Tuesday, 8 September 2020

भारत भी तिब्बत में मानवाधिकार हनन का सवाल उठाये



गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ हुई खूनी मुठभेड़ में भले ही दोनों पक्षों के दर्जनों सैनिक हताहत हुए किन्तु उस संघर्ष में एक भी गोली नहीं चली। वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर दोनों देशों की सैन्य टुकड़ियां निरंतर निगाह रखती हैं। इस दौरान उनका आमना-सामना भी होता रहा है और कभी-कभार हाथापाई की चित्र सहित खबरें भी आती रहीं। लेकिन दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति कायम रही कि तनाव बढ़ने पर भी अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया जावेगा। ये भी तय हुआ था कि दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा पर निगरानी रखने के बावजूद उसके अतिक्रमण से परहेज रखेंगे। यद्यपि चीन गाहे-बगाहे मानवरहित क्षेत्र में अपना कब्जा ज़माने की हरकतें करता रहा जिसे रोकने के दौरान ही धक्का-मुक्की और हाथापाई की नौबत आती थी। लेकिन बीती गर्मियों में चीनी घुसपैठ के बाद हालात पहले जैसी छुटपुट घटनाओं से आगे निकलकर युद्ध की परिस्थितियों में तब्दील होते गये। गलवान घाटी की घटना के बाद भारत ने पहली बार लद्दाख क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मोर्चेबंदी की। दरअसल इस दुर्गम इलाके में सैन्य दृष्टि से सड़क, पुल, हवाई पट्टी, सेना को सर्दियों में तैनात रखने के इंतजाम, रसद की आपूर्ति, मिसाइलों, तोपों, टैंकों और लड़ाकू विमानों की तैनाती जैसे प्रबंधों के मामले में भारत तुलनात्मक रूप से चीन से बहुत पीछे था। लेकिन हाल के वर्षों में इस कमी को दूर कर लिया गया। और यही चीन की बौखलाहट का मुख्य कारण है। गलवान घाटी की घटना के पीछे भी यही विवाद था। अग्रिम चौकियों तक सड़क बनाने का चीनी सेना ने विरोध किया जिसे भारत ने नजरंदाज करते हुए अपना काम जारी रखा। उसी का लाभ ये हुआ कि चीन के आक्रामक और संदेहास्पद रवैये को भांपकर भारत ने अत्यंत तत्परता से पूरे लद्दाख क्षेत्र में चीनी सीमा पर जवाबी सैन्य जमावड़ा करते हुए उसे चौंका दिया। ये कहना पूरी तरह सही होगा कि चीन को ऐसी उम्मीद नहीं थी। वह सोचता था कि भारत उससे बातचीत की पहल करेगा लेकिन बजाय इसके हमारी सेनाओं ने युद्ध करने की तैयारी कर ली। चीन को उम्मीद थी कि अक्टूबर में सर्दियां शुरू के पहले ही भारत कुछ टुकड़ियों को छोड़कर बाकी को पीछे हटा लेगा किन्तु चीनी इरादों का सही पूर्वानुमान लगाते हुए भारत ने ये निर्णय कर लिया कि अब लद्दाख में भी सियाचिन जैसी पूर्णकालिक सैन्य तैनाती रखी जावेगी । जिससे चीन दबे पाँव कोई हरकत न कर सके। और इसका त्वरित लाभ भी दिखाई दिया जब बीते 29-30 अगस्त को पेंगांग झील इलाके में चीनी घुसपैठ को नाकाम करने के साथ ही भारत ने रणनीतिक महत्व की कुछ चोटियों से चीनी कब्जे को हटाकर अपना आधिपत्य कायम कर लिया। इसके बाद ही बीते सप्ताह मास्को में चीन के रक्षा मंत्री ने भारत के रक्षा मंत्री से मुलाकात करने की इच्छा व्यक्त की और दोनों के बीच दो घंटे बातचीत हुई। सैनिक अधिकारी भी निरंतर मिलते रहते हैं। लेकिन चीन ने गत दिवस एक बार फिर घुसपैठ की हिमाकत की जिसके चलते दोनों तरफ से दशकों बाद गोलियाँ चलने की जानकारी आई। हालांकि किसी के हताहत होने की खबर नहीं है और ये भी सुनाई दिया कि सांकेतिक तौर पर चेतावनी स्वरूप गोलियां चलीं। लेकिन ये बात स्पष्ट हो गई कि लद्दाख मोर्चे पर अब यद्ध की स्थितियां बन सकती हैं। चीन को पहली बार भारत की तरफ  से इतने जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। सीमा पर चाहे जब उसकी तरफ से होने वाली हरकतों पर भी तकरीबन रोक लग चुकी है। लद्दाख के दुर्गम निर्जन पहाड़ी इलाकों में भारतीय सैनिकों की अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए चीनी सेना गुपचुप कब्जा करने की जो कोशिश किया करती थी वह अब संभव नहीं रहा। इस कारण पहली बार वह तनाव में नजर आ रहा है। और कभी बातचीत से मसला हल करने की बात कहता, तो कभी धमकी देने से बाज नहीं आता। बहरहाल उसे ये अंदाज नहीं रहा होगा कि भारत व्यापार और सैन्य दोनों मोर्चों पर एक साथ उसे चुनौती देने का साहस करेगा। कोरोना संक्रमण फैलाने के लिए पूरी दुनिया में संदेह के घेरे में आने के बाद चीन भारत के साथ सीमा विवाद के जरिये दुनिया का ध्यान भटकाने की जो कोशिश कर रहा था वह उसे उल्टी पड़ गई प्रतीत हो रही है। लेकिन भारत को इस बारे में जरा सी भी खुशफहमी नहीं पालना चाहिए क्योंकि चीन दुनिया भर में हो रही किरकिरी से बौखलाकर भारत के साथ सीमित युद्ध का जोखिम उठा सकता है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस कारण फिलहाल उसका बहुत भरोसा करना भूल होगी। ऐसे में भारत ने अभी तक जिस तरह का दृढ़ रवैया अपनाया वह जारी रखा जाना जरूरी है।  बेहतर होगा भारत अब तिब्बत में मानव अधिकारों के हनन का मामला संरासंघ में उठाना शुरू करे जो चीन की दुखती रग है। आखिर जब वह जम्मू-कश्मीर को लेकर विश्व संगठन में चाहे जब भारत के विरुद्ध प्रस्ताव ला सकता है तब हम भी वैसा क्यों नहीं कर सकते।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 7 September 2020

गरीबों को घटिया चावल बाँटने वाले मानवता के दुश्मन



मप्र में घटिया चावल वितरण के मामले की जाँच आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दी गयी है। मंडला और बालाघाट जैसे आदिवासी बहुल जिलों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वितरित होने वाले घटिया चावल को लेकर ज्योंही वास्तविकता सामने आई त्योंही हड़कंप मच गया। राजनीतिक चिल्लपुकार और आरोप-प्रत्यारोप भी चल पड़े। सरकार जब देखती है कि भ्रष्टाचार के किसी मामले में वह कटघरे में खड़ी हो सकती है तब वह बिना देर लगाये जाँच बिठा देती है। ऐसा ही इस प्रकरण में हुआ। राशन की दुकानों से बांटा जाने वाला अनाज गरीबों को पेट भरने के लिए दिया जाता है। कोरोना काल में केंद्र सरकार ने जिस तेजी से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये गरीबों को मुफ्त और सस्ती दरों पर गल्ला उपलब्ध करवाया उसकी वजह से देश अराजकता से बच गया वरना जो होता उसकी कल्पना तक से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मप्र में सामने आये घटिया चावल के मामले में राज्य आपूर्ति निगम, चावल मिल संचालक, खाद्य विभाग के बड़े अधिकारी एवं उनकी सरपरस्ती करने वाले कौन- कौन लोग जिम्मेदार हैं ये सब तो जांच से पता चल सकेगा लेकिन इस तरह के मामले महज आर्थिक भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रखे जाने चाहिये। गरीबों के लिए सरकार द्वारा संचालित राशन व्यवस्था लोक कल्याणकारी राज्य के मूलभूत कर्तव्यों में मानी जाती है। राजतंत्र के दौर में भी जिन राजाओं को अच्छा और लोकप्रिय शासक माना गया वे अकाल या अन्य किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय प्रजा का उदर पोषण करने के लिए अन्न भण्डार खोल दिया करते थे। आजाद भारत में गरीबी की हालत में बसर करने वाले करोड़ों लोगों को सार्वजानिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ता अनाज, शक्कर, कैरोसिन वगैरह देने की व्यवस्था लम्बे समय से चली आ रही है। राशन की दूकान नामक ये प्रणाली हमारे देश के माथे पर एक धब्बा है क्योंकि बीते सात दशक में भी हम गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य को केवल चुनावी घोषणापत्र तक ही सीमित रख सके। और तो और करोड़ों लोग गरीबी रेखा से भी नीचे जीवन गुजार रहे हैं। कुछ समय पहले तक विश्व की सबसे तेज विकसित हो रही अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी के आंकड़े लज्जित करने वाले हैं लेकिन ये ऐसी हकीकत है जिसे झुठलाना सच्चाई से मुंह मोड़ना  है। उस दृष्टि से होना तो ये चाहिये कि राशन नामक ये व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी रहे। सार्वजानिक वितरण प्रणाली के लिए जिन विभागों की सेवाएँ ली जाती हैं उनको भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए । लेकिन दुर्भाग्यवश वे ही हमारे देश के भ्रष्टतम महकमों में से हैं। मप्र का संदर्भित चावल घोटाला इस तरह का पहला नहीं है। शायद ही कोई ऐसा प्रदेश या जिला होगा जहाँ अनाज की सरकारी खरीदी, उसके भण्डारण और वितरण में नीचता की हद तक भ्रष्टाचार न होता हो। इसके लिए केवल सरकारी अधिकारी अकेले जिम्मेदार नहीं होते। सत्ता में बैठे नेताओं से लेकर राशन की दूकान संचालित करने वाले तक एक गिरोह जैसा बना हुआ है। ईमानदारी से सर्वेक्षण किया जाए तो ये बात सामने आये बिना नहीं रहेगी कि देश में लाखों ऐसे गरीब मिल जायेंगे जो राशन कार्ड बनवाने के लिए भटक रहे हैं जबकि उनसे ज्यादा बोगस राशन कार्ड बने हुए हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के नाम पर जितना गोलमाल प्रारंभ से चला आ रहा है वह बोफोर्स, टेलीकाम, कोयला जैसे तमाम घोटालों पर भी भारी पड़ेगा। लेकिन जैसा शुरू में कहा गया कि इस व्यवस्था में होने वाला भ्रष्टाचार केवल आर्थिक न होकर मानवता के विरुद्ध घिनौना अपराध है। गरीबों को घटिया किस्म का चावल देने के मामले में जो भी कसूरवार साबित हो उसे इतनी कड़ी सजा दी जानी चाहिए जिससे भविष्य में गरीबों की आड़ में अपना घर भरने के पहले कोई हजार बार सोचे। मप्र सरकार को चाहिए कि वह इस मामले को सीबीआई के हवाले करे जिससे जांच एजेंसी को राज्यस्तरीय दबाव से मुक्त रखा जा सके। जिन लोगों ने ये पाप किया है उनके भीतर चूँकि इंसानियत मर चुकी है इसलिए उनको मिलने वाला दंड भी सामान्य से हटकर होना चहिये।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 September 2020

वाहन टैक्स जैसी मेहरबानी बिजली बिलों पर भी करे शिवराज सरकार



हमारे देश में निर्णय प्रक्रिया में विलम्ब से अच्छे फैसले भी समय पर लागू नहीं हो पाते। ताजा उदाहरण है मप्र में निजी बस संचालकों द्वारा वाहन टैक्स माफ किये जाने की मांग को पूरा किया जाना। स्मरणीय है निजी बस सेवा संचालक ये मांग कर रहे थे कि प्रदेश सरकार 1 अप्रैल से 31 अगस्त तक का वाहन टैक्स माफ  करे क्योंकि इस दौरान बसें खड़ी रहीं। बीते दिनों ही राज्य सरकार ने एक सितम्बर से बसें चलाने की अनुमति दे दी थी लेकिन बस संचालक बिना टैक्स माफी के इसके लिए राजी नहीं हुए और हड़ताल पर जाने की घोषणा भी कर दी। आखिरकार गत दिवस मुख्यमंत्री ने तदाशय का फैसला किया। उसके बाद हड़ताल वापिस लेते हुए बसों का संचालन आज से प्रारंभ किये जाने की जानकारी बस संचालकों द्वारा दी गई। लेकिन साथ में ये भी जोड़ दिया गया कि जिन मार्गों पर सवारियां नहीं मिलेंगी वहां सेवाएँ रोक दी जायेंगीं। उल्लेखनीय है पहले भी राज्य सरकार द्वारा आधी सवारियों के साथ बसें चलाने की अनुमति दी गई थी किन्तु उसे घाटे का सौदा मानकर बस संचालकों ने अस्वीकृत कर दिया। अब पूरी सवारियों के साथ परिचालन की बात मान ली गई। राज्य सरकार ने 121 करोड़ का टैक्स माफ कर दिया। गतिरोध खत्म होने से प्रदेश के उन इलाकों में यात्री परिवहन प्रारम्भ हो सकेगा जहाँ आवागमन के दूसरे साधन उपलब्ध नहीं थे। जिनके पास अपने वाहन नहीं हैं वे परिवहन के अन्य महंगे साधनों का उपयोग नहीं कर पा रहे थे। छोटे शहरों और कस्बों से गरीब मजदूर, छोटे व्यापारी, मरीज आदि आसपास के स्थानों पर जाने के लिए सार्वजनिक बस सेवा का उपयोग करते हैं। लेकिन मप्र में पहले लॉक डाउन और बाद में संचालकों और सरकार के बीच चल रही खींचातानी से बसों के पहिये जाम रहे। हालांकि अभी भी बस मालिक किराये में अच्छी खासी वृद्धि करने की जिद पकड़े हुए हैं जिससे बीते पांच महीनों का घाटा पूरा किया जा सके। बहरहाल ये तो हुआ कि इस फैसले के बाद प्रदेश में यात्री परिवहन में आ रही दिक्कत से आम जनता को राहत मिलेगी तथा जनजीवन और कारोबार अपने पुराने स्वरूप में लौट सकेगा। लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में विचारणीय प्रशन ये है कि जब सरकार को टैक्स माफ  करना ही था तब इतनी हीलाहवाली क्यों की गई? ऐसे मामलों में सरकार का रवैया ज्यादातार टरकाऊ होता है। इसकी एक वजह मंत्रियों के सलाहकार बने बैठे नौकरशाह भी बनते हैं जो अपनी ऐंठ में पहले- पहल किसी भी बात पर नकारात्मक रुख ही दिखाते हैं। उन्हें ये लगता है कि आसानी से किसी मांग को स्वीकार कर लेने से उनका रुतबा कम हो जाएगा। संदर्भित मामले में भी यदि बस संचालकों की मांग अनुचित थी तो उसे अभी भी नहीं माना जाना चाहिए था। और यदि सही थी तब इतना विलम्ब क्यों किया गया जिसकी वजह से सुदूर अंचलों में रह रहे साधनहीन लोगों को अकल्पनीय परेशानी और नुकसान उठाना पड़ा। ऐसा लगता है प्रदेश में होने वाले दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा उपचुनावों के कारण ये रहमदिली दिखाई गई। जनसंपर्क पर निकले नेताओं को जनता ने खरी-खोटी सुनाई होगी तब जाकर सरकार बहादुर के कान में जूँ रेंगी। इसी तरह का मामला बिजली वसूली का है। लॉक डाउन के दौरान कारखाने, व्यावसायिक प्रतिष्ठान, सिनेमा, शॉपिंग माल, होटल, रेस्टारेंट आदि महीनों बंद रहे। इस कारण उनकी बिजली खपत न के बराबर रह गई। कुछ महीनों तक तो वसूली स्थगित रखी गयी लेकिन ज्योंही लॉक डाउन में छूट दी जाने लगी त्योंही विद्युत मंडल ने ये जानते हुए भी कि अभी तक उपरोक्त में से अनेक व्यवसाय या तो प्रारंभ नहीं हो सके या फिर उनका कारोबार पटरी पर नहीं आ पाया है, विशुद्ध पठानी शैली में वसूली शुरू कर दी। उनसे न्यूनतम प्रभार के नाम पर अनाप-शनाप राशि वसूली जा रही है। जो औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर थोपे गये जजिया कर जैसा ही है। जो कारोबारी बिल का भुगतान करने में थोड़ी सी भी देरी करता है, उसकी बिजली काटकर ब्लैकमेल किया जा रहा है। चूँकि उद्योगपति और व्यापारी बस संचालकों की तरह एकजुट नहीं हैं इस वजह से उन्हें पूरी तरह उपेक्षित किया जाता है। प्रदेश सरकार के सामने जो आर्थिक संकट है उससे कोई इंकार नहीं करेगा । लेकिन उसे ये सोचना चाहिए कि सरकार का राजस्व बढ़ाने के लिए कारोबारियों के कन्धों पर पड़ रहे बोझ को हल्का करना बुद्धिमत्ता होगी। जिस तरह आज से बसों का परिचालन शुरू होने से प्रदेश भर में डीजल की बिक्री बढ़ेगी जिससे उस पर लगाए गये टैक्स के रूप में मिलने वाला राजस्व बढ़ जायेगा जो बीते पांच महीनों से रुका पड़ा था। इससे 121 करोड़ के वाहन टैक्स माफी की भरपाई आसानी से हो जायेगी। ऐसी ही बुद्धिमत्ता बिजली बिलों के मामले में भी दिखाई जाए तो तमाम रुके हुए कारोबार गति पकड़ लेंगे और राजस्व की आवक में स्वाभाविक और सुनिश्चित वृद्धि हो सकेगी। शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। इस कारण उन्हें शासन-प्रशासन के साथ जनता के सभी वर्गों मसलन व्यापारी, उद्योगपति, किसान, मजदूर, नौकरपेशा, पेंशनधारी, बेरोजगार आदि की परेशानियों का अच्छी तरह से एहसास है। बेहतर हो वे कोरोना संकट के इस दौर में अपने अनुभव और संवेदनशीलता से लोगों का दिल जीतने के साथ ही प्रदेश की छवि एक ऐसे राज्य के तौर पर स्थापित करें जहां जनहित के फैसले लेने में देर नहीं की जाती। यदि वे ऐसा कर सके तो प्रदेश में निवेशक सम्मेलनों पर करोड़ों रूपये फूंकने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 September 2020

मोबाइल की रिंगटोन से नहीं रुकने वाला कोरोना का फैलाव




देश में कोरोना संक्रमण को लेकर अजीबोगरीब स्थिति बनी हुई है। अधिकृत आंकड़ों के अनुसार नए संक्रमण रोजाना तेजी से बढ़ते जा रहे हैं वहीं ठीक होने वालों का प्रतिशत भी तेजी से बढ़कर 77 के पार जा पहुंचा है। जबकि मरने वालों का आंकड़ा घटते हुए 1.77 फीसदी हो गया है। स्वस्थ होने वाले संक्रमितों की आशाजनक संख्या और कम मृत्यु दर आश्वस्त तो कर रही है लेकिन जिस गति से नए मामले आते जा रहे हैं उससे ये डर भी लग रहा है कि इस पर नियन्त्रण न हुआ तो कोरोना वाकई महामारी में बदल जाएगा।  अभी तक कोरोना के टीके (वैक्सीन) को लेकर नये-नये अनुमान लग रहे हैं लेकिन ईमानदारी की बात ये है कि दिसम्बर के पूर्व उसकी उम्मीद करना खुद को धोखे में रखना है। और फिर हमारे देश में आबादी का आकार बहुत बड़ा होने से टीका उपलब्ध होने के बावजूद उसे लगाने में लम्बा वक्त लग जायेगा। तब तक कोरोना को रोकना हर किसी का फर्ज है। अर्थव्यवस्था को प्राणवायु देने के लिए सरकार ने लॉक डाउन की शक्ल में लगाये तमाम प्रतिबन्ध तकरीबन शिथिल कर दिए हैं। उद्योग-व्यवसाय में भी रफ़्तार देखी जा सकती है। बाजारों में जनता की भीड़ भी जनजीवन सामान्य होने का संकेत है। परिवहन भी शुरू हो गया है। रेलगाड़ियों का परिचालन क्रमश: बढ़ाया जा रहा है तथा हवाई सेवाएं भी काफी हद तक बहाल की जा चुकी हैं। निर्माण गतिविधियाँ भी जोर पकड़ने लगी हैं। अच्छे मानसून ने कृषि क्षेत्र में उत्साह भर दिया है । अनुमान के अनुसार रिकॉर्ड खरीफ  फसल की उम्मीद की जाने लगी है। इसका अनुकूल असर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। लेकिन कोरोना के प्रकोप को नहीं रोका जा सका तब समूचा आशावाद धरा रह जाएगा। प्रधानमंत्री सहित बाकी जिम्मेदार लोग भी इस बात पर आये दिन संतोष जताया करते हैं कि हमारे देश में ठीक होने वालों का आंकड़ा जहां निरंतर बढ़ रहा है वहीं मरने वालों का प्रतिशत नीचे जा रहा है। इसे चिकित्सा प्रबंधों की सफलता मान लेना गलत नहीं है लेकिन इस सच्चाई से भी तो मुंह नहीं फेरा जा सकता कि नए संक्रमणों की संख्या सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है और यही हाल रहा तो एक हफ्ते से पहले ही प्रतिदिन एक लाख से ज्यादा नए संक्रमित सामने आने लगेंगे। कुछ सूत्रों के अनुसार ग्रामीण इलाकों में भी कोरोना ने दबिश दे दी है। ठीक होने वालों की तुलना में नये संक्रमणों की ज्यादा संख्या से अस्पतालों की क्षमता जवाब देने की स्थिति में आ सकती है। देश की राजधानी दिल्ली में जहां कुछ दिन पहले तक कोरोना को नियंत्रित किये जाने की खुशी मनाई जाने लगी थी वहां बीते कुछ दिनों में हजारों नये मरीज निकलने से चिंता के बादल फिर मंडराने लगे हैं। देश के अन्य हिस्सों से भी कोरोना के पलटवार की खबरें निरंतर मिल रही हैं। इधर केंद्र सरकार ने सितम्बर माह से लॉक डाउन के तहत लगाये अधिकतर प्रतिबन्ध खत्म कर दिए हैं। एक राज्य से  दूसरे में जाने के लिए किसी पूर्वानुमति की जरूरत नहीं रही। यात्री रेल गाड़ियों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है। होटल, रेस्टारेंट, सभागारों को भी खोल दिया गया है। दिल्ली में 9 सितम्बर से बार भी प्राम्भ किये जा रहे हैं। लेकिन ये सब होने के बाद भी कोरोना के फैलाव को रोकने की लिए की जा रही सख्ती के प्रति अव्वल दर्जे का उपेक्षा भाव न केवल सरकार अपितु जनता के स्तर पर भी देखा जा सकता है जो घातक साबित हो रहा है। पुलिस मास्क नहीं पहिनने वालों से जुर्माना वसूलकर उसको अपनी उपलब्धि बताती फिरती है। जिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक उसके आंकड़े प्रसारित किये जाते हैं । लेकिन जनता को मास्क एवं शारीरिक दूरी बनाये रखने के लिए जरूरी प्रेरणा देते हुए अनुशासित करने का अभियान केवल मोबाईल फोन की रिंग टोन तक सिमटकर रह गया है। ऐसे में ये जरूरी प्रतीत हो रहा है कि भले ही लॉक डाउन को शिथिल किया जाता रहे किन्तु कोरोना से बचाव हेतु जिन सावधनियों को लेकर प्रारंभ में बेहद जागरूकता देखी जा रही थी उनके बारे में समाज का बड़ा तबका अव्वल दर्जे की लापरवाही दिखा रहा है और उसी का परिणाम नये संक्रमितों की संख्या में प्रतिदिन होने वाली वृद्धि के रूप में देखने मिल रहा है। अब जबकि साप्ताहिक लॉक डाउन को भी खत्म कर दिया गया है तब कोरोना से बचाव के मान्य तरीकों को अपनाने के प्रति आत्मप्रेरणा का भाव उत्पन्न किया जाना समय की मांग ही नहीं वरन अनिवार्यता भी है। सरकार का समूचा ध्यान अर्थव्यवस्था को दोबारा चुस्त-दुरुस्त करने के अलावा चीन के साथ सीमा पर चल रहे तनाव से निपटने में लगा है। अनेक राज्यों में बाढ़ से पैदा हुई समस्याएं भी उसका ध्यान आकर्षित कर रही हैं। इनके अलावा उसके रोजमर्रे के काम भी बीते छह महीने में काफी पिछड़ गये हैं। ऐसे में रास्वसंघ जैसे स्वयंसेवी संगठनों को आगे आकर कोरोना से बचाव के प्रति लोगों में दायित्वबोध पैदा करने का अभियान चलाना चाहिए। लॉक डाउन के दौरान जरूरतमंदों की सहायता करने की स्वप्रेरित भावना लिए अनगिनत कोरोना योद्धा सामने आये थे लेकिन उनमें से अधिकतर अब नजर नहीं आते। बेहतर हो राजनीतिक दल भी अपने कार्यकर्ताओं को इस हेतु प्रेरित करें। कोरोना के इलाज की व्यवस्था करना सरकार और चिकित्सकों का काम है लेकिन उसकी रोकथाम के लिए जिन सावधानियों का पालन अपेक्षित और आवश्यक है उसके प्रति समाज की रचनात्मक शक्तियों को मोर्चा संभालना होगा। कोरोना का टीका जब आयेगा तब आयेगा किन्तु तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो सामुदायिक संक्रमण की भयावह स्थिति को रोक पाना असम्भव हो जाएगा। देश की राजधानी दिल्ली में जिस तरह से कोरोना पहले से भी ज्यादा ताकत से आ धमका है वह पूरे देश के लिए चेतावनी भरा संकेत है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 September 2020

पहली बार चीन को उसी की भाषा में जवाब दे रहा भारत



लद्दाख से अरुणाचल तक चीन से लगी सीमा पर भारत द्वारा बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती युद्ध पूर्व के संकेत दे रही है। बीते तीन - चार दिनों में भारतीय सेना ने पेंगांग झील के निकट स्थित पहाड़ियों में अनेक ऐसी जगहों पर अपना डेरा जमा लिया जिन्हें रणनीतिक महत्व का माना जा रहा है। ये संभवत: पहला अवसर होगा जब भारतीय सेना ने वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर आक्रामक रुख अपनाते हुए आगे बढ़कर कब्जे का साहस किया। अन्यथा हमेशा यही सुनने मिलता था कि चीनी सैनिक हमारे भूभाग में घुस आये और हमारे सैनिक उन्हें पीछे धकेलने में जुटे हैं। राजनयिक स्तर पर भी हम विरोध करते थे जिसके जवाब में चीन सदैव उपेक्षापूर्ण रवैया दिखाता था। ये भी सुनने में आया है कि लद्दाख के पहाड़ी अंचल में सीमा का विधिवत निर्धारण न होने से चीन चुपचाप आगे बढ़ता जाता था और 1962 के बाद भी धीरे - धीरे उसने हमारे सैकड़ों किलोमीटर भूभाग पर कब्जा कर लिया। सही बात ये है कि चीन के साथ भले ही 1962 के बाद औपचारिक रूप से युद्ध नहीं हुआ लेकिन चीन ने पूरे सीमा क्षेत्र में जिस तरह का विकास किया उसकी तुलना में भारत बहुत पीछे रहा। लेकिन मोदी सरकार ने बीते छह साल में वास्तविक नियन्त्रण रेखा तक सड़क, पुल, हवाई अड्डा बनाने के बाद मिसाइलें, राडार, टैंक आदि तैनात कर दिए। बीते जून माह में हुए तनाव के बाद बड़े पैमाने पर सैन्य बटालियनें वहां भेजी गईं जिनमें पहाड़ों पर जंग लडऩे के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक दस्ते भी हैं। इस बार भारत ने सर्दियों में भी पर्याप्त सैन्यबल की मौजूदगी सुनिश्चित कर दी है जिससे बर्फबारी का लाभ लेकर चीन घुसपैठ न कर सके। चीन के साथ तनाव के चलते ये पहला मौका है जब भारत के उच्च सैन्य अधिकारी खुले आम कह रहे हैं कि यदि चीन की हरकतें नहीं रुकीं तो भारत युद्ध का विकल्प चुनने से भी नहीं हिचकेगा। हालाँकि दोनों तरफ के सैन्य अधिकारी निरंतर बातचीत भी कर रहे हैं किन्तु चीन अपनी सेना को दबे पाँव भारतीय भूभाग में अतिक्रमण करने के लिए भी भेजता रहता है। लेकिन हाल ही में उसकी ऐसी ही कोशिश को हमारे सैनिकों द्वारा विफल करते हुए सैन्य महत्व की चीन के कब्जे वाली पहाड़ियों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। उसके बाद चीन के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया में एक तरफ  तो 1962 से भी गम्भीर नतीजों की धमकी थी लेकिन दूसरी तरफ बातचीत के जरिये विवाद सुलझाने की अपील के साथ भारतीय सेना द्वारा की गई आक्रामक कार्र्वाई की शिकायत भी। जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार अभी तक चीन झगड़ा झूठा कब्जा सच्चा वाली नीति पर चलते हुए वार्ता की टेबिल पर अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में रहा करता था लेकिन बीते कुछ समय से भारत की तरफ से राजनयिक और सैन्य अधिकारियों के बीच वार्ता के अलावा सैन्य मोर्चे पर भी जिस तरह से कड़ा रवैया अख्तियार किया गया उससे हमारी सेना का मनोबल तो बढ़ा ही लगे हाथ विश्व बिरादरी में भी भारत की दृढ़ता का खासा प्रचार हुआ। दुनिया की सभी बड़ी शक्तियां जिस तरह से हमारे साथ खड़ी दिखाई दे रही हैं उससे भी हमारा साहस बढ़ा है। आर्थिक मोर्चे पर भी कल एक बार फिर भारत ने जोरदार हमला बोलते हुए सौ से ज्यादा चीनी एप प्रतिबंधित कर दिए जिनमें बेहद लोकप्रिय पबजी भी है। ये एक तरह का सन्देश है कि भारत अब उसकी प्रत्येक हरकत का उसी की शैली में उत्तर देने में संकोच नहीं करेगा। इसमें दो राय नहीं है कि मौजूदा स्थिति बहुत ही नाजुक है। कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है लेकिन भारत ने जिस मुस्तैदी से सेना को सुसज्जित करने का काम किया वह विश्वशक्ति बनने की दिशा में बड़ा कदम है। चीन के सामने आर्थिक और सैनिक दृष्टि से कमजोर होने की अवधारणा को पूरी तरह तथ्यहीन साबित करते हुए भारत ने आँख में आँख डालकर बात करने का जो हौसला दिखाया उसी का परिणाम है कि व्यापार और उद्योग जगत ने भी अपने मुनाफे को दरकिनार करते हुए स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने की तरफ  कदम बढ़ा दिए। सीमा से आ रही खबरों के कारण आम देशवासी का आत्मविश्वास प्रबल हुआ है। हालांकि युद्ध से जितना बचा जा सके उतना अच्छा किन्तु यदि देश की सुरक्षा और सम्मान के लिए वह आवश्यक हो जाए तब पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर दुश्मन पर हमला करना ही ठीक होता है। प्रधानमंत्री ने अग्रिम मोर्चे पर जाकर चीन की विस्तारवादी नीति के दिन लदने की बात कही थी। रक्षामंत्री और सेना के सभी वरिष्ठतम अधिकारी निरंतर मोर्चे पर जाकर सेना का मनोबल बढ़ा रहे हैं। सर्दियों में भी पूरी चौकसी का इंतजाम कर दिया गया है। चीन को लगातार ये जताया जा रहा कि याचना नहीं अब रण होगा, संग्राम बड़ा भीषण होगा। जैसे संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार चीन के भीतर राष्ट्रपति जिनपिंग की राजनीतिक स्थिति पहले जैसी नहीं रही। दक्षिणी चीनी समुद्र में अमेरिका, जापान, भारत और आस्ट्रेलिया की संयुक्त मोर्चेबंदी से उन पर दबाव बढ़ा है। अभी तक दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन में भारत सदैव चीन के सामने आने से बचता रहा लेकिन पहली बार ये देखने मिल रहा है कि भारत ने उसके साथ उसी की जुबान में बात करने का साहस दिखाया जिसकी वजह से दक्षिण एशिया के कूटनीतिक समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं। अपने आर्थिक स्वार्थवश जिस अमेरिका और उसके साथ पश्चिम के विकसित देशों ने चीन को आर्थिक महाशक्ति बनाने में सहायता की वे सब अपने निर्णय पर पछताते हुए कदम पीछे खींचने लगे हैं। भारत के लिए यह शुभ संकेत हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 2 September 2020

पहली तिमाही की निराशा के बावजूद उम्मीदें खत्म नहीं हुईं



कोरोना काल में पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल छा गये हैं। जिन देशों में संक्रमण ढलान पर आने के बाद कारोबार पटरी पर आता दिख रहा था वहां कोरोना का दूसरा हमला होने से स्थितियां फिर गड़बड़ा गईं। जहाँ तक भारत का सवाल है तो यहाँ अभी तक कोरोना का चरम नहीं आया जिसकी वजह से पक्के तौर पर ये अनुमान लगाना कठिन है कि उस पर नियंत्रण कब तक हो सकेगा ? हालाँकि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने भरोसा दिलवाया है कि दीपावली अर्थात नवम्बर मध्य तक हालात काबू में आ जायेंगे। वहीं दूसरी तरफ दिसम्बर तक भारतीय और विदेशी वैक्सीन उपलब्ध होने की संभावना से भी उम्मीदें बनी हुई हैं। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो अर्थव्यवस्था के वर्तमान आंकड़े और भविष्य को लेकर लगाये जा रहे अनुमान आर्थिक विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही अर्थात अप्रैल से जून में जीडीपी (सकल घरेलू उत्पादन) के जो आंकड़े जारी हुए उनके मुताबिक बीते वर्ष की तुलना में लगभग 24 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी। नया वित्तीय वर्ष चूँकि लॉक डाउन से ही शुरू हुआ तथा दो महीने तक उद्योग-व्यवसाय कुछ अपवादों को छोड़कर ठप्प ही रहा इसलिए सकल घरेलू उत्पादन में गिरावट आना अवश्यम्भावी था लेकिन 24 फीसदी गिरावट की खबर आते ही सर्वत्र चिंता का वातावरण बन गया। विपक्ष सरकार पर चढ़ बैठा। आर्थिक विशेषज्ञ भी संभल- संभलकर बोल रहे हैं लेकिन ये बात भी कही जा रही है कि पूरी तरह से लॉक डाउन रहने से ये आंकड़ा स्वाभाविक ही है। इसी के साथ विभिन्न अनुमानों में ये कहा जा रहा है कि दूसरी, तीसरी और अंतिम तिमाही में सकल घरेलू उत्पादन में निरंतर वृद्धि होगी। लेकिन अंत में पूरे वर्ष का औसत निकालने पर आंकड़ा तकरीबन 11 फीसदी की गिरावट पर रुकेगा। दूसरी तरफ  कुछ क्षेत्रों में चौंकाने वाले समाचार मिल रहे हैं। निराशाजनक स्थिति के बावजूद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है और विदेशी मुद्रा का भंडार भी सर्वकालीन उच्चतम स्तर पर बना हुआ है। यही नहीं तो अमेरिकी डालर के मुकाबले भारतीय रुपया मजबूत हो रहा है। बीते माह में दो पहिया और चार पहिया वाहनों की बिक्री ने गत वर्ष के आंकड़ों को भी पीछे छोड़ दिया। इसके पहले ट्रैक्टरों की बिक्री भी  जबरदस्त रही। बीते कुछ महीनों में मोबाईल, लैपटॉप और टैबलेट आदि की आशातीत बिक्री ने भी अर्थव्यवस्था के पुन: गतिशील होने का प्रमाण दिया। ये खबर भी आ रही है कि देश का विनिर्माण (मैन्युफेक्चरिंग) सेक्टर भी तेजी से पुरानी रंगत पर लौट चला है। लेकिन अभी भी पर्यटन और परिवहन के क्षेत्र में सुस्ती बनी हुई है। कोरोना के कारण चिकित्सा सुविधाओं में अप्रत्याशित वृद्धि की वजह से सरकार के पास धन की कमी आ गयी है । कारोबार ठंडा रहने से राजस्व की आय भी अनुमान से बहुत पीछे बनी हुई है। इसका असर विकास कार्यों पर भी देखा जा सकता है जिसके परिणामस्वरूप बाजार में मांग और रोजगार दोनों में गिरावट देखी जा रही है। लेकिन कुछ लोगों का अनुमान है कि पहली तिमाही जरूर पूरी तरह से निराशाजनक रही लेकिन 135 करोड़ से भी ज्यादा आबादी वाले देश में उपभोक्ताओं की विशाल संख्या अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने में बहुत सहायक होगी। दुनिया के अनेक विकसित देश भी भारत की विशाल आबादी में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं। सबसे अच्छी बात ये हुई कि इस बहाने आत्मनिर्भरता के प्रति रूचि जागी है। कोरोना को लेकर चीन के संदिग्ध हो जाने के कारण उसके सामान के प्रति अरुचि सीमा पर तनाव की वजह से और बढ़ गई। इसे देखते हुए भारतीय उद्योगों को संजीवनी मिलने के आसार बढ़ गये हैं। लेकिन इसके लिये सरकार को थोड़ी दरियादिली दिखानी होगी। घरेलू कारोबार तभी उन्नति करता है जब उसे राज्याश्रय मिले। हालांकि केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारें इस समय तंगी में हैं लेकिन यही समय है जब कारोबारी जगत को अधिकतम संरक्षण देकर रोजगार की स्थिति को सुधारा जावे। ऐसा होने पर बाजारों में मांग बढ़ेगी और सरकार का राजस्व भी अपेक्षित स्तर पर पहुंचेगा। मौजूदा स्थिति में तो राजकोषीय घाटा वर्ष भर के अनुमान के करीब जा पहुंचा है। दीपावली सीजन के पहले से बाजारों में जो चहल-पहल बढ़ती है वह इस साल शायद न दिखे। लॉक डाउन में लगातार शिथिलता के बावजूद चूंकि शीतकालीन पर्यटन की संभावना काफी कम हैं इसलिए अर्थव्यवस्था का एक बड़ा सेक्टर तीसरी तिमाही में भी उबर नहीं सकेगा। फिर भी शादी-विवाह में लोगों की उपस्थिति पर लगी सीमा को बढ़ा देने का असर तो होगा ही। यूँ भी बरसात के बाद बाजार उठते हैं। संयोगवश इस वर्ष मानसून ठीक चल रहा है। और खेती का क्षेत्र भी अच्छी खबरें दे रहा है। ये सब देखते हुए कह सकते हैं कि अर्थव्यवस्था सघन चिकित्सा कक्ष से बाहर आने के बाद भी अभी आंशिक स्वस्थ होने की स्थिति में ही है। फिर भी उसे लेकर निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करना ठीक नहीं है। भारत ने ऐसे अवसरों पर सदैव आश्चर्यजनक वापिसी की है। राजनीतिक स्थिरता की वजह से भी निर्णय प्रक्रिया काफी अच्छी है। इस सबके कारण ये सोचना गलत न होगा कि वित्तीय वर्ष समाप्त होते तक भारतीय अर्थव्यवस्था संतोषजनक स्थिति में आ जायेगी। यद्यपि उसकी सेहत सुधरने में अभी एक वर्ष और लगेगा किन्तु कोरोना कई मामलों में वरदान भी साबित हुआ है क्योंकि इसकी वजह से देश की सोई हुई उद्यमशीलता जाग्रत हो सकी, जो बड़ी उपलब्धि है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 September 2020

प्रणब दा : देश अभी उनसे बहुत कुछ सुनना चाहता था




यूँ तो मृत्यु उपरांत हर किसी के बारे में अच्छी-अच्छी बातें कही जाती हैं लेकिन बीती शाम दिवंगत हुए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बारे में जो कुछ कहा और सुना जा रहा है वह महज औपचरिकता न होकर सच्चाई है। स्व. मुखर्जी राजनीति में न  आते तब भी अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण जिस क्षेत्र में जाते उसका शिखर स्पर्श किये बिना  नहीं रहते। उन्हें महानता विरासत में नहीं  मिली और न उन पर थोपी गई अपितु उन्होंने अपनी मेधा और मेहनत से उसे अर्जित किया था। साधारण परिस्थिति से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद और सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न तक की उनकी यात्रा में उनकी योग्यता और क्षमता पर उनके वैचारिक विरोधी भी सवाल नहीं उठा सके। स्व. अटल जी की तरह से ही प्रणब बाबू भी दलीय सीमाओं से परे जाकर अपनी विद्वता और ज्ञान के कारण सम्मानित हुए। भारतीय राजनीति के जिस दौर में वे उसका हिस्सा बने तब उनके बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं थी। जिस बंगाल से वे आये वह वामपंथ का मजबूत किला था और वे कोई जननेता भी नहीं थे। उनकी बौद्धिक प्रतिभा और पैनी नजर के कारण ही राजनीति उन्हें खींचकर लाई वरना दादा शिक्षविद बने रहते। लेकिन एक बार जब वे आ गये तब उन्होने एक कुशल राजनीतिक नेता की भूमिका का बड़े  ही प्रभावशाली तरीके से निर्वहन किया। उनका पुरुषार्थ कई  बार उन्हें प्रधानमंत्री पद के निकट ले गया लेकिन प्रारब्ध ने अवरोध  उत्पन्न कर दिए। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि यदि डा. मनमोहन सिंह की जगह स्व. मुखर्जी प्रधानमंत्री बने होते तब कांग्रेस आज जिस दुरावस्था का शिकार है,  शायद उससे बच जाती। आशय डा. सिंह की योग्यता को कमतर आंकना नहीं अपितु प्रणब दा के संवाद कौशल और साहसिक फैसले लेने की क्षमता को स्वीकार करना है। एक समय ऐसा भी आया जब प्रणब दा को कांग्रेस से बाहर आकर  अपनी अलग पार्टी बनानी पड़ी लेकिन अंत में कांग्रेस को उन्हें वापिस लाना पड़ा और धीरे-धीरे वे उसके विघ्नहर्ता की भूमिका में आ गये। प्रणब मुखर्जी उन गिने चुने राजनेताओं में थे जिनकी अध्ययन और अध्यापन में रूचि अंतत: तक बनी रही और इसीलिये चाहे संसद में हो या अन्यत्र कहीं , उनके भाषण सदैव विषय केन्द्रित और तथ्यपूर्ण होते थे । उनके न रहने से राजनीति में बौद्धिकता की एक और कड़ी टूट गई। एक जमाना था जब बंगाल ज्ञान, विज्ञान, कला, संस्कृति और  आध्यात्म के साथ ही क्रांतिकारी सोच के लिए प्रसिद्ध था। उक्त सभी क्षेत्रों में  एक से एक विभूतियों की गौरवगाथा से बंग भूमि का इतिहास सुशोभित है। उस भद्रलोक की परम्परा को राजनीति में भी प्रणब बाबू ने जिस शालीनता से निभाया उसमें रवीन्द्र संगीत की मधुरता के साथ ही बंगाल के अभिजात्य स्वभाव का भी मिश्रण था। दादा ने एक लम्बी पारी खेली। इंदिरा जी से लेकर राहुल गांधी तक के साथ उन्होंने काम किया। सार्वजानिक जीवन में अनेक दायित्वों का निर्वहन करते हुए वे रायसीना पहाड़ी पर स्थित उस  भव्य प्रासाद तक पहुंचे  जो किसी भी  राजनेता के लिए सन्यास की राह प्रशस्त करता है। उनके कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री का दायित्व ग्रहण किया और बिना संकोच ये स्वीकार किया कि दिल्ली में आने के बाद वे उनके मार्गदर्शक बने। श्री मोदी द्वारा प्रणब दा के चरण स्पर्श करना ये साबित कर गया कि विद्वता का सम्मान करने के हमारे संस्कार आज भी जीवित हैं। उस लिहाज से दादा का चला जाना एक रिक्तता पैदा कर गया। राष्ट्रपति  पद से निवृत्त होने के बाद उन्होने खुद को राजनीति से ऊपर कर  लिया था। सही  मायनों में वे उपदेशक की भूमिका में आ गये थे। रास्वसंघ के आमन्त्रण पर नागपुर जाकर स्वयंसेवकों को संबोधित करने के उनके कदम को लेकर तरह-तरह की टिप्पणियाँ हुईं । लेकिन उस अवसर पर उनका भाषण भारत  के इतिहास और संस्कृति पर एक शोध पत्र के वाचन जैसा था। उनके संस्मरण आत्मकथा के रूप में आ चुके थे पर  अभी देश  उनसे बहुत कुछ और भी सुनना चाहता था। लेकिन उनकी यात्रा का अंत हो गया।  प्रणब मुखर्जी  इंदिरा युग से लेकर 2020  तक राष्ट्रीय परिदृश्य पर पूरी वजनदारी से छाये रहे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी दादा का अवसान एक राष्ट्रीय क्षति है क्योंकि सार्वजनिक जीवन में बढ़ते जा रहे प्रदूषण के बीच वे उस सुगन्धित फूल की तरह थे जिसका सान्निध्य हर किसी को पसंद था।
विनम्र श्रद्धांजलि।

- रवीन्द्र वाजपेयी