Sunday, 7 June 2020

एक दाने की बर्बादी भी अन्न देवता का अपमान है भण्डारण , कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण सुविधाओं से ही बढ़ेगी किसानों की आय




आज एक किसान भाई से अनायास मुलाकात हो गई | मैंने उसे बधाई  दी तो उसने पूछा किसलिए ? तब मैंने उससे कहा कि जब आर्थिक मोर्चे पर चौतरफा निराशाजनक खबरें आ रही हैं तब देश के किसानों ने रबी फसल में रिकॉर्ड पैदावार करते हुए देश का मनोबल बढ़ाया और उसी कारण से कोरोना संकट आते ही सरकार  भी देश भर में गरीबों को सस्ता और मुफ्त अनाज बाँट सकी । उसके तत्काल बाद लॉक डाउन के दौरान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी जैसे कठिन कार्य को संपन्न करवाया जिससे देश को आगामी  दो वर्षों तक अन्न संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा | जैसी जानकारी आई है उसके अनुसार इस वर्ष गेंहू की सरकारी खरीदी में भी रिकॉर्ड वृद्धि हुई है | लेकिन ये सब सुनने के बाद वह किसान बोला ये सब हर वर्ष होता है | किसान जी तोड़  मेहनत से अन्न उत्पादन करता है | सरकार उसे अच्छे दाम पर खरीदती भी है | इसी खरीदी से वह राशन की दुकान ( सार्वजानिक वितरण प्रणाली ) के माध्यम से गरीबों को सस्ता अनाज वितरण करती है  | लेकिन किसान की मेहनत से उपजे अन्न को पैसा देकर खरीदने के बाद समय पर उसके सुरक्षित  भंडारण की  व्यवस्था नहीं किये जाने के कारण हर वर्ष गोदामों में जाने से पहले ही काफी अनाज बरसात से भीगकर खराब  हो जाता है | इस तरह  रिकॉर्ड खरीदी किये जाने के बाद भी उसका समुचित लाभ नहीं हो पाता |

किसान की बात में कुछ भी  नयापन नहीं था | इस आशय की खबरें आये दिन देखने - सुनने मिला करती हैं | सरकार जिन केन्द्रों में किसान का अनाज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदती है वहां उसे ढांकने तक की उचित व्यवस्था नहीं होने से थोड़ी देर की बरसात से ही अनाज खराब हो जाता है | उसकी ये बात भी ध्यान देने योग्य थी कि सरकारी मशीनरी निजी क्षेत्र के जिन गोदामों का चयन करती है उनमें निकटस्थ को छोड़ ज्यादा दूर वाले गोदामों में भंडारण किये जाने से अनाज के परिवहन में विलम्ब होता है | उसने ये आरोप भी लगाया कि अनाज की खरीद के बाद से उसके गोदाम में जाने तक  के काम में सरकारी तंत्र का चिर - परिचित खेल चला करता है जिसकी जानकारी सबको होने के बावजूद व्यवस्था में सुधार नहीं होने से  बेशकीमती अनाज बरबाद होने के साथ ही किसान की मेहनत का भी अपमान होता है | गोदामों के चयन और परिवहन ठेकों में होने वाले भ्रष्टाचार का जिक्र भी उसने किया |

उसकी  बातें सुनने के बाद मुझे लगा कि उक्त सभी जानकारियाँ  शासन और प्रशासन में बैठे जिम्मेदार लोगों को होने के बाद भी व्यवस्था में सुधार करते हुए पिछली गलतियाँ ठीक करने के बजाय उन्हें दोहराने का अपराध होता है | जबलपुर  से भोपाल जाते समय रेल की खिड़की से नरसिंहपुर , करेली , गाडरवारा में सरकारी खरीद के अनाज को ऊँचे चबूतरों पर टीन शेड के नीचे प्लस्टिक शीट से ढंका देखा जा सकता है | इससे साफ होता है कि भले ही  किसानों ने अपने पौरुष से देश का पेट भरने के लिए हरित क्रांति के सपने को साकार कर दिखाया हो लेकिन उसके परिश्रम को अपेक्षित सम्मान देने की क्षमता हमारी शासकीय व्यवस्था आज तक उत्पन्न नहीं कर  सकी |

 सत्तर के दशक में जब खाद्यान्न संकट के कारण भारत को अंतर्राष्ट्रीय दबाव झेलने पड़ते थे तब स्व. इंदिरा गांधी ने अन्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए हरित क्रांति की शुरुवात करवाई थी | देश के किसानों और कृषि वैज्ञनिकों के समन्वित प्रयासों से वह अभियान अपने उद्देश्य में सफल हुआ और खाद्यान्न की कमी से उबरते हुए आखिरकार  अपनी जरूरत से अधिक अनाज पैदा करने में सफल हो गया | लेकिन उस महत्वपूर्ण लक्ष्य को तय करते समय इस बात को ध्यान नहीं रखा गया कि बढ़े हुए उत्पादन को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त  भंडारण क्षमता भी होनी चाहिए | उस समय तक देश में निजी क्षेत्र की गोदामें सरकार द्वारा किराये पर लिए जाने का चलन नहीं था | भारतीय खाद्य निगम के अपने गोदामों में भंडारण किया जाता था | कालान्तर में सरकार को जब एहसास हुआ तब उसने निजी गोदाम बनाने हेतु बैंकों से ऋण उपलब्ध करवाने के साथ ही  कुछ और सहूलियतें भी प्रदान कीं जिसकी वजह से देश में गोदामें तो खूब बन गईं किन्तु सरकारी तंत्र की दोषपूर्ण कार्यप्रणाली के कारण आज भी प्रतिवर्ष समय पर भंडारण नहीं होने से बहुत बड़ी मात्रा में सरकार द्वारा किसानों से खरीदी के बाद अनाज खराब हो जाता है |

उस किसान का ये दर्द वाकई संज्ञान लेने लायक है | हमारे देश में खेतों से निकलने वाले अनाज को सोना कहा जाता है और घर - परिवार में अन्न को देवता कहकर उसे सम्मान दिया जाता है  | जमीन में गिरे एक - एक दाने को उठाकर उसका उपयोग करने का संस्कार आम भारतीय में है | भोजन प्रारम्भ करने के पहले उसे प्रणाम करने और बाद में ईश्वर को धन्यवाद देने के पीछे भी अन्न के महत्व को स्वीकार करने की ही सोच थी |

भंडारण क्षमता के अलावा कोल्ड स्टोरेज और खाद्य प्रसंस्करण ( फ़ूड प्रोसेसिंग ) के प्रति भी लम्बे समय तक दुर्लक्ष्य किये जाने के कारण सब्जी और फल आदि का उत्पादन करने वाले अधिकतर किसान को उनकी मेहनत का वाजिब लाभ नहीं  मिलता | वहीं कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण सुविधा  की कमी से सब्जी और फल उत्पादकों को नुकसान होने के साथ ही आम उपभोक्ता को भी जरूरत के समय गुणवत्ता युक्त ताजी सब्जी , फलों के रस   आदि से वंचित होना पड़ता है |

आज जब भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहा है तब हमें अपनी भण्डारण क्षमता के साथ ही अन्न के अलावा अन्य कृषि उत्पादों को कोल्ड स्टोरेज सुविधा के साथ ही  प्रसंस्करण करते हुए उनका मूल्य बढ़ाने की ओर भी ध्यान देना चाहिए |

कोरोना संकट के समय यदि रबी फसल भी अर्थव्यवस्था के बाकी हिस्सों  की तरह निराश कर देती  तो इस महामारी से लड़ने में सरकार का हौसला टूट गया होता | लेकिन देश में भरपूर अन्न पैदा कर किसानों ने जो कारनामा किया उसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए | एक भी दाना यदि नष्ट होता है तो ये राष्ट्रीय क्षति ही नहीं नैतिकता के पैमाने पर भी अपराध ही है |

 संदर्भित किसान की पीड़ा को राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिलना चाहिए क्योंकि उस छोटी सी बात में देश का बड़ा हित छिपा है | भारत आज एक विश्व शक्ति के तौर पर उभरा है तो उसके लिए हमारी सैन्य शक्ति के  साथ किसानों के पसीने का भी उतना ही योगदान है ।  जिसके कारण आज हम 135 करोड़ जनता का पेट कम से कम दो वर्ष तक भर सकने लायक भंडारण करने में सक्षम हो सके | लेकिन सरकारी खरीद का अनाज यदि बिना खराब हुए सही समय पर गोदामों तक पहुंच  जाये तो गरीबों को दिए जाने वाले गेंहू वगैरह की गुणवत्ता भी अपेक्षाकृत बेहतर रहेगी |

कोरोना के बाद देश में अनेक बड़े बदलाव होने की चर्चा के बीच यदि अन्न , सब्जी , फल आदि के  लिए पर्याप्त , गोदामें , कोल्ड स्टोरेज तथा गाँवों के निकट ही प्रसंस्करण सुविधाएँ  उपलब्ध हों तो हरित क्रांति का उद्देश्य सार्थकता के साथ पूरा हो सकेगा |

 इस बारे में अमूल को आदर्श माना जा सकता है जिसने केवल दूध बेचकर मुनाफा कमाने के  बजाय दुग्ध उत्पादकों को अधिकतम उत्पादन के लिए प्रेरित करते हुए दूध से बनी चीजों की श्रृंखला तैयार करते हुए उसका मूल्य बढ़ा दिया | इसी तरह कृषि उत्पादों मसलन अन्न , सब्जी  और फल आदि का व्यावसायिक  उपयोग होने पर ही खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने का लक्ष्य पूरा हो सकेगा |

Saturday, 6 June 2020

कोरोना के फैलाव वाले इलाकों का अध्ययन जरूरी



भारत में कोरोना संक्रमण की संख्या में रोजाना तेजी से वृद्धि होने की वजह से आम जनता में भय का माहौल है | केंद्र सरकार द्वारा विशेष रेलगाड़ियाँ चलाये जाने के बाद भी लोग यात्रा करने से बच रहे हैं | श्रमिक एक्सप्रेस भी खाली  जा रही  हैं | बीते एक सप्ताह में ही 60 हजार नये संक्रमित  निकलने से कुल मरीजों की  संख्या 2 लाख 26 हजार पार कर गई | गत दिवस 10 हजार से ज्यादा नये संक्रमण सामने आये | लेकिन इन आंकड़ों में सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि महाराष्ट्र , दिल्ली , तमिलनाडु और गुजरात में ही लगभग 1.50 लाख संक्रमित अब तक मिले हैं | ये महत्वपूर्ण संख्या  है जिसका अध्ययन करने पर भविष्य में आने वाली ऐसी ही  आपदा के समय चिकित्सा प्रबन्धन पहले से कहीं बेहतर हो सकेगा |  अब तो उप्र , मप्र और राजस्थान भी 10 हजार  के आंकड़े को छू रहे हैं | इस तरह कुल सवा दो लाख में से तकरीबन 1.80 लाख संक्रमित तो केवल 7  राज्यों से ही निकले है |  हालाँकि इस समय देश में कोरोना के इलाज हेतु भर्ती मरीज कुल संख्या के आधे ही हैं | और यही वह आधार है जिस के बलबूते सरकार और जनता दोनों का आत्मविश्वास अभी तक बना हुआ है | बीते कुछ  दिनो में नए संक्रमण बढ़ने की  वजह प्रवासी श्रमिकों का पलायन माना जा सकता है | उप्र ,मप्र , राजस्थान , बंगाल , झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों में लौटे प्रवासी मजदूरों में से अनेक  अपने साथ कोरोना का संक्रमण लेकर लौटे हैं | जिस वजह से इन राज्यों में संक्रमितों  का आंकडा तेजी से बढ़ने  लगा | सबसे बड़ी बात ये है कि इन राज्यों में प्रवासी श्रमिकों की वापिसी के बाद कोरोना शहरों के अलावा ग्रामीण इलाकों तक भी जा पहुंचा है | लेकिन अभी तक  भयावह स्थिति महाराष्ट्र , तमिलनाडु , दिल्ली और गुजरात में ही है | इन चारों के कुल आंकड़े का ही आधा तो केवल महाराष्ट्र में ही निकल आया जिसका बड़ा हिस्सा मुम्बई में है | इन राज्यों और उनके भी कुछ विशेष शहरों में कोरोना संक्रमण के  औसत से भी ज्यादा फैलाव ने इस बात की जरूरत पैदा कर दी है कि सूक्ष्म  अध्ययन करते हुए पता लगाया जाए कि कोरोना का कहर इन्हीं पर ज्यादा क्यों फूटा ? भले ही सरकार ने संक्रमित व्यक्ति का नाम और पहिचान गोपनीय रखने की व्यवस्था की  हो  लेकिन इस जानकारी को वह लम्बे समय तक छिपाकर भी नहीं रख सकेगी | महामारी के बाद उसके कारण और निदान हेतु जब अध्ययन और शोध होंगे तब संक्रमित लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करना ही होगी | कोरोना ने जिन राज्यों को सर्वाधिक पीड़ित किया वहां कुछ न कुछ तो ऐसा होगा जिसकी वजह से संक्रमण का विस्तार बड़े पैमाने पर हुआ | उदाहरण के तौर पर मप्र के इंदौर और भोपाल तथा उनके निकटवर्ती क्षेत्रों में कोरोना का जितना फैलाव हुआ उतना प्रदेश के महाकौशल और विन्ध्य अंचलों में नहीं होना अध्ययन का विषय तो ही | इसी तरह महाराष्ट्र में कोरोना का प्रकोप मुम्बई  , पुणे  नासिक और ठाणे में जितना है उतना बाकी क्षेत्रों में नहीं होना महज संयोग नहीं बल्कि इसके पीछे कुछ विशेष कारण जरूर होंगे | भले ही मौजूदा हालातों में समूचा ध्यान कोरोना के इलाज और बचाव पर लगा हो लेकिन आखिरकार इस बीमारी के संदर्भ में उठे सवालों का जवाब तो तलाशना ही होगा क्योंकि चाहे दवा हो या वैक्सीन , ह तभी कामयाब होते हैं जब मरीजों और बीमारी के चरित्र का सही अध्ययन किया गया हो | अब तक इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया जाता रहा कि कोरोना संक्रमण शहरी क्षेत्रों में ही फैला जबकि आदिवासी अंचल उससे अछूते रहे | हालाँकि प्रवासी श्रमिकों के लौटने के बाद आदिवासी जिलों में भी संक्रमित सामने आये हैं लेकिन उनकी संख्या तुलनात्मक रूप से बेहद कम है | ऐसे में चिकित्सा विज्ञान के लिए ये अध्ययन और अनुसन्धान का अच्छा विषय होगा | महामारी का कुछ विशेष क्षेत्र या समुदायों में फैलना या न फैलना दोनों महत्वपूर्ण है | इनके अध्ययन के उपरान्त ही न सिर्फ चिकित्सा क्षेत्र अपितु शहरों की बसाहट की  समूची योजना पर भी नए सिरे से विचार करना होगा | क्योंकि  वैश्विक हालातों के परिप्रेक्ष्य में इस तरह की आपदा के पुनरागमन की आशंका को नजरअंदाज नहीं  किया जा सकता | विशेषज्ञों का अभिमत है कि भारत में कोरोना अपने चरम बिंदु की ओर बढ़ रहा है  औरर जून तथा जुलाई में वह अपना उच्चतम शिखर छू लेगा | यदि जिन राज्यों में अभी उसका सर्वाधिक प्रकोप है उन्हीं में उसका संक्रमण और बढ़ा तब ये मान लेना पडेगा कि वहां संक्रमण को खाद पानी देने वाली तत्व मौजूद है | और तभी कोरोना को सही तरीके से घेरकर हराया जा सकेगा | चूँकि ये बीमारी भारतीय परिस्थितियों में नहीं पनपी इसलिए भविष्य के लिए रक्षा कवच तैयार करना ही बुद्धिमानी होगी | केवल पीपीई किट , सैनिटाईजर और मास्क बनाना उपलब्धि नहीं है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 June 2020

लॉक डाउन : पर्यावरण संरक्षण का प्रशिक्षण काल



आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इस साल कोरोना संक्रमण के कारण बड़े आयोजन तो नहीं हो पा रहे लेकिन साधारण जन भी  महसूस कर रहे हैं कि प्रकृति के प्रति उनका व्यवहार बेहद असंवेदनशील होने से उसका रौद्र रूप किसी  न किसी तरह से सामने आता रहा है। कोरोना एक वायरस है जिसका प्रकोप पर्यावरण को हुए नुकसान का प्रमाण है या नहीं इस बारे में अभी तक कोई निश्चित राय नहीं बन सकी लेकिन लॉक डाउन के दौरान प्रकृति जिस तरह श्रृंगारित होकर सामने आई उसने समूची मानव जाति को आत्मावलोकन के लिए मजबूर कर दिया। हम अपने ही देश में देखें तो सबसे पहले ध्यान खींचा वाराणसी में गंगा नदी के जल में आये परिवर्तन ने। उसका पानी न केवल स्वच्छ हुआ अपितु मछलियाँ भी जल क्रीड़ा करते हुए किनारों पर मंडराने लगीं। पहले चूँकि नदियों के किनारे श्रद्धालुओं द्वारा फेंकी गई पूजन सामग्री से लबालब रहते थे इसलिए मछलियां वहां तक नहीं आती थीं। गंगा की शुद्धता के लिए करोड़ों रु. खर्च होने के बाद भी उसे प्रदूषित होने से नहीं बचाया जा सका लेकिन लॉक डाउन के कुछ दिन बाद ही जब वैज्ञनिकों ने वाराणसी में उसके जल के नमूनों का परीक्षण किया तब वे उसकी गुणवत्ता में हुए सुधार को देखकर भौचक रह गये। ऐसी ही खबरें देश की दूसरी नदियों के बारे में आने लगीं। चूँकि कारखानों से निकलने वाला दूषित जल आना रुक गया इसलिए भी नदियों को सांस लेने का अवसर मिला। भरी गर्मी में बढ़ते हुए तापमान ने इस वर्ष हलाकान नहीं किया। महानगरों के वायुमंडल में जहरीली गैसों की मात्रा बिना कुछ किये घट गई। वातावरण में छाई धूल के अलावा वाहनों और कारखानों से निकलने वाला धुंआ कम हो जाने से 100 किमी से भी ज्यादा दूरी से पहाड़ों की चोटियाँ नजर आने लगीं। सबसे बड़ी बात ये देखने में आई कि उक्त रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, दमा के अतिरिक्त मौसमी बदलाव से होने वाली आम बीमारियों से लोगों को राहत मिली। उल्लेखनीय है लॉक डाउन के दौरान जनरल प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सक अपनी डिस्पेंसरी बंद कर घर बैठ गए थे लेकिन अपवादस्वरूप कुछ को छोड़कर अधिकतर को पर्यावरण में आये सुखद बदलाव ने स्वस्थ बनाये रखा। शहरों में कम होते जा रहे पक्षी वापिस नजर आने लगे। तितलियों की रंग बिरंगी उड़ानें भी घरों के बगीचों में अरसे बाद दिखने लगीं। संरक्षित वन होने के बावजूद सैलानियों की नजरों से बचकर छिपने वाले वन्य पशु निर्भय होकर बाहर आने लगे। इस दृष्टि से बीते दो माह एक तरह से प्रकृति और पर्यावरण के लिए वरदान बनकर आये। लेकिन ज्योंहीं लॉक डाउन में ढील दी गयी त्योंहीं हालात जैसे थे की ओर लौटने लगे। मात्र कुछ दिनों में ही दो महीने के पर्यावरण संरक्षण के सुखद एहसास पर पानी फेरने के लिए मानवीय वासना फिर अपने असली रूप में आने लगी। बौद्धिक अंदाज में कहें तो लॉक डाउन था तो कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए लेकिन उसका सर्वाधिक लाभ हुआ प्रकृति और पर्यावरण को। ऐसे में इसे पर्यावरण संरक्षण का प्रशिक्षण काल भी कह सकते हैं। पर इस दौरान मिले सबक से हम मनुष्यों ने कुछ नहीं सीखा तो फिर ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि हमने नहीं सुधरने की कसम खा रखी है। यदि लॉक डाउन के दौरान जैसा आचरण हमारा रहा उसका आधा भी हम अपने चरित्र में उतार सकें तो पर्यावरण संरक्षण को लेकर व्याप्त चिंताएं दूर हो सकती हैं। सही कहा जाए तो पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिवस या कुछ दिनों की औपचारिकताओं तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा होना चाहिए। जिस तरह हमारी जि़न्दगी के लिये सांस लेना जरूरी है वैसी ही जरुरत कुछ-कुछ  प्रकृति और पर्यावरण की भी हैं। जिस दिन हम इस बात को समझकर सहअस्तित्व की आवश्यकता को जान लेंगे उस दिन से रोज पर्यावरण दिवस होगा। जल, जंगल और जमीन के नैसर्गिक स्वरूप को हम जितना ज्यादा सुरक्षित रख सकेंगे हमारी भावी पीढिय़ां उतनी ही स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगी। पूर्वजों ने हमें एक हरी-भरी वसुंधरा दी थी। हम अपने बच्चों को क्या देने जा रहे हैं उसका विचार करने का समय आ गया है। कोरोना ने सुधरने का जो अवसर दिया उसका लाभ नहीं उठाया तो फिर ये कहना ही ठीक होगा कि हम खुद अपना विनाश करने पर आमादा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 June 2020

फसल बेचने की स्वतंत्रता : देर आये दुरुस्त आये



मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बारे में उनके आलोचक कुछ भी कहें लेकिन उनकी सरकार सदैव किसानों के हित में सार्थक कदम उठाती रही है। फरवरी में  सत्ता में लौटते ही कोरोना संकट आ गया लेकिन इस दौरान भी उन्होंने किसानों को फसल का वाजिब मूल्य दिलवाने के लिए कृषि उपज मंडी रूपी बाधा दूर करते हुए देश में कहीं भी अपना उत्पाद बेचने की जो सुविधा दी उसका अनेक राज्यों ने अनुसरण किया और अब केन्द्र सरकार ने उस व्यवस्था को पूरे देश के लिए लागू करते हुए किसानों को अपनी फसल देश में कहीं भी बेचने की छूट देकर एक क्रांतिकारी कदम उठाया जो सही मायनों में तो पहले ही उठा लिया जाना चाहिए था। कृषि उपज मंडी नामक व्यवस्था किसानों को आढ़तियों के शोषण से बचाने के लिए बनाई गयी थी। सिद्धान्त: वह एक अच्छा प्रयोग था किन्तु कालान्तर में वह भी राजनेताओं और अफसरों के भ्रष्ट गठजोड़ का अड्डा बन गया। उसके चुनावों में असली  किसानों की स्थिति महज मतदाता की रह जाती जबकि महत्वपूर्ण पदों पर नेता या माफिया किस्म के लोग जम जाते। परिणाम ये हुआ कि बजाय किसानों का फायदा होने के मंडियां उन्हें परेशान करने का कारण बन गईं। जिस तरह से बाजार में व्यापारी उन्हें भुगतान के लिए रुलाते थे उसी तरह का खेल कृषि उपज मंडियों में भी होने लगा। ऐसा नहीं है कि ये मंडियां पूरी तरह से अनुपयोगी हैं लेकिन वे अपनी स्थापना के व्यापक उद्देश्य से भटक गईं, ये कहना गलत नहीं होगा। हालांकि श्री चौहान पहले भी एक दशक से ज्यादा तक प्रदेश की सत्ता में रहे किन्तु किसानों के हित में अनेक अच्छे फैसले लेने के बावजूद कृषि उपज मंडी नामक भ्रष्टाचार के अड्डे से किसानों को मुक्ति दिलवाने के लिये न जाने क्यों इन्तजार किया गया ? इसी तरह से किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य लेकर चल रही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के दिमाग में भी ये छोटी सी बात क्यों नहीं आई ? खैर, कोरोना से उत्पन्न परिस्थितियों में मानव जाति के मन में सर्वशक्तिमान होने का घमंड जिस तरह टूटा उसी तरह से सरकार को भी आखिऱकार ये समझ में आने लगा कि वह हर क्षेत्र में प्रभावशाली और सफल नहीं हो सकती। इसीलिये इस दौरान उसने राहत पैकेज के नाम पर जिस तरह के सुधार किये उनको लेकर आलोचना के स्वर गूंज रहे हैं लेकिन ये बात पूरे तौर पर सही है कि 1991 में डा. मनमोहन सिंह द्वारा प्रारम्भ किये गए आर्थिक सुधारों को राजनीतिक दबावों के कारण पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका। जब भी थोड़ी कोशिश हुई तब कोई न कोई अड़ंगा आ गया। सही बात तो ये है कि नेता और नौकरशाहों का गठजोड़ अपना वर्चस्व कहीं से भी छोड़ना नहीं चाहता। यही वजह है कि समझ में ही नहीं आता कि कौन सा क्षेत्र सरकारी दखलंदाजी से मुक्त है और कौन सा नियन्त्रण में ? इसलिए किसानों की फसल को बेचने में लगे अवरोधक हटा देने के निर्णय की हर सुलझा हुआ व्यक्ति प्रशंसा करेगा। हालांकि ये बात भी सही है कि किसान समुदाय में आज भी शिक्षा और डिजिटल मार्कटिंग की समुचित जानकारी रखने वाले गिने-चुने हैं। लेकिन कृषि उपज मंडी वाली बाधा दूर होने से स्थानीय और बाहरी व्यापारी खुद उनके पास पहुँचने लगेगा। और उस समय वे ज्यादा भाव पर सौदा कर सकेंगे। रही बात मंडियों की आवश्यकता की तो वे अपना काम करती रहें। जो किसान उनके माध्यम से अपना अनाज बेचना चाहें वे बेशक उनकी सेवाएँ लेते रहें लेकिन जिन्हें ये लगे कि उन्हें सीधी बिक्री से लाभ मिल रहा हो वे मनमाफिक व्यापारी को बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं। इस निर्णय को देर आये दुरुस्त आये कहना गलत नहीं होगा। पुरानी कहावत है राजा का कम नियमन करना है व्यापार करना नहीं। लेकिन हमारे देश में सरकारे खुद ही मुनाफाखोर हो उठीं और इसीलिये हर क्षेत्र में उनका नियन्त्रण या हस्तक्षेप होता रहा। अब जबकि सुधार प्रक्रिया एक बार फिर से शुरू हो गई है तब इसे और आगे बढ़ाना चाहिए। किसानों के अलावा उद्योग-व्यापार में भी सरकारी दखलंदाजी जरूरत से ज्यादा है। कोरोना काल में जब भारत खुद को विश्व के सबसे बड़े मैन्युफेक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने का ख्वाब संजो रहा है तब उसे वैश्विक स्तर पर ये छवि भी बनानी होगी कि भारत में उद्योग-व्यापार करना पूर्वापेक्षा न सिर्फ आसान वरन फायदेमंद भी हो गया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 June 2020

उपचुनाव रद्द हुए तो आसमान टूट नहीं पड़ेगा




मप्र भी उन राज्यों में से हैं जहाँ कोरोना के नये मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। मौतें भी कम होने का नाम नहीं ले रहीं। प्रवासी मजदूरों की घर वापिसी के बाद अभी तक अछूते माने जा रहे जिलों तक भी संक्रमण पहुँच चुका है। यद्यपि इंदौर और उसके आसपास के जिलों के साथ ही भोपाल तथा सागर में संक्रमितों की संख्या काफी है किन्तु आगामी कुछ दिनों में जैसी आशंका है मरीजों की संख्या में वृद्धि होगी। बाहर से लौटे मजदूरों का क्वारंटाइन अभी चल ही रहा है। वह खत्म होने में समय लगेगा। और फिर प्रवासियों के लौटने का सिलसिला भी तो जारी है। ऐसे में प्रदेश सरकार का पूरा ध्यान कोरोना संकट का मुकाबला करने में लगा हुआ है। स्थानीय प्रशासन भी राहत और बचाव के कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर अंजाम देने में जुटा है। लॉक डाउन हटते ही जिस तरह से लोग घरों से निकलकर सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं वह भी खतरे को न्यौता देने वाला है। ऐसे में ये आशंका भी जाहिर की जा रही है कि लॉक डाउन कहीं फिर से नहीं लगाना पड़ जाए। इन हालातों में सियासत का अखाड़ा सजाना अटपटा लग सकता है। फिलहाल शादी-ब्याह बंद हैं, समारोह-जलसों और राजनीतिक कार्यक्रमों पर भी रोक लगी है। यहाँ तक कि संसदीय समितियों की बैठकें तक रुकी हुई हैं। संसद और विधानसभाओं के अधिवेशन कैसे आयोजित हों उस पर माथापच्च्ची चल रही है। और ऐसे में मप्र विधानसभा के 24 उपचुनाव करवाने की उधेड़बुन शुरू हो गयी है। कांग्रेस से त्यागपत्र देकर भाजपा में आये 22 के अलावा दो अन्य विधायकों की मृत्यु से रिक्त हुए स्थान को भरने के लिए उपचुनाव होना हैं। संविधान के अनुसार लोकसभा या विधानसभा की कोई सीट रिक्त होने पर छह महीने के भीतर उपचुनाव करवाना जरुरी है। उस दृष्टि से मप्र में उपचुनाव की प्रक्रिया पूरी तरह विधि सम्मत है किन्तु मौजूदा परिस्थितियों में जब प्रदेश की करोड़ों जनता की जान दांव पर लगी हो तब एक साथ 24 उपचुनाव कराने का अर्थ है सत्ता और विपक्ष ही नहीं चुनाव वाले स्थानों की पुलिस और प्रशासन चुनाव चक्कर में फंसकर कोरोना के विरूद्ध हो रही मोर्चेबन्दी से मुंह मोड़ लेंगे। भले ही कितना भी दावा किया जा रहा हो कि सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार होने से शारीरिक दूरी बनी रहेगी लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से ये नामुमकिन होगा। और फिर दोनों पक्षों से पानी की तरह पैसा बहाया जाएगा। सरकारी अमले को चुनाव ड्यूटी में लगाना होगा। मतदान के दिन दोनों खेमे ज्यादा से ज्यादा मतदान के लिए प्रयास करेंगे जिससे उनकी विजय सुनिश्चित हो जाए। और ऐसा करते समय दो गज की दूरी का पालन करना असमभव रहेगा। मतदाता जिस ईवीएम का बटन दबायेंगे क्या उसे हर बार सैनिटाइज करना संभव होगा ? सवाल और भी है लेकिन जिस संविधान के अंतर्गत थोक के भाव उपचुनाव करवाना जरुरी माना जा रहा है वह हम भारत के लोग से शुरू होता है और दरअसल उन्हीं के लिए बना भी है। ये देखते हुए जब भारत के लोगों के प्राण संकट में हों तब उपचुनावों को स्थिति सामान्य होने तक टालने से आसमान नहीं फट पड़ेगा। ऐसे समय में जब प्रदेश सरकार के सभी समन्धित विभाग कोरोना वारियर बनकर मानवता की सेवा और सुरक्षा में लगे हुए हैं तब उनका ध्यान उस ओर से हटाकर उपचुनाव में लगा देना अमानवीय होगा। माना, कि ये उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए जीवन मरण का प्रश्न हैं जिनके परिणाम से तय होगा कि शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहेंगे या फिर सत्ता लौटकर कमलनाथ के पास आयेगी। लेकिन भाजपा-कांग्रेस या किसी और पार्टी के भविष्य से ज्यादा मूल्यवान मप्र के करोड़ों लोगों की जि़न्दगी है। ऐसे में उपचुनाव वाले क्षेत्रों में कोरोना जांच पर विपरीत असर तो पड़ेगा ही इसी के साथ-साथ यदि किसी क्षेत्र विशेष में तब संक्रमण फैला रहा तो वहां न प्रचार सम्भव होगा और न ही मतदान। ऐसे अनेक कारण हैं जिनके आधार पर इन उपचुनावों की निरर्थकता सिद्ध हो सकती है। लेकिन पता नहीं क्यों दिन रात जनता के लिए जान न्यौछावर करने का दावा करने वाले नेतागण उसी जनता की जान खतरे में डालने पर क्यों आमादा हैं ? आखिर चुनाव लड़ने वाली पार्टियों के कार्यकर्ता भी तो चुनाव में सक्रिय होंगें। उनके भी संक्रमित होने का खतरा बना रहेगा। ये सब देखते हुए बेहतर यही है कि केवल मप्र के ही नहीं अपितु देश के और किसी राज्य में होने वाले उपचुनाव भी कोरोना संकट के पूरी तरह दूर होने तक स्थगित रखे जाएं। रही बात संवैधानिक बाध्यता की तो जिस तरह सभी दलों के सांसद अपने वेतन-भत्ते बढ़ाते समय सभी वैचारिक मतभेद भुलाकर एकजुट हो जाते हैं वैसे ही इस मुद्दे पर एकमत होकर संसद से वैधानिक औपचरिकता पूर्ण करवाने एक साथ आयें। यदि कोरोना का खतरा बना रहता है तब बिहार विधानसभा के आसन्न चुनाव भी टाले जाना चाहिए क्योंकि जनतंत्र जिस जन के लिए बना है उसकी जि़न्दगी कुछ लोगों की सियासत से ज्यादा कीमती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 June 2020

वाटर हार्वेस्टिंग को भी जनांदोलन बनाना होगा



कोरोना की बढ़ती चिंताओं के बीच केरल में मानसून का ठीक समय पर आ जाना राहत देना वाला है। मौसम विभाग का अनुमान है कि इस साल मानसून से 102 प्रतिशत वर्षा होगी। इसका आशय ये है कि औसत बरसात से ही संतोष नहीं करना पड़ेगा। अपितु नदियाँ लबालब होंगीं, जलाशय भर जायेंगे, कुओं में खूब पानी होगा और इसके कारण भूजल स्तर में भी सुधार होगा जिससे वर्षा उपरांत सिचाई और पीने के लिए भरपूर पानी उपलब्ध रहेगा। भारत में चूंकि अभी भी खेती का बड़ा हिस्सा मानसूनी बरसात पर निर्भर है इसलिए ज्योंही अच्छी बरसात की भविष्यवाणी होती है त्योंहीं उससे बाजार में भी उम्मीद की किरण नजर आने लगती है। इसकी वजह भारत की अर्थव्यवस्था का कृषि पर आधारित होना है। यद्यपि पहले जैसी हिस्सेदारी न रही हो लेकिन खेती न सिर्फ अर्थव्यवस्था अपितु सामाजिक गतिविधियों पर भी असर डालती है। अच्छी फसल मतलब अच्छा शादी सीजन और अच्छा शादी सीजन यानि बाजार में रौनक। सर्वविदित है कि कोरोना के कारण ग्रीष्मकालीन विवाह या तो रद्द हो गये या फिर बेहद सादगी से हुए जिससे कपड़ा, किराना, आभूषण, होटल, कैटरिंग से लेकर तो बैंड, घोड़ी और आतिशबाजी वालों तक का व्यवसाय ठप्प पड़ गया। अर्थव्यवस्था को लगे झटके का एक कारण ये भी है। अब चूँकि मानसून को लेकर अच्छी खबर आई है इसलिए किसान के साथ ही उद्योग-व्यापार जगत भी आने वाले भविष्य में सुखद एहसास की कल्पना करने लगा है। लेकिन अच्छे मानसून की खुशी तब जाकर कमतर हो जाती है जब ये खुलासा होता है कि कुदरत से मिलने वाली इस अमूल्य दौलत को हम सहेजकर नहीं रख पाते और जो भी अतरिक्त वर्षा होती है वह बाढ़ के रूप में तबाही मचाते हुए अंतत: सागर में जाकर समा जाती है। जहां तक बांधों का सवाल है तो उनमें जल एकत्र करने की एक सीमा है। तालाबों और कुओं की भी अपनी क्षमता होती है किन्तु वाटर हार्वेस्टिंग नामक वर्षा जल को संग्रहित करने की जो प्रणाली भवनों की छतों पर लगई जाती है उससे होने वाला जल संग्रहण सीधे भूजल स्तर को ऊपर उठाता है। आजकल घरों में पहले जैसे आंगन नहीं होते और होते भी हैं तो कच्चे  नहीं होने से वर्षा जल उसके जरिये घर के कुए या बोरिंग में न जाकर नालियों में बह जाता है। विकास के नये पैमाने के तहत अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी सीमेंटेड सड़कें बनने से वर्षा जल जमीन में समाने के बजाय व्यर्थ चला जाता है। सौर उर्जा की तरह ही वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था नये निर्माणों में अनिवार्य कर दी गई है। स्थानीय निकाय इस हेतु नक्शा स्वीकृत करते समय कुछ राशि बतौर सुरक्षा निधि जमा भी करवाते हैं जिसका उद्देश्य ये है कि निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद किये जाने वाले निरीक्षण के दौरान यदि ये पाया जाए कि वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली नहीं लगाई गई तब उस सुरक्षा निधि से वह काम करवा दिया जावे। लेकिन ऐसा अपवादस्वरूप ही होता है। स्थानीय निकाय सुरक्षा निधि को बैंक में जमा रखते हुए ब्याज खाते हैं किन्तु इतने महत्वपूर्ण उद्देश्य की अनदेखी कर दी जाती है। मन की बात के पिछले प्रसारण में प्रधानमंत्री ने इस बारे में बात भी की लेकिन प्रचार माध्यमों ने इसे ज्यादा महत्व नहीं दिया। हर साल मानसून के पहले इसकी जरूरत पर विमर्श होता है लेकिन जमीन पर पर्याप्त प्रयास नहीं होते। ऐसे में जरूरी है स्वच्छता मिशन की तरह से ही वर्षा जल संग्रहण को भी जनांदोलन बनाया जाए। देश में अन्न के भण्डार तो इतने होते हैं जिनसे एक वर्ष देश की खाद्यान्न जरूरतें पूरी की जा सकती हैं परन्तु जल के मामले में ये स्थिति नहीं बन पा रही। जल के क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में आगे आना चाहिए। हालाँकि लोग अब इसकी जरूरत को समझने लगे हैं लेकिन अभी भी गम्भीरता का अभाव है। भारत में जल की बर्बादी को रोकने का जो संस्कार था वह आधुनिक जीवनशैली के चलते विलुप्त होता जा रहा है। उसे पुनर्जीवित करते हुए जल संग्रहण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। प्रकृत्ति से मिलने वाले अनमोल तोहफे को नालियों में बहने देना किसी अपराध से कम नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 June 2020

ताकि लॉक डाउन की नौबत दोबारा न आये



जैसी कि उम्मीद थी ठीक वैसा ही हुआ। आज से कुछ राज्यों को छोड़कर लॉक डाउन काफी हद तक वापिस ले लिया गया। हालांकि बाजार वगैरह शाम जल्दी बंद हो जायेंगे और रात 9 बजे से सुबह तक कर्फ्यू  रहेगा किन्तु शॉपिंग माल, सिनेमा, पार्लर जैसे व्यवसाय बंद रहेंगे। होटल, रेस्टारेंट आदि 8 जून से खुल जायेंगे जबकि स्थानीय सार्वजनिक परिवहन भी कुछ बंदिशों के साथ शुरू करने की छूट दी जायेगी। आज से रेल गाड़ियों का संचालन भी बढ़ाया जा रहा है। लेकिन उल्लेखनीय बात ये रहेगी कि साधारण डिब्बे में भी उतने ही यात्री बैठ सकेंगे जितनी उसकी वास्तविक सीट संख्या है। अर्थात ठसाठस भरे यात्री वाले नज़ारे नहीं होंगे। राज्यों के भीतर और बाहर आवागमन पर भी रोक तकरीबन हटा ली गयी है। हवाई सेवा सीमित क्षेत्रों में शुरू हो ही चुकी है। विद्यालय और महाविद्यालय खोलने का फैसला जुलाई में किया जाएगा। लॉक डाउन के दौरान सवा दो महीने देश ने जो देखा और भोगा उसके बाद मिली ये छूट वैसे तो राहत भरी है लेकिन जब प्रतिदिन 7 से 8 हजार नये संक्रमित मामले आ रहे हों तब लॉक डाउन को बड़े पैमाने पर शिथिल करने के फैसले पर सवाल भी उठ रहे हैं। दरअसल चौतरफा मांग के बाद ही राज्यों से सलाह लेकर केंद्र ने ये कदम उठाया जिसके पीछे मुख्य उद्देश्य कारोबारी गतिविधियाँ शुरू करना है। सरकारी और निजी क्षेत्र के दफ्तर भी आज से पूरी तरह काम कर सकेंगे। कारखानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खुलने से क्रमश: उत्पादन और बिक्री दोनों को सहारा मिलेगा। सबसे बड़ी बात ये होगी कि रोजनदारी वाले श्रमिकों के अलावा निजी क्षेत्र के छोटे कर्मचारियों की बेरोजगारी दूर हो सकेगी। रबी फसल के बाद इन दिनों अनाज मंडियों में जबरदस्त कारोबार रहता है जिसको काफी नुकसान हुआ। मानसून देश में प्रवेश कर चुका है। ऐसें में जून माह अनाज व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। पूरे शादी सीजन में लॉक डाउन बने रहने से कपड़ा और जेवर की बिक्री भी बुरी तरह प्रभावित हुई। उसी तरह, कूलर, एयर कंडीशनर आदि का व्यवसाय भी मार खा गया। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि एक भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें इस दौरान जबरदस्त नुकसान न हुआ हो। लेकिन लॉक डाउन जरूरी से ज्यादा मजबूरी बन गया था। भले ही कोई कुछ भी कहे किन्तु उसका विकल्प नहीं था और लोगों की जान बचाने से बड़ी प्राथमिकता दूसरी नहीं हो सकती थी। इस दौरान कारोबार बंद रहने से अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ वह तो अपनी जगह है परन्तु अल्प आय वर्ग के सामने जो मुसीबतें आ गईं उनके मद्देनजर ये जरूरी हो चला था कि धीरे - धीरे ही सही लेकिन जनजीवन के साथ ही शासन और प्रशासन भी पूरी क्षमता के साथ काम करें। और आज से अनेक बंदिशों के बावजूद लॉक डाउन काफी हद तक वापिस ले लिया गया। लेकिन इसके साथ ही आम जनता की जिम्मेदारी और बढ़ गयी है, क्योंकि मास्क, सैनीटाइजर, सोशल अथवा शारीरिक डिस्टेंसिंग जैसी सावधानियों का पालन करना अब हमारे ऊपर निर्भर होगा। दफ्तरों में ऐसा करते हुए काम करना आसान नहीं होगा लेकिन कोरोना से बचाव करने के लिए उक्त छोटी-छोटी बातों को नजरंदाज करना बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। भारत सरीखे विशाल जनसंख्या वाले देश में शारीरिक दूरी बनाये रखना बहुत कठिन काम है किन्तु मौजूदा हालात में उसका विकल्प भी नहीं है। इसलिए उसे अनिवार्य आवश्यकता के तौर पर देखना चाहिए। बाकी सावधानियां भी रोजमर्रे की जि़न्दगी में मोबाईल फोन जैसे साथ चलेंगी। लॉक डाउन ऐसे समय हटाया गया है जब देश में कोरोना निरंतर बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ  ये भी सही है कि दर्जन भर शहरों में चूँकि 70 से 75 फीसदी संक्रमित सिमटे हुए हैं इसलिए पूरे देश को तालाबंदी में रखना कठिन भी है और औचित्यहीन भी। फिर भी देखने वाली बात ये होगी कि अगर जनता ने वैसा ही नजारा पेश किया जैसा शराब दुकानें खुलने के बाद दिखाई दिया तब फिर लॉक डाउन रूपी ताला दोबारा लटकने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। आगामी एक महीना इस लिहाज से परीक्षण का होगा। यदि सब ठीक - ठाक रहा तभी सामान्य स्थिति की उम्मीद की जा सकेगी। भले ही राज्य के भीतर और बाहर आवाजाही पर रोक हटा ली गई है परन्तु ये छूट संक्रमण फैलाने का कारण न बने ये चिंता सरकार से ज्यादा लोगों को खुद करना होगी। शासकीय इंतजाम एक हद तक जाने के बाद खत्म होते जायेंगे। कोई ये सोचे कि वह लापरवाह बना रहे और सरकार सजग रहे तो ये गलत होगा। अपने और अपनों के स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहना हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है और यही सोचकर लॉक डाउन में काफी हद तक रियायतें दी गईं हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी