Saturday, 29 August 2020

हमारे देश के बीमार नेता शिंजो आबे जैसा उदाहरण कब पेश करेंगे




जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। वे जापान के सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमन्त्री रहे। त्यागपत्र का कारण राजनीतिक न होकर खऱाब स्वास्थ्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपना कार्यकाल पूरा होने के एक वर्ष पहले ही पद छोड़ रहे हैं क्योंकि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है और ऐसे में जब देश कोरोना से जूझ रहा है तब वे नेतृत्व के स्तर पर शून्यता की स्थिति बनाए रखने के पक्ष में नहीं हैं। जापान एक विकसित देश है। वहां चिकित्सा सुविधाएँ भी विश्वस्तरीय हैं। प्रधानमन्त्री आबे चाहते तो पद पर रहते हुए किसी कार्यकारी के जरिये भी सरकार का संचालन कर सकते थे। जापान की जनता में भी उनका विरोध नहीं था। इस पद पर कार्य करने का उनके पास पर्याप्त अनुभव भी था। श्री आबे ने देश को राजनीतिक स्थायित्व देने के साथ ही आर्थिक मजबूती भी दी। पिछली आर्थिक मंदी के दौरान जापान की अर्थव्यवस्था को डगमगाने से बचाने में उनकी भूमिका सराहना का पात्र बनी। यहाँ तक कि अनेक अवसरों पर जापान ने अमेरिका के अर्थतंत्र को भी सहारा दिया। विश्व बिरादरी में भी उनकी गिनती अनुभवी और प्रभावशाली नेता के तौर पर होती रही। भारत और जापान के बीच निकट सम्बन्ध स्थापित होने में श्री आबे का योगदान उल्लेखनीय है। खास तौर पर नरेंद्र मोदी के साथ उनका व्यक्तिगत सामंजस्य बहुत ही अच्छा  रहा। लेकिन इस सबसे हटकर उनके त्यागपत्र को भारतीय संदर्भों में देखने पर मन में स्वाभाविक रूप से ये प्रश्न उठता है कि हमारे देश में बीमारी के बावजूद सरकारी पदों पर बैठे महानुभाव इस तरह का उदाहरण पेश क्यों नहीं करते ? मात्र 65 साल के आयु में पद त्याग करने वाले श्री आबे एक वर्ष का शेष कार्यकाल आसानी से पूरा कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा करने की जगह गद्दी छोड़ने का फैसला किया। भारत में सत्ता में बैठे अनेक वयोवृद्ध राजनेता असाध्य रोगों से ग्रसित होने के बाद भी पद से हटने की बजाय सरकारी खर्च पर मुफ्त इलाज करवाते हैं। अनेक तो ऐसे हैं जो लम्बे समय तक विदेश में इलाजरत रहे। आज भी कुछ हैं जो दफ्तर में कम और अस्पताल में ज्यादा रहते हैं। लेकिन सत्ता से हटने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आता। राज्यपाल पद पर बिठाये जाने वाले अधिकतर नेताओं के काफी बुजुर्ग होने से तरह-तरह की बीमारियाँ उनके साथ जुड़ी होती हैं। महामहिम बनते ही वे प्राचीन समय के राजा-महाराजा की तरह बन जाते हैं। मप्र के अनेक पूर्व राज्यपाल पद पर आने के पहले ही बीमार थे, इस कारण उनका अधिकतर कार्यकाल अस्पतालों में ही बीता। इलाज पर हुआ करोड़ों का खर्च भी सरकारी खजाने से किया गया। सत्ता से अलग होने के बाद भी मुफ्त इलाज की बात अपनी जगह है लेकिन पद पर रहते हुए जब राजनेता बीमार होते हैं तो उसका असर उनके सरकारी काम पर पड़ता है। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले स्व. अरुण जेटली और स्व. सुषमा स्वराज ने चुनावी राजनीति से खुद को दूर कर लिया। पिछली सरकार में मंत्री रहते हुए ही उनकी तबियत काफी खराब रही। किडनी और हृदय की शल्यक्रिया भी हुई और उस कारण वे लम्बे समय तक मंत्री पद का दायित्व नहीं निभा सके। श्री जेटली पहली मोदी सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए खड़े रहकर बजट भाषण तक नहीं पढ़ पाते थे। उस सरकार का आखिरी बजट तो उनकी जगह पियूष गोयल ने पेश किया। दुर्भाग्य से चुनाव के बाद वे दोनों ही दिवंगत हो गये। लेकिन चुनावों से दूर होने जैसा निर्णय लेने में बीमार नेताओं को तकलीफ  होती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद श्री मोदी ने भाजपा में 75 वर्ष की जो आयु सीमा निर्धारित की उसकी वजह से बहुत से नेता सक्रिय राजनीति से तो अलग हो गये लेकिन राजभवन में उनका पुनर्वास अभी भी जारी है। केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान लम्बे समय से अस्वस्थ हैं। लन्दन में भी इलाज करवाकर आ चुके हैं। हाल ही में फिर अस्पताल में भर्ती हो गये। ऐसे मंत्रीगण अपने मंत्रालय को ठीक तरह से नहीं चला पाने के बावजूद खराब स्वास्थ्य के कारण पद छोड़ने की सौजन्यता क्यों नहीं दिखाते, ये बड़ा सवाल है। जापान के प्रधानमन्त्री द्वारा बीमारी के कारण महज 65 साल की उम्र में सत्ता त्याग देने जैसी बात हमारे देश में मूर्खता की श्रेणी में रखी जायेगी। चुनाव आयोग ने नामांकन पत्र में तरह-तरह की जानकारियाँ देने का प्रावधान किया है। इसके कारण प्रत्याशी की आय, चल-अचल सम्पत्ति, अपराधिक प्रकरण, शैक्षणिक योग्यता आदि की जानकारी जनता के संज्ञान में आ जाती है। बेहतर हो आगे से नामांकन पत्र के साथ ही प्रत्याशी के स्वास्थ्य संबंधी विवरण देना भी अनिवार्य किया जाए। हो सकता है कुछ लोग इसे लेकर निजता का सवाल खड़ा करें लेकिन जब स्वस्थ भारत की बात होती है तो फिर नेताओं का स्वस्थ होना भी एक मुद्दा होना चाहिए। सुशांत राजपूत, कोरोना और राजनीतिक रस्साकशी के कारण हमारे देश में जापान के प्रधानमंत्री द्वारा स्वास्थ्य संबंधी कारण से पद त्याग देने जैसी खबर का शायद ही संज्ञान लिया जाए लेकिन यदि लोकतंत्र को जवाबदेह बनाना है तो उसे बीमार नेताओं से बचाना भी समय की मांग है। 1945 में परमाणु हमले के कारण तबाह होने के बाद मात्र 75 बरस में जापान विश्व की आर्थिक महाशक्ति बन बैठा जबकि दूसरे महायुद्ध की विभीषिका से दूर रहकर 1947 में आजाद होने के बाद भारत में आज भी बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहने को बाध्य है। कारण श्री आबे के त्यागपत्र से समझा जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 28 August 2020

असली पिक्चर अभी बाकी है : नशे के खुलासे से मामला उलझा



गत दिवस एक टीवी समाचार चैनल के वरिष्ठ संपादक द्वारा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर संदेह के घेरे में बताई जा रहीं उनकी महिला मित्र और अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती का जो साक्षात्कार लिया गया उसके प्रसारण के बाद सोशल मीडिया पर उक्त संपादक के साथ चैनल की भी जमकर आलोचना हुई। रिया का सुशांत की मौत में हाथ है या नहीं ये तो जाँच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा लेकिन जिन रहस्यमय परिस्थितियों में वह सुशांत को छोडकर गई और उससे जुड़ी बाकी जानकारी सामने आ रही है उससे लगता है कि भले ही वह उसकी मृत्यु के समय उसके घर में नहीं रही लेकिन उसके पहले और बाद के घटनाक्रम से मिल रहे संकेतों के मुताबिक इस कांड के बारे में उससे काफी कुछ पता चल सकता है। सबसे बड़ी बात जो उक्त साक्षात्कार में उसने बताई वह ये कि सुशांत नशीली दवाएं ( ड्रग्स ) लेता था। हालाँकि उसने इस बात से साफ़  इंकार किया कि उसने सुशांत को इसकी लत डाली। बकौल रिया उसे विमान में बैठने से डर लगता था और किसी चिकित्सक के कहने पर उसने उड़ान से पहले नशीली दवाई लेना शुरू किया, जो लत बन गई। रिया ने ये भी कहा कि उसने सुशांत को रोकने की काफी कोशिश की लेकिन वह अपने फैसलों को लेकर बहुत ही दृढ़ था। नशीली दवाओं के नाम भी उसने साक्षात्कार के दौरान खुलकर बताये। लेकिन उसके जो व्हाट्स एप सन्देश जाँच एजेंसियों ने ढूढ़ निकाले उनसे स्पष्ट होता है कि वह नशीली दवाइयां मंगवाने में शामिल थी और उसकी आपूर्ति करने वालों को प्रत्यक्ष न सही लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जानती थी। हो सकता है वह सुशांत की मांग पूरी करने के लिए ऐसा करती रही लेकिन जब उसने ये माना कि वे दोनों दंपत्ति की तरह रहते थे और सुशांत को नशीली दवाएं देने में उसकी कोई भूमिका नहीं थी तब जिस इन्सान से वह विवाह रचाने जा रही थी क्या उसकी नशे की लत छुड़वाने के लिए उसे ज़रूरी कदम नहीं उठाना चाहिये थे ? जिस आत्मविश्वास के साथ उसने साक्षात्कार दिया उससे एक बात तो साफ़ हो गई कि रिया बहुत ही दबंग महिला है। लेकिन अपने होने वाले पति को नशीली दवाईयों से मुक्त करने के लिए उसका कुछ न किया जाना ये साबित करता है कि सुशांत की जिस मानसिक बीमारी (अवसाद) का ढिंढोरा पीटा जा रहा था वह जैसा रिया ने बताया नशीली दवाइयों की लत थी। उसने ये भी बताया कि सुशांत के साथ उसके जुड़ने के पहले से ही वह नशे की गिरफ्त में आ चुका था। रिया चूंकि उसके साथ लिव इन में रह रही थी और जैसा उसी ने बताया उसके भाई के सुशांत के साथ बहुत ही आत्मीय सम्बन्ध थे। यहाँ तक कि जब वे दोनों  छुट्टियाँ मनाने यूरोप गए तब भी सुशांत , रिया के भाई को साथ ले गया। सवाल ये है कि एक युवती ये जानते हुए भी कि वह जिस शख्स के साथ बिना शादी किये पत्नी की तरह रह रही हो और जल्द उसके साथ विवाह करने वाली हो , वह उसके नशे में डूबे होने की बात को किस कारण छुपाती रही , और उसने इस बारे में नशा मुक्ति केंद्र या प्रशासन को क्यों नहीं बताया ? उसके फोन से मिली जानकारी के अनुसार वह खुद नशीली दावा के आपूर्तिकर्ता से संपर्क किया करती थी। इस बारे में नारकोटिक्स विभाग भी सक्रिय हो गया है जिससे कि सुशांत के नशैलची होने वाली कहानी का सच सामने आने की उम्मीद बढ़ चली है। इस जानकारी के बाद फिल्मी दुनिया में नशे के चलन की तह में जाना जरूरी है। कुछ समय पहले एक युवा फिल्म निर्माता जो इन दिनों भतीजावाद के कारण काफी विवादित हो चले हैं , के घर हुई सितारों की अन्तरंग पार्टी का जो वीडियो प्रसारित हुआ था उसमें अनेक अभिनेता और अभिनेत्रियाँ नशा ( ड्रग्स ) करते दिखाई दिए थे। शराब तो खैर फिल्मी पार्टियों में पानी की तरह बहती है । लेकिन नशीली दवाओं का चलन भी तेजी से फैलने की बात अब खुलकर सामने आने लगी है। काफी पहले संजय दत्त इसके शिकार हुए थे जिनका इलाज उनके पिता स्व. सुनील दत्त ने अमेरिका ले जाकर करवाया। लेकिन सुशांत के मामले में जैसा रिया ने बताया और उसके फोन से पता चला कि नशीली दवाइयां फिल्मी कलाकारों को आसानी से उपलब्ध होती हैं। हालाँकि जाँच शुरू तो इस बात के लिए हुई थी कि सुशांत ने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई लेकिन नशे के कारोबार के सामने आने के बाद अब उसका दायरा काफी विस्तृत हो गया है। जाँच एजेंसियों को चमक-दमक भरी फिल्मी दुनिया की गन्दगी को सबके सामने लाने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिलेगा क्योंकि परिवारवाद से पीड़ित अनेक छोटे बड़े कलाकार अपनी बिरादरी की पोल खोलने के लिए तैयार बैठे हैं। कंगना रनौत नामक अभिनेत्री तो नशे के कारोबार का पर्दाफाश करने के लिए सरकार से सुरक्षा मांग रही है। सीबीआई और नारकोटिक्स विभाग मिलकर सुशांत की मौत के साथ ही नशीली दवाइयों की आपूर्ति के स्रोतों का पता लगाकर उसके संचालकों की गर्दन में फंदा डाल सकें तो अनेक ऐसे राज खुल जायेंगे जिन पर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ है। ये बात भी जगजाहिर है कि फिल्मी दुनिया में पैसे का जो अनवरत प्रवाह है, उसका एक स्रोत माफिया भी है। और जहां माफिया होता है वहां नशा (ड्रग्स), व्यभिचार और अन्य अपराध स्वाभाविक तौर पर अपनी जगह बना लेते हैं। ये देखते हुए लगता है कि सुशांत की मौत का असली सच जो अब तक बताया जा रहा है, उससे अलग हटकर भी हो सकता है। फिल्मी अंदाज में कहें तो पिक्चर अभी बाकी है ...।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 August 2020

कांग्रेस मुक्त भारत की बजाय गांधी परिवार मुक्त कांग्रेस की मुहिम



2014 के लोकसभा चुनाव के पहले जब नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा उछाला तब तरह-तरह की बातें हुईं। मोदी विरोधियों ने उसे अतिरेक भी बताया। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस जब पचास से नीचे उतर आई तब ऐसा लगा कि वह बात सही होने को आई। लेकिन अगले पांच सालों में उसने पंजाब, मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपने दम पर सत्ता हासिल की वहीं अनेक राज्यों में दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर भाजपा का विजय रथ रोका। ऐसा लगने लगा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस वापिसी करेगी। 2018 के अंत में तीन प्रमुख राज्य जिस तरह से भाजपा के हाथ से खिसके और उसके पहले गुजरात में वह घुटनों के बल चलकर जीत पाई उससे कांग्रेस का आत्मविश्वास काफी बढ़ा और उसी कारण राहुल गांधी ने जबर्रदस्त आक्रामक रुख अख्त्तियार किया। हिन्दू विरोधी छवि को बदलने के लिए मंदिरों और मठों में भी मत्था टेका। उनके जनेऊ धारण करने जैसे शिगूफे भी छोड़े गए किन्तु 2019 के लोकसभा चुनाव ने कांग्रेस की तमाम उम्मीदों को धूल - धूसरित कर दिया। पराजय की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल ने अध्यक्ष पद त्याग दिया। लेकिन उनका स्तीफा मंजूर करने में ही पार्टी ने कई महीने लगा दिए और फिर सोनिया गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर पार्टी की बागडोर परिवार के ही पास रखी। एक वर्ष गुजर जाने के बाद भी पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं चुने जाने से पार्टी की दिशा तय नहीं हो पा रही थी। श्रीमती गांधी का स्वास्थ्य इस भार को सहन करने लायक नहीं होने से संगठन संबंधी जरूरी फैसले अटके पड़े रहने का ही दुष्परिणाम मप्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के तौर पर देखने मिला। उसकी पुनरावृत्ति राजस्थान में भी होने जा रही थी लेकिन सचिन पायलट संख्या नहीं बटोर सके। हालाँकि खतरे के बादल कब बरस जाएं कहा नहीं जा सकता। इस सबके पीछे का कारण पार्टी के शीर्ष नेतृत्त्व में व्याप्त शून्यता ही है। जिन 23 वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया जी को पत्र लिखकर पार्टी संगठन को तदर्थवाद से निकालकर सक्रिय बनाने का अनुरोध किया वे गांधी परिवार के विरोधी हैं या नहीं ये तो स्पष्ट नहीं हुआ किन्तु उनकी मुहिम थी तो पार्टी के हित में ही। यदि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उस पत्र की मंशानुसार श्रीमती गांधी अपनी जगह किसी और को अध्यक्ष बना देतीं तो मामला आसानी से निपट जाता लेकिन पत्र लिखने वालों की वफादारी पर ही सवाल उठाकर आग में घी डाल दिया गया। सोनिया जी तो शांत रहीं लेकिन राहुल और प्रियंका ने चिट्ठी लिखने वालों पर जिस तरह की टिप्पणियाँ कीं और उनके समर्थकों ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाई वह चिट्ठी भेजने वालों को अपना अपमान लगा और उनकी तरफ  से भी तीखी जवाबी प्रतिक्रिया आने लगी। हालाँकि बाद में भूल जाओ और माफ़ करो की औपचारिकता का निर्वहन करते हुए सब कुछ शांत होता दिखाने की कोशिश भी की गई और श्रीमती गांधी ने कुछ नाराज नेताओं को फोन करते हुए मनाने का प्रयास भी  किया लेकिन कपिल सिब्बल के अलावा चिट्ठी भेजने वाले और नेता भी लगातार अपने पत्र के औचित्य को साबित कर रहे हैं जिससे लगता है आग अभी तक ठंडी नहीं हुई। जिस तरह सोनिया जी को आगामी छह महीने तक कार्यकारी बने रहने का फैसला करवाते हुए नये अध्यक्ष के चुनाव को टाल दिया गया उससे पत्र भेजने वाले खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह जैसे नेता खुलकर कह रहे हैं कि उसे सार्वजनिक करना पार्टी विरोधी कृत्य था। इससे लगता है कि सोनिया जी द्वारा मामला ठंडा करने की कोशिशों को पलीता लगाने के समानांतर प्रयास भी चल रहे हैं। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े दो दर्जन नेताओं ने कांग्रेस को गांधी परिवार के शिकंजे से आजाद करवाने का दुस्साहसिक कदम उठा लिया है और ऐसा करते समय वे इतना आगे बढ़ गए कि लौटना आत्मघाती होगा। वहीं दूसरी तरफ  गांधी परिवार का भरोसा दोबारा हासिल करने के रास्ते भी बंद हो चुके हैं। ऐसे में इन नेताओं के पास सीमित विकल्प बच रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी परेशानी ये है कि वे बड़े नेता कहलाने के बावजूद अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखते। और यही कमजोरी गांधी परिवार समझता है। लेकिन इस घटनाक्रम से कांग्रेस की द्वितीय पंक्ति में भी पशोपेश की स्थिति है। जिन 23 नेताओं ने चिट्ठी भेजने की हिमाकत की उनमें से अधिकांश ने तो राजनीति में बहुत कुछ हासिल कर लिया लेकिन उनके समर्थक यदि उनके साथ खड़े होने की हिम्मत दिखाते हैं तब उनके हाथ खाली ही रहेंगे। वैसे भी इस तरह का मोर्चा खोल देने के बाद आर-पार की लड़ाई लड़ना जरूरी हो जाता है। इस प्रकार श्री मोदी द्वारा कांग्रेस मुक्त भारत की बजाय बात अब गांधी परिवार मुक्त कांग्रेस की तरफ  घूमने लगी है। विवादित पत्र भेजने वाले नेताओं को यदि कांग्रेस निकाल दे तब उसके पास भी चेहरों का अभाव हो जाएगा। इसलिए फिलहाल शीतयुद्ध के हालात बने रहेंगे किन्तु अगले छह महीने गांधी परिवार के लिए बेहद चुनौती भरे होंगे। हाल ही में हुई कार्यसमिति की  चर्चित बैठक में भले ही विरोध की आवाज को दबा दिया गया परन्तु उसके बाद भी चिट्ठी लिखने वालों की बैठकें और बयान जारी हैं। सोनिया गांधी के साथ सबसे बड़ी परेशानी ये है कि न तो उनमें इंदिरा जी जैसा राजनीतिक कौशल है और न ही राहुल गांधी में संजय गांधी सरीखा साहस। रही प्रियंका वाड्रा तो वे शाही परिवार की राजकुमारी से ज्यादा कुछ नहीं हैं। आजादी से पहले और बाद में कांग्रेस ने अनेक बार बगावत और विभाजन झेले हैं लेकिन मौजूदा स्थिति थोड़ी अलग है क्योंकि इसमें नेतृत्व को अपने लिए उतना खतरा नहीं लग रहा लेकिन उसके साथ अब तक जुड़े रहे कुनबे में अपने भविष्य को लेकर जबरदस्त चिंता है। क्या पता डूबते जहाज से चूहों के कूदने वाली कहावत ऐसे ही हालातों के संदर्भ में बनाई गई हो।

-रवीन्द्र वाजपेयी



Wednesday, 26 August 2020

चोटी से उतरते समय असावधानी जानलेवा हो सकती है




कोरोना को लेकर ये धारणा बनने लगी है कि भारत में उसका चरमोत्कर्ष आने वाला है और उसके बाद वह ढलान पर आ जाएगा। कोई 15 सितम्बर की तारीख बता रहा है तो कोई कुछ और। भविष्यवक्ता भी अपनी गणना के मुताबिक़ दावे कर रहे हैं। दूसरी तरफ  चिकित्सा विज्ञान से जुड़े लोगों का पूरा हिसाब-किताब कोरोना की वैक्सीन पर टिका है, जिसे लेकर जितने मुंह उतनी बातें सुनाई दे रही हैं। मोटे अनुमान के अनुसार दुनिया भर में जितनी भी वैक्सीन बन रही हैं उनका अंतिम परीक्षण होते-होते अभी एक-डेढ़ महीना और लग जाएगा और उसके उपरांत ही व्यावसायिक उत्पादन हो सकेगा। भारत में विकसित की जा रही वैक्सीन के भी दिसम्बर तक बाजार में आने की उम्मीद है। इधर कुछ दिनों से भारत में कोरोना के नए मरीजों और अस्पतालों से ठीक होकर निकलने वाले मरीजों की संख्या में अंतर घट रहा है। प्रतिदिन नए संक्रमण भी 70 हजार के आसपास ही ठहरे हुए हैं। हालाँकि इसकी एक वजह जाँच की संख्या में आया ठहराव भी हो सकता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार नए संक्रमण और मृत्यु का प्रतिशत भी पूर्वापेक्षा नीचे आया है, जो अच्छा संकेत है। ये भी तब जबकि देश के बड़े हिस्से में लॉक डाउन हटने के बाद से जनजीवन सामान्य होता दिख रहा है। दिल्ली सहित अनेक राज्यों में कोरोना का प्रकोप नियंत्रण में है। यद्यपि महाराष्ट्र की हालत बेहद खराब है। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि देर से ही सही लेकिन भारत ने कोरोना नामक इस रहस्यमय महामारी से निपटने का हुनर हासिल कर लिया और उसकी रोकथाम के लिए वैक्सीन विकसित करने में भी सफलता हासिल करने जा रहा है। 135 करोड़ से भी ज्यादा की आबादी और उस पर भी घनी बसाहट के बावजूद कोरोना संक्रमण को रोकने में काफी हद तक कामयाबी वाकई बड़ी उपलब्धि कही जायेगी। अन्यथा ये डर था कि भारत में महामारी शब्द पूरी तरह से सही साबित होकर रहेगा। अब तक की स्थिति को देखते हुए ये माना जा सकता है कोरोना को लेकर एम्स दिल्ली के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया ने जो अनुमान लगाया था वह सच्चाई के काफी करीब प्रतीत हो रहा है। उनके मुताबिक अगस्त के अंत और सितम्बर की शुरुवात से कोरोना उतार पर आना शुरू हो जाएगा। उस लिहाज से बीते कुछ दिनों के आंकड़े उनके अनुमानों को सही ठहराने का संकेत दे रहे हैं। लेकिन इस बारे में ध्यान देने योग्य बात ये है कि चोटी से नीचे उतरते समय जरा सी असावधानी होने पर पैर फिसलने का खतरा रहता है जो जानलेवा भी साबित हो सकता है। कोरोना के चरम बिंदु को छू लेने के बाद उसके ढलान पर आने की खुशी में थोड़ी सी असावधानी घातक हो सकती है। चिकित्सा विशेषज्ञ भी ये खुलकर कह रहे हैं कि भले ही कोरोना पर हाल-फिलहाल नियंत्रण कर लिया जाए लेकिन उसके समूल नष्ट होने में कम से कम दो साल लगेंगे। और इस दौरान जरा सी लापरवाही उसकी वापिसी का कारण बन सकती है। भारत में कुछ राज्य ऐसे हैं जिन्होंने प्रारम्भिक चरण के बाद कोरोना पर पूरी तरह से काबू करते हुए खुद को विजेता मान लिया था लेकिन उनका विजयोल्लास क्षणिक साबित हुआ और कोरोना दोगनी ताकत से लौट आया। दुनिया के अनेक देशों में भी ऐसा देखने मिला है। इसलिए भले ही ताजा आंकड़े आश्वस्त कर रहे हों तथा वैक्सीन आने की खबरें कोरोना के डर को कम कर रही हों लेकिन जैसा पूर्व में कहा गया चोटी पर चढ़ने के बाद जीत की खुशी में लौटने के दौरान जरा सी असावधानी भारी पड़ जाती है। दुनिया के जाने-माने पर्वतारोहियों के अनुभव इस बारे में सचेत करने वाले हैं। भारत के सन्दर्भ में कोरोना के बारे में जरूरी सावधानियां बरतने की सख्त जरूरत है। जिस तरह से लोगों में बेफिक्री दिखाई देने लगी है वह खतरे का संकेत है। सोशल मीडिया पर जैसे चुटकुले देखने मिल रहे हैं वे समाज की मानसिक दृढ़ता का संकेत तो हैं लेकिन उससे कोरोना से बचाव के तौर-तरीकों की अवहेलना का माहौल भी पैदा हो रहा है। सार्वजनिक स्थलों पर बिना मास्क के घूमने वाले बड़ी संख्या में नजर आने से ये लगने लगा है कि कोरोना को खत्म मान लिया गया है जबकि मौजूदा हालात में ही सबसे ज्यादा सावधानी की जरूरत है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

तात्कालिक राहत लेकिन बगावत ने घर तो देख ही लिया



कांग्रेस कार्यसमिति की बहुप्रतीक्षित बैठक गत दिवस हुई तो पार्टी के पूर्णकालिक अध्यक्ष को चुनने के लिए थी लेकिन आपसी विवादों के कारण पहले तो तू-तू, मैं-मैं में बदली और फिर साफ-सफाई के बाद अंतत: जैसे थे की स्थिति पर ही समाप्त हो गई। लोकसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद गत वर्ष राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था। महीनों तक मान-मनौवल चली और जब वे नहीं माने तो उनकी माताजी सोनिया गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया। गत 11 तारीख को एक वर्ष पूर्ण होने पर पार्टी में पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग उठी। अनेक नेताओं ने बाकायदा पत्र लिखकर नए अध्यक्ष के चुनाव की मांग रखी। जिसके बाद गत दिवस पार्टी कार्यसमिति की आभासी बैठक हुई। गत वर्ष राहुल ने गैर गांधी अध्यक्ष का जो शिगूफा छोड़ा था उसकी चर्चा पूरी पार्टी में थी और अनेक वैकल्पिक नाम भी चर्चा में आने लगे। प्रियंका वाड्रा ने अपने बयान में तो यहाँ तक कह दिया कि वे गैर गांधी अध्यक्ष के मातहत किसी भी पद का दायित्व सँभालने राजी हैं। दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के अलावा अशोक गहलोत, कैप्टेन अमरिंदर सिंह और भूपेश बघेल ने राहुल गांधी को ही दोबारा कमान सौंपने का राग छेड़ दिया। लगभग दो दर्जन नेताओं के हस्ताक्षरों से जारी पत्र के सार्वजनिक हो जाने को पार्टी के भीतर मतभेदों का प्रगटीकरण माना गया। मोहल्ले स्तर के फैसले दस जनपथ पर छोड़ दिए जाने की आदी कांग्रेस में शीर्ष स्तर के नेताओं द्वारा संगठन में व्याप्त तदर्थवाद को खत्म करते हुए पूर्णकालिक अध्यक्ष के लिए दबाव बनाया जाना ये साबित करने के लिए पर्याप्त था कि गांधी परिवार के एकाधिकार के विरुद्ध अब वे नेता भी मुखर होने लगे हैं जो उसका दिन-रात गुणगान किया करते थे। राहुल गांधी की ट्विटर पर सक्रियता के बावजूद संगठन के मामलों में उदासीनता के कारण पार्टी का प्रभाव क्षेत्र जिस तरह सिकुड़ता जा रहा है उसकी वजह से नीचे से लेकर ऊपर तक पार्टीजन अपने भविष्य को लेकर चिंतित होने लगे हैं। गैर गांधी अध्यक्ष की चर्चा ने आंतरिक लोकतंत्र की जो संभावनाएं पैदा कीं उनके कारण उनमें उत्साह का वातावरण था। कार्यसमिति की बैठक शुरू होते ही श्रीमती गांधी ने अध्यक्ष पद त्यागने की पेशकश की तो डा. मनमोहन सिंह ने उन्हें रोक दिया। बात आगे बढ़ती इसी दौरान राहुल ने कथित तौर पर पत्र भेजे जाने वाले नेताओं पर निशाना साधते हुए ये तंज कस दिया कि वह भाजपा के इशारों पर लिखा गया है। उसके समय पर भी सवाल दागे गए। जवाब में गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल के गुस्से भरे ट्वीट सामने आने से ऐसा लगने लगा कि पार्टी दोफाड़ होने की राह पर है। प्रियंका ने भी चिट्ठी भेजने वालों को लताड़ा। गांधी परिवार के समर्थक नेतागण भी सामने आये और घर की बातों को सार्वजनिक करने वालों के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं। फिर शुरू हुआ घावों पर मरहम लगाने का दौर और थोड़ी देर बाद गलतफहमी दूर होने का दावा करते हुए कही- सुनी माफ वाली स्थिति देखने मिली। वहीं इस दौरान वह दांव फिर खेल दिया गया जिसने गैर गांधी अध्यक्ष की चर्चा को हवा - हवाई बना दिया। डा. मनमोहन सिंह के प्रस्ताव को सबने समर्थन दे दिया। राहुल की दोबारा ताजपोशी किये जाने के लिए अनुकूल माहौल नहीं दिखने पर सोनिया जी को ही अगले छह महीने तक कार्यकारी अध्यक्ष बनाये रखने का फैसला करते हुए बैठक समाप्त कर दी गई। इस तरह ले देकर पार्टी पर गांधी परिवार का कब्जा बरकरार रहा। अतीत में शरद पवार द्वारा श्रीमती गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर की गई बगावत के बाद सम्भवत: ये पहला मौका होगा जब गांधी परिवार के विरुद्ध पार्टी में आवाज सुनाई दे रही हैं। भले ही कल की बैठक में किसी तरह बाजी हाथ से निकलते-निकलते बचा ली गई किन्तु ये कहना गलत न होगा कि राहुल की असफलता को आगे ढोने के विरुद्ध कांग्रेस के बड़े नेताओं का एक गुट खुलकर सामने आने का साहस दिखा रहा है। श्रीमती गांधी का जो लिहाज है उसी का फायदा उठाते हुए गत दिवस बगावत को शांत किया गया लेकिन राख के ढेर में दबी चिंगारी दोबारा कब भड़क उठे ये कहना कठिन है। सोनिया जी की अस्वस्थता के अल्रावा राहुल और प्रियंका की अंशकालिक राजनीतिक शैली ने कांग्रेस को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां उसके सामने मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं, बड़ी मुश्किल में हूँ अब किधर जाऊँ, जैसी दुविधा है। भले ही आगामी छह महीने के लिए अध्यक्ष पद का मसला टाल दिया गया हो लेकिन बगावत ने पार्टी का घर तो देख ही लिया है। इस घटनाक्रम से कांग्रेस का साधारण कार्यकर्ता असमंजस में है क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा कि आखिर ऐसे तमाम नेता जो कल तक गांधी परिवार के अंधभक्त हुआ करते थे, अचानक से खुदमुख्त्यारी का ऐलान करने पर क्यों और कैसे उतारू हो गये?

-रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 24 August 2020

होटलों और सभागारों को दी जा रही छूट स्वागतयोग्य बशर्ते .....



कोरोना वैक्सीन को लेकर व्याप्त अनिश्चितता के बीच केंद्र सरकार ने इस दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित पर्यटन उद्योग को उबारने के लिए विगत दिवस अनेक रियायतों का ऐलान किया। होटल एवं सभागार आदि में होने वाले आयोजनों में 50 व्यक्तियों की सीमा खत्म कर दी है। गत दिवस केन्द्रीय पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल ने इस आशय की घोषणा करते हुए बताया कि जितने मेहमान बुलाये जायेंगे उससे दोगुना स्थान आयोजन स्थल पर होना अनिवार्य होगा। सभागारों में भी जितनी सीटें होंगीं उसके आधे व्यक्ति ही प्रवेश पा सकेंगे। इस बारे में विधिवत घोषणा शीघ्र ही की जावेगी। मार्च में लॉक डाउन के बाद शादी-विवाह, संगीत, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा व्यावसायिक सम्मेलन आदि पर रोक लग गई थी। विवाह में अधिकतम 50 लोगों की अनुमति दिए जाने से होटलों, बैंक्वेट हॉल, तथा मैरिज गार्डन का पूरा व्यवसाय चौपट हो गया। देश के अधिकाँश होटल बीते अनेक महीनों से बंद पड़े हैं। पर्यटन पूरी तरह से बंद है। व्यवसायिक और औद्योगिक गतिविधियां ठप्प होने से होटलों और सभागारों के सामने अस्तित्व का संकट होने लगा था। बिजली के बिल, रखरखाव और वेतन पर होने वाले खर्च के कारण उनकी कमर टूटने लगी थी। उस लिहाज से केंद्र सरकार का उक्त फैसला उम्मीदें जगाने वाला है। भारत में ग्रीष्मकाल शादियों का मौसम होता है। शिक्षण संस्थानों में अवकाश होने से लोग सपरिवार सैर-सपाटे पर निकलते हैं। कोरोना के कारण लगाये गए लॉक डाउन की वजह से उक्त सभी गतिविधियाँ ठप्प होकर रह गईं। प्रतिबंधों के चलते फिल्म उद्योग भी पूरी तरह से ठहराव का शिकार हो गया। उसे दोबारा खड़ा करने के मकसद से प्रतिबंधों का पालन करते हुए शूटिंग की अनुमति भी दे दी गयी। इस सबसे पर्यटन और मनोरंजन उद्योग को एक तरह से प्राणवायु मिल जायेगी। सबसे बड़ी बात ये हैं कि विवाह समारोह में अतिथियों की संख्या पर लगी पाबंदी हटने से उसका सीधा असर बाजार पर पड़ेगा। ये बात सर्वविदित है कि विवाह संबंधी आयोजन भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने में सर्वाधिक योगदान देते हैं। इसी तरह सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं इसी तरह की गतिविधियों से भी बड़ी संख्या में लोगों को काम मिलता है। बीते लगभग पांच महीने इस दृष्टि से बेहद भारी साबित हुए। जून में लॉक डाउन शिथिल किये जाने के बाद भी उक्त सभी क्षेत्रों पर प्रतिबंध जारी थे। शीघ्र ही सिनेमाघरों को भी उनकी क्षमता के आधे दर्शकों के साथ शुरू करने की अनुमति देने पर भी विचार हो रहा है। परिवहन क्षेत्र तो पहले ही खोल दिया गया है। हालाँकि अभी शिक्षण संस्थान खोले जाने को लेकर अनिश्चितता है। लेकिन होटल, सभागार, मैरिज हाल आदि में गातिविधियां शुरू होते ही बाजार में छाई उदासीनता को दूर करने में सहायता मिलेगी। फिलहाल जो भय का माहौल है उसे दूर करना भी बहुत जरूरी है। लेकिन इन छूटों के साथ ही ये भी देखना होगा कि प्रतिबंधों के हटने से कहीं स्वछंदता का बोलबाला न हो जाए। लॉक डाउन हटने के बाद बाजारों में उमड़ी भीड़ ने जिस तरह से कोरोना संबंधी सावधानियों की धज्जियाँ उड़ाईं उसे देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि होटलों एवं सभागारों में आयोजनों की अनुमति दिए जाने के बाद जरा सी चूक कोरोना के फैलाव का कारण बन सकती है। जबलपुर में बीते दिनों स्थानीय होटल में एक शासकीय अधिकारी के पारिवारिक विवाह समारोह में अतिथि संख्या का उल्लंघन होने पर सैकड़ों लोग संक्रमित हुए। इस तरह की लापरवाही पर यदि रोक लग सकी तो केंद्र सरकार के उक्त सभी फैसले कारगर साबित होंगे। बरसात के बाद भारत में विवाह के साथ ही त्यौहारी मौसम भी आता है जिसके कारण बाजार में बहार आ जाती है। ऐसे में अभी मिल रही छूट का यदि सही उपयोग हुआ तब होटल और पर्यटन उद्योग के साथ ही अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों को भी जबर्दस्त सहारा मिल जाएगा। जैसी उम्मीद जताई जा रही है उसके अनुसार सितम्बर मध्य से कोरोना ढलान पर आयेगा। लेकिन अतिउत्साह में बेफिक्र हो जाना खतरनाक होगा। दुनिया के अनेक देशों में लापरवाही के चलते कोरोना संक्रमण ने पलटवार किया है। भारत में तो वैसे भी अनुशासन का पालन करने के प्रति अशिक्षित ही नहीं पढ़े-लिखे लोग भी बेहद लापरवाह हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 22 August 2020

सीबीआई के पास सितारों के काले सच उजागर करने का मौका



अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी सुलझाने की जिम्मेदारी सीबीआई को मिलने के बाद बिहार और महाराष्ट्र सरकार के बीच चल रहा शीतयुद्ध ऊपर से तो समाप्त हो गया किन्तु राजनीतिक दांवपेंच जारी हैं। लेकिन इससे फिल्मी दुनिया की गन्दगी पर पड़ी परतें लगातार खुल रही हैं। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि फिल्म जगत सुशांत की मौत को लेकर दो धड़ों में विभक्त हो गया है। आरोप-प्रत्यारोप जिस धड़ल्ले से चल रहे हैं उन्हें देखते हुए कहा जा सकता है कि अपनी एकता के लिए प्रसिद्ध फिल्मी बिरादरी मौजूदा हालात में टुकड़े-टुकड़े होने के कगार पर है। हालाँकि फिल्मी कलाकारों के राजनीति में आने का सिलसिला काफी पुराना है। दक्षिण भारत में तो फिल्मी सितारों का राजनीति में धमाकेदार प्रवेश साठ के दशक में ही हो चुका था। इसी तरह कोलकाता में बँगला फिल्म उद्योग में भी वामपंथी प्रभाव वाली अनेक हस्तियाँ राजनीति में उतरीं। तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन और उनके बाद जयललिता जैसे फिल्मी चेहरे लम्बे समय तक सत्ता में रहे। अविभाजित आंध्र में एनटी रामाराव भी धूमकेतु की तरह उभरे थे। मुम्बई फिल्म उद्योग इस मामले में पीछे रहा लेकिन फिर सुनील दत्त, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा को केंद्र में मंत्री पद मिलने से सत्ता में फिल्मी उद्योग की भागीदारी मजबूत हुई। अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, गोविन्दा, धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी और सनी देओल ने लोकसभा तो पृथ्वीराज कपूर, नर्गिस, शबाना  आजमी, जया बच्चन और रेखा आदि ने राज्य सभा में अपनी मौजूदगी दर्ज की। मुंबई फिल्म जगत से जुड़े अनेक कलाकार चुनावों में राजनीतिक पार्टियों के लिए प्रचार करते रहे हैं। लेकिन राजनीतिक मतभिन्नता के बावजूद भी उनके आपसी रिश्ते बेहद प्रगाढ़ रहे। हालांकि व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा बनी रही लेकिन ये पहला अवसर है जब मुम्बई फिल्म उद्योग में अभूतपूर्व दरारें देखने मिल रही हैं। पहले तो परिवारवाद के नाम पर बाहरी प्रतिभाओं को परेशान करने जैसी बातें सामने आईं। ये आरोप खुलकर लगाये जाने लगे कि चंद परिवारों ने फिल्मी दुनिया पर कब्जा जमा रखा है। स्टार किड्स नामक एक वर्ग ऐसा है जो बाहरी दुनिया से आए अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की राह में रोड़ा बन ज़ाता है। सुशांत की मौत को भी इसी से जोड़ा गया। उसने आत्महत्या की या उसकी ह्त्या हुई ये तो सीबीआई की जाँच के उपरान्त ही स्पष्ट हो सकेगा लेकिन उसके समानांतर फिल्म जगत में चारित्रिक पतन की जो कहानियाँ सामने आ रही हैं वे घिन पैदा करने वाली हैं। यद्यपि कास्टिंग काउच के किस्से तो समय-समय पर सामने आते रहे हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इनका खुलासा कुछ ज्यादा ही होने लगा है। अनेक अभिनेत्रियों द्वारा आत्महत्या किये जाने के पीछे उनका यौन शोषण ही प्रमुख वजह मानी गई। सुशांत की मौत के बाद जिस तरह की बातें सोशल मीडिया पर हो रही हैं और अनेक अभिनेत्रियाँ अपने शोषण के किस्सों का बखान कर रही हैं उसे देखते हुए इस बारे में भी जाँच होनी चाहिए। हालांकि निजी सम्बन्धों को लेकर फिल्मी दुनिया सदैव वर्जनाहीन रही है। लेकिन कुछ सालों से लिव इन की जो संस्कृति पैर पसार रही है उसके कारण फिल्म जगत में रिश्तों को लेकर स्थापित सामाजिक मर्यादाएं तार-तार होकर रह गई हैं। सुशांत स्वयं भी दो अभिनेत्रियों के साथ लिव इन में रहे और जैसे आरोप लगाये जा रहे हैं उनके अनुसार तो उनको मौत के मुंह में धकेलने के लिए लिव इन पार्टनर ही जिम्मेदार हैं। ग्लैमर की दुनिया का का ये काला सच केवल मुम्बई में ही नहीं है। दक्षिण भारत और बंगाल में भी ये गंदगी बराबरी से है लेकिन मुम्बई चूंकि भारत का हॉलीवुड कहा जाता है इसलिए उसकी चर्चा देशव्यापी होती है। सुशांत जैसे अनेक मामले दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में भी हुए लेकिन इस जैसी राजनीतिक उठापटक नहीं हुई। कुछ अरसे पहले जिया खान नामक अभिनेत्री की आत्महत्या ने भी काफी सनसनी मचाई थी लेकिन उसमें राजनीति नहीं आने से वह धीरे से ठंडा हो गया। वहीं सुशांत मामले में बिहार विरुद्ध महाराष्ट्र की स्थिति बन जाने से बात सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंची। महाराष्ट्र सरकार ने सीबीआई जांच में जिस तरह से अड़ंगेबाजी की उससे संदेह और पुख्ता हुए तथा बात मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पुत्र तक जा पहुंची। लेकिन फिल्मी दुनिया में जिस तरह की खेमेबाजी सामने आई उसे देखते हुए लगता है कि लम्बे समय से दबा हुआ ज्वालामुखी फूटने के कगार पर आ गया है। संजय दत्त के पास अवैध हथियार पकड़े जाने के समय उनके पिता स्व. सुनील दत्त ने शिवसेना प्रमुख स्व. बाल ठाकरे से भी सहयोग माँगा था। जबकि स्व. दत्त कांग्रेस में थे। पूरा मुम्बई फिल्म जगत उस समय संजय के प्रति सहानुभूति व्यक्त करता सामने आया था जबकि उसका अपराध देश विरोधी था। और भी ऐसे कांड हुए जिनमें फिल्मी हस्तियाँ फंसीं परन्तु लगभग सभी ने उनका साथ दिया। लेकिन सुशांत की मौत के बाद परिदृश्य पूरी तरह बदल सा गया। और सीबीआई जाँच की मांग को जिस तरह फिल्मी हस्तियों का समर्थन मिला उसने ये साबित कर दिया कि मुम्बई फिल्म उद्योग में कुछ लोगों का एकाधिकार अब असहनीय हो गया है। सुशांत की मौत के साथ जुड़े लोगों के फिल्मी दुनिया के अनेक स्थापित दिग्गजों से अन्तरंग सम्बन्ध चकाचौंध के पीछे के अँधेरे को उजागार कर रहे हैं। सबसे जयादा चौंकाने वाली बात ये है कि जिस शिवसेना का फिल्मी दुनिया में इकतरफा दबदबा था वही इस बार रक्षात्मक होने मजबूर दिखाई दे रही है। ये सब देखते हुए लगता है सीबीआई को सुशांत की मौत की जाँच करते-करते ऐसे अनेक दबे हुए मामले मिल सकते हैं जिनसे फिल्मी दुनिया के भीतर व्याप्त गंदगी और माफियाकरण का खुलासा हो जाएगा। ये बात तो जगजाहिर है कि पहले फिल्मों में धनकुबेरों का काला धन लगा करता था लेकिन अब माफिया के पैसों से फिल्में बनती हैं। दुबई में दाउद इब्राहीम की मेजबानी का लुत्फ़ उठा चुके फिल्मी कलाकारों के सचित्र प्रमाण होने के बाद भी उनका छुट्टा घूमना रहस्यमय है। बड़े दिनों बाद ये मौका आया है जब सितारों की दुनिया का काला सच सामने आने की उम्मीदें जागी हैं जिसका लाभ लिया जाना चाहिए। लेकिन ये आशंका भी सता रही है कि महाराष्ट्र की सरकार को गिराने या बचाने के नाम पर कहीं लीपापोती न हो जाये। आदित्य ठाकरे पर छोड़े तीर तरकश में लौट न आएं ये डर सबको सता रहा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी