Monday, 6 July 2020

मंत्री काबिल हो तो किसी भी विभाग को महत्वपूर्ण बना सकता है। पद या विभाग नहीं काम दिलाता है सम्मान





मप्र में नया मंत्रीमंडल बन गया | इसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर आये अनेक  विधायकों को भी प्रमुखता से स्थान मिला | लेकिन उस वजह से भाजपा के तमाम वरिष्ठ विधायकों का पत्ता तो कटा ही प्रदेश के अनेक क्षेत्र मंत्रीमंडल में प्रतिनिधित्व पाने से वंचित रह गए | इस वजह से भाजपा के भीतर तो असंतोष है ही लेकिन अभी तक मंत्रियों को विभागों का बंटवारा भी नहीं हो सका 
। जैसी कि खबर है उसके अनुसार मुख्यमंत्री को इस कार्य के लिये हायकमान के पास जाना पड़ रहा है | पार्टी अनुशासन के लिहाज से ये अच्छा माना जा सकता है।| कांग्रेस में तो नेहरु युग से ही केन्द्रीय संगठन द्वारा प्रादेशिक इकाइयों के निर्णय लेने की  स्वतंत्रता सीमित कर दी  गई थी जो इंदिरा जी का दौर आते तक पूरी तरह से खत्म हो गई | लेकिन शनैः शनैः सभी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र केवल दिखावे तक सीमित रह गया | असलियत में चाहे पार्टी क्षेत्रीय हो या राष्ट्रीय उसकी स्थानीय इकाई तो छोड़ दीजिये प्रादेशिक संगठन तक ज़रा - ज़रा सी बात में हायकमान की तरफ देखने मजबूर कर दिया गया है |

लेकिन संदर्भित मसला मंत्रियों के विभागों के बंटवारे का है | सिंधिया समर्थक जो मंत्री बनाये  गये वे अपने लिए ऐसे विभाग चाहते हैं जो ताकतवर या राजनीतिक शब्दावली  में मलाईदार कहे जाते हैं | दूसरी तरफ मुख्यमंत्री चाह रहे हैं कि भाजपा के कोटे से मंत्री बने लोगों को प्रभावशाली विभाग दिए जा सकें जिससे कि सरकार पर उनका नियन्त्रण बना रहे | ये बात सर्वविदित है श्री सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा  में आने के बाद भी बागी विधायकों की निष्ठा उनके राजनीतिक आका ज्योतिरादित्य में ज्यादा है | और ग्वालियर राजपरिवार के इस वारिस को भी ये लगता होगा कि पार्टी में अपना समानांतर रुतबा बनाकर रखा जाए जिससे पूछ्परख होती रहे | वरना  भाजपा सदृश कैडर आधारित पार्टी में रहकर स्वतंत्र अस्तित्व बरकरार रखना बेहद कठिन है |

लेकिन राजनीति से थोड़ा अलग हटकर देखें तो सरकार में महत्वपूर्ण विभाग नामक अवधारणा राजनेताओं के मानसिक खोखलेपन और अक्षमता को उजागर करती हैं | मंत्रीमंडल सामूहिक जिम्मेदारी पर कार्य करता है जिसमें सभी मंत्री समान होते हैं |  प्रधानमन्त्री अथवा मुख्यमंत्री की हैसियत समानों में बड़े ( Elder amongst Equals )  मानी जाती है | ऐसे में जबकि सभी मंत्री एक समान होते हैं तब विभागों को लेकर खींचातानी , सौदेबाजी , नाराजगी क्यों होती है , ये बड़ा सवाल है | मप्र में ही नहीं अपितु और भी राज्यों में  चाहे सरकार  एक दल की हो या मिली जुली , ये नजारा साफ  तौर पर दिखाई  देता है | विभाग चयन का आधार  ये होता है कि उसके पास कितना ज्यादा बजट और प्रशासनिक उथलपुथल मचाने की गुंजाईश है | और फिर कौन से विभाग के मंत्री को सबसे ज्यादा प्रचार मिल सकता है ..वगैरह वगैरह | लेकिन इस जद्दोजहद में उलझे राजनेता ये भूल जाते हैं कि सरकारी महकमे में कोई भी ऐसा नहीं होता जिसे महत्वहीन कहा जा सके | ये तो सम्बन्धित मंत्री पर निर्भर करता है कि कैसे अपने विभाग को महत्वपूर्ण बना दे | वर्तमान केन्द्र सरकार में नितिन गडकरी को ही लें तो महाराष्ट्र में शिवसेना - भाजपा की संयुक्त सरकार में लोकनिर्माण  विभाग के मंत्री के तौर पर उन्होंने जो कारनामा कर दिखाया उसकी वजह से भ्रष्टाचार के लिए बदनाम माने जाने वाले इस विभाग में रहने के बाद भी उन्होंने राष्ट्रव्यापी ख्याति और प्रशंसा अर्जित की | जब 2014 में  नागपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर वे मोदी सरकार में मंत्री बने तब भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते  लोगों को  अपेक्षा थी कि उन्हें गृह , रक्षा अथवा उनके व्यवसायिक अनुभव को देखते हुए वित्त या उद्योग जैसा मंत्रालय मिलेगा लेकिन मिला परिवहन जैसा विभाग | लेकिन उन्होंने अपनी  कार्यकुशलता से इस विभाग को सरकार की उपलब्धियों का पर्याय बना  दिया | मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में विदेश मंत्री रहीं सुषमा स्वराज को लेकर ये प्रचार काफी चला कि प्रधानमन्त्री उन्हें उभरने ही नहीं देते थे | विदेशी दौरों में भी मोदी - मोदी के नारे सुनाई देने से उक्त कथन की पुष्टि होती दिखी लेकिन सुषमा जी ने खराब स्वास्थ्य के बावजूद विदेश मंत्रालय के मानवीय पक्ष को जिस कुशलता से सामने लाते  हुए उस तक  आम भारतीय की पहुंच स्थापित की वह बहुत बड़ा काम  था | विदेशों में संकट से घिरे भारतीयों को निकालने के खतरे से भरे अभियानों को उन्होंने जितने बेहतरीन तरीके से पूरा किया वह अब इतिहास बन चुका है | इस प्रकार उपेक्षा के तमाम किस्सों से अविचलित रहते हुए सुषमा जी ने विदेश मंत्रालय को पहली बार देशवासियों के सामान्य सरोकारों से जोड़कर दिखा दिया कि हर विभाग महत्वपूर्ण होता है | मप्र में स्व. बाबूलाल गौर का नाम भी कर्मठता के  प्रतीक के तौर पर लिया जाता है जिन्होंने बुलडोजर चलवाकर पूरे प्रदेश में जबरदस्त तोड़फोड़ की लेकिन जनता उनकी उस कार्यशैली पर फ़िदा हो गई |  

केरल की वर्तमान वाममोर्चा सरकार की स्वास्थ्य मंत्री के. के. शैलजा कोरोना संकट के दौरान अपने परिश्रम और सूझबूझ से पूरे देश में चर्चित और प्रशंसित हुईं | राज्य के मुख्यमंत्री से ज्यादा केरल के बाहर शैलजा टीचर कहलाने वाली इस मंत्री को डंका बज रहा है |

मनमोहन सिंह की सरकार में बतौर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अपनी छाप छोड़ी थी | स्व. जार्ज फर्नांडीज थे तो श्रमिक नेता लेकिन वाजपेयी सरकार के रक्षा मंत्री के तौर पर उन्होंने सियाचिन सहित दूसरे दुर्गम स्थानों पर पदस्थ सैनिकों की तकलीफों को समझकर रक्षा मंत्रालय की सोच को और व्यवहारिक बनाया | हमारे देश में अब तक अनेक प्रधानमन्त्री बन चुके लेकिन उनमें से कुछ ही पद से हटने के बाद भी जनमानस में प्रतिष्ठित हैं जबकि बाकी के सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में सिमटकर रह गये | यही स्थिति राष्ट्रपति पद की है | इस पद को राजनीति का अंत समझा जाता है | लेकिन डा. एपीजे कलाम ने इस पद को जो लोकप्रियता और सम्मान दिलवाया उतना तो अनेक प्रधानमन्त्री भी नहीं पा सके |

उपरोक्त उदहारण तो मात्र संकेत हैं | कहने का आशय ये है कि मंत्री पद के लिए झगड़ने के बाद  महत्वपूर्ण विभाग प्राप्त करने के लिए की जाने वाली मशक्कत से सम्बन्धित व्यक्ति के मन में व्याप्त हीन भावना ही व्यक्त होती है | वैसे ये दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे देश में शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर बातें तो बड़ी - बड़ी होती हैं लेकिन इन विभागों को उतना महत्व मिलता है जितना गृह , वित्त , विदेश , या लोक निर्माण विभाग को मिलता है |

ये देखते हुए मंत्री बन जाने के उपरांत भी अपनी मर्जी के विभाग से वंचित रह जाने वाला नेता जब रूठा या निराश दिखता है तब उसकी अक्ल पर हंसी आती है | आज  तक किसी भी मंत्री ने ये कहकर मंत्री पद नहीं त्यागा कि जो विभाग उसे दिया गया , वह उसे संभालने के लिए सक्षम या योग्य नहीं था |

इसी वजह से बीते काफी समय से सेवानिवृत्त नौकरशाहों को सरकार का हिस्सा बनाने का चलन शुरू हो गया | डा. मनमोहन सिंह स्वयं नौकर शाह रहे | देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे मनोहर सिंह गिल भी उनकी सरकार में मंत्री बने | मोदी सरकार ने हरदीप पुरी , आर के सिंह , जनरल वी.के. सिंह , सतपाल सिंह और अब एस.जयशंकर को मंत्री बनाया | देश के अनेक राज्यों में पूर्व सरकारी अफसर राजनीति में उतरकर सरकार का हिस्सा इसलिए बनाये जाने लगे क्योंकि चुनाव जीतकर आये पेशेवर राजनेता अपनी योग्यता और क्षमता से बाहर जाकर पद के लिए अड़ने लगे | हाल ही में दिवंगत हुए अजीत जोगी ने आईएएस की नौकरी छोड़कर मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया |
प्रजातंत्र की बेहतरी इसी में है कि ऐसे काबिल लोग मंत्री बनाये जाएं जिनकी लार किसी विभाग विशेष के लिए टपकने की बजाय , वे इस बात के लिए कटिबद्ध हों कि जो भी मंत्रालय उन्हें मिलेगा उसे वे महत्वपूर्ण बना देंगे | संचार क्रांति के प्रादुर्भाव और विकास के पैमाने वैश्विक स्तर पर तय होने के बाद अब योग्यता , क्षमता , कार्यकुशलता तथा समयबद्ध पारिणाम मूलक कार्यशैली ही किसी नेता को प्रतिष्ठा दिलवा सकती है |

 किसी अनुभवी व्यक्ति का ये कथन महत्वपूर्ण मंत्रालय के लिए साष्टांग दंडवत  करते हुए मंत्रियों के लिए प्रेरणादायक है कि यदि सफलता की कोई राह है तो मैं उसे तलाशकर रहूंगा और यदि नहीं मिली तो खुद बना लूंगा |

इस सम्बन्ध में उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का उदाहरण सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है | वे अपने पिता स्व. बीजू पटनायक के विपरीत बिना किसी तामझाम के बतौर मुख्यमंत्री का काम करते हुए जनता के मन में जगह बना चुके हैं | आज के दौर में पांचवी बार सरकार बना लेना ये साबित करता है कि पद या महकमा नहीं आपका काम और उसका परिणाम मायने रखता है |

पुलिस , प्रशासन और राजनीति के गठजोड़ का परिणाम है विकास




बीते सप्ताह कानपुर  के बिकरू गाँव  में विकास दुबे नामक एक कुख्यात गैंग्स्टर के घर पर दबिश देने गयी पुलिस टुकड़ी पर हुए जवाबी हमले में एक अधिकारी सहित 8 पुलिस वाले मारे गए। जो विवरण सामने आया उसके अनुसार गैंग्स्टर के घर के भीतर से पुलिस दल पर वैसे ही फायरिंग की गयी जैसे कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों द्वारा घेर लिए जाने पर आतंकवादी करते हैं। घटना के बाद विकास फरार हो गया। पुलिस की टीमें बड़े पैमाने पर उसकी खोज में जुट गईं हैं। चूँकि इस वारदात में पुलिस वाले जान से हाथ धो बैठे इसलिए विकास को किसी भी कीमत पर तलाश लिया जाएगा। गत दिवस उसका घर जेसीबी मशीन से धराशायी कर  दिया गया। शेष संपत्ति भी जप्त की जा रही है। लेकिन ये घटना केवल यहीं तक सीमित नहीं है। विकास का उसके गाँव में सियासी दबदबा है। वह और उसकी पत्नी स्थानीय निकाय में चुनाव जीतते रहे हैं। उसके अपराधों की फेहरिस्त में जो सबसे  बड़ी घटना है वह हमारे देश की पुलिस और न्यायपालिका दोनों को कठघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त है। वर्ष 2001 में विकास ने थाने के भीतर घुसकर राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त संतोष शुक्ल की हत्या कर दी थी । उस दौरान दो पुलिसकर्मी भी मारे गए। पूरा थाना चश्मदीद गवाह था। लेकिन अदालत में सब के सब मुकर गये। सेवानिवृत्ति के एक दिन पहले न्यायाधीश ने विकास को सबूतों के अभाव में बाइज्ज्त बरी कर  दिया। एक मंत्री स्तर के व्यक्ति के  साथ ही दो पुलिस कर्मियों की हत्या के मामले में राज्य सरकार को ऊपरी अदालत  में अपील करनी थी किन्तु तत्कालीन सपा सरकार ने मामला आगे नहीं बढ़ाया जिससे विकास के हौसले और बुलंद होते गए। ताजा घटना के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार किसी मामले में पुलिस विकास को घर जाकर दबोचने वाली थी। लेकिन थाने से फोन करके उसे अग्रिम जानकारी किसी ने दे दी। यहीं नहीं तो पूरे गाँव की  बिजली  भी बंद कर दी गयी। पुलिस टुकड़ी जब उसे पकड़ने पहुँची तब तक विकास के घर से उस पर पूरी तरह से हमले की तैयारी की जा चुकी थी। आगे की जानकारी सर्वविदित है। जाँच में जो बातें सामने आईं हैं उनके अनुसार विकास के पालतू गुर्गे  पुलिस महकमे के साथ बिजली विभाग में भी बैठे हैं। इसके पीछे उसका आतंक है या पैसे की मार ये तो फि़लहाल स्पष्ट नहीं हुआ  लेकिन पकड़े गए विकास के नौकर से इस बात की पुष्टि हो गई है कि पुलिस द्वारा दबिश दिए जाने की  जानकारी विकास को  संबंधित थाने के ही किसी स्टाफ ने दी और इसी तरह गाँव में अँधेरा कर देने में बिजली कर्मी सहयोगी बने। वैसे इस घटना से लोगों को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। यदि 8 पुलिस वाले न मारे गये होते तब घटना को रोजमर्रे की गैंगवार मानकर हवा में उड़ा दिया जाता। चूंकि राज्य की योगी  सरकार पर खराब कानून व्यवस्था का आरोप लगा इसलिए उसने ताबड़तोड़ कार्र्वाई करते हुए विकास का घर गिरा दिया। लेकिन अब तक उसका पकड़ा नहीं जाना ये दर्शाता है कि पुलिस के भीतर बिके हुए लोग उसे बचाने में लगे हैं। राज्य के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने साफ़ - साफ़ कहा कि विकास दुबे पुलिस विभाग की  उदासीनता का प्रमाण है और वे खुद को भी  उस पाप से अलग नहीं कर पा रहे। टीवी पर चर्चा के दौरान श्री सिंह ने अपने कार्यकाल में ऐसे अपराधियों को मुठभेड़ के दौरान गोली  मार दिए जाने का  भी जिक्र किया। जांच हेतु बनाई गयी टीमें विकास के राजनीतिक और प्रशासनिक संपर्क तलाशने में जुट गई है। उसके मोबाइल कॉल का विवरण भी  खंगाला जा रहा है जिससे पता लगाया जा सके कि उसका किस - किस से जुड़ाव रहा। लेकिन इसके पहले ही उसे तलाशकर एनकाउंटर कर दिया जावे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि उसके पकड़े जाने से अनेक चेहरों पर कालिख पुत जायेगी। पूरी तरह फि़ल्मी अंदाज में आगे बढ़ रहे इस अपराधिक प्रकरण ने एक बार फिर अपराधी  सरगनाओं की  पुलिस और राजनेताओं के बीच गहरी पैठ को उजागर कर दिया है। हालांकि विकास इस बार बहुत बड़ी गलती कर गया। अभी तक जिस खाकी वर्दी के कारण वह सुरक्षित रहा उसी पर चूँकि उसने खून के छींटे डाल दिए ,  इसलिए  उसकी शामत आना सुनिश्चित है। यदि मरने वाले किसी किसी दूसरे तबके के होते तब शायद उसका  कुछ भी नहीं बिगड़ता। उसके घर पर दबिश के दौरान गाँव में अँधेरा किये जाने से न जाने कितने साक्ष्य हाथ से निकल गये। हो सकता है पुलिस घटना के समय उसके वहां होने की बात को ही साबित न कर सके। कुल मिलाकर ये घटना है तो कानपुर के निकटवर्ती ग्राम की लेकिन इसकी प्रासंगिकता पूरे देश में महसूस की जा सकती है। ये खबर भी मिल रही है कि मीडिया के अलावा समाज के विभिन्न तबके बजाय कसूरवार मानकर उसे कड़ी सजा  दिए जाने की हिमायत करने के , उसके बचाव में तर्क दे रहे हैं। जिससे साफ़ हो रहा है कि विकास के जाल में तरह-तरह की मछलियाँ फंसी हुई हैं। देखने वाली बात ये होगी कि वह पकड़ा जाता है या नहीं? और यदि हाँ , तो क्या उससे जुड़े पुलिस और प्रशासन के अधिकारी तथा राजनीतिक नेतागण पर भी शिकंजा कसा जाएगा? अथवा पिछली बार की तरह इस बार भी सबूतों के अभाव में वह अदालत से  दोषमुक्त साबित होकर कानून के राज का मजाक बनाता घूमेगा?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 July 2020

सावधान, अभी तक टीका नहीं आया उसकी खबर भर आई है



गत दिवस कोरोना के नए मामलों का सबसे बड़ा आंकड़ा सामने आया। 24 घंटे में 23 हजार नए संक्रमण आने के बाद ये साफ़ हो गया कि अब महज चार दिन में एक लाख मरीज बढ़ने की स्थिति आ गयी है। जो निरंतर और नजदीकी होते- होते उस बिंदु पर जा पहुंचेगी जिसे चरमोत्कर्ष कहा जा रहा है। दिल्ली स्थित एम्स के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया ने तो पहले ही जुलाई में कोरोना के सर्वोच्च स्तर को छूने की चेतावनी दी थी। हालाँकि उसी के साथ उन्होंने ये उम्मीद भी जताई थी कि जुलाई के अंत और अगस्त के शुरू होते ही संक्रमण कम होने लगेगा। इस आशावाद का आधार जरूर उन्होंने जाहिर नहीं किया। और भी स्रोतों से ये कहा जा रहा है कि कोरोना का प्रकोप कुछ समय बाद बढ़ना रुक जाएगा। लेकिन पूरी तरह से उससे मुक्ति मिलते तक 2020 खत्म हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा। उल्लेखनीय है मार्च में लॉक डाउन लगते समय ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन बांटने की योजना का एलान कर दिया था। उसी समय कुछ जानकारों ने ये भविष्यवाणी कर दी थी कि कोरोना जून तक खिंचेगा और इसीलिए सरकार ने जनअसंतोष फैलने से रोकने के लिए गरीबों के पेट भरने की व्यवस्था कर दी। बीते 30 जून को प्रधानमंत्री ने एक बार फिर गरीबों को मुफ्त अनाज देने की योजना को नवम्बर तक बढ़ा दिया। वैसे इसे बिहार विधानसभा चुनाव की दृष्टि से भी देखा जा रहा है लेकिन मुख्य बात ये है कि कोरोना संक्रमण के अंतिम चरण में पहुंचने तक दिसम्बर आ ही जाएगा। अब सवाल ये भी उठता है कि चिकित्सक और सरकार दोनों किस आधार पर सोचते हैं कि साल खत्म होते तक कोरोना की बिदाई हो जायेगी ? और इसका सीधा-सरल जवाब ये है कि पूरी दुनिया में वैज्ञानिक इन दिनों कोरोना का टीका (वैक्सीन) बनाने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं। गत दिवस भारत सरकार द्वारा ये संकेत दे दिया गया कि हमारा देश भी कोरोना का टीका विकसित करने के नजदीक आ चुका है । उसका मानव पर परीक्षण करने के अनुमति भी दे दी गयी है। और यदि कोई विशेष बाधा नहीं आई तब आगामी 15 अगस्त को उसकी विधिवत घोषणा भी कर दी जायेगी। ये बात भी सुनने आ रही है कि दुनिया की अनेक दवा कंपनियों द्वारा भी कोरोना का टीका बनाने का काम भारत की कंपनियों को मिला है। इस प्रकार देश का फार्मा सेक्टर पूरे विश्व को कोरोना  वैक्सीन की आपूर्ति कर सकेगा। भरात सरकार द्वारा गरीबों के लिये मुफ्त अनाज की योजना को नवम्बर तक बढ़ाए जाने की बड़ी वजह भी कोरोना का टीका ईजाद होना ही लगता है। लेकिन सवाल ये हैं कि क्या उसकी खुशी में हम अभी से लापरवाह हो जाएँ। देश के चार-पांच महानगर कोरोना के सबसे बड़े हॉट स्पॉट बने हुए हैं। ये कहना पूरी तरह सही है कि यदि मुम्बई, दिल्ली, चेन्नई, पुणे, अहमदाबाद, इन्दौर अदि में कोरोना का फैलाव इस हद तक न हुआ होता तो भारत अब तक उस पर नियन्त्रण स्थापित कर चुका होता। बहरहाल अब जबकि देश में कोरोना को रोकने का टीका बनकर तैयार होने की स्थिति में आ गया है तब भी उसे बाजार में आने और करोड़ों लोगों को लगाये जाने में महीनों लग जायेंगे। इसीलिये टीका आने से लेकर टीकाकरण अभियान पूरा होने तक किसी भी तरह की लापरवाही न सिर्फ अपनी अपितु अपने परिवार और सम्पर्क में आने वाले दूसरे व्यक्तियों के लिए भी जानलेवा हो सकती है। जिस तेजी से अभी कोरोना संक्रमण बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए ज्यादा सावधानी अपेक्षित है क्योंकि लॉक डाउन हटते ही जिस तरह की भीड़ हर जगह नजर आने लगी है उसकी वजह से संक्रमण नई जगहों पर पहुंचने लगा है। हॉट स्पॉट से बाहर के क्षेत्र में भी इक्का-दुक्का कोरोना मरीज मिलने से खतरा और बढ़ गया है। बाहर आना-जाना शुरू होने से भी एक शहर से दूसरे में उसका फैलाव देखने मिल रहा है। ये देखते हुए बेहतर होगा कि टीके की खोज की खुशी में बेपरवाह होने से बचा जाए। कोरोना के आने के बाद से मास्क, सैनिटाईजर और सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर आम जनता में जिस तरह की जागरूकता और दायित्व बोध जाग्रत हुआ था वह तेजी से घटता दिख रहा है। यहाँ तक कि जिन महानगरों में कोरोना का प्रकोप भयावह स्थिति तक जा पहुंचा है वहां भी आम जनता जिस तरह से बेफिक्र हो चली है वह टीके के आने के पहले ही खतरे को बेकाबू कर दे तो आश्चर्य नहीं होगा। इसलिए ये बात तेजी से प्रचारित करने की जरूरत है कि अभी कोरोना का टीका बनने की खबर मात्र आई है लेकिन टीका आने में अभी देर है और जब तक देश के सभी लोगों को कोरोना का टीका न लग जाए तब तक किसी भी तरह की खुशफहमी दु:ख का कारण बन सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 July 2020

विस्तारवाद नामक तीर सही निशाने पर जाकर लगा चीन का अपराधबोध निकलकर बाहर आया





प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को  सुबह - सुबह लेह जा पहुंचे | वहां उन्होंने फौजी अफसरों से हालात का जायजा लिया , 11 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित अग्रिम पोस्ट नीमू में जवानों के बीच आधा घंटा भाषण देकर उनके प्रति अपना सम्मान जताया  | लद्दाख स्थित सेना के  अस्पताल में भर्ती उन जवानों का हालचाल देखा  जो विगत 15 जून को गलवाल घाटी में हुए  संघर्ष में घायल हो गये थे | इसके पीछे उद्देश्य  सैनिकों का हौसला बढ़ाने के साथ ही ये सन्देश देना था कि राजनीतिक नेतृत्व और समूचा देश आपके साथ है और आपकी हर तकलीफ के प्रति संवेदनशील तथा राष्ट्रभक्ति के समक्ष  नतमस्तक है | 

लेकिन श्री मोदी ने सैनिकों को दिए  संबोधन में जो कूटनीतिक सन्देश दिया वह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरणों का संकेत है | दो दिन पहले ही उनकी  रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बातचीत हुई | और उसके पहले रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और विदेशमंत्री एस.जयशंकर भी  रूस गये थे |  रक्षामंत्री ने रूस से प्राप्त होने वाले लड़ाकू विमान सहित अन्य सैन्य  सामग्री की  तत्काल आपूर्ति सुनिश्चित की तो विदेशमंत्री ने चीन के साथ चल रहे तनाव के मद्देनजर  समर्थन प्राप्त करने के लिए कूटनीतिक जमीन तैयार की | उसके बाद प्रधानमंत्री ने श्री पुतिन से बात कर उन्हें  भारत के पक्ष में करने का जो प्रयास किया गया वह कारगर रहा | अमेरिका , ऑस्ट्रेलिया , जापान के साथ ही दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण देशों के राष्ट्रप्रमुखों से बातचीत करते हुए  उन्होंने भारत के पक्ष में माहौल बनाने में भी कामयाबी  हासिल की |

चीन सरकार द्वारा हांगकांग में किये जा रहे दमन के विरुद्ध भारत ने तो संरासंघ   मानवाधिकार परिषद में मुखर होकर अपनी बात रखी  और वहां  रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा के प्रति अपनी चिंता से विश्व बिरादरी  को अवगत करवाया | लेकिन दूसरी तरफ चीन और पाकिस्तान द्वारा हाल ही में संरासंघ में भारत  के विरुद्ध जब भी कोई मोर्चेबंदी की गई तो विश्व के ताकतवर देश भारत के साथ खड़े आये | 

इसीलिये गत दिवस  प्रधानमंत्री का लेह पहुंचना बहुउद्देशीय था | अग्रिम पोस्ट तक जाकर जवानों को संबोधित करते हुए उनके शौर्य की प्रशंसा करते हुए उन्होंने ये संकेत दे दिया कि लद्दाख को लेकर किसी भी तरह  का दबाव या समझौता मंजूर नहीं  होगा | और  साफ़ - साफ़ कह दिया कि लद्दाख का पूरा हिस्सा भारत का मस्तक है |साथ ही  सेना को ये आश्वासन भी दे दिया गया कि उनकी हर जरूरत पूरी   की जा रही है | उनके साथ चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ जनरल बिपिन रावत और थलसेना अध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे का होना भी  काफी कुछ कह  गया |

लेकिन प्रधानमंत्री ने ये कहकर वैश्विक राजनीति का एजेंडा तय करने का जोरदार प्रयास किया कि विस्तारवाद का युग समाप्त हो चुका  है | ये युग विकासवाद का है | अतीत में विस्तारवाद ने ही मानवता का विनाश करने का प्रयास किया | विस्तारवाद की जिद से जो भी प्रेरित हुआ उसने हमेशा विश्व शान्ति के सामने खतरा पैदा किया है | और ऐसी ताकतें मिटने  या मुड़ने के लिए मजबूर हो गईं | इसके साथ ही श्री  मोदी ने ये भी कहा कि पूरे विश्व ने विस्तारवाद के  खिलाफ मन बना लिया है |

प्रधानमंत्री द्वारा सैनिकों के सामने बोली गईं उक्त पंक्तियाँ दरअसल इस समूचे विवाद में चीन के विरुद्ध सबसे बड़ा कूटनीतिक हमला था | विस्तारवाद के विरुद्ध पूरे विश्व की मंशा को व्यक्त करना आसान बात नहीं थी | और फिर जिस जगह उन्होंने उक्त वक्तव्य दिया वह कोई अंतर्राष्ट्रीय मंच न होकर देश का वह सीमान्त था जहां बीते कुछ समय से युद्ध का अघोषित माहौल बना हुआ है | कई स्थानों पर तो भारत और चीन के सैनिक बहुत ही पास  हैं | लड़ाकू विमान , मिसाइलें , राडार , तोपें और  टैंकों के साथ ही हजारों  सैनिकों की तैनाती से युद्ध संबंधी तैयारी का पता चल जाता है | यद्यपि दोनों देशों के उच्च सैन्य अधिकारी प्रति सप्ताह लम्बी वार्ताएं करते हुए सेना पीछे हटाने के तौर तरीके तलाश रहे हैं | दो दिन पहले ही चरणबद्ध तरीके से अग्रिम मोर्चों से सैन्य वापिसी का निर्णय हुआ था | लेकिन चीन बातचीत के साथ ही घुसपैठ और कब्जे की हरकत से बाज नहीं आ रहा | उसके हर कदम के जवाब में भारत ने  जिस तरह की मोर्चेबंदी की उससे वह चौंकन्ना हो गया है |

उसे ये उम्मीद थी कि समूचे लद्दाख सेक्टर में घुसपैठ कर वह हमेशा की तरह थोड़ी - थोड़ी जमीन दबाता जायेगा और भारत तनाव से बचने के लिए रक्षात्मक  बना रहेगा | लेकिन इस बार उसे न केवल सैन्य मोर्चे पर अपितु कूटनीतिक क्षेत्र में भी भारत की तरफ से अप्रत्याशित चुनौती का सामना करना पड़ रहा है | इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि पहले  इस तरह की  स्थिति में भारत शान्ति की दुहाई देता रहता था जबकि चीन हमेशा अकड़कर  बात किया करता था | लेकिन इस बार भारत आक्रामक रवैया दिखा रहा है जबकि चीन बार - बार शान्ति से विवाद सुलझाने की रट लगाये हुए है | लद्दाख में आज प्रधानमंत्री ने विस्तारवाद का उल्लेख तो किया किन्तु किसी  का नाम लिए बगैर | इस पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बिना देर किये सवाल उठा दिया कि श्री मोदी ने चीन का नाम क्यों नहीं लिया ?

लेकिन चीन को श्री  मोदी के भाषण के विस्तारवाद वाला वह एक पैराग्राफ बहुत अंदर तक चुभ गया | उसका अपराधबोध उसके विदेश विभाग के प्रवक्ता की उस सफाई से व्यक्त हो गया जिसमें विस्तारवाद के आरोप से इंकार करते हुए सफेद  झूठ बोलते हुए  कहा गया कि वह  अपने 14 पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद शांति वार्ता के जरिये सुलझा चुका है  | उसे ये बात भी नागवार गुजरी कि जब भारत और चीन के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी तनाव कम करने के लिए वार्तारत हों तब भारत के प्रधानमंत्री ने अग्रिम मोर्चे पर जाकर चीन को घेरने की कोशिश की | इस तरह उसको ये लगने लगा कि भारत पहली बार आक्रामक मुद्रा में है और  विश्व जनमत मौजूदा हालातों में चीन के साथ नजर नहीं आ रहा | उल्टे अधिकतर बड़े और प्रभावशाली देश भारत का समर्थन कर रहे हैं | रूस और अमेरिका के  अलावा फ़्रांस और इजरायल ने जिस तत्परता से भारत की रक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए हाथ आगे बढ़ाये वह चीन की परेशानी का सबब बन गया |

भारत द्वारा लगाये जा रहे गये व्यापारिक प्रतिबंधों पर शुरुवात में तो चीन सरकार  ने  मजाक उड़ाते हुए कहा  कि भारत के लोग जरूरी चीजों के लिए तरस जायेंगे किन्तु जब प्रतिबंध और बढ़े तब चीन द्विपक्षीय व्यापार को दोनों के हित में बताने जैसी चिकनी - चुपड़ी बातें करने लगा | इससे साबित हो जाता है कि अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति के मद में चूर चीन को ये तो लगने ही लगा कि भारत हर तरह से निपटने तैयार है | मौजूदा संकट के प्रारंभिक दौर में भारतीय सेना की तैयारियों का मखौल भी चीन के सरकारी मीडिया ने ये कहते हुए उड़ाया था कि भारत आग से खेलने का दुस्साहस कर रहा है | लेकिन गलवाल में हुई मुठभेड़ के बाद अब वह शांति के साथ निपटारे जैसी बातें दोहरा रहा है | लेकिन भारत ने उसके दोगलेपन  को भांपते हुए सीमा पर जबरदस्त तैयारी के जरिये चीन  को संकेत दे दिया कि युद्ध हुआ तो भारत की सेना धरती  और आकाश दोनों में भारी पड़ेगी |

चीन का एक और दांव जो बेकार जाता दिख रहा है वह नेपाल | भारत से दो - दो  हाथ करने का दम्भ भर रहे उसके प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली खुद अपनी गद्दी बचाते घूम रहे हैं | चीन को लगता था कि भारत में राजनीतिक मतभेद सरकार के मनोबल को तोड़ देंगे  लेकिन इक्का - दुक्का नेताओं के अलावा अधिकतर  विपक्ष इस समय सरकार और सेना के साथ खड़ा हुआ है | जबकि चीन के भीतर सरकार के विरोध में असंतोष की  चिंगारी नजर आने लगी है | कहाँ तो वह भारत को आग से न खेलने की नसीहत दे  रहा था और कहाँ अपनी जनता के गुस्से से बचने के लिए गलवाल में मारे गये सैनिकों के नाम और संख्या बताने की  हिम्मत तक जिनपिंग सरकार की नहीं पड़ रही |

भारत के प्रधानमंत्री की  गत दिवस संपन्न लद्दाख यात्रा के दौरान विस्तारवाद पर जिस तरह का तीखा हमला उनके द्वारा बोला गया वह वैश्विक राजनीति में चीन के विरुद्ध नई  मोर्चेबंदी का आधार बनेगा | लगे हाथ खबर आ गई कि चीन और रूस के बीच भी सीमा विवाद बना हुआ है |

शिवराज मंत्रीमंडल पर उपचुनावों का दबाव



म.प्र. में शिवराज सिंह चौहान की सरकार बनने के 100 दिनों बाद उनका मंत्रीमंडल गत दिवस आकार ले सका। लेकिन इसे न तो शिवराज सिंह का मंत्रीमंडल कहा जा सकता है और न ही भाजपा का। भले ही अभी भी भाजपा के मंत्री संख्या में ज्यादा हों लेकिन दलबदल करके आये ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक कांग्रेस विधायकों को मंत्री बनाए जाने की बाध्यता से पूरे परिदृश्य पर मजबूरी का साया छा गया। जो भाजपाई मंत्री बन भी गये वे अपने अगल-बगल भिन्न राजनीतिक पृष्ठभूमि और संस्कृति के मंत्रियों की मौजूदगी से कितना सहज महसूस करेंगे ये बड़ा सवाल है। यही परेशानी नौकरशाही की है क्योंकि आजकल उसकी प्रतिबद्धता भी शासन में बैठे चेहरों के अनुसार बदलती रहती है। उस दृष्टि से मंत्रीमंडल विपरीत धाराओं का मिलाप है। उस पर भी दबाव ये कि दलबदल करके आये सभी विधायकों को दो महीने के भीतर उपचुनाव जीतना होगा। और यही वह कारण है जिसकी वजह से भाजपा और शिवराज चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सके। यद्यपि मुख्यमंत्री तमाम बाधाओं को पार करते हुए भी अपने आधा दर्जन करीबियों को मंत्री बनवाने में कामयाब हो गए लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद से पहली बार अपने सहयोगियों की टीम को चुनने में उन्हें इतनी परेशानी उठानी पड़ी। इसमें भी सबसे बड़ी बात ये रही कि श्री चौहान को बाहरी प्रतिरोध से अधिक अपनी ही पार्टी  के भीतर जबर्दस्त विरोध से जूझना पड़ा। मंत्रीमंडल विस्तार को अंतिम रूप देने के पहले तो यहाँ तक खबर चल पड़ी कि संभवत: उन्हें ही मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जायेगा। लेकिन उन अटकलों को झुठलाते हुए वे फिलहाल तो अपनी गद्दी बचा ले गये। लेकिन इस मंत्रीमंडल में उनके आभामंडल से ज्यादा भाजपा संगठन और श्री सिंधिया का असर साफ़  दिख रहा है। ग्वालियर महाराज तो वैसे भी एक तयशुदा राजनीतिक सौदेबाजी के बाद भाजपा में आये थे। राज्यसभा में उनके निर्वाचन से पहली शर्त पूरी हो गई और दूसरी के तहत उनके साथ आये बागी विधायकों में से कुछ को मंत्री पद भी मिल गया। अब तीसरी बची है उन्हें केन्द्रीय मंत्रीपद दिया जाना जिसमें किसी भी प्रकार की अड़चन नहीं होगी। लेकिन मप्र में एक से ज्यादा राजनीतिक शक्ति केंद्र बन गये हैं जिसका प्रभाव आने वाले दिनों में नजर आयेगा। भाजपा और शिवराज दोनों की सबसे बड़ी चिंता दो दर्जन उपचुनाव में अधिकांश जीतने को लेकर है। हालाँकि अभी भी सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है लेकिन उपचुनाव में थोड़ी सी भी घट-बढ़ हुई तो इस सरकार के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडराते देर नहीं लगेगी। मुख्यमंत्री से ज्यादा ज्योतिरादित्य इसे जानते हैं। उन्हें पता है कि इन उपचुनावों को जीतना केवल श्री चौहान ही नहीं वरन उनके अपने राजनीतिक भविष्य और प्रभाव के लिए कितना महत्वपूर्ण है। इसीलिये गत दिवस उन्होंने भोपाल में सभी 24 उप चुनाव जीतने का दावा करते हुए टाइगर अभी जिंदा है जैसी टिप्पणी की। संयोगवश अधिकांश उपचुनाव ग्वालियर-चम्बल संभाग के अलावा मध्यभारत अंचल में होने वाले हैं जहाँ ज्योतिरादित्य का निजी और पुश्तैनी प्रभाव माना जाता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उनकी बुआ यशोधरा राजे को मंत्री पद मिल गया वर्ना उनकी छुट्टी होने की आशंका थी। जिस तरह प्रदेश के विन्ध्य और महाकौशल अंचल को मंत्री पद से वंचित रखा गया उसका कोई तात्कालिक असर भी फिलहाल नहीं होने वाला क्योंकि मंत्री नहीं बन पाए भाजपा विधायकों को ये लग रहा है कि उपचुनाव की सभी सीटें तो जीती नहीं जा सकेंगीं। उस स्थिति में कुछ मंत्री विधायक नहीं रह जायेंगे और तब खाली हुई जगह उनका राजयोग लौटा देगी। इस उम्मीद को पूरी तरह निराधार भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि भाजपा का एक बड़ा वर्ग खून का घूँट पीकर रह गया है। भले ही ऊपर से कैसे भी मनोभाव दिखाए जाएं किन्तु भीतर ही भीतर भाजपाई कांग्रेस से आकर पूरी राजनीति और प्रशासन तन्त्र पर प्रभाव जमा रहे सिंधिया समर्थकों को पचा नहीं पा रहे। खास तौर पर वहाँ जहां कम मतों से भाजपा 2018 का चुनाव हारी थी। बहरहाल मंत्रीमंडल तो जैसे-तैसे बन गया और आज शाम तक सम्भवत: विभागों की बन्दरबांट भी हो चुकी होगी। लेकिन इसके बाद ही सरकार का ध्यान शासन से ज्यादा उपचुनाव जीतने पर ही केन्द्रित रहेगा। यद्यपि ये मान लेना गलत नहीं है कि शिवराज और सिंधिया की मिली - जुली ताकत कांग्रेस पर भारी पड़ेगी लेकिन भाजपा को ये नहीं भूलना चाहिये कि कोरोना ने समाज के सभी वर्गों को जिस तरह से हलाकान किया और बीते एक माह से पेट्रोल-डीजल के दामों में रोजाना वृद्धि की गयी उसने सभी वर्गों को नाराज किया है। बिजली बिलों का भारी भरकम बोझ भी जनरोष का कारण है। व्यापार चौपट होने से व्यापारी वर्ग भी सरकार से नाराज चल रहा है तो मध्यमवर्ग की अपनी पीड़ा है। इस सबके बीच 2018 के संग्राम में एक दूसरे के मुकाबले खड़े शिवराज और महाराज एक साथ आकर कितना प्रभाव छोड़ते हैं इस पर सबकी निगाहें लगी हैं। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो जिस तरह क्मलनाथ अभी भी पूरी ताकत अपने हाथ में केन्द्रित रखना चाहते हैं वह असंतोष को और बढ़ा सकता है। पिछले चुनाव के पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आये कुछ नेताओं का पार्टी से त्यागपत्र देना भले ही छोटी सी खबर हो लेकिन उसका भी सांकेतिक महत्व तो है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 2 July 2020

चीन पर दूसरा आर्थिक प्रहार वाकई जोरदार



सीमा पर शांति वार्ता जारी रहने के दौरान भारत द्वारा आर्थिक मोर्चे पर चीन की गर्दन दबाने के लिए किये जा रहे निर्णय दूरगामी असर डालने वाले साबित होंगे। बीएसएनएल में 5 जी उपकरण लगाने के काम में चीनी सामान के उपयोग पर तो पहले ही रोक लगाकर नया टेंडर जारी किये जाने का फैसला लिया जा चुका है। उसी के साथ रेलवे सहित अनेक सरकारी विभागों ने चीनी सामान के ऑर्डर रद्द करने के साथ ही भविष्य में चीनी कम्पनियों को काम नहीं देने का आदेश पारित कर दिया। इसी तरह सेना, अर्धसैनिक बल, पुलिस और केंद्र सरकार की सभी उपभोक्ता कैंटीनों में चीनी माल नहीं बेचे जाने का नीतिगत निर्णय भी लिया जा चुका है। उम्मीद थी कि इस बीच चीन सीमा पर शांति स्थापित करने की दिशा में सहयोगात्मक रवैया अपनाएगा किन्तु उसकी हठधर्मिता बढ़ती ही गयी। सीमा पर सैनिकों को पीछे हटाने के समझौते के बाद भी गलवाल में हुआ खूनी संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि चीन और कुत्ते की पूंछ कभी सीधे नहीं हो सकते। और ऐसे में भारत के सामने यही विकल्प बचा था कि वह उसकी अकड़ कम करने के लिए दूसरा मोर्चा खोले। केंद्र सरकार ने चीन के साथ हो रहे व्यापार को लेकर जो निर्णय लिए वे कारगर होते दिख रहे हैं। चीन के 59 एप प्रतिबंधित करने के कारण वहां की घरेलू कम्पनियों को पहली बार ये लगा कि राष्ट्रपति जिनपिंग द्वारा भारत के साथ की गई छेड़छाड़ उनके लिए कितनी महंगी साबित होने जा रही है। अमेरिका ने इस फैसले का समर्थन करते हुए 5 जी संबंधी चीनी तकनीक के प्रति अनिच्छा जताना शुरू कर दिया है। उधर यूरोप के कुछ और देश भी चीनी एप को डाटा चोरी का जरिया मानकर उनसे पिंड छुड़ाना चाह रहे हैं। भारत में जरूर एक तबका ऐसा है जिसने एप प्रतिबंधित करने का ये कहकर मजाक उड़ाया कि ये चीन की अर्थव्यवस्था का बहुत ही छोटा हिस्सा है और उससे उसे रती भर भी असर नहीं पड़ेगा। लेकिन वहां के सरकारी प्रचार माध्यमों ने ही ये माना है कि एप चलाने वाली कम्पनियों  को इस निर्णय से बड़ा नुकसान होगा। सबसे बड़ा भय एप कंपनियों को इस बात का है कि दूसरे देश भी यदि इसी दिशा में बढे तो उनका दिवाला निकल जाएगा। अभी इस फैसले की पूरी समीक्षा हुई भी नहीं थी कि गत दिवस केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने देश में सड़क निर्माण के काम से चीनी निर्माण कम्पनियों को बाहर करने की घोषणा कर डाली। यही नहीं भारतीय भागीदार के साथ भी चीनी ठेकेदार फर्मों को भारत में कार्य करने नहीं जाएगा। इस बारे में जो करार हो चुके हैं उन्हें रद्द करते हुए नये टेंडर निकाले जायेंगे। इस साल के बजट में बुनियादी ढाँचे के लिए 1 लाख करोड़ का भारी भरकम बजट है। कोरोना के कारण अनेक बड़े प्रकल्प अटक गये। बेहतर हो उनके नए टेंडर निकालकर भारतीय कंपनियों से काम करवाया जावे। इस बारे में कहना गलत नहीं होगा कि बीते अनेक वर्षों में चीन की निर्माण कंपनियों के कारण भारतीय ठेकेदार फर्मों के हाथ से बड़े-बड़े काम निकल गये। श्री गडकरी बहुत ही व्यावहारिक राजनेता हैं। उनके द्वारा लिए गये फैसले भावनात्मक और जल्दबाजी की बजाय वास्तविकता के धरातल पर होते हैं। देश भर में राजमार्ग , फ्लायओवर , पुल सहित बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य होने हैं। कोरोना से प्रभावित अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए इस साल बुनियादी ढांचे के विकास के प्रकल्प तेजी से चलाना सर्वोच्च प्राथमिकता है। यही एक ऐसा क्षेत्र है जिसके जरिये पूरी अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाया जा सकता है। ऐसे में चीनी निर्माण कम्पनियों को बाहर कर देने से घरेलू ठेकेदारों को काम मिलेगा। सरकार का ये फैसला भी बेहद बुद्धिमत्तापूर्ण है कि चीनी फर्म के साथ भागीदारी वाली भारतीय फर्म भी अयोग्य मानी जायेगी। हो सकता है शुरुवाती दौर में थोड़ी परेशानी सामने आये लेकिन इस समय भारत का उद्योग - व्यापार जगत चीन की चुनौती का सामना करने की मानसिकता के साथ उत्साहित है। भारत सरकार के हालिया निर्णयों से उनके बीच उत्साह का वातावरण है। भले ही नए सिरे से काम शुरू करने में कुछ विलम्ब हो और तब तक चीन के साथ सीमा पर शांति कायम हो जाये लेकिन आर्थिक मोर्चे पर भारत ने जो हमलावर रुख अपनाया है उसे जारी रखा जाना चाहिए। ये कहना गलत नहीं होगा कि जिन विपरीत परिस्थितियों में चीन ने सीमा विवाद को युद्ध के कगार पर पहुंचा दिया उनमें भारत द्वारा जिस मुस्तैदी से उसका प्रतिरोध किया गया उससे पूरी दुनिया को ये लगा कि चीन को रास्ते पर लाने के लिए उससे दबने की बजाय पलटवार करना ही कारगर तरीका है। और वर्तमान दौर में चीन की दुखती रग उसका विदेशी व्यापार है। यदि उसमें एक चौथाई कमी भी आ गयी तो उसकी अर्थव्यवस्था पटरी से उतरते देर नहीं लगेगी और बेरोजगार लोग सरकार के विरुद्ध खड़े होने लगेंगे। सीमा पर तनाव घटाने के लिए सैन्य स्तर की वार्ताओं के बीच आर्थिक प्रतिबंधों के जरिये चीन पर प्रहार साहसिक कूटनीतिक दांव है जिसका वैश्विक प्रभाव पड़ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। चीन से एक साथ अनेक मोर्चों पर टकराने के भारतीय हौसले पर दुनिया भर की निगाहें टिकी हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 1 July 2020

भारतीय एप भी दुनिया भर में लोकप्रिय हो सकते हैं



चीन के 59 एप प्रतिबंधित किये जाने के बाद जो जानकारी आ रही है उससे ये उजागर हुआ कि भारतीय समाज में चीन की पैठ कितनी गहराई तक हो चुकी थी ।  टिक टॉक नामक एप के दुनिया भर में कुल उपयोगकार्ताओं में से एक तिहाई तो भारत में ही थे ।  हमारे युवा और किशोर इन एप के जरिये एक अलग दुनिया में जीने की स्थिति में जा पहुंचे थे जो उन्हें स्वछन्द बना रही थी ।  इनके जरिये प्रतिदिन करोड़ों रूपये की कमाई चीनी कम्पनियाँ कर रही थी ।  कहने को तो ये चीनी अर्थव्यवस्था का बहुत ही छोटा सा हिस्सा है किन्तु यहाँ सवाल नफे - नुकसान से ज्यादा राष्ट्रीय सम्मान का है ।  चीन से होने वाले व्यापार में घाटा भी एक बार बर्दाश्त किया जा सकता था किन्तु  सीमा पर की जा रही शत्रुतापूर्ण कार्रवाई के बाद उसे झटका देना जरूरी हो गया था ।  21 वीं सदी की दुनिया में सामरिक शक्ति से भी  बढ़कर आर्थिक दबाव कारगर होने लगा है ।  चीन ने अपनी सैन्य शक्ति में चाहे कितनी भी वृद्धि क्यों न कर ली हो किन्तु उसका वैश्विक उभार उसकी आर्थिक उन्नति पर आधारित है ।  इसीलिये  भारत द्वारा उठाये गये छोटे से कदम पर उसकी जो प्रतिक्रिया आई उसमें दम्भ और खीझ दोनों झलक रहे हैं ।  ये बात बिलकुल सही है कि 59 चीनी एप पर प्रतिबन्ध पहले ही लग जाना चाहिए था ।  भारत का उद्योग  व्यापार जगत अरसे से मांग करता आ रहा है कि चीन से आयातित चीजों पर शुल्क  बढ़ाया जाए जिससे घरेलू उत्पादकों की कंगाली दूर हो सके ।  हालांकि केंद्र सरकार ने बीते कुछ समय से इस  दिशा में कदम उठाने शुरू भी कर  दिए थे किन्तु कहीं न कहीं सरकार के पैर ठिठक जाते थे  ।  इसका कारण शायद  कूटनीतिक संतुलन रहा होगा  ।  हालाँकि सीमा पर चीन का रवैया सामान्य समय में भी सदैव तनाव पैदा करना वाला रहा ।  उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहली बार जब भारत आये उसी  समय अरुणाचल में चीन ने घुसपैठ की  कोशिश की थी ।  संयोग से इस  साल भारत - चीन मैत्री की  70  वीं वर्षगांठ है ।  दोनों देशों में राजनयिक स्तर पर इसे यादगार बनाने की तैयारियां चल रही थीं किन्तु लद्दाख में चीनी सेना द्वारा जिस तरह की हरकतें की गईं उनके बाद उस अवसर की स्मृतियाँ कड़वाहट में बदल गईं ।  गलवाल घाटी में हुए खूनी संघर्ष के बाद तो हालात और भी संगीन हो गये और तब जनमत के गुस्से से बचने के लिए भारत सरकर ने पहले तो चीनी सामान के उपयोग को सरकारी दफ्तरों में प्रतिबंधित किया ।  फिर चीनी कंपनियों के साथ किये अनेक निर्माण कार्यों के अनुबंध खत्म करने के साथ आयात शुल्क में वृद्धि के जरिये चीनी सामान को महंगा करते हुए भारतीय उत्पादों को सहारा देने  का प्रयास किया गया ।  लेकिन इन सबसे जनता के मन में चीन के प्रति उमड़ रहा गुस्सा ठंडा नहीं हो रहा था ।  संभवत: इसीलिए सरकार ने उन एप को प्रतिबंधित करने का फैसला लिया जिनसे  युवा पीढी सीधे जुड़ी हुई है ।  चीन ने भी इस निर्णय  पर जो प्रतिक्रिया दी उससे लगा कि उक्त  फैसला उसे वाकई चुभा क्योंकि सोशल मीडिया के जरिये बना एक नया वैश्विक समाज इस तरह के निर्णयों का त्वरित संज्ञान लेता है ।  जैसी कि जानकारी आई उसके अनुसार दुनिया के अनेक देश चीनी एप को प्रतिबंधित कर अन्य विकल्प तलाश रहे हैं ।  बीते दो दिनों में ही भारत का चिंगारी नामक एप देखते - देखते लाखों उपयोगकर्ताओं की पसंद बन गया ।  ये सवाल भी प्रमुखता से उठ खड़ा हुआ है भारत के विश्वविख्यात सॉUIफ्टवेयर इन्जीनियर क्या करोड़ों भारतीय युवाओं की अभिरुचियों के अनुरूप एप नहीं  बना सकते थे जिनके अभाव में वे चीनी एप के मोहपाश में फंसे ।  लेकिन इसके जवाब में ये सुनाई दे रहा है कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने तो अपना काम बखूबी किया किन्तु उनको प्रायोजक / प्रमोटर नहीं मिलने से उनकी मेहनत गुमनामी ,में डूबकर रह गई ।  द्वितीय  विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका से दो कॉमिक फीचर सीरीज शुरू हुई ।  इनमें एक थी फैंटम ( मृत्युंजय या भूतनाथ ) और दूसरी जादूगर मैन्ड्रेक ।  इनमें मुख्य चरित्र गोरी चमड़ी वाला होता किन्तु उसका सहायक अफ्रीकी मूल का अश्वेत ।  अखबार और पत्रिकाओं के जरिये उक्त कॉमिक फीचर पूरी दुनिया में स्थानीय भाषाओँ में प्रकाशित होते थे ।  पत्र - पत्रिकाओं की प्रसार संख्या बढ़ाने में वे  काफी सहायक साबित हुए।  अनेक दशकों तक उनका डंका बजता रहा ।  बाद में भारत में चाचा चौधरी जैसे आभासी चरित्र बाजार में उतरे ।  आदर्श चित्र कथा नामक प्रकाशनों के जरिये भारत के ऐतिहसिक और पौराणिक चरित्रों की  जानकारी भी बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हुई ।  आज के दौर  में वाल्ट डिज्नी द्वारा गढ़े गए मिकी - माउस नामक कार्टून चरित्र पूरी दुनिया  के बच्चों की पसंद बने हुए हैं ।  भारत  में भी घरेलू पृष्ठभूमि के अनेक कार्टून चरित्र बच्चों में लोकप्रिय हुए ।  रामायण और महाभारत के बतौर धारावाहिक प्रसारण ने धार्मिक और पौराणिक चरित्रों पर केन्द्रित धारावाहिक बनाने का रास्ता साफ कर दिया ।  अनेक फिल्म निर्माताओं ने लैला - मजनू और शीरी - फरहाद की बजाय पद्मावत , बाजीराव , मणिकर्णिका जैसी  फिल्में बनाकर ये साबित कर दिया कि दर्शक भारतीय इतिहास में भी रूचि रखते हैं ।  मिल्खासिंह और महेंद्रसिंह धोनी पर बने जीवनवृत्त भी सराहे गये ।  ऐसे में यदि भारत के युवा सॉफ्टवेयर इन्जीयरों को मार्केटिंग समर्थन मिल जाये तो वे टिक टॉक से कहीं बेहतर एप बनाकर दुनिया भर में अपना डंका बजा सकते हैं ।  कहने का आशय ये है कि चीन द्वारा की गयी हरकत की सजा उसे जरूर दी जाए किन्तु विकल्प विकसित करने पर भी ध्यान देना जरूरी है ।  चीन ने 59 एप प्रतिबंधित किये जाने संबंधी भारत सरकार के निर्णय पर तंज कसते हुए कहा है कि भारत के लोग बेहतर  उत्पाद के लिए तरस जायेंगे ।  इस टिप्पणी में  एक तरफ अहंकार तो दूसरी ओर खिसियाहट भरी है ।  इसका मतलब तीर सही निशाने पर लगा है ।  अब भारतीय इंजीनियरों को मुकाबले के लिए आगे  होगा और बड़े औद्योगिक घरानों को भी , जो एशिया और दुनिया के रईसों की सूची  में लगातार ऊपर आते जा रहे हैं ।  यदि तीन  महीनों में  भारत पीपीई किट का निर्यात करने की  क्षमता अर्जित करने लगा और वेंटीलेटर जैसे  उपकरण बनाने में सफल  होने के साथ कोरोना की वैक्सीन बनाने के बेहद करीब है तब मनोरंजन आधारित एप बनाना कौन सी बड़ी बात है  ? और उस पर भी तब जबकि दुनिया भर में करोड़ों अप्रवासी भारतीय फैले हुए हैं ।


-रवीन्द्र वाजपेयी