Saturday, 18 July 2020

पहला दौर जीतने के बाद धैर्य रखना चाहिए था गहलोत को



राजस्थान  का राजनीतिक रण जिस दिशा में बढ़ रहा है उसके कारण संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है। मुख्यमंत्री  अशोक गहलोत ने अपने बहुमत का जुगाड़ करते ही जिस तरह के तेवर दिखाए उससे कांग्रेस  आलाकमान भी हतप्रभ है। सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री के साथ ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से  हटाने के अलावा उनके साथ बागी हुए दो मंत्रियों की छुट्टी के बाद श्री गहलोत का रास्ता साफ़ हो चुका था। ये बात स्पष्ट  हो चुकी है कि श्री पायलट के पास सरकार गिराने या भाजपा के सहयोग से बनाने लायक संख्याबल नहीं है। और अभी तक की स्थिति में वे एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। बजाय बागी विधायकों को योग्यता संबंधी नोटिस देने के श्री गहलोत बेहतर होता विधानसभा का सत्र बुलवाकर अपना बहुमत साबित करने का दांव  चलते और तब पायलट खेमा पार्टी व्हिप के फेर में फंसकर या तो सरकार का समर्थन करता या उल्लंघन करने पर सदस्यता गंवाता। इसी तरह जब कांग्रेस हाईकमान सचिन पायलट को माफ़ करने के ऐलानिया आश्वासन के साथ गुस्सा थूककर घर लौट आने के लिए पुचकारने में लगा था तभी श्री गहलोत ने अपने बयान के जरिये जहर बुझे तीर  छोड़कर हाईकमान को झटका दे दिया। उनकी रणनीति इस बारे में बहुत स्पष्ट है। वे समझ चुके हैं कि कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति में वे अपरिहार्य हैं। जैसी कि चर्चा है पार्टी के केन्द्रीय कार्यलय का खर्च राजस्थान से ही पुजाया जाता है। केन्द्रीय नेतृत्व में अब इतना दम नहीं है कि वह किसी राज्य के मुख्यमंत्री को चलता कर सके।  इसमें दो मत नहीं हैं कि कांग्रेस पार्टी आज भी गांधी परिवार के इर्द - गिर्द ही मंडराती है किन्तु उसका रौब-रुतबा पहले जैसा नहीं रहा। इसकी वजह साफ है। अव्वल तो 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद राजस्थान और मप्र में राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य  सिंधिया मुख्यमंत्री नहीं  बन सके। सचिन को तो खैर उपमुख्यमंत्री  की गद्दी ही नसीब हो गई जबकि श्री सिंधिया लोकसभा चुनाव हारकर पूरी तरह हाशिये पर आ गये। राहुल की नजदीकी के बावजूद जब प्रदेश में उनकी उपेक्षा जारी रही तब वे बगावत कर बैठे और कमलनाथ सरकार धराशायी हो गयी। राजस्थान में भी जिन सचिन पायलट ने बगावत का झंडा उठाया वे भी टीम राहुल के अन्तरंग सदस्य थे। इन दो उदाहरणों से स्पष्ट हो गया कि राहुल गांधी के अत्यंत करीबी युवा नेताओं का ही कांग्रेस से मोहभंग होने लगा क्योंकि वरिष्ठ नेता उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं देते वहीं  राहुल भी उनका संरक्षण करने में विफल रहे हैं। गांधी परिवार के अत्यंत करीबी माने जाने वाले कुछ वरिष्ठ नेतागण  भी इस बात से रुष्ट हैं कि पार्टी का प्रथम परिवार धीरे - धीरे अपनी पकड़ खो रहा है। ज्योतिरादित्य के बाद साचिन ने जिस तरह से सोनिया गांधी के अलावा राहुल और प्रियंका वाड्रा की उपेक्षा की वह साधारण बात नहीं है। अशोक गहलोत इस कमजोरी को भांप गए और उन्होंने बिना समय गँवाए श्री पायलट की  वापिसी  के सारे रास्ते बंद कर  दिए। ये भी चर्चा है कि इस खेल में उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का भी गुप्त सहयोग मिल रहा है जो  इस दौरान पूरी तरह से  चुप्पी साधे हुए हैं। फिर भी  पायलट गुट की बगावत को काफी हद तक बेअसर कर देने के बाद श्री गहलोत को संभलकर कदम आगे बढ़ाना थे किन्तु  लगता है वे अति आत्मविश्वास का शिकार हो गये हैं। विधायकों  की खरीद फरोख्त संबंधी कुछ ऑडियो टेप को आधार बनाकर उनकी सरकार ने दो बागी  कांग्रेस विधायकों के साथ ही केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत के विरुद्ध भी मामला पंजीबद्ध कर  उनसे पूछताछ के लिए विशेष जांच दल भेज दिया। यही नहीं तो उनकी गिरफ्तारी की मांग भी उठवा दी। स्मरणीय है श्री शेखावत ने ही जोधपुर लोकसभा सीट पर श्री गहलोत के पुत्र वैभव को रिकार्ड मतों  से हराया था। इस तरह की कार्रवाई से गहलोत परिवार की खीझ ही सामने आ रही है। ऑडियो टेप को लेकर की जा रही कार्रवाई धैर्य के साथ होती तो वह निष्कर्ष तक पहुंचती। लेकिन श्री गहलोत लगता है एक साथ अनेक मोर्चे खोल बैठे जो उनकी पूरी बढ़त को मटियामेट कर  सकती  है। सचिन पायलट का अभियान तो उन्होंने बड़ी ही चतुराई से फुस्स कर दिया किन्तु ये दूसरा मोर्चा उनके लिए मुसीबत का सबब बन सकता है। अभी तक भाजपा दूर से बैठकर नजारा देख रही थी। लेकिन मुख्यमंत्री ने अति उत्साह में जो कदम उठा लिए उनके बाद भाजपा हाईकमान भी यदि मैदान में आ गया तब श्री गहलोत की जादूगरी बेअसर होकर रह जायेगी। राजनीति में आक्रामक होना बुरा नहीं है लेकिन ये ध्यान भी रखना चाहिए कि आपके तीर इधर-उधर न चले जाएँ। वैसे राजस्थान की मौजूदा राजनीति में एक से बढ़कर एक पैंतरे देखने मिल रहे हैं परन्तु  मुख्यमंत्री ने बिना सोचे - समझे हमले जारी रखे तब उनका दम जल्दी फूलने का खतरा है।  उनको ये ध्यान रखना चाहिए कि सचिन की वापिसी में रोड़े अटकाकर उनने कांग्रेस  हाईकमान को भी छेड़ दिया है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 17 July 2020

न्याय की देवी को काली पट्टी और मी लॉर्ड को चश्मे के 50 हजार मुंशी प्रेमचन्द के पंच परमेश्वर याद आ गये





देश में विधायिका और  कार्यपालिका में बैठे कथित जनसेवकों द्वारा सरकार के पैसों पर किये जाने ऐश के बारे में जनता की आवाज तो नक्कारखाने में तूती समान होकर रह जाती है | जिन्हें जनता के बारे में सोचना  और कुछ करना चाहिये वे नेता और नौकरशाह आज भी अंग्रेजों के दौर वाली ठसक दिखाने से बाज नहीं आते | इसीलिये देश के भविष्य के लिए चिंतित हर जिम्मेदार नागरिक न्यायपालिका की तरफ बड़ी ही  उम्मीद से निहारता है | और ये कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि न्यायापालिका ने देश हित में अनेक ऐतिहासिक फैसले सुनाकर लोकतांत्रिक मर्यादाओं  और मूल्यों की रक्षा की | अमूमन  देखा गया है कि कार्यपालिका और विधायिका जिन पेचीदा मामलों अथवा विवादों को छूने से भी कतराती हैं  न्यायपालिका साहस दिखाते हुए उनका हल निकाल देती है |

ये भी  संतोष  और सौभाग्य का विषय है कि संसद और विधानसभा के फैसलों को मानने से इंकार करने की जुर्रत करने वाले भी न्यायपालिका के अप्रिय लगने वाले फैसलों को  सिर झुकाकर मंजूर कर लेते  हैं  | 

अयोध्या की राम जन्मभूमि का विवाद सुलझाने की हिम्मत न देश की संसद की हुई और न ही किसी प्रधानमंत्री ने इसे हल करने का  साहस जुटाया  | राष्ट्रीय  राजनीति को गहराई  तक प्रभावित करने वाले उक्त मुद्दे पर जिस तरह का भावनात्मक ध्रुवीकरण हुआ उसके बाद राजनीतिक समाधान की सभी संभावनाएं खत्म हो चुकी थीं |  लेकिन राजनीतिक पार्टियों के अलावा धार्मिक संगठन और साधु -संत , मुल्ला - मौलवी सभी  ने एक स्वर से कह दिया कि  सर्वोच्च न्यायालय जो फैसला देगा उसे सभी स्वीकार कर लेंगे और हुआ भी यही |

लेकिन न्यायपालिका के प्रति बिना शर्त सम्मान में तब कमी आती है जब कतिपय आचरण और क्रियाकलाप उसके श्रेष्ठि भाव का परिचय देते हैं | न्यायपालिका में निचले स्तर पर तो भ्रष्टाचार है ही किन्तु जब उच्च स्तर पर भी उसकी जानकारी  आती है तब दुःख के साथ चिंता  भी होने लगती है | बाहर के लोग आरोप लगायें  तो बात नजरअंदाज भी की जा सकती है लेकिन जब न्यायपालिका की सर्वोच्च आसंदी पर विराजमान माननीय एक दूसरे के  विरुद्ध मोर्चा  खोकर बैठ जाएँ तब ये सोचना पड़ता है कि पानी सिर से ऊपर आने को है | उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने तो सर्वोच्च न्यायालय के  न्यायाधीशों तक के विरुद्ध मनमर्जी से आदेश पारित कर दिए | बाद में वे फरार हो गये और चेन्नई में पकड़े गए |

खैर , ये सब तो समाज में आये चारित्रिक  पतन या बदलाव के कारण सामान्य प्रतीत होने लगा है | आखिर न्यायाधीश भी तो इसी समाज और न्यायिक व्यवस्था से आते हैं जहाँ भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मानकर आंखें मूँद लेने की प्रवृत्ति हावी हो चुकी है | और यही वजह है कि न्यायाधीश की कुर्सी पर आसीन मान्यवर भी  राजनेताओं की तरह राजसी ठाठ - बाट की अपेक्षा करने से बाज नहीं आते | उनके पद की गरिमा और महत्व को देखते हुए उन्हें अच्छा वेतन- भत्ते , आवास , नौकर - चाकर , सुरक्षा , चिकित्सा आदि मिलना जरूरी है | सेवा निवृत्ति के बाद भी उन्हें  शासकीय अधिकारियों जैसी या उससे अधिक सुविधाएं मिलना भी काफ़ी हद तक ठीक ही है | न्यायाधीशों की शान में गुस्ताखी करने की हिम्मत अच्छे - अच्छों की नहीं  पड़ती | यहाँ तक कि छुटभैये नेता से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक की बखिया उधेड़ने वाले समाचार माध्यम भी , मी लॉर्ड की  बात आते ही दायें - बाएं होने लगते हैं |

इसी संदर्भ में  बॉम्बे  उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को महाराष्ट्र सरकार के एक निर्णय के अंतर्गत  चश्मा बनवाने हेतु प्रतिवर्ष 50 हजार रु. की  राशि मंजूर किया जाना न सिर्फ आश्चर्यचकित  करने अपितु हंसने  को मजबूर करता है | उनकी  पत्नी और  आश्रित बच्चे भी इस व्यवस्था से लाभान्वित हो सकेंगे | इस बारे में पांच -  छः माह पहले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश और मुख्य सचिव अजॉय मेहता के बीच चर्चा हुई थी | आजकल श्री मेहता मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के सलाहकार हैं |

सवाल ये नहीं है कि न्यायाधीशों की सेवा शर्तों के अनुसार उन्हें क्या मिलता है ? सवाल ये है कि महाराष्ट्र जैसे राज्य के मुख्य न्यायाधीश और मुख्य सचिव  के बीच चश्मे जैसी बेहद मामूली चीज के लिए राशि के निर्धारण पर चर्चा हुई और उस पर लम्बे विचार - विमर्श के बाद सरकार ने अंततः प्रस्ताव पारित कर  दिया | कोई न्यायाधीश और उसकी पत्नी  तथा बच्चे कौन सा चश्मा लगायें और उसकी  कीमत क्या हो ये  उनकी निजी पसंद का मामला है | उनका इलाज सरकारी खर्च पर हो और उन्हें विशिष्ट व्यक्ति के तौर पर तमाम सुविधाएं  और सम्मान हासिल हों इसमें भी किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन चिकित्सा सुविधा के तहत  चश्मे की कीमत तय करने के लिए माननीय मुख्य न्यायाधीश को मुख्य सचिव के साथ बैठना पड़ा ये शोचनीय है |  

पता नहीं ये व्यवस्था बाकी उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी है या नहीं  किन्तु राज्य की न्यायपालिका और नौकरशाही का मुखिया बैठकर न्याय व्यवस्था में सुधार जैसे किसी विषय पर चर्चा करते तो वह स्वागतयोग्य होती  | लेकिन महज एक चश्मे  की कीमत हेतु दो दिग्गजों ने अपना समय खर्च किया ये हमारी न्याय  व्यवस्था और शासन प्रणाली दोनों के लिए गम्भीर विमर्श का विषय होना चाहिए |

मेरा आशय न्यायपालिका का मखौल उड़ाना बिलकुल नहीं है लेकिन इस तरह के शासकीय निर्णयों और उनमें न्यायपालिका के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति की सक्रिय भूमिका से यदि आम जनता के बीच न्यायपालिका की निरंतर खराब हो रही छवि और गिर जाए तो उसे अस्वाभाविक नहीं कहा जाना चाहिए | उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को मिलने वाला वेतन इतना कम नहीं है कि उन्हें अपने और पत्नी के साथ ही आश्रित बच्चों के लिए चश्मा जैसी मामूली चीज खरीदने के लिए सरकार का मुंह ताकना पड़े |और फिर प्रतिवर्ष 50 हजार रु. के चश्मा भत्ते की राशि का प्रावधान तो और चौंकाने वाला है | कल को ऐसी ही  सुविधा देश के सम्मानीय विधायक - सांसद  और उनके पीछे आला नौकरशाह भी हासिल करने लगें तब उनका  हाथ पकड़ने वाला कौन होगा ?

उल्लेखनीय है निःशुल्क नेत्र शिविरों में गरीबों के मोतियाबिंद ऑपरेशन हेतु सरकार तीन से चार हजार रु. प्रति मरीज बतौर अनुदान शिविर आयोजकों को देती है | उस आधार पर देखें तो बॉम्बे उच्च न्यायालय में तकरीबन 68 न्यायाधीश हैं | इसकी पीठ नागपुर , औरंगाबाद और गोवा  में है | साधारण बुद्धि वाला भी बता देगा कि इन न्यायाधीशों को चश्मा भत्ते के रूप में दी जाने वाली राशि से कितने गरीबों की आँख का मोतियाबिंद ठीक किया जा सकता है |

ऐसे समय में जब कोरोना  संकट के कारण   देश के सांसदों और  शासकीय कर्मियों के वेतन भत्ते कम कर दिए गए और सरकारी राजस्व गिर रहा है तब इस तरह के चश्मे भत्ते की स्वीकृति  आँखों में किरकिरी पैदा करने वाली है |

भारतीय फिल्मों में न्यायाधीश के  पीछे खड़ी न्याय की देवी रूपी प्रतिमा की आंख में पट्टी बांधी होती है | यदि यही स्थिति रही तो बड़ी बात नहीं आने वाले समय में न्याय की देवी की आँखों पर भी कोई ब्रांडेड चश्मा हो |

अनायास मुंशी प्रेमचंद की कालजयी  कहानी पंच परमेश्वर के अलगू चौधरी और जुम्मन शेख जैसे पंच याद आ गये जो किसी सरकारी सुविधा के मोहताज हुए बगैर लम्बी - लम्बी  तारीखें दिये बिना ऐसा न्याय करते थे जिसमें दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता था |

लेकिन उनकी आँखों पर लोकलाज का चश्मा था , किसी सरकार का नहीं |

नेता और जनता नहीं माने तो बीमारी महामारी में बदल जायेगी



आखिरकार भारत में कोरोना 10 लाख  का आंकड़ा लांघ गया ।  हालांकि अभी तक ठीक होने वालों का राष्ट्रीय औसत 63 प्रतिशत है जबकि मृत्यु दर को लेकर थोड़ा भ्रम है ।  यदि ठीक होने  वालों की  संख्या से उसे जोड़ें तो वह 4 फीसदी  है लेकिन अब तक संक्रमित हुए कुल लोगों की संख्या के आधार पर मूल्यांकन करें तो वह मात्र ढाई प्रतिशत ही आती है ।  संतोष की बात ये जरूर  है कि अस्पतालों में भर्ती मरीज 3.6।  लाख ही हैं किन्तु  चिंता का विषय ये है कि प्रतिदिन ठीक होने वाले मरीजों की तुलना में नए संक्रमित ज्यादा होने से अस्पतालों की क्षमता  निरंतर कम होती जा रही है । वृद्धि का आंकडा मात्र तीन दिनों में एक लाख होने के बाद आशंका है कि कुछ दिनों के बाद प्रति दिन 1 लाख नए मरीज आयेंगे । और वही भयभीत कर  रहा है  क्योंकि उस स्थिति में न तो सरकारी  और न ही निजी क्षेत्र के अस्पतालों में पैर रखने की जगह बचेगी ।  इसके अलावा विचारणीय बात ये भी है कि बरसात के  मौसम में डेंगू , मलेरिया , चिकिनगुनिया और अन्य वायरल बीमारियाँ भी तेजी से फैलती हैं जिनके कारण अस्पतालों पर  वैसे भी काफी दबाव रहता है ।  उस स्थिति में यदि कोरोना  संक्रमण इसी गति से बढ़ता गया तब चिकित्सा प्रबंध गड़बड़ा जायेंगे ।  हालांकि हो वैसा ही रहा है जैसा विशेषज्ञ अनुमान लगा चुके थे । जुलाई और अगस्त में  कोरोना का चरमोत्कर्ष आने के बाद उसमें ढलान आने की बात लगातार जिम्मेदार सूत्रों ने कही थी ।  उनको लगता था कि तब तक शायद वैक्सीन भी  बाजार में आ जायेगी ।   लेकिन उस बारे में नित नई खबरें आने के बाद भी अभी तक कोई निश्चित तिथि बताने जैसी स्थिति नहीं   है ।  भारत सहित अनेक देशों ने संकेत दिया है कि  वे वैक्सीन बनाने के बाद उसके  मानव  परीक्षण के दौर  में हैं और अतिशीघ्र उसके  बाजार में आने की सम्भावना है ।  इस बारे में उल्लेखनीय बात ये होगी कि भारत में बनी वैक्सीन यदि पहले आ गई तब तो हमारे देश के लोगों को उसका लाभ तत्काल मिल जाएगा वरना  विदेशों में बनी वैक्सीन के भारतीय बाजारों में आने में समय लगेगा ।  यद्यपि ये  बात आशा जगाने वाली  है कि वैक्सीन खोजे कोई भी लेकिन उसका व्यावसायिक उत्पादन भारत में भी होगा क्योंकि यहाँ उसके लिए जरूरी अधोसंरचना पहले से है ।  माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स ने भी गत दिवस इसकी उम्मीद जताई है ।  लेकिन मोटे तौर पर ये माना जा रहा है कि वैक्सीन पूरी  तरह से बाजार में आने तक 2020 विदा हो जाएगा । और इसीलिये शायद कुछ विदेशी विशेषज्ञों ने आगामी वर्ष की जनवरी  और फरवरी में  कोरोना के भयावह होने की आशंका  जताई है ।  आंकड़ों की मगजमारी से  अलग  हटकर देखें तो ये मानना पड़ेगा कि प्रारम्भिक दौर में अच्छा प्रदर्शन  करने के बाद भारत बीते डेढ़ महीने के दौरान  गंभीर हालात में आ पहुंचा है । और इसकी वजह जनता और नेताओं द्वारा  बरती गई घोर लापरवाही है ।  लॉक डाउन के दौरान भारत में कोरोना का फैलाव देश की आबादी के मद्देनजर बहुत ही मामूली था ।  कुल मरीजों के  0 फीसदी चंद महानगरों में ही सिमटे थे । हॉट स्पॉट का चयन भी  सही समय पर कर लिया गया ।  कन्टेनमेंट जोन बनाकर कोरोना के सामुदायिक फैलाव को रोकने में भी उल्लेख्नीय सफलता हासिल हुए । मुम्बई के धारावी इलाके की झोपड़ पट्टी में कोरोना को जिस तरह से नियंत्रित किया जा सका उसकी वैश्विक स्तर पर तारीफ भी हुई लेकिन लॉक डाउन हटते  ही अनुशासनहीनता का जो नजारा  दिखाई दिया वह कोरोना के विस्फोट का कारण बन गया । जिन दो - तीन सावधानियों का पालन कोरोना से बचाव के लिए ज़रूरी बताया गया वे इतनी कठिन या अव्यवहारिक नहीं हैं जिनका पालन न किया जा सके । मुंह और नाक को ढंकने के  साथ ही हाथ को साफ करते रहना और लोगों के बीच शारीरिक दूरी जैसे सामान्य उपायों से कोरोना सदृश खतरनाक संक्रमण को रोकना संभव  है लेकिन न जाने लोगों को इसमें भी क्या परेशानी होती है ? बाजारों सहित सार्वजनिक स्थलों पर आम जनता जिस बेख़ौफ़ अंदाज में घूमती दिखती है  उससे तो लगता है उसे अपनी जान की  कोई परवाह ही  नहीं है ।  लेकिन बीते एक - दो सप्ताह में कोरोना संक्रमण का आंकड़ा  जिस तेजी से आसमान छूने पर आमादा है उसे देखते हुए अब लोगों को सावधान होना चाहिए वरना दो महीने से ज्यादा के लॉक डाउन की समूची मेहनत पर पानी फिर जाएगा । कुछ जगहों को अपवादस्वरूप छोड़ दें तो देश की  अर्थव्यवस्था दोबारा राष्ट्रव्यापी लॉक डाउन की अनुमति नहीं  देती । यूँ भी पूरी दुनिया ये स्वीकार कर चुकी है कि लॉक डाउन एक हद के बाद अनावश्यक और नुकसानदेह हो जाता है । ऐसे में अब बात जनता के स्तर पर आकर ठहर जाती है । हमारी जान की रक्षा के  लिए सरकार और डाक्टर से पहले हम जिम्मेदार हैं । लेकिन जनता को प्रेरित करने वाले राजनेता भी कोरोना के फैलाव के लिए कम दोषी नहीं हैं । अनेक शहरों में राजनीतिक जलसों के  बाद  बड़ी  संख्या में मरीजों का  निकलना इसका प्रमाण है । कोरोना के प्रति यदि इसी तरह का गैर जिम्मेदाराना रवैया दिखाया जाता रहा तब बीमारी के महामारी में बदलने की आशंका वास्तविकता में बदल जायेगी ।  क्या हम इसके लिए तैयार हैं ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 July 2020

बात तो लाख टके की कही गहलोत ने लेकिन ....



राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भले ही ये कटाक्ष अपनी सत्ता के लिए खतरा बने हुए सचिन पायलट पर किया हो लेकिन उसमें सच्चाई है। यद्यपि उनकी टिप्पणी से कांग्रेस हायकमान नाराज बताया जाता है, परन्तु श्री पायलट के सन्दर्भ में उनका ये कहना गलत नहीं है कि इनकी रगड़ाई नहीं हुई, केंद्र में मंत्री बन गये। यदि रगड़ाई हुई होती तो और अच्छा काम करते। गहलोत जी ने लगे हाथ ये भी कह दिया कि सोने की छुरी खाने के लिए नहीं होती, अच्छी अंग्रेजी बोलने और स्मार्ट दिखने मात्र से कुछ नहीं होता। हालाँकि ये सब उन्होंने तब कहा जब सचिन को उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। निश्चित तौर पर ये एक व्यक्ति विशेष को लक्ष्य बनाकर कसा गया तंज है, किन्तु इसमें भारतीय राजनीति की वह कड़वी हकीकत छिपी हुई है जिसने लोकतंत्र में नव सामन्तवाद की नींव डाल दी। इसकी शुरुवात कब और किसने की ये तो शोध का विषय है लेकिन नेता पुत्रों और पुत्रियों के अलावा उनके कृपापात्रों का राजनीति में अचानक आकर छा जाना राजनीतिक पार्टियों के वैचारिक आधार और संगठनात्मक ढांचे को कमजोर करता है। श्री गहलोत ने खुद के चालीस वर्षीय राजनीतिक जीवन के हवाले से ये कहना चाहा कि वे परिश्रम करते हुए नीचे से ऊपर आये। उनका कथन पूरी तरह सही है लेकिन सवाल ये भी है कि उनके अपने बेटे वैभव की राजनीति में कितनी रगड़ाई हुई जिनको पिछले लोकसभा चुनाव में जोधपुर सीट से कांग्रेस टिकिट दी गई किन्तु वे बुरी तरह हार गए। बाद में उन्हें राजस्थान क्रिकेट एसो. का अध्यक्ष बनवाया गया जिसमें भी मुख्यमंत्री पिता का ही हाथ रहा। राजनीति में रगड़ाई से श्री गहलोत का आशय संगठन में निचले स्तर से उठते हुए ऊपर आने से है, पुरानी परम्परा यही थी। आजादी के आन्दोलन के समय छोटे कार्यकर्ता और बड़े नेता सभी जेल जाते थे। आजादी के बाद सत्ता और विपक्ष दोनों में ऐसे नेताओं की बहुतायत थी जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में कठोर संघर्ष और नि:स्वार्थ सेवा के आधार पर अपनी जगह बनाई। लेकिन उसके बाद परिवारवाद का सिलसिला शुरू हुआ। फिर भी तत्कालीन बड़े नेताओं के वंशजों को भी सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों का थोड़ा ज्ञान तो होता था जो उन्हें आजादी के संघर्ष के दौरान उनके परिवार की भूमिका से प्राप्त हुआ किन्तु साठ के दशक के बाद से राजनीतिक परिदृश्य जिस तरह बदला उसने राजनीति को पारिवारिक व्यवसाय और उत्तराधिकार में बदल दिया। धीरे-धीरे राजनीति के भी कुछ राजघराने बन गये और युवराजों के साथ ही उनके इर्दगिर्द मंडराने वालों को भी राजनीतिक जागीरदारी बतौर दी जाने लगी। मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं जिन्हें 1980 में संजय गांधी की निकटता का लाभ मिला मप्र की छिंदवाड़ा सीट से उम्मीदवारी के रूप में। 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की प्रचंड लहर में समूचा उत्तर भारत कांग्रेस विहीन हो गया था। यहाँ तक कि इंदिरा गांधी और संजय गांधी भी हार गए। तब भी छिंदवाड़ा में कांग्रेस के गार्गीशंकर मिश्रा जीते थे। इसलिए उसे सुरक्षित सीट मानकर कमलनाथ को वहां भेजा गया। 1980 से वे वहां ऐसे जमे कि छिंदवाड़ा और कमलनाथ समानार्थी बन बैठे। 2018 में उन्हें मप्र के मुख्यमंत्री बनने का अवसर भी मिल गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने बेटे नकुल नाथ को वहां से लोकसभा चुनाव जितवा दिया। श्री गहलोत द्वारा जिस रगड़ाई को मापदंड बनाने की बात कही उसमें कमलनाथ और नकुलनाथ कितने फिट बैठते हैं ये विश्लेषण का विषय है। उनके कारण उस अंचल के न जाने कितने प्रतिभावान कांग्रेसी जमीन से उपर नहीं उठ सके। ये तो महज एक उदहारण है। सचिन पायलट या वैभव गहलोत ही अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्हें बिना रगड़ाई के राजनीति में महत्व मिल गया हो। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा और प्रिय दत्त जैसे चेहरे भी तो बिना रगड़ाई के चमक उठे। और अब तो राजनीति में वंशवाद रूपी अमर बेल को रोपने वाली कांग्रेस ही अकेले उसकी पोषक नहीं रही। राहुल और प्रियंका को लेकर परिवारवाद का रोना रोने वाले दूसरे दलों में भी तो कमोबेश यही आलम है। उमर अब्दुल्ला, सुखबीर बादल, भूपिंदर हुड्डा, कुलदीप विश्नोई, अभय चौटाला, अनुराग ठाकुर, अजय माकन, अखिलेश यादव, पंकज सिंह, दुष्यंत सिंह, राजवीर सिंह, तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, संदीप दीक्षित, अभिषेक सिंह, हेमंत सोरेन, नवीन पटनायक, अभिजीत मुखर्जी, अशोक चव्हाण, आदित्य ठाकरे, कुमारस्वामी, जगनमोहन रेड्डी, कनिमोझी, स्टालिन जैसे और भी नाम हैं जिन्हें बिना रगड़ाई किये राजनीति में पैराशूट से उतार दिया गया। भले ही बाद में इनमें से कुछ ने अपनी मेहनत और योग्यता से मुकाम बनाया जिनमें नवीन पटनायक सबसे ज्यादा उल्लेखनीय हैं। लेकिन राजनीति का ककहरा पढ़े बिना ही इनमें से अधिकतर को स्नातक और किसी-किसी को तो डाक्टरेट की मानद उपाधि तक दे दी गयी। यद्यपि इस दौर में भी अनेक ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपनी औलादों या अन्य परिजनों को सियासत से दूर रखा। इनमें लालकृष्ण आडवाणी, डा. मुरलीमनोहर जोशी, डा. मनमोहन सिंह, नीतीश कुमार और शरद यादव उल्लेखनीय हैं वरना राजनीति विशद्ध पारिवारिक पेशा बनकर रह गयी है। राजीव गांधी ने अरुण नेहरु और अरुण सिंह जैसे कार्पोरेट संस्कृति के अपने यारों को सरकार का हिस्सा बनाया। श्री नेहरू तो बाद में भी सक्रिय रहे लेकिन अरुण सिंह गुमनामी में डूब गये। नेहरू-गांधी परिवार में घरेलू कर्मचारी की हैसियत वाले आर के धवन और माखनलाल फोतेदार सत्ता प्रतिष्ठान में जिस ऊंचाई तक पहुंचा दिए गये वह केवल उनके दरबारी होने का पुरुस्कार था। आजकल टीवी पर राजनीतिक पार्टियों के अनेक ऐसे प्रवक्ता नजर आने लगे हैं जिनका कोई जमीनी आधार नहीं है। उस दृष्टि से श्री गहलोत ने रगड़ाई वाला जो मुद्दा उठाया वह पूरी तरह से समयोचित है। लेकिन उनका बयान उनकी पार्टी के आला नेताओं को ही रास नहीं आने की जानकारी है क्योंकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में जमे नेताओं में से अधिकतर ने बिना रगड़ाई वाले अपने परिजनों और कृपापात्रों को ऊंची छलांग लगवा दी। गांधी परिवार के सदस्यों ने तो शिखर पर आने के लिए नीचे से चढ़ाई करने के बजाय हेलीकाप्टर का सहारा लिया ही लेकिन केवल कांग्रेस ही क्यों बाकी लगभग सभी पार्टियों में संघर्ष की आग में तपे बिना रेडीमेड नेताओं की लम्बी जमात है। वामपंथी पार्टियाँ हालाँकि अभी अपवाद बनी हुई हैं लेकिन वहां भी वैचारिक भटकाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अतीत में अमिताभ बच्चन द्वारा हेमवतीनंदन बहुगुणा और गोविंदा द्वारा राम नाइक जैसे नेताओं को हराना भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 July 2020

ईरान : सतही तौर पर नुकसान लेकिन ......





भारत और ईरान के सम्बन्धों में अचानक आया दुराव अस्वाभाविक नहीं है। दोनों के रिश्ते कूटनीतिक के अलावा सांस्कृतिक और व्यापारिक भी थे। पाकिस्तान में चीन द्वारा ग्वादर बंदरगाह बनाने का काम लिया तो भारत ने भी ईरान में चाबहार का बंदरगाह बनाने का अनुबंध करने के साथ ही वहां से अफगानिस्तान तक रेल लाइन बिछाने का काम भी ले लिया। इसका उद्देश्य अफगानिस्तान और मध्य एशिया के दूसरे देशों तक भारत की आवाजाही को सुगम बनाना था जो व्यापार के लिये भी बहुत ही मददगार होती। लेकिन बीते दो वर्षों से भारत और  ईरान के रिश्तों में ठंडक आ गई। इसका कारण अमेरिका बना जिसने ईरान के विरुद्ध वैसा ही रुख अख्तियार कर रखा है जैसा कभी ईराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन के प्रति था। आर्थिक प्रतिबंध थोपकर उसे जबरदस्त नुकसान पहुँचाने के अमेरिकी दांव के  पीछे दरअसल ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकना था। ईरान की मुख्य आय का स्रोत कच्चा तेल ही है। आर्थिक प्रतिबंधों के कारण उसने अपने तेल को सस्ते दाम पर बेचने की नीति अपनाई। इसका लाभ लेकर भारत सरकार ने भी ईरान से अनुबंध किया। मोदी सरकार ने उससे रिश्ते मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन अमेरिका से कूटनीतिक और आर्थिक हितों के साथ ही सैन्य मोर्चे पर बढ़ती नजदीकियों के कारण भारत को ईरान से न चाहते हुए भी दूरी बनानी पड़ी। तेल खरीदी रोकना उसमें सबसे प्रमुख कदम था। ऐसे में चीन ने उसका हाथ पकड़ने की पेशकश  की और गत दिवस इसका परिणाम भी सामने आ गया। भारत से चाबहार बंदरगाह और वहां से अफगानिस्तान की सीमा तक रेल लाइन बिछाने का काम छीनकर चीन को दे देना महज एक व्यापारिक समझौता नहीं बल्कि समूचे एशियाई क्षेत्र के शक्ति संतुलन के लिहाज से इसे एक बड़ा बदलाव माना जा सकता है। ईरान से चीन की निकटता के चलते उसे अपना व्यापार बढ़ाने का बहुत बड़ा अवसर मिलने की संभावना है। पाकिस्तान तो एक तरह से चीन का उपनिवेश है ही जहाँ वह जो चाहे कर  सकता है। चाबहार बंदरगाह मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता था। ईरान से मिलने वाले सस्ते कच्चे तेल से भी हमारी अर्थव्यवस्था को काफी सहारा मिलता रहा। ईरान और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार भी काफी संतुलित था। सबसे बड़ी बात ये रही कि कट्टरपंथी मुस्लिम देश होने के बाद भी ईरान ने भारत और पाकिस्तान के बीच बने  रहने वाले तनाव में कभी भी एकपक्षीय रवैया नहीं अपनाया। बावजूद इसके भारत द्वारा अमेरिका को खुश करने के फेर में उससे तेल की खरीदी रोक दी गई। चीन तो ऐसे अवसरों की तलाश करता ही रहता है, परन्तु इस बारे में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि भारत के साथ मजबूत रिश्तों को लेकर ईरान में कभी भी विरोध के स्वर नहीं  सुनाई दिए जबकि चीन के साथ हुए  हालिया 25 वर्षीय करार के विरुद्ध पूरे देश में बवाल मच गया है। लोगों का कहना है कि चीन  ने जिस भी देश में निवेश किया वह उस पर कर्ज का बोझ लादकर गुलाम बनाने का दाँव चलता है। अफ्रीका के अनेक देशों पर चीन ने जिस तरह से शिकंजा कसा वह ईरान के लोगों को डरा रहा है लेकिन अमेरिका द्वारा लगातार धमकाए जाने के कारण ईरान को भी अपने लिए एक संरक्षक चाहिए था और उसी कारण उसने चीन का हाथ थाम लिया। हालांकि इस  निष्कर्ष तक पहुंचना जल्दबाजी होगी कि ये भारत के लिए कूटनीतिक झटका है या नहीं क्योंकि ईरान से तेल की खरीदी बंद करने के बाद ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं था। देखने वाली बात ये होगी कि क्या चीन के विरोध में वहां जिस तरह की जन भावनाएं देखने मिल रही हैं वे कितनी देर तक टिकती हैं ?  यदि वे इसी तरह उग्र बनी रहीं तब तो ईरानी सरकार के लिये मुसीबत खड़ी हो जायेगी। कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित होने वाले देशों में ईरान काफी अग्रणी रहा। शुरुवाती दौर में इटली, स्पेन और ईरान में ही कोरोना का तांडव सबसे ज्यादा था। इस कारण ईरान में जनता का एक बड़ा वर्ग चीन  को कोरोना के लिए जिम्मेदार, मानकर उसके साथ किसी भी तरह के समझौते की मुखालफत कर रहा है। एशिया के कूटनीतिक संतुलन में चीन के साथ ईरान की दोस्ती से होने से वाले  बदलाव का असर  आने वाले समय में दिखाई देगा। भारत की मजबूरी ये है कि उसे भी अमेरिका की बहुत जरूरत है। बावजूद इसके भारत और ईरान में नजदीकी की संभावनाएं पूरे तौर पर खत्म नहीं हुईं हैं क्योंकि चीन के साथ उसके रिश्ते मजबूरी का सौदा हो सकते हैं लेकिन उनमें स्थायित्व की गारंटी नहीं दी जा सकती। सतही तौर पर ये कूटनीतिक बदलाव भारत के हितों पर चोट है लेकिन इसे धक्का नहीं कहा जा सकता क्योंकि रिश्ते कमजोर करने की पहल तो भारत ने ही की थी। उसके व्यापक राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर शायद ऐसा करना ही ठीक था। और फिर कूटनीति में रिश्ते आदर्श और भावनाओं से ज्यादा आवश्यकता और उपयोगिता पर आधारित होते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

राहुल ब्रिगेड को अपने भविष्य की चिंता सता रही कांग्रेस नहीं जागी तो ऐसे झटके लगते रहेंगे



राजस्थान की राजनीतिक गुत्थी सुलझी अथवा और उलझ गई ये कहना फ़िलहाल बेहद कठिन है | जहां तक सरकार बचाने का सवाल था तो तकनीकी तौर पर अभी भी अशोक गहलोत सरकार के पास बहुमत है | बागी नेता सचिन पायलट को सत्ता और संगठन के पदों से भले  हटा दिया गया हो लेकिन अभी भी उनको कांग्रेस से निष्कासित नहीं किया गया | और वे पार्टी के विधायक दल में ही माने जायेंगे | जैसे कि संकेत हैं वे आज या कल  अपना भावी कदम घोषित करेंगे | यद्यपि इसमें कोई दो राय नहीं कि सचिन की मनुहार करने में कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी ,  लेकिन उन्होंने उनसे बात करना तक जरूरी नहीं समझा |  राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा तक को उन्होंने तवज्जो नहीं दी | जिससे स्पष्ट हो गया कि पार्टी के  आला नेतृत्व से वे बहुत ज्यादा दुखी थे |

रही बात पद की तो वे राजस्थान के उपमुख्यमंत्री तो थे ही | भविष्य में सरकार की कमान उनके हाथ ही आने की संभावना भी हर कोई जता रहा था | पार्टी संगठन के भी वे ही मुखिया थे | ऐसे में क्या हो गया कि वे इतने आगे बढ़ गए जहाँ से लौटना संभव नहीं रहा | और किसी वजह से लौटते भी तो अपामान और पराजय का घूँट पीना पड़ता | कांग्रेस का आरोप है कि वे भाजपा के हाथों में खेल रहे हैं | ऊपरी तौर पर देखें तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि 20 - 30 विधायकों को लेकर सरकार गिराने की जुर्रत तो महामूर्खता होगी | कांग्रेस छोड़कर मप्र की कमलनाथ सरकार गिरवा चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया से सचिन की नजदीकियों के कारण भाजपा और उनके बीच रणनीतिक सामंजस्य बनने की बात तो हर कोई स्वीकार कर रहा है |

लेकिन श्री पायलट ने लगातार ये बात दोहराई  कि वे भाजपा में नहीं जा रहे  | ऐसे  में सवाल उठता है कि जब कांग्रेस में उनके लिए जगह बची नहीं और भाजपा में उन्हें जाना नहीं है तब वे क्या करेंगे क्या ? हाल - फ़िलहाल के लिए कोई क्षेत्रीय पार्टी बना भी  लें तो उसका भविष्य अनिश्चितता के घेरे में ही रहेगा | चुपचाप घर बैठने वाली बात होती तब उन्हें इतना बखेड़ा करने की जरूरत ही क्या थी ? सरकार में क्रमांक दो की हैसियत तो उनकी थी ही | मुख्यमंत्री से थोड़ा सा सामंजस्य स्थापित कर लेते तो सत्ता का सुख भोगते रहते | लेकिन पहले ज्योतिरादित्य और अब सचिन की बगावत केवल सत्ता में हिस्सेदारी का मामला नहीं है |

सचिन को मनाने से मुम्बई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और राहुल गांधी की टीम के ही एक  सदस्य मिलिंद देवड़ा ने साफ़ इंकार कर दिया | वहीं स्व. सुनील दत्त की बेटी और मुम्बई से सांसद रहीं प्रिया दत्त ने भी सचिन के विरुद्ध हुई कार्रवाई पर नाराजगी जताकर पार्टी आला कमान के कान खड़े कर दिए हैं | उप्र में भी जितिन प्रसाद नामक राहुल ब्रिगेड के एक सदस्य को सिंधिया और सचिन के रूप में दो युवाओं का बाहर जाना नागवार गुजर रहा है ।

सचिन की आगे की रणनीति कल तक  सामने आ  जायेगी किन्तु  यहाँ सवाल गहलोत सरकार के बचने या गिरने से भी बड़ा है | मप्र की तरह से ही  राजस्थान में भी सचिन के भाजपा में आने की खबरें वहां के भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं  को विचलित कर रही हैं | पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उनको किस हद तक स्वीकार करेंगीं ये बताने वाला कोई नहीं है | सचिन पायलट को मुख्यमंत्री  बनवाकर बाहर से समर्थन देने का विकल्प  भी तलाशा जा रहा होगा | विधानसभा से सचिन समर्थक विधायकों की छुट्टी होने पर थोक  के भाव उपचुनाव होंगे और उनमें  भाजपा की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं |

लेकिन समूचे विवाद की जड़ है राहुल गांधी का नेतृत्व और उनकी अंशकालिक राजनीतिक शैली | कोप भवन में जाकर बैठ जाने के बाद जिस तरह ज्योतिरादित्य और सचिन को अंतिम समय तक मनाने की कोशिशें की गईं यदि वे उनकी नाराजगी का पहला संकेत मिलते ही की गई होतीं तो बात इस हद तक शायद न बिगड़ती | लेकिन इस सबसे हटकर जो बात समझ आती है वह यह कि कांग्रेस के युवा नेतृत्व के दिल में ये धारणा घर करती जा रही है कि पार्टी का  भविष्य अंधकारमय है | ऐसे में उसमें बने रहने से उनका राजनीतिक कैरियर धक्के खाने में ही गुजर जाएगा | जहां तक बात राहुल और प्रियंका की है तो उन्हें राज परिवार की खानदानी हैसियत तो हासिल है ही | संयोगवश राहुल की टीम कहे जाने वाले समूह में ज्योतिरादित्य , सचिन , मिलिंद , जितिन और अब प्रिया  जैसे नेता भी वंशवाद की उपज ही हैं | उनकी पढ़ाई - लिखाई , पेशवर योग्यता और व्यक्तित्व सभी  दरकिनार रह जाते यदि वे क्रमशः माधव राव सिंधिया , राजेश पायलट , जितेन्द्र प्रसाद और सुनील दत्त के बेटे - बेटी न होते | ऐसे में उनका महत्वाकांक्षी होना स्वभाविक है | पिता की मृत्यु ने ही उनके लिए सियासी अवसर पैदा किया था |

 उन्हें लगने लगा कि राहुल तो गांधी परिवार की विरासत का लाभ लेते हुए महत्वपूर्ण बने रहेंगे लेकिन कांग्रेस नामक जहाज के डूबते जाने की आशंका दिन ब दिन प्रबल होने से उनका अपना भविष्य चौपट हो जाएगा | इस युवा नेताओं का झगड़ा दरअसल न कांग्रेस की नीतियों से है और न ही राहुल से | इन सबको इस बात की  चिंता है कि कांग्रेस का भविष्य जिस तरह से अनिश्चित होता जा रहा है उसे देखते हुए अगले चुनाव में भी उसकी वापिसी के आसार नजर नहीं आ रहे | ऐसे में अपना भविष्य बचाने  की गरज से ये सब समय रहते सुरक्षित  हो जाना चाहते हैं |

कांग्रेस का ये  कहना शत - प्रतिशत सही है कि उसने इन सबको बेहद कम उम्र में बहुत  कुछ दिया किन्तु ये भी उतना ही सच है कि कांग्रेस ने इन सभी के पिता के नाम को भुनाने के लिए इनका उपयोग किया | वरना तो ये सभी पढ़ने - लिखने के बाद अन्य काम कर रहे थे | कांग्रेस ने सभी दिवंगत नेताओं के बेटे - बेटियों को तो उपकृत नहीं  किया | एक बार सियासत में आने के बाद इनके मन में भी लड्डू फूटने लगे तो आश्चर्य कैसा ?  

उस दृष्टि से कांग्रेस को ये समझ लेना चाहिए कि जिन युवा नेताओं को वह भविष्य में अग्रणी पंक्ति का योद्धा बनाना चाह रही थी वे सभी सेनापति की अक्षमता का आकलन करने के बाद खेमा बदलने की  मानसिकता बना बैठे हैं | और आज के दौर में इसमें कुछ भी  अटपटा नहीं है  | एक जमाने में जब ज्योतिरादित्य के स्वर्गीय पिता अपनी माँ राजमाता विजयाराजे  की इच्छा के विरुद्ध कांग्रेस में गये थे तब वे भी अपने सुरक्षित भविष्य के प्रति चिंतित थे |

कांग्रेस को इस मानसिकता को गम्भीरता से समझ लेना चाहिए | उसके लिए चिंता का विषय कुछ राज्य सरकारें नहीं बल्कि गांधी परिवार विशेष रूप से राहुल और अब उनकी बहिन प्रियंका के नेतृत्व की प्रति बढ़ता अविश्वास ही है | यदि इन बानगियों के बाद भी कांग्रेस खुशफहमी में बैठी रही तो  उसे ऐसे झटके लगातार लगते रहेंगे | जहां तक बात भाजपा पर खरीद - फरोख्त का आरोप लगाने की है तो ये भारतीय राजनीति के बदलते हुए चरित्र की पहिचान है | राजस्थान में बसपा के सभी छह विधायकों को कांग्रेस में शामिल करने का दांव क्या मुफ्त में संभव हुआ ? कमलनाथ सरकार ने भी तो बाहरी समर्थन का जो जुगाड़ किया वह भी निःशुल्क नहीं माना जा सकता |

आने वाले दिनों में कांग्रेस से और भी लोग इसी तरह टूटें तो अचरज  वाली बात नहीं रहगी | आजदी के बाद पंडित नेहरु ने तमाम समाजवादी नेताओं को धीरे - धीरे कांग्रेस में खींचकर समाजवादी आन्दोलन को बहुत नुकसान पहुंचाया था | भाजपा भी अब सत्ता में आने और उसमें बने रहने के कांग्रेसी गुर सीखती जा रही है | जब नवजोत सिद्धू और शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस में आये तब वह खुश थी , अब भाजपा की बारी है |

हाँ ,  एक बात और है | सचिन पायलट कश्मीर की नेशनल कान्फ्रेंस नेता फारुख अब्दुल्ला के दामाद हैं | ऐसे में उनकी बगावत को कश्मीर की  भावी राजनीति से जोड़कर देखा जाना गलत नहीं होगा ।

Tuesday, 14 July 2020

कम से कम पढ़े लिखे लोग तो कोरोना के प्रति गंभीरता बरतें




देश में कोरोना संक्रमण की संख्या 9 लाख पार कर गई। अब प्रति तीन दिन में एक लाख नए मरीज सामने आ रहे हैं। कुछ राज्यों ने इस वजह से लॉक डाउन बढ़ा दिया । वहीं अधिकतर राज्यों ने सप्ताह में एक या दो दिन का अनिवार्य लॉक डाउन घोषित कर दिया है । संक्रमित लोगों की संख्या जिस तेजी से बढ़  रही है उसे देखते हुए अगस्त खत्म होने तक भले ही ठीक होने वालों का प्रतिशत काफी हो लेकिन अस्पतालों की व्यवस्था अपर्याप्त हो जायेगी। वैसे भी अब जैसी जानकारी आ रही है उसके अनुसार सरकारी अस्पतालों में पहले जैसी मुस्तैदी नहीं रही। संक्रमित व्यक्तियों को घर पर रखने जैसे प्रयोग भी भविष्य को भांपकर किये जाने लगे हैं। निजी अस्पतालों के लिए कोरोना नोट छापने की मशीन बनकर सामने आया है। एक तरफ तो आशा जगाने वाली बात है कि भयावह स्थिति से निकलकर दिल्ली में ठीक होने वालों का प्रतिशत 80 तक जा पहुंचा है और मुम्बई की धारावी नामक एशिया की सबसे बड़ी झोपड़ पट्टी में कोरोना को नियंत्रित कर लिया गया है। लेकिन दूसरी तरफ  ये बात भी पूरी तरह सही है कि इस अचानक आई बाढ़ का सबसे बड़ा कारण है लॉक डाउन का खुलना। हालांकि जाँच की संख्या बढऩे से भी नये मामले सामने आने लगे हैं लेकिन संक्रमण फैलाने के लिए आम जनता की लापरवाही पूरी तरह से जिम्मेदार है। लॉक डाउन लगाना जिस तरह से मजबूरी थी ठीक वैसे ही उसे हटाना भी जरूरी हो गया था। कारोबारी सक्रियता के अभाव में न सिर्फ  अर्थव्यवस्था अपितु समूचा सामाजिक ढांचा ही चरमराने लगा था। पूरी दुनिया में ऐसा ही देखने मिला। आखिर देश को पूरी तरह से सुप्तावस्था में तो नहीं रखा जा सकता था। बीते छ: सप्ताह की जो रिपोर्ट आई उसके मुताबिक उद्योग व्यापार क्षेत्र में काफी तेजी से काम शुरू हो चुका है। कुछ में तो लॉक डाउन से पहले वाली स्थिति लौट आई है। प्रवासी श्रमिकों के घर लौट जाने के कारण जरूर मानव संसाधन की कमी महसूस की जा रही है लेकिन उसके बाद भी उत्पादन ने गति पकड़ ली है। सबसे बड़ी बात ये है कि तमाम आशंकाओं के बावजूद बाजार में मांग नजर आ रही है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। पिछली फसल अच्छी आने के कारण ग्रामीण बाजार भी अर्थव्यवस्था को अच्छा समर्थन दे रहे हैं। कोरोना के कारण गर्मियों में होने वाले शादी-विवाह की संख्या में बेहद कमी आई। आमंत्रितों की संख्या भी सीमित किये जाने का असर कारोबार पर पड़ा। हमारे देश की आर्थिक रीढ़ को खेती और शादी दोनों का जबर्दस्त सहारा मिलता है। लेकिन जैसी उम्मीद है दीपावाली तक कोरोना ढलान पर आयेगा और तब बीते छ: महीने की कसर पूरी हो जायेगी। यद्यपि इस बारे में अभी कुछ भी कहना कठिन है लेकिन ये बात तो है कि भारत को लेकर दुनिया आशान्वित है। गत दिवस गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने जानकारी दी कि उनकी कम्पनी भारत में 75 हजार करोड़ का निवेश करने वाली है। उसके पहले प्रसिद्ध एपल कम्पनी ने भी चीन से अपना कारोबार घटाकर भारत में अपने उत्पादन में वृद्धि का ऐलान किया था। चीनी एप प्रतिबन्धित होने के बाद जिस तरह से भारत में बने एप की विश्वव्यापी मांग हुई वह भी उत्साहजनक है। कहने का आशय ये है कि कोरोना संकट का प्रारम्भ में भारत ने जिस तरह से मुकाबला किया उससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ी तथा आपदा प्रबन्धन के पेशेवर रवैये की दुनिया भर में तारीफ  हुई। लेकिन लॉक डाउन खुलते ही जनता ने दो माह से भी ज्यादा जिस धैर्य और अनुशासन का परिचय दिया वह सब देखते-देखते काफूर हो गया। बाजारों में तो लगता ही नहीं है कि कोरोना का कोई भय कहीं है भी। बड़े राजनीतिक जलसों में शासन के मंत्री तक बिना मास्क के नजर आते हैं । शारीरिक दूरी बनाये रखने की प्रति भी अव्वल दर्जे का उपेक्षा भाव हर किसी में है। शादी-विवाह एवं शव यात्रा में लोगों की उपस्थिति को सीमित किये जाने के बाद भी भीड़ की जाती है। जबलपुर नगर निगम में पदस्थ अपर आयुक्त स्तर के अधिकारी द्वारा अपने परिवार के एक विवाह में कानूनों का उल्लंघन करने के कारण दर्जनों लोगों को कोरोना हो गया। शहर के अनेक प्रशासनिक अधिकारी भी उस गैर कानूनी जलसे में शामिल थे। यदि अपर आयुक्त और उनके परिवार को कोरोना न हुआ होता तो बात दबी रहती। लेकिन समाचार पत्रों ने मामला उठाया तब जाकर गत दिवस उनके विरुद्ध रिपोर्ट की गई। ये तो महज एक मामला है। देश भर में ऐसी गलतियाँ जान बूझकर होने से कोरोना तेजी पकड़ रहा है। यदि अभी भी इस बारे में जिम्मेदारी का परिचय नहीं दिया गया तो आगे पाट पीछे सपाट और एक कदम आगे , दो कदम पीछे वाली स्थिति बनी रहेगी। कम से कम पढ़े लिखे लोग तो इस बात को समझें कि कोरोना न सिर्फ  आपके वरन सम्पर्क  में आने वाले अन्य लोगों के लिए भी जानलेवा हो सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी