राज्य के भीतर और बाहर आवाजाही पर रोक हटा ली गई है परन्तु ये छूट संक्रमण फैलाने का कारण न बने ये चिंता सरकार से ज्यादा लोगों को खुद करना होगी। शासकीय इंतजाम एक हद तक जाने के बाद खत्म होते जायेंगे। कोई ये सोचे कि वह लापरवाह बना रहे और सरकार सजग रहे तो ये गलत होगा। अपने और अपनों के स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहना हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है और यही सोचकर लॉक डाउन में काफी हद तक रियायतें दी गईं हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 30 May 2020

ऐतिहासिक उपलब्धियों पर कोरोना की छाया



मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल को आज एक वर्ष पूरा हो गया।  बीते एक वर्ष में केंद्र सरकार ने जिस ताबड़तोड़ अंदाज में  निर्णय किये और अनेक लंबित मामले निबटे उससे राष्ट्रीय राजनीति  की दिशा तय होने लगी  थी।  असहमति और आलोचनाओं के बावजूद एक बात तो साबित हो ही गई  कि नरेंद्र  मोदी में कड़े निर्णय लेने का साहस है।  जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर उसे दो हिस्सों में विभाजित करने का फैसला जिस सुनियोजित तरीके से लागू करवाया गया वह बहुत ही बड़े जोखिम का काम था जिसमें जरा सी चूक देश को बड़े  संकट में डाल सकती थी किन्तु केंद्र सरकार की रणनीति और मैदानी तैयारी इतनी सटीक रही कि असंभव समझा जाने वाला काम भी सम्भव हो गया।  तीन तलाक़ को बंद करवाने के अलावा नागरिकता संशोधन कानून तथा राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर जैसे निर्णय भी केंद्र सरकार की दृढ इच्छा शक्ति के प्रमाण हैं।  यद्यपि इन्हें मुद्दा बनाकर विपक्ष ने देश में अल्पसंख्यकों के बीच जबरदस्त भ्रम का वातावरण बना दिया।  यहां तक कि अन्तर्राष्ट्रीय  स्तर पर भी ये बात प्रचारित की गयी कि भारत की मौजूदा सरकार अल्पसंख्यकों पर  अत्याचार करने पर आमादा है।  इस विषय पर जिस तरह का प्रपंच फैलाया गया उसके पीछे बहुत ही सोची - समझी चाल थी जिसमें तमाम मोदी विरोधी एकजुट हो गए।  तीन तलाक , 370 और बाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राममन्दिर जैसे लंबित विवाद पर दिए  फैसले पर अल्पसंख्यक समुदाय  की ठंडी प्रतिक्रिया से भाजपा विरोधी पार्टियाँ खास तौर पर वामपंथी काफी परेशान थे । इसलिए उन्होंने नागरिकता संशोधन और जनसंख्या जैसे मामले पर दिल्ली की जामिया मिलिया , जेएनयू और अलीगढ़ मुस्लिम विव के छात्रों को भड़काकर उत्पात मचवाया और फिर शाहीन बाग़ के धरने के बहाने अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का भाव पैदा करते हुए उन्हें आंदोलित किया । जिसका अंजाम दिल्ली में हुए साम्प्रदायिक दंगों के तौर पर सामने आया।  दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था भी चिंताजनक दौर में प्रविष्ट हो चुकी थी। ऐसे में केंद्र सरकार और प्रधानमन्त्री के सामने कठिन परीक्षा का समय था।  केन्द्रीय बजट में सरकार की तरफ से जो ऐलान हुए उनके जरिये हालात सँभालने की कोशिश की ही जा रही थी कि कोरोना नामक महाविपत्ति का हमला हो गया जिससे बीते दो महीने से देश जूझ रहा है।  इस वायरस को रोक पाने में मोदी सरकार कितनी कामयाब हुई इसका आकलन करने का समय अभी नहीं आया है किन्तु इतना तो कहा  ही जा सकता है कि 135 करोड़ की घनी बसाहट वाले देश में यदि अभी तक कोरोना महामारी नहीं  बन सका तो इसका श्रेय मोदी सरकार को देना गलत नहीं होगा।  कोरोना से हुई मृत्यु दर कम रहना भी बड़ी उपलब्धि है।  राष्ट्रीय  सुरक्षा के साथ विदेश नीति के मोर्चे पर भी इस सरकार ने शानदार काम किया।  विशेष रूप से पहले पाकिस्तान और अब चीन को कूटनीतिक स्तर पर घेरने की रणनीति पूरी तरह से कामयाब रही।  लेकिन आने वाले समय में प्रधानमंत्री  के सामने सबसे बड़ी समस्या आर्थिक मोर्चे पर उत्पन्न चुनौतियों से जूझने की होगी। बीते दो महीने से कारोबार ठप्प रहने से उद्योग - व्यापार पूरी तरह से बंद पड़े थे।  करोड़ों प्रवासी श्रमिकों को बेहद दर्दनाक  स्थिति में गाँव लौटना  पड़ा।  उनके पास कोई काम नहीं है।  लाखों मध्यमवर्गीय लोग अपनी नौकरी गंवा बैठे या उनके वेतन में कटौती हो गयी।  रोज कमाने रोज खाने वाले त्रस्त हैं ।  बाजार और कारखाने यद्यपि शुरू किये जा रहे हैं लेकिन उपभोक्ता चूँकि  खाली हाथ है इसलिए मांग घट गई  है।  शादी का मौसम भी जाने को है। ग्रीष्मकालीन पर्यटन और तीर्थयात्राएं रद्द होने से पर्यटन उद्योग की कमर टूट गयी। अर्थव्यवस्था का एक भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसे दुरुस्त कहा जा सके। इस वजह से सरकार की राजस्व वसूली रुक गयी है और विकास दर शून्य से नीचे जाना तय है। इस तरह कोरोना के कारण मोदी सरकार की दूसरी पारी की सालगिरह का रंग फीका पड़ गया। जिन ऐतिहासिक उपलब्धियों के नाम पर वह आज जनता के सामने सीना फुलाकर आती वे सब कोरोना के कुहासे में छिपकर रह गईं। बावजूद उसके प्रधानमन्त्री में लोगों का भरोसा कायम है। कोरोना के अलावा सीमा पर पैदा हुई  स्थितियों का उन्होंने जिस कुशलता से सामना  किया वह प्रशंसनीय है। आने वाले समय में देश को विकास के रास्ते पर ले जाने में इस सरकार की नीतियां आशा जगाती हैं। बजाय खैरात बांटकर लोगों का मुंह बंद करने के विकास का ठोस आधार तैयार करने की दिशा में उसकी सोच काफी सकारात्मक है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि कोरोना संकट के बाद का समय भारत के पुनरुत्थान का होगा जिसमें नरेंद्र  मोदी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 May 2020

कोरोना काल की बंदिशों को आदत बनाना होगा।

 

बीते कुछ दिनों में नए कोरोना संक्रमित लोगों की  संख्या तेजी से बढ़ने के कारण भारत एशिया में पहले स्थान पर आ गया है ।  हालाँकि ठीक होने वालों की संख्या वैश्विक औसत से ज्यादा और मरने वालों की  कम होने से स्थिति  को संतोषजनक मानकर लॉक डाउन में ढील पर विचार हो रहा है ।  अनेक राज्यों में तो औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियाँ शुरू भी कर दी गईं  ।  लेकिन अभी भी मॉल , होटल - रेस्टारेंट , सिनेमा , पार्लर आदि पर पाबंदी है ।  सार्वजनिक परिवहन भी आंशिक तौर पर शुरू हुआ है ।  नए मामलों में वृद्धि का कारण जांच  की संख्या में बढ़ोतरी ही है ।  लेकिन देश के लिए राहत की बात ये है कि कोरोना संक्रमण के । 70 फीसदी मामले मात्र 13 शहरों में सिमटे हुए हैं ।  इस वजह से चिकित्सा सुविधाओं को वहां केंद्रीकृत करने में सहूलियत  हुई है ।  नये संक्रमण  हॉट स्पॉट बन चुके क्षेत्रों से ही आने की वजह से उनकी पहिचान करना आसान हुआ ,  वहीं प्रवासी मजदूरों के घर लौटने के बाद विभिन्न राज्यों के ग्रामीण इलाकों में भी छिटपुट नए संक्रमण सामने आ रहे हैं ।  लेकिन लॉक डाउन को लेकर होने वाली समस्त आलोचनाओं के बीच एक बात जो माननी ही पड़ेगी कि यदि ये न लगा होता तब संक्रमण महामारी का रूप लिए बिना नहीं रहता ।  अब प्रश्न ये है कि क्या लॉक डाउन और आगे बढ़ाया जाए या उसे सीमित करते हुए जनजीवन सामान्य करने की दिशा में कदम आगे बढ़ाए जाएं ? केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राज्य सरकारों से सम्पर्क करते हुए सुझाव मांगें हैं जिसके आधार पर 31 मई के बाद वाली स्थिति पर विचार किया जाएगा ।  लेकिन अब सरकार के साथ ही  जनता की  भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो चली है ।  क्योंकि न तो लॉक डाउन को स्थायी किया जा सकता है और न ही पूरी तरह शिथिल ।  इस सम्बन्ध में चिंतनीय   बात ये है कि जब और जहां लॉक डाउन में ढील दी गयी वहां  जनता ने शारीरिक दूरी का धड़ल्ले से उल्लंघन किया ।  फिर चाहे वह बाज़ार हो या अन्य  स्थान ।   और यही चिंता का सबसे बड़ा  कारण है ।  अनेक शहरों में जहाँ कोरोना संक्रमण नियन्त्रण में है , वहां जब बाजार खोले गये तो जनसैलाब उमड़ पड़ा ।  सम और विषम संख्या में दुकानें खोलने के  भी संतोषजनक परिणाम नहीं दिखाई दिए ।  विभिन्न शहरों से जो रिपोर्टें आ रही हैं उनके अनुसार घरों के बाहर मास्क का उपयोग नहीं करने के कारण पुलिस द्वारा लोगों का जुर्माना किया जा रहा है ।   ये एक ऐसी जरूरत है जिससे शायद ही कोई भी  इंकार करेगा ।  और जब चिकित्सक भी  कह चुके हैं कि हमें कोरोना के साथ रहने की आदत डाल लेनी चाहिए तब उसका अर्थ ये होता है कि लॉक डाउन के दौरान जिन सावधानियों का  पालन किया गया उन्हें दैनिक जीवन में स्थायी रूप से उतारा जाए ।  मास्क , हाथ धोना , सार्वजनिक स्थल में नहीं थूकना और शारीरिक दूरी बनाये रखने जैसी बातें हमें अपने आचरण में शामिल करनी  ही होंगी ।  वैसे भी थूकने जैसी गन्दी आदत तो कोरोना न आता तब भी असभ्यता का परिचायक है ।  शारीरिक दूरी बनाये रखकर हम भीड़ और धक्कामुक्की को दूर कर सकते हैं जिससे यूँ भी  सभी परेशान  हैं ।  बाजारों और धार्मिक स्थलों पर शारीरिक दूरी अब एक अनिवार्यता होगी ।  ये सब देखते हुए कोरोना के बाद भी हमें उन बंदिशों को अपनी आदत बनाना होगा जो किसी भी भावी संक्रमण से बचने में सहायक होने के साथ ही हमारे निजी और सार्वजनिक जीवन को अनुशासित बनाकर भावी  स्वास्थ्य सम्बन्धी चिंताओं को भी दूर करेगा ।  भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में जहां सामाजिक अनुशासन का स्तर बहुत ही चिंताजनक है , वहां इस तरह की सावधानियां अब एक जरूरत बन गईं हैं ।  लॉक  डाउन बढ़े या न बढ़े  किन्तु जनता को  खुद होकर भी ये साबित करना होगा कि कोरोना से उसने क्या सबक लिया है ?  जैसा  कि चिकित्सा जगत मान  रहा है उसके मुताबिक तो कोरोना का दूसरा हमला  भी हो सकता है ।  यदि ऐसा नहीं हुआ तब भी किसी ऐसे ही वायरस के आक्रमण की आशंका बनी रहेगी ।  और फिर दुनिया में आवागमन भी सदैव के लिए तो नहीं रुका रहेगा ।  ऐसे में कोरोना का एक भी अनजाना संक्रमित यदि बच रहा तो वह पूरी दुनिया में उसे फैला सकता है ।  ये देखते हुए अब हमें स्वअनुशासन का परिचय देते  हुए एक स्वस्थ भारत बनाना होगा ।  वैसे इसमें नया कुछ भी नहीं है क्योंकि बिना जातिगत छुआछूत के भी भारतीय समाज में स्वच्छता और शारीरिक दूरी का काफी पालन होता रहा ।  पाँव धोकर घर में प्रवेश और हाथ धोते रहना भी  सहज प्रवृत्ति थी ।  बच रहा मास्क तो उसका प्रयोग करना यूँ भी लाभप्रद है क्योंकि ये वायु प्रदूषण से भी हमें बचाता है ।  दिल्ली में तो हजारों लोग सामान्य हालातों में भी मास्क लगाये दिख जाते हैं ।  इस तरह कोरोना से बचाव हेतु हमें उक्त आदतें डालनी होंगी ।  बीते सवा  दो महीने  में बहुत सी अच्छी बातें कोरोना संकट ने हमें सिखाई हैं ।  संक्रमण न रहने पर भी अपने दैनिक जीवन में  उनको ढाल लेना एक तरह से सुरक्षा चक्र जैसा ही होगा ।  प्रबन्धन का एक महत्वपूर्ण सूत्र गलतियों से सीखना है ।  कोरोना को लेकर जो असावधानी या गलतियाँ हुईं हों उनसे सबक लेकर यदि हम सतर्क रहे तो इस तरह के हमले का सामना करने  के लिए हमारी तैयारी पहले से कहीं बेहतर रहेगी ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 May 2020

नेपाल और चीन से मिले संकेतों के बाद भी चौकसी जरुरी



बीते कुछ दिनों से सीमा पर चले आ रहे तनाव में गत दिवस कुछ नरमी के संकेत मिले। सबसे पहले तो नेपाल से खबर आई कि उसने उस संशोधित नक्शे पर अंतिम निर्णय रोक दिया है जिसमें भारत के कुछ हिस्से को अपना बताया था। दरअसल वहां की सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में प्रस्तावित नए नक्शे पर आम सहमति नहीं बन सकी। इससे ये आशय लगाया जा सकता है कि चीन समर्थक नेपाल की माओवादी सरकार अपने भारत विरोधी आक्रामक रवैये से फिलहाल विपक्ष को आश्वस्त नहीं कर सकी। इसका कारण वहां भारत समर्थक पार्टियों का साक्रिय होना भी हो सकता है। दरअसल नेपाल को उम्मीद रही कि भारत उसकी धमकी से प्रभावित होगा लेकिन हुआ उलटा। उधर जिस चीन की शह पर नेपाल ने आँखें तरेरी थीं वह भी गत दिवस नरमी दिखाता नजर आया। उस वजह से भी काठमांडू की ऐंठ कुछ कम हुई होगी, ये सोचना भी सही है। क्योंकि जब नेपाल ने भारत विरोधी रुख अख्तियार किया तब ही ये समझ में आ गया था कि उसकी पीठ पर चीन का हाथ है। भारत के  थलसेनाध्यक्ष ने तो इस आशय का बयान भी दे दिया था जिस पर नेपाल और चीन सरकार की रोषपूर्ण प्रतिक्रिया भी आई। लेकिन चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग द्वारा अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने जैसा सन्देश दिए जाने के बाद नई दिल्ली का ये कहना महत्वपूर्ण था कि सीमा पर सड़क एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर संबंधी बाकी काम पूरे किये जायेंगे और जितनी सेना चीन तैनात करेगा उतनी ही भारत की तरफ से भी मोर्चे पर रहेगी। चीन द्वारा लद्दाख क्षेत्र में पेंगोंग झील के पास सौ सैन्य टेंट लगाये जाने के साथ ही भारत ने भी अपने सैनिकों का जमावड़ा शुरू कर दिया। दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर भी चीन के भड़काऊ रवये पर आश्चर्य होने लगा। क्योंकि ऐसे समय जब पूरी दूनिया सब काम छोड़कर कोरोना से जूझ रही है तब चीन सीमा पर अनावश्यक तनाव उपस्थित कर रहा है। संयोगवश गत दिवस ही अमेरिका में तिब्बत और हांगकांग को स्वतंत्र देश घोषित करने विषयक ट्रंप सरकार का प्रस्ताव विचारार्थ संसद में पेश किया गया और पीछे से डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत-चीन के मौजूदा झगड़े में बिना कहे ही मध्यस्थता की पेशकश करते हुए ये संकेत दे दिया कि चीन की हरकतों से शेष विश्व अनजान नहीं है। और उसी दौरान चीन के प्रवक्ता का ये बयान भी आ गया कि सीमा पर स्थिति नियन्त्रण में है और दोनों पक्ष मिलकर कूटनीतिक स्तर पर विवाद को सुलझा लेंगे। बीते कुछ दिनों से चले आ रहे तनाव के बीच चीन की तरफ से ये पहला सकारात्मक बयान था। हालांकि चीन की फितरत देखते हुए जल्दबाजी में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना धोखे का कारण बन सकता है । लेकिन युद्ध की अप्रत्यक्ष धमकी के बाद कूटनीतिक माध्यम से विवाद सुलझाने जैसी बात से ये संकेत मिलता है कि चीन फिलहाल धीमे चलो की नीति अपना रहा है। उसे ये उम्मीद रही होगी कि भारत या तो उससे अनुनय विनय करते हुए सीमा पर चल रहे निर्माण और विकास के काम रोक देगा या फिर आपा खोकर ऐसा कुछ कर जायेगा जिससे उसे हमलावर होने का बहाना मिल जाता। लेकिन भारत की तरफ से न तो शीर्ष स्तर पर किसी बड़े नेता ने भड़काऊ बयान दिया और न ही किसी भी तरह की आपाधापी या भय व्यक्त किया गया। इसके उलट सीमा पर सड़कों , पुलों और इन्फ्रास्ट्रक्चर के अन्य कार्य तेजी से पूरे करने का संकल्प दोहरा दिया गया। ये बात पूरी तरह साफ़ है कि चीन ने अपनी सीमा में तो इन्फ्रास्ट्रक्चर का जबर्दस्त विकास कर लिया है किन्तु भारत की तरफ से लंबे समय तक इस ओर दुर्लक्ष्य किया गया। लेकिन 2014 में मोदी सरकार के आते ही सीमावर्ती सभी इलाकों में सड़को , पुलों, हवाई पट्टियों आदि का काम बहुत तेजी से शुरू करते हुए उनमें से अधिकांश पूर्ण कर लिए गए। जिन पर चीन को सदैव ऐतराज रहा। लेकिन हाल ही में मानसरोवर जाने वाले के लिए एक शॉर्ट कट सड़क के उद्घाटन के बाद से ही नेपाल और चीन दोनों लाल-पीले हो रहे थे। ऐसे में भारत ने बड़े ही सुलझे हुए अंदाज में दोनों को माकूल सन्देश दे दिया। कूटनीतिक स्तर पर चलने वाली वार्ताओं में से बहुत कुछ सामने नहीं आता। इसलिए नेपाल और चीन द्वारा गत दिवस दिखाई नरमी उनके अपने दिमाग की उपज थी ये कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी। इस विवाद में बीचबचाव के प्रस्ताव के साथ ही तिब्बत और हांगकांग संबंधी अमेरिकी प्रस्ताव से भी हो सकता है चीन ने झगड़े को टालने की चाल चली हो लेकिन इतना तो तय है किस उसे भारत से ऐसे प्रतिरोध की आशा नहीं रही होगी। आने वाले कुछ दिन बेहद उहापोह भरे होंगे। भारत ने बिना धैर्य गंवाए अब तक जैसा जवाब नेपाल और चीन को दिया वह हर दृष्टि से सही है किन्तु चीन इस समय जिस दबाव में है और जिनपिंग के प्रति आंतरिक असंतोष बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए भारत को उसके हर कदम पर पैनी निगाह रखनी होगी क्योंकि धोखाधड़ी और धूर्तता चीनियों का जन्मजात गुण है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 May 2020

श्रमिक एक्सप्रेस को भी राजधानी जैसा महत्व मिले



जिस तरह की परिस्थितियाँ देश में बनी बु6ईं हैं उसमें बात-बात पर शासन-प्रशासन की आलोचना ठीक नहीं लगती किन्तु कुछ गलतियाँ ऐसी हैं जिन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है, जिससे उनकी पुनरावृत्ति न हो। प्रवासी श्रमिकों को लेकर जा रही अनेक श्रमिक एक्सप्रेस रेलगाड़ियों द्वारा घंटो का सफर कई दिनों में करने की जो बात सामने आई उस पर रेल मंत्री या उनके विभाग की सफाई गले नहीं उतरती। रेलगाड़ी का परिचालन पूरी तरह तकनीकी मामला है। इंजिन में बैठा ड्राइवर अपनी मनमर्जी से उसे कहीं भी नहीं मोड़ सकता। यदि किसी ट्रेन का मार्ग बदला जाता है तो उसमें ड्राइवर की भूमिका नहीं होती। ऐसे में ये गहन जाँच का विषय है कि मुम्बई या अन्य किसी स्थान से बिहार के लिये निकली रेल गाड़ी उड़ीसा कैसे जा पहुँची और वह भी 16-18 घंटों की बजाय हफ्ते भर के विलम्ब से। इसके अलावा श्रमिक एक्सप्रेस गाड़ियों को स्टेशन से दूर घंटों रोके रहने की शिकायतें भी बड़ी संख्या में आ रही हैं। भीषण गर्मी में साधारण रेल के कहीं खड़े हो जाने पर यात्री कितने हलाकान होते हैं ये किसी से छिपा नहीं है। और फिर श्रमिक एक्सप्रेस से सफर करने वाले लोग पहले से ही खून के आंसू रो चुके थे। उनको भोजन-पानी दिए बिना घंटों गाड़ी बिना स्टेशन के रोके रखना और एक-दो दिन के सफर को हफ्ते भर में पूरा करने जैसी भयंकर भूल पर रेलमंत्री और संबंधित अधिकारी बजाय आधारहीन सफाई देने के अगर सीधे-सीधे माफी मांगते हुए जिम्मेदार लोगों पर दंडात्मक कार्रवाई की बात कहते तो वह ज्यादा सही होता। शुरुवात में तो श्रमिक एक्सप्रेस बिना रुके लम्बी-लम्बी दूरी तय करते हुए ज्यादा से ज्यादा फेरे लगा रही थीं। जिन स्टेशनों पर सवारियों को भोजन-पानी देने की व्यवस्था होती या रेलवे के स्टाफ को बदलना होता , वहीं उसे रोका जाता था परन्तु ज्यों-ज्यों गाड़ियों की संख्या बढ़ती गयी रेलवे का ढर्रा भी वापिस लौटने लगा। भारतीय रेलवे दुनिया की सबसे बड़ी रेल व्यवस्था है। गर्मियों में यात्रियों की भीड़ के मद्देनजर विशेष गाड़ियां चलाई जाती हैं। लेकिन इस वर्ष कोरोना की वजह से लगाये गये लॉक डाउन के कारण यात्री गाड़ियों का परिचालन लम्बे समय तक बंद रहा। मालगाड़ियां भी तुलनात्मक रूप से कम ही चलीं। ऐसे में श्रमिक एक्सप्रेस चलने से रेलवे पर अतिरिक्त बोझ आया ऐसा भी नहीं था। और फिर प्रवासी श्रमिकों की बड़ी संख्या देखते हुए ये जरूरी था कि ट्रेन निर्धारित समय पर अपने गन्तव्य तक पहुंचकर वापिस लौटें। लेकिन प्रारम्भिक मुस्तैदी के बाद रेलवे की ढीलपोल सामने आने लगी। ऐसे समय में इस तरह की गलतियाँ इस बात का संकेत हैं कि इतने बड़े संगठन में अभी तक पेशेवर कार्यप्रणाली नहीं आ सकी। जिस तरह की आपदा से देश गुजर रहा है और करोड़ों प्रवासियों को उनके गाँव में पहुंचाना एक राष्ट्रीय आवश्यकता बन गई है तब इस विभाग से अपेक्षा है कि वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी प्रामाणिकता के साथ करे। हालांकि शुरुवाती चरण में श्रमिक एक्सप्रेसों ने जीवनदायिनी की भूमिका का निर्वहन किया किन्तु बाद में वे सरकारी कार्यप्रणाली का नमूना पेश करने लगीं। रेलमंत्री को ये नहीं भूलना चाहिए कि श्रमिक एक्सप्रेस के माध्यम से प्रवासी मजदूरों की सहायता करने का ये प्रयास अव्यवस्था का शिकार होने से उन श्रमिकों के मन में बजाय संतुष्टि के नाराजगी का भाव उत्पन्न हो रहा है। सोचने वाली बात है कि इस भीषण गर्मी में 18-20 घंटों की यात्रा यदि हफ्ते भर में पूरी हो तो साधारण डिब्बे में बैठे यात्री की क्या दशा हुई होगी ? और कोई देश होता तो यात्रियों को मुआवजा देना पड़ जाता। लेकिन हमारे देश में जिम्मेदार लोग अफ़सोस करने में भी कंजूसी करते हैं। आपदा में किसी भी समाज और देश की पेशेवर दक्षता और संवेदनशीलता की परीक्षा होती है। ये कहना गलत नहीं होगा कि जिन भी राज्यो में दूसरे राज्यों के श्रमिक रह रहे थे वहां के शासन-प्रशासन ने अव्वल दर्जे की लापरवाही या शरारत की ,  वरना प्रवासी श्रमिकों की घर वापिसी एक राष्ट्रीय त्रासदी नहीं बनी होती। इस सम्बन्ध में महाराष्ट्र और गुजरात सरकार विशेष रूप से कठघरे में खड़े करने लायक हैं। हालाँकि अब तक करोड़ों प्रवासी श्रमिक अपने स्थानों तक लौट चुके हैं लेकिन अभी भी लाखों बाकी हैं। उन्हें पैदल जाने से रोकने हेतु बसों की व्यवस्था किये जाने के अलावा श्रमिक एक्सप्रेसों की संख्या भी बढ़ाई गई। इस काम में भी अनेक राज्यों ने निर्णय लेने में विलम्ब किया। बहरहाल अब जबकि काफी काम हो चुका है इसलिए रेलवे को देखना चाहिए कि उसके अच्छे प्रयास पर बदनामी के दाग न लग जाएं। रेलमंत्री पियूष गोयल को चाहिए वे श्रमिक एक्सप्रेस के परिचालन को राजधानी एक्सप्रेस जैसा ही महत्व प्रदान करें क्योंकि इस समय प्रवासी मजदूर पूरे देश की जिम्मेदारी हैं और उन्हें भी ये महसूस होना चाहिए कि देश उनका भी उतना ही है जितना सम्पन्न लोगों का।

-रवीन्द्र वाजपेयी