Wednesday, 10 June 2020

नेता मांगने भले न आयें पर मतदाता को तो वोट देने जाना ही पड़ेगा क्या एहसास वास्तविकता का विकल्प बन सकेगा ?



सोशल मीडिया के प्रादुर्भाव के साथ ही Virtual शब्द काफी प्रचलित हो गया था | हिन्दी में इसे आभास के तौर पर समझा जाता है  | इसमें विभिन्न माध्यमों के जरिये अनजाने लोगों से बिना मिले परिचय और संवाद संभव हो गया | सोशल मीडिया के प्लेटफ़ार्म कहे  जाने वाले अनेक माध्यमों ने पूरी दुनिया को आभासी संसार ( Virtual World ) का रूप दे दिया है | कुछ देशों में तो फेसबुक जैसे माध्यम बड़े राजनीतिक परिवर्तनों का आधार बन गये | वहीं आभासी माध्यम से हुई मित्रता वैवाहिक गठबंधन तक में बदल गयी | मेरे प्रिय अनुज वरिष्ठ टीवी पत्रकार Sanjay Sinha  ने तो फेसबुक परिवार के रूप में रिश्तों का एक नायाब संसार खड़ा कर दिया , जिसका विस्तार देश - देशांतर तक हो चुका है | प्रारम्भ में महज बतियाने का साधन माने जाने वाला  सोशल मीडिया धीरे - धीरे अभिव्यक्ति और संवाद के सबसे  सशक्त और सक्रिय माध्यम के तौर पर स्थापित हो चुका  है |

लेकिन बीते कुछ महीनों में पूरी दुनिया जिस तरह कोरोना नामक अदृश्य शत्रु के हमले से हिल उठी उसने आभासी दुनिया को एक नया रूप  दे दिया | शिक्षा , व्यवसाय , प्रशिक्षण , प्रशासन , वैचारिक - बौद्धिक गतिविधियाँ अब वेबिनार नामक नई  विधा में सिमट गईं हैं | विभिन्न देशों के राष्ट्र प्रमुख भी  वेबिनार के जरिये उच्च स्तरीय राजनयिक वार्तालाप कर रहे हैं | प्रधानमंत्री सभी मुख्यमंत्रियों और मुख्यमंत्री जिले के अधिकारियों से बिना सामने बैठे रूबरू हो जाते हैं |

और जब सब कुछ वेबिनार में आकर केन्द्रित हो गया तब भला राजनेता कैसे पीछे रहते और इसीलिये उन्होने भी निःसंकोच कोरोना काल के दौरान  आभासी संसार में बाकायदा अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी | पार्टी की बैठकें वेबिनार पर होने लगीं | पत्रकार वार्ता में पत्रकारों के सवाल और नेताओं के जवाब तो होते हैं लेकिन आमने - सामने बैठकर होने वाला संवाद टीवी या मोबाइल की स्क्रीन के जरिये होने लगा है | स्कूल , कालेज के विद्यार्थी घर बैठे कक्षा में उपस्थिति का एहसास करते हैं | कविगण श्रोताओं को कविताएँ सुनाने खुद उपस्थित हैं | संगीतकार नई - नई धुनें बनाकर आभासी माध्यम से रसवर्षा कर रहे हैं | बढ़ते - बढ़ते इसका चरमोत्कर्ष राजनीतिक पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं द्वारा सम्बोधित की जा रही रैलियों तक आ पहुंचा।

चूँकि कोरोना ने  सारे पहिये रोक दिए और लम्बे समय तक जो जहां है वहीं  बंधकर रह गया तब आभासी संसार ने बिना चले या हिले ही समूचे ठहराव को अनूठी गतिशीलता प्रदान की | इसमें एक जगह बैठ -  बैठे ही व्यक्ति पूरे दुनिया - जहान  से मुखातिब  होकर अपनी कह लेता है और दूसरों की  सुन भी सकता है | इसकी तुलना वायु की गतिशीलता से की जा सकती है जो चलते  हुए महसूस तो होती है किन्तु उसका दर्शन नहीं होता |

बीते कुछ दिनों में देश के विभिन्न राजनीतिक दलों ने वेबिनार के अलावा आभासी संसार के विभिन्न माध्यमों के जरिये राजनीतिक रैलियां , संगठनात्मक   बैठकें , पत्रकार वार्ता आदि करते हुए जो प्रयोग किया वह कोरोना काल में हुए बड़े बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण माना जावेगा |

पूरी तरह विपरीत परिस्थितियों में जब नेतागण दौरे नहीं कर  सकते और चुनाव सिर  पर आ खड़े हों तब उनका संवादहीन होना खतरनाक साबित हो सकता है | और इसी खतरे को टालने के लिए अब सियासी सम्वाद भी वेबिनार के जरिये हो रहा है | वैसे लम्बे समय से चुनाव के दौरान नेताओं के हवाई दौरों और रैलियों पर होने वाले अनाप शनाप खर्च को कम करने के लिये आम चर्चा में ये सुझाव आता रहा है कि क्यों न टीवी चैनलों के माध्यम से वे मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाएं | लेकिन वेबिनार के  तौर  पर एक नया तरीका सामने आया है जिसमें एक जगह से नेता दूर - दूर बैठे लाखों लोगों से एक साथ संवाद कर रहे हैं | कम से कम पार्टी कार्यकर्ताओं से तो इस माध्यम से वे  नियमित सम्पर्क में रह ही सकते हैं  |

ये माध्यम प्रशासनिक और व्यवसायिक जगत में भी एक क्रान्ति का प्रतीक बन गया है | घर से काम (वर्क फ्राम होम ) नामक नई कार्यप्रणाली ने तो कार्यालय के भविष्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिए | अनेक कम्पनियों ने अपने बड़े -बड़े दफ्तर बंद कर छोटा स्थान ले लिया | अपने स्टाफ को घर बैठे काम की सुविधा दे दी | इसके बदले वेतन कटौती भी कर दी गई  | कुछ दफ्तरों में एक तिहाई या आधे स्टाफ को बारी - बारी से बुलाया जाने लगा | अनेक बड़े अखबारों ने अपने ब्यूरो कार्यालय बंद करते हुए खर्चों में कटौती कर ली |

कहने का आशय ये है कि आभासी संचार माध्यमों ने हमारे समूचे व्यवहार को सिरे से उलट -  पुलट दिया | इसकी रफ्तार और प्रवाह इतना तेज था कि चाहे - अनचाहे हर क्षेत्र इससे प्रभावित हो गया | सवाल ये भी उठता है कि क्या एहसास स्थायी तौर पर वास्तविकता का विकल्प बन सकता है ? और जवाब में सुनने मिल रहा है कि  जिस तरह  फिल्म और टीवी ने हमारे जीवन को गहराई तक प्रभावित किया ठीक वैसे ही आभासी दुनिया के ये माध्यम भी 21 वीं  सदी के विश्व को अपनी गिरफ्त में लिए बिना नहीं रहेंगे |

इसी आधार पर लगता है कि राजनीति की दुनिया में भी आभासी तौर -तरीकों का पदार्पण एक बड़े बदलाव का कारण बनेगा | जनता के बीच घुसकर लोगों से निकटता अब बीते दिनों की बात बन जाए तो अचरज नहीं होगा | लोकप्रिय मंचीय वक्ताओं की जगह शायद  पेशेवर किस्म के लोग बोलते दिखेंगे | प्रशांत किशोर सदृश लोग वैसे भी पूरे चुनाव का संचालन करने ही लगे हैं|

लेकिन लाख टके का सवाल है कि भारत सरीखे देश में जहां भले ही मशीन से मतदान हो लेकिन मतदाता के पास वेबिनार से अपना मत देने की सुविधा नहीं होगी | और  ऐसे  में उसके मन में ये बात बैठ गई कि जब उन्हें हमारे पास आने की फुर्सत और जरूरत नहीं है तब हम भला क्यों उनको मत देने चलकर जाएँ , तब क्या होगा ?

किसी फ़िल्मी गीत की पंक्ति हैं : -

सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो ...
।बेशक फ़िल्में ज़िन्दगी से जुड़ी होती हैं लेकिन ज़िन्दगी पूरी तरह फ़िल्मी नहीं होती |

इसी तरह आभास को भी कहीं न कहीं साक्षात अनुभूति में बदलना पड़ेगा और Virtual को भी Real होना होगा क्योंकि  आत्मा की अमरता का एहसास भी शरीर के औचित्य को नकार नहीं सकता |

घाटी में कश्मीरी पंडितों का बसना राष्ट्रहित में जरूरी।



कश्मीर घाटी में बीते कुछ दिनों से आतंकवादियों के मारे जाने की  खबरें आने से ऐसा लग रहा था कि अलगावादियों के हौसले कमजोर हो रहे हैं । लेकिन दो दिन पहले ग्राम पंचायत के एक युवा कश्मीरी पंडित सरपंच की हत्या ने ये संकेत दे दिया है कि जहर की  खेती करने वाले अभी भी सक्रिय हैं । अजय पंडित नामक उक्त  सरपंच संभवत: उन विरले  लोगों में था जो पूरी तरह  विपरीत हालातों में भी घाटी के अंदरूनी इलाके में रहने का दुस्साहस कर सके । ये भी हो सकता है कि सुरक्षा बलों द्वारा बीते कुछ दिनों से लगातार आतंकवादियों को मारे जाने से उत्पन्न बौखलाहट में कश्मीरी पंडित सरपंच की  खुले आम हत्या की गयी हो लेकिन इस घटना ने एक बार फिर कश्मीर घाटी में रह रहे हिन्दू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है । कश्मीरी पंडितों के संगठनों ने पूरी दुनिया  में उक्त घटना पर रोष व्यक्त जताया है । लेकिन भारत के प्रगतिशील तबके ने खास तौर पर गंगा - जमुनी संस्कृति का गीत गाने वाले खामोश हैं । कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर आंसू बहाने वाली  अरुंधती रॉय भी मौन हैं । कन्हैया कुमार और उनके वैचारिक अभिभावक तो यूँ भी कश्मीर घाटी में राष्ट्रवादी ताकतों को अपना दुश्मन मानते हैं । कश्मीरी पंडित  खैर ऊँची जाति के हिन्दू हैं किन्तु वहां कई पीढ़ियों  से रह रहे अनुसुचित जाति के लोगों तक को नागरिकता और मताधिकार नहीं मिलने पर देश की सेकुलर लॉबी ने भी उनकी पीड़ा को कभी नहीं सुना । केंद्र सरकार द्वारा गत वर्ष  जम्मू कश्मीर से 35 ए और 370  हटाये जाने से इन लोगों को पहली बार वहां की नागरिकता मिल सकी । लेकिन कश्मीरी पंडितों को न उनका ख़ोया घर मिला  और न ही सुरक्षा के आश्वासन के साथ पुनर्वास । आज भी देश के अनेक स्थानों पर हजारों ऐसे काश्मीरी पंडित हैं जो बीते तीन दशक से अपने ही मुल्क में शरणार्थी बने रहने का दंश झेल रहे हैं । उनमें से कुछ ने तो अपनी मेधा और मेहनत से जि़न्दगी को संवार लिया लेकिन अभी भी हजारों हैं जो खानाबदोश बने हुए हैं । न जाने कितने तो दोबारा कश्मीर लौटने की  चाहत लिये ही चल बसे । अनेक युवा पढ़  लिखकर विदेश जा बसे लेकिन वहां भी कश्मीरी पंडितों के संगठनों  से जुड़े रहकर वे अपनी विरासत को संजोये हुए हैं । आश्चर्य की बात ये है कि भारत की जो राजनीतिक बिरादरी कश्मीर को लेकर बेहद संवेदनशील नजर आती है उसके पास  भी घाटी  से निष्कासित कर दिए गये कश्मीरी पंडितों के घावों पर लगाने के लिए मरहम की कमी है । घाटी के अलगाववादियों से मिलने  के लिए तो वे बेताब रहते हैं भले ही हुर्रियत वालों ने उन्हें दरवाजे के बाहर से ही भगा दिया किन्तु कश्मीरी पंडितों के बीच जाकर उनका दर्द जानने की सौजन्यता उनमें कभी नहीं रही । खुद को कश्मीर का सारस्वत ब्राह्मण बताकर जनेऊ धारण करने का स्वांग रचने वाले नेता भी अपने पूर्वजों की बिरादरी की बदहाली देखने कभी गये या उस बारे  में संसद या बाहर कहीं बात की हो , ये भी किसी को नहीं पता । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यही वह कश्मीरियत है जिसका गाना जिसे देखो बजाते फिरता है । ताजा घटना के संदर्भ में अब ये जरूरी हो गया है कि केंद्र सरकार कश्मीरी पंडितों के घाटी में सुरक्षित और सम्मानजनक पुनर्वास का रास्ता साफ़ करे । कश्मीर में रहने वाले बहुसंख्यक मुसलमान कितना भी कहें लेकिन भारतीय सनातन संस्कृति और संस्कारों का प्रतिनिधित्व कश्मीरी पंडित ही करते हैं और जब तक घाटी में उनकी दोबारा प्रभावशाली मौजूदगी नहीं होती तब तक वहां अलगाववाद के बीज अंकुरित होते रहेंगे । कश्मीर समस्या के समाधान में रूचि रखने वालों को ये समझना होगा कि तीस साल पहले एकाएक कश्मीरी पंडितों को घाटी से जान - माल के साथ बहू - बेटियों की इज्जत बचाकर भागने के लिए बाध्य करना न तो क्षणिक उन्माद था और न ही सांप्रदायिक तनाव का परिणाम । वह पूरी  तरह से घाटी को भारत से अलग करने का सुनियोजित षडय़ंत्र था जिसकी पटकथा पाकिस्तान में लिखी गई । समय का तकाजा है कि 35 ए और 370 हटाये जाने के बाद कश्मीरी पंडितों का घाटी में पुनर्स्थापन हो क्योंकि वे ही वहां राष्ट्रीय भावनाओं के सही प्रतिनिधि हैं । जब तक ऐसा नहीं होता तब तक घाटी में भारत की  बात करनेवालों का अभाव बना रहेगा और अलगाववादी रुक रुककर घात लगाते  रहेंगे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 June 2020

वैचारिक भ्रान्ति में फंसकर रह गए भारत के वामपंथी नेपाल और चीन का विरोध करने से बचते फिर रहे





एक जमाना था जब कोलक़ाता की दीवारों पर चेयरमैन माओ की तस्वीरों के साथ नक्सलवादी नारे सरे आम नजर आते थे | लेकिन बंगाल में मार्क्सवादी सरकार आने के बाद वहां से हटकर नक्सली हिंसा दूसरे राज्यों में फ़ैल गई | कनु सान्याल और चारू  मजूमदार का नाम तो आज के युवा वामपंथी भी भूल गए होंगे | 1962 में चीन के हमले के बाद भारत के वामपंथी आन्दोलन में फूट पड़ी  | कारण था सोवियत संघ और चीन में से किसके साम्यवादी माडल का अनुसरण किया जावे ? यद्यपि 1917 की  साम्यवादी क्रांति के बाद सोवियत संघ का सबसे  बड़ा घटक रूस दुनिया भर के साम्यवादियों का आदर्श था | लेकिन 1949 में जब माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीन में  साम्यवादी क्रान्ति  हुई तो रूस का एकाधिकार टूटा और माओ ने खुद को साम्यवाद का नया प्रतीक पुरुष बनाकर पेश कर दिया | भारत की तत्कालीन नेहरु सरकार पर साम्यवाद का वैचारिक प्रभाव था | नेहरु जी रूस के साथ ही चीन से भी प्रभावित थे | यहाँ तक कि तिब्बत पर उसके बलात कब्जे को मान्यता देने में भी  उन्होंने तनिक विलम्ब नहीं किया | हिन्दी - चीनी भाई - भाई का नारा सर्वत्र गूंजने लगा | लेकिन 1962 में चीन द्वारा किये गये हमले ने पंडित नेहरु के तमाम  सपने ध्वस्त कर दिए | चीन उस लड़ाई में भारी पड़ा और हमारे बड़े भूभाग पर काबिज होकर आज तक बैठा हुआ है |

उस हमले  को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में मतभेद उभरे | रूस समर्थक चाहते थे चीन को हमलवार कहा जावे जबकि  रूसी मॉडल को दोषपूर्ण मानने के समर्थक चीन के चेयरमैन माओ के रास्ते की हिमायत करने पर अड़ गये  | आखिरकार 1964 में सीपीआई से टूटकर चीन  समर्थक सीपीएम बनी | 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गये आपातकाल को सीपीआई ने समर्थन दिया जबकि सीपीएम विरोध में थी | ये वो ऐतिहासिक मोड़ था  जिसने सीपीआई को चमचा पार्टी आफ इण्डिया के रूप में बदनाम किया , वहीं सीपीएम वामपंथ का उग्र चेहरा बनकर उभरी  और बंगाल , त्रिपुरा , केरल आदि में लम्बे समय तक सत्ता में रही | बंगाल और त्रिपुरा  हाथ से निकलने के बाद फ़िलहाल वह केरल में  संयुक्त सरकार की मुखिया है | जनाधार में निरंतर कमी आने के बाद सीपीआई और सीपीएम अलग होते हुए भी जरूरत होने पर एक ही थाली में साथ - साथ खाने बैठते हैं | लेकिन अब उनका  दुश्मन  नम्बर एक भाजपा है और उसके लिये  वे कांग्रेस सहित किसी भी पार्टी के साथ जाने लालायित  हैं | पिछले विधानसभा चुनाव में सीपीएम बंगाल में कांग्रेस के साथ लड़ी  और केरल में विरोध में | इस वैचारिक भटकाव ने साम्यवादी आन्दोलन की पहिचान खत्म कर  दी | सोवियत संघ के टूटने पर सीपीआई तो अनाथ जैसी हो गयी | बची सीपीएम तो बंगाल हाथ से निकल जाने के बाद वह भी बेघर जैसी है | केंद्र में विपक्षी एकता की कोशिशें लगातार विफल  रहीं | कांग्रेस का निरंतर कमजोर  होता जाना भी इसका कारण है | जनता द्वारा ठुकराए जाने के कारण वामपंथी अब कुछ बुद्धिजीवियों के अलावा जेएनयू जैसे कुछ संस्थानों के दम पर सुर्खियाँ भले बटोर लेते हों जिसमें वामपंथी रुझान के पत्रकार उनके मददगार बन जाते हैं | लेकिन वे किले भी अब कमजोर पड़ने लगे हैं और उसका मुख्य कारण वामपंथियों का अपने बनाये  संसार से बाहर नहीं निकलना है |

मुख्यधारा की राजनीति या जनभावनाओं को समझ पाने में विफलता इसका बड़ा कारण है | उदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रवर्तक डा. मनमोहन सिंह की सरकार को पांच साल तक टेका लगाने के बाद  वामपंथी अपनी  वैचारिक पवित्रता गंवा बैठे | आज की स्थिति में उनके भीतर ही जबरदस्त अन्तर्विरोध है जिनका प्रमाण दर्जनों वामपंथी संगठन हैं जिनमें से अनेक माओवादी बनकर हिंसा के रास्ते पर चल रहे हैं |

रूस ने तो साम्यवाद को कब का अलविदा कह दिया और चीन पूंजीवाद के मोहपाश में माओ के दौर से निकलकर जिनपिंग के युग में आ गया | लेकिन भारत के वामपंथी अपनी कोई पहिचान या नीति निश्चित नहीं कर  पा रहे | यही  कारण है कि दुनिया के मजदूरो एक हो का नारा लगाने वाले अपने  ही देश के मजदूरों का नेतृत्व नहीं कर पा रहे | यही स्थिति विदेशी मामलों को लेकर है | मौजूदा प्रकरण को ही लें तो नेपाल और चीन के साथ चल रहे तनाव में भारत के वामपंथियों का रुख अभी तक स्पष्ट नहीं है | कांग्रेस ने तो इन दोनों मामलों में सरकार से सवाल भी पूछे तथा राष्ट्रीय  सुरक्षा के प्रति अपनी चिंता भी व्यक्त की | कांगेस के  अलावा राष्ट्रीय और वैश्विक मामलों पर केवल वामपंथी दलों से ही कुछ बोलने की अपेक्षा रहती है । किसी पश्चिमी देश ने भारत के हितों के खिलाफ यदि कुछ किया होता तब वे  आसमान सिर पर उठा चुके होते । लेकिन नेपाल और चीन में साम्यवादी सरकारें होने के बाद भी उनके भारत विरोधी रवैये के विरुद्ध कोई वामपंथी नेता मुंह नहीं खोल रहा |

यहाँ उल्लेखनीय है कि नेपाल में माओवादी संघर्ष के अनेक नेताओं ने भारत में साम्यवादी नेताओं  के संरक्षण में रहकर लड़ाई लड़ी | बाद में जब उनका शासन आया और वामपंथी नेताओं में सिर फुटौव्वल होने लगी तब सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने वहां जाकर बीच - बचाव करवाया | ये बात किसी से छिपी नहीं है कि नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने से सबसे ज्यादा परेशानी चीन को थी | उसने वहां माओवादी हिंसा को प्रश्रय देकर राजशाही खत्म करवा दी | उस संघर्ष को भारत के साम्यवादी दलों खास तौर पर सीपीएम का  खुला समर्थन था |

ऐसे में जब  नेपाल की मौजूदा वामपंथी सरकार भारत से सीधे टकराने की नीति पर चल रही है तब वामपंथी दलों की चुप्पी सवाल पैदा करती है | इसी तरह लद्दाख में चीन द्वारा युद्ध के हालात बना दिए जाने पर भी  साम्यवादी नेता कुछ बोलने से बच रहे हैं | कांग्रेस के अलावा दूसरी विपक्षी पार्टियों ने तो कम से कम सरकार पर दबाव बनाया लेकिन वामपंथी इसलिये मौन हैं क्योंकि नेपाल और चीन की सरकारें उनकी अपनी विचारधारा की समर्थक हैं |

वैसे राष्ट्रीय हितों की अनदेखी का वामपंथी रवैया नया नहीं है | और यही वजह है कि अपनी ढेर सारी रूमानियत के बावजूद भारत के साम्यवादी कुए के मेंढक जैसे बनकर रह गये हैं | मौजूदा दौर में  वामपंथी राजनीतिक तौर पर बेहद कमजोर हो चुके हैं । पुरानी पीढ़ी के तपे - तपाये नेताओं की जगह जेएनयू ब्रांड नेताओ ने ले ली । हालाँकि  पार्टी  की विचारधारा से प्रभावित हजारों बुद्धिजीवी देश भर में फैले हैं जो अवार्ड वापिसी जैसे कदमों के साथ सामने आते रहे हैं परन्तु देश हित के किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर वामपंथी जिस तरह मुंह में दही जमाकर बैठ जाते हैं उसी वजह से वे राष्ट्रीय मुख्यधारा से बाहर होते चले गये |

नेपाल और चीन के साथ चल रहे वर्तमान विवाद में यदि वे उनके भारत विरोधी रवैये की आलोचना करने का साहस दिखाएँ तो उनकी प्रासंगिकता दोबारा कायम हो सकती है , वरना तो लाल रंग का फीका पड़ना जारी रहेगा | 

क्रांति की बात करते - करते वैचारिक भ्रान्ति के रास्ते पर भारत के साम्यवादी इतने आगे बढ़ चुके है कि वे अपने अस्तित्व का औचित्य साबित करने की क्षमता भी गंवाते जा रहे हैं   |

लॉक डाउन में ढील पर विजय पर्व न मनाएं



लॉक डाउन को पूरी तरह शिथिल किये जाने के साथ ही देश भर में भीड़ नजर आने लगी | भले ही  अधिकतर  लोग मास्क का उपयोग करते दिखे हों किन्तु बाजार के अलावा चाट के ठेलों पर गोलगप्पे खाते हुए अपनी सेल्फी सोशल मीडिया पर प्रसारित करने वालों को देखकर तो ऐसा लगा मानों वे कोरोना पर  विजय पर्व मना रहे हों | 8 जून से होटल  रेस्टारेंट , शापिंग माल आदि पर लगी बंदिश भी हटा ली गईं | रेल गाडियां और हवाई सेवा तो पहले से ही प्रारम्भ हो चुकी थी | उसे और बढ़ाया जा रहा है | हालाँकि यात्री संख्या और ग्राहकों का अभाव है  | लेकिन दो महीनों से ज्यादा घरों में कैद रहने के बाद लोग खुली हवा में सांस लेने जिस अंदाज में निकले वह उनकी निडरता भले हो लेकिन उसमें जिम्मेदारी का अभाव है | जबलपुर में लस्सी की अनेक दुकानों पर जिस तरह की भीड़ गत दिवस दिखाई दी वह खतरनाक है | और इसीलिये ये प्रश्न उठ रहा है कि जब कोरोना संक्रमण मामूली स्थिति में था तब तो सरकार ने ताबड़तोड़ तरीके से लॉक डाउन कर दिया  और जब उसका संक्रमण धीरे - धीरे  अपने चरम पर पहुँच रहा है तब सभी बंदिशें हटा ली गई  | बीते 10 दिनों में कोरोना  संक्रमण जिस तेजी से उछला  उसने उसके महामारी बनने की आशंका को जहाँ बढ़ा दिया वहीं सामुदायिक संक्रमण की स्थिति तो कुछ शहरों में पहले से ही बनी हुई थी | लेकिन इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि  कोरोना का प्रकोप 5 राज्यों में सर्वाधिक है जहां कुल मरीजों के 70 फीसदी मिल चुके हैं | इसी तरह देश के 10 शहर ही ऐसे हैं जिनमें देश के 53 प्रतिशत मरीज मिले |  ऐसे में पूरे देश को आखिर कहाँ तक घरों में बिठाकर रखा जाता ? प्रवासी मजदूरों के लौटने से रोजगार देने की समस्या भी नये सिरे से उत्पन्न हुई है | ये देखते हुए कारोबार को शुरू नहीं  किये जाने से दूसरी समस्या शुरू हो सकती थी | इसीलिये जहां - जहाँ कोरोना का प्रकोप ज्यादा है वहां कड़ाई करते हुए बाकी जगहों  पर लॉक डाउन को करीब - करीब खत्म कर दिया गया | चिकित्सा विशेषज्ञ भी ये कह रहे हैं कि कोरोना का प्रभाव यद्यपि धीरे - धीरे कम होगा लेकिन उसके पूरी तरह खत्म होने की  बात सोचना बंद कर देना चाहिए और इसलिए उससे बचाव करते हुए सुरक्षित रहने की जीवन शैली  अपनानी होगी  | जहां तक बात कोरोना के संक्रमण में  वृद्धि की  है तो वैश्विक स्तर पर मिले अनुभव बताते हैं कि जब तक वह चरमोत्कर्ष तक नहीं आएगा तब तक उसमें कमी की बात सोचना भी दिवा स्वप्न है | उस दृष्टि से बीते कुछ दिनों में नए मामले तेजी से बढ़ते हुए 10 हजार प्रतिदिन तक जा पहुंचे किन्तु पिछले दो दिन में वे इससे कम रहे | आज सुबह की  जानकारी के अनुसार ठीक होकर अस्पताल से निकले मरीजों की संख्या नये संक्रमण के बराबर  आ गई , जो एक शुभ  संकेत है | यदि आने वाले कुछ दिनों तक ऐसा ही हुआ तब ये उम्मीद बन सकती है कि कोरोना की  रफ्तार धीमी हुई है | ये भी पता चला है कि जो शहर या राज्य सबसे ज्यादा पीड़ित थे वहां नये मामले आने की गति कम हुई है | लेकिन  दूसरी तरफ ये बात भी ध्यान देने वाली है कि प्रवासी श्रमिकों की वापिसी के बाद अनेक राज्यों में कोरोना के मरीज बढ़े हैं | उस दृष्टि से आगामी दो सप्ताह बेहद तनाव भरे होंगे | क्योंकि बाहर से आये श्रमिकों का क्वारंटीन तब तक समाप्त होने को आ जाएगा | यदि वे संक्रमित नहीं निकले तो फिर राहत की सांस ली जा सकेगी | लेकिन तब तक ये  भी संतोषजनक  ही है कि कोरोना का अधिकतम संक्रमण केवल 5 राज्यों  और 10 शहरों तक सीमित है | ऐसे में अब जहां - जहां भी लॉक डाउन में पूरी तरह ढील दी जा चुकी है वहां के नागरिकों को चाहिए वे कोरोना से बचने के तीन मौलिक तरीकों  मसलन मास्क , सैनिटाईजर और शारीरिक दूरी का पालन करें | यदि अगले 15 दिन कोरोना का संक्रमण लॉक डाउन वाले राज्यों में नियन्त्रण में रहा तो ये ये मानकर चला जा सकता है कि उसको नियंत्रित कर लिया गया है |  लेकिन अति आत्मविश्वास और लापरवाही दिखाई जाती रही तो फिर एक कदम आगे दो कदम पीछे वाली स्थिति बनने का खतरा भी बना रहेगा |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 June 2020

पैसा मिले न मिले पर अनमोल दुआएं मिल सकती हैंनिजी चिकित्सकों के लिए छवि सुधारने का बेहतरीन अवसर




 
बीते कुछ दिनों से कतिपय निजी अस्पतालों में कोरोना के मरीजों का इलाज करवाने वालों को जिस तरह लूटा गया उसे लेकर काफी हल्ला मचा | रियायती दरों पर सरकार से जमीनें लेकर आलीशान अस्पताल बनाने के बाद इलाज में किसी  भी प्रकार की रियायत नहीं करने और कोरोना मरीजों को भर्ती करने में  आनाकानी किये जाने पर अनेक राज्यों में सरकार और निजी अस्पताल  प्रबंधन में विवाद की स्थिति बन गई है |  दिल्ली  के सुप्रसिद्ध गंगाराम अस्पताल के विरुद्ध केजरीवाल सरकार ने पुलिस में एफ़आईआर दर्ज करवा दी तो राजधानी के चिकित्सक समुदाय में नाराजगी व्याप्त हो गई | दिल्ली सरकार का आरोप है कि निजी अस्पताल वाले कोरोना के मरीजों को भर्ती करने से इंकार कर  रहे हैं |  इसलिए अब वहां  एक सरकारी व्यक्ति बिठाया  जाएगा जो तय करेगा कि मरीज भरती किये जाने लायक है या नहीं ? गत दिवस दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने फरमान निकाल दिया कि उनकी सरकार के अधीन  अस्पतालों में केवल दिल्ली वालों का इलाज ही हो सकेगा | बाकी के लिए केंद्र सरकार द्वारा संचालित अस्पताल हैं | यद्यपि इस निर्णय पर उपराज्यपाल ने रोक लगा दी | एनसीआर ( राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र ) के अंतर्गत गाज़ियाबाद , नोएडा , गुरुग्राम आदि के निवासी आते हैं | तकनीकी दृष्टि से ये क्रमशः उप्र और हरियाणा के नागरिक कहे जाते हैं लेकिन इनका काम धंधा या नौकरी दिल्ली में है | मुख्यमंत्री बनने के पहले तक श्री केजरीवाल सहित आम आदमी पार्टी के तमाम नेता एनसीआर में ही रहा करते थे | सर्वोच्च न्यायालय तो साफ़ कह भी चुका है कि जीवन रक्षा चूँकि मौलिक अधिकार है इसलिए किसी  की चिकित्सा से इंकार  नहीं किया जा सकता |

ये विवाद  इसलिए तब उठा जब  देश भर से इस आशय की खबरें आने लगीं कि निजी अस्पताल  सर्दी - खांसी और साधारण बुखार वाले मरीज को भी कोराना संक्रमित मानकर सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं | जिन नामी - गिरामी अस्पतालों में कोरोना के मरीज  भर्ती हो रहे हैं उनमें  इलाज का खर्च किसी  सात सितारा होटल में ठहरने से भी ज्यादा है | इसके अलावा मुम्बई में एक पैथालाजी लैब द्वारा निजी अस्पतालों से सांठगाँठ कर कोरोना की झूठी रिपोर्ट तैयार करने क़ा मामला भी सामने आया | इसके पहले मुम्बई से प्रवासी मजदूरों से पैसा लेकर कोरोना मुक्त होने का प्रमाणपत्र भी खूब बिका |  

इस प्रकार ये देखने में आया कि जब मानवता पर एक अभूतपूर्व जानलेवा विपत्ति आई हो तब उसकी जीवनरक्षा की प्रतिज्ञा लेने वाले जो चिकित्सक इस दौर में भी धन बटोरने की वासना में लिप्त रहे वे कहने को तो इन्सान हैं लेकिन उनमें इंसानियत के गुण लेशमात्र भी नहीं हैं | चिकित्सक का पेशा आज भी हमारे समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा का माना जाता है | भले ही उसके साथ कितनी  भी बदनामियाँ जुड़ गयी हों लेकिन आम भारतीय इस पेशे के प्रति आदरभाव रखता है | और फिर कोरोना संकट के दौरान शासकीय अस्पतालों के चिकित्सकों , नर्सें और उनके सहयोगी स्टाफ ने जिस समर्पण भाव से इस महामारी से संक्रमित लोगों की प्राण रक्षा करने के लिए अथक परिश्रम  किया उसने एक बार फिर चिकित्सक समुदाय के प्रति धारणा में जबरदस्त सुधार किया |

अनेक चिकित्सक , नर्सें और अन्य स्टाफ  अनेक दिनों तक दिन रात अस्पताल  में ही रहे | अपने घर गये भी तो बाहर से ही परिजनों को चेहरा दिखाकर वापिस अपने दायित्व निर्वहन में जुट गए | कुछ तो संक्रमित होकर जान से हाथ तक धो बैठे। इसके  ठीक विपरीत निजी  डिस्पेंसरी खोलकर बैठे चिकित्सकों ने लॉक डाउन घोषित होते ही अपने क्लीनिक बंद कर लिए जो अभी तक पूरी तरह नहीं   खुल सके | वहीं अनेक निजी अस्पतालों ने या तो नये मरीज लेना बंद कर दिया या सर्दी - खांसी  , बुखार सुनकर बाहर से ही विदा कर  दिया | हालांकि अनेक निजी अस्पतालों ने कोरोना के इलाज हेतु अपनी सेवाएँ भी दीं  | लेकिन इसमें भी बड़े घपले - घोटाले के आरोप लगना शुरू हो गये हैं | भोपाल का चिरायु अस्पताल का मामला इसका उदाहरण है |

बीते एक सप्ताह से कोरोना का संक्रमण निरंतर बढ़ता जा रहा है और बकौल चिकित्सा विशेषज्ञ  उसका चरमोत्कर्ष जुलाई माह में आएगा | दूसरी तरफ दिल्ली और मुम्बई से मिल रही जानकारी के अनुसार अब मरीजों को भर्ती करने की  क्षमता नहीं बची है | खाली जगहों पर अस्थायी अस्पताल खड़े किये जा रहे हैं | उसमें भी परेशानी ये है कि मानसून सिर पर खड़ा हुआ है | अस्थायी अस्पताल बनाने में गुणवत्ता से लेशमात्र भी समझौता किया गया तब किसी अनहोनी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता |

और ऐसी स्थिति में  घूम फिरकर नजर निजी क्षेत्र के उन अस्पतालों की तरफ ही जाती है जो अभी तक कोरोना के इलाज से दूर रहे |  सरकारी अस्पताल में कोरोना मरीजों का इलाज निःशुल्क होता है | जिन निजी चिकित्सालयों के साथ अनुबंध हुआ उन्हें तदनुसार भुगतान किया जाता है | लेकिन महानगरों के साथ अन्य बड़े शहरों में जो नामी अस्पताल हैं उनका इलाज महंगा होने से शायद सरकार ने उनसे बात नहीं की होगी | आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न जो लोग महंगे  अस्पतालों में कोरोना के इलाज हेतु दाखिल हुए उनका खर्च सुनकर साधारण व्यक्ति को तो पसीना आ जायेगा | ऐसे में चाहे सरकार से मिली रियायती जमीन पर बना हो या निजी भूमि खरीदकर , लेकिन इन अस्पतालों का उपयोग यदि साधारण हैसियत वाले कोरोना मरीज के इलाज के लिए नहीं किया जा सके तो फिर इनके  होने न होने का अर्थ ही क्या है ?

सरकार अपने अधिकारों का उपयोग करे अथवा न्यायालय को फरमान जारी करना पड़े , उसके पहले चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े लोगों को स्वयं होकर अपनी सेवाएँ और संसाधन इस महामारी से लड़ने के लिए प्रदान करना चाहिए | ये समय पैसा कमाने अथवा नफ़ा - नुकसान देखने का न होकर मानवता की  रक्षा  के लिए अपना हरसंभव योगदान देने का है  | निजी क्षेत्र के जो भी अस्पताल कोरोना का इलाज करने में सक्षम हों उन्हें सरकार के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ा होना चाहिए | यदि उनके सहयोग से एक व्यक्ति को भी मरने से बचाया जा सके तो वह सहयोग अमूल्य होगा |

ये कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि निजी क्षेत्र के अस्पताल और चिकित्सक जनता की  निगाहों में पहले जैसे सम्मानित नहीं रहे | निश्चित रूप से आज भी कुछ ऐसे चिकित्सक हैं जिनके सेवाभाव और पेशे  की पवित्रता को बनाये रखने की प्रतिबद्धता के कारण जनता उन्हें सिर आँखों पर बिठाती है । लेकिन चिकित्सा व्यवसाय रूपी तालाब को गन्दा करने में एक नहीं  सैकड़ों मछलियों का योगदान है | सामान्यतः निजी अस्पतालों के प्रति  आम जन की अवधारणा इतनी नकारात्मक है कि उसको ज्यों का त्यों  उद्धृत नहीं किया जा सकता |

बावजूद इस सबके ये अवसर है चिकित्सक समुदाय के लिए  कर्तव्य पथ पर ईमानदारी से आगे बढ़ते हुए पीड़ित मानवता की निःस्वार्थ सेवा करने का | हो सकता है इसके बदले उन्हें आर्थिक दृष्टि से अपेक्षित लाभ न हो किन्तु लोगों की जो  दुआएं मिलेंगी  वे अनमोल होंगी  |

और इन दुआओं का क्या महत्व है ये चिकित्सकों   से ज्यादा और कौन जानता होगा जो किसी मर्ज के लाइलाज होने पर खुद होकर उसके लिए दुआ करने की सलाह देते हैं |

विद्यार्थियों की शिक्षा और सुरक्षा दोनों जरुरी



केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ने गत दिवस स्पष्ट कर  दिया कि विद्यालय और महाविद्यालय 15 अगस्त के बाद ही खोले जायंगे | यद्यपि उनके बयान  से ये स्पष्ट नहीं हुआ कि ये निर्णय केवल केंद्र के संदर्भ में है या फिर राज्य भी इसका पालन करने बाध्य होंगे | क्योंकि अनेक राज्यों में जुलाई से शैक्षणिक सत्र शुरू करने जैसी खबरें आने  से अभिभावकों में घबराहट फ़ैल रही थी | विशेष रूप से जिनके बच्चे प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में पढ़ते हैं , वे माँ - बाप काफी  चिंतित थे | सोशल मीडिया पर तो बाकायदा इस बारे में आभियान भी  चल पड़ा | जैसी कि सम्भावना व्यक्त की जा रही है उसके अनुसार तो कोरोना का असर आगामी कुछ महीनों तक रहने वाला है | ऐसे में जब तक ये सुनिश्चित नहीं हो जाता कि संक्रमण का प्रसार रुक गया है तब तक छोटे बच्चों को घर से बाहर भेजना खतरे से खाली नहीं होगा | सवाल ये है कि उनकी पढ़ाई का क्या होगा तो इसका सीधा जवाब है कि देश के भविष्य को सही  - सलामत रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता है | जहाँ तक बात पाठ्यक्रम के पूरी होने की है तो उसको इस तरह नए सिरे से निर्धारित किया जाए जिससे कुछ हिस्सा अगले वर्ष में जोड़ा जा सके | क्योंकि अगस्त में भी यदि सत्र  शुरू नहीं  हो सका तब पाठ्यक्रम पूरा करना  संभव नहीं  होगा | जहाँ तक बात शून्य वर्ष मानकर प्राथमिक  और माध्यमिक स्तर तक के विद्यार्थियों को बिना परीक्षा अगली कक्षा में पदोन्नत कर देने की है तो आपातकालीन व्यवस्था के कारण वैसा करना जरूरी है किन्तु  इस स्तर पर बच्चों की  बुनियाद कमजोर न हो इसका ध्यान भी  रखना होगा | वैसे तो  ऑन लाइन पढ़ाई करवाई जा रही है लेकिन साधन सम्पन्न  विद्यालय ही वैसा  कर रहे हैं और फिर बच्चों के पास भी तो मोबाईल और लैप टॉप की व्यवस्था होनी जरूरी है | लेकिन सबसे बड़ी बात है बच्चे का विद्यालय जाना , क्योंकि शैक्षणिक के साथ ही शारीरिक और मानसिक विकास के लिए वैसा करना निहायत जरूरी है |  दरअसल यही वह बिंदु है जिस पर शिक्षा जगत से जुड़े लोग गम्भीरता से विचार कर रहे हैं | विगत दिवस दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसौदिया द्वारा श्री  पोखरियाल को खुला पत्र लिखकर बच्चों के सर्वतोमुखी विकास में शाला की महत्ता का जो वर्णन किया गया वह अत्यंत व्यवहारिक है | जब शिक्षा आज की तरह औपचारिक स्वरूप में नहीं थी  तब भी विद्या प्राप्ति हेतु गुरुकुल जाना होता था | गुरु के आश्रम में रहकर विद्यार्थी  शास्त्र के साथ ही शस्त्र अर्थात व्यवहारिक ज्ञान भी हासिल करते थे | सबसे बड़ी बात आर्थिक , सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेद नहीं  होता था वरना श्रीकृष्ण और सुदामा सहपाठी नहीं होते | आज के दौर में जब शिक्षा का व्यवसायीकरण हो चुका  है तब प्राथमिक स्तर से ही वर्गभेद होने लगा  और इस वजह से समाज का निचला तबका अपेक्षित विकास से वंचित रह जाता है | अंग्रेजी माध्यम भी इसमें सहायक हुआ है | कोरोना  के कारण शैक्षणिक संस्थान बंद होने से निम्न आय वर्ग के परिवारों के बच्चे ही सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं | लेकिन महामारी के भय से विद्यालय  खोलना संभव भी नहीं रहा | ऐसे में इस तबके के छात्रों को लेकर जरुर चिंता रहेगी क्योंकि ऐसे परिवारों में बच्चों के विकास पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता | कुल मिलाकर कोरोना काल में चूंकि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया है इसलिए शिक्षा व्यवस्था  भी अछूती नहीं रह सकती | लेकिन विद्यार्थियों की जीवन रक्षा सबसे ज्यादा जरूरी है और उसके लिए पूरा  शैक्षणिक सत्र भी यदि रद्द करना पड़े तो संकोच नहीं करना चाहिए | हाँ , एक बात जरुर है कि निजी शिक्षा संस्थान अभिभावकों पर दबाव बनाकर जो शुल्क वसूल कर रहे हैं उस बारे में जरुर कोई समाधान निकालना होगा  | ये बात सही है कि संस्थान के प्रबन्धन को भी वेतन सहित अन्य खर्चे वहन करना पड़  रहे हैं किन्तु विद्यालय या महाविद्यालय में शिक्षण कार्य नही होने से काफी खर्च घटे भी होंगे | सरकार को समन्वय स्थापित करते हुए दोनों पक्षों के आर्थिक हित सुरक्षित रखने संबंधी प्रबंध करना चाहिए | निश्चित रूप से हालात अनिश्चित होने  के साथ ही चिंताजनक भी हैं | नामी गिरामी पब्लिक स्कूलों में तो प्राथमिक कक्षा के बच्चे तक बाहर से आकर छात्रावास में रहते हैं | ऐसे में उन विद्यालयों को खोलना खतरे से खाली नहीं है | अर्थव्यवस्था के साथ ही देश के शैक्षणिक कैलेंडर का भी बड़ा महत्व है क्योंकि भविष्य का पूरा नियोजन शिक्षा संस्थानों से निकले युवाओं पर ही  निर्भर है | ऐसे में अनिश्चितकाल तक शिक्षा व्यवस्था को ठप्प रखना जहाँ समस्या पैदा करने वाला होगा वहीं छोटे बच्चों की  सुरक्षा को भी नजरंदाज करना उचित नहीं होगा | केन्द्रीय मानव  संसाधन मंत्री श्री पोखरियाल  ने 15 अगस्त के बाद की तारीख  बताकर अनिश्चितता तो फिलहाल दूर कर दी लेकिन सत्र जब भी शुरू हो तब आगे की  व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके इस बात पर भी  अभी से ध्यान दिए जाने की जरूरत है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 7 June 2020

केवल भूमिपुत्र ही नहीं भारत माँ का हर पुत्र मूल्यवान राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र जैसी सोच विघटनकारी





कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित महाराष्ट्र और उसमें भी सर्वाधिक संक्रमित मुम्बई में हैं | सर्वाधिक मौतें भी वहीं हुई है | यद्यपि अधिकृत आंकड़े तो नहीं  हैं लेकिन दूसरे राज्यों से आकर काम करने वाले कुशल और अकुशल श्रमिकों का पलायन भी सर्वाधिक  मुम्बई से ही हुआ | वे अपने गाँवों तक कैसे पहुंचे उसकी दर्द भरी दास्तान सभी ने देखी | उनको पलायन के लिए किसने और क्यों मजबूर किया ये भी धीरे - धीरे लोगों को समझ में आ गया | देश के सबसे धनवान लोग  जिस महानगर में रहते हों वह उन मजदूरों की भूख न मिटा सका इसके लिए किसी सबूत की जरूरत भी  नहीं रही | वे अपने गन्तव्य तक किसी तरह पहुंच गये ये संतोष का विषय है | लेकिन जब धनकुबेरों की सम्वेदनाएँ समंदर की गहराइयों में डूब चुकी थें तब सोनू सूद नामक एक अभिनेता ने पीड़ित मानवता की सेवा के लिए अपने आपको पेश किया और हजारों प्रवासियों को मुम्बई से सुरक्षित और सुविधा के साथ उनके गन्तव्य तक पहुँचाने के लिए वाहनों की व्यवस्था की | बाकायदा उन्होंने अपना सम्पर्क सूत्र प्रचारित किया और जिसने भी मदद की गुहार लगाई उसको सोनू ने हरसंभव सहायता पहुंचाई | अपने निजी संसाधनों से ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसकी  पूरे देश में प्रशंसा हुई | मुम्बई में अन्य किसी ने जरुरतमंदों की कोई मदद  नहीं की ये कहना पूरी तरह से सही नहीं होगा लेकिन प्रवासियों की  पीड़ा को दूर करने के लिए जो कदम सोनू सूद ने उठाया और खुद कड़ी धूप में  खड़े होकर एक - एक बस को रवाना करवाया वह मानव सेवा का आदर्श रूप था | सोशल मीडिया सहित अन्य संचार माध्यमों में इस अभिनेता के सेवा भाव और समर्पण  को जी भर के सराहा गया | 

वैसे प्रवासी मजदूरों का प्रस्थान तकरीबन पूरा हो चुका है | उलटे अब तो उनके वापिस आने की अटकलें लगने लगी हैं | कुछ बड़े कारोबारी तो अपने खर्चे से विशेष ट्रेन की व्यवस्था करने के लिय भी राजी बताये जा रहे हैं | हालांकि वे लौटेंगे या नहीं ये कोई  नहीं बता पा रहा | और लौटे भी तो कब लौटेंगे ये भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है |

लेकिन  शिवसेना के बड़बोले नेता संजय राउत ने पार्टी के मुखपत्र सामना में एक लेख लिखकर  सोनू सूद की आलोचना करते हुए कहा कि रातों - रात एक नये महात्मा का  अवतार हो गया , जो ये साबित करना चाहता है कि प्रवासी मजदूरों के कल्याण  के लिए सरकार द्वारा कुछ भी नहीं किया गया | वे यहीं तक नहीं रुके , आगे उन्होंने सोनू को भाजपा का प्यादा बताते हुए लिखा कि कुछ दिनों बाद वे प्रधानमन्त्री से मिलेंगे और फिर बिहार चुनाव में उनकी पार्टी का प्रचार करेंगे | 

लेकिन दूसरी तरफ महाराष्ट्र सरकार के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने सोनू के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस अभिनेता ने प्रवासी श्रमिकों की सहायता कर अच्छा काम किया और जो भी ऐसा काम करे उसकी प्रशंसा होनी चाहिए |

कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने भी उक्त लेख पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी  पार्टी प्रवासियों की सहायता करने में विफल रही है | जब शिवसेना नेता को लगा कि  सहयोगी ही उनकी  मुखालफत  करने लगे तब उन्होंने सोनू को एक अच्छा अभिनेता बताते हुए तंज कसा कि जिस तरह फिल्मों में डायरेक्टर होते हैं वैसे ही इसके पीछे भी कोई राजनीतिक डायरेक्टर है |

संजय राउत का बड़बोलापन नई बात तो है नहीं लेकिन पार्टी के मुख़पत्र में उनका लेख केवल अकेले उनके दिमाग की उपज नहीं है | महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिवसेना के सर्वोच्च नेता उद्धव ठाकरे ने भी प्रवासी  श्रमिकों के चले जाने से खाली हुए स्थान को भूमिपुत्रों अर्थात स्थानीय लोगों से भरे जाने का आह्वान करते हुए उन्हें प्रशिक्षित किये जाने की मुहिम भी छेड़ दी | वैसे इसमें चौंकाने वाला कुछ भी नहीं है क्योंकि ये तो स्व. बाल ठाकरे के जमाने से ही चली आ रही मांग है | केंद्र सरकार की कुछ भर्ती परीक्षाओं में शामिल होने आये दूसरे राज्यों के युवकों को शिवसैनिकों द्वारा पीट - पीटकर भगाने जैसी अनेक घटनाएँ अतीत में होती रही हैं |

ऐसे में श्री राउत द्वारा सोनू सूद की आलोचना और श्री ठाकरे द्वारा भूमिपुत्रों को काम देने  के निर्देश के साथ महाराष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने जैसा बयान  दिया जाना ये साबित करने के लिए काफी है कि प्रवासी पलायन के पीछे एक सुनियोजित योजना थी और राजनीतिक निर्देशक होने जैसा जो तंज उन्होंने अभिनेता के सेवा कार्य की लिए कसा गया , दरअसल वह शिवसेना पर ज्यादा सटीक बैठ रहा है , जिसने प्रवासियों के  महाराष्ट्र छोड़ने की राजनीतिक पटकथा लिखकर अपनी  चिर प्रतीक्षित मंशा पूरी कर ली | 

कांग्रेस `चूँकि राष्ट्रीय पार्टी है इसलिए उसे श्री राउत के लेख का विरोध करना पड़ा किन्तु मुख्यमंत्री श्री ठाकरे द्वारा भूमिपुत्र जैसे विशेषण के उपयोग पर वह भी शांत रही | गृहमंत्री श्री देशमुख यूँ तो जिस राकांपा के है   उसमें पहला शब्द राष्ट्रवादी है लेकिन उसका प्रभाव क्षेत्र महाराष्ट्र में ही है | ऐसे में इस पार्टी के कोटे से गृहमंत्री बने श्री देशमुख ने भले श्री राउत की टिप्पणी को गलत बता दिया लेकिन पार्टी के दिग्गज नेता शरद पवार , अजीत पवार और सुप्रिया सुले ने प्रवासी श्रामिकों के पलायन पर  शायद ही कभी  कुछ कहा हो | 

इस तरह शिवसेना की कुटिल नीति तो सामने आ गई | लेकिन उसे अकेले कठघरे में खड़ा करते हुए बाकी सबको बरी कर दिया जाना भी न्यायोचित  नहीं होगा | संजय निरुपम और कांग्रेस ने प्रवासियों के  दुख दर्द बाँटने के लिए क्या किया इसका भी खुलासा होना चाहिए | शरद पवार तो केंद्र में कृषि और रक्षा मंत्री रहे हैं | वे चाहते तो बेरोजगारी और भूख से हलाकान लोगों के मददगार बन जाते | और तो और भाजपा ने जो राज्य सरकार को कसूरवार मान रही है , प्रवासी मजदूरों की किस प्रकार  सहायता की ये भी  स्पष्ट नहीं  है | जबकि अधिकतर उत्तर भारतीय प्रवासी  उसके कट्टर समर्थक रहे |

इस प्रकार एक अभिनेता द्वारा किये गये काम में सहयोग तो दूर उसे लेकर राजनीति का गंदा खेल चल पड़ा | हालांकि राजनीतिक बिरादरी से  किसी  अच्छे कार्य की उम्मीद तो वैसे भी नहीं की जाती लेकिन शकुनी मानसिकता वाले संजय राउत सरीखे नेता भले ही सोनू के योगदान की  प्रशंसा न करते लेकिन उसे महात्मा का अवतार बताकर भाजपा का प्यादा बताना भी कहाँ  जरूरी था ? और यदि उन्हें उसकी तारीफ इसलिए हजम नहीं हुई क्योंकि उसके सेवा कार्य के कारण उद्धव सरकार की किरकिरी हुई तो वे भूल गये कि लोगों ने समूची  राजनीतिक बिरादरी को कठघरे में खड़ा किया | यहाँ तक कि केंद्र सरकार तक को नहीं बख्शा | और भी अनेक लोग हैं जिन्हें सोनू की प्रशंसा से ईर्ष्या हुई |

कोरोना एक राष्ट्रीय संकट है जिसने अमीर - गरीब , भाषा , प्रांत , जाति , विचारधारा रूपी दीवारों को ध्वस्त कर दिया | ये ऐसी लड़ाई है जो समन्वय और सहयोग से ही लड़ी जा सकती है | इसमें किसी राज्य के भूमिपुत्र की नहीं अपितु  भारत माँ के सभी  पुत्रों की कुशलक्षेम महत्वपूर्ण है | दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दिल्ली वालों का ही इलाज होगा जैसे बयान देने वाले अरविन्द केजरीवाल राष्ट्रीय  राजधानी के मुख्यमंत्री होने के बाद भी मोहल्ला मानसिकता दिखा रहे हैं |

ये स्थिति दुखद है | राजनीति अपनी जगह है । और महामारी पर विजय पाने के बाद जी भरकर उसके दांवपेंच चले जाएं तो किसी को आपत्ति नहीं होगी | लेकिन जानलेवा विपदा के समय इस तरह का  संकुचित दृष्टिकोण देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं है | नेताओं को भले ही राजनीति किये बिना नींद न आती हो लेकिन उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि:-

और भी गम हैं जमाने में सियासत के सिवा .....