Sunday, 28 June 2020

विदेशी धन केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं आरोप लगे हैं तो सच्चाई भी सामने आनी चाहिए



हालाँकि मौजूदा संदर्भ राजनीतिक दलों से जुड़ा हुआ है लेकिन जब बात निकल ही  चुकी है तब क्यों न उसकी तह तक जाया जाए | 

भाजपा द्वारा पहले कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच हस्ताक्षरित हुए समझौता ज्ञापन (MOU) और बाद में राजीव गांधी फाउंडेशन को विदेशी  आर्थिक सहायता के अलावा प्रधानमन्त्री राहत  कोष से मिले अनुदान पर जो सवाल उठाये गए , उसका जवाब देने की बजाय कांग्रेस और फाउंडेशन की तरफ से इसे कोरोना और सीमा पर चीन  द्वारा उत्पन्न सैन्य  दबाव से निपटने में विफलता को छुपाने का प्रयास बताया जा रहा है | इसके अलावा कांग्रेस ये भी कह रही है कि भाजपा यदि गड़े मुर्दे उखाड़ने पर उतारू रही तो भाजपा को भी मुंह छिपाने जगह नहीं मिलेगी | 

लेकिन फिलहाल तो चर्चा में कांग्रेस और राजीव गांधी फाउंडेशन ही हैं | दरअसल भाजपा इस आरोप के जरिये गांधी परिवार को घेरना चाह रही है | वह अपने मकसद में कितनी सफल होगी ये फ़िलहाल कहना जल्दबाजी होगी लेकिन ये बिलकुल सही है कि सीमा पर चीन के साथ चल रहे  तनाव में जहाँ कांग्रेस अपने लिए राजनीतिक अवसर तलाश रही थी वहीं भाजपा ने भी उसके  जवाब में वैसा ही मोर्चा खोलते हुए उस पर सवालों की गठरी लाद दी | अब दोनों एक दूसरे पर जवाब नहीं देने का आरोप लगाने में जुटे हैं |  लेकिन दोनों के आरोप चूँकि अनुत्तरित हैं इसलिए जनता तब तक किसी  भी निष्कर्ष  तक नहीं  पहुंच सकती जब तक कि सम्बन्धित पक्ष आरोपों  को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं करें |

लेकिन जैसी चर्चायें चल रही हैं उनके अनुसार भारत में गैर शासकीय संस्थाओं ( NGO ) को विभिन्न कार्यों हेतु विदेशी पैसा मिलता है | राजीव गाँधी फाउंडेशन को  भी अनेक विदेशी सरकारों और संस्थाओं  से पैसा मिलने की बात सामने आई है | देश में हजारों NGO हैं जिन्हें विदेशों से आर्थिक सहायता मिलती है | इस हेतु केंद्र सरकार बाकायदा अनुमति देती है तथा ऐसी संस्थाओं पर उसकी नजर भी रहती  है | ये बात किसी  से छिपी नहीं है कि`अनेक संस्थाओं द्वारा विदेशी धन से धर्मांतरण के अलावा देश विरोधी भावनाएं भड़काने जैसे काम किये जाते हैं | ऐसे में राजनीतिक दलों को एक - दो नहीं अनेक देशों से मिलने वाले विदेशी अनुदान का वे क्या उपयोग करते हैं ये स्पष्ट होना चाहिए | 

यद्यपि वे अपनी बैलेंस शीट के अलावा सरकार को दिए जाने वाले वार्षिक विवरण में विदेशी राशि मिलने के साथ ही उसे खर्च किये  जाने वाले मद का विवरण देते हैं | केंद्र सरकार का गुप्तचर ब्यूरो ( I. B. ) द्वारा ऐसी सभी संस्थाओं की जांच करने के उपरांत जब अनापत्ति दी जाती है उसी के बाद ही विदेशी अनुदान की पात्रता होती है |

ऐसे में राजीव गाँधी फाउंडेशन को भी इसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा होगा | लेकिन भारत सरकार नियंत्रित प्रधानमंत्री राहत कोष से उसे धन क्यों मिला ये वाकई महत्वपूर्ण प्रश्न है , जिसका उत्तर कांग्रेस को देना चाहिए | विशेष रूप से इसलिए कि इस संस्थान की प्रमुख सोनिया गाँधी के साथ अन्य संचालकों  में राहुल गांधी , प्रियंका वाड्रा , डा. मनमोहन सिंह और पी चिदम्बरम हैं | इन पांचों को गांधी परिवार का ही माना  जाता है | वहीं चीनी सरकार से कांग्रेस को मिले धन के उपयोग में भी पार्टी की सर्वेसर्वा  होने से गाँधी परिवार का ही निर्णय लागू होता रहा होगा | प्रधानमन्त्री राहत कोष को  भी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती गांधी प्रभावित करती थीं ये भी भाजपा का आरोप है |

 लेकिन विदेशी आर्थिक  सहायता का आरोप तो अतीत में स्व.जॉर्ज फर्नांडीज पर भी लगा | एकीकरण के पहले पश्चिम जर्मनी के चांसलर रहे विली ब्रांट  द्वारा समाजवादी विचारधारा वाली पार्टियों को दी जाने वाली सहयता के अनतर्गत जॉर्ज भी लाभान्वित हुए बताये जाते हैं | जहाँ तक बात वामपंथियों की है तो पहले सोवियत संघ और बाद में चीन उनका संरक्षक बना रहा | सोवियत संघ के विघटन के बाद भी ये माना जाता है कि रूस अपने अंतर्राष्ट्रीय हित्तों के संरक्षण हेतु अनेक देशों की साम्य्वादी पार्टी के दाना -- पानी का इंतजाम करता है | जबकि चीन विभिन्न देशों में साम्यवादी पार्टी सहित  अन्य उन लोगों की मदद करता है जो वामपंथ की माओवादी विचारधारा से प्रभावित हों |

भाजपा पर भी ये आरोप लगता रहा है `कि वह दुनिया भर में फैले अप्रवासी भारतीयों से धन बटोरती है | यही नहीं चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने कुछ साल पहले भाजपा के प्रतिनिधिमंडल को भी चीन आकर दोनों पार्टियों के बीच आपसी समझ  पैदा करते हुए वैचारिक स्तर पर समझाइश बढ़ाने हेतु।आमंत्रित किया था | बाकी  देशों की पार्टियाँ भी  हमारे यहाँ के सतारूढ़ और विपक्षी दलों को बारी - बारी से अपने यहाँ आमंत्रित करती रहती हैं | ऐसे में यदि कांग्रेस को चीन का सरकारी धन न मिला होता तब उसके दामन को दागदार बताने का दुस्साहस भाजपा शायद न कर पाती  । 

इसी तरह राजीव गांधी फाउंडेशन को प्रधानमंत्री राहत कोष से यदि धन दिया गया तो वह अनैतिकता की पराकाष्ठा ही कही जायेगी | ऐसे में जब भाजपा ने कांग्रेस पर इतने गम्भीर आरोप लगाये हैं तो पहली बात तो उसे उन्हें सप्रमाण साबित करना चाहिए और दूसरा ये कि उसे इस बात के प्रति देश को आश्वस्त करना होगा कि उसने विदेशों में रहने वाले भारतीयों के अलावा किसी और से धन नहीं लिया |

 वैसे ये बात तो राजनय की समझ रखने वाला साधारण व्यक्ति भी बता देगा कि विदेशी धन प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर देश की राजनीति को प्रभावित करने आकर राजनेताओं और उनकी पार्टियों के अलावा समाचार माध्यमों , बुद्धिजीवियों , पत्रकारों आदि तक भी पहुंचता है |  बड़े सरकारी  ठेकों  और सौदों में लॉबिंग नामक एक तरीका पूरी दुनिया में प्रचलित है | इसके अंतर्गत न सिर्फ सत्ता अपितु विपक्ष को भी प्रभावित किया जाता है  ताकि वह अड़ंगा न डाले | समाचार माध्यमों को उपकृत करते हुए अपने अनुकूल बना लेना भी लॉबिंग  करने वालों की कार्यसूची में होता है |

भारत में आम चुनाव के समय विभिन्न विदेशी दूतावास अपने अधिकारियों को दौरे पर भेजते है | जिसका उद्देश्य अपने देश के हितों के अनुकूल चुनाव परिणाम का आकलन करना होता है | इस प्रकार विदेशी धन केवल व्यवसाय में नहीं बल्कि राजनीति और उससे परोक्ष तौर पर जुड़ी अन्य गतिविधियों के लिए भी खफता है और इसका स्वरूप कानूनी और गैरकानूनी दोनों तरह  का रहता है |

इस बारे  में मौजूदा विवाद देश की दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों के बीच होने से केवल राजनीतिक दांव - पेच मानकर उसे हवा में उड़ाना ठीक नहीं होगा | इसको अंजाम तक पहुँचाना जरूरी है | भाजपा के आरोपों पर कांग्रेस  ने जिस जवाबी हमले की धमकी दी गई उसे अमल में लाने में उसे संकोच और देर नहीं करना चाहिए ।
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और जब बात इतनी  बढ़ चुकी है तब सरकार को चाहिए कि वह राजनीतिक दलों के अलावा व्यक्तियों अथवा संस्थाओं  को मिलने वाले विदेशी धन के बारे में बाकायदा सार्वजनिक जानकारी उनके कार्य क्षेत्र में प्रसारित करे | इससे ऐसे  लोग और संस्थाएं प्रकाश में आ सकेंगी जो समाजसेवा के आड़ में अनैतिक और  देशविरोधी गतिविधियाँ चला रहे हैं | 

यदि वह इस बार  भी ऐसा नहीं कर सकी तब लोगों को ऐसे आरोपों पर से बचा - खुचा विश्वास भी नहीं रहेगा | उल्लेखनीय है मोदी सरकार को बने छह साल बीत  गए किन्तु राबर्ट वाड्रा के अलावा गांधी परिवार के एक भी व्यक्ति को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजने में सरकार को सफलता  नहीं मिली | और फिर जमानत पर चल रहे व्यक्ति को दण्डित नहीं माना जा सकता |

पवार के पावर गेम को समझना सबके बस की बात नहीं। राहुल पर हो रहे कटाक्ष दूरगामी सियासत का संकेत





देश के सबसे वरिष्ठ राजनेताओं में राकांपा ( राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ) के संस्थापक शरद पवार की गणना  होती है | लेकिन केवल वरिष्ठता ही उनकी   खूबी नहीं है अपितु अवसर को भांपकर उसके अनुरूप अपनी रणनीति को एकाएक बदलने में भी वे सिद्धहस्त  हैं | कम उम्र में ही महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने के  लिए उन्होंने 1978 में अपने राजनीतिक गुरु वसंत दादा पाटिल की सरकार गिरवाकर  गद्दी हासिल की थी | उन्होंने कितनी बार पार्टी छोड़ी और नई बनाई ये भी एक रिकॉर्ड है | गद्दी की खातिर वे कब किससे हाथ मिलाने वाले हैं ये केवल वे ही जानते हैं | 1999 में उन्होंने प्रधानमन्त्री की दौड़ में शामिल होने की गरज से सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा कांग्रेस कार्यसमिति में उठाकर भूचाल ला दिया था | उनके साथ  पूर्व लोकसभाध्यक्ष पीए संगमा तथा तारिक अनवर भी थे | ये पहला मौका था जब कांग्रेस के भीतर किसी ने श्रीमती गांधी के विदेशी मूल का प्रश्न उठाया और वह भी श्री पवार जैसे अनुभवी नेता द्वारा | लेकिन वे और उनके साथी अकेले पड़ गए  और उसके बाद उन्हें निकाल बाहर किया गया | अपनी नई पार्टी के नाम में कांग्रेस के साथ राष्ट्रवादी जोड़कर उन्होंने  विदेशी मूल का सवाल उठाए जाने के औचित्य को सांकेतिक तौर पर कायम रखा |

राजनीति के जानकार खुलकर इस बात को स्वीकार करते हैं कि यदि श्री पवार वह बखेड़ा खड़ा नहीं करते तो तब अटल बिहारी  वाजपेयी की सत्ता में वापिसी शायद नहीं हो पाती और बड़ी बात नहीं कांग्रेस की सरकार और श्रीमती गांधी प्रधानमंत्री बन जातीं | ये कहने वाले भी कम नहीं है कि उसके बाद भी श्री पवार गुजरात जैसे राज्य में अपने प्रत्याशी लड़वाकर परोक्ष रूप से भाजपा की मदद करते रहे | उन्हीं के विरोध ने सोनिया गांधी पर इतना जबर्दस्त मनोवैज्ञानिक दबाव डाला कि 2004 में  लोकसभा  चुनाव के बाद कांग्रेस  संसदीय दल की नेता चुने जाने के बाद भी वे प्रधानमंत्री बनने से पीछे हट गई | हालांकि श्री पवार कांग्रेस की  अगुआई वाली यूपीए सरकार में कृषि और रक्षा ऐसे महत्वपूर्ण विभागों  के मंत्री भी रहे |

वे राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार रखते हुए अपने निजी संबंधों को मजबूत बनाये रखने के प्रति सचेत रहते हैं | जिन बाला साहेब ठाकरे ने श्री पवार पर  दाउद इब्राहीम को अभयदान देने जैसा आरोप लगाया उनके साथ भी उनका  बड़ा ही अन्तरंग  रिश्ता था |  गृहनगर बारामती में जब - जब भी उनके सम्मान में कोई महत्वपूर्ण आयोजन हुआ तब तमाम मतभेद भुलाकर अटल बिहारी वाजपेयी और चन्द्रशेखर जैसे नेता वहां  पहुंचे और उनकी तारीफ़ के पुल बांध दिए | यही नहीं नरेंद्र मोदी ने भी राकांपा सुप्रीमो के इलाके में जाकर उनके सम्मान समारोह में यहां तक बोल दिया कि वे उनसे समय - समय पर  सलाह लिया करते हैं |

महाराष्ट्र विधानसभा के गत वर्ष हुए चुनाव में वह शरद पवार का पावर गेम ही था जिसने भाजपा  के सामने से सत्ता रूपी थाली छीन ली | उनकी पार्टी का तो चलो ठीक था लेकिन कांग्रेस को शिवसेना के साथ गठबंधन हेतु राजी करना उनकी  बड़ी सफलता थी | यद्यपि कांग्रेस विशेष रूप से श्रीमती गांधी , इस मराठा नेता द्वारा उनके विदेशी होने को मुद्दा बनाये जाने वाले हमले को भूली नहीं हैं , लेकिन सत्ता के समीकरणों ने कांग्रेस को उन्हीं शरद पवार को अपने साथ केंद्र के सरकार में बाइज्जत शामिल करने के लिए मजबूर कर दिया था | 

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए उनको भाजपा से अलग करना उतनी बड़ी बात नहीं थी जितनी कांग्रेस को शिवसेना के करीब लाना | लेकिन वे इसमें कामयाब हो गये | उस दौरान राज्य की राजनीतिक गहमागहमी के बीच  उनका दिल्ली में प्रधानमन्त्री श्री मोदी से अकेले में मिलना भी उनकी सियासती चपलता को दर्शाता है | महाराष्ट्र के इस राजनीतिक प्रयोग ने  उम्र  के इस पड़ाव पर  शरद पावर को मिली राजनीति के चाणक्य की उपाधि का नवीनीकरण करवा दिया | उनके भतीजे अजीत पवार द्वारा की गई नाटकीय बगावत को जिस तरह  उन्होंने फुस्स किया वह मायने रखता था। वह वाकई बगावत थी या उनके द्वारा रचा गया नाटक ये रहस्य शायद ही कभी सामने आएगा  लेकिन उस अजीबोगरीब घटनाक्रम में अपनी
भूमिका से उन्होंने खुद को महाराष्ट्र की राजनीति का रिंग मास्टर बना दिया | मुख्यमंत्री बनकर भी जहां उद्धव ठाकरे बौने हैं वहीं राज्य की सरकार का  हिस्सा बनने के बाद भी कांग्रेस पूरी तरह से निरीह बनी हुई है |

लेकिन श्री पवार की नई राजनीतिक बिसात फिर से बिछती दिखाई दे रही है | बीते कुछ दिनों से वे कांग्रेस नेता राहुल गांधी को  जिस तरह से किनारे पर धकेलने में जुटे हैं वह राजनीतिक प्रेक्षकों को चौंका रहा है | चीन  के साथ सीमा पर चल रहे तनाव को लेकर हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा विपक्षी नेताओं के साथ की गई बैठक के पहले से ही राहुल गांधी  द्वारा गलवान घाटी में हुए संघर्ष में 20 फौजियों की मौत को सरकार की विफलता बताकर धुआंधार बयानबाज की जा रही थी |  बैठक में सोनिया गांधी ने भी सरकार को घेरना चाहा | लेकिन श्री पवार ने वहीं माँ - बेटे की आलोचनाओं को पूरी तरह अनावश्यक बताते हुए कहा कि सीमा पर सैनिकों का हथियार रखना और उनका उपयोग आदि अंतर्राष्ट्रीय संधियों के अनुसार तय होता है और इस अवसर पर सियासत नहीं होनी चाहिए |

 बैठक के बाद भी उन्होंने बिना नाम लिए राहुल को उनके सवालों के लिए झिड़का | लेकिन उनका जो ताजा बयान  आया उससे तो लगता है वे गांधी परिवार को एक बार फिर निशाने पर लेने की तैयारी कर रहे हैं | सतारा में उन्होंने पहले तो गलवान में घटनाक्रम के लिए रक्षामंत्री को बेकसूर ठहराते हुए कहा कि वह सब चीन के उकसावे पर ही हुआ | उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय  सुरक्षा के मामलों का राजनीतिकरण नहीं करने पर जोर दिया | लेकिन वे यहीं तक नहीं रुके | राहुल गांधी द्वारा नरेंद्र मोदी को सरेंडर मोदी कहकर सम्बोधित किये जाने पर तंज कसते हुए श्री पवार का  ये कहना काफी बहुउद्देशीय लगता है कि यह भुलाया नहीं जा सकता कि 1962 के युद्ध में चीन द्वारा भारत की तकरीबन 45 हजार वर्ग किमी पर कब्जा कर लिया गया था | ऐसे में जब मैं आरोप लगाता हूँ तो मुझे यह भी देखना चाहिए कि जब मैं सत्ता में था तो क्या हुआ था ? इस तरह ये सीधे - सीधे कांग्रेस और विशेषतः राहुल गांधी पर वैसा ही  हमला है जैसा भाजपा के नेता कर  रहे हैं | प्रधानमन्त्री वाली बैठक के बाद ही राहुल ने श्री  पवार के सुझाव से असहमति व्यक्त की | यही नहीं उसके बाद  गांधी परिवार द्वारा सरकार के विरुद्ध की जा रही तीखी बयानबाजी जिस तरह तेज हुई उससे लगता है श्री पवार की समझाइश को हवा में उड़ा दिया गया |

शायद यही वजह है वे गत दिवस  और आक्रामक होकर गांधी परिवार की अप्रत्यक्ष तौर पर आलोचना करते आये | उन्होंने साफ़ कहा कि उतनी बड़ी भूमि पर कब्जे को नजरअंदाज नहीं  किया जा सकता | वे केवल सरकार और प्रधानमंत्री  का समर्थन करते हुए  भी अपनी प्रतिक्रिया दे सकते थे किन्तु उन्होंने सोनिया गांधी और राहुल को भी लपेट लिया |

लगातार सरकार की तरफदारी करने के साथ ही पूर्व रक्षा मंत्री द्वारा राहुल गांधी पर धारदार तीर छोड़ने की रणनीति का उद्देश्य  फिलहाल स्पष्ट नहीं  हो सका । लेकिन वे राहुल को क्यों निशाना बना  रहे हैं ये किसी के पल्ले नहीं पड़ रहा | श्री पवार के अलावा उद्धव ठाकरे भी भाजपा से रिश्ते तल्ख बने रहने के बावजूद प्रधानमंत्री के सुर में सुर मिला रहे हैं | इससे ऐसा प्रतीत होता है कि श्री पवार को कांग्रेस  विशेष तौर पर गांधी परिवार से जुड़े राजीव गांधी फाउंडेशन को लेकर मचने वाले विवाद का पता चल गया था । इसीलिये वे अपने गठबन्धन की साथी कांग्रेस को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर रहे हैं |

उनका ये कहना कि आरोप लगाते समय ये भी देखना चाहिए कि जब हम सरकार में थे तो क्या हुआ था , गांधी परिवार की तिलमिलाहट बढ़ाने वाला है। श्री पवार के ऐसे बयानों से केंद्र सरकार और  भाजपा तो खुश हैं ही लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को ये समझ में  नहीं आ रहा कि उन्होंने 
भाजपा को एक मुद्दा आखिर क्यूं दे दिया ? और इसीलिए लगता है उन जैसे चतुर राजनेता की छटवीं इन्द्रिय ने जरूर  कुछ न कुछ न ऐसा देख लिया जिसके कारण से वे गांधी परिवार पर आने वाले संकट का पूर्वानुमान लगा सके | वह संकट क्या है ये तो फ़िलहाल कोई बता पाने की स्थिति में नहीं है किन्तु श्री पवार जैसा चतुर और चालाक व्यक्ति बिना दूर की सोचे कुछ बोलना तो दूर सोचता तक नहीं है |

यूँ भी उनकी बेटी सुप्रिया सुले के केन्द्रीय मंत्री बनने की अटकलें काफी समय से सुनाई दे रही हैं ।

Saturday, 27 June 2020

जिनपिंग को बाबर की तरह मुस्कराने का मौका दे दिया हमारे नेताओं ने ! आपसी लड़ाई से फुर्सत नहीं तो चीन से क्या ख़ाक लड़ेंगे ?





अतीत की भयंकर गलतियों से न  सीखने वाले देशों  में भारत का नाम सबसे ऊपर  हो तो चौंकने वाले बात नहीं होगी | इतिहास ऐसे अनेक प्रसंगों से भरा हुआ है जब  दरवाजे पर शत्रु आकर ललकार रहा हो और उसकी  अनदेखी करते हुए हम अपने घर के झगड़ों में उलझे रहे | विदेशी आक्रमणों के प्रारम्भ में ही  हमारी ये चारित्रिक कमजोरी सामने आ गयी थी  | भले ही हमने दर्जनों मर्तबा आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया हो किन्तु हारकर जाने के बाद वे फिर वापिस आने की जुर्रत करते रहे क्योंकि उन्हें ये बात महसूस हो गयी कि इस देश को हराने में यहीं के लोग उनकी मदद करेंगे | अंततः उनकी सोच सही साबित हुई | पहले मुगल और उनके बाद  अग्रेजों ने भारत को सैकड़ों वर्षों तक गुलाम बनाकर रखा | इसका प्रमुख कारण भी हमारे देश की आंतरिक फूट ही थी | अकबर ने जिस तरह राजपूताने की एक - एक रियासत को अपने अधीन किया वह एकता के अभाव का परिणाम था | वरना तब तक वह बहुत ताकतवर नहीं था | ब्रिटिश सत्ता का आधिपत्य भी उन्हीं कारणों से हुआ और देखते - देखते अंग्रेज  पूरे भारत पर छा गये | लम्बी परतन्त्रता के बाद मिली आजादी के पीछे भी द्वितीय विश्व युद्ध  से उत्पन्न हालात थे | बावजूद उसके हमने पिछली  गलतियों पर जमी विस्मृतियों की धूल को साफ़ करने की कोशिश नहीं की और परिणामस्वरूप पूर्ण स्वराज हमें  एक खंडित देश के रूप में मिला |

ऐसा लगा था कि अब नए सिरे से  राष्ट्रनिर्माण में सभी एकजुट और एकमत रहकर काम करेंगे | लेकिन देश भाषा और प्रांत के झगड़ों में ऐसा उलझा कि निकल ही नहीं  पाया | वोट बैंक की सियासत ने जाति और धर्म की दीवारें खड़ी कर दीं |  लेकिन  ताजा सन्दर्भ भारत - चीन सीमा पर उत्पन्न तनाव के दौरान हो रही राजनीति है | जिससे स्पष्ट होता है कि सीमा पर दुश्मन की हरकतों से ज्यादा चिंता हमारे राजनेताओं को अपने सियासी स्वार्थों की है |

सीमा पर चीनी जमावड़े के बारे में सवाल उठाकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चीन द्वारा हमारी जमीन  कब्जा लेने का  आरोप लगाते हुए प्रधानमन्त्री को नरेंद्र मोदी की जगह सरेंडर मोदी कहकर सम्बोधित किया | गलवान घाटी में हुए सैन्य संघर्ष में मारे गये भारतीय सैनिकों का जिक्र करते हुए वे केंद्र सरकार को लगातार घेर रहे हैं | उनका आरोप है कि केंद्र सरकार की कमजोरी से हमारे जवान सस्ते में जान गंवा बैठे | प्रधानमन्त्री द्वारा बुलाई विपक्षी दलों की बैठक में भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार को घेरने में कोई भी संकोच नहीं किया | गत दिवस तो श्रीमती गांधी  के साथ ही राहुल और प्रियंका वाड्रा तीनों ने ट्विटर पर ताबड़तोड़ हमले सरकार पर किये | हालांकि विपक्ष के तकरीबन हर नेता ने प्रधानमंत्री का साथ देने के अलावा इस समय  राजनीति को परे रखने की समझाइश भी दी किन्तु कांग्रेस विशेष रूप से गांधी परिवार पर उसका प्रभाव नहीं पड़ा |

श्रीमती गांधी ने जो ताजा प्रश्न पूछा उसके अनुसार चीन ने हमारी कितनी जमीन दबा रखी है और उसे कैसे वापिस लिया जायेगा ? हालांकि ये प्रश्न सदैव ही उनके परिवार के गले का फंदा साबित हुआ क्योंकि चीन ने हजारों किमी भूमि  पर जो कब्जा जमा रखा है  वह उनकी पार्टी के शासनकाल में ही हुआ और उसे वापिस लेने की कोई कोशिश भी नहीं  की गयी | यहाँ तक कि सीमा का निर्धारण करने के बारे में भी कुछ नहीं हुआ |  उन्हें ये समझाने की कोशश भी हुई कि ऐसे प्रश्नों का उत्तर मांगने का ये उपयुक्त समय नहीं है क्योंकि सैन्य तैयारियों  की गोपनीयता और सैनिकों का मनोबल बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है | फिर भी जब गांधी परिवार दाना- पानी लेकर चढ़ाई करने पर आमादा बना रहा तब सत्ता पक्ष  ने पलटवार करते हुए पूछ लिया  कि डोकलाम विवाद के समय राहुल दिल्ली के चीनी दूतावास में क्या करने गए थे ? उसके बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कांग्रेस का कौन सा समझौता ज्ञापन (MOU ) हस्ताक्षरित हुआ ? चीन यात्रा के दौरान श्री गांधी की किस - किस चीनी नेता से क्या - क्या बात हुई ? गांधी परिवार के  साथ चीनी नेताओं की भेंट के चित्रों में  डॉ. मनमोहन सिंह किस हैसियत से खड़े हुए थे ?

जिस तरह राहुल को सरकार से उनके प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला ठीक वैसे ही गांधी परिवार ने उक्त सभी सवालों का जवाब देने की बजाय चुप्पी साध ली |  सरकार के पास उसके मौन के तो अनेक कारण हैं लेकिन  चीन के साथ अपने और कांग्रेस पार्टी के रिश्तों पर न गांधी परिवार कुछ बोल रहा है और न ही कांग्रेस पार्टी | उनकी तरफ से लगातार चीन द्वारा भारतीय भूभाग पर कब्ज़ा किये जाने और गलवान में भारत के सौनिकों के मारे जाने को मुद्दा बनाकर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किये  जाने का प्रयास चल रहा है | राहुल गांधी तो पूरे जोश  में आकर सीधे प्रधानमन्त्री पर ताबड़तोड़ हमले करने में जुटे हैं | इनका जनता  पर कितना असर हो रहा है ये तो कुछ समय बाद ही  पता चलेगा | लेकिन दोनों तरफ से चल रही सियासी गोलाबारी के बीच भाजपा ने गत दिवस दो ऐसे आरोप उछाल दिए जिनसे कांग्रेस को रक्षात्मक होना पड़ रहा है | 

भाजपा ने सनसनी फैलाते हुए खुलासा किया कि चीन की तरफ से राजीव गांधी फाउंडेशन को मोटी रकम मिली थी जिसके एवज में मनमोहन सरकार के समय चीन को व्यापार बढ़ाने में सहायता दी गयी | इसी के साथ एक और आरोप ये आ गया कि यूपीए सरकार के दौर में प्रधानमंत्री राहत कोष  से भी राजीव गांधी  फाउंडशन को भारी धन दिया गया | उल्लेखनीय है इस संस्था की प्रमुख सोनिया गांधी हैं और डॉ.मनमोहन सिंह तथा पी चिदम्बरम इसके सदस्य हैं |

इस प्रकार सत्ता पक्ष द्वारा गांधी परिवार और कांग्रेस पर जो आरोप लगाये गए वे बेहद संवेदनशील और गम्भीर हैं |  प्रधानमन्त्री राहत कोष से फाउंडेशन को यदि पैसा मिला तब वह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आयेगा किन्तु चीन के साथ कांग्रेस का कोई भी समझौता ज्ञापन और फिर राजीव गांधी फाउंडेशन नामक परिवारिक संस्था के लिये चीन  सरकार और दूतावास से धन प्राप्त करना कांग्रेस को भारी मुसीबत में डाल सकता है | ये आरोप भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के अलावा केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी लगाये  | आश्चर्य की बात ये है कि कांग्रेस या गांधी परिवार ने उक्त किसी भी मुद्दे या आरोप पर सफाई देना मुनासिब नहीं समझा और भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा कि वह सीमा पर चीन के अतिक्रमण  और गलवान में भारतीय सैनिकों के बलिदान को रोकने के तौर पर उजागर हुई असफलता और उस पर कांग्रेस द्वारा लगाये आरोपों से  जनता का घ्यान हटाने के लिए पुराने मामले उछाल  रही है |

कांग्रेस द्वारा चीन के साथ पार्टी और फाउंडेशन के अलावा गांधी परिवार के निजी संबंधों और आर्थिक लेनदेन पर कुछ न कहने से सत्ता पक्ष को और आक्रामक होने का अवसर मिल गया है |  सीमा पर उत्पन्न हालातों को लेकर अभी तक मोदी सरकार ने कुछ प्रतीकात्मक और बेहद औपचारिक बयान जरूर दिये किन्तु उनमें से कुछ के विवादास्पद हो जाने से कांग्रेस को हमलावर होने की गुंजाइश प्राप्त हुई थी  | विशेष रूप से श्री मोदी द्वारा दिए उस आश्वासन पर कि हमारी सीमा में न कोई  घुस आया और न ही घुसा हुआ है , हुए बवाल के बाद प्रधानमन्त्री कार्यालय को  स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा | रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस . जयशंकर के कुछ बयानों ने भी  केंद्र सरकार को  पशोपेश में डाल दिया लेकिन कांग्रेस को छोड़कर बाकी विपक्षी  पार्टियाँ वक्त की नजाकत को समझते हुए पूरी तरह से प्रधानमंत्री के साथ खड़ी हुई हैं | शरद पवार तो राहुल का नाम लिए बिना दो बार कटाक्ष कर  चुके हैं | लेकिन ऐसा लगता है गांधी परिवार इस मौके को छोड़ने के लिए राजी नहीं  है और श्री  मोदी से पिछ्ले सारे हिसाब पूरे करने में जुटा हुआ है |  

जवाब में कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने गत दिवस कुछ ऐसे  संगठनों को चीन से पैसा मिलने की जानकारी देते हुए भाजपा को घेरने का दांव चला जो उसके निकट हैं  किन्तु पार्टी और गांधी परिवार पर लगे किसी भी आरोप पर स्पष्टीकरण न दिया जाना संदेह को मजबूत कर रहा है | इसी आशय के कांग्रेसी आरोपों पर भाजपा की प्रतिक्रिया भी कुछ स्पष्ट नहीं करती |

हालाँकि सभी आरोप बेहद गंभीर हैं किन्तु सवाल ये है कि देश की दोनों बड़ी पार्टियों के बीच शुरु हुई इस जंग से चीन से निपटने की हमारी तैयारी क्या प्रभावित नहीं होगी ? राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर चीन के समक्ष आत्मसमर्पण का आरोप लगाकर राजनीतिक बढ़त लेने का जो दांव चला था वह कामयाब होने के पहले ही उनके परिवार और पार्टी पर शत्रु देश से प्यार - मोहब्बत वाले रिश्ते बनाने के साथ आर्थिक मदद लेने जैसा संगीन आरोप लग गया |

 कौन सच है कौन नहीं ये तो जाँच से पता चलेगा और क्या पता रात गयी , बात गयी की  परम्परा दोहरा दी जाए | लेकिन इन राजनीतिक दांव - पेंचों  से चीन के सामने हमारी आपसी फूट खुलकर सामने आ गयी है |

कहते हैं कि पानीपत की आख़िरी लड़ाई में बाबर ने पहले दिन के युद्ध की समाप्ति पर  भारतीय खेमे में जगह - जगह जलती  आग को देखकर सेनापति से पूछा ये क्या है ? और  जब उसे बताया गया कि भारतीय फौज में  शामिल विभिन्न जातियों के सैनिक एक साथ भोजन नहीं करते अपितु अपना - अपना अलग बनाते हैं तो ये सुनकर बाबर मुस्कुराते हुए सेनापति से बोला हमारी जीत पक्की है | जो फौज युद्ध के समय भी एक साथ बैठकर खाना नहीं  खा सकती वह एकजुट होकर क्या खाक लड़ेगी ?

सीमा पर गरज रहे युद्ध के बादलों के बावजूद भारत के भीतर चल रही राजनीतिक रस्सा खींच प्रतियोगिता की खबरें सुनकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी यदि बाबर की तरह मुस्करा रहे हों तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए |

भारत को घेरने के फेर में खुद घिर गया नेपाल



आखिर वही  हुआ जिसकी आशंका थी | चीन के उकसावे पर भारत से बेवजह टकराव मोल बैठा नेपाल अब अपने ही बनाये जाल में फंसता जा रहा है | नक्शा और विदेशी पत्नी की  नागरिकता जैसे कानून तो राष्ट्रवाद की आड़ में प्रधानमंत्री  केपी शर्मा ओली ने भारी बहुमत से पारित करवा लिए किन्तु उसके बाद सत्तारूढ़ गठबंधन में ही गांठ पड़ने लगी | पूर्व प्रधानमंत्री  और नेपाल में सशस्त्र माओवादी संघर्ष के अग्रणी नेता रहे पुष्प  कमल दहल प्रचंड ने श्री कोली पर  इस्तीफा देने का दबाव बना दिया है | सुना है पार्टी संगठन की  जिस बैठक में श्री  कोली के भविष्य का फैसला होना है उसमें भी वे अल्पमत में हैं | गत दिवस दोनों नेताओं के बीच मुलाकात में गतिरोध टालने का प्रयास हुआ किन्त्तु जैसी जानकारी आई  उसके अनुसार तो श्री  प्रचंड ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बिना किसी समझौते से इंकार करते हुए धमकी दे  डाली कि वे गठबंधन से  अलग होने में भी संकोच नहीं करेंगे | विवाद के दौरान ये बात भी उछली  कि श्री ओली अफगानिस्तान , पाकिस्तान और बांगला देश मॉडल से देश  को चलाना चाहते है | कुछ लोग इसे श्री  प्रचंड की महत्वाकांक्षा से जोडकर देख  रहे हैं तो कुछ का कहना है श्री कोली ने चीन की भटैती करते  हुए अनावश्यक रूप से भारत से पंगा लेकर  खुद को पाकिस्तान की तरह उसका पिट्ठू बना लिया |  यद्यपि ये बात सही है कि नेपाल में राजतंत्र के खात्मे और माओवादी सत्ता बनने के बाद से  चीन का दबदबा बढ़ता गया | श्री प्रचंड का पूरा सशस्त्र संघर्ष भी चीन से मिले शस्त्रों और संसाधनों से सफलता के मुकाम पर पहुंच सका | जिस तरह कश्मीर के पत्थरबाजों को पाकिस्तान से पैसा मिलता है ठीक वैसे ही नेपाल में चला माओवादी  संघर्ष चीन  के पैसे से ही संभव और सफल हो सका । और ये भी कि श्री प्रचंड प्रधानमंत्री की अपेक्षा चीन के ज्यादा निकट और विश्वासपात्र हैं | नेपाल की गद्दी पर बैठते ही जिन माओवादी शासकों ने भारत के साथ सम्बन्धों में ज़हर घोला उनमें श्री प्रचंड अग्रणी थे | लेकिन जिस अंदाज में श्री कोली भारत के विरोध में  उतरकर दो - दो हाथ करने पर आमादा हो गये उससे श्री प्रचंड जरूर  बचे | बहरहाल भारत - नेपाल संबन्धों में मौजूदा दौर सबसे ज्यादा टकराहट का है | अपनी गद्दी बचाने के लिए चीन  के चरण चुम्बन करने का जो अंदाज श्री कोली ने दिखाया उससे देश में चिंता का माहौल है | गत दिवस संसद में हिन्दी भाषा के उपयोग को रोकने संबंधी जो कोशिश हुई उसका मधेशी महिला सांसद ने जोरदार विरोध करते हुए कहा कि ये एक करोड़ मधेशियों को मुख्य धारा से अलग - थलग करने का षड्यंत्र है | इसी तरह  नेपाल की आबादी का एक बड़ा तबका ये मानता है कि चीन से कितनी भी नजदीकी हो जाये लेकिन बिना भारत के नेपाल साँस नहीं  ले पायेगा | प्रश्न केवल जरूरी चीजों की भारत के रास्ते होने वाली आपूर्ति का नहीं वरन लाखों नेपालियों का भारत में रोजगार के सिलसिले में रहना है | भारतीय सेना में तो बाकायदा गोरखा रेजिमेंट अंग्रेजों के ज़माने से चली आ रही है | इसके अलावा भी सामाजिक , सांस्कृतिक और धार्मिक तौर पर  दोनों देशों के बीच पुश्तैनी रिश्ते सामाजिक स्तर  पर कायम हैं | जिन्हें चीन के दबाव में आकर कोई भी सरकार आसानी से खत्म नहीं कर सकती | यद्यपि चीन ने नौजवानों में वामपंथी विचारधारा का प्रचार - प्रसार काफी हद तक कर दिया लेकिन अभी भी देश में एक वर्ग उससे न केवल अप्रभावित है बल्कि  इस बात के प्रति भी आशंकित है कि चीन देर सवेर नेपाल को भी तिब्बत की तरह हड़प लेगा | मौजूदा विवाद जिस तरह से अचानक बढ़ा उससे वहां के माओवादी भी नाराज है | उन्हें लग रहा है कि चीन का वैचारिक समर्थन और आर्थिक सहयोग गलत नहीं है लेकिन नेपाल के वामपंथियों के बीच एक वर्ग  ये भी सोचता है कि पूरी तरह चीन के अधीन चला जाना नेपाल की सार्वभौमिकता के लिए खतरनाक होगा |  इस बारे में ये  तर्क दिया जाता है कि जिस वियतनाम को अमेरिका  से लड़ने में  चीन ने पूरी मदद दी वह  भी उससे दूरी बनाकर चल रहा है | इसका कारण दक्षिण चीन के समुद्र पर चीन द्वारा एकाधिकार ज़माना है | उल्लेखनीय है वियतनाम भी साम्यवादी विचारधारा पर चलने वाला  देश है | उस दृष्टि से चीन को लेकर आशंका व्यक्त करने वाले नेपाली गलत नहीं हैं | ऐसा लगता है चीन ने पहले चरण में श्री  कोली को सत्ता में बनाये  रखने का लालच  देते हुए भारत विरोधी तमाम ऐसे फैसले करवा लिए जिनके कारण ये दोनों पड़ोसी एक दूसरे के  दुश्मन  बन जाएं | और जब उसका काम हो गया  तब वह खुद होकर नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता फैलाकर वहां  दखलंदाजी करने की जमीन तैयार कर  रहा है | ये जानते हुए भी कि नेपाल भारत के सामने  कहीं नहीं ठहरता उसने श्री कोली को ऐसे रास्ते पर आगे बढ़ा दिया जिससे लौटना कठिन है और अब उन्हीं के लिए मुसीबतें खडी कर  रहा है | इस अंतर्कलह से भारत को खुश  होने की बजाय सतर्क हो जाना चाहिये क्योकि पड़ोसी के घर में  लगी आग से अपना घर भी जलने का खतरा पैदा हो जाता है | बांग्ला देश का उदाहरण सामने है जिसकी जलन आज तक हमें परेशान कर रही है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 26 June 2020

भयभीत भले न हों लेकिन लापरवाही जानलेवा हो सकती है



दिल्ली स्थित एम्स (आखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) एक तरह से देश में चिकित्सा जगत का प्रतिनिधि संस्थान माना जाता है। कोरोना संकट में इसके निदेशक डा रणदीप गुलेरिया एक अधिकृत प्रवक्ता के तौर पर सामने आये हैं। समय - समय पर वे कोरोना के बारे में अपना आकलन प्रस्तुत करते रहे हैं। चूँकि एम्स देश का सबसे बड़ा सरकारी चिकित्सा और शोध संस्थान है इसलिए उसके प्रमुख द्वारा कही बात को सरकार का नीतिगत वक्तव्य भी माना जाता है। वे डा. गुलेरिया ही हैं जिन्होंने कोरोना को लेकर व्याप्त आशावाद को सबसे पहले दूर करते हुए कह दिया था कि उसका चरम जून - जुलाई में आयेगा और हमें उसके साथ रहने की आदत डालनी होगी। उनके बयान के पहले तक ये माना जाने लगा था कि 31 मई तक कोरोना का फैलाव रुक जाएगा। सरकार द्वारा लॉक डाउन को खत्म करते हुए जनजीवन को सामान्य बनाने के लिए एक जून से बहुत सारी बंदिशें हटा ली गईं। प्रमुख मार्गों पर चुनिन्दा रेल गाड़ियाँ शुरू करने के साथ ही सड़क परिवहन खोल दिया गया। हवाई सेवा भी कुछ सेक्टर्स के लिए प्रारंभ कर दी गई। बाजार, होटल, रेस्टारेंट प्रारंभ करने की अनुमति भी दे दी गई। एक तरफ डा. गुलेरिया द्वारा कोरोना का चरम आने की चेतावनी और दूसरी तरफ लॉक डाउन हटाने का फैसला परस्पर विरोधाभासी होने से सवाल उठे। लेकिन ये मानते हुए कि दो महीने से ज्यादा तक लॉक डाउन में रहते हुए जनता कोरोना से जुड़े शिष्टाचार सीख गई होगी , लॉक डाउन में इस उम्मीद से ढील दी गई कि लोग कोरोना संबंधी अनुशासन का पालन करेंगे। लेकिन जो नजारा देखने में मिला उससे सरकार के फैसले का औचित्य सवालों के घेरे में आ गया। ऐसा ही तब हुआ जब 40 दिनों के बाद शराब की बिक्री शुरू की गई थी। बाजारों में लोग जिस लापरवाही से मंडराते दिख रहे हैं उससे तो लगता ही नहीं कि देश एक भयंकर महामारी से जूझ रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग और सैनिटाइजर का उपयोग तो दूर की बात है, मास्क के उपयोग के प्रति भी लापरवाही साफ  नजर आती है। पुलिस द्वारा चालान भी किये जाते हैं किन्तु लोग हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे। जब शहरों की ये स्थिति है तब ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में लोगों की बेफिक्री का अनुमान सहज रूप से लगाया जा सकता है। जबकि कोरोना का फैलाव अब शहरों से इन क्षेत्रों में भी हो रहा है। प्रवासी श्रमिकों के लौटने के साथ ही लॉक डाउन में शिथिलता के बाद बाहर देश-विदेश में फंसे लोगों के घर लौटने के कारण भी कोरोना का संक्रमण अब तक अछूते रहे इलाकों तक आ पंहुचा। ऐसे में छूट का मतलब ये निकालना गलत है कि कोरोना अब मलेरिया जैसा सामान्य रोग हो गया है। डा. गुलेरिया की ताजा चेतावनी के अनुसार कोरोना का चरम जून के मध्य से शुरू होकर जुलाई के अंत तक जाने के बाद अगस्त के पहले हफ्ते से उसमें गिरावट आने की उम्मीद है। अन्य सूत्र भी ये मानकर चल रहे हैं कि कोरोना पर प्रभावी नियंत्रण सितम्बर आने पर ही महसूस होगा। लेकिन साथ ही ये भी चेताया जा रहा है कि कोरोना अंतिम रूप से विदा नहीं होगा। और कम से कम आगामी एक वर्ष तक हमें उससे बचाव हेतु सभी सावधानियां बरतनी होंगीं। इस बारे में अब घुमा-फिराकर बात करने की बजाय सरकार द्वारा भी साफ संकेत दे दिए गए हैं कि कोरोना से मुक्ति में देर है और वह पूरी तरह जाने वाला नहीं है। डा.गुलेरिया का ताजा बयान ऐसे समय आय है जब गत दिवस 18 हजार नये मामलों के साथ ही कुल कोरोना संक्रमितों की संख्या 5 लाख तक पहुंचने के कगार पर आ गई। नये संक्रमणों की संख्या रोज बढ़ने  से अब ये कहा जा सकता है कि जुलाई बीतते - बीतते देश में कोरोना संक्रमितों  का आंकड़ा 20 से 25 लाख तक पहुंच सकता है। निश्चित रूप से वह एक भयावह संख्या होगी लेकिन इसी के साथ ये तथ्य राहत पहुँचाने वाला है कि उनमें से तकरीबन 60 फीसदी स्वस्थ होकर लौट चुके होंगे। लेकिन जब तक नये संक्रमण का आंकड़ा ठीक होने वालों की संख्या से कम नहीं होता तब तक खतरा बरकरार रहने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। चूंकि देश भर में जांच की संख्या भी दिन ब दिन बढ़ रही है इसलिए भी नये मामले ज्यादा आने लगे हैं। कुल मिलाकर कोरोना में गिरावट के लिए अगस्त तक का इन्जार अवश्यम्भावी हो गया है। आज ही सरकार ने 12 अगस्त तक नियमित रेल सेवा बंद रखने की घोषणा कर तत्संबंधी संकेत भी दे दिए। लेकिन केवल डा. गुलेरिया और सरकार के अनुमान ही कोरोना के प्रकोप को नहीं रोक पायेंगे। इसके लिए जनता को भी अपने स्तर पर सतर्क और अनुशासित रहना होगा। सावधानी हटी , दुर्घटना घटी वाला नारा कोरोना के सन्दर्भ में बहुत ही प्रासंगिक हो चला है। कुछ लोग ये कहने से भी बाज नहीं आ रहे कि सरकार ने लम्बे लॉक डाउन के बाद अब जनता को बेसहारा छोड़ दिया। लेकिन ये बात बिलकुल सही है कि उसके बाद का लॉक डाउन समाज में अव्यवस्था और अराजकता का कारण बन जाता। दो माह से भी अधिक लोगों को घरों में बंद रखने के कारण कोरोना को प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रित रखा जा सका। तब तक उससे लड़ने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा खड़ा करने का काम किया गया। लेकिन जिस तेजी से नये मामले निकल रहे हैं उसके बाद भी कोरोना के हॉट स्पॉट देश के लगभग एक दर्जन महानगरों और नगरों में ही हैं। ऐसे में यदि जनता अपने स्तर पर सावधानी बरते तो वह इस जंग में सबसे बड़ा सहयोग होगा। कोरोना के फैलाव को रोकना काफी कुछ हमारे हाथ में है। कुछ शहरों और राज्यों ने ऐसा करके दिखा भी दिया है। भले ही कोरोना को लेकर आम जनों में शुरुवाती दौर में देखा गया डर नहीं रहा लेकिन जरा सी लापरवाही अपने और अपनों के लिए जानलेवा हो सकती है और इसीलिये हमें कोरोना से बचने के प्रति गम्भीर रहना होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 25 June 2020

जब एक व्यक्ति को बचाने लोकतंत्र की बलि दे दी गई!

जब एक व्यक्ति को बचाने लोकतंत्र की बलि दे दी गई!
बीते कुछ सालों से देश में अघोषित आपातकाल का भय पैदा करने का सुनियोजित अभियान चल रहा है। ये प्रचार भी किया जाता रहा कि अभिव्यक्ति का गला घोंट दिया गया, संवैधानिक संस्थाओं की आज़ादी खत्म हो रही है तथा देश तानाशाही की तरफ  बढ़ रहा है। धर्म निरपेक्षता को खतरे में बताने वालों ने भी जमकर हल्ला मचाया जिसमें कुछ टीवी चैनल भी अग्रणी थे। लेकिन इस समूचे अभियान में सबसे रोचक बात ये रही कि जिस कांग्रेस के राज में 45 साल पहले देश को आपातकाल में जकड़कर अभिव्यक्ति तो क्या जीने का मौलिक अधिकार तक छीन लिया गया वही इस प्रचार में अगुआ है। उसके पीछे वे वामपंथी विचारक आ खड़े हुए जिन्हें आपातकाल किसी वैचारिक क्रांति का सूत्रपात लगता था। लेकिन गत वर्ष देश की जनता ने उस प्रचार अभियान की हवा वैसे ही निकाल दी जैसी 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में इदिरा गांधी की सत्ता पलटकर निकाली थी। ये भी संयोग है कि उस चुनाव में भी अमेठी में कांग्रेस हारी और 2019 के चुनाव में भी इतिहास दोहराया गया। 25 और 26 जून 1975 की दरम्यानी रात में जब पूरा देश नींद के आगोश में था तब तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया और समूचे विपक्ष को जेल में ठूंस दिया। जयप्रकाश नारायण , अटलबिहारी वाजपेयी , लालकृष्ण आडवाणी , मधु लिमये , मधु दंडवते , कर्पूरी ठाकुर जैसे बड़े - बड़े नेताओं को देश के लिए संकट बताकर सलाखों के पीछे भेज दिया। अखबारों पर सेंसर लग गया। लोकसभा का चुनाव एक वर्ष टालने जैसा अभूतपूर्व निर्णय किया गया। विपक्ष विहीन संसद इंदिरा जी की दरबारी बनकर रह गई। कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने इंदिरा ही भारत और भारत ही इंदिरा जैसा बयान देकर चाटुकारिता का नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। 19 महीने बाद जब इंदिरा जी को लगा कि विपक्ष पूरी तरह मरणासन्न है तब अचानक 1977 शुरू होते ही उन्होंने लोकसभा चुनाव का ऐलान करवा दिया। लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी पर लगे प्रतिबन्ध के बावजूद जनता ने मौन क्रांति के जरिये इंदिरा जी को सत्ता से ही नहीं अपितु संसद तक से बाहर कर दिया। स्वाधीन हिन्दुस्तान के इतिहास का वह काला अध्याय आज की पीढी को नहीं पता क्योंकि दलगत राजनीति 'मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थूÓ पर आधारित है। हालाँकि बाद में आपातकाल के कुछ भुक्तभोगियों ने ही 1977 के जनादेश का जबर्दस्त अपमान किया जिससे कि देश फिर उन्हीं ताकतों के हाथ चला गया जो प्रजातंत्र के नाम पर परिवार की सत्ता के सिद्धांत के पक्षधर रहीं। बहरहाल उन ताकतों को लगातार दो बार पटकनी देकर देश ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र की कीमत पर उसे कुछ भी स्वीकार नहीं है। 2019 का जनादेश भले ही नरेंद्र मोदी के नाम लिखा गया हो लेकिन सही अर्थों में उससे उस राजनीतिक संस्कृति से मुक्ति का रास्ता साफ़ हो गया जो देश को निजी स्वार्थों की आग में झोकने पर आमादा थी। ऐसी तमाम ताकतों के गठजोड़ को मतदाताओं ने पूरी तरह नकारते हुए अपात्काल लगाने वाली मानसिकता की जड़ों में ही मठा डाल दिया। उस दृष्टि से आज का दिन बड़े ही ऐतिहासिक महत्व का है। भारत के भविष्य की कर्णधार युवा पीढ़ी को आपातकाल के उस अंधकारपूर्ण दौर के बारे में बताये जाने की जरूरत है जिससे कि सत्ता से वंचित कुंठाग्रस्त तबका आपातकाल को लेकर भय का जो भूत खड़ा करने पर आमादा है उसकी सच्चाई सामने आये। दरअसल भारत के टुकड़े करने वाली मानसिकता पर किये जा रहे प्रहार से बौखलाये तथाकथित प्रगतिशील लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए निरंतर पराजय झेलने मजबूर हैं। ऐसे में उनके पास सिवाय मिथ्या प्रचार करने के और कोई रास्ता नहीं बच रहता। दुर्भाग्य से कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी भी शहरी नक्सलियों की गैंग के चक्रव्यूह में फंसकर अपनी छवि और विश्वसनीयता पर खुद ही सवालिया निशान लगा लेती है। आपातकाल की यह वर्षगांठ जनता को इस बात के लिए सचेत करती है उसकी उदासीनता लोकतंत्र के लिए कितनी भारी साबित हो सकती है। आपातकाल लगने के 45 साल बाद भी उस दिन की यादें भयाक्रांत कर देती हैं जब एक व्यक्ति की सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र को सूली पर चढ़ाने का पाप किया गया था।
 - रवीन्द्र वाजपेयी

सतर्कता जरूरी क्योंकि चीन और धूर्तता समानार्थी हैं




उच्चस्तरीय सैन्य वार्ता के बाद गत दिवस संयुक्त सचिवों के बीच भारत-चीन की सीमा पर पूर्वी लद्दाख इलाके से दोनों देशों की सेना के पीछे हटने के साथ ही स्थितियां पूर्ववत सामान्य बनाने के तौर-तरीके और समय सीमा निश्चित करने पर बातचीत हुई। ऐसा लगने लगा था कि 15 जून की रात गलवाल घाटी में जो कुछ भी हुआ उससे चीन ने सबक लिया। खास तौर पर जैसा बताया गया उसके अनुसार बातचीत करने गई भारतीय सैन्य टुकड़ी पर चीनी सैनिकों के अचानक हुए हमले के बाद भारतीय सैनिकों ने जो पलटवार किया उससे चीनी पक्ष को काफी नुकसान हुआ। उसकी तरफ से मृतक सैनिकों की संख्या नहीं बताया जाना भी ये साबित कर रहा है कि उस रात चीनी पक्ष की जमकर धुनाई हुई। यद्यपि ये भी सही है कि देर रात तक चले संघर्ष में दोनों तरफ के 50 से ज्यादा सैनिकों के मारे जाने और 100 से अधिक के घायल होने के बाद भी अगले दिन सुबह-सुबह से ही दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच बातचीत सामान्य माहौल में शुरू हो गई। जिसका सिलसिला तब से लगातार जारी है। ये एहसास भी निकलकर आया कि चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय टुकड़ी पर किया गया हमला वहां की सेना या सरकार की किसी कार्ययोजना का हिस्सा न होकर मौके पर तैनात फौजी कमांडर और उनके मातहत सैनिकों का अपना फैसला था। लेकिन जिस तरह चीन के विदेश मंत्री सहित बाकी प्रवक्ताओं ने गलवाल घाटी को चीन का भूभाग बताते हुए उलटे भारतीय सेनाओं द्वारा उनके इलाके में घुसने का आरोप लगाया उससे ये संदेह पुख्ता हुआ कि वह विवाद चीन की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था जिसके जरिये वह सीमा पर युद्ध के हालात पैदा करते हुए भारत पर अनावश्यक दबाव बनाना चाहता था। गत दिवस संयुक्त सचिवों की बातचीत खत्म होते ही ये खबर आने लगी कि गलवान घाटी से अपना डेरा उठाने के लिए राजी होने के बाद बजाय पीछे हटने के चीनी सेनाएं नए सिरे से वहां अपनी ताकत बढ़ाने में जुट गई हैं। गलवाल घाटी के अलावा पेंगांग झील के क्षेत्र में भी वह दोनों देशों के बीच खाली पड़ी भूमि पर कब्जा बनाये रखने के लिए साजो-सामान जुटा रहा है। कूटनीति के जानकार ये मान रहे हैं कि भारत के रक्षा और विदेश मंत्री का एक साथ  रूस जाना चीन को सशंकित कर रहा है। यद्यपि ये दौरा अचानक तय नहीं हुआ लेकिन रूस से सैन्य सामग्री की आपूर्ति शीघ्र किए जाने के आश्वासन के साथ ही भारत-चीन विवाद में टांग न फंसाने के रूसी ऐलान के बाद चीन को ऐसा लगा कि भारत उसे घेरने का दांव चल रहा है। अमेरिका और आस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों द्वारा भारत के पक्ष में खड़े होने से वह बौखलाया तो है ही। दरअसल उसे ये उम्मीद कतई नहीं थी कि भारत सैन्य और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर कड़ी चुनौती पेश करेगा। मई माह में चीनी हलचलों की जानकारी मिलते ही भारत ने भी चीन के साथ लगी पूरी सीमा पर जवाबी मोर्चेबंदी कर दी। यहाँ तक कि वायुसेना तक की तैनाती कर दी गयी। यद्यपि बीते दस दिनों से किसी भी तरह के सैन्य टकराव की जानकारी नहीं आई किन्तु चीन द्वारा अपने जमावड़े में और वृद्धि के साथ ही गलवान घाटी और पेंगांग झील के तटस्थ इलाकों से हटने की बजाय दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में हलचल बढ़ा दी गई है। उल्लेखनीय है ये वह सीमांत क्षेत्र है जहाँ भारत ने एक हवाई पट्टी बनाई है। विश्व में सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित इस हवाई पट्टी पर लड़ाकू विमानों के अलावा बड़े मालवाहक भी सफलता पूर्वक उतर सकते हैं। इसके कारण इस दुर्गम इलाके में भारतीय सैनिकों एवं सामग्री की आवाजाही सुगम हुई वहीं दूसरी तरफ किसी भी संकट के समय वायुसेना भी बिना देर किये हमले के लिए तैयार रहेगी। चीन इस क्षेत्र में सड़क आदि बनाने का विरोध करता रहा है लेकिन उसकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भारत ने जब हवाई पट्टी बना ली तबसे वह और भन्नाया है। ऐसे में बड़ी बात नहीं वह सैन्य और सचिव स्तर पर सेना को पीछे हटाने पर बनी सहमति के बावजूद वही सब कर रहा है जिसके लिए वह कुख्यात है। ऐसा लगता है विश्व जनमत की नाराजगी से बचने के लिए चीन एक तरफ तो वार्ता-वार्ता खेल रहा है और दूसरी तरफ दबाव बनाकर भारतीय जमीन कब्जाना चाहता है। ये भी हो सकता है कि वह भारत में हो रहे चीनी उत्पादों के विरोध से रुष्ट हो। भारत सरकार द्वारा अनेक चीनी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया गया तथा कुछ पर और बढ़ाया जाने वाला है। चीन की नजर में ये भी अप्रत्यक्ष तौर पर युद्ध ही है। इसलिए हो सकता है वह सीमा पर तनाव बनाये रखकर आर्थिक मोर्चे पर भारत द्वारा उठाए जा रहे कदमों को पीछे लौटाने का दबाव बना रहा हो। सच्चाई जो भी हो लेकिन चीन की हर चाल पर नजर रखना जरूरी है क्योंकि वह कूटनीतिक शिष्टाचार का पालन करते हुए आसानी से अपने सैन्य जमावड़े को पीछे नहीं हटाएगा। ये देखते हुए किसी आशावाद में डूबे बिना भारत को चीन के चरित्र को ध्यान में रख फैसले लेने चाहिए। सीमाओं पर शान्ति बनाये रखना जरूरी है लेकिन शत्रु पक्ष यदि चालाकी पर ही आमादा है तब उसे माकूल जवाब देने की तैयारी भी रखनी चाहिए क्योंकि चीन और धूर्तता एक दूसरे के पर्याय हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी