Wednesday, 24 June 2020

भारत का अंध विरोध नेपाल को गृहयुद्ध में धकेल सकता है बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसा बनने की आशंका




 बीते कुछ समय से नेपाल के भारत विरोधी आक्रामक रवैये के कारण मोदी सरकार की  विदेश नीति पर सवाल उठ रहे हैं  | राजनीति  को कुछ देर के लिए अलग रखकर देखें तो भी आम हिन्दुस्तानी को आश्चर्यमिश्रित चिंता सताने लगी | गलवान घाटी  में उत्पन्न तनाव के दौरान  जब भारत और चीन के बीच युद्ध की  संभावनाएं चरम पर थीं तब चीन के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने ये चेतावनी दी  कि भारत को एक साथ तीन मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा | उसका  आशय ये था चीन  के साथ - साथ  पाकिस्तान और नेपाल भी भारत के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई कर देंगे | नेपाल सरकार की और से भी कुछ ऐसे बयान आये जो चौंकाने वाले थे  क्योंकि उसमें इतनी ताकत नहीं है कि वह भारत से दो - दो हाथ करने की सोच भी सके | इसीलिये जब भारत के थलसेनाध्यक्ष ने ये कहा कि नेपाल की ऐंठ के पीछे  किसी और  का हाथ है तो नेपाल सरकार ने फौरन सफाई देते हुए डींग हांकी कि वह अपने बलबूते भारत से उन सीमावर्ती इलाकों को वापिस ले ले लेगा  जो उसके अनुसार भारत के कब्जे में हैं | हाल  ही में उसने अपना नक्शा संशोधित करते हुए  संसद से  पारित भी करवा लिया | उसके बाद उसकी संसद ने नागरिकता कानून में बदलाव करते हुए नेपाली पुरुष द्वारा विदेशी महिला से विवाह करने पर पत्नी को सात  साल तक नागरिकता और राजनीतिक अधिकार नहीं देने का प्रावधान कर दिया | वैसे इसमें अटपटा कुछ भी नहीं था | लेकिन नया नक्शा पारित करने के तत्काल बाद विदेशी पत्नी की नागरिकता की  अवधि का निर्धारण भारत विरोधी रणनीति का ही हिस्सा है | 

दरअसल नेपाल और भारत की सीमा पर स्थित तराई का हिस्सा मैदानी है | इसे कभी मध्यदेश कहा जाता था जो धीरे - धीरे बोलचाल की भाषा में मधेश कहलाने लगा | यहाँ रहने वाले  मूलतः बिहार और उप्र से सैकड़ों वर्ष पूर्व इस इलाके में जा बसे लोगों के वंशज हैं | आज की स्थिति में ये कानूनी तौर पर तो नेपाल के नागरिक हैं लेकिन चेहरे - मोहरे से लेकर इनका बाकी सब भारतीय है | दोनों देशों के बीच  रोटी और बेटी के जिन संबंधों की  दुहाई दी जाती है उसका असल आधार यही मधेशी है जो सामाजिक और पारिवारिक तौर पर बिहार और पूर्वी उप्र से निकटता से जुड़े हुए  है | चूंकि दोनों देशों के नागरिकों के लिए आवाजाही पूरी तरह से स्वतंत्र रही है इसलिए मधेश कहलाने वाले इन लोगों  को भारत में संबंध रखने और उनका निर्वहन करने में कोई परेशानी नहीं हुई | परन्तु नेपाल में इन्हें पहाड़ी क्षेत्रों की तुलना में उपेक्षा का शिकार होना पड़ता रहा है | सरकारी नौकरियों से लेकर तो नेपाल की संसद में आबादी के अनुपात में इनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है |  विकास सम्बन्धी असमानता के अलावा मधेशी लोगों को पीड़ा है कि उनको नेपाल के मूल निवासियों की तुलना में दोयम दर्जे का माना जाता है |

इन सब समस्याओं को लेकर 2015 - 16  में मधेशी आन्दोलन काफी उग्र हो चला | पुलिस द्वारा कुछ आन्दोलनकारियों की हत्या  के बाद जब भारत ने नेपाल सरकार से उनकी मांगों पर विचार करने कहा तो उसने इसे उसके आन्तरिक  मामलों में हस्तक्षेप मानकर ऐतराज जताया | नेपाल की 275 सदस्यों वाली संसद में कुल 33 मदेशी सदस्य हैं | तराई के कुल 22 जिलों में रहने वाले 1 करोड़ मधेशियों में से 56 लाख की नागरिकता अटकाकर रखी हुई है | मधेशियों के साथ सबसे बड़ा भेदभाव ये है कि पहाड़ों पर हर संसदीय सीट पर जहां 10 हजार से कम की आबादी है वहीं  मधेशी बहुल तराई के जिलों में एक निर्वाचन क्षेत्र में 70 हजार से 1 लाख तक जनसंख्या रहती है | मधेशियों को कहना है ऐसा होने से संसद में उनकी आवाज दबाने में पहाड़ के लोगों को सहूलियत होती है | जब पिछली बार आन्दोलन उग्र हुआ और मधेशियों  ने नेपाल से सटी सीमा पर नाकेबंदी कर दी जिससे नेपाल को जरूरी चीजों की आपूर्ति रुक गई | तब वहां की वामपंथी सरकार को मदद करने चीन आगे आया लेकिन उसकी सहायता से नेपाल का काम नहीं चला और अंततः नेपाल ने भारत से अनुनय विनय कर सीमा खुलवाई | सीमा तो खुल गई लेकिन रिश्तों में खटास नहीं मिटी | हालांकि नेपाल पर आये किसी भी संकट में भारत ने बड़े भाई की तरह उसकी मदद की किन्तु वामपंथी प्रभाव वाली सरकार ने चीन की तरफ झुकाव बढ़ाया और आखिर बात यहाँ तक आ गई कि नेपाल भारत से दो - दो हाथ करने  की हिम्मत दिखाने लगा | 

हालांकि संशोधित नक्शे के अलावा नए नागरिकता कानून को लेकर नेपाल में न सिर्फ मधेशियों वाले तराई अपितु पहाड़ी हिस्सों में भी सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए हैं | नेपाल में वामपंथ के बढ़ते शिकंजे के बाद से समाज का एक तबका तो चीन के प्रभाव में आकर भारत विरोधी रंग में रंग गया है लेकिन अभी भी एक वर्ग ऐसा है जो ये मानकर चल रहा है कि चीन के हाथों खेलना देश की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकता है और भारत के साथ पुश्तैनी ताल्लुकातों को दुश्मनी में  बदलना नेपाल को अराजकता की खाई में धकेल सकता है | लेकिन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पूरी तरह चीन के दबाव और प्रभाव में हैं | रोचक बात ये है कि नेपाल में राजतन्त्र के विरुद्ध हुए लम्बे माओवादी आन्दोलन के प्रमुख चेहरे रहे पुष्पदहल कमल प्रचंड जो पहले माओवादी सरकार के प्रधानमंत्री भी बने, मौजूदा प्रधानमन्त्री ओली से नाराज रहे हैं | लेकिन चीन उन्हें सरकार गिराने से रोक लेता है | हाल के महीनों में ओली  सरकार खतरे में आ गई थी लेकिन भारत विरोध ने उन्हें अभयदान दे दिया | यद्यपि प्रचंड भी चीन  के पिट्ठू हैं लेकिन वे ओली द्वारा उठाये गये हालिया कदमों से असहमत बताये जाते हैं |

इस बीच नेपाल के वरिष्ठ पत्रकारों और समाचार पत्रों ने भी ओली  सरकार द्वारा उत्पन्न नक्शा  विवाद और मधेशियों की भारतीय नवविवाहिता भारतीय पत्नी को सात साल तक नागरिकता नहीं देने जैसे निर्णयों को घातक बताते हुए चेताया है कि भारत के साथ  सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्तों को खराब कर लेना नेपाल के भविष्य के लिए अच्छा नहीं होगा | चीन द्वारा नेपाल में जिस तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की जा रही है तथा वह  विकास परियोजनाओं के नाम पर देश भर में फ़ैल गया है उसे लेकर नेपाल के एक बड़े वर्ग में बेचैनी है | चीन विरोधी प्रदर्शन भी होने लगे हैं |

ताजा रिपोर्ट के अनुसार चीन ने नेपाल के कुछ गाँवों पर अपना दावा ठोंककर विस्तारवादी नीति का अग्रिम परिचय दे दिया है | आर्थिक सहायता के एवज में वह नेपाल के शासन - प्रशासन में हस्तक्षेप भी करने लगा है | इससे वहां का भारत विरोधी वर्ग भी सनाके में है | उसे लग रहा है कि भारत ने कभी भी नेपाल में इस तरह की दखलंदाजी नहीं की |

ये सब देखते हुए ये आशंका बढ़ रही है कि नेपाल गृहयुद्ध की आग में न जलने लगे | मधेशियों को लगने लगा है कि माओवादी सत्ता आने के  बाद बना नया संविधान उनके अधिकारों का हनन है और माओवादी सरकार चीन की शह पाकर उनका दमन करने पर आमादा है | ऐसी स्थितियों में बड़ी बात नहीं अगर एक बार फिर 2015 जैसी स्थितियां  बन जाएँ और नाकेबंदी की नौबत आ जाए | लेकिन अब यदि वैसा हुआ तब भारत को भी नेपाल में हस्तक्षेप करने मजबूर होना पड़ेगा क्योंकि चीन की कूटरचना मधेशियों को परेशान करते हुए उन्हें भारत जाने के लिए मजबूर करने की होगी | और तब शरणार्थी समस्या से बचने के लिए भारत को बांग्लादेश जैसी कार्रवाई करनी पड़ सकती है |

घटना चक्र जिस तरह घूम रहा है उससे लगता है नेपाल ने चीन की चाल में फंसकर भारत रूपी शेर की पूंछ पर पैर रख दिया है | यदि उसके भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष और मधेशियों के बीच पनप रहा असंतोष और बढ़ा तब नेपाल में पाकिस्तान जैसी स्थिति भी बन सकती है | जो बलूचिस्तान के साथ ही गिलगित और बालतिस्तान में हो रहे जनांदोलनों को जितना दबाता है वे उतने ही उग्र हो रहे हैं | चीन नेपाल को दूसरा तिब्बत बनाने के मास्टर प्लान पर आगे बढ़ रहा है जिससे वह भारत के प्रवेश द्वार पर आकर बैठ सके | लेकिन उसके पहले नेपाल या तो बांगलादेश जैसे हश्र की ओर बढ़ेगा या फिर अफगानिस्तान की तरह लम्बे गृहयुद्ध की आग में झुलसने मजबूर होगा | भारत के लिए नेपाल की अस्थिरता चिंताजनक होगी लेकिन ये भी सही है कि मधेशियों के रूप में उसके पास एक ढाल भी है | उल्लेखनीय है तराई  का ये इलाका ब्रिटिश हुकूमत के पास ही था लेकिन 1857 के भारतीय सैन्य विद्रोह के दमन  में गोरखाओं से मिली मदद से खुश होकर अंग्रेजों ने वह  इलाका नेपाल को दे दिया गया |

हो  सकता है समय का पहिया पीछे  घूमने वाला हो |

लालू के कुनबे में बिखराव से नीतिश और मजबूत हुए




बिहार विधानसभा के आगामी चुनाव हेतु बिसात बिछ गई है। पांच साल पहले हुए चुनाव में नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव के पुनर्मिलन से बने महागठबंधन ने 2014 के लोकसभा चुनाव में आई नरेंन्द्र मोदी नामक सुनामी को पूरी तरह बेअसर कर दिया था। यद्यपि उसके पहले ही दिल्ली विधान सभा के चुनाव में अरविन्द केजरीवाल के रूप में उभरे धूमकेतु ने भी मोदी लहर को रोक दिया था किन्तु बिहार में बहार है नीतिशै कुमार है जैसे नारे ने राष्ट्रीय राजनीति में संयुक्त विपक्ष के मजबूत होने की सम्भावना को नई ताकत दे दी। लोकसभा चुनाव में सफाया करवा चुके लालू प्रसाद भले ही खुद चुनाव नहीं लड़ पाए लेकिन अपने दोनों बेटों को राजनीति में स्थापित करने में जरूर कामयाब हो गये। हालाँकि उनकी पार्टी राजद को ज्यादा सीटें मिलीं लेकिन उनने चतुराई दिखाते हुए नीतिश को गद्दी सौंपी और दोनों बेटों को ताकतवर विभाग वाला मंत्री बनवा दिया। सरकार बनी तो लालू समानांतर मुख्यमंत्री बन गये। दोनों पुत्रों ने भी जमकर लूटमार शुरू कर दी। अंतत: नीतीश ने एक झटके में उस गठबंधन की हवा निकालते हुए दोबारा भाजपा का दामन थामकर लालू परिवार से किनारा कर लिया। इसे नीतिश का अवसरवाद और धोखेबाजी भी कहा गया किन्तु वे बहुत ही दूरदर्शी राजनेता हैं। कुछ समय बाद लालू को सजा मिलने से जेल जाना पड़ा और अभी तक वे जेल में ही हैं। साथ ही उनका स्वास्थ्य भी काफी खराब है। इस कारण अस्पताल में रहते हुए उनकी सजा कट रही है और वहीं बैठे-बैठे वे सियासत की बिसात पर अपने मोहरे चला करते हैं। लेकिन ये भी सच है कि तमाम बुराइयों के बावजूद लालू बिहार की राजनीति का वह चेहरा हैं जो आम जनता से सीधा संवाद करने की कला में पारंगत है। पिछड़ी जातियों के साथ ही मुस्लिम मतदाता भी लालू में ही अपना संरक्षक देखते हैं। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि उनके दोनों बेटों खासकर तेजप्रताप यादव का बहुरूपियापन आम जनता में मजाक का कारण बनता रहा। तेजस्वी की छवि एक तेज तर्रार और मुखर नेता के तौर पर स्थापित होने लगी थी लेकिन लालू की सियासत के उत्तराधिकार को लेकर शुरू हुए पारिवारिक विवाद ने उसे धक्का पहुंचाया। 2019 के लोकसभा चुनाव ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। बिहार में कहने को तो कांग्रेस लालू के साथ चिपकी हुई है लेकिन ऐसा करने से उसकी अपनी पहिचान खत्म सी हो गयी। और इस तरह नीतिश कुमार बिहार की राजनीति में श्री मोदी की तरह विकल्पहीनता का लाभ मिलने की स्थिति में आ गए। बीच-बीच में खबर आई कि उनकी भाजपा से नहीं बन रही। मोदी सरकार की दूसरी पारी को एक साल बीत चुका लेकिन अभी तक उसमें जद (यू) का एक भी मंत्री नहीं है। नागरिकता संशोधन कानून पर भी नीतिश ने खुलकर केंद्र सरकार के विरुद्ध जाने का दुस्साहस किया किन्तु सरकार में साझीदार रहने के बावजूद भाजपा की बिहार इकाई मन मसोसकर रह गयी। यद्यपि गिरिराज सिंह जैसे मुंहफट नेता ने अनेक अवसरों पर उनके विरुद्ध बयान दिये लेकिन भाजपा ने ही उन्हें ज्यादा महत्व नहीं दिया। इसी वजह से नीतिश बिहार और भाजपा दोनों के लिए अपरिहार्य बनते गए। उनकी वर्तमान सरकार का कार्यकाल भले ही उतना अच्छा नहीं रहा लेकिन लालू के जेल में रहने और कांग्रेस के अप्रासंगिक हो जाने से वे चुनौतीविहीन नजर आ रहे हैं। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री और महादलित वर्ग के चेहरे कहे जाने वाले जीतन राम मांझी द्वारा महागठबंधन से किनारा करते हुए नीतिश के पाले में लौटने के संकेत दिए गये। लेकिन गत दिवस 5 विधान परिषद सदस्यों द्वारा राजद छोडऩे के साथ ही सबसे वरिष्ठ नेता पूर्व केन्द्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद द्वारा पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दिए जाने की वजह से विपक्ष की राजनीति को बड़ा धक्का लगा है। रघुवंश बाबू राजद के सबसे सम्मानित और स्वच्छ छवि वाले नेता माने जाते हैं। केन्द्रीय मंत्री के रूप में मनरेगा जैसी योजना उन्हीं के दिमाग की उपज थी। वे विधानपरिषद चुनाव में वैशाली के एक माफिया को राजद उम्मीदवार बनाये जाने से रुष्ट हैं और लालू के दोनों बेटों द्वारा पार्टी संगठन का अपहरण किये जाने से खुद को अपमानित महसूस करने लगे। हालाँकि पार्टी छोड़ने के बारे में उन्होंने स्पष्ट नहीं किया किन्तु जैसी खबर है वे भी नीतिश के साथ जाने का मन बना रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये हैं कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व काफी पहले से नीतिश को ही बतौर मुख्यमंत्री पेश करने का ऐलान कर चुका है। गत दिवस लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने भी उसका समर्थन कर दिया। इस तरह बिहार के राजनीतिक समीकरण भले ही भाजपा के पक्ष में न दिखते हों लेकिन नीतिश कुमार का दामन थामकर वह चुनावी वैतरणी आसानी से पार कर लेगी। लालू के बाहर रहते हुए भी शायद ज्यादा कुछ न हो पाता किन्तु सियासत में हलचल जरूर बनी रहती। नीतिश और भाजपा विरोधी छोटे-छोटे दल लालू में अपना रहनुमा देखते थे लेकिन तेजस्वी में वह आकर्षण नहीं है और तेजप्रताप की छवि जोकर से भी बदतर बन चुकी है। राबड़ी देवी बिना लालू के साथ खड़े हुए अधूरी लगती हैं वहीं उनकी बेटी मीसा को भाइयों ने किनारे बिठा दिया है। इस सबका स्वाभाविक लाभ बैठे-बिठाये नीतिश और उनका पल्ला पकड़कर चल रही भाजपा को होता दिखाई दे रहा है। इस समूचे खेल में चौंकाने वाली बात ये है कि कांग्रेस अब भी लालू के भरोसे बैठी हुई है। उप्र में तो उसने प्रियंका वाड्रा को स्थायी तौर पर तैनात कर रखा है लेकिन बिहार में वह चेहराविहीन है। लालू की अनुपस्थिति से उत्पन्न शून्य को भरने का प्रयास यदि वह करती तब विपक्ष की सरदार बन सकती थी लेकिन बिहार में वह पूरी तरह से परजीवी होकर रह गयी। सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि नीतिश ने  अपनी सीमा जानकर प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को गंगा में बहा दिया है। दूसरी तरफ  भाजपा ने भी समझ लिया है कि महाराष्ट्र जैसी आपाधापी करने से न खुदा ही न मिला न विसाल ए सनम वाले हालात बन जायेंगे। और वह अकेले दम पर बाजी जीतने में सक्षम नहीं होगी। लिहाजा उसने भी बिहार में फिर एक बार नीतिशै कुमार के नारे को स्वीकार कर लिया है। राजनीतिक अस्थिरता के दौर में कब क्या हो जाए कहना कठिन है किन्तु मौजदा सूरते हाल में नीतिश चुनौतीविहीन होते जा रहे हैं। यदि वे रघुवंश प्रसाद को भी अपने साथ ले आये तब लालू के कुनबे का बचा खुचा नूर भी खत्म होने में देर नहीं लगेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 23 June 2020

मध्यम वर्ग करे पुकार , हमको भी कुछ दे सरकार आखिर जो जनमत बनाता है वही बिगाड़ भी सकता है



 
भारत का विशाल  मध्यम वर्ग पूरी दुनिया के लिये कौतुहल और अध्ययन का विषय  रहा है | The Great Indian Middle Class जैसी पुस्तकें भी  लिखी गईं हैं | ये भारतीय समाज का वह  वर्ग है जो बाजार से लेकर सरकार तक को प्रभावित करता है | पिछले तीन दशक में भारत की जो बदली हुई तस्वीर नजर आती है उसका बड़ा कारण यही मध्यम वर्ग है | सड़कों पर बढ़ती जा रही कारें और  मोटर सायकिलों के अलावा मोबाईल , लैपटॉप , एलईडी , वाशिंग  मशीन , फ्रिज , एयर कंडीशनर जैसी चीजों का सबसे बड़ा खरीददार यही तबका है | फ़्लैट , डुप्लेक्स खरीदने या मकान के निर्माण  में भी सबसे आगे मध्यम वर्ग ही नजर आता है | अच्छे स्कूलों में भीड़ और उच्च शिक्षा के प्रति बढ़ता रुझान भी देश  में इसी वर्ग की देन है | घरेलू पर्यटन के अलावा विदेश यात्रा करने वालों में हो रही उल्लेखनीय वृद्धि में भी  मध्यमवर्गीय परिवारों का योगदान है जो अपने सीमित दायरे से निकलकर देश के बाहर पैर रखने की महत्वाकांक्षा से प्रेरित हो चले हैं | और यही तबका है जो भारत की बैंकिंग व्यवस्था को जबरदस्त मंदी के बावजूद भी गतिशील बनाये रखता है | उदारवाद की कोख से जन्मे उधारवाद को दिल खोलकर अपनाते हुए  अपनी छोटी - छोटी इच्छाओं और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बैंक से कर्ज  लेकर उसकी ईएमआई ( मासिक किश्त ) चुकाने में आगे रहने वाला मध्यम वर्ग भारत में बाजारवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा संरक्षक बनकर सामने आया है | ये कहने में लेश मात्र भी अतिशयोक्ति नहीं है कि आधुनिक भारत को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाने में इसी मध्यम वर्ग ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया , अपनी सोच को पहले राष्ट्रीय और फिर वैश्विक बनाकर |

पाठक सोच रहे होंगे कि मैं भारतीय समाज के किसी सर्वेक्षण की  रिपोर्ट पेश करने जा रहा हूँ | लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है | मेरा आशय मौजूदा  माहौल में इस मध्यम वर्ग के मन में उठ रही टीस को शब्द देकर राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ना मात्र है | 

कोरोना संकट आते ही जब पूरे देश में लॉक डाउन लागू हुआ तब उच्च वर्ग तो आराम से घर बैठ गया | काम -  धंधा बंद हो जाने से आर्थिक नुकसान उसे भी खूब  हुआ किन्तु ये माना जाता है कि उसके पास इतने संचित संसाधन थे कि  ज्यादा कठिनाई नहीं झेलनी पड़ी | दूसरी तरफ निम्न आय वर्ग या जिसे मजदूर और कुशल श्रमिक कहा जा सकता है , उसे लॉक डाउन के साथ ही सरकार ने पहले सस्ता और  फिर मुफ्त राशन के साथ रसोई गैस देकर उपकृत कर दिया | कुछ नगद राशि भी उसके खाते में जमा की गई | 

लेकिन मध्यम वर्ग को क्या मिला ?

और यही प्रश्न है जो समाज के उस बड़े वर्ग को उद्वेलित कर रहा है जिसके मन में ये पीड़ा अंदर तक समा चुकी है कि अपनी शक्ल - सूरत थोड़ी सी संवारने का दंड उसे भोगना पड़ रहा है | विडम्बना ये है कि न तो ये तबका अमीरों की बराबरी से बैठने की हैसियत में है और न ही गरीबों से  हिल -मिलकर रहना उसके लिए सम्भव रहा | ऐसे में न तो उसे संपन्न वर्ग वाली हैसियत मिलती है और  न ही गरीबों पर होने वाली इनायत का लाभ खाते में आता है |  इस वर्ग में केवल  सरकारी या निजी क्षेत्र के  कर्मचारी ही नहीं  वरन स्वरोजगार के माध्यम से अपना परिवार पालने वाले प्रोफेशनल और व्यापारी भी हैं |

इस वर्ग के मन में ये बात तेजी से घर करती जा रही है कि सरकार को उसकी चिंता नहीं  है | लॉक डाउन में सरकारी कर्मचारी भले घर बैठा रहा लेकिन उसे वेतन - भत्ता मिलता रहा | जबकि इसी वर्ग के बाकी लोगों को भारी नुकसान हुआ | निजी क्षेत्र में नौकरी  करने वालों पर छटनी या वेतन कटौती की मार पड़ी | दुकानदार या अन्य पेशेवरों का कारोबार भी बंद होने से उनकी आय का साधन बंद हो गया | लेकिन उसकी दुविधा ये रही कि वह किसी भी प्रकार  की सहायता से वंचित हो गया | बीते अनेक दशकों में बनाई उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा उसके पांवों में जंजीर बन गयी | न तो वह प्रवासी मजदूर के तौर पर समूचे राष्ट्र की सहानुभूति का पात्र बन सका और न ही गरीबों को मिलने वाली सहायता उस तक पहुँची |

लॉक डाउन खत्म होने के बाद निजी  नौकरी या स्वयं का व्यवसाय पुराने स्वरूप में नहीं  आ सका | और ऊपर से बिजली वाले बिल जमा करने का दबाव बना रहे हैं , निजी क्षेत्र की कम्पनी ने एक दो मैसेज भेजने के बाद घर का वाईफाई बंद कर दिया , ऑन लाइन पढ़ाने वाले विद्यालय  बच्चे की फीस के लिए परेशान कर रहे हैं | सोसायटी का शुल्क और नगर निगम के टैक्स के लिए लगातार टेलीफोन पर तकादा  किया जाने लगा है | जीएसटी की देनदारी के लिये मिली मोहलत भी पूरी होने को आई | बैंक से लिए विभिन्न  कर्जों की ईएमआई के लिए भले ही छह महीने की मोहलत मिल गई लेकिन इस अवधि का ब्याज तो सिर पर लद ही रहा है |

जो बच्चे बाहर कोचिंग करने गये थे वे लौट आये हैं | फीस तो कोचिंग सेंटर ने अग्रिम ही ले ली थी | यद्यपि पढ़ाई ऑन लाइन करवा तो रहे हैं लेकिन उसका अपेक्षित प्रभाव न दिखने से बच्चे के भविष्य की चिन्ता सताने लगी है | कोटा या पुणे में जिस कमरे को उसने किराये पर ले रखा था उसका मालिक किराया मांगने फोन कर रहा है |

लॉक डाउन खुले तीन सप्ताह होने को आये लेकिन किस्मत और ज़िन्दगी के जो दरवाजे  25 मार्च को बंद हुए वे खुलने का नाम नहीं ले रहे | बाजार खुलते ही रोजमर्रे की चीजें महंगी होने से खर्च बढ़ गया | सब्जी - फल सब रंग दिखाने लगे | जिन घरेलू नौकरों को लॉक डाउन के नाम पर एक माह का वेतन देकर नमस्ते कह दिया था वे काम पर लौटना चाहते हैं लेकिन किसी न किसी वजह से उन्हें टरकाना पड़ रहा है | और ऊपर से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में रोजाना की वृद्धि डराये हुए है |

ऐसी  और भी छोटी - बड़ी समस्याएं हैं जिनसे मध्यमवर्गीय इंसान जूझ रहा है किन्तु उसके दर्द को न कोई  समझने वाला है और न दूर करने वाला | प्रश्न ये है कि  सरकार ने क्या ये मान लिया है कि मध्यम वर्ग का अर्थ केवल शासकीय कर्मचारी हैं  जिन्हें इस दौरान किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं हुई | हालांकि ये मान लेना गलत होगा कि उच्च आय वर्ग और गरीबों को किसी भी तरह से परेशान नहीं पड़ा ।  लेकिन ये भी सही है कि सरकार का पूरा फोकस प्रत्यक्ष तौर पर तो उच्च वर्ग की शिकायतें सुनने और उन्हें दूर करने में है  क्योंकि वह ज्यादा टैक्स के साथ ही रोजगार प्रदाता भी है |  इसके साथ ही वह गरीबों के खाने , रहने , रोजगार से जुड़े राहत और पुनर्वास के कार्यों को भी सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है । लेकिन मध्यम वर्ग को इस दौरान किसी भी प्रकार की ऐसी मदद नहीं मिली जिससे उसके सिर पर आयी मुसीबतों का बोझ कुछ कम हो सके |

वैसे भी इस वर्ग के प्रति सत्ता सदैव लापरवाह रही है | बजट में कहने को तो प्रत्यक्ष करों में राहत के नाम पर खूब सौगातें दी जाती हैं लेकिन दूसरे हाथों से ब्याज सहित छीन भी ली जाती हैं | वैसे तो यह वर्ग अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में उलझा रहकर इस सबके बारे में उतना नहीं सोच पाता किन्तु लॉक डाउन के तकरीबन सवा दो महीनों में घर में बैठे - बैठे उसे अपने साथ होने वाले उपेक्षापूर्ण व्यवहार पर विचारने का जो अवसर मिला उसने एक तल्खी उसके मन - मष्तिष्क में समूची  व्यवस्था के प्रति भर दी है |

उसका ये सोचना गलत नहीं है कि सरकार किसानों के कर्जे माफ कर देती है , करोड़ों का कर्ज न लौटाने वालों को भी ढेर सारी रियायतें देती है लेकिन मध्यमवर्ग को देते समय उसका हाथ तंग हो जाता है | केंद्र में आसीन मौजूदा सत्ता के प्रति इस वर्ग का शुरू से झुकाव रहा है लेकिन इसका कोई  प्रतिफल उसे नहीं मिलना एक तरह की कृतघ्नता ही है | ऐसे में यदि वह उदासीनता ओढ़ ले तो बड़े बदलाव की आशंका से इंकार  नहीं किया जा सकता | 

आखिर जो जनमत बनाता है वह बिगाड़ भी तो सकता है |

डीजल-पेट्रोल की महंगाई सरकारी मुनाफाखोरी



कोरोना के बाद से पूरी दुनिया अस्त व्यस्त हो गयी। थल, जल, नभ तीनों में यातायात ठहर जाने से जो जहाँ था वो वहीं रुके रहने को मजबूर हो गया। व्यापार और पर्यटन पर इसका जबरदस्त प्रभाव पड़ा। पेट्रोल-डीजल की मांग और कीमत भी ऐतिहासिक रूप से घट गयी। कच्चे तेल के उत्पादक अरब एवं अन्य देश संकट में आ गये। इस स्थिति का लाभ लेकर विभिन्न देशों ने कच्चे तेल का या तो स्टॉक कर लिया या फिर वायदे के सौदे के अंतर्गत सस्ते दर पर अग्रिम बुकिंग कर ली जिससे दाम बढ़ने पर भी कम दाम पर आपूर्ति होती रहे। इस स्थिति का लाभ उपभोक्ताओं को भी मिलना था। यद्यपि लॉक डाउन की वजह से पेट्रोल-डीजल की खपत न के बराबर रह गई। लेकिन बीते 1 जून से लॉक डाउन खत्म किये जाने के बाद जनजीवन सामान्य होते ही मांग में वृद्धि होने लगी। लेकिन भारत में वैश्विक स्तर पर घटी कीमतों का लाभ उपभोक्ता को देने की बजाय दाम बढ़ाते जाने का जो सिलसिला शुरु हुआ वह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। अख़बारों में रोज सुबह कोरोना मरीजों की संख्या बढऩे के साथ ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की जानकारी सामने आ जाती है। कोरोना के साथ ही सीमा पर संकट के बादल मंडराने के कारण जनमानस इस समय चुपचाप बर्दाश्त करता जा रहा है। लम्बे लॉक डाउन के कारण सरकार का राजस्व घटने से आने वाली परेशानियाँ भी जनता समझ रही है। मौके की नजाकत को देखते हुए विपक्ष भी विरोध की औपचरिकता निभा रहा है। चूँकि अभी भी परिवहन पूरी तौर पर शुरू नहीं हो सका है इस कारण पेट्रोल-डीजल की मांग भी सामान्य स्तर से काफी कम है किन्तु कीमतों में लगातार होने वाली वृद्धि का औचित्य किसी को समझ में नहीं आ रहा। सबसे बड़ी समस्या परिवहन का व्यवसाय करने वालों के सामने है। व्यापारिक गतिविधियाँ अभी तक पूरे शबाब पर नहीं आई हैं। कारखानों में काम शुरू हुए भी महज तीन हफ्ते बीते हैं। इस कारण उत्पादन भी इतना नहीं हुआ है जिससे ट्रकों की मारामारी हो। प्रवासी मजदूरों के पलायन से उत्पादन इकाइयाँ अपनी पुरानी रंगत पर नहीं लौट पा रहीं। ऐसे में महंगा डीजल-पेट्रोल दूबरे में दो आसाढ़ वाली स्थिति उत्पन्न कर रहा है। शराब की तरह ही डीजल-पेट्रोल भी सरकारी कमाई का बड़ा स्रोत है और वह भी नगद में। एक समय था जब इनके दाम सरकार अपनी लोकप्रियता बनाये रखने को ध्यान में रखते हुए तय करती थी। लम्बे समय बाद जब उनमें वृद्धि होती तो बड़ा बवाल मचता था। विपक्ष के बड़े-बड़े नेता सायकिल और बैलगाड़ी पर बैठकर विरोध जताते थे। तब शायद कच्चे तेल के उत्पादक देश भी संगठित नहीं थे। और न ही रोजाना दाम-घटने बढ़ने का खेल चलता था। लेकिन धीरे-धीरे कच्चा तेल भी बाजारवाद के अंतर्गत आकर शेयर बाजार की तरह रोज चढने-उतरने लगा। भारत में वाजपेयी सरकार ने हर 15 दिन में उनके दामों की समीक्षा करने की व्यवस्था बनाते हुए उसे राजनीतिक शिकंजे से मुक्त कर तेल कंपनियों पर छोड़ दिया। यद्यपि चुनावी मौसम में सत्ताधारी दल अपनी सुविधानुसार डीजल-पेट्रोल के दामों में कमी या वृद्धि को नियंत्रित करने से बाज नहीं आये। मोदी सरकार के आने के बाद अब डीजल-पेट्रोल के दाम भी दैनिक अंतर्राष्ट्रीय घट-बढ़ से जोड़ दिए गये। ऐसा करने के पीछे खुद को जनता के गुस्से से बचाने का उद्देश्य था। और काफी हद तक वह पूरा भी हुआ किन्तु जब दाम लगातार गिरने लगे और उस पर मिलने वाले करों की मात्रा भी तदनुसार कम हुई तब केंद्र और राज्य सरकारों ने अपना खजाना भरते रहने के लिए एक्साइज और वाणिज्य कर को बढ़ाने का तरीका निकाल लिया। वर्तमान में जो स्थिति है उसमें पेट्रोलियम चीजें रोज महंगी करते जाने का तुक समझ में नहीं आता। मान भी लें कि वैश्विक स्तर पर मूल्य बढ़े हैं तब भी लॉक डाउन के दौरान खरीदे सस्ते कच्चे तेल का लाभ तो भारत की जनता को मिलना चाहिये। कोरोना राहत पर बेशक बहुत पैसा खर्च हो रहा है। वहीं करों की आय में ऐतिहासिक गिरावट हुई है। केंद्र और राज्य सरकारें नगदी के संकट से जूझ रही हैं। राहत और पुनर्वास पर अनाप-शनाप खर्च हो रहा है जिसे रोक पाना नामुमकिन है। अभी तक कारोबार ठीक से शुरू नहीं हो सका है इसलिए आने वाले कुछ महीने भी सरकार के लिए सूखे ही रहेंगे। ऐसे में कर्ज लेकर काम चलाना ही सरलतम विकल्प था। लेकिन बजाय कर्ज लेने के पेट्रोल-डीजल में मुनाफाखोरी करने का रास्ता चुना गया। इसके पीछे ये सोच बताई जा रही है कि कर्ज की अदायगी भी तो आखिरकार जनता पर नया कर या आधिभार थोपकर ही की जायेगी तो बेहतर है महंगा डीजल बेचकर कर्ज लेने से बचा जाए। लेकिन इसकी वजह से यात्री और माल वाहक वाहनों के भाड़े का निर्धारण करने में भारी अनिश्चितता बनी रहती है। व्यापारी एवं परिवहन कम्पनियाँ दोनों रोज-रोज बढ़ रही कीमतों से परेशान होते हैं। लॉक डाउन हटने के तीन सप्ताह बाद भी उद्योग-व्यवसाय रफ़्तार नहीं पकड़ सके हैं। ऐसे में परिवहन खर्च को लेकर व्याप्त अनिश्चितता गति अवरोधक का काम कर रही है। यदि सरकार मात्र राजस्व बटोरने के लिए डीजल-पेट्रोल महंगा करने में जुटी हुई है तब उसे जनता से तत्संबंधी अपील करना चाहिये लेकिन मौजूदा स्थिति में जिस तरह वे महंगे किये जा रहे हैं उससे तो सत्ता प्रतिष्ठान की असंवेदनशीलता के साथ ही एहसानफरोशी का भाव भी झलकता है। इससे तो अच्छा रहेगा सरकार 15 दिनों में एक बार कीमतों की समीक्षा का पुराना तरीका दोबारा लागू करे। कारोबारी अनिश्चितता के इस दौर में डीजल-पेट्रोल के दामों में वृद्धि एक तो पूरी तरह नाजायज है वहीं दूसरी तरफ  संकट के समय देश की जनता से जबरन वसूले जा रहे बढ़े हुए दामों के प्रति सरकार की तरफ  से धन्यवाद का एक शब्द भी नहीं सुनाई दिया। पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में मुनाफाखोरी से केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों का जनविरोधी चेहरा सामने आता रहा है लेकिन सवाल ये है कि जो सरकार व्यापारी को मुनाफाखोरी के लिए दंडित करती है उसे कौन दंड देगा ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 22 June 2020

माफिया पर फिल्में बनाते - बनाते खुद माफिया बन गए फिल्मी दुनिया की डर्टी पिक्चर सामने आई



हाल ही में तेजी से उभर रहे युवा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत द्वारा आत्महत्या किये जाने के बाद से मुम्बई की फ़िल्मी  बिरादरी में जिस तरह का शीतयुद्ध शुरू हुआ है उसकी वजह से अनेक अनछुए पहलू  और नामचीन चेहरे अनावृत्त हो रहे  हैं | ये काम खोजी पत्रकार करते तब तो उसे महज गॉसिप कहकर हवा में उड़ाया जा सकता था किन्तु फिल्म उद्योग के भीतर से ही ये आरोप खुलकर सामने आ रहे हैं कि वहां परिवारवाद का कब्जा है | फ़िल्मी दुनिया के कुछ स्थापित परिवार और उनसे जुड़े बड़े सितारे किसी भी नवोदित अभिनेता - अभिनेत्री को तब तक नहीं जमने देते जब तक वह उनकी शरण में न आ जाए | फिर भी यदि वह अपनी प्रतिभा के बलबूते सफलता की राह पर बढ़ने लगे तब उसे रोकने के लिए वह सब किया  जाता है जो मनोरंजन की दुनिया का माफियाकरण होने का प्रमाण है |

सत्तर के दशक में अमेरिकी इतावली मूल के लेखक मारियो पूजो द्वारा रचित गॉड फादर नामक उपन्यास  पचास  और साठ के दशक में अमेरिका में माफिया गुटों के सामाजिक जीवन पर प्रभाव पर आधारित था | इस पर इसी नाम से बनी फिल्म को विश्व सिनेमा में सर्वाधिक प्रतिष्ठित माने जाने वाले ऑस्कर अवार्ड की विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कृत होने का सौभाग्य भी मिला | फिल्म के कथानक में अपराध की दुनिया का माफिया हॉलीवुड के फिल्म जगत को किस तरह प्रभावित करता है उसका भी उल्लेख था | जिसमें नये कलाकारों को काम दिलवाने के साथ ही अवार्ड प्रक्रिया को प्रभावित करने का भी उल्लेख था |

भारत का फिल्म उद्योग भले ही हॉलीवुड जैसा भव्य और साधन सम्पन्न न हो लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में हमारे देश में बनना कम महत्वपूर्ण नहीं है | बीते कुछ दशकों में भारतीय मूल के लोगों के दुनिया भर में फ़ैल जाने के कारण विशेष रूप से हिन्दी  फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार भी मिलने लगा है | यही कारण है कि अनेक युवा फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों में अप्रवासी चरित्र रखते हैं | कुछ फिल्मों की पटकथाएँ तो पूरी तरह से विदेशों में रह रहे भारतीयों से सम्बन्धित ही रहीं |

फिल्म निर्माण में चूंकि काफी धन लगता है इसलिए बड़े - बड़े धन्ना सेठ इनमें निवेश करते रहे हैं | अक्सर ये लोग पर्दे के पीछे रहते हैं | लेकिन बीते कुछ दशकों में भारतीय फिल्म उद्योग भी महंगी फ़िल्में बनाने की तरफ अग्रसर हुआ और तब फिल्मों में पैसा लगाने वाले परम्परागत फायनेंसरों  की जगह कार्पोरेट जगत आगे आया और फिर बात धीरे - धीरे माफिया तक जा पहुंची | अक्सर ये चर्चा होती है कि भारत में बनने वाली अधिकतर फ़िल्में तो  सिनेमाघरों तक पहुँच ही नहीं पातीं तब उनमें धन लगाने वाले क्या करते हैं , ये कोई नहीं  बता सकता | लेकिन बात सिर्फ पैसा लगाने तक सीमित नहीं रहती | माफिया के इशारे पर कलाकार रखे और निकाले जाते है | फिल्म कब रिलीज होगी ये तक उनके द्वारा तय होने लगा है |

ताजा विवाद में ये बात सामने आ रही है कि मुम्बई के फिल्म जगत का  अपना एक स्वनिर्मित माफिया भी है जिसकी बागडोर चंद परिवारों के हाथ में होने से ये केवल उनके बेटे - बेटियों को ही अवसर देते हैं तथा अभिनय की दुनिया में कदम रखने  वाले प्रतिभा संपन्न युवक - युवतियों को या तो धक्के खाने  पड़ते हैं या फिर उन्हें निर्माता - निर्देशक  की अनुचित शर्तों के सामने समर्पण करना होता है | परिवार और कुछ बड़ी हस्तियाँ पहले भी  फिल्म उद्योग पर हावी थीं | कहते हैं लता मंगेशकर के कारण अनेक गायिकाएं प्रतिभाशाली होने  के बाद भी या तो अवसर से वंचित रह गईं या फिर इक्का - दुक्का सफलता के बाद गुमनामी के  अँधेरे में गुम हो गईं | कपूर खानदान तो बीती आधी सदी से भी ज्यादा से फिल्म उद्योग  पर छाया हुआ है  किन्तु जिस तरह की बातें बीते कुछ दिनों में सुनाई दीं वे चौंकाने वाली हैं |

ये कहना गलत नहीं होगा कि आज भारतीय फिल्म उद्योग से जुड़े परिवारों के बेटे व्  बेटियां कुछ ज्यादा ही फिल्मों में दिखाई दे रहे हैं | उनके पिता उन्हें बाकायदा पेशेवर अंदाज में स्थापित  करते और  अपना पैसा  लगाकर उनके लिये  फ़िल्में बनाते हैं | लेकिन इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि हर पिता ऐसा करता है | और फिर फिल्म चले न चले ये परिवार नहीं दर्शक तय करते हैं | लेकिन इसके कारण किसी  ऐसे कलाकार का भविष्य  चौपट करना गलत है जो बिना किसी समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि के आया हो | संघर्ष क्षमता और प्रतिभा के बल पर हासिल  सफलता उसके लिए तब दुश्मन बन जाती है जब  वह फिल्मी दुनिया के चौधरी बने बैठे सरगनाओं का दरबारी नहीं बनता | नवोदित अभिनेत्रियों के साथ होने वाला घृणित  व्यवहार अक्सर सामने आता रहा है | हाल के वर्षों में टीवी सीरियलों में भी नये  अभिनेता - अभिनेत्रियों को अवसर मिलने लगा है किन्तु एक - दो सीरियल के बाद काम न मिलने की  वजह से अनेक कलाकार अवसादग्रस्त होते हुए आत्महत्या की राह पर बढ़ गए | अभिनेत्रियों के शोषण की घटनाएँ  भी सामने आया करती हैं  |

यही वजह है कि सुशांत की आत्महत्या के बाद विशेष रूप से मुम्बई का फिल्म उद्योग दो खेमों में बंट गया है | खुलकर ये आरोप लग रहा है कि किस तरह चन्द परिवार और कुछ अभिनेता मिलकर पूरे फिल्म जगत के भाग्यविधाता बन गये हैं| बात अभिनेताओं से होते हुए गायकों , संगीतकारों , गीतकारों और पटकथा लेखकों  तक भी जा पहुँची है | सुशांत सिंह पहले कलाकार नहीं हैं जिसने आत्महत्या जैसा  कदम उठाया | 

लम्बे समय से ये सिलसिला चला आ रहा है | अनेक मौतों पर आज तक रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है | मुम्बई दंगों के मुख्य आरोपी दाउद इब्राहीम के घरेलू जलसों में नाचने -  गाने वाले कलाकार भी किसी से छिपे नहीं हैं | जो फिल्म जगत माफिया को खलनायक के तौर पर पेश कर अपनी देशभक्ति का ढिंढोरा पीटता फिरता है , वही आज बुरी तरह से उसके शिकंजे में फंसा हुआ है | हालाँकि जो कुछ भी कहा जा रहा है उसके पीछे व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा और असफलता से उपजी भड़ास भी हो सकती है किन्तु जिस  बड़ी संख्या में विरोध के स्वर गूँज रहे हैं उन्हें देखते हुए इस तरफ भी ध्यान जा रहा है  | ऊपरी चमक - दमक से परे इस उद्योग का असली चेहरा कितना भयावह है , ये संदर्भित घटना से सामने आया है | सुशांत सिंह ने तो अपनी मौत का कोई भी कारण नहीं लिख  छोड़ा किन्तु उसकी वेदना को व्यक्त करने वाली इतनी आवाजें फिल्म  जगत में से ही उठ रही हैं कि सभी को कुंठा या ईर्ष्या से प्रेरित मानकर उपेक्षित नहीं  किया जा सकता |

हालाँकि  परिवारवाद  अनेक क्षेत्रों में दिखाई  देता  है | लेकिन फिल्म उद्योग के भीतर चलने वाली डर्टी पिक्चर के दृश्य जिस तरह सामने आ रहे हैं उनसे उन सब बातों की पुष्टि हो जाती है जिन्हें गॉसिप और अफवाह मानकर हवा में उड़ा दिया जाता था |

फिल्मों में जो दिखाया जाता है वह असल  ज़िन्दगी में सत्य ही हो ये सोचना तो अव्यवहारिक होगा परन्तु पूरी तरह उल्टा होता है  ये देख - सुनकर अचरज होता है | सुशांत सिंह ने मृत्यु के पहले किसी से कुछ कहा हो ये भी पता नहीं चला लेकिन जिस बड़ी संख्या में फिल्मी  हस्तियाँ उसके साथ हुए उपेक्षापूर्ण व्यवहार  के विरोध में खुलकर सामने आती जा रही हैं उनसे ऐसा लगता है जैसे अनेकानेक सोये हुए ज्वालामुखी एक साथ फूट पड़े हों |

हालांकि इस सबसे फ़िल्मी दुनिया में कोई सुधार होगा ये कह पाना कठिन है क्योंकि जो व्यवसाय माफिया के कब्जे में आ गया हो तथा जहां अवार्डों का फैसला तक दुबई से आये फोन या अनैतिक सौदेबाजी से होता हो उसमें रातों - रात बदलाव  की उम्मीद करना व्यर्थ है किन्तु इस दौरान पानी  को हिलाने पर तलहटी में जमी गंदगी जिस तरह सतह पर आकर तैरने लगती है , ठीक वैसा ही कुछ - कुछ सुशांत सिंह की मौत के बाद सामने आ रहा है |

नो फायरिंग जैसे प्रावधान आखिर रखे ही क्यों गए ? सैनिकों के हाथ बांधने वाले समझौतों को तोड़ना जरूरी


 1962 के चीनी हमले पर बनी स्व. चेतन आनंद की  बलैक एंड व्हाइट फिल्म हकीकत देखने के बाद लम्बे समय तक गुस्सा मन में रहा | फिल्म लद्दाख  की पृष्ठभूमि पर फिल्माई गयी थी | चीनी  हमले के शुरुवाती दृश्यों में भारतीय सैन्य चौकी की हिफाजत कर रही टुकड़ी को दूर से चीनी सैनिक लाउडस्पीकर पर पहले तो  हिन्दी - चीनी भाई - भाई के नारे सुनाते हैं और उसके साथ ही ये जमीन हमारी है , तुम यहाँ से चले जाओ की चेतावनी देते हैं | टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे मेजर ( बलराज साहनी ) अपने ब्रिगेडियर ( जयंत )  को वायरलैस पर स्थिति की  जानकारी देते हैं | लेकिन ऊपर से  शांत रहने का आदेश मिल जाता है | चीनी पक्ष से लाउड स्पीकर पर हिन्दी - चीनी भाई - भाई का राग अलापने के साथ ही जमीन छोड़कर जाने के धमकी रोजाना दोहराई जाने लगी | यही नहीं चीनी खेमे में हलचल बढ़ते देखकर सैनिकों ने मेजर साहब से पूछा , साहब कहें  तो निपटा दें | उन्होंने फिर ब्रिगेडियर को वायरलैस पर खतरा बढ़ने की जानकारी के अलावा  सैनिकों की मंशा से अवगत करवाया किन्तु ब्रिगेडियर ने कड़क आवाज में आदेश दिया नो फायरिंग | दिन ब दिन चीनी खेमे में संख्या बढ़ती जा रही थी  | लाउड स्पीकर से दिन  में अनेक बार ये जमीन हमारी है , तुम यहाँ से चले जाओ की धमकी शुरू हो गयी | जब भी  मेजर साहब स्थिति के बिगड़ने से ब्रिगेडियर को अवगत करवाते हुए  कार्र्वाई का आदेश मांगते और उत्तर में घिसा - पिटा निर्देश होता नो फायरिंग |

 
धीरे - धीरे चीनी सेना के सैकड़ों सैनिक हथियारों सहित आगे आते दिखाई देते हैं | मेजर फिर आदेश मांगते हैं पर  जवाब में नो फायरिंग ही सुनाई देता है | और फिर एक दिन टिड्डी दल की शक्ल में चीनी सेना को आक्रामक अंदाज में बढ़ते देखते ही मेजर चीखते हुए ब्रिगेडियर को बताते हैं सर ये तो सरासर हमला है | और तब तक  सामने से गोली चलते ही युद्ध की औपचारिक शुरुवात हो जाती है | भारतीय टुकड़ी  छोटी होने के बाद भी चीनी सैनिकों के छक्के छुड़ा देती है किन्तु उसके अनेक जवान मारे जाते हैं | खबर पीछे जाती है किन्तु और सैनिक आते तक चीनी दल और बड़ी संख्या में आ टपकता है  और वहीं से भारत की शर्मनाक हार की शुरुवात हो जाती है | उसके बाद फिल्म कुछ हकीकत और कुछ फसानों के साथ बढते हुए कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों , अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो , गीत के साथ खत्म हो जाती है |  मैं तब विद्यालयीन छात्र था | उस फिल्म को देखने के बाद बेहद शर्मिन्दगी महसूस हुई |

यद्यपि उसके बाद 1965 में पाकिस्तान से हुई जंग में भारत ने अभूतपूर्व पराक्रम दिखाया और शत्रु को जबरदस्त पटकनी दी | लेकिन दोनों युद्धों में एक बात समान रही | 62 में चीन ने हमारी जमीन हमसे छीन ली | और 65 में हमने जो जमीन पाकिस्तान से जीती थी वह ताशकंद समझौते में गंवा दी |

पाकिस्तान से तो उसके बाद 1971 में भी ऐतिहासिक युद्द्ध हुआ लेकिन जीतकर भी हमारे हाथ खाली रहे | पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली  पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों  के नस्लीय भेदभाव से त्रस्त होकर विरोध में उतरे  तो उनका दमन शुरू हुआ | लाखों की संख्या में  वहां से शरणार्थी सीमा पार करते हुए भारत आने लगे | अंत में भारत ने भी  सैन्य हस्तक्षेप किया और पूर्वी पाकिस्तान बांग्ला देश नामक नये देश के तौर पर स्थापित हुआ | बंगालियों को पश्चिमी पाकिस्तान से मुक्ति मिल गयी | 90 हजार पाकिस्तानी सैनिक आत्मसमर्पण कर भारत में युद्धबंदी बनकर आ गये | लाखों  शरणार्थी पहले से ही  जमे हुए थे  | देश जीत के  जश्न में डूबा हुआ था |  पंडित नेहरु पर देश को तोड़ने का इल्जाम लगता रहा है लेकिन उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को तोड़कर इतिहास बना डाला | वह बहुत बड़ी सैन्य जीत तो थी ही | लेकिन उससे भी बढ़कर तो नियति ने एक ब्रह्मास्त्र हमारे हाथ में दिया था 90 हजार पाकिस्तानी युद्धबंदियों के रूप में |

इंदिरा जी के एक मजबूत नेता के रूप में उभरने से उम्मीद जगी कि पाकिस्तान से समझौते में 90 हजार  युद्धबंदियों के बदले पाक अधिकृत कश्मीर वापिस ले लिया जाएगा | कुछ महीनों बाद सुलह वार्ता के लिए  शिमला में पाक प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो आये | लेकिन  कश्मीर वापिस लेने की बात  न जाने कहाँ छूट  गयी और वे भविष्य में शराफत से पेश आने का वायदा युक्त समझौता करते हुए अपने युद्धबंदी  वापिस ले गये | इस तरह हारकर भी  पाकिस्तान शिमला से विजयी  अंदाज में लौटा जबकि जीतकर भी भारत के  हाथ आये लाखों भूखे शरणार्थी जो अपना अलग देश बन जाने के बाद भी यहीं  चिपककर बैठ गए |  बाद में भी  उनके आने का सिलसिला दशकों तक जारी रहा । अब तक उनकी  संख्या करोड़ से ऊपर हो चुकी होगी क्योंकि इनकी दूसरी - तीसरी पीढ़ी भी भारत की  नागरिक बन चुकी है |

 हालाँकि पाकिस्तान से कारगिल रूपी एक लघु युद्ध और हुआ जिसमें उसकी  शिकस्त हुई | दूसरी तरफ चीन के साथ एक दो खूनी संघर्षों के बाद शांति तो बनी रही लेकिन उसने अपनी विस्तारवादी नीति के तहत भारतीय भूभाग पर हकीकत फिल्म वाली शैली  में ये जमीन हमारी है , तुम यहाँ से चले जाओ , की रट कभी नहीं छोड़ी | दोनों देशों के बीच आज तक सीमा का निर्धारण न  हो पाने से उसका दावा हमेशा बना रहता है | रोज - रोज के तनाव को रोकने एवं युद्ध को टालने के उद्देश्य से 1993 , 96, 2005 , 12 और 13 में विभिन्न समझौते हुए जिनके अंतर्गत सीमा पर उत्पन्न  विवाद मौके पर उपस्थित सैन्य अधिकारियों द्वारा निपटाने के साथ किसी भी सूरत में शस्त्रों का प्रयोग न करने का प्रावधान था | दोनों देशों के सैनिक वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर एक दूसरे के क्षेत्र में घुसपैठ के चलते आपस में गुत्थमगुत्था होते रहे | घूंसेबाजी , धक्का मुक्की भी सामान्य हो गई | लेकिन कुछ साल पहले डोकलाम में दो महीने से ज्यादा चले गतिरोध के बाद भी गोली नहीं चली | इस कारण दोनों तरफ से कभी भी जनहानि नहीं हुई |

लेकिन बीते दो माह से लद्दाख सेक्टर में चीन की सैन्य गतिविधियाँ रहस्यमय तरीके से बढ़ीं जिसकी परिणिति 15 जून की उस घटना के रूप में हुई जिसमें भारत के 20 सैन्यकर्मी शहीद हो गए | चीनी सेना को भी  भारत से ज्यादा सैनिक गंवाने पड़े | प्रचलित समझौते के अंतर्गत बातचीत करने गये भारतीय सैन्य दल पर अप्रत्याशित रूप से किये गये हमले  के बाद भारतीय सैनिकों ने भी जोरदार पलटवार करते हुए चीनी शिविर में मारकाट मचा दी | जिस जगह और हालातों में वह संघर्ष हुआ वह पूरी तरह असामान्य थे | लेकिन देश  में अपने फौजियों के मारे जाने से जो गुस्सा फैला उसने इस सवाल को जन्म दिया कि क्या हमारे सैनिकों के पास शस्त्र नहीं थे और यदि थे तो उन्होंने उनका उपयोग क्यों नहीं किया ?

और जवाब में स्पष्ट किया गया कि सैनिक शस्त्र तो लिए थे किन्तु समझौते से बंधे होने से उनके सामने भी हकीकत फिल्म वाली नो फायरिंग की बंदिश थी | सरकार का जवाब सही है | विपक्ष  की आलोचना का जवाब भी विपक्ष से ही आया जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों को आधार बनाया गया |

गत दिवस सरकार ने सेना को जरूरत पड़ने पर नो फायरिंग वाली बंदिश तोड़ने की आजादी दे दी | चीन को भी बता दिया गया कि गोली न चलाने की कसम तोड़ी भी जा सकती है | सेना भी यही चाह रही थी  | सियासत का मैदान भी सजा हुआ है | लोकतांत्रिक तकाजे  और शालीनता की मर्यादाएं ध्वस्त हो रही हैं | उलाहना दिया जा रहा है कि धोखेबाज चीन पर भरोसा क्यों किया गया ? लेकिन कोई ये नहीं पूछ रहा कि चीन के धोखेबाज चरित्र को जानने के बावजूद शस्त्र पास होते हुए भी सैनिकों के हाथ नो फायरिंग जैसी  शर्त से क्यों बांधे गये ?

आज सरकार ने गोली चलाने की जो छूट सेना को दी वह  सही , साहसिक और सामयिक फैसला है | बेहतर होगा बार्डर मैनेजमेंट के नाम पर चीन से हुए  सभी समझौते इकतरफा तोड़ दिये  जाएँ | इसी तरह शिमला समझौता , लाहौर समझौता और ऐसे ही किसी भी समझौते को तिलांजलि दे दी जाए | पाकिस्तानी सीमा पर तो सेना को गोली के जवाब में गोला दागने की छूट है किन्तु चीन के साथ युद्धभूमि अलग तरह की है । और फिर ये दुश्मन  बहादुरी से नहीं चालाकी से लड़ता है । इसलिए सेना को  चीनी इलाकों के भीतर घुसकर उसकी  जमीन दबाने की अनुमति भी दी जाए | चीन को ये भी लगना चाहिए कि भारत भी उकसाना और झगड़ा बढ़ाने की कला जानता है | सैन्य सूत्रों के मुताबिक गलवान में 15 जून को हुए संघर्ष में जिस तरह चीनी पक्ष की जमकर पिटाई हुई उससे 20 फौजी गंवाने के बाद भी भारतीय सेना में जबर्दस्त जोश है |

 दूसरे विश्वयुद्ध के पहले रूस और जर्मनी के बीच अनाक्रमण समझौता था  | लेकिन जब जर्मनी ने रूस पर चढ़ाई की और रूस ने  उस समझौते का हवाला देते हुए आक्रमण रोकने कहा तो जवाब मिला समझौते तो तोड़ने के लिए ही होते हैं | पाकिस्तान और चीन ने सदैव जर्मनी के उस जवाब के अनुरूप आचरण किया है | अतः उन्हें उनकी ही शैली में जवाब देने की जरूरत है |

 आखिर जिन समझौतों के बाद भी सीमा पर युद्ध के हालात बने रहें और पूरा देश तनाव में जिए , उनको सहेजकर रखने से क्या फायदा ?

उद्योग - व्यापार जगत को सामान्य से ज्यादा राहत दी जाए वरना ..



यदि कोरोना न आता और उसके बाद चीन द्वारा सीमा पर शरारत नहीं की जाती तब हमारा आर्थिक राष्ट्रवाद भी शायद इस तरह उफान पर नहीं आता। जानलेवा वायरस के निर्यात के लिए दोषी माने जा रहे चीन के साथ व्यापार असंतुलन को दूर कर भारतीय उद्योगों को पुनर्जीवित करते हुए स्वदेशी के नारे को जमीन पर उतारने की मुहिम जिस तरह से जोर पकड़ रही है वह एक शुभ संकेत है। सरकार को आखिर ये समझ में आ गया कि देश की तरक्की और मजबूती के लिए विदेशों पर निर्भरता घटानी ही होगी और इसके एकमात्र उपाय के तौर पर देश में उत्पादन क्षमता को इतना बढ़ाना पड़ेगा जिससे हम अपने उपभोग के बाद भी निर्यात कर सकें। उस दृष्टि से प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया आत्मनिर्भरता का नारा राजनीतिक तौर पर भले ही हास-परिहास में उलझ गया हो और सोशल मीडिया पर भी उसे लेकर तरह-तरह के चुटकुले और तंज कसे गये हों लेकिन आलोचक भी दबी जुबान ही सही ये तो स्वीकार करेंगे ही कि स्वदेशी को बढ़ावा दिए बगैर भारतीय अर्थव्यवस्था का उद्धार संभव नहीं होगा। बावजूद इसके ये कहना गलत नहीं है कि कोरोना संकट से उत्पन्न हालातों में चीन से आयात घटाने के बारे में लिए गये निर्णय भी औपचारिक ही रहते किन्तु सीमा पर उसके द्वारा किये गए शत्रुतापूर्ण व्यवहार के बाद केंद्र सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर भी जो आक्रामकता दिखाई उसका प्रभाव चीन पर होने लगा है। इसका प्रमाण भारत के भीतर चीनी सामान के बहिष्कार को लेकर सामने आ रही उग्र जनभावनाओं पर वहां के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित प्रतिक्रियाओं से मिलता है जो चीनी सामान पर आयात शुल्क बढ़ाने को दोनों देशों के आपसी सम्बन्धों के लिए नुकसानदेह बताती हैं। सीमा पर बीते 15 जून की घटना से चीन का शत्रुतापूर्ण रवैया सामने आने के उपरान्त केंद्र सरकार ने ताबड़तोड़ कुछ कदम उठाते हुए उसके आर्थिक हितों को चोट पहुँचाने का जो पैंतरा दिखाया उससे भारतीय उद्योग और व्यापार जगत में काफी उत्साह है। लेकिन सरकारी तंत्र की असम्वेदनशीलता और सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पेट फाड़ने की प्रवृत्ति के चलते प्रधानमन्त्री द्वारा किया आत्मनिर्भरता का आह्वान और स्वदेशी की स्वप्रेरित बयार कितनी प्रभावशाली और टिकाऊ हो सकेगी, ये विचारणीय है। बिजली की अधिकतम दरें, कर ढ़ांचे की पेचीदगियां और उससे भी बढ़कर नीतिगत अनिश्चितता के साथ उनके क्रियान्वयन में होने वाली देरी से उद्योग जगत विशेष रूप से छोटे और मध्यम श्रेणी  के उपक्रम खून के आंसू पीने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। मप्र को ही लें तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह द्वारा लॉक डाउन की अवधि में व्यवसायिक बिजली उपभोक्ताओं को स्थायी प्रभार के अलावा कुछ और राहतें देने का ऐलान कर राहत प्रदान कर दी। लेकिन आज तक उस पर अमल नहीं हुआ। व्यवसायिक प्रतिष्ठान तथा कारखाना महीनों तक बंद रहने के बावजूद हजारों- लाखों के बिल आ रहे हैं। ये बड़ी ही विरोधाभासी स्थिति है। सरकार रोजगार से वंचित लोगों को तो मुफ्त राशन देकर उनका पेट भर रही है किन्तु रोजगार देने वाले व्यवसाय-उद्योग जगत के मुंह से रोटी छीनने का अपराध करने से भी बाज नहीं आती। ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि जब तक उद्योग और व्यापार जगत को सामान्य से ज्यादा सुविधायें और रियायतें नहीं दी जातीं तब तक वे प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं सकेंगे। ये ठीक है कि उपभोक्ता वस्तुओं के अलावा इलेक्ट्रानिक्स, आटोमोबाइल, मोबाइल, कम्यूटर जैसी चीजों के लिए भारत का घरेलू बाजार ही बहुत बड़ा है लेकिन यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था बनना है तब हमें निर्यात में भी तेजी लानी होगी। उस दृष्टि से भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धात्मक बनाना होगा जिसके लिये सरकार को उदार ह्रदय और सहयोगात्मक नीतियां लागू करते हुए नौकरशाहों को ठेठ हिन्दी में समझाना होगा कि उद्योगपति और व्यापारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनको सहायता और संरक्षण दिए बिना न आत्मनिर्भरता आयेगी, न बेरोजगारी दूर होगी और न ही चीन के आर्थिक आक्रमण का सामना किया जा सकेगा। आज जो लोग भावावेश में कुछ कदम उठा रहे हैं वे ज्यादा दिनों तक ऐसा नहीं कर सकेंगे , यदि भारतीय उद्योग उनकी जरूरतों को किफायती दामों पर पूरा करने में शीघ्र ही सक्षम नहीं होते। बीते दो दशक में भारत का घरेलू औद्योगिक ढांचा जिस बुरी तरह से चरमराया है उसे देखते हुए उसका शक्तिवर्धक दवाओं रूपी नीतियों से उपचार जरूरी है। वरना कोरोना के बाद और सीमा पर संकट खत्म होते ही न सरकार को आत्मनिर्भरता याद रहेगी और न ही जनता को चीनी सामान के बहिष्कार की।

-रवीन्द्र वाजपेयी