Saturday, 8 August 2020

कश्मीर संभल गया तो मनोज सिन्हा का कद बहुत उंचा हो जाएगा



अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन होने के कारण बीते 5 अगस्त को पूरा परिवेश राममय हो गया और इसीलिये जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाये जाने की वर्षगांठ की ज्यादा चर्चा नहीं हो सकी। लेकिन उसके बाद वहां के उप राज्यपाल जीसी मुर्मू द्वारा स्तीफा दिए जाने से जरूर लोगों का ध्यान उस तरफ गया। पहले-पहल इस खबर से लोग चौंके। कारण जानने पर पता लगा कि उनकी राज्य की नौकरशाही से पट नहीं रही थी। राज्य में विधानसभा चुनाव करवाने की उनकी घोषणा पर चुनाव आयोग द्वारा आपत्ति किये जाने को भी उनके स्तीफे से जोड़ा गया। इसी बीच ये जानकारी आई कि केंद्र सरकार ने उन्हें नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) बनाने का फैसला किया है। लेकिन उनके स्थान पर पूर्व रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा को उपराज्यपाल बनाने की घोषणा ज्यादा चौंकाने वाली रही। उप्र की गाजीपुर लोकसभा सीट से तीन चुनाव जीत चुके श्री सिन्हा 2019 में हार गये। तभी से उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी देने की चर्चा चल रही थी । राज्यसभा में लाकर दोबारा मंत्री बनाये जाने की खबर भी उड़ी किन्तु वैसा नहीं हुआ। हाल ही में उन्हें जगत प्रकाश नड्डा की टीम में शामिल कर भाजपा संगठन के काम में लगाने की बात भी सुनाई दी । लेकिन अंतत: श्री सिन्हा को जम्मू कश्मीर की कमान सौंपकर उनका राजनीतिक पुनर्स्थापन  कर दिया गया। इसके पीछे उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का नजदीकी होना बताया जा रहा है। लेकिन श्री सिन्हा की योग्यता केवल इतनी नहीं है। विद्यार्थी जीवन में बनारस हिन्दू विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे श्री सिन्हा ने सिविल इन्जीनियरिंग में एम. टेक की उपाधि अर्जित की थी। मैदानी राजनीति के खिलाड़ी रहने के कारण उनकी संपर्क क्षमता बेजोड़ हैं। लेकिन वे बहुत ही धीर-गंभीर किस्म के व्यक्ति हैं और अपने काम को बड़ी ही निष्ठा के साथ करते हैं। पार्टी लाइन से भी भटकते नहीं। बतौर केन्द्रीय मंत्री उनका कार्य बहुत ही संतोषप्रद रहा। 2017 में उप्र के मुख्यमंत्री पद हेतु उनका नाम काफी आगे था लेकिन अंत में योगी आदित्यनाथ को अवसर मिल गया। लेकिन श्री सिन्हा ने कभी उस पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की। बीते सवा साल से वे राजनीतिक तौर पर खाली थे किन्तु उनको कोई न कोई महती जिम्मेदारी सौंपी जायेगी ये सम्भावना सदैव बनी रही। जम्मू कश्मीर लम्बे समय से राष्ट्रपति शासन के अधीन है। केंद्र शासित राज्य बनाये जाने के बाद वहां विधानसभा चुनाव करवाए जाने हैं। इसके लिए राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करना होगा। संभवत: इसीलिये राजनीतिक क्षेत्र के अनुभवी श्री सिन्हा को इस संवेदनशील और समस्याग्रस्त राज्य का दायित्व सौंपा गया। वैसे घाटी के प्रमुख नेताओं में डा. फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर को रिहा किया जा चुका है जबकि महबूबा मुफ्ती अभी भी नजरबंद हैं। संयोग से ये तीनों राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हैं। अलगाववादी नेता भी बंद हैं।  इस कारण घाटी में विगत एक साल से भारत विरोधी बड़ा आन्दोलन नहीं हो सका। आतंकवादियों का भी बड़े पैमाने पर सफाया किया गया। हालाँकि कोरोना के कारण स्थितियां उस स्तर तक सामान्य नहीं की जा सकीं , जितनी अपेक्षित थीं। लेकिन कुल मिलाकर भारत विरोधी ताकतों की कमर तोड़ने का अभियान काफी हद तक सफल रहा है। ऐसे में ये जरूरी है कि राज्य विधानसभा के चुनाव करवाए जाएं। यद्यपि ये काम है तो बहुत ही कठिन क्योंकि आतंकवादी मौका पाते ही अपनी हरकतें दिखाने से बाज नहीं आते। बीते कुछ दिनों में ही उन्होंने अनेक भाजपा नेताओं की हत्या कर भय पैदा करने की कोशिश की। इसका उद्देश्य लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग रखना ही है। कांग्रेस का घाटी के अलावा जम्मू क्षेत्र में भी पहले जैसा जनाधार नहीं रहा। हिन्दू बहुल इलाकों में तो भाजपा का प्रभाव कायम है लेकिन घाटी के मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों में उसकी पकड़ अभी मजबूत नहीं हो सकी है। भले ही इक्का-दुक्का लोग पार्टी का झन्डा लगाने का साहस दिखाने लगे हों लेकिन उन सबकी हालत दांतों के बीच जीभ जैसी ही है। हालिया हत्याओं के कारण भाजपा के साथ आने से नए लोग डरेंगे और आतंकवादी भी यही चाहते हैं। कश्मीर घाटी में विधानसभा की अधिकांश सीटें होने से राजनीतिक पलड़ा उसी तरफ  झुकता रहा है। मोदी सरकार चाह रही है कि सीटों का परिसीमन इस तरह से किया जाए जिससे जम्मू अंचल की राजनीतिक वजनदारी भी कश्मीर घाटी के बराबर हो जाये। लद्दाख तो वैसे भी अलग केंद्र शासित क्षेत्र बना चुका है। 2014 में विधानसभा चुनाव के बाद त्रिशंकु सदन बनने पर भाजपा ने पीडीपी से अप्रत्याशित गठबंधन कर सभी को चौंका दिया। उसकी वजह से पार्टी को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी लेकिन कालान्तर में ये स्पष्ट हो गया कि भाजपा ने वह खतरा काफी सोच - समझकर उठाया था। पीडीपी सरकार से समर्थन वापिस लेने के बाद राष्ट्रपति शासन और फिर एक झटके में अनुच्छेद 370 के खात्मे से ये साबित हो गया कि केंद्र सरकार ने कश्मीर को लेकर काफी तैयारी कर रखी थी। लेकिन गत वर्ष 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर को लेकर किया गया ऐतिहासिक फैसला पूरे तौर पर प्रभावशाली हो सका ये कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि अव्वल तो लंबे समय तक घाटी में कर्फ्यू जैसे हालात रहे। संचार सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं थी। स्थितियां सामान्य होते तक कोरोना आ धमका जिससे जनजीवन और राजनीतिक गतिविधियाँ फिर ठप्प हो गईं। उस लिहाज से नये उप राज्यपाल मनोज सिन्हा के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। भाजपा की मुसीबत ये है कि वह फिलहाल अकेली है। नेशनल कांफ्रेंस , पीडीपी और कांग्रेस तीनों उसके विरुद्ध हैं। हालाँकि जैसे संकेत दिखाई दे रहे हैं उनके अनुसार भाजपा भविष्य में नेशनल कांफ्रेंस को अपने साथ ला सकती है। अब्दुल्ला बाप-बेटे की रिहाई और महबूबा मुफ्ती की नजरबन्दी तीन महीने बढ़ा देने से नये राजनीतिक समीकरणों के हलके संकेत मिल रहे हैं। बहरहाल श्री सिन्हा को कश्मीर के राजभवन में बैठकर कुदरत के नज़ारे देखने का अवसर कम ही मिलेगा। केंद्र सरकार ने बीते साल अनुच्छेद 370 को समाप्त कर घाटी में भारतीयता को मजबूत करने का जो प्रयास किया वह पूरी तरह सफल हुआ या नहीं ये विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा। भारत विरोधी ताकतों का प्रभाव सतह पर तो कम हुआ दिखता है लेकिन अभी भी उनकी जड़ें जमी हैं। घाटी में जब तक उद्योग-व्यापार सामान्य नहीं होते तब तक हालात अनिश्चित रहेंगे। पर्यटन उद्योग कश्मीर की प्राणवायु है। स्थितियां सामान्य होने का भी वह प्रमाण है। जब श्रीनगर की डल झील, गुलमर्ग, पहलगाँव आदि में फिल्मों की शूटिंग फिर बिना डरे शुरू हो जायेगी और सैलानी कश्मीर में सुरक्षित घूम फिर सकेंगे तब ही ये माना जा सकेगा कि घाटी ने बदले हुए हालात को स्वीकार कर लिया है। मनोज सिन्हा पर प्रधानमंत्री ने जो विश्वास किया है उस पर यदि वे खरे साबित हो सके तो उनका कद राष्ट्रीय राजनीति में बहुत उंचा हो जाएगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 August 2020

सोना-चांदी की कीमतों का आसमान छूना बड़े वैश्विक संकट का संकेत




सोना और चांदी ऐसी दो धातुएं हैं जिनके बारे में हर वह व्यक्ति भी रूचि रखता है जिसे न उन्हें खरीदना है और न ही बेचना है। वैसे तो पृथ्वी के गर्भ से इनसे भी मूल्यवान धातुएं निकलती हैं लेकिन सोना और चांदी से चूँकि आभूषण बनते हैं और इनका विक्रय दुनिया में कहीं भी हो जाता है इसलिए सदियों से ये मानव जाति को प्रिय रही हैं। इनके आधार पर किसी व्यक्ति की ही नहीं अपितु देश की सम्पन्नता का आकलन भी किया जाता है। और फिर भारत में तो इन धातुओं के प्रति दीवानगी विशेष रूप से रही है। इसीलिये हमारा देश सोने के आयात में अग्रणी है। कहते हैं जनता के अलावा विभिन्न मंदिरों और मठों के भण्डार में इतना स्वर्ण संचित है जिससे देश की आर्थिक स्थिति में अकल्पनीय सुधार हो सकता है। सोना और चांदी दोनों की कीमतों में यद्यपि बहुत अंतर होता है किन्तु चूँकि उनमें गिरावट नहीं आती इसलिए वह सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। इनकी कीमतें भी वैश्विक आधार पर तय होती हैं और अक्सर दिन में कई बार उनमें बदलाव देखा जाता है। हर देश अपने खजाने में ज्यादा से ज्यादा स्वर्ण रखता है क्योंकि उसी आधार पर उसकी मुद्रा की साख निश्चित होती है। कोरोना महामारी के कारण बीते अनेक महीनों से पूरी दुनिया अस्त व्यस्त हो चली है। व्यापार-उद्योग पर इसका जबरदस्त प्रभाव पड़ने से सम्पन्न देशों तक के सामने बड़ा संकट आ गया है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भी ठप्प सा है। दूसरी तरफ चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव से युद्ध की आशंका भी प्रबल होती जा रही है। जिस प्रकार की अनिश्चितता है उसके मद्देनजर हर देश अपनी आर्थिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हो उठा है। यही कारण है कि सोना और चांदी दोनों की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। गत दिवस सोना 55 हजार रु. प्रति दस ग्राम और चांदी लगभग 75 हजार रु. प्रति किलोग्राम तक जा पहुँची। जानकारों के अनुसार कीमतें और ऊपर जायेंगीं। जैसी कि जानकारी आ रही है उसके अनुसार सोने और चांदी की बढ़ती कीमतों के पीछे आम जनता की मांग न होकर बड़े निवेशकों के साथ विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही खरीदी है। उद्योग-व्यापार में आया ठंडापन निवेशकों को परेशान किये हुए है। दुनिया भर के पूंजी बाजार डगमगा रहे हैं। ऐसे में जिनके पास धन है वे सोने और चांदी में निवेश कर रहे हैं। दूसरी तरफ  सरकारी स्तर पर होने वाली खरीदी भी मूल्यवृद्धि का बड़ा कारण है। वर्तमान हालात में कौन सा देश कब दिवालिया हो जाये ये बता पाना कठिन है। इसी तरह चीन और अमेरिका के बीच शुरू हुए व्यापार युद्ध के बाद स्थिति अब सैन्य युद्ध की तरफ  बढ़ रही है। दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा अपना कब्जा बढ़ाये जाने से अमेरिका सहित एशिया और प्रशांत महासागर क्षेत्र में स्थित देश आक्रामक मुद्रा में हैं। कोरोना संकट के लिए चीन को जिम्मेदार मानने के अलावा अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में अपनी कमजोर स्थिति देखते हुए डोनाल्ड ट्रंप चीन को दबिश देकर अमेरिका की जनता को अपनी तरफ खींचने का दांव चल सकते हैं। पश्चिम एशिया में भी हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। ईरान और अमेरिका के बीच की तनातनी कब बारूदी धमाकों में बदल जाए ये कह पाना कठिन है। कच्चे तेल के व्यापार में जैसी अनिश्चितता उत्पन्न हो गई है वह भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला रही है। ऐसे में मुद्रा के प्रति विश्वास का संकट मंडराने लगा है। यही वजह है कि आपातकालीन विनिमय के तौर पर दुनिया भर के देश सोना और चांदी की खरीदी में जुट गए। यदि युद्ध हुआ तो उस सूरत में हथियारों सहित जरूरी चीजों की खरीदी में मुद्रा को अस्वीकार किये जाने पर सोना ऐसी धातु है जिसके जरिये भुगतान सुलभ हो सकेगा। हालाँकि उपभोक्ता बाजार में सोने और चांदी की मांग उतनी नजर नहीं आ रही। भारत में तो कोरोना के कारण ग्रीष्मकालीन विवाह सीजन चौपट होने से आभूषण बाजार ठण्डा ही रहा। कीमतें आसमान छू लेने के कारण अब सोना-चांदी खरीदना सटोरियों और काले धन को ठिकाने लगाने वालों के अलावा सरकारों के बस की ही बात रह गई है। लेकिन इस मूल्य वृद्धि को लेकर उठ खड़ी  हुई आशंकाएं पूरी दुनिया को भयभीत भी कर रही हैं। कोरोना से मुक्ति मिलने के पहले ही सीमित विश्व युद्ध के आसार बन जाएँ तो आश्चर्य नहीं होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 August 2020

सबके राम सब में राम : आम सहमति शुभ संकेत



आखिऱकार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण हेतु भूमि पूजन सम्पन्न हो ही गया। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और रास्वसंघ के प्रमुख डा. मोहन भागवत ने इस अवसर पर जो उद्बोधन दिए वे बहुत ही जिम्मेदारी से भरे हुए थे। प्रधानमंत्री ने सबके राम और सब में राम का उल्लेख करते हुए उन सभी की भावनाओं को सम्मान दे दिया जो कुछ दिनों से मंदिर और राम के प्रति बढ़ चढ़कर अपनी श्रद्धा प्रगट करने लगे हैं। मंदिर निर्माण में अड़ंगा लगाने और उसे राजनीति प्रेरित बताने वाले जिस तरह से रामधुन गाते हुए गर्व से खुद को हिन्दू कहने लगे वह राष्ट्रीय राजनीति में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत है। कुछ विघ्नसंतोषी अभी भी हैं लेकिन कुल मिलाकर राम मंदिर को लेकर राजनीतिक बिरादरी की राय काफी हद तक वास्तविकता को स्वीकार करने की बन गयी है। हालांकि श्रेय बटोरने की होड़ भी चल पड़ी है। इसका उद्देश्य भाजपा के हाथ से मंदिर निर्माण का राजनीतिक लाभ छीनना है। बसपा नेत्री मायावती ने गत दिवस इसीलिये मंदिर निर्माण का श्रेय सर्वोच्च न्यायालय को दिया। भूमिपूजन समारोह के अवसर पर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा प्रधानमंत्री ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उल्लेख करते हुए ये कहने का प्रयास किया कि मंदिर निर्माण पूरी तरह से विधि सम्मत है। निश्चित रूप से ये आदर्श स्थिति है। यदि केंद्र सरकार अपनी तरफ  से कानून बनाकर संसद में बहुमत के बल पर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़  करती तब उस पर राजनीतिक विवादों की छाया बनी रहती। लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद मंदिर निर्माण पर हाय तौबा मचाने वाले भी खुद को असली राम भक्त साबित करने आगे-आगे हो रहे हैं। प्रधानमंत्री द्वारा सबके राम और सब में राम कहकर मंदिर निर्माण को व्यापक राष्ट्रीय रूप देने का जो प्रयास किया वह निश्चित तौर पर समय की मांग है क्योंकि अब मंदिर मुद्दा किसी दल या नेता विशेष का न होकर पूरे देश का है। गत रात्रि अमेरिका में न्यूयॉर्क शहर के सुप्रसिद्ध टाइम्स स्क्वेयर में जिस तरह से राम मंदिर के मॉडल का प्रदर्शन हुआ उससे इसके वैश्विक महत्व का प्रमाण मिला। राम मंदिर किसके प्रयासों से बन रहा है ये अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रहा जितना ये कि अब अधिकतर राजनीतिक दलों ने इसे अपना समर्थन दे दिया है। कुछ साधु-संत और दिग्विजय सिंह जैसे नेता भले ही भूमि पूजन का विरोध करते रहे किन्तु उनका विरोध मुहूर्त को लेकर था न कि मदिर निर्माण से। प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर राम का गुणगान किया जबकि कमलनाथ ने मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय आकाक्षाओं का प्रतीक बताते हुए 11  चांदी की ईंटें मंदिर निर्माण हेतु भेजने की घोषणा की। कुछ समय पहले तक राम मंदिर को लेकर आलोचना करने वाले अनेक नेता गत दिवस खुद को राम का उपासक बताने आगे-आगे दिखाई दिए। कुल मिलाकर देश राममय हो गया जो हर्ष का विषय है। लेकिन इस अवसर पर हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी जहर बुझे तीर छोड़ने से बाज नहीं आये। उन्होंने सोशल मीडिया के अलावा पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा कि बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। उनसे भी दो कदम आगे बढ़कर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को ही न्याय मानने से इंकार कर दिया। ओवैसी ने कमलनाथ और प्रियंका के राम प्रेम पर भी तीखे कटाक्ष किये। इस बारे में उल्लेखनीय है कि मुस्लिम समाज ने अयोध्या विवाद में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मानने की रजामंदी पहले से दे रखी थी। यद्यपि फैसले से उनकी निराशा अस्वाभाविक नहीं है लेकिन ओवैसी और मुस्लिम समाज के विभिन्न संगठनों को ये नहीं भूलना चाहिए कि पुरातत्व विभाग द्वारा करवाई गई खुदाई के बाद पेश की गयी जिस रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय ने विवादित भूमि राम मंदिर के लिए दिए जाने का निर्णय दिया उस रिपोर्ट को तैयार करने वाले पुरातत्व विभाग के अधिकारी के.के. मोहम्मद भी मुस्लिम हैं। बेहतर होगा यदि कांग्रेस सहित बाकी दलों के नेतागण भी ओवैसी की आलोचना करने के साथ ही मुस्लिम समाज के प्रमुख संगठनों को ये समझाएं कि वे भले ही मंदिर निर्माण में सहायक न बनें किन्तु अपनी खीज निकालने के लिए कितना भी वक्त लग जाए लेकिन बदला जरूर लिया जायेगा जैसी बातों से बचें। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या के निकट ही मुस्लिम समाज को भी मस्जिद बनाने हेतु भूमि दी गयी है। बेहतर होगा उस जगह पर भव्य मस्जिद बनाने की तैयारी मुस्लिम समाज करे। लेकिन ऐसा न करते हुए यदि वे बाबरी मस्जिद का रोना ही रोते रहे तो उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा। मुस्लिम नेताओं को ये समझ लेना चाहिये कि देश में तुष्टीकरण के दिन जा चुके हैं। कांग्रेस ही नहीं सपा जैसी पार्टियाँ भी समझ चुकी हैं कि मुस्लिम मतों के पीछे भागने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। ऐसे में पूरी तरह किनारे लग जाने के पहले मुस्लिम समुदाय के समझदार लोगों को तो कम से कम मुख्यधारा में आने की कोशिश कर लेनी चाहिए वरना मुसलमान राजनीतिक दृष्टि से और भी कमजोर हो जायेंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 5 August 2020

कारसेवक बलिदानी भाव न दिखाते तो आज भी सपना ही रहता राम मन्दिर




ऐसा लगता है मानों कल की ही बात है। 30 अक्टूबर 1990 और 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में जो हुआ वह आजाद भारत के इतिहास के नव लेखन का आधार बन गया जिसकी प्रस्तावना आज पूरी हो गई। राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का भूमि पूजन सदियों के संघर्ष का परिणाम है। सबसे अच्छी बात ये है कि कल तक इस समूचे अभियान का मजाक उड़ाने वाले राम की विरासत में हिस्सेदारी का दावा करने आगे आ गए हैं। राम राजनीति से परे हैं, वे तो राष्ट्रपुरुष हैं, वे इस देश की महान संस्कृति के जीवंत ध्वजवाहक हैं। जो उन्हें न मानने का दिखावा करते हैं वे भी मन ही मन राम के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। जिसकी अभिव्यक्ति बीते कुछ दिनों से दिखाई देने लगी थी और आज खुलकर सामने आ गयी। राम को कपोल कल्पना मानकर हवा में उड़ाने वाले ये दावा कर रहे हैं कि राम तो सभी के हैं। लेकिन इस बात से इंकार तो कभी किया ही नहीं गया। भगवान के रूप में न सही किन्तु एक महामानव, आदर्श राजा और मर्यादाओं के प्रतीक के तौर पर तो श्री राम पूजनीय और अनुकरणीय हैं ही। गुलामी के दौर में हमारी सांस्कृतिक जड़ों को काटने का खूब प्रयास हुआ। मुगलों ने आतंक और जोर जबरदस्ती से तो अंग्रेजों ने चालाकी से हमारी मौलिकता को नष्ट करने का हरसंभव प्रयास किया। सतही तौर पर वे सफल भी दिखे लेकिन इस देश की सनातन संस्कृति अमरत्व का वरदान प्राप्त है। अनेकानेक संकटों के बावजूद इस देश ने अपनी जड़ों को सूखने नहीं दिया और आज अयोध्या में जो भूमिपूजन संपन्न हुआ वह उसी जिजीवषा का सुखद परिणाम है। ये अत्यंत ही संतोष का विषय है कि राम और उनके भव्य मंदिर के निर्माण के प्रति स्वीकृति और सहमति अब राजनीतिक प्रतिबद्धता के सीने पर पैर रखकर ऊंची आवाज में व्यक्त्त की जा रही है। जिन्हें राम मंदिर में राजनीति की बू आती थी वही आज उसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक मानकर हर्षोल्लास करते दिख रहे हैं। राम को अपना आदि पुरुष मानने में जिन्हें शर्म महसूस होती थी तथा राजनीतिक पूंजी खो जाने का डर लगता था वे ही आज अपनी वंशावली में राम को अपना पूर्वज बताते घूम रहे हैं। इस प्रकार भारतीय राजनीति में ये एक बड़े चारित्रिक बदलाव का संकेत है जो हर दृष्टि से स्वागतयोग्य है। गर्व से कहो हम हिन्दू हैं के नारे से चिढ़कर गर्व से कहो हम भारतीय हैं पर जोर देने वाले ही आज ये कहते दिख रहे हैं कि हिंदुत्व किसी की बपौती नहीं है और वे भी उतने ही हिन्दू हैं जितने बाकी सब। हालाँकि ये दावे कितने दिन जारी रहेंगे ये कहना मुश्किल है क्योंकि राजनीति से जुड़े लोग बहुत ज्यादा विश्वसनीय नहीं होते किन्तु राम मंदिर का मुद्दा राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय बन गया ये परम संतोष का विषय है। भारत की एकता में श्री राम का महत्व किसी से छिपा नहीं है। करोड़ों देवताओं के अस्तित्व को स्वीकार करने वाले सनातन धर्म में जिन दो अवतारों ने आम जन के साथ अपना तादात्म्य स्थापित किया उनमें श्री राम और श्री कृष्ण ही थे। यही वजह है कि ये भारत की लोक संस्कृति के अभिन्न हिस्से हैं। अयोध्या में श्री राम की जन्मभूमि पर बने मुगलकालीन ढांचे को हटाये जाने का संघर्ष अनेक शताब्दियों से चला आ रहा था। समय के साथ उसका स्वरूप भले ही बदलता रहा  लेकिन हिन्दू समाज के मन में अपने आराध्य की जन्मस्थली पर बलात खड़ा किया वह ढांचा कील की तरह चुभता था। आखिरकार वह समय आया जब उस चुभन ने हुंकार का रूप ले लिया और फिर वह हुआ जिसकी सुखद परिणिति आज देखने मिली। मंदिर आन्दोलन से जुड़े वे सभी जाने-अनजाने लोग अभिनंदन के हकदार हैं जिन्होंने इस संघर्ष को सफलता के इस मुकाम तक पहुंचाया। इसका श्रेय लूटने की होड़ भी चल रही है। ये दावे भी हो रहे हैं कि हम ऐसा न करते तो ये हो पाना संभव नहीं था। कौन सच्चा है कौन झूठा इस झगड़े में पड़े बिना आज का दिन राष्ट्रीय स्वाभिमान के उत्कर्ष का उत्सव मनाने का है। अयोध्या अपने प्राचीन वैभव को पुन: अर्जित करे ये मनोकामना हर किसी की है क्योंकि वह रामराज्य का प्रतीक है। भव्य राम मंदिर का निर्माण उसी तरह भारत के स्वाभिमान का प्रतीक बनेगा जैसा कभी सोमनाथ का मंदिर बना था। बीते तीन दशक का घटनाचक्र आज एक बार फिर स्मृति पटल पर सजीव हो उठा है। इस ऐतिहासिक अवसर पर उन हजारों कार सेवकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना परम आवश्यक है क्योंकि वे बलिदानी भावना न दिखाते तो आज भी राममन्दिर सपना ही रहता।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 August 2020

भारत के पुनरुथान का ऐतिहासिक पल होगा राम मंदिर का भूमिपूजन




सदियों से चले आ रहे संघर्ष के बाद आखिरकार वह घड़ी आ ही गयी जब अयोध्या में भगवान श्री राम के जन्मस्थान पर भव्यतम मंदिर निर्माण की धार्मिक प्रक्रिया शुरू होगी। कल 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विधिवत भूमिपूजन कर निर्माण का शुभारम्भ कर देंगे। चूँकि मंदिर में प्रयुक्त होने वाले पत्थरों की गढ़ाई बीते कई दशक से चली आ रही है इसलिए निर्माण पूरा होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। सौभाग्य से कानूनी अड़चन भी नहीं बची । केंद्र के साथ उप्र में भी मंदिर समर्थक पूर्ण बहुमत वाली सरकार होने से राजनीतिक स्तर पर भी कोई अवरोध नहीं रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोनों राम जन्मभूमि के आंदोलन से जुड़े रहे थे। इसलिए वे दोनों न सिर्फ मंदिर के निर्माण अपितु समूचे अयोध्या क्षेत्र को भारतीय संस्कृति और आध्यात्म का विश्वस्तरीय केंद्र बनाने में व्यक्तिगत रूचि ले रहे हैं। जैसी जानकारी आई है उसके अनुसार मंदिर निर्माण के साथ ही अयोध्या में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जायेंगीं। प्रधानमन्त्री इस बारे में बेहद व्यवहारिक हैं। उनके निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में जिस तरह से उन्होंने गंगा तटों के साथ ही काशी विश्वनाथ मंदिर के चारों तरफ विकास करवाया उससे वहां का स्वरूप ही बदल गया। अयोध्या के कायाकल्प की योजना तो और भी व्यापक है। ये देखते हुए आगामी कुछ वर्षों के भीतर उप्र के इस अति पिछड़े अंचल में विकास का नया सूर्योदय दिखाई देगा। दुनिया भर से हिन्दू धर्मावलम्बी इस स्थल की यात्रा पर आयेंगे। जिस तेजी से उप्र सरकार ने अयोध्या के चतुर्मुखी विकास की शुरुवात की है उसे देखते हुए ये उम्मीद गलत न होगी कि वह आने वाले कुछ वर्षों में उत्तर भारत का सबसे बड़ा तीर्थस्थान बनेगी । लेकिन जिस तरह से राम के राज्याभिषेक के पहले मंथरा नामक एक स्त्री ने अपनी कुंठित मनोवृत्ति का परिचय दिया था , वैसी ही अनेक मंथराएं आज भी राम मन्दिर के निर्माण में अड़ंगा लगाने पर आमादा हैं। सदियों से समूचा देश जिस आकांक्षा को संजोये हुए था उसके पूरे होने की घड़ी तो राष्ट्रीय हर्षोल्लास का विषय होना चाहिए किन्तु कुछ लोग हैं जो दूध में नीबू निचोड़ने की अपनी बुरी आदत से बाज नहीं आ रहे। कोई महूर्त पर सवाल उठा रहा है तो किसी को इस बात पर ऐतराज है कि भगवान राम पर एक ही विचारधारा का कब्जा हो चला है। यद्यपि मंथरा के इन कलियुगी मानस पुत्रों के बीचे कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय आकांक्षाओं का पूरा होना लग रहा है। सोशल मीडिया पर उनके द्वारा प्रसारित सन्देश इसका प्रमाण हैं। मप्र के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों में से एक अपने आध्यात्मिक गुरुदेव के विचारों के अनुरूप ही मुहूर्त को अशुभ बताने में जुटे हैं वहीं कुछ माह पहले ही सत्ता से बाहर हुए दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ करवाकर मंदिर निर्माण पर हर्ष व्यक्त कर रहे हैं। कुछ समय पहले तक मुस्लिम मतों के डर से मंदिर का नाम लेने से परहेज करने वाले अब ये कहते घूम रहे हैं कि हम भी मन्दिर बनवाना चाहते थे और राम पर किसी का एकाधिकार नहीं है, वे तो सभी के हैं। वैसे ये शुभ संकेत है कि राम मन्दिर के आन्दोलन को राजनीति के नजरिये से देखने वालों को अब इस सच्चाई का एहसास हो गया है कि ये देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज की सदियों पुरानी आकांक्षा से जुड़ा मुद्दा था। जहां तक रास्वसंघ की विचारधारा से जुड़े लोगों द्वारा उस पर कब्जा कर लेने के बात है तो ये उसके विरोधियों की ऐतिहासिक भूल का नतीजा था। आजादी के बाद ढांचे में मूर्तियाँ रखने, बरसों बाद ताला खुलवाने अथवा शिलान्यास की बात हो, सभी कांग्रेस की केन्द्रीय और प्रांतीय सत्ता रहते हुए। ऐसे में जब मंदिर निर्माण का आन्दोलन शुरू हुआ तब कांग्रेस यदि उसका समर्थन करते हुए आगे आती तब भाजपा का पुनरुद्धार इतनी जल्दी न हुआ होता। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की सुप्रसिद्ध राम रथ यात्रा को लालू प्रसाद यादव द्वारा रोके जाने के बाद जब भाजपा ने लालू और उप्र की मुलायम सरकार से समर्थन वापिस लिया तब कांग्रेस ने उसे और लालू दोनों को अपने समर्थन की बैसाखी प्रदान करने की जो हिमालयन गलती की उसकी वजह से उसकी छवि हिन्दू विरोधी पार्टी की बन गयी। उधर मुसलमान इसलिये उससे कटते गये क्योंकि राम मन्दिर के आन्दोलन की जमीन कांग्रेस के शासन में ही तैयार हुई। पार्टी चाहती तो बाद में भी अपनी गलती सुधार सकती थी किन्तु संघ परिवार और भाजपा के अंधे विरोध के कारण वह जनमत को पढ़ने में नाकामयाब रही। अब जबकि राम मन्दिर एक वास्तविकता बनने के कगार पर आ गया तब कांग्रेस के कुछ नेता तो परिपक्वता का परिचय दे रहे हैं लेकिन कुछ अभी भी खिसियाहट में मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग का ढोल पीटते फिर रहे हैं। मन्दिर मुद्दा यदि संघ परिवार और भाजपा के साथ जुड़ा तो इसमें सबसे बड़ी गलती कांग्रेस की है। उसके नेता ये तो कहते हैं कि स्व. राजीव गांधी भी मंदिर बनवाने के इच्छुक थे लेकिन उनके न रहने के बाद भी कभी पार्टी नेतृत्व ने इसे लेकर कोई प्रयास नहीं किया। उल्टे उसके कतिपय बड़े नेता अदालत में मुस्लिम पक्ष की तरफदारी करते दिखे। कांग्रेस चाहती तो मुस्लिम पक्ष को समझाकर न्यायालय के बाहर दोनों में समझौता करवा सकती थी लेकिन उसमें साहस का अभाव था। इतिहास हर किसी को अपनी गलती सुधारने का अवसर देता है। कांग्रेस के पास तो तुरुप के सारे पत्ते थे लेकिन वह उनका सही उपयोग नहीं कर सकी और हिन्दुओं के साथ ही मुसलमानों का भरोसा भी गंवा बैठी। जानकार बताते हैं कि स्व.राजीव गांधी ने प्रयाग में संत समाज द्वारा जन्मभूमि को लेकर जो फैसले किये उनके दबाव में आकर शिलान्यास का फैसला किया जिसमें स्व. नारायण दत्त तिवारी की भी भूमिका थी। लेकिन बाद में कारसेवकों पर गोली चलवाने वाली मुलायम सरकार का समर्थन करने के कारण कांग्रेस हिन्दुओं की नजर में खलनायक बन गयी लेकिन उसे मुस्लिम मतों का घाटा भी हो गया जिनको मुलायम सिंह ले उड़े। आज जबकि वह ऐतिहासिक क्षण आ गया है जब भारत की पहिचान कहे जाने भगवान राम के जन्मस्थान पर भव्यतम मंदिर बनाने की शुरुवात हो रही है तब भी कांग्रेस के कतिपय विघ्नसंतोषी अपने बयानों से ऐसा आभास करवा रहे हैं जैसे राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का यह गौरवशाली अवसर उनके लिए दु:ख का विषय है। बावजूद इसके लगभग सभी पार्टियाँ ये समझ गई हैं कि राम और हिन्दुत्व से दूर रहकर राजनीति संभव नहीं रही। भाजपा विरोधी माने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी एक ताजा चर्चा में स्वीकार किया कि ये हिंदुत्व का युग है। उन्होंने ये भी स्वीकारा कि मंदिर निर्माण को लेकर कांग्रेस ने हाथ आये अवसरों को नासमझी के कारण गंवाया जिसकी वजह से भाजपा हर तरह की बाधा दौड़ में सफल होती हुई असम्भव को संभव बनाने का कारनामा दिखा सकी। बीते साल 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया था और इस वर्ष राम मन्दिर का भूमि पूजन किया जा रहा है। इन दोनों मुद्दों पर एक लंबा संघर्ष चला और न जाने कितने साधारण और असाधारण लोगों ने अपने जीवन को खफा दिया। लेकिन कहना गलत नहीं होगा कि नियति ने नरेंद्र मोदी को ये इतिहास रचने का अवसर प्रदान किया। लेकिन जिस तरह अनुच्छेद 370 को हटाते समय स्व. डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का स्मरण स्वाभाविक रूप से हो आया ठीक वैसे ही राम मन्दिर के भूमिपूजन पर विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे स्व. अशोक सिंघल के भगीरथी प्रयासों की अनगिनत स्मृतियाँ सजीव हो रही हैं, जिन्होंने पूरी तरह बिखरे संत समाज को मंदिर आन्दोलन से जोड़कर उसे नैतिक शक्ति प्रदान की। निश्चित रूप से वह एक ऐतिहासिक पल होगा जब अयोध्या में श्री मोदी राम मन्दिर की आधारशिला रखेंगे। न सिर्फ भारत अपितु पूरे विश्व में ये भारत के उस पुनरुत्थान का उद्घोष होगा जिसकी भविष्यवाणी महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद बहुत पहले कर गए थे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 August 2020

टैक्स और ब्याज दरें न घटीं तो आपदा बजाय अवसर के अवसाद बन जाएगी मध्यमवर्गीय नौकरपेशा और कारोबारी राहत से वंचित


 


 

भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के दावे होने लगे हैं | जीएसटी का संग्रहण यद्यपि बीते साल की तुलना में 14 फीसदी कम जरूर है लेकिन अभी भी उद्योग - व्यापार में असली रंगत नहीं आई है | इस वजह से राजस्व वसूली में कमी आना स्वाभाविक ही है | गत दिवस केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ये दावा किया कि देश में मोबाईल फोन के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि होने जा रही हैं | आगामी पाँच  सालों में तकरीबन 12 लाख करोड़ के मोबाइल और उनके पुर्जे बनने लगेंगे | इनसे प्रत्यक्ष  और परोक्ष रूप से 12  लाख नये  रोजगार सृजित होंगे | केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में शुरू किये गये प्रोडक्शन लिंक इंसेटिव प्रोग्राम के अंतर्गत दुनिया की प्रमुख 22 मोबाइल निर्माता कंपनियों ने भारत  में रूचि दिखाई है |  हालांकि अभी भी  भारत मोबाइल उत्पादन में अग्रणी देशों की  कतार में है लेकिन चीनी कम्पनियां अपना दबदबा बनाये हुये थीं जो अपना कारोबार समटने के  संकेत दे रही हैं | एपल और सैमसंग जैसे बड़े ब्रांड भारत में जब अपना उत्पादन बढ़ाएंगे तब निश्चित रूप से वैश्विक बाजारों में मेड इन इंडिया की धाक बढ़ेगी | उत्पादन का बड़ा हिस्सा निर्यात होने की उम्मीद और भी अच्छा संकेत है | पहले आर्थिक मंदी और उसके बाद ही कोरोना संकट आ जाने से अर्थव्यवस्था की कमर टूट गयी | लेकिन बीते दो महीनों में जिस तेजी से वापिसी हुई वह निश्चित तौर पर उत्साह जगाने वाली है | हालांकि ऑटोमोबाइल के अलावा फार्मा सेक्टर भी बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है लेकिन अभी तक उद्योग व्यापार पूरी तरह से रंगत पर नहीं आया तो उसका कारण सरकार की वित्तीय नीतियों में कुछ कमियाँ  है | कोरोना संकट के इस दौर में देश में  सैनिटाईजर का उत्पादन आश्चर्यजनक तौर पर बढ़ा | लेकिन उस पर 18 फीसदी जीएसटी लगाना किसी भी दृष्टि  से उचित नहीं कहा जा सकता | भारत इस समय जिस आर्थिक दौर से गुजर रहा है उसमें उत्पादक और उपभोक्ता दोनों के हितों का संरक्षण करने की जरूरत है | ये बात बिलकुल सही है कि संकट के इस दौर में सरकार को भी राजस्व की बेहद जरूरत है किन्तु उसे अपने कर ढाँचे को व्यावहारिक  बनाना चाहिए | 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज को लेकर तरह - तरह के मजाक चले | फिर भी सरकार की सोच को दूरगामी मानकर उसे नजरअंदाज कर दिया गया | लेकिन अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने वाले मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग के लिये अब तक कुछ नहीं किया गया | बैंक के कर्जे  चुकाने के लिए जो मोह्लत मिली वह निश्चित रूप से एक बड़ी राहत है लेकिन उस अवधि में ब्याज का पहिया तो बिना रुके अपनी गति से घूम ही रहा है | और जिस दिन वह मोहलत खत्म होगी उसी दिन से बैंक वाले वसूली का दबाव बनाने लगेंगे | आपदा को  अवसर में बदलने का जो आह्वान प्रधानमन्त्री द्वारा किया गया उसके औचित्य और आवश्यकता को हर कोई स्वीकार कर रहा है | आत्मनिर्भर  भारत के संकल्प पर भी जिस तरह  की उत्साहजनक प्रतिक्रिया उपभोक्ता और विक्रेता दोनों की तरफ से आई वह निश्चित रूप से शुभ संकेत है और ये दर्शाती है कि संकट के  इस दौर में भी समाज का हर वर्ग सरकार और राष्ट्रीय नेतृत्व की आवाज में अपनी आवाज मिलाने के लिए प्रतिबद्ध है | रविशंकर प्रसाद ने गत दिवस देश में उत्पादन बढ़ाने और औद्योगिक क्षेत्र में भारी निवेश आने की जो बात कही उसकी सत्यता पर संदेह करना किसी भी तरह से अनुचित होगा लेकिन विचार  करने वाली बात ये भी है कि जब मजदूर , नौकरपेशा , व्यापारी , उद्योगपति सभी की  कमाई घटी तब सरकार अपनी  कमाई में से एक पाई तक छोड़ने राजी नहीं है | बैंकों ने ब्याज नहीं घटाया , बिजली विभाग जबरिया वसूली करने  पर आमादा है , आयकर ,जीएसटी और नगरीय प्रशासन से जुडी संस्थाएं भी अपना कर एकत्र करने में जुटे हैं | लेकिन जब मध्यमवर्ग की नौकरी चली गई या वेतन कम हो गया तथा व्यापारी और उद्योगपति की आय में जबरदस्त कमी आ गई तब उस पर दबाव बनाकर करों की उगाही कम से कम फिलहाल तो टालना चाहिए | यदि सरकार आपदा को वाकई अवसर में बदलना चाह रही है तो उसे अपने कर ढांचे को नये सिरे से ऐसा बनाना होगा जिससे कर अपवंचन रुक सके तथा सरकार के पास ज्यादा राजस्व आये | जीएसटी की दरें कम होने की उम्मीद   उसे नियंत्रित करने वाली कौंसिल  की हर बैठक के  पहले की जाती है लेकिन राहत के नाम पर ऊँट के मुंह में जीरा ही मिलता है | रिजर्व बैंक द्वारा समय - समय पर घटाई जाने वाली ब्याज दर भी इतनी मामूली होती है कि उसका ज्यादा लाभ नहीं हो पता | बेहतर हो सरकार अब ऐसा कोई पैकेज लेकर आये जिससे नौकरपेशा मध्यमवर्ग और छोटे तथा मध्यम व्यापारी और उद्योगपतियों को सांस लेने का अवसर मिले | एक हाथ से दी गयी राहत पेट्रोल - डीजल की जरिये  वसूल करने की नीति आपदा को  अवसर की बजाय अवसाद  में बदलने का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये | 


Saturday, 1 August 2020

नई शिक्षा नीति में कई सवालों के जवाब नजर नहीं आ रहे शिक्षा को महत्व और शिक्षक के सम्मान का संस्कार आवश्यक





 
उम्मीद है शिक्षा क्षेत्र में रूचि रखने वालों ने नई शिक्षा नीति का विस्तृत न सही किन्तु सरसरी तौर पर अध्ययन अवश्य कर लिया होगा | इसे बेहद क्रांतिकारी एवं दूरगामी सोच पर आधारित बताया जा रहा है | प्राथमिक से लेकर तो उच्च  शिक्षा  और उसी के साथ शोध आदि पर इस नीति में काफी बारीकी से ध्यान दिया गया है | भारतीय शिक्षा प्रणाली को वैश्विक मापदंडों के अनुरूप ढालने का भगीरथी प्रयास इस नीति के जरिये दिखाई देता है | शिक्षा पर केन्द्रीय बजट के अंशदान में वृद्धि की बात भी आशान्वित करती है | वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन करने का जो इरादा नई नीति में परिलक्षित होता है वह निश्चित रूप से साहसिक है | मातृभाषा  में प्राथमिक शिक्षा और विषय चयन में विज्ञान , कला और वाणिज्य संकाय की विभाजन रेखा समाप्त करना भारतीय परिप्रेक्ष्य में निसंदेह एक अभिनव प्रयोग होगा | लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न जो शिक्षा जगत के भीतर से ही उठाया जा रहा है कि समूची शिक्षा प्रणाली को सिरे से बदल देने के लिए प्रशासनिक और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े  प्रशिक्षित व्यक्ति कहाँ से आयेंगे ? ये वाकई  यक्ष प्रश्न है क्योंकि आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवाने मात्र से अत्याधुनिक शिक्षा संस्थान तो खड़े किये जा सकते हैं लेकिन बिना सक्षम और समर्पित शिक्षकों के उनका समुचित उपयोग नहीं हो पाता | 

उदहारण के लिए मप्र सरकार ने शहडोल , छिंदवाड़ा, सागर और दतिया जैसे छोटे जिलों में मेडीकल कालेज तो खोल दिए | छिंदवाड़ा का कालेज तो बेहद उच्चस्तरीय  बना है लेकिन समस्या फिर वही शिक्षकों की आ रही है |  जबलपुर , भोपाल , रीवा , इंदौर और ग्वालियर आदि बड़े शहरों से जिस शिक्षक को वहाँ भेजा जाता है वह या तो  छुट्टी लेकर बैठ जाता है या फिर पूरे समय अपना स्थानान्तरण करवाने की जुगत भिड़ाया करता है |

ये बात विद्यालय और महाविद्यालयों पर भी लागू होती है | बीते कुछ सालों से संविदा पर पढ़ाने वाले रखने का जो तरीका निकला गया उसने शिक्षा को भी ठेकेदारी जैसा बना दिया | विश्वविद्यालयों में  इस प्रथा का  प्रचलन होने से शिक्षा का स्तर भी जैसा देव वैसी पूजा वाली उक्ति चरितार्थ करने लगा है | ऐसे में सरकार नई नीति के अंतर्गत शिक्षा में आमूल बदलाव करने की जो इच्छाशक्ति दिखा रही है वह पर्याप्त संख्या में योग्य और विधिवत प्रशिक्षित शिक्षकों के बिना कैसे सफलीभूत होगी इसका जवाब किसी के पास फ़िलहाल तो नहीं है |

मैं पूर्व में भी लिख चुका हूँ कि शिक्षा रूपी इमारत जिस नींव पर टिकी होती है वह है प्राथमिक स्तर की शिक्षा | और ये बताने वाली बात नहीं है कि निजी क्षेत्र को छोड़ दें तो देश की  अधिकतर सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक शालाएं दुर्दशा का  पर्याय हैं | नई नीति में जिस बदलाव का सपना दिखाया जा रहा है उसमें तो माध्यमिक कक्षा में ही व्यावसायिक शिक्षा की शुरुवात करते हुए बच्चों को बाकायदे मैदानी प्रशिक्षण देने की बात भी है |  इसकी दशा भी मध्यान्ह भोजन जैसी न हो जाए ये डर अभी से जताया जा रहा है |

इस विषय में एक बात ध्यान देने वाली है कि जब तक प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर आज जैसे सरकारी शिक्षक रहेंगे तब तक कितनी भी नीतियाँ बना ली जाएं लेकिन शिक्षा की बदहाली दूर नहीं की जा सकेगी | इसलिए बेहतर होगा कि सरकार नीति के क्रियान्वयन के पहले चरण में शिक्षकों का ऐसा समूह तैयार करे जो नये परिवेश में विद्यार्थियों को शिक्षा दे सकें | ये बात स्वयंसिद्ध है कि पैसे से सड़क , पुल , बाँध , फ्लायओवर जैसे काम तो कराये  जा सकते हैं | विद्यालय , महाविद्यालय और विश्वविद्यालय की इमारतें भी  निर्मित हो सकती हैं लेकिन बिना सक्षम शिक्षकों के शिक्षा में  गुणवत्ता नहीं आ सकती |

इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि सीमेंट  ईंट और पत्थर से हुए घटिया निर्माण की तो मरम्मत सम्भव भी है किन्तु यदि विद्यार्थी के निर्माण में किसी भी तरह की कमी रह जाती है तो उस क्षति को पूरा करना संभव नहीं रहता | और यहीं आकर न सिर्फ योग्य वरन  प्रतिबद्ध शिक्षकों की अनिवार्यता महसूस होती है | उस दृष्टि से नई नीति को लागू करने के लिए वैसे शिक्षक कहाँ से आएंगे ये ऐसा सवाल है जिसका उत्तर तत्काल मिलना चाहिये वरना ये नीति ऊँची दूकान का फीका पकवान साबित होने का खतरा है |

अमेरिका जैसे देश में विश्वविद्यालयों के पास शोध कार्य से प्राप्त ज्ञान के पेटेंट से खूब धन आता है | उस दृष्टि से हमारे देश में आईआईटी छोड़कर उच्चशिक्षा के अधिकतर संस्थान सफेद हाथी बने हुए हैं | और इसीलिये उनकी दशा , दुर्दशा का प्रतिरूप होकर रह गयी | देश में एम्स और पीजीआई के अलावा   सैकड़ों सरकारी और  निजी मेडिकल कालेज हैं | इनमें चिकित्सा क्षेत्र को लेकर शोध किये जाने  के दावे तो बहुत होते हैं लेकिन उनमें से कितने विश्वस्तर पर मान्यता प्राप्त करने के बाद आर्थिक लाभ का आधार बनते हैं , ये पता नहीं चलता | इसी तरह निजी क्षेत्र के हजारों अस्पतालों के नाम के साथ रिसर्च सेंटर नामक पुछल्ला जुड़ा होने के बाद भी वे कितनी रिसर्च कर  पाए इसका खुलासा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि रिसर्च के नाम पर ये सरकार से मशीनों और उपकरणों के आयात में भारी रियायत हासिल करते हैं | ऐसे ही  निजी शिक्षा संस्थानों को आयकर से मिलने वाली छूट का लाभ  लेने के लिए कागजी शिक्षा समिति बनाई जाती हैं लेकिन परदे के पीछे से  शिक्षा माफिया काम  करता रहता है |

यद्यपि इसका मतलब ये कदापि नहीं कि नई नीति की सफलता को पूरी तरह संदिग्ध मानकर निराश हुआ जाए | लेकिन केंद्र और राज्य सरकार दोनों को पहले ये तय करना चाहिए कि क्या वे शिक्षा को देश के विकास का सबसे महत्वपूर्ण साधन मानती हैं या नहीं ? यदि हाँ , तो फिर केवल शिक्षा का बजट बढ़ाने से काम नहीं चलने वाला | शिक्षकों की सेवा को एक स्थायित्व देना बहुत जरूरी है | अपने भविष्य के लिए दिन रात चिंतित रहने  वाला शिक्षक विद्यार्थियों के भविष्य को  संवारने में कितना ध्यान दे सकेगा ये किसी से छिपा नहीं है | यहाँ शिक्षक से आशय केवल विद्यालयीन नहीं अपितु महाविद्यालय और विश्वविद्यालय सभी में पढ़ाने वालों से है |

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों  के वेतनमान और सेवा शर्तों में बहुत ज्यादा अंतर भी नहीं होना चाहिए | ऐसा  इसलिए जिससे प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक में एक समान गुणवत्ता रहे | ये बात पूरी तरह सत्य है कि भारत यदि 21 वीं सदी में विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनना चाहता है  तो उसे शिक्षा क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता , प्रोत्साहन और संरक्षण देना होगा | 

स्मरणीय है स्व. अटलबिहारी  वाजपेयी ने प्रधानमन्त्री रहते हुए देश में विश्वस्तरीय राजमार्ग के साथ ही ग्रामीण सड़क योजना प्रारम्भ की | वह बहुत ही क्रांतिकारी कदम था | उसके कारण देश में सड़क परिवहन के साथ ही ऑटोमोबाइल उद्योग का भी मानो स्वर्णयुग आ गया | ग्रामीण इलाकों में  आधुनिकता एवं विकास का दौर पक्की बारह मासी सड़क बनने के बाद तेजी से आया |

नई शिक्षा नीति भी उसी  तरह विकास के द्वार खोल सकती है , बशर्ते सरकार में बैठे महानुभाव शिक्षा का महत्व और शिक्षक का सम्मान करने का संस्कार अपनी कार्यप्रणाली  में विकसित करें | एक जमाना था जब वेतन भले कम था लेकिन शिक्षक का सम्मान बहुत था | कालान्तर में वेतनमान बढ़ा तो सम्मान का अवमूल्यन होता गया | धीरे - धीरे ये स्थिति बनी कि शिक्षक सम्मान के साथ वेतनमान से भी वंचित कर दिया गया | ये कहने का अर्थ  कदापि न लगाया जाए कि समूचा शिक्षक समुदाय बहुत ही कर्तव्यनिष्ठ हो गया हो | अपवाद स्वरुप कुछ को छोड़ दें तो बाकी महज नौकरपेशा बनकर रह गए हैं | निजी संस्थानों में तो शोषण की पराकाष्ठा ही है | लेकिन सरकार ने भी शिक्षा और शिक्षकों  की जिस तरह उपेक्षा की वह एक दर्दनाक पहलू है |

 ये सब देखते हुए जरूरी  है कि नई शिक्षा नीति के अमल में पूरी तरह ईमानदारी रहे | वैसे इस बात को लेकर ये नीति मौन है कि क्या आगे भी शिक्षक वर्ग को पढ़ाने का  काम छोड़कर समय - समय पर सरकार की बेगारी करनी होगी ?