Friday, 21 August 2020

शौचालय और राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान: बदलते भारत की पहिचान




राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 के नतीजे गत दिवस घोषित हो गये जिसमें मप्र का इन्दौर शहर लगातार चौथी बार देश का सबसे स्वच्छ शहर बन गया। विभिन्न मापदंडों के आधार पर हुए इस सर्वेक्षण में छोटे बड़े सभी शहरों को विभिन्न श्रेणियों में बांटकर मूल्यांकन होता है। अनेक शहरों ने बीते वर्षों की अपेक्षा अपनी स्थिति सुधारी वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो लुढ़ककर निचली पायदान पर आ गये। इस सर्वेक्षण में नागरिकों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए उसको भी पैमाना बनाया गया। जबलपुर को स्वच्छता में भले 17 वां स्थान हासिल हुआ लेकिन नागरिकों के फीडबैक के मापदंड पर वह पहले स्थान पर रहा। इस सर्वेक्षण की वजह से स्वच्छता को लेकर जो प्रतिस्पर्धा देश भर में प्रारंम्भ की गयी उसका श्रेय पूर्णरूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जाना चाहिए। सत्ता सँभालने के बाद स्वाधीनता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से देश को स्वच्छ बनाने के लिए राष्ट्रीय मिशन शुरू करने का उनका आह्वान शुरु - शुरू में लोगों को अटपटा लगा। कहने वालों ने ये तक कहा कि ये प्रधानमन्त्री के स्तर का काम नहीं है और कम से कम लालकिले की प्राचीर से इस तरह के मुद्दे उठाना शोभा नहीं देता। श्री मोदी ने इसी के साथ खुले में शौच की प्रथा खत्म करने के लिए घर - घर शौचालय बनवाने की मुहिम भी शुरू की। उनके आह्वान पर जब पूरे देश में बड़ी - बड़ी हस्तियाँ झाड़ू लेकर सफाई के लिए जुटीं तब उसे फोटो खिंचाऊ कार्यक्रम मानकर उपहास किया गया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तो यहाँ तक तंज किया कि प्रधानमन्त्री ने युवाओं के हाथ में काम देने की बजाय झाड़ू पकड़ा दी। उसी समय श्री मोदी ने राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण प्रारम्भ करवाया। शुरुवाती एक दो साल में तो उसका उतना असर नहीं दिखा लेकिन धीरे - धीरे इस प्रतिस्पर्धा के प्रति स्थानीय निकायों के साथ ही जनता में ही जागरूकता बढी और आजादी के सात दशक बाद स्वच्छता और शौचालय राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल हो सके। हालाँकि हमारे राष्ट्रीय चरित्र के अनुरूप इन कार्यक्रमों में भी जमकर भ्रष्टाचार हुआ। सार्वजनिक शौचालयों के नाम पर खड़े किये डिब्बे कुछ ही दिनों में बेकार हो गए। पानी की समुचित आपूर्ति न होने से उनमें गंदगी भी होने लगी। रही - सही कसर पूरी कर दी चोरों ने। ये कहना गलत न होगा कि इस काम पर खर्च हुई राशि का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया। बावजूद इसके पिछड़ी बस्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में घरों के भीतर शौचालय बनाने के काम में काफी कामयाबी हासिल हुई। खुले में शौच की स्थिति में भी आशाजनक सुधार हुआ। हालांकि अभी भी इस दिशा में काफी कुछ किया जाना बाकी है लेकिन भारत सरीखे देश में जो शौचालय सुविधा से वंचितों के मामले में दुनिया में अग्रणी हुआ करता था , वहां शौचालय को लेकर एक दायित्वबोध उत्पन्न करना आसान काम नहीं था। खासकर ग्रामीण अंचल में जहाँ सुबह - सुबह शौच के लिये खेत में जाने को प्रात:कालीन सैर का नाम देकर उसके औचित्य को साबित किया जाता था। लेकिन इस बारे में महिलाओं को होने वाली असुविधा के बारे में नहीं सोचा गया। इसी प्रकार शहरों में विकास के लिए करोड़ों खर्च किये जाने के बावजूद सफाई व्यवस्था को लेकर अपेक्षित गम्भीरता नहीं रही। शहरों में आबादी के बढ़ते विस्फोट के कारण कचरा बड़ी समस्या के रूप में सामने आ गया। महानगरों के बाहर खाली स्थान पर बनाये गए संग्रहण स्थल पहाड़ की शक्ल ले बैठे। कचरे से बिजली बनाने के संयंत्र भी सभी जगह नहीं लगाये जा सके। प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छता मिशन के रूप में जो राष्ट्रीय सोच स्थापित की गई उसे पूरी तरह से स्वीकार्यता भले न मिल सकी हो लेकिन आबादी का महत्वपूर्ण हिस्सा स्वच्छता की लेकर जागरूक हुआ है। सार्वजनिक स्थलों पर कचरा फेंकने के बारे में कुछ हिचक तो देखने मिलने लगी है। कचरे के डिब्बे का उपयोग करने के बारे में भी लोग स्वप्रेरित हुए हैं। रेलवे स्टेशन जैसी जगहों पर इसका असर देखा जा सकता है। अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है और ऐसे काम पूरे होने में लम्बा समय लग जाता है। स्वच्छता को स्वभाव और संस्कार बनाने का ये अभियान बहुत बड़ी जरूरत थी क्योंकि ये केवल सुन्दरता ही नहीं अपितु जनस्वास्थ्य के लिए भी प्राथमिक आवश्यकता है। 2020 के स्वच्छता सर्वेक्षण के जो परिणाम आये उनमें विजेता शहरों के नागरिक और प्रशासन बधाई के पात्र हैं। विशेष रूप से इन्दौर की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उसने स्वच्छता को अपनी पहिचान बनाने के लिए सतर्कता बरती। हालांकि ये आरोप भी लगते हैं कि स्वच्छता सर्वेक्षण के नाम पर अधिकतर स्थानीय निकायों द्वारा प्रचार पर बेरहमी से पैसा खर्च किया जाता है जिसमें भारी भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। बेहतर होगा कि सर्वेक्षण में ये जांच भी हो कि इस खर्च की जरूरत थी या नहीं ? इसके अलावा आकस्मिक जांच की भी व्यवस्था की जाए जिससे पता चल सके कि शहरों की सफाई व्यवस्था हमेशा दुरुस्त रहती है या केवल सर्वेक्षण के दौरान उसे चाकचौबंद रखा जाता है। सवाल और भी हैं लेकिन भारत सरीखे विकासशील देश में जहां आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा से भी नीचे रहता हो वहां स्वच्छता यदि राष्ट्रीय मुद्दा बन रहा है तो ये कम संतोषजनक नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 August 2020

राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी से प्रक्रिया में बड़ा सुधार करना संभव हो सकेगा



राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाद केंद्र सरकार ने बी और सी समूह के गैर तकनीकी पदों हेतु राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी के गठन को मंजूरी दे दी। केन्द्रीय मंत्रीमंडल की बैठक में इसके प्रारूप को गत दिवस स्वीकृति मिल गयी। इस एजेंसी के गठन से बैंक और रेलवे सहित केंद्र सरकार एवं बैंक जैसे सार्वजनिक उद्यमों में बी और सी समूह के गैर तकनीकी पदों पर नियुक्ति हेतु एक ही प्रवेश परीक्षा होगी जिसे उत्तीर्ण करने के बाद अपने इच्छुक विभाग की अंतिम परीक्षा में बैठा जा सकेगा। अच्छी बात ये रहेगी कि अंतिम परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने के बाद दोबारा प्रवेश परीक्षा से मुक्ति मिल जायेगी। इस एजेंसी के बनने के बाद नौकरी के इच्छुक युवाओं को हर परीक्षा के लिए अलग - अलग आवेदन और शुल्क नहीं भरना पड़ेगा। अभी किसी अभ्यर्थी को बैंक और रेलवे की नौकरी के लिए अलग आवेदन और शुल्क भरना पड़ता है। इसके साथ ही नई एजेंसी के गठन से देश भर में जिलावार केंद्र खोले जाएंगे। इसके कारण परीक्षार्थियों को अपने घर से दूर किसी शहर या राज्य में जाने के खर्च से मुक्ति मिल जायेगी। परीक्षा हेतु पंजीयन भी ऑन लाइन किया जा सकेगा। इस बारे में उल्लेखनीय है कि अतीत में महाराष्ट्र में दूसरे राज्यों से भर्ती परीक्षा में आये परीक्षार्थियों के साथ मारपीट जैसी घटनाएँ हो चुकी हैं। इस तरह बी और सी समूह के पदों में ही स्नातक , हायर सेकेंडरी और हाई स्कूल योग्यता प्राप्त आवेदकों के लिए एक ही पाठ्यक्रम से अलग-अलग परीक्षाएं होंगी। प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होना एक तरह से प्राथमिक योग्यता मानी जायेगी। अभी विस्तृत विवरण आना बाकी है। इस एजेंसी को मूर्तरूप लेने में निश्चित रूप से कुछ समय लगेगा। देश भर के जिलों में केंद्र खोलकर परीक्षा का आयोजन भी आसान काम नहीं होगा। लेकिन इस फैसले को एक बड़े सुधार के तौर पर देखा जा सकता है। ये उम्मीद पाल लेना तो जल्दबाजी होगी कि राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी के गठन से बेरोजगारी दूर हो जायेगी लेकिन ये सही है कि इसके प्रभावशील होते ही सरकार और उसके नियन्त्रण वाले उद्यमों में नए रोजगार के लिए होने वाली परीक्षाओं की व्यवस्था में अपेक्षित सुधार के साथ ही निर्णय प्रक्रिया तेज हो सकेगी। विभिन्न विभागों द्वारा समान पद हेतु की जाने वाली भर्ती के लिए अलग-अलग परीक्षा लिए जाने से बेरोजगारों पर आर्थिक और मानसिक बोझ बढ़ता है। अपने घरों से दूर परीक्षा हेतु जाने के लिए अनेक के पास पैसे तक नहीं होते। और फिर परीक्षा की समय-सारिणी कब बदल जाए ये कहना कठिन है। कुल मिलाकर अलग-अलग भर्ती परीक्षाएं भारत के संघीय ढांचे के भी अनुरूप नहीं हैं। इससे विभागों द्वारा अलग-अलग परीक्षाओं पर होने वाले खर्च की भी बचत हो सकेगी। परीक्षा के परिणाम भी जल्दी आयेंगे जिससे अभ्यर्थियों को विभिन्न नौकरियों में अपनी पसंद चुनने का बेहतर अवसर मिल सकेगा। केंद्र सरकार का ये कदम प्रशासनिक सुधार के साथ ही पारदार्शिता बढाने वाला भी होगा। देश में बेरोजगारी की भयावह स्थिति के कारण बहुत बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है जो अलग-अलग परीक्षाओं के कारण परेशान हो गये हैं। राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी के गठन से भर्ती प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद करना गलत नहीं होगा। लेकिन केंद्र सरकार को ये देखना चाहिए कि एजेंसी का काम निश्चित समय सीमा में सम्पन्न हो क्योंकि हमारे देश में सुधारवादी फैसले लिए जाने के बावजूद उन्हें अमल में लाने का काम मंथर गति से होने के कारण उनकी उपयोगिता और प्रभाव दोनों नकारात्मक हो जाते हैं। वैसे ये अच्छा संकेत है कि कोरोना संकट के समय भी केंद्र सरकार लंबित फैसले तेजी से ले रही है। इससे उसका आत्मविश्वास भी सामने आता है। लेकिन कोरोना के जाने के बाद ऐसे तमाम फैसलों को लागू करने के बारे में भी ऐसी ही प्रतिबद्धता दिखाई जानी चाहिए जिससे एक कदम आगे दो कदम पीछे की परिपाटी को खत्म किया जा सके। एक देश एक भर्ती परीक्षा का निर्णय राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत करेगा। एक राष्ट्र एक राशन कार्ड और सभी का स्वास्थ्य कार्ड बनवाने जैसी योजनाओं के बाद केंद्र सरकार का नया फैसला स्वागतयोग्य है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 August 2020

सोशल मीडिया इतना ताकतवर नहीं कि चुनाव नतीजे तय कर सके



कांग्रेस द्वारा सोशल मीडिया पर भाजपा को प्राथमिकता मिलने का मुद्दा जोरशोर से उठाया जा रहा है। अमेरिका के एक अख़बार में प्रकाशित खबर के अनुसार फेसबुक ने भाजपा को समर्थन दिया। कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाते हुए फेसबुक के मालिक को चिट्ठी भेजकर अपना विरोध जताया। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इस बारे में खुलकर बयानबाजी करते हुए संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराये जाने की मांग कर रहे हैं। उनकी मानें तो भाजपा ने फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर कब्जा जमा रखा है। आरोप है कि उनमें भाजपा द्वारा प्रसारित आपत्तिजनक सामग्री को हटाया नहीं जाता जबकि ऐसे ही मामलों में अन्य दलों को पक्षपात का शिकार होना पड़ता है। अतीत में भी ये आरोप उछले थे कि भाजपा ने चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर प्रचार हेतु बड़ी रकम खर्च की। वैसे ये बात भारत तक सीमित नहीं है। अनेक देशों में फेसबुक और ट्विटर पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वे आंतरिक राजनीति में दखल देते हैं। इनको चुनाव के दौरान विज्ञापन तथा अन्य माध्यम से राजनीतिक दलों द्वारा मोटी रकम दी जाती है। आजकल व्हाट्स एप नामक एक और माध्यम है जो विचारों और सूचनाओं के आदान- प्रदान के लिए पूरी दुनिया में लोकप्रिय है। इसके जरिये अफवाहों का फैलाव भी बड़ी जल्दी हो जाता है। आधारहीन और प्रामाणिकता रहित जानकारी के कारण व्हाट्स एप यूनीवर्सिटी नामक व्यंग्यात्मक शब्द भी खूब चर्चित है। अमेरिका में प्रकाशित खबर एवं कांग्रेस द्वारा लगाये आरोप कहाँ तक सही हैं ये कहना फिलहाल संभव नहीं है। लेकिन ये बात जरूर कही जा सकती है कि सोशल मीडिया के उपयोग में कांग्रेस भी पीछे नहीं है। भाजपा की तरह उसका अपना भी आईटी सेल है जिसका काम सोशल मीडिया के अलावा बाकी संचार माध्यमों का उपयोग करते हुए पार्टी की विचारधारा और नीति-रीति का प्रचार-प्रसार करना है। इस मामले में प्रारंभिक तौर पर तो ये लगता है कि कांग्रेस हार की खीज निकाल रही है। जहां तक सोशल मीडिया के उक्त प्लेटफार्मों का प्रश्न है तो ये खुले मंच जैसे हैं जिन पर हर कोई अपनी बात और विचार रख सकता है। कांग्रेस और उसके समर्थक भी इस बारे में अधिकार संपन्न हैं लेकिन उसकी शिकायत ये है कि भाजपा समर्थक सामग्री आपत्तिजनक होने पर भी हटाई नहीं जाती जबकि कांग्रेस के पक्ष वाले विचारों पर सेंसर लगाया जाता है। सामान्य तरीके से देखें तो ये कहना गलत नहीं होगा कि दौड़ सब एक ही दिशा और तरीके से रहे हैं लेकिन जो पीछे रह जाता है वह ये आरोप लगाने से बाज नहीं आता कि आगे निकले व्यक्ति ने उसे टंगड़ी मारी थी। बड़ी बात नहीं यदि कांग्रेस सत्ता में होती तो आज भाजपा उस पर ऐसे ही आरोप थोप देती। यही बात है कि संदर्भित मामले में आम जनता की रूचि नहीं है। वैसे कांग्रेस को ये देखना चाहिए कि वह सोशल मीडिया पर यदि प्रभावशाली नहीं हो पा रही तो इसके लिए क्या इन प्लेटफार्मों की पक्षपातपूर्ण नीति ही अकेली जिम्मेदार है ? उसे ये ध्यान रखना चाहिए कि जनसभा में वाहनों में भरकर श्रोता तो लाये जा सकते हैं लेकिन उन्हें संबोधित करने वाला नेता यदि प्रभावशाली भाषण न दे तो उस सभा का कोई लाभ नहीं होता। इस बारे में एक उदाहरण काफी सामयिक है। 2014 में भाजपा ने प्रशांत किशोर नामक एक पेशेवर की सेवाएँ लेकर लोकसभा चुनाव की पूरी व्यूहरचना की जिसमें उसे ऐतिहासिक सफलता मिली। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने में प्रशांत की रणनीति को काफी हद तक जिम्मेदार माना गया। बाद में उनका भाजपा से मतभेद हो गया और बिहार विधानसभा के चुनाव में वे उसके विरुद्ध नीतीश कुमार और लालू के महागठबंधन के पक्ष में हो गये। संयोगवश उसे भी जोरदार सफलता मिली। और प्रशांत किशोर चुनाव जिताने वाली ताकत माने जाने लगे। लेकिन उसके बाद हुए उप्र विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस के साथ जुड़े किन्तु वह पूरी तरह से डूब गई। इससे स्पष्ट हो गया कि चुनाव जीतने के लिए पेशेवर लोगों की सेवाएं और संचार के आभासी माध्यम ही सफलता की गारंटी नहीं हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को इस बात का पता करना चाहिये कि आखिर क्या कारण है कि वे और कांग्रेस दोनों जनता का भरोसा जीतने में नाकामयाब रहे। यदि सोशल मीडिया पर मिले अतिरिक्त समर्थन से चुनाव जीते जा सकते तो भाजपा मप्र, राजस्थान और छतीसगढ़ की सत्ता क्यों गंवाती? गुजरात में भी वह हारते-हारते ही जीत पाई। राहुल गांधी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद अध्ययन अवकाश लिया। हालाँकि उसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ हुईं लेकिन ऐसा लगता है श्री गांधी वास्तविकता का एहसास अभी तक नहीं कर सके। बतौर विपक्षी नेता वे सत्तारूढ़ पार्टी और उसके नेता पर सियासी हमले करते रहें तो उसमें अस्वाभाविक कुछ भी  नहीं है । लेकिन उनके प्रयासों को अपेक्षित सफलता इसलिये नहीं मिलती क्योंकि वे जनता की नब्ज नहीं जान पा रहे। सोशल मीडिया को लेकर उनके हालिया आरोप लोगों के गले नहीं उतर रहे तो उसकी वजह साफ़ है। आम जनता में ये माध्यम इतना लोकप्रिय है कि उसे इसमें गड़बड़ी की बात पर यकीन नहीं होता। देश में अनेक टीवी चैनल ऐसे हैं जो भाजपा और प्रधानमंत्री की बखिया उधेड़ने का कोई अवसर नहीं गंवाते। इसी तरह टीवी चैनलों से निकलकर अपने खुद के वीडियो पोर्टल चलाने वाले देश के अनेक वरिष्ठ पत्रकार भी नरेंद्र मोदी के विरुद्ध हाथ धोकर पड़े रहते हैं। उनके लाखों दर्शक हैं लेकिन वे भी चुनावों को प्रभावित नहीं कर पा रहे। इससे साबित होता है कि संचार और समाचार माध्यम किसी के अंधभक्त या विरोधी होने पर अपना प्रभाव गँवा बैठते हैं। कांग्रेस के जो प्रादेशिक नेता जनता के मन पर अपना असर छोड़ने में कामयाब रहे  वे बिना सोशल मीडिया या विज्ञापनों के भी सफल हो जाते हैं। राहुल गांधी को बजाय व्यर्थ के विवादों में समय और शक्ति खर्च करने के जनता से सीधे सम्वाद की शैली अपनानी चाहिए। 2014 में हारने के बाद स्मृति ईरानी ने अमेठी से लगातार सम्पर्क बनाए रखा जबकि राहुल जीतकर भी वहां सक्रियता नहीं रख सके। पिछले लोकसभा चुनाव में हारने के बाद बीते सवा साल में वे कितनी बार अमेठी के लोगों से मिलने गए ये उन्हें सोचना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 August 2020

राहत भरी खबरों के बावजूद कोरोना संबंधी सावधानी बेहद जरूरी



भारत में कोरोना  को लेकर यूँ तो अनगिनत भविष्यवाणी की गईं किन्तु दिल्ली स्थित एम्स के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया का आकलन अभी तक सबसे सटीक निकलता दिख रहा है | मई में जब लॉक डाउन समाप्त करते हुए सामान्य स्थिति बनाने की कोशिश शुरू हुई तभी उन्होंने कह दिया था कि जून से कोरोना के मामले बढ़ेंगे और जुलाई तथा अगस्त में चरमोत्कर्ष पर पहुँचने  के बाद सितम्बर माह से उसमें गिरावट आना शुरू होगी , लेकिन उसका प्रकोप दिसम्बर तक जारी रहेगा और तब तक स्वदेश में बनी वैक्सीन भी उपलब्ध होने  लगेगी | बीते  लगभग दो महीनों में कोरोना का फैलाव जिस तेजी से हुआ उसने कन्टेनमेंट ज़ोन की सीमा को खत्म कर दिया | शुरुवात में ये देखा गया था कि शहरों के कुछ विशेष इलाकों में ही कोरोना के अधिकतर मरीज मिल रहे थे किन्तु मौजूदा स्थिति में कोरोना का विस्तार शहर या कस्बों के तकरीबन हर क्षेत्र में हो चुका है | ये बात भी सही है कि जाँच की संख्या बढ़ने से भी नये  संक्रमित सामने आने लगे | लेकिन बीते दो महीने में कोरोना  संक्रमण के शिकार मरीजों की संख्या में हुई असाधारण वृद्धि ने पूरे देश को भयभीत कर दिया | भले ही वैश्विक पैमाने पर हमारे देश में मृत्युदर काफी नियन्त्रण में  रही तथा ठीक होने वालों  का प्रतिशत भी लगातार बढ़ता जा रहा है लेकिन नए संक्रमण जिस तेज गति से सामने आये उसके कारण अस्पतालों की क्षमता जवाब देने लगी थी | इसी वजह से सरकार द्वारा नये मरीजों को घर में रहकर खुद को अलग - थलग रखते हुए इलाज करवाने का विकल्प दिया जाने लगा | हालांकि उनके स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखी जाती रही और तकलीफ बढ़ने पर अस्पताल ले जाया गया लेकिन ये देखने में आया कि बड़ी संख्या में मरीज घरों  में रहते हुए भी कोरोना संक्रमण से मुक्त होने लगे |  इससे चिकित्सकों और उनके सहयोगियों का मनोबल निश्चित रूप से बढ़ा | इसके साथ ही आम जनता में भी ये विश्वास जागा कि कोरोना होने के बाद हताश होने की जरूरत नहीं है । चूंकि देश में  कुछ हिस्सों के अलावा लॉक डाउन हटा लिया गया है तथा  लोगों का आवागमन भी शुरू हो चुका है इसलिए संक्रमण की दैनिक संख्या तकरीबन 70 हजार तक जा पहुँची किन्तु ठीक होने वालों का नियमित आंकड़ा भी तेजी से बढ़ते जाने से कुछ राहत महसूस की जाने लगी | कल सोमवार के जो आंकड़े आज सुबह प्रसारित हुए उनके मुताबिक नये मामलों से ठीक होने वालों की संख्या 4753  ज्यादा रही | हालाँकि ये राष्ट्रीय आंकड़ा है और इसमें दिल्ली जैसे  राज्य हो  सकते हैं जहां  कोरोना ढलान पर है लेकिन ये भी सही है कि ये गिरावट तब देखने आई जब कोरोना जांच की दैनिक संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है | हालांकि इस बारे में एक सवाल  गौरतलब है कि नये सैम्पलों की जांच रिपोर्ट आने में कितना समय लग रहा है ? बावजूद इसके ये संतोष का विषय है कि एम्स के निदेशक डा. गुलेरिया के अनुमान सही दिशा में जा रहे हैं | और यही स्थिति जारी रही तो उम्मीद की जा सकती है कि सितम्बर शुरू होते तक कोरोना सबसे ऊँचे शिखर पर पहुंचने के बाद उतार की तरफ रुख करेगा | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गरीबों को 30 नवम्बर तक मुफ्त राशन देने की जो घोषणा जून के अंतिम सप्ताह में की गई थी वह इस बात का संकेत थी कि सरकार भी मानकर चल रही थी कि तब तक कोरोना  जमीन पर आ जायेगा और बची - खुची समस्या वैक्सीन की मदद से हल कर  ली जावेगी | उस दृष्टि से अगस्त माह के शेष दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं | यदि नये मामलों में गिरावट न सही लेकिन ठहराव भी आ गया और ठीक होने वालों की संख्या उससे  ज्यादा होती गयी तब  कोरोना पर जीत हासिल करने का आत्मविश्वास और मजबूत होगा | दिल्ली जिसे कुछ समय पहले  तक मुम्बई के बाद सबसे ज्यादा समस्याग्रस्त माना जाता था , वहां अस्पतालों में बिस्तर खाली पड़े हैं | मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल बाहर  के मरीजों का इलाज करने का प्रस्ताव भी दे रहे हैं | कुछ और शहरों से भी ठीक होने वालों की संख्या में तेजी से वृदधि की खबरें आश्वस्त कर रही हैं । लेकिन यही वह समय है जब जनता को अतिरिक्त  सावधानी बरतने की जरूरत है क्योंकि अनेक देशों में कोरोना  लगभग समाप्त होने के बाद दोबारा वापिस लौटा है | इसी तरह से अनेक देश जो लम्बे समय तक इससे बचे रहे वे भी  अब उसकी चपेट में आ गये हैं | उसका बड़ा कारण वहां की जनता द्वारा पूरी तरह से  असावधान होकर कोरोना पूर्व की जीवन शैली में लौट जाना ही है | भारत में विशाल आबादी और घनी बसाहट के कारण किसी भी संक्रामक बीमारी का तेजी से फैलना  बहुत ही आसान है और फिर कोरोना तो बेहद खतरनाक वायरस है | ये  देखते हुए अपेक्षा है कि उसके बारे में आ रही आशाजनक खबरों के  बावजूद उससे बचाव के मान्य तौर - तरीकों का ईमानदारी से पालन किया जाए | सरकार और चिकित्सा कर्मी अपने स्तर पर जो कर रहे हैं उसमें पूर्ण सफलता तभी  मिलेगी जब जनता भी पूरी तरह अनुशासन में रहते हुए सहयोग करे | बीते कुछ महीनों में अनेक बार ये देखने में आया कि कोरोना पर नियन्त्रण पाने में कामयाबी  मिल रही है लेकिन जनता के स्तर पर लापरवाही के कारण वह खुशी क्षणिक होकर रह गई | बीते एक दो दिनों में आये सुखद समाचारों के बावजूद एहतियात रखने की जरूरत है | कोरोना चूंकि पूरी तरह से अदृश्य है इसलिए वह कब और कहाँ से आ धमके ये पता नहीं चलता ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 17 August 2020

सब कुछ आसान हो जाये तो नेताओं और अफसरों को पूछेगा कौन ? भ्रष्टाचार की जड़ों में मठा डाले बिना बात नहीं बनने वाली


स्वाधीनता दिवस की शाम एक टीवी चैनल पर बिना चीख पुकार वाली बहस को सुनने लगा | मुद्दा था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सुबह  लाल किले की प्राचीर से दिया गया भाषण | भाजपा के प्रतिनिधि जहां प्रधानमन्त्री के एक  - एक शब्द का गुणगान करने में लगे थे वहीं  विपक्षी दलों के नुमाइंदे  अपना धर्म निभाने में | बात नए उद्योगों के शुरू होने , आत्मनिर्भरता , रोजगार की स्थिति , सीधा विदेशी निवेश , मेक इन इण्डिया और ऐसे ही तमाम विषयों  के इर्द गिर्द सिमटी थी | इसी बीच एंकर ने एक वित्तीय सलाहकार  को बोलने का अवसर दिया | उनके बातों में राजनीति  कदापि नहीं थी और उन्होंने  प्रधानमंत्री के  इरादों को भी नेक बताया | कोरोना के बावजूद भी विदेशी मुद्रा के भंडार के साथ रिकार्ड तोड़ विदेशी निवेश पर भी संतोष व्यक्त किया लेकिन आत्मनिर्भर भारत और नए उद्योगों को प्रोत्साहन के बारे में उनका कहना था कि प्रधानमंत्री जो कहते हैं वह जमीन पर कितना उतरता है इसे परखने के लिए उन्हें केन्द्रीय सचिवालय के समस्त सचिवों को बुलाकर ये जानकारी लेनी चाहिए कि उनके पास  छह महीने से  ज्यादा समय से लंबित फाइलें कितनी हैं ?

उनके कहने का आशय ये था  कि किसी नये   उद्यमी को सरकारी  दफ्तर वाले इतना हलाकान कर डालते हैं कि नया काम शुरू  करने से पूर्व ही उसका उत्साह ठंडा हो जाता है | उन्होंने  ये कहकर सभी को चौंका दिया कि उनके एक मित्र ने तेल  मिल लगाने के लिए आवेदन किया जिसके लिए उसे दर्जनों विभागों से लायसेन्स अथवा अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना था | कुछ दिनों तक चक्कर लगाने  के बाद उसके अरमानों का ही तेल निकल गया | बातचीत के दौरान ढेर सारे कानूनों  का जिक्र आने पर कहा  गया कि केंद्र सरकार ने तमाम अनुपयोगी और कारोबार में बाधक कानूनों को खत्म कर दिया लेकिन ये बात भी स्वीकार की गई कारोबार को सरल और सहज बनाने के लिए किये जाने वाले सुधारों की प्रक्रिया बहुत ही सुस्त है | यहाँ तक कि प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणाओं पर अमल होने में भी नौकरशाही अड़ंगे लगाती है | इसकी वजह ये है कि यदि सब कुछ आसान हो गया तो फिर अफसरों और नेताओं की पूछ - परख ही समाप्त हो जायेगी |

मैंने जब इसकी चर्चा वीडियो कान्फ्रेंसिंग पर अपने मित्रों से की तो तीन दशक से हांगकांग निवासी Sanjay Nagarkar ने बड़ी ही मार्के की बात कही | उन्होंने विभिन्न देशों के अपने अनुभव बताते हुए कहा कि उच्च स्तर पर तो भ्रष्टाचार विकसित देशों में भी होता है  लेकिन निचले स्तर का भ्रष्टाचार नहीं होने से जनता का  उससे वास्ता नहीं  पड़ता | जबकि हमारे देश में सरकारी दफ्तर का भृत्य भी भ्रष्टाचार में लिप्त देखा जा सकता है | अदालतों में न्यायाधीश की आसंदी के नीचे बैठा बाबू वकीलों से जिस दबंगी के साथ सौजन्य भेंट लेता है वह जगजाहिर है | इसी तरह सड़क  पर खोमचा लगाने वाला गरीब व्यक्ति कब पुलिस वाले की अवैध वसूली का शिकार हो जाये ये कहना कठिन है |

उनका कहना था कि निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार चूंकि आम जनता को परेशान करते हुए उसका शोषण करता है इसलिए हमारे देश की तरक्की अपेक्षित गति से नहीं हो पा रही | हमारे देश की  वर्तमान केंद्र सरकार ये दावा करते नहीं  थकती कि वह घोटाला मुक्त है | प्रधानमंत्री के बारे में भी आम भावना यही है कि वे ईमानदारी से सेवा कर रहे हैं | देश को प्रगति पथ पर ले जाने की उनकी प्रतिबद्धता पर भी ज्यादातर लोगों को भरोसा है किन्तु निचले स्तर के भ्रष्टाचार को रोक पाने में कोई सफलता  नहीं मिली | और यदि मिली भी तो ऊँट के मुंह में जीरे के बराबर |

यही वजह है कि प्रधानमंत्री के न खाउंगा के   दावे की सच्चाई को तो  लोग स्वीकार कर भी लेते हैं लेकिन  न खाने दूंगा वाली बात हवा हवाई होकर रह गई | कहते हैं केद्रीय सचिवालय का काफी शुद्धिकरण किया गया है लेकिन सरकार केवल दिल्ली से नहीं चलती | ग्राम पंचायत के स्तर तक आते - आते भ्रष्टाचार भी भिन्न - भिन्न रूप धारण करता जाता है |

ये बात सही है कि गरीबों के बैंक खाते में सीधे पैसा जमा करने की व्यवस्था ने भ्रष्टाचार को एक हद तक तो रोका है लेकिन प्रधानमन्त्री आवास योजना का पैसा प्राप्त करने के  लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सरपंच खुले आम कमीशन लेते हैं | शहरों में राशन कार्ड और गरीबी रेखा वाले कार्ड बनवाने के लिए जिला मुख्यालय में किस तरह  दलाली होती  है ये किसी से छिपा नहीं है |

निचले स्तर का भ्रष्टाचार रोकने में यदि कामयाबी मिल जाती तो प्रधानमंत्री के तमाम चुनावी वायदे और सरकार में आने के बाद की गयी  घोषणाओं के फलस्वरूप अच्छे दिन आ गये होते | आम जनता को जिस तरह के भ्रष्टाचार से रूबरू होना पड़ता है वही देश की छवि को खराब  करता है | राजनीतिक दल जिन धनकुबेरों , भ्रष्ट नौकरशाहों या अन्य स्रोतों से चंदा वसूलते हैं उससे आम जनता को किसी भी तरह का लेना   - देना नहीं है , लेकिन जब उससे छोटी - छोटी घूस माँगी जाती  तभी उसके मुंह से निकलता है कि सब चोर हैं |

स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री के लगभग डेढ़ घंटे के ओजस्वी उद्बोधन के संदर्भ में शुरू ये चर्चा निश्चित रूप से समस्या  की जड़ को समझने जैसा है | सही बात है कि  निचले स्तर का  भ्रष्टाचार तब तक नहीं रुक सकता जब तक उसे रोकने वालों का दामन बेदाग न हो | खाकी वर्दी पहिनकर  डंडे के जोर पर अवैध कमाई  करने वाला पुलिस वाला जब लोकायुक्त में जा बैठता है तब उसको ईमानदारी का पुतला मान लेना अपने आप को धोखा देना नहीं तो और क्या है ? अदालतों  में छोटे - छोटे कामों के लिए बाबुओं के हाथों की खुजली मिटाने वाले वकील साहब जब मी लॉर्ड बन जाते है तब क्या न्याय के मंदिर में खुलेआम होने वाले पाप उन्हें नजर नहीं आते ? इसीलिए जब बात भ्रष्टाचार रोकने की  हो तब ये ध्यान रखना भी जरूरी है कि केवल गंगोत्री में जल की शुद्धता सुरक्षित रखने मात्र से गंगा को प्रदूषित होने से तब तक नहीं  बचाया जा सकता जब तक मैदानी इलाकों में उसमें समा जाने वाले नालों को नहीं रोका जाए  |

चाणक्य के जीवन का एक अति महत्वपूर्ण प्रसंग है  , जब वे किसी पौधे की जड़ों में मठा डालते देखे गए और उनसे उसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि किसी बुराई को नष्ट करना है तो उसकी जड़ों को दोबारा पनपने से रोकना जरूरी है | हमारे देश में भ्रष्टाचार रूपी वृक्ष की पत्तियां   और टहनियां तोड़ने का काम तो खूब होता है लेकिन जड़ों में मठा डालने की जुर्रत कोई नहीं करता |

विस्तारवाद और आतंकवाद के विरुद्ध भारत का कड़ा रुख असरकारक



प्रधानमंत्री द्वारा स्वाधीनता दिवस को सुबह दिल्ली स्थित लालकिले की प्राचीर से जो भाषण दिया जाता है वह केवल रस्मअदायगी न होकर देश और दुनिया के लिए सरकार का एक नीति वक्तव्य होता है। इस वर्ष भी नरेंद्र मोदी ने लगभग डेढ़ घंटे का लंबा भाषण दिया। यद्यपि उसमें मुख्य रूप से आत्मनिर्भर भारत पर ज्यादा जोर दिया गया लेकिन बिना नाम लिये ही पाकिस्तान और चीन को भी ये बता दिया कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) से लेकर वास्तविक नियन्त्रण रेखा (एलएसी) पर होने वाली किसी भी गड़बड़ी का हमारी सेना करारा जवाब देगी। प्रधानमंत्री ने साफ-साफ कहा कि आतंकवाद और विस्तारवाद के विरुद्ध भारत कमर कसकर लड़ने तैयार है। हालाँकि उनके इस भाषण पर विपक्ष ने फिर सवाल पूछा कि श्री मोदी ने चीन का नाम क्यों नहीं लिया? लेकिन सैन्य और कूटनीतिक मामलों के जानकारों के अनुसार प्रधानमंत्री ने बहुत ही समझदारी का पारिचय दिया और बिना कोई विवादास्पद बात कहे पाकिस्तान और चीन दोनों को माकूल सन्देश प्रेषित कर दिया। हालाँकि लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में अभी भी तनाव की स्थिति बनी हुई है लेकिन भारत ने भी अपना सैन्य जमावड़ा करते हुए ये संकेत दे दिया है कि चीन जैसा करेगा वैसा ही  जवाब उसे दिया जाएगा। स्वाधीनता दिवस के पहले चीनी विदेश मंत्री ने भारत के साथ सभी विवाद वार्ता द्वारा सुलझाये जाने की बात कहकर सीमा पर तनाव घटाने की इच्छा व्यक्त की। हालाँकि चीन के ऐसे किसी भी बयान पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं होता। लद्दाख में अपनी सेनाएं पीछे हटाने का वायदा करने के बाद पलट जाने का उदहारण ताजा-ताजा है। ऐसे में ये माना जा सकता है कि भारत द्वारा सीमा पर जवाबी मोर्चेबंदी के बाद आर्थिक क्षेत्र में चीन पर जो शिकंजा कसा गया उससे वह दबाव महसूस कर रहा है। इसका अप्रत्यक्ष संकेत नेपाल के रुख में अचानक आये परिवर्तन से भी मिल रहा है। नेपाली प्रधानमंत्री केपी ओली द्वारा लम्बे अंतराल के बाद श्री मोदी से फोन पर बात करना और आज काठमांडू में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत की शुरुवात इस बात का प्रमाण है कि चीन को ये एहसास हो चला है कि भारत से टकराना उसके लिए नुकसानदेह हो रहा है। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि नेपाल द्वारा हाल के महीनों में जो भारत विरोधी रुख दिखाया गया उसके पीछे चीन की ही शह थी। भारतीय भूभाग को अपने नक़्शे में शामिल करने के अलावा सीमवर्ती क्षेत्रों में सैन्य तैनाती जैसे कदम उठाने का दुस्साहस नेपाल कभी नहीं कर पाता यदि उसकी पीठ पर चीन का हाथ न रहा होता। प्रधानमंत्री ओली के भारत विरोधी रवैये की उनके देश में ही भारी आलोचना हुई। यहाँ तक कि उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड तक उन्हें हटाने पर आमादा हैं। लेकिन चीन उनके साथ खड़ा हुआ है। इसलिए ऐसा मान लेना गलत न होगा कि नेपाल के रुख में आई नरमी की वजह चीन से मिले निर्देश ही हैं। गलवान घाटी की घटना के बाद भारत द्वारा उस क्षेत्र में जबरदस्त सैन्य तैयारियां किये जाने पर चीन ने काफी ऐतराज जताया लेकिन जब उसे लगा कि भारत युद्ध की धमकी से डरने की बजाय दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है तब वह बातचीत के जरिये रिश्ते सुधारने जैसी बातें करने लगा और नेपाल को भी वैसा ही करने की सलाह दे डाली। दरअसल इस सबके पीछे भारत द्वारा आर्थिक मोर्चे पर चीन की घेराबंदी किया जाना बड़ा कारण बन गया। श्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का जो नारा दिया उसका सबसे ज्यादा असर चीन पर ही पड़ा। भारत को किया जाने वाला उसका निर्यात लगातार कम होता जा रहा है। इसके अलावा सरकारी क्षेत्र में काम करने से चीनी कम्पनियों को रोक दिया गया है। भारत के व्यापारी भी चीनी माल के आर्डर रद्द कर रहे हैं। राखी पर इसका पहला प्रमाण मिला। आगामी गणेश पूजा में भी चीन से आयातित होने वाली मूर्तियों के आयात और व्यापार के प्रति कोई उत्साह नहीं है। यही हाल रहा तो दीपावली के अवसर पर चीनी सामान के उपयोग में भारी कमी आने की पूरी-पूरी संभावना है जो चीन के लिये बड़ा धक्का होगा। इस तरह प्रधानमंत्री द्वारा लालकिले से भले ही चीन और पाकिस्तान का नाम न लिया गया हो लेकिन विस्तारवाद की खुलकर आलोचना और आतंकवाद के विरूद्ध निर्णायक लड़ाई का संकल्प व्यक्त किये जाने का असर होना अवश्यंभावी है। संरासंघ में पाकिस्तान की तरफदारी किये जाने के मामले में चीन जिस तरह अकेला पड़ा वह भी शुभ संकेत है। भारत के आत्मनिर्भरता रूपी दांव ने चीन के लिए जबरदस्त परेशानी पैदा कर दी है क्योंकि देखा सीखी दुनिया के अनेक देशों ने चीन की आर्थिक मोर्चेबंदी कर दी। स्वाधीनता दिवस के भाषण में श्री मोदी द्वारा जिस तरह का कूटनीतिक संदेश दिया गया उसका असर आने वाले दिनों में जरूर दिखाई देगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

नेता तो बहुत हैं किंतु उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक कोई नहीं आज की राजनीति में अटल जी का अभाव बहुत खलता है



आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की दूसरी पुण्य तिथि है | आजादी के बाद  भारत में यूँ तो एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र नेता थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसी लोकप्रियता हासिल हुई | लेकिन जहाँ नेहरू जी और इंदिरा जी सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनकी  लोकप्रियता और सम्मान प्रधानमन्त्री से कमतर नहीं था | इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीतिक शैली थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें उनसे पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही साफगोई से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | राजनीति के आलावा सार्वजनिक जीवन में जिन उच्च मानदंडों को उन्होंने स्थापित किया वे आदर्श कहे जा सकते हैं |

विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुई लेकिन अटल जी ने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि भाषण दिया वह आज भी उद्धृत किया जाता है | नेहरू जी ने संसद में उनकी तेजस्विता को भांपते हुए भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | यही नहीं तो उन्होंने अपने विश्वस्त नेता स्व.उमाशंकर दीक्षित को उन्हें कांग्रेस में लाने का जिम्मा भी सौंपा परन्तु वे विफल रहे | 

हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में उनके राजनीतिक विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी प्रभावशाली वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

राजनीति के क्षेत्र में बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान कैसे अर्जित किया जा सकता है इसका उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि राजनीतिक व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह किया करती थीं  |

आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें , कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चूका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

उन्हें गये दो वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |