Friday, 14 August 2020

आपदा को अवसर में बदलकर विश्व शक्ति बनने का सुअवसर



इस साल आजादी का पर्व ऐसी परिस्थितियों में आया है जब पूरी दुनिया के साथ हमारा देश भी कोरोना नामक महामारी से जूझ रहा है। इसके कारण समूचा देश हलाकान है। प्रारंभ में इसे शहरी, ख़ास तौर पर बड़े लोगों तक सीमित माना गया था परन्तु अब इसका संक्रमण शहरी बस्तियों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक फैल गया है। आर्थिक हैसियत की सीमा रेखा भी नहीं रही। हजारों लोग मारे जा चुके हैं। दो महीने से ज्यादा की देशबंदी ने राष्ट्रीय जीवन की समूची संरचना को ही उलट पुलट दिया। जिस तरह से कोरोना संक्रमण का आंकड़ा रोजाना बढ़ता जा रहा है उससे लगता है अभी उससे मुक्ति दूर है। चिकित्सा विज्ञान इसका टीका बनाने में जुट गया है। उम्मीद की जा रही है कि दिसम्बर तक भारत में बना टीका बाजार में आ जाएगा। हालाँकि अनेक देशों के टीके का उत्पादन भारतीय कपनियां करने वाली हैं लेकिन हमारे द्वारा तैयार किया टीका आने में कुछ महीनों की देर है। और तब तक सिवाय कोरोना का सामना करने और उससे बचकर रहने के दूसरा विकल्प नहीं है। देशबंदी में कारोबार चौपट होने से रोजगार की समस्या उत्पन्न हो गई थी और इसीलिये अंतत: उसे हटाना पड़ा। भले ही  सीमित प्रतिबंध अभी भी हैं लेकिन धीरे-धीरे देश गतिशील हो उठा है। सभी मोर्चों पर सक्रियता बढ़ी है। अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ाते क़दमों से ही सही लेकिन रफ्तार पकड़ने लगी है किन्तु ये स्वीकार करने में कुछ भी बुराई नहीं है कि कोरोना ने हमारी प्रगति को काफी पीछे कर दिया है और इससे उबरने में लम्बा समय लगेगा। लेकिन आपदा अपने साथ अनेक अवसर भी लेकर आई है। आत्मनिर्भर भारत की प्रतिबद्धता जिस तरह से राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गयी वह अच्छा संकेत है। बीते दिनों रक्षा मंत्री द्वारा 100 से भी अधिक रक्षा उपकरणों का निर्माण भारत में ही  किये जाने की नीतिगत घोषणा  से रक्षा सामग्री  के क्षेत्र में विदेशों  पर निर्भरता घटने का रास्ता साफ़ हुआ। यही नहीं तो ऐसा होने पर देश की रक्षा उत्पादन इकाइयों के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा भी कम होगा। चीन से आयात होने वाली राखी का आयात दो हजार करोड़ रु. से भी ज्यादा घटने से ये विश्वास प्रबल हुआ है कि स्वदेशी को मजबूत बनाकर समृद्ध भारत की नींव रखी जा सकती है। चीनी एप पर रोक लगाने के भारत सरकार के फैसले का अनुसरण अनेक देशों द्वारा किया गया। देखते ही देखते भारत में  बने एप की मांग बढ़ गई। कोरोना आने पर  उससे निपटने  का तंत्र हमारे देश में नहीं था परन्तु  बीते चार-पांच महीनों में भारत  में चिकित्सा सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ। हालाँकि वे अभी भी अपर्याप्त हैं किन्तु देश में एक आत्मविश्वास जाग्रत हुआ है। कोरोना  से हुई मौतों के आंकड़े जिस तरह नियन्त्रण में हैं वह निश्चित रूप से हमारे चिकित्सा तंत्र की बड़ी सफलता है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि शासन और जनता दोनों को समझ आ गया कि स्वास्थ्य सेवाएँ भी उतनी ही जरूरी हैं जितनी कि देश  की सुरक्षा। केंद्र सरकार द्वारा दवा निर्माताओं को एक निश्चित समय सीमा के भीतर दवाइयों में लगने वाले कच्चे माल के मामले में आत्मनिर्भर होने के लिए जो सुविधाएँ दी गईं वह निश्चित रूप से एक क्रांतिकारी कदम है। इससे आने वाले समय में देश दवा निर्यात में बहुत आगे बढ़ सकेगा। कोरोना संकट के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को जो धक्का पहुंचा वह अकल्पनीय था। उसकी वजह से शुरूआत में आम देशवासी का मनोबल कमजोर हुआ लेकिन इतिहास गवाह है कि मुसीबत के क्षणों में भारत ने सदैव आगे बढऩे का हौसला दिखाया है। और वैसा ही वर्तमान दौर में नजर आ रहा है। यद्यपि मुसीबत बड़ी है और उसका अंत कब होगा ये कह पाना भी आज तो संभव नहीं है लेकिन संतोष का विषय है कि देश ने आपदा में अवसर तलाशने की बुद्धिमत्ता दिखाई है और कोरोना काल के बाद का  भारत एक सशक्त और समृद्ध भारत बनकर विश्व पटल  पर उभरेगा , ये तय है। सीमा पर शत्रुओं द्वारा उत्पन्न हालातों का जिस आत्मविश्वास और दृढ़ता से  सामना किया जा रहा है उसकी वजह से विश्व जनमत भी हमारी  ताकत को पहिचान रहा है। संरासंघ में भारत के समर्थन में विश्व की बड़ी ताकतों का खुलकर खड़ा होना इस बात का संकेत है कि भारत को विश्वशक्ति माना  जाने लगा है। लेकिन देश के भीतर आज भी अनेक समस्याएँ हैं जिनका समाधान किया जाना जरूरी है। ऐसी अनेक जानी-अनजानी ताकतें भी हैं जो विदेशी इशारों पर भारत को भीतर से कमजोर करने का कोई अवसर नहीं छोड़तीं। इनसे सख्ती के साथ निपटने का तंत्र विकसित करना होगा। वैसे एक बात अच्छी है कि केन्द्रीय सत्ता की दृढ़ता के कारण अनेक ऐसे  विवादों का निराकरण हो गया जिनकी वजह से जटिल  समस्याएँ बनी हुई थीं। ये भी अच्छा संकेत है कि कोरोना के कारण आये ठहराव के बावजूद निर्णय प्रक्रिया में व्यवधान नहीं आया और देश अपनी भावी दिशा को तय करने के प्रति गम्भीर है। आजादी के  इस पर्व पर देशभक्ति का भाव हर देशवासी के मन में जाग्रत होता है। लेकिन इस वर्ष आजादी की ये वर्षगांठ दायित्वबोध जाग्रत करने का भी अवसर है। किसी देश की ताकत का सही मूल्यांकन संकट के समय उसके नागरिकों के व्यवहार से होता है। भारत के सामने आज जो चुनौतियां हैं वे दरअसल नियति द्वारा ली जा रही परीक्षा के समान हैं। इन पर विजय प्राप्त करना हमारे भविष्य को तय करेगा। कोरोना नामक इस मुसीबत ने हमें बहुत कुछ सिखाया भी है। बेहतर होगा इस अग्निपरीक्षा में से सुरक्षित निकलकर हम ये साबित करें कि भारत 21 वीं सदी में दुनिया का नेतृत्व करने में सक्षम है। लेकिन इसके लिए हर देशवासी को अपनी भूमिका का ईमानदारी से निर्वहन करना होगा। विश्वास है आपदा को अवसर में बदलने के इस अभियान में हम सबकी भगीदारी रहेगी। आखिर ये देश भी तो हम सबका ही है।
कृपया कोरोना को लेकर समस्त सावधानियां बरतें क्योंकि उससे बचाव ही उसका बेहतर इलाज है।
स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 13 August 2020

बेंगलुरु दंगा षडयंत्र का हिस्सा : टीवी चैनलों का रवैया खतरनाक





कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में गत दिवस हुआ दंगा पूरी तरह किसी षडयंत्र का हिस्सा लगता है। फेसबुक पर एक कांग्रेस विधायक के करीबी रिश्तेदार की इस्लाम विरोधी टिप्पणी से भड़के मुस्लिम धर्मावलम्बियों की भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगाने के बाद विधायक निवास को फूंकने की भी कोशिश की। यद्यपि निकटवर्ती एक हिन्दू मंदिर को बचाने के लिए मुसलमानों द्वारा मानव श्रृंखला बनाये जाने के चित्र भी प्रसारित हुए लेकिन दूसरी जगहों पर बड़ी संख्या में आगजनी और तोडफ़ोड़ की गयी। दर्जनों वाहन आग के हवाले कर दिए गये। पुलिस द्वारा विधायक के संबंधी को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं दंगे भड़काने के आरोप में एक मुस्लिम संगठन के नेता को भी हिरासत में ले लिया गया। राज्य सरकार ने तोडफ़ोड़ करने वालों की पहिचान करते हुए उनसे नुकसान की वसूली करने का ऐलान कर दिया। सीएए के विरोध में हुए उपद्रव के दौरान की गयी तोड़फोड़ के आरोपियों से क्षतिपूर्ति का निर्णय उप्र की योगी सरकार द्वारा भी लिया गया था। वैसे तो ये एक अच्छा तरीका है लेकिन इससे दंगे नहीं रुकते क्योंकि दंगाई विध्वंसक मानसिकता से प्रेरित होते हैं। कतिपय देशविरोधी ताकतें ऐसे हादसों के पीछे काम करती हैं। बेंगलुरु की ताजी घटना के बारे में जो जानकारी मिली हैं उसके बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि दंगा जान-बूझकर भड़काया गया। सोशल मीडिया पर इस्लाम विरोधी किसी टिप्पणी के विरोध में पुलिस थाने में रिपोर्ट किया जाना तो मान्य तरीका है लेकिन थाने को आग के हवाले कर देने के अलावा सैकड़ों वाहनों में आगजनी और सार्वजानिक संपत्ति में तोडफ़ोड़ का कोई औचित्य नहीं था। उस पर भी एक मुस्लिम प्रवक्ता टीवी पर ये धमकाते हुए सुने गए कि आग में हाथ डालोगे तो जलोगे ही। किसी भी धर्म के विरुद्ध आपत्तिजनक अभिव्यक्ति किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। लेकिन उसके विरोध में जिस बर्बर तरीके का सहारा बेंगलुरु में लिया गया वह भी किसी भी कीमत पर मान्य नहीं किया जा सकता। सीएए के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग़ में सड़क घेरकर दिये गए धरने और उप्र के अनेक शहरों में हुए प्रायोजित दंगों से ये साबित हो गया कि मुस्लिमों के बीच अशिक्षा का सहारा लेकर धर्मान्धता फैलाने वाले तत्व पूरी तरह साक्रिय हैं। सोशल मीडिया पर जिस तरह की स्तरहीन और गैर जिम्मेदाराना सामग्री प्रसारित होती रहती है वह निश्चित तौर पर चिंता और निंदा का विषय है लेकिन उसकी प्रतिक्रियास्वरूप दंगा-फसाद कर देना और भी ज्यादा गैर जिम्मेदाराना तरीका है। बेंगलुरु की ताजा घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि मुस्लिम समाज के बीच कुछ ऐसे संगठन पनप रहे हैं जिनका नाम भले ही धार्मिक एहसास न करवाता हो लेकिन वे बड़ी ही कुटिलता से लोगों को भड़काकर शांति-व्यवस्था भंग करने का मौका तलाशते रहते हैं। बेंगलुरु में कांग्रेस विधायक के करीबी रिश्तेदार की करतूत के लिए उसका घर जलाने का कोई वाजिब कारण नहीं था। सबंधित पुलिस थाने द्वारा दोषी के विरुद्ध कार्रवाई में हुए विलम्ब की शिकायत उच्च अधिकारियों से की जानी चाहिए थी। जिन मुसलमानों ने हिन्दू मंदिर को बचाने की पहल की उनकी समझदारी प्रशंसनीय और अनुकरणीय है। वह सामाजिक सद्भाव का एक अच्छा उदाहरण बन सकता था लेकिन उसी समुदाय के बाकी लोगों ने उस कोशिश पर पानी फेर दिया और कुछ विघटनकारी सोच वाले नेताओं के बहकावे में पूरी कौम को कटघरे में खड़ा कर दिया। बीते 5 अगस्त को अयोध्या में राम मन्दिर के भूमि पूजन का आयोजन संपन्न होने के बाद भी देश में सांप्रदायिक सद्भाव बने रहने से हर शांतिप्रिय व्यक्ति ने राहत की सांस ली। लेकिन लगता है कुछ लोगों को ये हजम नहीं हुआ और उन्होंने धजी का सांप बनाने का खेल बड़े ही शातिराना अंदाज में रच डाला। इस बारे में विचारणीय बात ये भी है कि ऐसी घटनाओं के बाद एक तरफ  तो समाचार पत्रों से शासन-प्रशासन अपेक्षा करता है कि वे घटना के पीछे की सच्चाई को छिपायें। हिन्दू-मुस्लिम की बजाय दो गुटों में तनाव लिखें। लेकिन टीवी चैनलों को ये छूट दी जाती है कि वे हिन्दू और मुसलमानों के तथाकथित प्रवक्ताओं को बिठाकर तीतर लड़वाने जैसा तमाशा करवाएं। इस दौरान एक दूसरे पर हावी होने के फेर में बेहद संगीन आरोप लगते हैं। बहस को संचालित करने वाले एंकर इनमें से कुछ पर ये कटाक्ष भी करते हैं कि वे अपनी कौम के अधिकृत प्रवक्ता नहीं हैं लेकिन उसके बाद भी उन्हें लगातार आमंत्रित क्यों किया जाता है इस प्रश्न का उत्तर न मिलने से ये कहना गलत नहीं होगा कि उपद्रव भड़काने वालों को ये चैनल मंच प्रदान करते हुए महिमामंडित करते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े दायित्वबोध का निर्वहन करने की अपेक्षा केवल समाचार पत्रों से किया जाना और टीवी चैनलों को छुट्टा छोड़ देना सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति का परिचायक है। बेहतर हो केंद्र सरकार टीवी चैनलों की स्वछंदता पर भी ध्यान दे। बेंगलुरु में हुए दंगे देश के बाकी हिस्सों में न फैलें इसकी चिंता केंद्र और राज्य सरकारों को करना ही चाहिए। आगामी दिनों में हिन्दू और मुस्लिम दोनों के अनेक त्यौहार आने वाले हैं। स्वाधीनता दिवस को तो मात्र दो दिन शेष हैं। ऐसे में जऱा सी असावधानी घातक हो सकती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 August 2020

हिन्दी का विरोध चुनावी राजनीति : चिदम्बरम का कूदना आश्चर्यजनक





तमिलनाडु में हिन्दी विरोध का नया दौर सामने आने से भावी राजनीति का अंदाज लगाया जा सकता है। दो दिन पहले चेन्नई हवाई अड्डे पर द्रमुक सांसद कनिमोझी से एक सुरक्षा कर्मी द्वारा हिन्दी में कुछ पूछे जाने पर उन्होंने उससे तमिल या अंग्रेजी में बात करने कहा। इस पर सुरक्षा कर्मी ने तंज कस दिया कि क्या वे भारतीय नहीं हैं ? इस कटाक्ष से कनिमोझी भन्ना गईं। सांसद होने के कारण उनका तुर्रा दिखाना स्वाभाविक था। लिहाजा बात आगे बढ़ी और जाँच करवाने का आश्वासन भी मिल गया। हवाई अड्डे पर यात्रियों से सुरक्षा कर्मी पूछताछ करते हैं। लेकिन भाषायी समस्या आने पर भारतीयता का सवाल उठाना आपत्तिजनक है। कनिमोझी तो सांसद हैं लेकिन साधारण यात्री के बारे में भी इस तरह की टिप्पणी को सही नहीं माना जा सकता। एक साधारण सुरक्षा कर्मी द्वारा की गई गलती पर जाँच का आश्वासन मिल जाने के बाद मामला शांत हो जाना चाहिए था। लेकिन पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदम्बरम भी इस विवाद में बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर कूद गए और अपने साथ भी इसी तरह के व्यवहार की बात उजागर कर दी। बात और बढ़ी तो कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी भी हिन्दी न जानने के कारण दक्षिण भारत के नेताओं को प्रधानमन्त्री नहीं बनाने का रोना लेकर बैठ गए। हालाँकि उनके पिताश्री एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बन चुके हैं किन्तु कुमारस्वामी को ये शिकायत है कि उनके पिताश्री को स्वाधीनता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से हिन्दी में भाषण देने मजबूर किया गया। कनिमोझी और कुमारस्वामी की राष्ट्रीय स्तर पर कोई पकड़ या पहिचान नहीं है। यहाँ तक कि वे अपने पड़ोसी राज्य तक में असर नहीं रखते लेकिन श्री चिदम्बरम तो कई दशकों से राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े हैं। कांग्रेस जैसी पार्टी में वे अग्रिम पंक्ति के नेता माने जाते हैं। देश के वित्त और गृह मंत्री भी रह चुके हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि वे दिल्ली के ही स्थायी निवासी हैं और सर्वोच्च न्यायालय के बड़े वकीलों में उनकी गिनती होती है। यदि उन जैसा व्यक्ति भी इतनी संकुचित सोच रखे तो दु:ख होता है। खबर ये भी है कि तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति को लेकर भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं। त्रिभाषा फार्मूले पर भी वहां ऐतराज जताया जा रहा है। लोग सोच रहे होंगे कि अचानक हिन्दी को मुद्दा बनाने के पीछे कारण क्या है ? और इसका जवाब है आगामी वर्ष होने वाले तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव। तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध वहां के दोनों क्षेत्रीय दलों की प्राणवायु है। जिस तरह मायावती दलितों की और लालू-मुलायम पिछड़ों की राजनीति पर जिंदा हैं ठीक उसी तरह तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक के अलावा बाकी जितने भी क्षेत्रीय दल हैं, वे सभी हिन्दी विरोध पर एकमत हैं। हालाँकि दक्षिण के चारों राज्यों में उनकी अपनी भाषा ही हावी है लेकिन हिन्दी का जैसा विरोध तमिलनाडु में होता रहा वैसा केरल , कर्नाटक और अविभाजित आंध्र में नहीं दिखाई दिया। इस बारे में उल्लेखनीय है कि देवनागरी लिपि के प्रचार हेतु जो नागरी प्रचारिणी सभा ब्रिटिश राज के दौरान बनी उसका काम तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी) में राजाजी नाम से लोकप्रिय चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी देखा करते थे। राजाजी को ये दायित्व महात्मा गांधी द्वारा सौंपा गया जो उनके समधी बन गये थे। लेकिन आजादी के बाद देश के पहले भारतीय गवर्नर जनरल रहे राजाजी को जब राष्ट्रपति नहीं बनाया गया तब उनने कांग्रेस छोड़ स्वतंत्र पार्टी बनाई और हिन्दी के घोर विरोधी बन बैठे। रामास्वामी पेरियार द्वारा प्रारंभ द्रविड़ आन्दोलन से उत्तर भारत और हिंदुत्व के विरोध की जो मुहिम प्रारम्भ हुई वह अंतत: हिन्दी विरोध पर आकर केन्द्रित हो गई। द्रमुक और अन्ना द्रमुक दोनों ही केंद्र सरकार में हिस्सेदार तो बनते रहे लेकिन मेरी मुर्गे की डेढ़ टांग वाली सियासत के चलते वहां के नेता राजनीतिक ब्लैकमेल से नहीं चूके। राजीव गांधी की हत्या भी उत्तर भारत के विरोध की भावना का ही परिणाम थी। तमिल भाषा की आड़ में श्रीलंका के तमिलों को मिलाकर तमिल राष्ट्र बनाने जैसी साजिशें भी रची गईं। रामसेतु और भगवान राम को कालपनिक बताने जैसी सोच तमिलनाडु में फैलाये गए उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध का ही नतीजा था। यद्यपि द्रविड़ राजनीति के दो मजबूत स्तम्भ क्रमश: करूणानिधि और जयललिता दिवंगत हो चुके हैं और दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों के पास उन जैसे नेताओं का नितान्त अभाव है लेकिन तमिलनाडु में हिन्दी विरोध रेडीमेड मुद्दे जैसा है। फिर भी कनिमोझी के समर्थन में पी. चिदम्बरम का कूदना चौंकाता है क्योंकि वे क्षेत्रीय पार्टी की बजाय कांग्रेस के नेता हैं। बेहतर होगा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर व्यापक राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर अपनी नीति तय करे। क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान और संरक्षण बहुत जरुरी है लेकिन उनकी आड़ में देश के संघीय ढाँचे और अखंडता को नुकसान पहुँचाने वाली किसी भी मानसिकता और कोशिश को सख्ती से दबाना जरूरी है। भाषावार प्रान्तों की रचना का कितना नुकसान देश को हुआ वह किसी से छिपा नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 10 August 2020

वैचारिक शून्यता और असमंजस से बाहर आये कांग्रेस



कांग्रेस में पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग उठने लगी है। सोनिया गांधी को कार्यकारी बने एक साल हो गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था जिसे स्वीकार करने में ही महीनों लगा दिए गए। पद छोड़ते समय उनने एक टिप्पणी कर दी कि अगला अध्यक्ष गैर गांधी होगा। उससे ये कयास लागाये जाने लगे कि श्री गांधी पार्टी को एक परिवार में सीमित रहने के आरोप से बचाना चाहते हैं। लेकिन लम्बी उहापोह के बाद अंतत: उनकी माताजी को ही कमान देनी पड़ी । इस तरह राहुल ने भले ही पार्टी का नेतृत्व छोड़ दिया लेकिन घुमा फिराकर नियन्त्रण उनके परिवार का ही रहा। बीते एक साल में वे ही पार्टी का चेहरा बने रहे। इस दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं के बागी तेवर भी देखने मिले , वहीं राहुल ब्रिगेड के अन्य युवा सदस्य भी पार्टी लाइन से बाहर जाते हुए बयान देकर चर्चा में आये। श्रीमती गांधी लम्बे समय तक पार्टी की अध्यक्ष रहीं और इस दौरान केंद्र में कांग्रेस सत्ता में भी थी। लेकिन राहुल द्वारा बागडोर सँभालने के बाद कांग्रेस ने कुछ राज्यों में भले सफलता प्राप्त कर ली हो लेकिन राष्ट्रीय सत्तर पर वह प्रभाव छोड़ने में विफल रही और इसका कारण उसका शीर्ष नेतृत्व ही है। सोनिया जी और राहुल दोनों का जनता से तो क्या कांग्रेस के आम कार्यकर्ता तक से सीधा संवाद नहीं है। संगठन की हालत भी खस्ता है। राहुल के आने के बाद आंतरिक लोकतंत्र की बड़ी दुहाई दी गयी तथा नए चेहरों को आगे बढ़ाने की कोशिशें भी दिखाई दीं लेकिन अंतत: पुराने अखाड़ची ही हावी रहे। कांग्रेस में एक वर्ग ऐसे नेताओं का भी है जो न युवा है और न बूढ़े। ये सुशिक्षित, अनुभवी और मुखर हैं। इनके मन में ये पीड़ा भी है कि उनकी क्षमता का सही उपयोग नहीं हो पा रहा। लेकिन वे गांधी परिवार के विरुद्ध मुंह खोलने से भी बचते हैं। शशि थरूर, जयराम रमेश, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे अनेक चेहरे हैं जो पार्टी का पक्ष बेहतर तरीके से रख सकते हैं। लेकिन उन्हें सीमित महत्व ही मिलता है। कांग्रेस के भीतरी मामलों पर नजर रखने वाले प्रेक्षकों का कहना है कि मप्र और राजस्थान में जो संकट पैदा हुआ वह शीर्ष नेतृत्व और प्रादेशिक नेताओं के बीच संवादहीनता का परिणाम है। राहुल की बहिन प्रियंका यूँ तो उप्र की प्रभारी हैं लेकिन वे लगभग हर मसले में हस्तक्षेप करती हैं। राजस्थान में सचिन पायलट की बगावत से निपटने में राहुल उतने सक्रिय नहीं दिखे जितना प्रियंका। बावजूद इसके पार्टी के बड़े नेता राहुल को ही दोबारा अध्यक्षता सौंपे जाने के पक्षधर हैं। इससे लगता है कि जिस युवा नेतृत्व और गैर गांधी अध्यक्ष की बात राहुल द्वारा की जाती रही वह महज दिखावा थी। बीते एक वर्ष में कांग्रेस और कमजोर हुई ये कहना गलत न होगा। इसका लाभ लेते हुए मोदी सरकार ने संसद में अनेक ऐसे निर्णय करवा लिए जो कांग्रेस यदि सतर्क होती तब शायद सम्भव न था। कश्मीर से अनुच्छेद 370 जितनी आसानी से हट गया वह कांग्रेस की रणनीतिक विफलता थी। इसी तरह राम मन्दिर मुद्दे पर उसका वैचारिक असमंजस और विरोधाभास खुलकर सामने आया। भले ही प्रियंका और राहुल ने ट्वीट के जरिये भूमि पूजन पर हर्ष जताया लेकिन दिग्विजय सिंह अंत तक विरोध करते रहे और किसी की भी हिम्मत उन्हें रोकने की नहीं पड़ी। अचानक उपजा राम प्रेम ये दर्शाता है कि इतनी पुरानी पार्टी इतने गम्भीर मसले पर किस तरह गलत निर्णय लेती रही। ऐसे में श्री गांधी को दोबारा अध्यक्षता सौंपना दूरदर्शिता नहीं होगी। बेटे के बाद माँ और माँ के बाद फिर बेटे की ताजपोशी से परिवारवाद का आरोप और भी पक्का हो जाएगा। बेहतर होता श्री गांधी बीते एक साल में किसी ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष बनाए जाने की कोशिश करते जो संगठन के स्तर पर काम करते हुए बिखराव को रोक सके। सोनिया जी की अस्वस्थता के कारण राहुल और प्रियंका का सामने आना तो स्वाभाविक था लेकिन  कांग्रेस को अब ऐसा समानांतर नेतृत्व भी चाहिए जो उसकी सेहत को सुधार सके। आज के हालात में भले ही श्री गांधी प्रधानमंत्री पर कितना भी तीखा हमला करें लेकिन पार्टी के भीतर भी ये भावना तेजी से बढ़ रही है कि गम्भीर राष्ट्रीय मुद्दों पर वे सही निशाना नहीं लगा पाते जिसका फायदा नरेंद्र मोदी को मिल जाता है। वर्तमान स्थिति में कांग्रेस को अपना ढांचा मजबूत करने की जरूरत है जिसके लिए मुरझाये चेहरों की जगह नए ऊर्जावान नेताओं को महत्व दिया जाना चाहिए। इसके अलावा अधिकारों का विकेंद्रीकरण करना भी बहुत जरूरी है। प्रधानमन्त्री भले ही आज भाजपा के सबसे ताकतवर नेता हों लेकिन पार्टी संगठन उनके भरोसे नहीं रहता। उसका अपना ढांचा है। राम मन्दिर के भूमि पूजन पर समारोह में श्री मोदी के साथ मंच पर रास्वसंघ प्रमुख डा. मोहन भागवत का होना काफी कुछ कह गया। दूसरी तरफ  देश की सबसे पुरानी पार्टी में इतना बड़ा शून्य कभी नहीं रहा। इंदिरा जी ने भी सत्ता और संगठन दोनों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया था लेकिन वह अलग दौर था। बेहतर हो गांधी परिवार बदलते समय को समझते हुए अध्यक्ष संबंधी फैसला ले वरना मप्र और राजस्थान का घटनाक्रम और राज्यों में भी दोहराया जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 August 2020

कश्मीर संभल गया तो मनोज सिन्हा का कद बहुत उंचा हो जाएगा



अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन होने के कारण बीते 5 अगस्त को पूरा परिवेश राममय हो गया और इसीलिये जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाये जाने की वर्षगांठ की ज्यादा चर्चा नहीं हो सकी। लेकिन उसके बाद वहां के उप राज्यपाल जीसी मुर्मू द्वारा स्तीफा दिए जाने से जरूर लोगों का ध्यान उस तरफ गया। पहले-पहल इस खबर से लोग चौंके। कारण जानने पर पता लगा कि उनकी राज्य की नौकरशाही से पट नहीं रही थी। राज्य में विधानसभा चुनाव करवाने की उनकी घोषणा पर चुनाव आयोग द्वारा आपत्ति किये जाने को भी उनके स्तीफे से जोड़ा गया। इसी बीच ये जानकारी आई कि केंद्र सरकार ने उन्हें नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) बनाने का फैसला किया है। लेकिन उनके स्थान पर पूर्व रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा को उपराज्यपाल बनाने की घोषणा ज्यादा चौंकाने वाली रही। उप्र की गाजीपुर लोकसभा सीट से तीन चुनाव जीत चुके श्री सिन्हा 2019 में हार गये। तभी से उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी देने की चर्चा चल रही थी । राज्यसभा में लाकर दोबारा मंत्री बनाये जाने की खबर भी उड़ी किन्तु वैसा नहीं हुआ। हाल ही में उन्हें जगत प्रकाश नड्डा की टीम में शामिल कर भाजपा संगठन के काम में लगाने की बात भी सुनाई दी । लेकिन अंतत: श्री सिन्हा को जम्मू कश्मीर की कमान सौंपकर उनका राजनीतिक पुनर्स्थापन  कर दिया गया। इसके पीछे उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का नजदीकी होना बताया जा रहा है। लेकिन श्री सिन्हा की योग्यता केवल इतनी नहीं है। विद्यार्थी जीवन में बनारस हिन्दू विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे श्री सिन्हा ने सिविल इन्जीनियरिंग में एम. टेक की उपाधि अर्जित की थी। मैदानी राजनीति के खिलाड़ी रहने के कारण उनकी संपर्क क्षमता बेजोड़ हैं। लेकिन वे बहुत ही धीर-गंभीर किस्म के व्यक्ति हैं और अपने काम को बड़ी ही निष्ठा के साथ करते हैं। पार्टी लाइन से भी भटकते नहीं। बतौर केन्द्रीय मंत्री उनका कार्य बहुत ही संतोषप्रद रहा। 2017 में उप्र के मुख्यमंत्री पद हेतु उनका नाम काफी आगे था लेकिन अंत में योगी आदित्यनाथ को अवसर मिल गया। लेकिन श्री सिन्हा ने कभी उस पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की। बीते सवा साल से वे राजनीतिक तौर पर खाली थे किन्तु उनको कोई न कोई महती जिम्मेदारी सौंपी जायेगी ये सम्भावना सदैव बनी रही। जम्मू कश्मीर लम्बे समय से राष्ट्रपति शासन के अधीन है। केंद्र शासित राज्य बनाये जाने के बाद वहां विधानसभा चुनाव करवाए जाने हैं। इसके लिए राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करना होगा। संभवत: इसीलिये राजनीतिक क्षेत्र के अनुभवी श्री सिन्हा को इस संवेदनशील और समस्याग्रस्त राज्य का दायित्व सौंपा गया। वैसे घाटी के प्रमुख नेताओं में डा. फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर को रिहा किया जा चुका है जबकि महबूबा मुफ्ती अभी भी नजरबंद हैं। संयोग से ये तीनों राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हैं। अलगाववादी नेता भी बंद हैं।  इस कारण घाटी में विगत एक साल से भारत विरोधी बड़ा आन्दोलन नहीं हो सका। आतंकवादियों का भी बड़े पैमाने पर सफाया किया गया। हालाँकि कोरोना के कारण स्थितियां उस स्तर तक सामान्य नहीं की जा सकीं , जितनी अपेक्षित थीं। लेकिन कुल मिलाकर भारत विरोधी ताकतों की कमर तोड़ने का अभियान काफी हद तक सफल रहा है। ऐसे में ये जरूरी है कि राज्य विधानसभा के चुनाव करवाए जाएं। यद्यपि ये काम है तो बहुत ही कठिन क्योंकि आतंकवादी मौका पाते ही अपनी हरकतें दिखाने से बाज नहीं आते। बीते कुछ दिनों में ही उन्होंने अनेक भाजपा नेताओं की हत्या कर भय पैदा करने की कोशिश की। इसका उद्देश्य लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग रखना ही है। कांग्रेस का घाटी के अलावा जम्मू क्षेत्र में भी पहले जैसा जनाधार नहीं रहा। हिन्दू बहुल इलाकों में तो भाजपा का प्रभाव कायम है लेकिन घाटी के मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों में उसकी पकड़ अभी मजबूत नहीं हो सकी है। भले ही इक्का-दुक्का लोग पार्टी का झन्डा लगाने का साहस दिखाने लगे हों लेकिन उन सबकी हालत दांतों के बीच जीभ जैसी ही है। हालिया हत्याओं के कारण भाजपा के साथ आने से नए लोग डरेंगे और आतंकवादी भी यही चाहते हैं। कश्मीर घाटी में विधानसभा की अधिकांश सीटें होने से राजनीतिक पलड़ा उसी तरफ  झुकता रहा है। मोदी सरकार चाह रही है कि सीटों का परिसीमन इस तरह से किया जाए जिससे जम्मू अंचल की राजनीतिक वजनदारी भी कश्मीर घाटी के बराबर हो जाये। लद्दाख तो वैसे भी अलग केंद्र शासित क्षेत्र बना चुका है। 2014 में विधानसभा चुनाव के बाद त्रिशंकु सदन बनने पर भाजपा ने पीडीपी से अप्रत्याशित गठबंधन कर सभी को चौंका दिया। उसकी वजह से पार्टी को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी लेकिन कालान्तर में ये स्पष्ट हो गया कि भाजपा ने वह खतरा काफी सोच - समझकर उठाया था। पीडीपी सरकार से समर्थन वापिस लेने के बाद राष्ट्रपति शासन और फिर एक झटके में अनुच्छेद 370 के खात्मे से ये साबित हो गया कि केंद्र सरकार ने कश्मीर को लेकर काफी तैयारी कर रखी थी। लेकिन गत वर्ष 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर को लेकर किया गया ऐतिहासिक फैसला पूरे तौर पर प्रभावशाली हो सका ये कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि अव्वल तो लंबे समय तक घाटी में कर्फ्यू जैसे हालात रहे। संचार सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं थी। स्थितियां सामान्य होते तक कोरोना आ धमका जिससे जनजीवन और राजनीतिक गतिविधियाँ फिर ठप्प हो गईं। उस लिहाज से नये उप राज्यपाल मनोज सिन्हा के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। भाजपा की मुसीबत ये है कि वह फिलहाल अकेली है। नेशनल कांफ्रेंस , पीडीपी और कांग्रेस तीनों उसके विरुद्ध हैं। हालाँकि जैसे संकेत दिखाई दे रहे हैं उनके अनुसार भाजपा भविष्य में नेशनल कांफ्रेंस को अपने साथ ला सकती है। अब्दुल्ला बाप-बेटे की रिहाई और महबूबा मुफ्ती की नजरबन्दी तीन महीने बढ़ा देने से नये राजनीतिक समीकरणों के हलके संकेत मिल रहे हैं। बहरहाल श्री सिन्हा को कश्मीर के राजभवन में बैठकर कुदरत के नज़ारे देखने का अवसर कम ही मिलेगा। केंद्र सरकार ने बीते साल अनुच्छेद 370 को समाप्त कर घाटी में भारतीयता को मजबूत करने का जो प्रयास किया वह पूरी तरह सफल हुआ या नहीं ये विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा। भारत विरोधी ताकतों का प्रभाव सतह पर तो कम हुआ दिखता है लेकिन अभी भी उनकी जड़ें जमी हैं। घाटी में जब तक उद्योग-व्यापार सामान्य नहीं होते तब तक हालात अनिश्चित रहेंगे। पर्यटन उद्योग कश्मीर की प्राणवायु है। स्थितियां सामान्य होने का भी वह प्रमाण है। जब श्रीनगर की डल झील, गुलमर्ग, पहलगाँव आदि में फिल्मों की शूटिंग फिर बिना डरे शुरू हो जायेगी और सैलानी कश्मीर में सुरक्षित घूम फिर सकेंगे तब ही ये माना जा सकेगा कि घाटी ने बदले हुए हालात को स्वीकार कर लिया है। मनोज सिन्हा पर प्रधानमंत्री ने जो विश्वास किया है उस पर यदि वे खरे साबित हो सके तो उनका कद राष्ट्रीय राजनीति में बहुत उंचा हो जाएगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 August 2020

सोना-चांदी की कीमतों का आसमान छूना बड़े वैश्विक संकट का संकेत




सोना और चांदी ऐसी दो धातुएं हैं जिनके बारे में हर वह व्यक्ति भी रूचि रखता है जिसे न उन्हें खरीदना है और न ही बेचना है। वैसे तो पृथ्वी के गर्भ से इनसे भी मूल्यवान धातुएं निकलती हैं लेकिन सोना और चांदी से चूँकि आभूषण बनते हैं और इनका विक्रय दुनिया में कहीं भी हो जाता है इसलिए सदियों से ये मानव जाति को प्रिय रही हैं। इनके आधार पर किसी व्यक्ति की ही नहीं अपितु देश की सम्पन्नता का आकलन भी किया जाता है। और फिर भारत में तो इन धातुओं के प्रति दीवानगी विशेष रूप से रही है। इसीलिये हमारा देश सोने के आयात में अग्रणी है। कहते हैं जनता के अलावा विभिन्न मंदिरों और मठों के भण्डार में इतना स्वर्ण संचित है जिससे देश की आर्थिक स्थिति में अकल्पनीय सुधार हो सकता है। सोना और चांदी दोनों की कीमतों में यद्यपि बहुत अंतर होता है किन्तु चूँकि उनमें गिरावट नहीं आती इसलिए वह सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। इनकी कीमतें भी वैश्विक आधार पर तय होती हैं और अक्सर दिन में कई बार उनमें बदलाव देखा जाता है। हर देश अपने खजाने में ज्यादा से ज्यादा स्वर्ण रखता है क्योंकि उसी आधार पर उसकी मुद्रा की साख निश्चित होती है। कोरोना महामारी के कारण बीते अनेक महीनों से पूरी दुनिया अस्त व्यस्त हो चली है। व्यापार-उद्योग पर इसका जबरदस्त प्रभाव पड़ने से सम्पन्न देशों तक के सामने बड़ा संकट आ गया है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भी ठप्प सा है। दूसरी तरफ चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव से युद्ध की आशंका भी प्रबल होती जा रही है। जिस प्रकार की अनिश्चितता है उसके मद्देनजर हर देश अपनी आर्थिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हो उठा है। यही कारण है कि सोना और चांदी दोनों की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। गत दिवस सोना 55 हजार रु. प्रति दस ग्राम और चांदी लगभग 75 हजार रु. प्रति किलोग्राम तक जा पहुँची। जानकारों के अनुसार कीमतें और ऊपर जायेंगीं। जैसी कि जानकारी आ रही है उसके अनुसार सोने और चांदी की बढ़ती कीमतों के पीछे आम जनता की मांग न होकर बड़े निवेशकों के साथ विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही खरीदी है। उद्योग-व्यापार में आया ठंडापन निवेशकों को परेशान किये हुए है। दुनिया भर के पूंजी बाजार डगमगा रहे हैं। ऐसे में जिनके पास धन है वे सोने और चांदी में निवेश कर रहे हैं। दूसरी तरफ  सरकारी स्तर पर होने वाली खरीदी भी मूल्यवृद्धि का बड़ा कारण है। वर्तमान हालात में कौन सा देश कब दिवालिया हो जाये ये बता पाना कठिन है। इसी तरह चीन और अमेरिका के बीच शुरू हुए व्यापार युद्ध के बाद स्थिति अब सैन्य युद्ध की तरफ  बढ़ रही है। दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा अपना कब्जा बढ़ाये जाने से अमेरिका सहित एशिया और प्रशांत महासागर क्षेत्र में स्थित देश आक्रामक मुद्रा में हैं। कोरोना संकट के लिए चीन को जिम्मेदार मानने के अलावा अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में अपनी कमजोर स्थिति देखते हुए डोनाल्ड ट्रंप चीन को दबिश देकर अमेरिका की जनता को अपनी तरफ खींचने का दांव चल सकते हैं। पश्चिम एशिया में भी हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। ईरान और अमेरिका के बीच की तनातनी कब बारूदी धमाकों में बदल जाए ये कह पाना कठिन है। कच्चे तेल के व्यापार में जैसी अनिश्चितता उत्पन्न हो गई है वह भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला रही है। ऐसे में मुद्रा के प्रति विश्वास का संकट मंडराने लगा है। यही वजह है कि आपातकालीन विनिमय के तौर पर दुनिया भर के देश सोना और चांदी की खरीदी में जुट गए। यदि युद्ध हुआ तो उस सूरत में हथियारों सहित जरूरी चीजों की खरीदी में मुद्रा को अस्वीकार किये जाने पर सोना ऐसी धातु है जिसके जरिये भुगतान सुलभ हो सकेगा। हालाँकि उपभोक्ता बाजार में सोने और चांदी की मांग उतनी नजर नहीं आ रही। भारत में तो कोरोना के कारण ग्रीष्मकालीन विवाह सीजन चौपट होने से आभूषण बाजार ठण्डा ही रहा। कीमतें आसमान छू लेने के कारण अब सोना-चांदी खरीदना सटोरियों और काले धन को ठिकाने लगाने वालों के अलावा सरकारों के बस की ही बात रह गई है। लेकिन इस मूल्य वृद्धि को लेकर उठ खड़ी  हुई आशंकाएं पूरी दुनिया को भयभीत भी कर रही हैं। कोरोना से मुक्ति मिलने के पहले ही सीमित विश्व युद्ध के आसार बन जाएँ तो आश्चर्य नहीं होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 August 2020

सबके राम सब में राम : आम सहमति शुभ संकेत



आखिऱकार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण हेतु भूमि पूजन सम्पन्न हो ही गया। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और रास्वसंघ के प्रमुख डा. मोहन भागवत ने इस अवसर पर जो उद्बोधन दिए वे बहुत ही जिम्मेदारी से भरे हुए थे। प्रधानमंत्री ने सबके राम और सब में राम का उल्लेख करते हुए उन सभी की भावनाओं को सम्मान दे दिया जो कुछ दिनों से मंदिर और राम के प्रति बढ़ चढ़कर अपनी श्रद्धा प्रगट करने लगे हैं। मंदिर निर्माण में अड़ंगा लगाने और उसे राजनीति प्रेरित बताने वाले जिस तरह से रामधुन गाते हुए गर्व से खुद को हिन्दू कहने लगे वह राष्ट्रीय राजनीति में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत है। कुछ विघ्नसंतोषी अभी भी हैं लेकिन कुल मिलाकर राम मंदिर को लेकर राजनीतिक बिरादरी की राय काफी हद तक वास्तविकता को स्वीकार करने की बन गयी है। हालांकि श्रेय बटोरने की होड़ भी चल पड़ी है। इसका उद्देश्य भाजपा के हाथ से मंदिर निर्माण का राजनीतिक लाभ छीनना है। बसपा नेत्री मायावती ने गत दिवस इसीलिये मंदिर निर्माण का श्रेय सर्वोच्च न्यायालय को दिया। भूमिपूजन समारोह के अवसर पर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा प्रधानमंत्री ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उल्लेख करते हुए ये कहने का प्रयास किया कि मंदिर निर्माण पूरी तरह से विधि सम्मत है। निश्चित रूप से ये आदर्श स्थिति है। यदि केंद्र सरकार अपनी तरफ  से कानून बनाकर संसद में बहुमत के बल पर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़  करती तब उस पर राजनीतिक विवादों की छाया बनी रहती। लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद मंदिर निर्माण पर हाय तौबा मचाने वाले भी खुद को असली राम भक्त साबित करने आगे-आगे हो रहे हैं। प्रधानमंत्री द्वारा सबके राम और सब में राम कहकर मंदिर निर्माण को व्यापक राष्ट्रीय रूप देने का जो प्रयास किया वह निश्चित तौर पर समय की मांग है क्योंकि अब मंदिर मुद्दा किसी दल या नेता विशेष का न होकर पूरे देश का है। गत रात्रि अमेरिका में न्यूयॉर्क शहर के सुप्रसिद्ध टाइम्स स्क्वेयर में जिस तरह से राम मंदिर के मॉडल का प्रदर्शन हुआ उससे इसके वैश्विक महत्व का प्रमाण मिला। राम मंदिर किसके प्रयासों से बन रहा है ये अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रहा जितना ये कि अब अधिकतर राजनीतिक दलों ने इसे अपना समर्थन दे दिया है। कुछ साधु-संत और दिग्विजय सिंह जैसे नेता भले ही भूमि पूजन का विरोध करते रहे किन्तु उनका विरोध मुहूर्त को लेकर था न कि मदिर निर्माण से। प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर राम का गुणगान किया जबकि कमलनाथ ने मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय आकाक्षाओं का प्रतीक बताते हुए 11  चांदी की ईंटें मंदिर निर्माण हेतु भेजने की घोषणा की। कुछ समय पहले तक राम मंदिर को लेकर आलोचना करने वाले अनेक नेता गत दिवस खुद को राम का उपासक बताने आगे-आगे दिखाई दिए। कुल मिलाकर देश राममय हो गया जो हर्ष का विषय है। लेकिन इस अवसर पर हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी जहर बुझे तीर छोड़ने से बाज नहीं आये। उन्होंने सोशल मीडिया के अलावा पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा कि बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। उनसे भी दो कदम आगे बढ़कर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को ही न्याय मानने से इंकार कर दिया। ओवैसी ने कमलनाथ और प्रियंका के राम प्रेम पर भी तीखे कटाक्ष किये। इस बारे में उल्लेखनीय है कि मुस्लिम समाज ने अयोध्या विवाद में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मानने की रजामंदी पहले से दे रखी थी। यद्यपि फैसले से उनकी निराशा अस्वाभाविक नहीं है लेकिन ओवैसी और मुस्लिम समाज के विभिन्न संगठनों को ये नहीं भूलना चाहिए कि पुरातत्व विभाग द्वारा करवाई गई खुदाई के बाद पेश की गयी जिस रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय ने विवादित भूमि राम मंदिर के लिए दिए जाने का निर्णय दिया उस रिपोर्ट को तैयार करने वाले पुरातत्व विभाग के अधिकारी के.के. मोहम्मद भी मुस्लिम हैं। बेहतर होगा यदि कांग्रेस सहित बाकी दलों के नेतागण भी ओवैसी की आलोचना करने के साथ ही मुस्लिम समाज के प्रमुख संगठनों को ये समझाएं कि वे भले ही मंदिर निर्माण में सहायक न बनें किन्तु अपनी खीज निकालने के लिए कितना भी वक्त लग जाए लेकिन बदला जरूर लिया जायेगा जैसी बातों से बचें। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या के निकट ही मुस्लिम समाज को भी मस्जिद बनाने हेतु भूमि दी गयी है। बेहतर होगा उस जगह पर भव्य मस्जिद बनाने की तैयारी मुस्लिम समाज करे। लेकिन ऐसा न करते हुए यदि वे बाबरी मस्जिद का रोना ही रोते रहे तो उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा। मुस्लिम नेताओं को ये समझ लेना चाहिये कि देश में तुष्टीकरण के दिन जा चुके हैं। कांग्रेस ही नहीं सपा जैसी पार्टियाँ भी समझ चुकी हैं कि मुस्लिम मतों के पीछे भागने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। ऐसे में पूरी तरह किनारे लग जाने के पहले मुस्लिम समुदाय के समझदार लोगों को तो कम से कम मुख्यधारा में आने की कोशिश कर लेनी चाहिए वरना मुसलमान राजनीतिक दृष्टि से और भी कमजोर हो जायेंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी