Monday, 17 August 2020

सब कुछ आसान हो जाये तो नेताओं और अफसरों को पूछेगा कौन ? भ्रष्टाचार की जड़ों में मठा डाले बिना बात नहीं बनने वाली


स्वाधीनता दिवस की शाम एक टीवी चैनल पर बिना चीख पुकार वाली बहस को सुनने लगा | मुद्दा था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सुबह  लाल किले की प्राचीर से दिया गया भाषण | भाजपा के प्रतिनिधि जहां प्रधानमन्त्री के एक  - एक शब्द का गुणगान करने में लगे थे वहीं  विपक्षी दलों के नुमाइंदे  अपना धर्म निभाने में | बात नए उद्योगों के शुरू होने , आत्मनिर्भरता , रोजगार की स्थिति , सीधा विदेशी निवेश , मेक इन इण्डिया और ऐसे ही तमाम विषयों  के इर्द गिर्द सिमटी थी | इसी बीच एंकर ने एक वित्तीय सलाहकार  को बोलने का अवसर दिया | उनके बातों में राजनीति  कदापि नहीं थी और उन्होंने  प्रधानमंत्री के  इरादों को भी नेक बताया | कोरोना के बावजूद भी विदेशी मुद्रा के भंडार के साथ रिकार्ड तोड़ विदेशी निवेश पर भी संतोष व्यक्त किया लेकिन आत्मनिर्भर भारत और नए उद्योगों को प्रोत्साहन के बारे में उनका कहना था कि प्रधानमंत्री जो कहते हैं वह जमीन पर कितना उतरता है इसे परखने के लिए उन्हें केन्द्रीय सचिवालय के समस्त सचिवों को बुलाकर ये जानकारी लेनी चाहिए कि उनके पास  छह महीने से  ज्यादा समय से लंबित फाइलें कितनी हैं ?

उनके कहने का आशय ये था  कि किसी नये   उद्यमी को सरकारी  दफ्तर वाले इतना हलाकान कर डालते हैं कि नया काम शुरू  करने से पूर्व ही उसका उत्साह ठंडा हो जाता है | उन्होंने  ये कहकर सभी को चौंका दिया कि उनके एक मित्र ने तेल  मिल लगाने के लिए आवेदन किया जिसके लिए उसे दर्जनों विभागों से लायसेन्स अथवा अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना था | कुछ दिनों तक चक्कर लगाने  के बाद उसके अरमानों का ही तेल निकल गया | बातचीत के दौरान ढेर सारे कानूनों  का जिक्र आने पर कहा  गया कि केंद्र सरकार ने तमाम अनुपयोगी और कारोबार में बाधक कानूनों को खत्म कर दिया लेकिन ये बात भी स्वीकार की गई कारोबार को सरल और सहज बनाने के लिए किये जाने वाले सुधारों की प्रक्रिया बहुत ही सुस्त है | यहाँ तक कि प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणाओं पर अमल होने में भी नौकरशाही अड़ंगे लगाती है | इसकी वजह ये है कि यदि सब कुछ आसान हो गया तो फिर अफसरों और नेताओं की पूछ - परख ही समाप्त हो जायेगी |

मैंने जब इसकी चर्चा वीडियो कान्फ्रेंसिंग पर अपने मित्रों से की तो तीन दशक से हांगकांग निवासी Sanjay Nagarkar ने बड़ी ही मार्के की बात कही | उन्होंने विभिन्न देशों के अपने अनुभव बताते हुए कहा कि उच्च स्तर पर तो भ्रष्टाचार विकसित देशों में भी होता है  लेकिन निचले स्तर का भ्रष्टाचार नहीं होने से जनता का  उससे वास्ता नहीं  पड़ता | जबकि हमारे देश में सरकारी दफ्तर का भृत्य भी भ्रष्टाचार में लिप्त देखा जा सकता है | अदालतों में न्यायाधीश की आसंदी के नीचे बैठा बाबू वकीलों से जिस दबंगी के साथ सौजन्य भेंट लेता है वह जगजाहिर है | इसी तरह सड़क  पर खोमचा लगाने वाला गरीब व्यक्ति कब पुलिस वाले की अवैध वसूली का शिकार हो जाये ये कहना कठिन है |

उनका कहना था कि निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार चूंकि आम जनता को परेशान करते हुए उसका शोषण करता है इसलिए हमारे देश की तरक्की अपेक्षित गति से नहीं हो पा रही | हमारे देश की  वर्तमान केंद्र सरकार ये दावा करते नहीं  थकती कि वह घोटाला मुक्त है | प्रधानमंत्री के बारे में भी आम भावना यही है कि वे ईमानदारी से सेवा कर रहे हैं | देश को प्रगति पथ पर ले जाने की उनकी प्रतिबद्धता पर भी ज्यादातर लोगों को भरोसा है किन्तु निचले स्तर के भ्रष्टाचार को रोक पाने में कोई सफलता  नहीं मिली | और यदि मिली भी तो ऊँट के मुंह में जीरे के बराबर |

यही वजह है कि प्रधानमंत्री के न खाउंगा के   दावे की सच्चाई को तो  लोग स्वीकार कर भी लेते हैं लेकिन  न खाने दूंगा वाली बात हवा हवाई होकर रह गई | कहते हैं केद्रीय सचिवालय का काफी शुद्धिकरण किया गया है लेकिन सरकार केवल दिल्ली से नहीं चलती | ग्राम पंचायत के स्तर तक आते - आते भ्रष्टाचार भी भिन्न - भिन्न रूप धारण करता जाता है |

ये बात सही है कि गरीबों के बैंक खाते में सीधे पैसा जमा करने की व्यवस्था ने भ्रष्टाचार को एक हद तक तो रोका है लेकिन प्रधानमन्त्री आवास योजना का पैसा प्राप्त करने के  लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सरपंच खुले आम कमीशन लेते हैं | शहरों में राशन कार्ड और गरीबी रेखा वाले कार्ड बनवाने के लिए जिला मुख्यालय में किस तरह  दलाली होती  है ये किसी से छिपा नहीं है |

निचले स्तर का भ्रष्टाचार रोकने में यदि कामयाबी मिल जाती तो प्रधानमंत्री के तमाम चुनावी वायदे और सरकार में आने के बाद की गयी  घोषणाओं के फलस्वरूप अच्छे दिन आ गये होते | आम जनता को जिस तरह के भ्रष्टाचार से रूबरू होना पड़ता है वही देश की छवि को खराब  करता है | राजनीतिक दल जिन धनकुबेरों , भ्रष्ट नौकरशाहों या अन्य स्रोतों से चंदा वसूलते हैं उससे आम जनता को किसी भी तरह का लेना   - देना नहीं है , लेकिन जब उससे छोटी - छोटी घूस माँगी जाती  तभी उसके मुंह से निकलता है कि सब चोर हैं |

स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री के लगभग डेढ़ घंटे के ओजस्वी उद्बोधन के संदर्भ में शुरू ये चर्चा निश्चित रूप से समस्या  की जड़ को समझने जैसा है | सही बात है कि  निचले स्तर का  भ्रष्टाचार तब तक नहीं रुक सकता जब तक उसे रोकने वालों का दामन बेदाग न हो | खाकी वर्दी पहिनकर  डंडे के जोर पर अवैध कमाई  करने वाला पुलिस वाला जब लोकायुक्त में जा बैठता है तब उसको ईमानदारी का पुतला मान लेना अपने आप को धोखा देना नहीं तो और क्या है ? अदालतों  में छोटे - छोटे कामों के लिए बाबुओं के हाथों की खुजली मिटाने वाले वकील साहब जब मी लॉर्ड बन जाते है तब क्या न्याय के मंदिर में खुलेआम होने वाले पाप उन्हें नजर नहीं आते ? इसीलिए जब बात भ्रष्टाचार रोकने की  हो तब ये ध्यान रखना भी जरूरी है कि केवल गंगोत्री में जल की शुद्धता सुरक्षित रखने मात्र से गंगा को प्रदूषित होने से तब तक नहीं  बचाया जा सकता जब तक मैदानी इलाकों में उसमें समा जाने वाले नालों को नहीं रोका जाए  |

चाणक्य के जीवन का एक अति महत्वपूर्ण प्रसंग है  , जब वे किसी पौधे की जड़ों में मठा डालते देखे गए और उनसे उसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि किसी बुराई को नष्ट करना है तो उसकी जड़ों को दोबारा पनपने से रोकना जरूरी है | हमारे देश में भ्रष्टाचार रूपी वृक्ष की पत्तियां   और टहनियां तोड़ने का काम तो खूब होता है लेकिन जड़ों में मठा डालने की जुर्रत कोई नहीं करता |

विस्तारवाद और आतंकवाद के विरुद्ध भारत का कड़ा रुख असरकारक



प्रधानमंत्री द्वारा स्वाधीनता दिवस को सुबह दिल्ली स्थित लालकिले की प्राचीर से जो भाषण दिया जाता है वह केवल रस्मअदायगी न होकर देश और दुनिया के लिए सरकार का एक नीति वक्तव्य होता है। इस वर्ष भी नरेंद्र मोदी ने लगभग डेढ़ घंटे का लंबा भाषण दिया। यद्यपि उसमें मुख्य रूप से आत्मनिर्भर भारत पर ज्यादा जोर दिया गया लेकिन बिना नाम लिये ही पाकिस्तान और चीन को भी ये बता दिया कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) से लेकर वास्तविक नियन्त्रण रेखा (एलएसी) पर होने वाली किसी भी गड़बड़ी का हमारी सेना करारा जवाब देगी। प्रधानमंत्री ने साफ-साफ कहा कि आतंकवाद और विस्तारवाद के विरुद्ध भारत कमर कसकर लड़ने तैयार है। हालाँकि उनके इस भाषण पर विपक्ष ने फिर सवाल पूछा कि श्री मोदी ने चीन का नाम क्यों नहीं लिया? लेकिन सैन्य और कूटनीतिक मामलों के जानकारों के अनुसार प्रधानमंत्री ने बहुत ही समझदारी का पारिचय दिया और बिना कोई विवादास्पद बात कहे पाकिस्तान और चीन दोनों को माकूल सन्देश प्रेषित कर दिया। हालाँकि लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में अभी भी तनाव की स्थिति बनी हुई है लेकिन भारत ने भी अपना सैन्य जमावड़ा करते हुए ये संकेत दे दिया है कि चीन जैसा करेगा वैसा ही  जवाब उसे दिया जाएगा। स्वाधीनता दिवस के पहले चीनी विदेश मंत्री ने भारत के साथ सभी विवाद वार्ता द्वारा सुलझाये जाने की बात कहकर सीमा पर तनाव घटाने की इच्छा व्यक्त की। हालाँकि चीन के ऐसे किसी भी बयान पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं होता। लद्दाख में अपनी सेनाएं पीछे हटाने का वायदा करने के बाद पलट जाने का उदहारण ताजा-ताजा है। ऐसे में ये माना जा सकता है कि भारत द्वारा सीमा पर जवाबी मोर्चेबंदी के बाद आर्थिक क्षेत्र में चीन पर जो शिकंजा कसा गया उससे वह दबाव महसूस कर रहा है। इसका अप्रत्यक्ष संकेत नेपाल के रुख में अचानक आये परिवर्तन से भी मिल रहा है। नेपाली प्रधानमंत्री केपी ओली द्वारा लम्बे अंतराल के बाद श्री मोदी से फोन पर बात करना और आज काठमांडू में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत की शुरुवात इस बात का प्रमाण है कि चीन को ये एहसास हो चला है कि भारत से टकराना उसके लिए नुकसानदेह हो रहा है। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि नेपाल द्वारा हाल के महीनों में जो भारत विरोधी रुख दिखाया गया उसके पीछे चीन की ही शह थी। भारतीय भूभाग को अपने नक़्शे में शामिल करने के अलावा सीमवर्ती क्षेत्रों में सैन्य तैनाती जैसे कदम उठाने का दुस्साहस नेपाल कभी नहीं कर पाता यदि उसकी पीठ पर चीन का हाथ न रहा होता। प्रधानमंत्री ओली के भारत विरोधी रवैये की उनके देश में ही भारी आलोचना हुई। यहाँ तक कि उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड तक उन्हें हटाने पर आमादा हैं। लेकिन चीन उनके साथ खड़ा हुआ है। इसलिए ऐसा मान लेना गलत न होगा कि नेपाल के रुख में आई नरमी की वजह चीन से मिले निर्देश ही हैं। गलवान घाटी की घटना के बाद भारत द्वारा उस क्षेत्र में जबरदस्त सैन्य तैयारियां किये जाने पर चीन ने काफी ऐतराज जताया लेकिन जब उसे लगा कि भारत युद्ध की धमकी से डरने की बजाय दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है तब वह बातचीत के जरिये रिश्ते सुधारने जैसी बातें करने लगा और नेपाल को भी वैसा ही करने की सलाह दे डाली। दरअसल इस सबके पीछे भारत द्वारा आर्थिक मोर्चे पर चीन की घेराबंदी किया जाना बड़ा कारण बन गया। श्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का जो नारा दिया उसका सबसे ज्यादा असर चीन पर ही पड़ा। भारत को किया जाने वाला उसका निर्यात लगातार कम होता जा रहा है। इसके अलावा सरकारी क्षेत्र में काम करने से चीनी कम्पनियों को रोक दिया गया है। भारत के व्यापारी भी चीनी माल के आर्डर रद्द कर रहे हैं। राखी पर इसका पहला प्रमाण मिला। आगामी गणेश पूजा में भी चीन से आयातित होने वाली मूर्तियों के आयात और व्यापार के प्रति कोई उत्साह नहीं है। यही हाल रहा तो दीपावली के अवसर पर चीनी सामान के उपयोग में भारी कमी आने की पूरी-पूरी संभावना है जो चीन के लिये बड़ा धक्का होगा। इस तरह प्रधानमंत्री द्वारा लालकिले से भले ही चीन और पाकिस्तान का नाम न लिया गया हो लेकिन विस्तारवाद की खुलकर आलोचना और आतंकवाद के विरूद्ध निर्णायक लड़ाई का संकल्प व्यक्त किये जाने का असर होना अवश्यंभावी है। संरासंघ में पाकिस्तान की तरफदारी किये जाने के मामले में चीन जिस तरह अकेला पड़ा वह भी शुभ संकेत है। भारत के आत्मनिर्भरता रूपी दांव ने चीन के लिए जबरदस्त परेशानी पैदा कर दी है क्योंकि देखा सीखी दुनिया के अनेक देशों ने चीन की आर्थिक मोर्चेबंदी कर दी। स्वाधीनता दिवस के भाषण में श्री मोदी द्वारा जिस तरह का कूटनीतिक संदेश दिया गया उसका असर आने वाले दिनों में जरूर दिखाई देगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

नेता तो बहुत हैं किंतु उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक कोई नहीं आज की राजनीति में अटल जी का अभाव बहुत खलता है



आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की दूसरी पुण्य तिथि है | आजादी के बाद  भारत में यूँ तो एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र नेता थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसी लोकप्रियता हासिल हुई | लेकिन जहाँ नेहरू जी और इंदिरा जी सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनकी  लोकप्रियता और सम्मान प्रधानमन्त्री से कमतर नहीं था | इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीतिक शैली थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें उनसे पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही साफगोई से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | राजनीति के आलावा सार्वजनिक जीवन में जिन उच्च मानदंडों को उन्होंने स्थापित किया वे आदर्श कहे जा सकते हैं |

विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुई लेकिन अटल जी ने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि भाषण दिया वह आज भी उद्धृत किया जाता है | नेहरू जी ने संसद में उनकी तेजस्विता को भांपते हुए भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | यही नहीं तो उन्होंने अपने विश्वस्त नेता स्व.उमाशंकर दीक्षित को उन्हें कांग्रेस में लाने का जिम्मा भी सौंपा परन्तु वे विफल रहे | 

हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में उनके राजनीतिक विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी प्रभावशाली वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

राजनीति के क्षेत्र में बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान कैसे अर्जित किया जा सकता है इसका उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि राजनीतिक व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह किया करती थीं  |

आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें , कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चूका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

उन्हें गये दो वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |

Friday, 14 August 2020

आपदा को अवसर में बदलकर विश्व शक्ति बनने का सुअवसर



इस साल आजादी का पर्व ऐसी परिस्थितियों में आया है जब पूरी दुनिया के साथ हमारा देश भी कोरोना नामक महामारी से जूझ रहा है। इसके कारण समूचा देश हलाकान है। प्रारंभ में इसे शहरी, ख़ास तौर पर बड़े लोगों तक सीमित माना गया था परन्तु अब इसका संक्रमण शहरी बस्तियों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक फैल गया है। आर्थिक हैसियत की सीमा रेखा भी नहीं रही। हजारों लोग मारे जा चुके हैं। दो महीने से ज्यादा की देशबंदी ने राष्ट्रीय जीवन की समूची संरचना को ही उलट पुलट दिया। जिस तरह से कोरोना संक्रमण का आंकड़ा रोजाना बढ़ता जा रहा है उससे लगता है अभी उससे मुक्ति दूर है। चिकित्सा विज्ञान इसका टीका बनाने में जुट गया है। उम्मीद की जा रही है कि दिसम्बर तक भारत में बना टीका बाजार में आ जाएगा। हालाँकि अनेक देशों के टीके का उत्पादन भारतीय कपनियां करने वाली हैं लेकिन हमारे द्वारा तैयार किया टीका आने में कुछ महीनों की देर है। और तब तक सिवाय कोरोना का सामना करने और उससे बचकर रहने के दूसरा विकल्प नहीं है। देशबंदी में कारोबार चौपट होने से रोजगार की समस्या उत्पन्न हो गई थी और इसीलिये अंतत: उसे हटाना पड़ा। भले ही  सीमित प्रतिबंध अभी भी हैं लेकिन धीरे-धीरे देश गतिशील हो उठा है। सभी मोर्चों पर सक्रियता बढ़ी है। अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ाते क़दमों से ही सही लेकिन रफ्तार पकड़ने लगी है किन्तु ये स्वीकार करने में कुछ भी बुराई नहीं है कि कोरोना ने हमारी प्रगति को काफी पीछे कर दिया है और इससे उबरने में लम्बा समय लगेगा। लेकिन आपदा अपने साथ अनेक अवसर भी लेकर आई है। आत्मनिर्भर भारत की प्रतिबद्धता जिस तरह से राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गयी वह अच्छा संकेत है। बीते दिनों रक्षा मंत्री द्वारा 100 से भी अधिक रक्षा उपकरणों का निर्माण भारत में ही  किये जाने की नीतिगत घोषणा  से रक्षा सामग्री  के क्षेत्र में विदेशों  पर निर्भरता घटने का रास्ता साफ़ हुआ। यही नहीं तो ऐसा होने पर देश की रक्षा उत्पादन इकाइयों के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा भी कम होगा। चीन से आयात होने वाली राखी का आयात दो हजार करोड़ रु. से भी ज्यादा घटने से ये विश्वास प्रबल हुआ है कि स्वदेशी को मजबूत बनाकर समृद्ध भारत की नींव रखी जा सकती है। चीनी एप पर रोक लगाने के भारत सरकार के फैसले का अनुसरण अनेक देशों द्वारा किया गया। देखते ही देखते भारत में  बने एप की मांग बढ़ गई। कोरोना आने पर  उससे निपटने  का तंत्र हमारे देश में नहीं था परन्तु  बीते चार-पांच महीनों में भारत  में चिकित्सा सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ। हालाँकि वे अभी भी अपर्याप्त हैं किन्तु देश में एक आत्मविश्वास जाग्रत हुआ है। कोरोना  से हुई मौतों के आंकड़े जिस तरह नियन्त्रण में हैं वह निश्चित रूप से हमारे चिकित्सा तंत्र की बड़ी सफलता है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि शासन और जनता दोनों को समझ आ गया कि स्वास्थ्य सेवाएँ भी उतनी ही जरूरी हैं जितनी कि देश  की सुरक्षा। केंद्र सरकार द्वारा दवा निर्माताओं को एक निश्चित समय सीमा के भीतर दवाइयों में लगने वाले कच्चे माल के मामले में आत्मनिर्भर होने के लिए जो सुविधाएँ दी गईं वह निश्चित रूप से एक क्रांतिकारी कदम है। इससे आने वाले समय में देश दवा निर्यात में बहुत आगे बढ़ सकेगा। कोरोना संकट के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को जो धक्का पहुंचा वह अकल्पनीय था। उसकी वजह से शुरूआत में आम देशवासी का मनोबल कमजोर हुआ लेकिन इतिहास गवाह है कि मुसीबत के क्षणों में भारत ने सदैव आगे बढऩे का हौसला दिखाया है। और वैसा ही वर्तमान दौर में नजर आ रहा है। यद्यपि मुसीबत बड़ी है और उसका अंत कब होगा ये कह पाना भी आज तो संभव नहीं है लेकिन संतोष का विषय है कि देश ने आपदा में अवसर तलाशने की बुद्धिमत्ता दिखाई है और कोरोना काल के बाद का  भारत एक सशक्त और समृद्ध भारत बनकर विश्व पटल  पर उभरेगा , ये तय है। सीमा पर शत्रुओं द्वारा उत्पन्न हालातों का जिस आत्मविश्वास और दृढ़ता से  सामना किया जा रहा है उसकी वजह से विश्व जनमत भी हमारी  ताकत को पहिचान रहा है। संरासंघ में भारत के समर्थन में विश्व की बड़ी ताकतों का खुलकर खड़ा होना इस बात का संकेत है कि भारत को विश्वशक्ति माना  जाने लगा है। लेकिन देश के भीतर आज भी अनेक समस्याएँ हैं जिनका समाधान किया जाना जरूरी है। ऐसी अनेक जानी-अनजानी ताकतें भी हैं जो विदेशी इशारों पर भारत को भीतर से कमजोर करने का कोई अवसर नहीं छोड़तीं। इनसे सख्ती के साथ निपटने का तंत्र विकसित करना होगा। वैसे एक बात अच्छी है कि केन्द्रीय सत्ता की दृढ़ता के कारण अनेक ऐसे  विवादों का निराकरण हो गया जिनकी वजह से जटिल  समस्याएँ बनी हुई थीं। ये भी अच्छा संकेत है कि कोरोना के कारण आये ठहराव के बावजूद निर्णय प्रक्रिया में व्यवधान नहीं आया और देश अपनी भावी दिशा को तय करने के प्रति गम्भीर है। आजादी के  इस पर्व पर देशभक्ति का भाव हर देशवासी के मन में जाग्रत होता है। लेकिन इस वर्ष आजादी की ये वर्षगांठ दायित्वबोध जाग्रत करने का भी अवसर है। किसी देश की ताकत का सही मूल्यांकन संकट के समय उसके नागरिकों के व्यवहार से होता है। भारत के सामने आज जो चुनौतियां हैं वे दरअसल नियति द्वारा ली जा रही परीक्षा के समान हैं। इन पर विजय प्राप्त करना हमारे भविष्य को तय करेगा। कोरोना नामक इस मुसीबत ने हमें बहुत कुछ सिखाया भी है। बेहतर होगा इस अग्निपरीक्षा में से सुरक्षित निकलकर हम ये साबित करें कि भारत 21 वीं सदी में दुनिया का नेतृत्व करने में सक्षम है। लेकिन इसके लिए हर देशवासी को अपनी भूमिका का ईमानदारी से निर्वहन करना होगा। विश्वास है आपदा को अवसर में बदलने के इस अभियान में हम सबकी भगीदारी रहेगी। आखिर ये देश भी तो हम सबका ही है।
कृपया कोरोना को लेकर समस्त सावधानियां बरतें क्योंकि उससे बचाव ही उसका बेहतर इलाज है।
स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 13 August 2020

बेंगलुरु दंगा षडयंत्र का हिस्सा : टीवी चैनलों का रवैया खतरनाक





कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में गत दिवस हुआ दंगा पूरी तरह किसी षडयंत्र का हिस्सा लगता है। फेसबुक पर एक कांग्रेस विधायक के करीबी रिश्तेदार की इस्लाम विरोधी टिप्पणी से भड़के मुस्लिम धर्मावलम्बियों की भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगाने के बाद विधायक निवास को फूंकने की भी कोशिश की। यद्यपि निकटवर्ती एक हिन्दू मंदिर को बचाने के लिए मुसलमानों द्वारा मानव श्रृंखला बनाये जाने के चित्र भी प्रसारित हुए लेकिन दूसरी जगहों पर बड़ी संख्या में आगजनी और तोडफ़ोड़ की गयी। दर्जनों वाहन आग के हवाले कर दिए गये। पुलिस द्वारा विधायक के संबंधी को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं दंगे भड़काने के आरोप में एक मुस्लिम संगठन के नेता को भी हिरासत में ले लिया गया। राज्य सरकार ने तोडफ़ोड़ करने वालों की पहिचान करते हुए उनसे नुकसान की वसूली करने का ऐलान कर दिया। सीएए के विरोध में हुए उपद्रव के दौरान की गयी तोड़फोड़ के आरोपियों से क्षतिपूर्ति का निर्णय उप्र की योगी सरकार द्वारा भी लिया गया था। वैसे तो ये एक अच्छा तरीका है लेकिन इससे दंगे नहीं रुकते क्योंकि दंगाई विध्वंसक मानसिकता से प्रेरित होते हैं। कतिपय देशविरोधी ताकतें ऐसे हादसों के पीछे काम करती हैं। बेंगलुरु की ताजी घटना के बारे में जो जानकारी मिली हैं उसके बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि दंगा जान-बूझकर भड़काया गया। सोशल मीडिया पर इस्लाम विरोधी किसी टिप्पणी के विरोध में पुलिस थाने में रिपोर्ट किया जाना तो मान्य तरीका है लेकिन थाने को आग के हवाले कर देने के अलावा सैकड़ों वाहनों में आगजनी और सार्वजानिक संपत्ति में तोडफ़ोड़ का कोई औचित्य नहीं था। उस पर भी एक मुस्लिम प्रवक्ता टीवी पर ये धमकाते हुए सुने गए कि आग में हाथ डालोगे तो जलोगे ही। किसी भी धर्म के विरुद्ध आपत्तिजनक अभिव्यक्ति किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। लेकिन उसके विरोध में जिस बर्बर तरीके का सहारा बेंगलुरु में लिया गया वह भी किसी भी कीमत पर मान्य नहीं किया जा सकता। सीएए के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग़ में सड़क घेरकर दिये गए धरने और उप्र के अनेक शहरों में हुए प्रायोजित दंगों से ये साबित हो गया कि मुस्लिमों के बीच अशिक्षा का सहारा लेकर धर्मान्धता फैलाने वाले तत्व पूरी तरह साक्रिय हैं। सोशल मीडिया पर जिस तरह की स्तरहीन और गैर जिम्मेदाराना सामग्री प्रसारित होती रहती है वह निश्चित तौर पर चिंता और निंदा का विषय है लेकिन उसकी प्रतिक्रियास्वरूप दंगा-फसाद कर देना और भी ज्यादा गैर जिम्मेदाराना तरीका है। बेंगलुरु की ताजा घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि मुस्लिम समाज के बीच कुछ ऐसे संगठन पनप रहे हैं जिनका नाम भले ही धार्मिक एहसास न करवाता हो लेकिन वे बड़ी ही कुटिलता से लोगों को भड़काकर शांति-व्यवस्था भंग करने का मौका तलाशते रहते हैं। बेंगलुरु में कांग्रेस विधायक के करीबी रिश्तेदार की करतूत के लिए उसका घर जलाने का कोई वाजिब कारण नहीं था। सबंधित पुलिस थाने द्वारा दोषी के विरुद्ध कार्रवाई में हुए विलम्ब की शिकायत उच्च अधिकारियों से की जानी चाहिए थी। जिन मुसलमानों ने हिन्दू मंदिर को बचाने की पहल की उनकी समझदारी प्रशंसनीय और अनुकरणीय है। वह सामाजिक सद्भाव का एक अच्छा उदाहरण बन सकता था लेकिन उसी समुदाय के बाकी लोगों ने उस कोशिश पर पानी फेर दिया और कुछ विघटनकारी सोच वाले नेताओं के बहकावे में पूरी कौम को कटघरे में खड़ा कर दिया। बीते 5 अगस्त को अयोध्या में राम मन्दिर के भूमि पूजन का आयोजन संपन्न होने के बाद भी देश में सांप्रदायिक सद्भाव बने रहने से हर शांतिप्रिय व्यक्ति ने राहत की सांस ली। लेकिन लगता है कुछ लोगों को ये हजम नहीं हुआ और उन्होंने धजी का सांप बनाने का खेल बड़े ही शातिराना अंदाज में रच डाला। इस बारे में विचारणीय बात ये भी है कि ऐसी घटनाओं के बाद एक तरफ  तो समाचार पत्रों से शासन-प्रशासन अपेक्षा करता है कि वे घटना के पीछे की सच्चाई को छिपायें। हिन्दू-मुस्लिम की बजाय दो गुटों में तनाव लिखें। लेकिन टीवी चैनलों को ये छूट दी जाती है कि वे हिन्दू और मुसलमानों के तथाकथित प्रवक्ताओं को बिठाकर तीतर लड़वाने जैसा तमाशा करवाएं। इस दौरान एक दूसरे पर हावी होने के फेर में बेहद संगीन आरोप लगते हैं। बहस को संचालित करने वाले एंकर इनमें से कुछ पर ये कटाक्ष भी करते हैं कि वे अपनी कौम के अधिकृत प्रवक्ता नहीं हैं लेकिन उसके बाद भी उन्हें लगातार आमंत्रित क्यों किया जाता है इस प्रश्न का उत्तर न मिलने से ये कहना गलत नहीं होगा कि उपद्रव भड़काने वालों को ये चैनल मंच प्रदान करते हुए महिमामंडित करते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े दायित्वबोध का निर्वहन करने की अपेक्षा केवल समाचार पत्रों से किया जाना और टीवी चैनलों को छुट्टा छोड़ देना सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति का परिचायक है। बेहतर हो केंद्र सरकार टीवी चैनलों की स्वछंदता पर भी ध्यान दे। बेंगलुरु में हुए दंगे देश के बाकी हिस्सों में न फैलें इसकी चिंता केंद्र और राज्य सरकारों को करना ही चाहिए। आगामी दिनों में हिन्दू और मुस्लिम दोनों के अनेक त्यौहार आने वाले हैं। स्वाधीनता दिवस को तो मात्र दो दिन शेष हैं। ऐसे में जऱा सी असावधानी घातक हो सकती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 August 2020

हिन्दी का विरोध चुनावी राजनीति : चिदम्बरम का कूदना आश्चर्यजनक





तमिलनाडु में हिन्दी विरोध का नया दौर सामने आने से भावी राजनीति का अंदाज लगाया जा सकता है। दो दिन पहले चेन्नई हवाई अड्डे पर द्रमुक सांसद कनिमोझी से एक सुरक्षा कर्मी द्वारा हिन्दी में कुछ पूछे जाने पर उन्होंने उससे तमिल या अंग्रेजी में बात करने कहा। इस पर सुरक्षा कर्मी ने तंज कस दिया कि क्या वे भारतीय नहीं हैं ? इस कटाक्ष से कनिमोझी भन्ना गईं। सांसद होने के कारण उनका तुर्रा दिखाना स्वाभाविक था। लिहाजा बात आगे बढ़ी और जाँच करवाने का आश्वासन भी मिल गया। हवाई अड्डे पर यात्रियों से सुरक्षा कर्मी पूछताछ करते हैं। लेकिन भाषायी समस्या आने पर भारतीयता का सवाल उठाना आपत्तिजनक है। कनिमोझी तो सांसद हैं लेकिन साधारण यात्री के बारे में भी इस तरह की टिप्पणी को सही नहीं माना जा सकता। एक साधारण सुरक्षा कर्मी द्वारा की गई गलती पर जाँच का आश्वासन मिल जाने के बाद मामला शांत हो जाना चाहिए था। लेकिन पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदम्बरम भी इस विवाद में बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर कूद गए और अपने साथ भी इसी तरह के व्यवहार की बात उजागर कर दी। बात और बढ़ी तो कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी भी हिन्दी न जानने के कारण दक्षिण भारत के नेताओं को प्रधानमन्त्री नहीं बनाने का रोना लेकर बैठ गए। हालाँकि उनके पिताश्री एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बन चुके हैं किन्तु कुमारस्वामी को ये शिकायत है कि उनके पिताश्री को स्वाधीनता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से हिन्दी में भाषण देने मजबूर किया गया। कनिमोझी और कुमारस्वामी की राष्ट्रीय स्तर पर कोई पकड़ या पहिचान नहीं है। यहाँ तक कि वे अपने पड़ोसी राज्य तक में असर नहीं रखते लेकिन श्री चिदम्बरम तो कई दशकों से राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े हैं। कांग्रेस जैसी पार्टी में वे अग्रिम पंक्ति के नेता माने जाते हैं। देश के वित्त और गृह मंत्री भी रह चुके हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि वे दिल्ली के ही स्थायी निवासी हैं और सर्वोच्च न्यायालय के बड़े वकीलों में उनकी गिनती होती है। यदि उन जैसा व्यक्ति भी इतनी संकुचित सोच रखे तो दु:ख होता है। खबर ये भी है कि तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति को लेकर भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं। त्रिभाषा फार्मूले पर भी वहां ऐतराज जताया जा रहा है। लोग सोच रहे होंगे कि अचानक हिन्दी को मुद्दा बनाने के पीछे कारण क्या है ? और इसका जवाब है आगामी वर्ष होने वाले तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव। तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध वहां के दोनों क्षेत्रीय दलों की प्राणवायु है। जिस तरह मायावती दलितों की और लालू-मुलायम पिछड़ों की राजनीति पर जिंदा हैं ठीक उसी तरह तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक के अलावा बाकी जितने भी क्षेत्रीय दल हैं, वे सभी हिन्दी विरोध पर एकमत हैं। हालाँकि दक्षिण के चारों राज्यों में उनकी अपनी भाषा ही हावी है लेकिन हिन्दी का जैसा विरोध तमिलनाडु में होता रहा वैसा केरल , कर्नाटक और अविभाजित आंध्र में नहीं दिखाई दिया। इस बारे में उल्लेखनीय है कि देवनागरी लिपि के प्रचार हेतु जो नागरी प्रचारिणी सभा ब्रिटिश राज के दौरान बनी उसका काम तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी) में राजाजी नाम से लोकप्रिय चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी देखा करते थे। राजाजी को ये दायित्व महात्मा गांधी द्वारा सौंपा गया जो उनके समधी बन गये थे। लेकिन आजादी के बाद देश के पहले भारतीय गवर्नर जनरल रहे राजाजी को जब राष्ट्रपति नहीं बनाया गया तब उनने कांग्रेस छोड़ स्वतंत्र पार्टी बनाई और हिन्दी के घोर विरोधी बन बैठे। रामास्वामी पेरियार द्वारा प्रारंभ द्रविड़ आन्दोलन से उत्तर भारत और हिंदुत्व के विरोध की जो मुहिम प्रारम्भ हुई वह अंतत: हिन्दी विरोध पर आकर केन्द्रित हो गई। द्रमुक और अन्ना द्रमुक दोनों ही केंद्र सरकार में हिस्सेदार तो बनते रहे लेकिन मेरी मुर्गे की डेढ़ टांग वाली सियासत के चलते वहां के नेता राजनीतिक ब्लैकमेल से नहीं चूके। राजीव गांधी की हत्या भी उत्तर भारत के विरोध की भावना का ही परिणाम थी। तमिल भाषा की आड़ में श्रीलंका के तमिलों को मिलाकर तमिल राष्ट्र बनाने जैसी साजिशें भी रची गईं। रामसेतु और भगवान राम को कालपनिक बताने जैसी सोच तमिलनाडु में फैलाये गए उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध का ही नतीजा था। यद्यपि द्रविड़ राजनीति के दो मजबूत स्तम्भ क्रमश: करूणानिधि और जयललिता दिवंगत हो चुके हैं और दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों के पास उन जैसे नेताओं का नितान्त अभाव है लेकिन तमिलनाडु में हिन्दी विरोध रेडीमेड मुद्दे जैसा है। फिर भी कनिमोझी के समर्थन में पी. चिदम्बरम का कूदना चौंकाता है क्योंकि वे क्षेत्रीय पार्टी की बजाय कांग्रेस के नेता हैं। बेहतर होगा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर व्यापक राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर अपनी नीति तय करे। क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान और संरक्षण बहुत जरुरी है लेकिन उनकी आड़ में देश के संघीय ढाँचे और अखंडता को नुकसान पहुँचाने वाली किसी भी मानसिकता और कोशिश को सख्ती से दबाना जरूरी है। भाषावार प्रान्तों की रचना का कितना नुकसान देश को हुआ वह किसी से छिपा नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 10 August 2020

वैचारिक शून्यता और असमंजस से बाहर आये कांग्रेस



कांग्रेस में पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग उठने लगी है। सोनिया गांधी को कार्यकारी बने एक साल हो गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था जिसे स्वीकार करने में ही महीनों लगा दिए गए। पद छोड़ते समय उनने एक टिप्पणी कर दी कि अगला अध्यक्ष गैर गांधी होगा। उससे ये कयास लागाये जाने लगे कि श्री गांधी पार्टी को एक परिवार में सीमित रहने के आरोप से बचाना चाहते हैं। लेकिन लम्बी उहापोह के बाद अंतत: उनकी माताजी को ही कमान देनी पड़ी । इस तरह राहुल ने भले ही पार्टी का नेतृत्व छोड़ दिया लेकिन घुमा फिराकर नियन्त्रण उनके परिवार का ही रहा। बीते एक साल में वे ही पार्टी का चेहरा बने रहे। इस दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं के बागी तेवर भी देखने मिले , वहीं राहुल ब्रिगेड के अन्य युवा सदस्य भी पार्टी लाइन से बाहर जाते हुए बयान देकर चर्चा में आये। श्रीमती गांधी लम्बे समय तक पार्टी की अध्यक्ष रहीं और इस दौरान केंद्र में कांग्रेस सत्ता में भी थी। लेकिन राहुल द्वारा बागडोर सँभालने के बाद कांग्रेस ने कुछ राज्यों में भले सफलता प्राप्त कर ली हो लेकिन राष्ट्रीय सत्तर पर वह प्रभाव छोड़ने में विफल रही और इसका कारण उसका शीर्ष नेतृत्व ही है। सोनिया जी और राहुल दोनों का जनता से तो क्या कांग्रेस के आम कार्यकर्ता तक से सीधा संवाद नहीं है। संगठन की हालत भी खस्ता है। राहुल के आने के बाद आंतरिक लोकतंत्र की बड़ी दुहाई दी गयी तथा नए चेहरों को आगे बढ़ाने की कोशिशें भी दिखाई दीं लेकिन अंतत: पुराने अखाड़ची ही हावी रहे। कांग्रेस में एक वर्ग ऐसे नेताओं का भी है जो न युवा है और न बूढ़े। ये सुशिक्षित, अनुभवी और मुखर हैं। इनके मन में ये पीड़ा भी है कि उनकी क्षमता का सही उपयोग नहीं हो पा रहा। लेकिन वे गांधी परिवार के विरुद्ध मुंह खोलने से भी बचते हैं। शशि थरूर, जयराम रमेश, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे अनेक चेहरे हैं जो पार्टी का पक्ष बेहतर तरीके से रख सकते हैं। लेकिन उन्हें सीमित महत्व ही मिलता है। कांग्रेस के भीतरी मामलों पर नजर रखने वाले प्रेक्षकों का कहना है कि मप्र और राजस्थान में जो संकट पैदा हुआ वह शीर्ष नेतृत्व और प्रादेशिक नेताओं के बीच संवादहीनता का परिणाम है। राहुल की बहिन प्रियंका यूँ तो उप्र की प्रभारी हैं लेकिन वे लगभग हर मसले में हस्तक्षेप करती हैं। राजस्थान में सचिन पायलट की बगावत से निपटने में राहुल उतने सक्रिय नहीं दिखे जितना प्रियंका। बावजूद इसके पार्टी के बड़े नेता राहुल को ही दोबारा अध्यक्षता सौंपे जाने के पक्षधर हैं। इससे लगता है कि जिस युवा नेतृत्व और गैर गांधी अध्यक्ष की बात राहुल द्वारा की जाती रही वह महज दिखावा थी। बीते एक वर्ष में कांग्रेस और कमजोर हुई ये कहना गलत न होगा। इसका लाभ लेते हुए मोदी सरकार ने संसद में अनेक ऐसे निर्णय करवा लिए जो कांग्रेस यदि सतर्क होती तब शायद सम्भव न था। कश्मीर से अनुच्छेद 370 जितनी आसानी से हट गया वह कांग्रेस की रणनीतिक विफलता थी। इसी तरह राम मन्दिर मुद्दे पर उसका वैचारिक असमंजस और विरोधाभास खुलकर सामने आया। भले ही प्रियंका और राहुल ने ट्वीट के जरिये भूमि पूजन पर हर्ष जताया लेकिन दिग्विजय सिंह अंत तक विरोध करते रहे और किसी की भी हिम्मत उन्हें रोकने की नहीं पड़ी। अचानक उपजा राम प्रेम ये दर्शाता है कि इतनी पुरानी पार्टी इतने गम्भीर मसले पर किस तरह गलत निर्णय लेती रही। ऐसे में श्री गांधी को दोबारा अध्यक्षता सौंपना दूरदर्शिता नहीं होगी। बेटे के बाद माँ और माँ के बाद फिर बेटे की ताजपोशी से परिवारवाद का आरोप और भी पक्का हो जाएगा। बेहतर होता श्री गांधी बीते एक साल में किसी ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष बनाए जाने की कोशिश करते जो संगठन के स्तर पर काम करते हुए बिखराव को रोक सके। सोनिया जी की अस्वस्थता के कारण राहुल और प्रियंका का सामने आना तो स्वाभाविक था लेकिन  कांग्रेस को अब ऐसा समानांतर नेतृत्व भी चाहिए जो उसकी सेहत को सुधार सके। आज के हालात में भले ही श्री गांधी प्रधानमंत्री पर कितना भी तीखा हमला करें लेकिन पार्टी के भीतर भी ये भावना तेजी से बढ़ रही है कि गम्भीर राष्ट्रीय मुद्दों पर वे सही निशाना नहीं लगा पाते जिसका फायदा नरेंद्र मोदी को मिल जाता है। वर्तमान स्थिति में कांग्रेस को अपना ढांचा मजबूत करने की जरूरत है जिसके लिए मुरझाये चेहरों की जगह नए ऊर्जावान नेताओं को महत्व दिया जाना चाहिए। इसके अलावा अधिकारों का विकेंद्रीकरण करना भी बहुत जरूरी है। प्रधानमन्त्री भले ही आज भाजपा के सबसे ताकतवर नेता हों लेकिन पार्टी संगठन उनके भरोसे नहीं रहता। उसका अपना ढांचा है। राम मन्दिर के भूमि पूजन पर समारोह में श्री मोदी के साथ मंच पर रास्वसंघ प्रमुख डा. मोहन भागवत का होना काफी कुछ कह गया। दूसरी तरफ  देश की सबसे पुरानी पार्टी में इतना बड़ा शून्य कभी नहीं रहा। इंदिरा जी ने भी सत्ता और संगठन दोनों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया था लेकिन वह अलग दौर था। बेहतर हो गांधी परिवार बदलते समय को समझते हुए अध्यक्ष संबंधी फैसला ले वरना मप्र और राजस्थान का घटनाक्रम और राज्यों में भी दोहराया जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी