Saturday, 11 July 2020

सौर ऊर्जा : सस्ती और प्रदूषण रहित



आधी सदी से भी ज्यादा का समय बीत गया। उस दौर की एक फिल्म हरिश्चंद्र तारामती के गीत का मुखड़ा था : - जगत भर की रोशनी के लिए, करोड़ों की जि़न्दगी के लिए, सूरज रे जलते रहना...। कविवर स्व. प्रदीप की वह रचना यूँ तो फिल्मी पटकथा को ध्यान में रखते हुए लिखी गई थी किन्त्तु उक्त पक्तियों में जो गूढ़ अर्थ छिपा हुआ था वह अधिकतर लोगों की समझ में नहीं आया। लेकिन गीतकार ने सूर्य की आराधना करते हुए जगत भर की रोशनी और करोड़ों की जि़न्दगी के लिए सूरज से जलते रहने की जो प्रार्थना है उसमें कहीं न कहीं वैज्ञानिकता का पुट भी महसूस होता है। भारतीय संस्कृति में सूर्य को तेजस्विता का अधिष्ठाता मानकर पूजा जाता है। सूर्य का उदय पृथ्वी पर रहने वाले अनगिनत जीव-जंतुओं की दिनचर्या का आधार है। उसकी किरणों से निकलने वाला प्रकाश ऊर्जा का अनंत स्रोत होने के साथ ही जीवन के लिए एक जरूरी तत्व भी है। हमारे पूर्वजों ने समूचे ब्रह्माण्ड को आलोकित करने वाले इस गृह को देवतुल्य मानकर इसकी आराधना करने का जो संस्कार दिया उसमें कितनी दूरदर्शिता थी ये तब जाकर लोगों की समझ में आई जब पूरी दुनिया ने ऊर्जा के सबसे भरोसेमंद और सस्ते वैकल्पिक स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा की तरफ  ध्यान देना शुरू किया। कोयला, पानी, तेल और आण्विक उर्जा के दुष्परिणामों और उनके कारण प्रकृति तथा पर्यावरण को होने वाली क्षति को देखते हुए विश्व भर ने एक स्वर से सौर ऊर्जा को बतौर विकल्प स्वीकार किया और देखते ही देखते वह सर्वत्र लोकप्रिय हो गई। लेकिन सूर्य की पूजा करने वाले भारत में इस दिशा में बहुत देर से कदम बढ़ाये गये और जब सौर उर्जा को वैकल्पिक की बजाय मुख्य स्रोत बनाने की कोशिशें शूरू हुईं तो उपकरणों का अभाव सामने आकर खड़ा हो गया। उनका आयात करने में प्रारंभिक लागत ज्यादा होने के कारण जन साधारण के दिमाग में सौर उर्जा रूपी विकल्प जगह नहीं बना सका। हालाँकि सरकार ने इस पर अनुदान भी दिया किन्तु अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। सबसे पहले सौर ऊर्जा का कुकर आया जिसमें सूर्य की रोशनी से खाना पकाने की व्यवस्था है। उसके बाद घरों की छत पर पानी गर्म करने के लिए सौर उर्जा गीजर लगाने की शुरुवात हुई। पहले-पहल इनका चलन होटलों के साथ ही व्यवसायिक भवनों में दिखाई दिया लेकिन धीरे-धीरे मध्यमवर्गीय लोगों ने भी इसका महत्व समझा और अब तो शहरों के ज्यादातर नये मकानों की छत पर सोलर गीजर नजर आने लगे हैं। हालाँकि बेहद उपयोगी और बचत देने वाले सोलर कुकर को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। लेकिन सौर उर्जा से विद्युत उत्पादन करने के बारे में भारत ने भी रूचि दिखाई और धीरे-धीरे ही सही इस बारे में तेजी से प्रगति होने लगी। सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि देश में ही सौर ऊर्जा संबंधी साजो-सामान का उत्पादन शुरू होने से आयात घटा और लागत कम हुई। अब तो घरों की छतों पर भी सोलर पैनल से बिजली उत्पादन का चलन जोर पकड़नेलगा है। ये बहुत ही शुभ संकेत है जो भविष्य में भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक तो होगा ही हमारे प्राकृतिक संसाधनों को बचाकर पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक बनेगा। इस क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों के प्रतीक के तौर पर गत दिवस मप्र के रीवा में 750 मेगावाट क्षमता के सौर ऊर्जा संयंत्र का लोकार्पण प्रधानमन्त्री द्वारा किया गया। ये देश का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा संयंत्र है। इससे उत्पन्न बिजली ग्रीन एनर्जी कहलायेगी। जैसा बताया गया इसके कारण 15.7 लाख टन कार्बन डाय आक्साइड का उत्सर्जन कम होगा जिसे रोकने के लिए ढाई लाख से भी ज्यादा वृक्षों की जरूरत होती। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने सौर उर्जा को श्योर, सीक्योर और प्योर बताकर जो व्याख्या की वह पूरी तरह से सही है। भारत जैसे देश में जहाँ अधिकतर हिस्सों में पूरे साल सूर्य का प्रकाश भरपूर मात्रा में मिलता हो वहां सूर्य की किरणों से उत्पन्न बिजली वैकल्पिक नहीं वरन मुख्य उर्जा होनी चाहिए। दुर्भाग्य से हम इसमें वैश्विक लिहाज से पिछड़ गए लेकिन देर से ही सही सौर ऊर्जा का महत्व और जरूरत भारत को समझ आ चुकी है। देश के अनेक हिस्सों में ऐसे और संयंत्र बन रहे हैं। रेलवे ने अपने फाटकों पर सौर ऊर्जा पैनल लगाकर बिजली बनाने की शुरुवात पहले ही कर दी थी। अन्य शासकीय संस्थान भी अपने भवनों की छतों पर सौर उर्जा पैनल लगवा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में सिचाई पम्प एवं स्ट्रीट लाइटों में सौर उर्जा का इस्तेमाल बढ़ना भी शुभ संकेत है। लेकिन निजी आवासों में सौर ऊर्जा पैनल लगाने वाले उपभोक्ताओं को बिजली विभाग से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलना कष्टदायी है। हालांकि अभी भी इसमें शुरुवाती लागत तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा है लेकिन अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक नागरिक महंगा होने के बावजूद पर्यावरण संरक्षण के लिए सौर उर्जा पैनल लगवा रहे हैं। बेहतर हो शासन और प्रशासन ऐसे लोगों की सहायता हेतु भी सिंगल विंडो प्रणाली लागू करे। यही नहीं तो ऐसे भवन स्वामियों के नाम और पते प्रचारित भी करे जिससे औरों को भी प्रेरणा मिल सके। रीवा में लोकार्पित सौर ऊर्जा संयंत्र निश्चित तौर पर एक गौरवशाली उपलब्धि है। देश के औद्योगिक विकास में सौर ऊर्जा की भूमिका बहुत ही क्रांतिकारी होगी क्योंकि यह सस्ती बिजली के साथ ही पर्यावरण की रक्षा में भी बहुत ही मददगार है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 July 2020

सियासी शतरंज के बड़े मोहरे बचाने पैदल की कुर्बानी विकास के संरक्षकों का पर्दाफाश भी जरूरी




कोरोना को लेकर जो सरकारी विज्ञापन हम सभी को मोबाईल फोन पर जबरन सुनना पड़ता  है उसमें  एक पंक्ति है हमें बीमारी से लड़ना है बीमार से  नहीं | निश्चित रूप से इसमें एक सन्देश छिपा हुआ है | बीते दो दिनों तक  ये देश कोरोना और चीन जैसी समस्याओं से परे हटकर कानपुर वाले विकास दुबे की  जीवनगाथा सुनने में  उलझा रहा | 9 दिन पहले कानपुर के चौबेपुर थाने से पुलिस की एक टुकड़ी विकास को पकड़ने रात के समय  उसके गांव स्थित घर पहुँची  | थाने में बैठे उसके शुभचिंतक ने इसकी सूचना पहले ही उसे दे दी जिसके  कारण विकास ने भी जबरदस्त मोर्चेबंदी कर  डाली | पुलिस टुकड़ी उसे पकड़ने में कामयाब हो पाती उसके पहले ही उसके 8 लोगों को विकास के घर से चली  गोलियों ने भूनकर रख दिया और वह खुद भाग निकला | उप्र की पूरी पुलिस उसे ढूंढती रह गई | उसके कुछ सह्योगियों को मार भी गिराया गया  | विकास अतीत में भी हत्याएं  करता रहा था किन्तु गवाहों के अभाव में बचता गया | शासन और प्रशासन किसी भी  दल का रहा हो लेकिन विकास के हौसले निरन्तर विकसित होते गये | वह भाजपा और  बसपा से होते हुए वर्तमान में सपा से जुड़ा बताया जा रहा था  | और प्रशासन में तो उसका दखल नीचे से लेकर ऊपर तक था ही | वरना 2001 में एक मंत्री स्तर के व्यक्ति की पुलिस थाने में हत्या करने के बाद वह 19 साल तक जीवित न बना रहता | इस दौरान उसका हृदय परिवर्तन हो गया हो ऐसा नहीं था | दर्जनों अपराधिक प्रकरणों में वह आरोपी था | बीच - बीच में जेल आना - जाना भी लगा रहा | वह और उसकी पत्नी स्थानीय निकाय के चुनाव में भी जीते |

उस रात पुलिस का दल उसके घर आया तब विकास चाहता  तो पहले ही निकल भागता किन्तु जब थाने में ही उसके खैरख्वांह बैठे रहे तब उसका हौसला बुलंद होना स्वाभाविक था | लेकिन यहीं वह गलती कर बैठा | एक साथ आठ पुलिस वालों की  नृशंस हत्या की वजह से उप्र सरकार  पर जो चौतरफा हमले हुए उनके बाद विकास दुबे को मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण पर सवाल उठने के अलावा  दिवंगत थाना प्रभारी द्वारा कुछ समय पूर्व उच्च अधिकारी को लिखी गई चिट्ठी का हल्ला मच जाने से पुलिस महकमे को भी विकास से नजदीकी नुकसान का सौदा लगने लगी | और आखिर में  वही हुआ जिसकी  जानकारी आज सुबह - सुबह मिली |

उज्जैन में पकड़े जाने के बाद कानपुर लाये जाने के दौरान कुछ किलोमीटर पहले हुए एक नाटकीय घटनाक्रम में विकास का अंत हो गया | उसके बाद से पुलिस की कार्रवाई संदेह और सवालों के घेरे  में आ गई है | पुलिस चाहे गर्म तवे  पर बैठकर भी  ये कहे कि विकास भागने की कोशिश में मारा गया , तब भी कोई विश्वास नहीं  करेगा क्योंकि खाकी वर्दी वालों की विश्वसनीयता इस देश में सबसे निचले स्तर पर मानी  जाती है | विकास ने यदि 8 साधारण लोगों की हत्या की  होती तब वह शायद इस तरह न मारा जाता |

उप्र पुलिस उसको इस तरह निपटा देगी ये मानने वाले 99 फीसदी रहे होंगे | इसलिए जब सुबह खबर आई तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ | और तो और अधिकतर लोग खुश भी हुए | यद्यपि एक वर्ग विशेष है जिसे पुलिस का ये तरीका रास नहीं आया | उसे भय है कि पुलिस को ऐसा करने की छूट मिल गयी तो वह एक तरह से स्वयंभू न्यायपालिका बन सकती है , जो बेहद खतरनाक होगा | और ऐसा सोचना  काफी हद तक सही भी है | लेकिन अनेक लोगों ने इस घटना के संदर्भ में  न्यायपालिका की अक्षमता पर भी निशाना साधा |  

वैसे ये पहला अवसर नहीं है जब पुलिस पर एनकाउंटर को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ हो | ऐसी अधिकतर घटनाओं को योजनाबद्ध माना जाता है | जांच भी होती है लेकिन नतीजा शून्य ही रहता आया है | और वैसा ही इस घटना के बारे में होना तय है | लेकिन पूरे देश में ये बात भी तेजी से उठ खड़ी हुई है कि  विकास के अपराधिक कारोबार को बढ़ावा देने वाले उसके अदृश्य  संरक्षक राजनीतिक नेता और अफसरों पर गाज कब गिरगी ? कोई  माने या न माने लेकिन दो दशक से भी ज्यादा समय से अपराध का इतना बड़ा जाल फैलाने के बाद भी उसका निडर होकर घूमना बगैर राजनीतिक और प्रशासनिक सरपरस्ती के  नामुमकिन था | योगी आदित्यनाथ की सरकार को विपक्षी दल एनकाउंटर की सरकार कहते रहे हैं | लेकिन बीते तीन साल में वह भी विकास दुबे को ठिकाने नहीं लगा सकी तो इसका साफ मतलब है कि उसे शासन - प्रशासन से अभयदान हासिल था |

सवाल ये है कि अपराधी गिरोहों का सफाया करने के दावों के बावजूद अपराध घटने की बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं और इसका कारण ये है कि हमारा पूरा फोकस अपराधी को मिटाने पर टिक गया है जबकि प्रयास अपराधों की जड़ पर प्रहार करने का  होना चाहिए | जिस तरह कोरोना के विज्ञापन में बीमार के बजाय बीमारी से लड़ने की  समझाइश है उसी तरह अपराधी रूपी बीमार को रास्ते से हटाने से समस्या हल नहीं होने वाली | दरअसल अपराधी  होना भी  एक मानसिक स्थिति है | लेकिन विकास दुबे समान जहरीले पौधे को खाद पानी देकर वृक्ष बनाने वाली सोच को जब तक  समूल नष्ट नहीं किया जाता तब तक भविष्य में  अपराधियों के मारे जाने के बाद भी अपराधों की  नई फसल आती रहेगी |

विकास के पकड़े जाते ही पुलिस प्रशासन और राजनेताओं से उसके रिश्तों के खुलासे की चर्चा जोर पकड़ने लगी थी  और उसी के साथ उसके खात्मे के आशंका भी | और जैसे ही उसके मारे जाने की खबर आई वैसे ही उससे खुश होने वाले भी इस बात को लेकर निराशा से भर उठे कि एनकाउंटर में केवल विकास नहीं मारा गया बल्कि उसके साथ अपराधों को पाल - पोसकर रखने वाला नेता और नौकरशाहों का पूरा काला चिट्ठा भी  काल के गाल में समा गया | जहां तक विकास की बात है तो उसके मार दिए जाने से भले ही पुलिस ने अपने दावे के मुताबिक अपने 8 शहीदों की मौत का भरपूर बदला तो ले लिया किन्तु जिस तरह शतरंज के खेल में बादशाह और वजीर के साथ बाकी मोहरों को बचाने के लिए पैदल की बलि दे दी जाती है ठीक वैसे ही इस मामले में भी बड़े मोहरे बचा लिए गए |

 विकास भले ही कितना भी बड़ा सूरमा रहा हो लेकिन जब सरकारी व्यवस्था ने उसके सफाये की ठान ली तब उसे आसानी से ठिकाने लगा दिया गया | लेकिन असली सवाल तो ये है कि उप्र की पुलिस में इतना साहस तब जाकर ही क्यों आया जब उसे लगा कि विकास उसके साथ ही राज्य की राजनीति से जुड़े तमाम कद्दावर नेताओं के विनाश का कारण बनने जा रहा है |  इस घटना के बाद भी शासन , प्रशासन और राजनीति का अपराधियों से स्थायी गठबंधन समाप्त हो जायेगा , ये मान लेने से बड़ी मूर्खता दूसरी नहीं होगी | लेकिन यदि इस गठजोड़ का  बेरहमी से खात्मा नहीं  किया गया तो अपराध रूपी गाजर घास कभी मिटने का नाम नहीं लेगी |

विकास भले मारा जा चुका  हो लेकिन उसके मोबाईल में छिपे राज यदि सामने लाये जा सकें तो योगी सरकार को एक नये युग के सूत्रपात का श्रेय हासिल हो सकेगा | 

हालाँकि इसकी उम्मीद न के बराबर है |

विकास दुबे का मरना तो तय था लेकिन ...



कल सुबह से देर रात तक खबरों में छाया रहा विकास दुबे आज सुबह से फिर खबर बना हुआ है। लेकिन बीते 24 घंटों में फर्क ये पड़ा कि कल वह जीवित था लेकिन आज मृतकों की सूची में शामिल हो गया। उज्जैन के महाकाल मन्दिर प्रांगण में उसकी नाटकीय गिरफ्तारी या प्रायोजित सरेंडर की दास्तान अभी बेनकाब हुई ही नहीं थी कि सुबह-सुबह खबर आ गई कि सड़क मार्ग से उसे ले जाते समय कानपुर के समीप पुलिस वाहन पलट गया। उसके बाद विकास दुबे ने पुलिस वाले की पिस्तौल छीनकर भागने की कोशिश की और उस दौरान उसका काम तमाम कर दिया गया, जिसे पुलिसिया भाषा में एनकाऊंटर कहा जाता है। इस तरह बीते 24 घंटे से चले आ रहे नाटकीय घटनाक्रम का फिल्मी अंत हो गया। कल दिन भर जो उप्र पुलिस अपनी नाकामी के लिए दोषारोपित होती रही आज वह दूसरे कारणों से कठघरे में है। विकास कौन था और उसका अपराध क्या था ये बताने की जरूरत नहीं रही। समाचार माध्यमों ने उसकी पूरी कर्मपत्री पहले ही खोलकर रख दी थी। इसलिए उसके मरने का शायद ही किसी को अफसोस हो। उलटे जिन 8 पुलिस वालों की उसने हत्या की थी उनमें से कुछ के परिवारजन तो टीवी चैनल पर उप्र पुलिस और योगी सरकार को धन्यवाद देते दिखाई दिए। समाज का बड़ा वर्ग ऐसा है जो देश की लचर न्याय प्रणाली के मद्देनजर अपराधियों के इस तरह से खात्मे की तरफदारी करता है। स्मरणीय है गत 6 दिसम्बर 2019 को हैदराबाद में एक महिला पशु चिकित्सक के साथ दरिंदगी करने वाले चार बलात्कारियों को भी सुबह-सुबह मौका ए वारदात पर ले जाकर घटनाक्रम की जांच के दौरान उन सभी को पुलिस से हथियार छीनकर भागने के बाद एनकाऊंटर कर दिया गया था। ज्योंही उसकी खबर फैली पूरे देश से हैदराबाद पुलिस को बधाइयां दी गईं। यद्यपि एक वर्ग ऐसा भी था जिसने पुलिस कार्रवाई को साजिश बताते हुए घटना की सत्यता पर संदेह जताया। ऐसे लोगों का कहना था कि पुलिस को यदि इस तरह की स्वछंदता दे दी गई तब वह न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण करने लगेगी। हालांकि ये बात भी  पूरी तरह सच है कि किसी भी अपराधी को उसके किये की सजा मिलने में इतना लंबा समय लगता है कि अपराध करने वाले बेख़ौफ़  हो जाते हैं। सख्त सजा देने वाले न्ययाधीश भी निष्पक्षता दिखाने के लिए अपराधी को बचाव के इतने अवसर देते हैं कि आम जनता को गुस्सा आने लगता है। आतंकवादी याकूब मेमन और निर्भया काण्ड के बलात्कारी दरिंदों की फांसी टलवाने के लिए जिस तरह देर रात देश का सर्वोच्च न्यायालय खोलकर सुनवाई की गयी उससे भले ही न्यायपालिका ने न्यायशास्त्र के इस सिद्धांत का पालन किया हो कि चाहे सौ अपराधी छूट जाएं किन्तु किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन उसी न्यायशास्त्र से ही ये बात भी निकलकर आई कि न्याय में विलम्ब उससे इंकार करना है। उस लिहाज से विकास दुबे की मौत समाज के बड़े वर्ग को जहां राहत पहुंचा रही है वहीं ये कहने वाले भी बड़ी संख्या में है कि एनकाऊंटर के नाम पर पुलिस अपने ही पापों पर पर्दा डाल देती है। ये स्थिति दरअसल समाज में व्याप्त उस स्थिति को स्पष्ट करती है जिसमें एक अपराधी को पहले तो संरक्षण देते हुए महिमामंडित किया जाता है लेकिन ज्योंही वह शासन और प्रशासन के लिए बोझ बनता है, उसे रास्ते से हटा दिया जाता है। 2001 में पुलिस थाने के भीतर घुसकर उप्र सरकार में मंत्री का दर्जा प्राप्त नेता की हत्या करने के बाद विकास दुबे महज इसलिए बरी हो गया क्योंकि उस हत्या के प्रत्यक्षदर्शी पुलिस वालों ने अदालत में कुछ न देखने जैसे बयान दे डाले। मौजूदा प्रकरण में भी विकास को 8 पुलिस वालों की हत्या करते किसी ने नहीं देखा था। घटना के समय गाँव की बिजली बंद कर दी गई थी। उसको पकड़ने पुलिस टीम के जाने की पूर्व सूचना उसे थाने से ही मिल चुकी थी। मारे गए पुलिस वालों के शवों को पेट्रोल से जलाकार खाक करने की भी उसकी तैयारी थी। सवाल ये है कि 2001 में भाजपा के मंत्री पद का दर्जा प्राप्त नेता को थाने में घुसकर मारने के बाद निचली अदालत से जब उसे बरी किया गया तब उस फैसले के विरुद्ध अपील क्यों नहीं हुई? विकास को संरक्षण देने वालों में भाजपा, सपा और बसपा सभी के नेताओं के नाम आ रहे हैं। पुलिस और प्रशासन से उसका याराना तो साबित हो ही चुका है। ऐसे में जब किसी पुलिस अधिकारी ने उसकी गर्दन पर हाथ डालने की जुर्रत की तो विकास ने लाशें बिछा दीं। उप्र और बिहार में इस तरह के अपराधी भरे पड़े हैं। राजनेताओं के साथ ही वे पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों से भी निकट सम्बन्ध रखते हैं जिसके पीछे आर्थिक हिस्सेदारी ही आधार होता है। विकास के सियासी हस्तियों और नौकरशाहों से रिश्तों की पोल खोलने का समय ज्योंहीं आया त्योंहीं उसका खात्मा हो गया। आज हुआ एनकाऊंटर सही था या सुनियोजित ये शायद ही पता चल सके क्योंकि हैदराबाद की तरह से ही यहाँ भी देखने वाले केवल पुलिस वाले ही थे। लेकिन उप्र की पुलिस इस आरोप से तो नहीं बच सकती कि विकास जबरदस्त नाकेबंदी के बाद भी कानपुर से निकलकर फरीदाबाद होते हुए मप्र के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर में दर्शनार्थी बनकर आ पहुंचा। उसकी गिरफ्तारी को लेकर भी संदेह बना रहा। एक बात तो सच है कि उप्र पुलिस के हत्थे चढ़ने पर अपना अंजाम मालूम होने के कारण ही उसने मप्र में गिरफ्तार होना पसन्द किया। लेकिन वह भूल गया कि अपराध की दुनिया का याराना भी स्वार्थों के आदान प्रदान पर निर्भर करता है। और हालिया घटनाक्रम के बाद वह शासन-प्रशासन के लिए खतरा बन गया था। इस तरह विकास की कहानी तो खत्म हो गई जिस पर अनेक फिल्म बनाने वालों ने पटकथा लिखना भी शुरू कर दिया होगा किन्तु हत्या के संदेहों में घिरी उसकी मौत से जहाँ अनेक कहानियां अनकही रह गईं वहीं कुछ नई कहानियों का जन्म भी हो सकता है। उप्र पुलिस विभाग के सैकड़ों लोग विकास से निकटता से जुड़े थे। उनकी जानकारी मिल चुकी है। कुछ तो गिरफ्तार भी हो चुके हैं। हो सकता है उनमें से कुछ कानून के शिकंजे में फंस भी जाएं किन्तु असली दोषी तो वे राजनेता हैं जो विकास जैसे मामूली गुंडे को अपराध की दुनिया का बादशाह बना देते है। उप्र की योगी सरकार ने तीन साल पहले सत्ता सँभालते ही दर्जनों अपराधियों के ठिकाने लगा दिया। बीते एक सप्ताह में विकास के अनेक सहयोगी भी चटका दिये गये। आम जनता में मुख्यमंत्री की दबंग छवि भी इस कारण से बनी किन्तु ये भी सही है कि योगी महाराज ने अभी तक अपराधियों को संरक्षण देने वाले एक भी राजनेता को सीखचों में नहीं पहुंचाया। और यही वजह रही कि विकास दुबे द्वारा किये गये हत्याकांड से लेकर आज उसकी मौत तक के समूचे घटनाक्रम में पुलिस और प्रशासन के तो कई चेहरे अनावृत्त होने को आ गये लेकिन नेता नामक प्राणी बचे हुए हैं। विकास जीवित रहता तो अनेक सफेदपोशों की असलियत सामने आ जाती। दरअसल विकास महज एक व्यक्ति नहीं अपितु एक प्रवृत्ति है जो हमारी शासन व्यवस्था पर पूरी तरह से हावी है। इसलिए जब तक जड़ों में मठा डालने जैसी बुद्धिमत्ता नहीं दिखाई जाती तब तक विकास जैसी नई टहनियां निकलती रहेंगीं। लेकिन सवाल ये है कि ये दुस्साहस करेगा कौन?

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 9 July 2020

कांग्रेस और गांधी परिवार पर जवाबदेही का दबाव



1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद स्व. अर्जुन सिंह ने सोनिया गांधी को कांग्रेस की  बागडोर संभालने के लिए काफी मनाया था | लेकिन उस समय वे अपने पति की की दर्दनाक मौत के बाद परिवार की सुरक्षा के लिए ज्यादा चिंतित थीं | लिहाजा पार्टी की बागडोर स्व. पीवी  नरसिम्हाराव और फिर स्व. सीताराम केसरी जैसों के हाथ में आ गयी | इस दौरान न सिर्फ स्व. अर्जुन  सिंह और स्व. नारायण दत्त तिवारी अपितु गांधी परिवार के निकटस्थ पी. चिदम्बरम और स्व. माधवराव सिन्धिया तक ने कांग्रेस छोड़कर अलग पार्टी बनाई | कुछ समय तक ऐसा लगने लगा था कि कांग्रेस और गांधी परिवार का नाता खत्म हो चला था किन्तु बाद में राजनीति ने फिर पलटा खाया और श्री सिंह की योजना के चलते श्री केसरी  को उठाकर कांग्रेस मुख्यालय से बाहर करते हुए श्रीमती गांधी को बागडोर सौंप दी गई | इस फैसले पर किसी को न आश्चर्य   हुआ और न ही आपत्ति | अतीत में नेहरू जी के दौर में ही उनके बेटी स्व. इंदिरा गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाकर मुख्य धारा में स्थापित  कर दिया गया था | इंदिरा जी की उसके पहले कांग्रेस संगठन में कौन सी महत्वपूर्ण भूमिका में रही ये विश्लेषण का विषय है | स्व. अर्जुन सिंह ने सोनिया गांधी को कांग्रेस की कमान सौपते समय उठे सवालों के जवाब में कहा था कि गांधी परिवार कांग्रेस को एकसूत्र में बांधे रखने वाली  शक्ति है | 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापिसी से सोनिया जी के चयन की सार्थकता स्वयंसिद्ध हो गयी | लेकिन अंततः परिवार की परम्परा का निर्वहन करते हुए उन्होंने भी पंडित नेहरु और इंदिरा जी की तरह अपने बेटे राहुल और बेटी प्रियंका को कांग्रेस संगठन के शीर्ष पदों पर स्थापित कर दिया | नेहरु जी  और इंदिरा जी के समय तो फिर भी पार्टी में असहमति के दो - चार स्वर सुनाई दे जाते थे लेकिन आज की कांग्रेस पूरी तरह से गांधी परिवार की गिरफ्त में है | 2019 के लोकसभा चुनाव की पराजय  का दायित्व लेते हुए जब राहुल ने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ते हुए संकेत दिया कि कोई गांधी इस पद पर नहीं  आएगा तब ये आशा बंधी थी कि पार्टी में  आन्तरिक लोकतंत्र का जो वायदा उन्होंने शुरुवात में किया था उसे वे पूरा करेंगे किन्तु अनेक महीनों की  अनिश्चितता के बाद भी कांग्रेस को कोई अध्यक्ष लायक नहीं मिला और ले देकर सोनिया जी ही कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर फिर मुखिया  बन बैठीं | उनकी पुत्री प्रियंका वाड्रा भी महासचिव पद पर कायम हैं | जबकि कुछ न रहते हुए भी राहुल ही पार्टी  के चेहरे बने हुए हैं | उससे भी बड़ी बात ये है कि गांधी परिवार ये स्वीकार नहीं कर पा रहा कि देश की सत्ता उनके हाथ में नहीं है | उनकी पूरी राजनीति में जो राजशाही अंदाज झलकता है वही उनके और कांग्रेस दोनों के लिए समस्या पैदा कर  रहा है | बतौर विपक्षी नेता सरकार पर तीखा हमला करना गांधी परिवार का फर्ज भी है और अधिकार भी , किन्तु उनकी  शान में कोई गुस्ताखी न हो , ये सोचना गैर प्रजातांत्रिक है | ताजा प्रसंग इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट , राजीव गांधी फाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट की जाँच का है | बीते कुछ समय से गांधी परिवार मोदी सरकार के विरुद्ध बेहद आक्रामक और  मुखर हो उठा था | लद्दाख में चीनी घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री को घेरने का अभियान जैसा चलाया  जा रहा था | बतौर विपक्षी उनका ऐसा करना स्वाभाविक माना जा सकता था किन्तु राष्ट्रीय सुरक्षा जब दांव पर लगी हो तब विपक्ष भी जिस जिम्मेदारी का परिचय अतीत में देता रहा वह गांधी परिवार भुला बैठा | और इसी झोंक में राहुल ने प्रधानमंत्री के नाम का मजाक बनाते हुए उन्हें सरेंडर मोदी कहकर सम्बोधित किया | इसके अलावा श्री मोदी पर लगातार ये आरोप लगाया  जाता रहा कि वे चीन से डरते हैं और इसीलिये पूरे विवाद के दौरान उन्होंने न उसका नाम लिया न ही वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का | लेकिन जब श्री गांधी ने प्रधानमंत्री को सरेंडर मोदी कहा तब भाजपा ने भी तुरुप का पत्ता निकालकर गांधी परिवार और कांग्रेस के चीन से मधुर रिश्तों का पिटारा खोलते हुए पलटवार कर दिया | सामने आये भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश  नड्डा | उन्होंने कांग्रेस पार्टी के चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) का खुलासा करते हुए राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन सरकार तथा चीनी दूतावास से धन मिलने की बात सार्वजनिक की  | इसके साथ ही प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा कोष से भी  फाउंडेशन को धन दिये  जाने की बात सामने लाई गई | डोकलाम विवाद के समय राहुल के दिल्ली स्थित चीनी दूतावास में जाने के  साथ ही  जिनपिंग सहित दूसरे चीनी नेताओं के साथ राहुल और श्रीमती गांधी की निजी मुलाकातों पर भी सवाल दागे गए | और गत दिवस उक्त सभी संस्थानों की जाँच हेतु केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा विभिन्न मंत्रालयों को मिलाकर एक  समिति बना दी गयी जो उनको चीन और अन्य विदेशी स्रोतों से मिले धन की जाँच करेगी | इस पर राहुल ने गुस्से से भरा एक ट्वीट किया जिसमें प्रधानमन्त्री पर तीखे कटाक्ष किये गये | उक्त सभी संस्थान कहने को तो सार्वजनिक न्यास हैं लेकिन वस्तुतः उन पर गांधी परिवार का  ही पूरा नियन्त्रण है | इनकी गतिविधियों से वैसे तो किसी को सरोकार नहीं  रहा लेकिन कांग्रेस पार्टी की पूरी तरह विपरीत  विचारधारा वाली चीन की कम्यनिस्ट पार्टी के साथ जुगलबन्दी और फिर राजीव गांधी के नाम से बने फाउंडेशन को चीन से मिले अनुदान के अलावा मिली अन्य विदेशी आर्थिक  सहायता के कारण  संदेह और गहरा गये | इसमें दो राय नहीं है कि भाजपा अध्यक्ष  द्वारा किया गया हमला विशुद्ध राजनीतिक पैंतरा था और सरकार द्वारा गत दिवस बिठाई गई जांच को भी कांग्रेस तथा गांधी परिवार को घेरने का प्रयास कहा जा सकता है | लेकिन फाउंडेशन द्वारा अपनी वार्षिक  जाँच रिपोर्ट में चीन से मिले धन के साथ प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा कोष से हासिल अनुदान का विवरण देने के बावजूद उनका औचित्य साबित करने में कांग्रेस और गांधी परिवार अब तक तो विफल रहे हैं | नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर चल रहे राहुल और श्रीमती गांधी पर इस जाँच में भी अपराधिक प्रकरण बनेगा या नहीं  ये कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इससे उनका नैतिक पक्ष कमजोर हुआ है | अभी तक श्री गांधी ने चीनी दूतावास जाने , चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से सम्झौता ज्ञापन हस्ताक्षरित करने और फाउंडेशन को चीनी अनुदान के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं  दिया  | सरकारी जांच तो अपनी गति से चलेगी और उसके पीछे के निहित उद्देश्य से भी इंकार नहीं  किया जा सकता किन्तु कांग्रेस और गांधी परिवार   केवल सियासी प्रतिशोध का आरोप  लगाकर खुद को सहानुभूति का पात्र नहीं  बना सकते | उसके लिए जरूरी है वह राजपरिवार वाली श्रेष्ठता की मानसिकता से बाहर निकलकर जनता के बीच उक्त प्रश्नों का जवाब दे क्योंकि बाकी सब बातें तो अपनी  जगह हैं किन्तु कांग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच समझौता और राजीव गांधी के नाम से बने संस्थान को चीन  सरकार से प्राप्त  धन के बारे में तो जनता को साफ़ - साफ़ बताना ही चाहिये | फ़िलहाल तो गांधी परिवार और उसके साथ ही कांग्रेस के लिए कठिन स्थितियां बनती जा रही हैं | यदि इनसे ठीक तरह से नहीं निपटा गया तो पार्टी में टूटन की आशंका और मजबूत हो जायेगी | और बकौल स्व. अर्जुन सिंह जो गांधी परिवार कांग्रेस की एकजुटता का आधार रहा वही उसके बिखराव की वजह बन सकता है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 July 2020

शिक्षा सत्र गड़बड़ाने से भावी पीढ़ी परेशान



भारत में जुलाई का महीना मौसम के लिहाज से वर्षा ऋतु का प्रतीक है । लेकिन दूसरी तरफ इसका नाम लेते ही आँखों के सामने विद्यालयों से महाविद्यालयों तक का दृश्य सामने आ जाता है । ग्रीष्मावकाश के बाद नया शिक्षण सत्र एक जुलाई से प्रारम्भ होने की परम्परा ब्रिटिश राज से चली  रही है । यद्यपि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सेमेस्टर प्रणाली के आने से परीक्षा का समय बदलता रहता है परन्तु शैक्षणिक सत्र की  औपचारिक शुरुवात एक जुलाई से ही मानी जाती है । लेकिन इस वर्ष कोरोना संकट ने सब कुछ उलट - पुलट कर दिया । उसकी वजह से सिर्फ कारोबारी जगत ही नहीं  अपितु शिक्षा संबंधी व्यवस्थाएं भी गड़बड़ा गई हैं ।मार्च में अचानक लॉक डाउन हो जाने से बोर्ड की परीक्षाएं तक समय से पूरी नहीं हो सकीं । जिन्हें लॉक डाउन खुलने  के बाद किसी तरह संपन्न करवाया गया । परीक्षाफल घोषित करने में भी काफी नरमी बरती गई । चूँकि मार्च के अंतिम सप्ताह में ही शिक्षण संस्थान बंद कर दिए गये थे इसलिए ऑन लाइन पढाई शुरू कर दी गई । सरकारी संस्थानों को तो उतनी चिंता नहीं  हुई किन्तु निजी शिक्षण संस्थानों ने अपनी फीस सुरक्षित रखने के मकसद से जोर देकर घर बैठे बच्चों को ऑन लाइन पढाई के लिए मजबूर कर दिया । अनेक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षण विभागों ने भी ऑन लाइन शिक्षण की प्रणाली अपना ली । लेकिन कोरोना के बढ़ते प्रकोप की वजह से एक जुलाई से प्रारम्भ होने वाले सत्र की शुरुवात कब से हो पायेगी ये कोई भी बता पाने की स्थिति में नहीं है ।  कुछ राज्य और केंद्र सरकार ने यद्यपि जुलाई के अंत और 15 अगस्त के बाद से शिक्षण संस्थान शुरु करने की बात कही है किन्तु दूसरी तरफ जो हालत बन रहे हैं उनमें कोरोना संक्रमण का चरमोत्कर्ष भी जुलाई से सितम्बर तक बताया जा रहा है । ऐसी सूरत में शिक्षण संस्थान खोलने की सम्भावना नजर नहीं  आ रही । गत दिवस सीबीएसई ने मौजूदा सत्र  के पाठ्यक्रम में 30 प्रतिशत की  कटौती का ऐलान तो कर दिया लेकिन ये निर्णय भी तो तभी कारगर हो सकेगा जब संस्थान खुल सकें । जैसी कि आशंका है यदि कोरोना अक्टूबर - नवम्बर तक खिंच गया तब तो 30 फीसदी पाठ्यक्रम भी पूरा नहीं हो सकेगा । उससे भी बड़ी बात विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का विकास होने की है । शिक्षण संस्थान में शिक्षक के सान्निध्य में विद्यार्थी को किताबी ज्ञान के अलावा  अनेक व्यवहारिक बातों का ज्ञान प्राप्त होता है जो भावी जीवन में बहुत काम आता है । उस दृष्टि से ये चिंता की बात है कि छोटे बच्चों की शाला से दूरी उनके मानसिक विकास में बाधा बन रही है । और जिन बच्चों का इस साल विद्यालय जाना शुरू होने वाला था वे भी उससे वंचित रह गये । असाधारण परिस्थितियों के चलते बोर्ड परीक्षाओं के अलावा बाकी की कक्षाओं  में भले ही बिना परीक्षा लिए ही प्रोत्तीर्ण कर दिया जाए लेकिन विद्यालय और महाविद्यालय जाए बिना प्राप्त शिक्षा में कुछ न कुछ अधूरापन तो रहेगा ही । अनेक छोटे बच्चे बीते अनेक महीनों से घर के भीतर रहकर पढ़ाई के प्रति लापारवाह हो रहे हैं । ऑन लाइन पढ़ाई के बाद जो गृह कार्य उन्हें मिलता है वह तब तक अधूरा  रहता है जब तक अभिभावक भी शिक्षक  की भूमिका का निर्वहन न करें । इस बारे में सबसे बड़ी समस्या  उन परिवारों के साथ है जो अपने बच्चे को किसी तरह अच्छे विद्यालय में पढ़ा तो रहे हैं लेकिन उसके लिए अलग से मोबाईल या लैपटॉप जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं करवा सकते ।  जिन परिवारों में माता - पिता दोनों कामकाजी हों उनमें प्राथमिक स्तर तक के बच्चों को ऑन लाइन शिक्षा देना बेहद कठिन है । ये सब देखते हुए शैक्षणिक सत्र संबंधी किसी भी निर्णय के पहले सरकार को परिस्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण करने के उपरान्त ही अंतिम निष्कर्ष निकालना चाहिए ।  अन्यथा पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों अनिश्चितता में फंसे रहेंगे ।  विश्विद्यालय स्तर की जो  परीक्षाएं कोरोना के चलते नहीं हो सकीं उन्हें लेकर भी नए - नये निर्णय होते रहते हैं ।  लेकिन कुछ भी ठोस नहीं होने से छात्र अपने भविष्य को लेकर परेशान हैं ।  कोरोना ने आर्थिक मोर्चे पर जो अनिश्चितता और चिंताएं उत्पन्न कीं उसी तरह के हालात शिक्षा जगत में  बने हुए हैं । देश की भावी पीढ़ी के लिए ये समय बेहद कठिन परीक्षा का है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 July 2020

राजनीतिक स्वार्थ के लिए जनता की जान खतरे में डालने का क्या औचित्य ? कोरोना के रहते सभी चुनाव टाल दिए जाएं





गत तीन अप्रैल को इसी स्तम्भ में मैंने आगामी एक - डेढ़ वर्ष  तक देश में चुनाव टाल दिए जाने संबंधी सुझाव दिया था जिस पर  अधिकांश पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया भी आई | उस समय तक देश में कोरोना का प्रकोप बहुत ही मामूली था | अधिकृत आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में कुल 2547 कोरोना संक्रमित मिल चुके थे | उनमें 2322 सक्रिय मरीज थे | 162 ठीक होकर जा चुके थे जबकि मात्र 62 की मृत्यु हुई थी | लेकिन उस समय भी पूरे देश में लॉक डाउन के कारण  सब कुछ बंद था | सभी तरह की सार्वजनिक गतिविधियों पर रोक थी | उसके बाद भी कोरोना का आंकड़ा बढ़ता जा रहा था | लेकिन भारत में इस बात को लेकर संतोष व्याप्त रहा  कि दुनिया के विकसित देशों की तुलना में हमारे यहाँ संक्रमित लोगों की संख्या बहुत ही कम है | मृत्यु दर भी नियंत्रण में है और ठीक होने वालों का अनुपात भी तुलनात्मक रूप से बहुत ही उत्साहवर्धक था | इसमें दो मत नहीं हैं कि देश की  जनता ने भी लॉक डाउन में  उम्मीद से ज्यादा सहयोग दिया | लेकिन दूसरी तरफ देश के कुछ चुनिन्दा बड़े शहरों मसलन मुम्बई , दिल्ली , चेन्नई , अहमदाबाद , पुणे और इंदौर आदि में कोरोना का फैलाव तेजी से होता हुआ इस स्थिति में जा पहुंचा कि देश के कुल 70 फीसदी कोरोना मामले इन्हीं में सीमित हो गये | मुम्बई , दिल्ली और चेन्नई तो भयावह स्थिति में जा पहुंचे | मरने वालों की संख्या भी इन्हीं  शहरों में सर्वाधिक है |

बीच में प्रवासी श्रमिकों की घर वापिसी का सिलसिला चल पड़ा और उसी बीच एक जून से केंद्र सरकार ने न्यूनतम प्रतिबंधों के साथ लॉक डाउन शिथिल कर दिया | आवागमन की अनुमति मिल गई |  रेल और हवाई जहाज की सीमित सेवा प्रारम्भ कर दी गयी | बाजार , कारखाने खोलने की अनुमति दे दी गयी | माल की ढुलाई हेतु ट्रक वगैरह भी चलने लगे | दफ्तरों में भी काम  शुरू हो गया  | यद्यपि मास्क , सोशल डिस्टेंसिंग , सैनिटाइजर आदि का उपयोग  करने की हिदायत बदस्तूर कायम रही लेकिन आख़िरकार वही सब आमने आ गया जिसकी आशंका थी | भीड़तन्त्र का सर्वत्र बोलबाला हो गया | लॉक डाउन के दौरान दिखाई दिया समूचा अनुशासन तार - तार होकर रह गया | केंद्र ने राज्यों  पर छोड़ दिया और राज्यों ने सब जनता पर |  इस बीच कोरोना की जांच बढ़ते - बढ़ते  दो लाख प्रतिदिन तक आ गई और उतनी ही गति से बढ़े कोरोना के मरीज | बड़े शहरों के  अस्पतालों में  जगह कम पड़ने लगी | वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी ताबड़तोड़ की जा रही हैं | सरकार से जो बन पड़ रहा है वह कर रही है | लेकिन नये मामले अब तो सुरसा के मुंह के समान बढ़ रहे हैं | कुल संक्रमित लोगों का आंकड़ा सात लाख को पार कर चुका है | यद्यपि उनमें से तकरीबन साढ़े चार लाख ठीक हो गये और अब तक 20 हजार की ही जान गई  | ताजा आंकड़ों के मुताबिक तीन लाख मरीज अस्पतालों  में इलाजरत हैं |

 यदि अमेरिका जैसे विकसित देश से तुलना करें तो भारत बहुत ही अच्छी हालत में है | लेकिन बीते कुछ समय से प्रतिदिन जिस बड़ी संख्या में नए मामले आ रहे हैं उसे देखते हुए हर चार दिन में एक लाख का आंकड़ा छूने की स्थिति बन चुकी  है | विशेषज्ञों की  मानें तो जुलाई अंत तक कुल संक्रमित लोगों का आंकडा 25 लाख से उपर जा चुका  होगा | भले ही तकरीबन दो तिहाई ठीक होते जाएँ किन्तु तब भी  बहुत  बड़ी संख्या में अस्पतालों में कोरोना मरीज भर्ती रहेंगे , वहीं मृतकों का आंकड़ा यदि एक लाख के ऊपर जा पहुंचे तो अचम्भा नहीं होगा |

ऐसे में सरकार स्कूल कालेज बंद रखे हुए हुए है | इस वर्ष पाठ्यक्रम में भी कटौती की जा रही है | छोटी कक्षा से लेकर विश्वविद्यालय तक में ऑन लाइन शिक्षा दी जा रही है | विधिवत रूप से शिक्षण संस्थान  कब से  खुलेंगे और परीक्षा  कब होगी  ये अनिश्चित बना हुआ है | कोरोना का फैलाव देश के छोटे - छोटे स्थानों पर होने की खबरें नित्य आ रही हैं | अभी तो उसके चरमोत्कर्ष की  प्रतीक्षा हो रही है | कोई  कह रहा है जुलाई के अंत से तो कोई अगस्त और सितम्बर से कोरोना में कमी आने का दावा कर रहा है लेकिन सभी अंदाजिया घोड़े दौड़ा रहे हैं | वैक्सीन आने का ढोल तो खूब बज रहा है लेकिन उसके बारे में  कुछ निश्चित नहीं है |

ये सब देखते हुए विचारणीय प्रश्न ये है कि जब देश में कोरोना का संक्रमण तेजी से खतरनाक स्तर की ओर बढ़ता जा रहा है तब क्या देश में चुनाव जैसे आयोजन होने चाहिए ? मप्र विधानसभा के 24 उपचुनावों के अलावा अक्टूबर - नवम्बर में बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं | राजनीतिक दल इनके लिये तैयारी कर रहे हैं | संवैधानिक प्रावधानों का पालन करते हुए निर्धारित अवधि में चुनाव प्रक्रिया पूर्ण करना चुनाव आयोग का दायित्व है और वह उस दिशा में काम भी कर रहा होगा किन्तु जब ये चेतावनी दी जा रही है कि आगामी कुछ महीनों में कोरोना संक्रमण अपने चर्मोत्कर्ष पर होगा तब क्या मप्र और बिहार के सरकारी अमले को विधान सभा चुनाव के काम में लगाया जाना सही रहेगा ?  चुनावों में जिलों  के कलेक्टर रिटर्निंग अधिकारी होते हैं | और वर्तमान में देश के सारे जिला कलेक्टर कोरोना की जांच , रोकथाम और उसके अलावा गरीबों को शासन द्वारा दिए जा रहे अनाज आदि के वितरण में व्यस्त हैं | मप्र के जिन जिलों में  उपचुनाव होने वाले हैं उनमें से कुछ में कोरोना तेजी से बढ़ता जा रहा है | इसी तरह से बिहार में प्रवासी  श्रमिकों के लौटने के बाद पूरे राज्य में कोरोना का संक्रमण वृद्धि की ओर है |

इससे बड़ी बात चुनावों में होने वाले खर्च की  है | सरकारी खजाने से तो करोड़ों खर्च होते  ही हैं लेकिन राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों का कुल खर्च अरबों में जा पहुचंता है |  आजकल पार्टियाँ और प्रत्याशी दोनों जो सर्वेक्षण करवाती हैं उस पर भी बड़ी राशि व्यय होती है | लेकिन उससे भी  अलग हटाकर देखें तो क्या चुनाव प्रचार और मतदान के समय शारीरिक दूरी के अलावा कोरोना सम्बंन्धी अन्य सावधानियों का पालन संभव होगा ? जो सरकारी अमला चुनाव ड्यूटी पर जाएगा उसके संक्रमित होने की बेहद सम्भावना रहेगी | बड़ी संख्या में सरकारी विद्यालय कोरोना आइसोलेशन एवं क्वारनटाइन के लिए आरक्षित जा चुके थे | ग्रामीण क्षेत्रों में तो खास तौर पर ऐसा किया गया | ऐसे में मतदान कहाँ होगा ?

ऐसी परिस्थितियों में चुनाव का आयोजन और संचालन दोनों औचित्यहीन होंगे | और अधिकतर मतदाता कोरोना संक्रमण के चलते मतदान करने जाएँगे इस पर भी संदेह है | 65 साल से ऊपर  के मतदाताओं को डाक मतपत्र की सुविधा भी सभी राजनीतिक दल स्वीकार नहीं कर रहे | ये सब देखते हुए देश और जनता दोनों का हित इसी में है कि आगामी एक वर्ष या कम से कम कोरोना की औपचारिक विदाई होने तक चुनाव चक्कर से देश को राहत दी जाए जिससे कि सरकारी अमला पूरी ताकत  कोरोना से लड़ने में लगा सके | चूंकि चुनाव ड्यूटी में  सबसे ज्यादा  उपयोग  शिक्षक समुदाय का है इसलिए चुनाव के समय पढ़ाई प्रभावित होती है | पुलिस और प्रशासन दोनों नेताओं के दौरों में फंसकर रह जाते हैं |

इस प्रकार देश के  वर्तमान हालात चुनाव करवाने के अनुमति नहीं देते | सरकार को चाहिए कि वह सभी राजनीतिक  पार्टियों को बुलाकर इस बारे में आम सहमति बनाये | बिहार में राजद नेता तेजस्वी यादव ने तो गत दिवस विधानसभा चुनाव अभी नहीं करवाने की मांग भी कर डाली |

समय का तकाजा  है कि जब तक देश में कोरोना संक्रमण का विस्तार नहीं रुकता तब तक किसी भी तरह के चुनाव पर रोक लगा दी जाए | इसके लिए सभी पार्टियाँ मिलकर संसद में प्रस्ताव पारित कर चुनाव आयोग को चुनाव टालने के आधिकार दें |

 संविधान में लोगों को जीवन का जो अधिकार दिया गया है ,चुनाव के नाम पर उसे खतरे में डालना जनतंत्र का अपमान है |

चीन पर आर्थिक प्रहार करते रहना चाहिए



भारत और चीन के बीच गत दिवस इस बात पर सहमति बन गई कि लद्दाख में दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर लौट जाएँगी। रक्षा सलाहकारों की फोन पर हुई लम्बी वार्ता में उक्त निर्णय होते ही खबर आई कि दोनों पक्षों के सैनिक गलवान घाटी से वापिस लौटने लगे हैं। यद्यपि अधिकृत सूत्र इस बारे में खामोश हैं। वैसे गत सप्ताह भारत और चीन के सैन्य अधिकारियों के बीच हुई बातचीत में भी काफी कुछ तय हो गया था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लद्दाख यात्रा के दौरान चीन को जिस आक्रामक अंदाज में विस्तारवाद के विरुध्द चेतावनी दी गयी , वह कारगर साबित हुई। प्रधानमंत्री का अग्रिम मोर्चे पर जाकर सैनिकों को सम्बोधित करना यूँ तो एक सामान्य प्रक्रिया ही थी। श्री मोदी साल में एक दो बार अग्रिम मोर्चों पर जाकर जवानों के साथ त्यौहार मनाते रहे हैं। लेकिन उनकी हालिया यात्रा जिस पृष्ठभूमि और तनावपूर्ण वातावरण में हुई उसका कूटनीतिक महत्व कहीं ज्यादा था। और उन्होंने अवसर का पूरा-पूरा लाभ लेने का प्रयास भी किया। इस बारे में कहना गलत न होगा कि ये पहला अवसर है जब भारत ने चीन पर चौतरफा दबाव बनाया। 15 जून को गलवान में हुए खूनी संघर्ष में पहले-पहल तो हमारी सैन्य टुकड़ी चीनी धोखेबाजी की शिकार हो गयी किन्तु अगले ही पल भारतीय सेना ने जवाबी कार्र्वाई करते हुए चीन के सैनिकों को बड़ी संख्या में मौत के घाट उतार दिया। उस संघर्ष के बाद सीमा पर युद्ध के बादल मंडराने लगे थे। लेकिन भारत ने चीन के भड़काऊ रवैये से सतर्क रहते हुए बुद्धिमत्ता से काम लिया और आर्थिक हितों को चोट पहुँचाने का बहुप्रतीक्षित कदम उठाकर उसे चौंका दिया। सीमा पर तनाव के बाद जब चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की बात उठी तब वहां के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने भारतीयों का ये कहकर मजाक उड़ाया कि वे जरूरी चीजों के लिए तरस जायेंगे। लेकिन सरकार द्वारा उठाये गए ताबड़तोड़ क़दमों का जनता ने जिस उत्साह से स्वागत किया उसका चीन पर माकूल असर हुआ। लेकिन उससे भी बड़ा आश्चर्य तब हुआ जब देश भर के फुटकर व्यापारियों ने भी चीनी सामान की खरीदी और बिक्री नहीं करने का फैसला किया। इसके कारण भी सरकार को काफी संबल मिला और प्रधानमंत्री जब लद्दाख गए तब वे पूरे देश से मिले अभूतपूर्व समर्थन के कारण आत्मविश्वास से भरे हुए थे। लद्दाख में सैनिकों को दिए संबोधन के बहाने उन्होंने चीन को सीधे-सीधे बता दिया कि सैन्य कार्रवाई होने पर भारत मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है। सीमा पर फ़ौज की तैनाती के साथ ही वायु सेना की प्रभावशाली मौजूदगी से भी चीन पर दबाव बढ़ा। गत दिवस रक्षा सलाहकारों के बीच हुई वार्ता का जो परिणाम सामने आया यदि वह पूरी तरह अमल में आ जाता है तो ये मानकर चला जा सकता है कि सैनिक स्तर का तनाव कुछ कम हो जाएगा। लेकिन इस बारे में आम राय ये है कि चीन के किसी भी आश्वासन पर यकीन करना आत्मघाती  होगा। धोखा देना उसका स्वभाव है और उसमें किसी भी बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ है। ऐसे में भले ही वह वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लौट जाए लेकिन दोबारा हिमाकत नहीं करेगा, ये मान लेना मूर्खता ही होगी। और इसीलिये इस वर्ष सर्दियों में भी अग्रिम मोर्चों पर सैनिको की तैनाती के साथ ही वायुसेना की सतर्कता आवश्यक रहेगी। लेकिन चीन पर असली दबाव् आर्थिक मोर्चे पर उसके बहिष्कार से ही बनेगा। इस बारे में ज्यादा शोर मचाने की जरूरत नहीं है। जनता, व्यापारी, उद्योगपति और सरकार सब हाल की घटनाओं से अपनी-अपनी भूमिका से अवगत हो चुके हैं। किसे क्या करना है ये बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन थोड़ी सूझबूझ भी दिखानी होगी। मसलन व्यापारिक मामलों में युद्ध की भाषा नुकसानदेह होगी। लिहाजा जिन चीजों का आयात चीन से किया जाना अनिवार्य हो उनको छोड़कर बाकी का निषेध किया जाए। आर्थिक मोर्चे पर किये जाने वाला प्रहार यदि जारी रखा जा सके तो चीन को सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। वर्तमान में उसकी ताकत उसकी आर्थिक समृद्धि ही है। जैसे कि संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक उसके विदेशी व्यापार में जबर्दस्त गिरावट आने से वह काफी परेशान है। भारत में तो उसका विरोध खैर दूसरे कारणों से हो रहा है लेकिन चीनी सामान के आयातक अधिकतर देशों में कोरोना संकट के कारण क्रय शक्ति कम होने से मांग घटी है। इसके अलावा अनेक देश ऐसे भी हैं जो आगे चीन से आर्थिक सम्बन्ध रखने के बारे में उदासीन हो चले हैं। इन सबके कारण भी वह काफी चिंतित है। इसीलिए सीमा विवाद पर अचानक नर्म रुख दिखाने लगा। बावजूद उसके उसकी हर गतिविधि पर नजर रखनी होगी। गलवान में हुई पिटाई से वह अपमानित महसूस कर रहा है और अवसर मिलते ही उस घटना का बदला लेने की कोशिश करेगा। जैसे कि जानकारी मिल रही है उसके अनुसार भारतीय सेनाएं अब पूरे साल चीन के साथ सटी सीमा पर मुस्तैद रहेंगीं जो कि जरूरी भी है। क्योंकि जऱा सी चूक होते ही चीन अपनी प्रवृत्ति से बाज नहीं आयेगा। इसीलिये दोनों देश के रक्षा सलाहकारों के बीच हुई बातचीत में सहमति बन जाने के बाद भी उसके आर्थिक बहिष्कार की मुहिम जारी रखना चाहिए क्योंकि यही उसका सबसे कमजोर पक्ष है।

-रवीन्द्र वाजपेयी