Friday, 11 September 2020

सियासी संरक्षण और प्रतिबद्ध प्रशासन से बढ़ा भ्रष्टाचार




देश में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली एक प्रमुख संस्था है केन्द्रीय सतर्कता आयोग। इसे साधारणत: लोग विजिलेंस कमीशन के नाम से जानते हैं। इसका कार्य केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में होने वाले भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को शुरु में ही रोक देना है। सरकारी खरीदी की बड़ी निविदाओं पर भी इस आयोग की पूर्व स्वीकृति ली जाती है। लेकिन भ्रष्ट लोग भी तुम डाल -डाल, हम पात-पात वाली कहावत को चरितार्थ करने में सिद्धहस्त हैं। और इसीलिये सतर्कता के लिये तैनात अमले को चकमा देते हुए भ्रष्टाचारी जमात अपना कारोबार बेधड़क चलाती रहती है। बाद में जो शिकायतें आती भी हैं उनकी जांच और दोषी को दण्डित करने की प्रक्रिया इतनी जटिल और उबाऊ है कि भ्रष्टाचार करने वाला सीना तानकर घूमा करता है। गत दिवस आयोग ने इस विसंगति को दूर करने के लिए सतर्कता आयोग के अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार की शिकायतों संबंधी फाइलों के समयबद्ध निपटारे के लिए आवश्यक कदम उठाये हैं। जांच का काम देख रहे अधिकारियों के पास लंबित फाइलों की 30 सितम्बर तक समीक्षा की जावेगी और फिर जाँच को अंजाम तक पहुँचाने की प्रक्रिया को तेज किया जावेगा। ये खबर वाकई उत्साहित करने वाली है क्योंकि हमारे देश में यूँ तो समस्याओं के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ खड़े हुए हैं लेकिन उनकी सबसे ऊँची चोटी का नाम भ्रष्टाचार है। यदि ये न होता या कम होता तब भारत जाने कभी का विकासशील से विकसित देश बन चुका होता। चूँकि केंद्र सरकार ही देश को संचालित करती है और संघीय ढांचे के बाद भी उसका प्रभाव और उपस्थिति पूरे देश में है , इसलिए उसके विभागों के भ्रष्टाचार से राज्य सरकारों का शासकीय ढांचा भी प्रेरित होता है। इस लिहाज से यदि केन्द्रीय सतर्कता आयोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन के प्रति गंभीर और परिणाममूलक हो जाये तो देश की अधिकतर समस्याएं आसानी से हल हो सकती हैं। राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार ने अपना कब्जा जमा रखा है। उसे रोकने के लिए स्थापित जांच एजेंसियां अक्षम हों ऐसा नहीं है, लेकिन कुछ तो कार्य संस्कृति के अभाव और कुछ राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से जाँच का काम बीरबल की खिचड़ी जैसा होकर रह जाता है। जैसे-तैसे जाँच पूरी हो भी जाये तो फिर बची-खुची कसर पूरी हो जाती है नवाबी चाल से चलने वाली न्यायपालिका में आकर जहां भ्रष्टाचार के मामले भी दीवानी मुकदमों जैसे बरसों-बरस खिंचते रहते हैं। गवाहों और सबूतों पर टिकी न्यायिक प्रणाली शातिर दिमाग वालों के आगे इस कदर मजबूर हो जाती है कि सब कुछ जानते और समझते हुए भी शीघ्र न्याय प्रदान करने में वह असमर्थ है। ऐसे में यदि सतर्कता आयोग निचले स्तर पर ही अपने नाम को सार्थक साबित करते हुए भ्रष्ट लोगों के गिरेबान को पकड़ सके तो भ्रष्ट तत्वों के हौसले कमजोर किये जा सकेंगे। वर्तमान स्थिति तो बेहद चिंताजनक और निराश करने वाली है। यद्यपि इसके लिए राजनीतिक संरक्षण भी कम जिम्मेदार नहीं है जो अपने प्रभाव का बेशर्मी के साथ दुरूपयोग करते हुए जनता को लूटने वालों को रक्षा कवच प्रदान करता है। सरकार बदलने के साथ ही नौकरशाहों को इधर-उधर किये जाने की संस्कृति प्रतिबद्ध प्रशासनिक तंत्र का कारण बनने से सरकारी महकमे के अफसरों की पहिचान  राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ाव से  होने लगी। सतर्कता आयोग में बैठे अधिकारी भी हैं तो आखिर सरकार के वेतनभोगी और ऐसे में उन्हें भी अपनी नौकरी तथा भविष्य प्यारा होता है। इस लिहाज से जब तक प्रशासन राजनीतिक हस्तक्षेप और पहिचान से मुक्त नहीं होगा सतर्कता आयोग की ताजा पहल को सफलता मिलने में संदेह बना रहेगा। यूँ भी भ्रष्टाचार अब केवल किसी एक या कुछ विभागों में सीमित न रहकर समूचे तंत्र में व्याप्त हो चुका है। ऐसी स्थिति में उससे लड़ने के लिए एक समग्र, सक्षम और स्वायत्त व्यवस्था करनी होगी अन्यथा जाँच और दंड प्रक्रिया में अधूरापन बना रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 10 September 2020

आखिर ज़िन्दगी भी तो हमारी है : सावधानी हटी दुर्घटना घटी



मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी

आखिर ज़िन्दगी भी तो हमारी है : सावधानी हटी दुर्घटना घटी

 जिस तरह बच्चे के बड़े हो जाने के बाद अभिभावक उसका हाथ पकड़ना छोड़ देते हैं ठीक वही  स्थिति भारत में कोरोना को लेकर दिखाई दे रही है | यहाँ अभिभावक के रूप में सरकार और बच्चे के तौर पर जनता को रखा जा सकता है | बीते कुछ समय से ये महसूस होने लगा है कि केंद्र और राज्य दोनों ही  सरकारों ने धीरे - धीरे कोरोना से निपटने के लिए जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया है | इसका संकेत लॉक डाउन में क्रमशः दी जा रही ढील है | दिल्ली जहां कोरोना संक्रमण खत्म होने के दावों के साथ मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अस्पतालों के खाली बिस्तरों का हवाला देते हुए दूसरे राज्यों के मरीजों का  भी दिल्ली में इलाज करने की  दरियादिली दिखाने लगे थे वहां भी कोरोना ने दोबारा अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया | देश में जांच की संख्या बढाए  जाने के साथ ही नए संक्रमितों का भी  सैलाब जैसा आने लगा है और  प्रतिदिन का आंकड़ा एक लाख को छूने के करीब है | अनेक राज्यों ने जनता से कहना शुरू कर दिया है कि जाँच केन्द्रों में जाकर अपनी जाँच खुद करवा लें | इस प्रकार घर - घर जाकर कोरोना संक्रमण की खोज बंद करने की तरफ कदम बढ़ाये जा रहे हैं | हालाँकि बिना चिकित्सक का पर्चा लिए निःशुल्क जांच कराने की  सुविधा  अच्छा निर्णय है लेकिन समाज में अशिक्षा के कारण बड़ा वर्ग ऐसा है जो बीमारी के लक्षण  दिखने पर भी जाँच और इलाज के प्रति लापरवाह बना रहता है | यहाँ  तक कि  पढ़े - लिखे लोगों के बीच भी ऐसे व्यक्ति बड़ी संख्या में हैं जो बीमारी के समयोचित इलाज के प्रति उपेक्षाभाव प्रदर्शित करने में बहादुरी समझते हैं | लॉक डाउन  लगाने और बीच - बीच में उसकी अवधि बढ़ाने के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कोरोना से बचाव हेतु हाथ जोड़कर उसके तरीके बताये थे | सरकारी स्तर पर भी लोगों को खूब जागरूक किया जाता रहा | लेकिन लॉक डाउन को शिथिल किये जाने के साथ ही  सरकार ने ये मान लिया कि लोग बहुत ज्यादा समझदार और जागरूक हो गये हैं तथा अब उन्हें उनके हाल पर छोड़ा जा सकता है | चूंकि कोरोना एक वैश्विक संक्रमण है इसलिए उससे बचने के तौर - तरीके  तथा अन्य शिष्टाचार भी अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार लागू किये जा रहे हैं | लॉक डाउन खत्म होने के बाद हमारी सरकारों ने ये मान लिया है कि देश  की जनता कोरोना से बचाव के सभी तौर - तरीके अच्छी तरह से सीख - समझ गई है | इसीलिये  आये दिन  तमाम बंदिशें हटाई  जा रही हैं |  | और ये तब हो रहा है  जब कोरोना संक्रमण का फैलाव सुरसा के मुंह की तरह फ़ैल  रहा है | इसलिए इस बात पर इतराना निहायत बेवकूफी होगी कि भारत में कोरोना से मृत्यु दर बहुत कम है और ठीक होने वालों का अनुपात भी बहुत संतोषजनक है | चिंता की बात ये है कि देश के सभी शासकीय और निजी अस्पतालों में  बिस्तरों की उपलब्धता रोजाना कम होती जा रही है | अभी तक हर किसी को इस बात की उम्मीद थी कि सितम्बर तक वैक्सीन ईजाद हो जायेगी और अक्टूबर  से उसे लगाने का अभियान भी शुरू हो सकेगा | लेकिन अधिकृत रूप से जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार भारत  और विदेश दोनों जगह बन रही वैक्सीनों के अंतिम परीक्षण अभी चल रहे हैं | भले ही रूस और चीन ये दावा कर रहे हैं कि उनकी  वैक्सीन जनता को लगाई  जाने लगी है किन्तु इस बारे में अभी तक कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा  जा सकता कि भारत में आम जनता तक वैक्सीन कब तक उपलब्ध हो सकेगी | इसे देखते हुए ये जरूरी हो गया है कि अब लोग खुद ही सावधान तो रहें ही साथ ही साथ अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मास्क लगाने और हाथ धोने की जरूरत महसूस करवाएं | वैसे ये अच्छी बात है कि भारत में कोरोना को लेकर बहुत ज्यादा भय नहीं है | फिर भी उसे लेकर लापरवाही भी उचित नहीं कही  जा सकती | देखने में आया है  कि किसी भी समस्या से लड़ते समय जब हमें लगने लगता है कि हम जीत के करीब हैं तभी हम लापरवाह हो जाते हैं और बाजी हाथ से निकल जाती है | कोरोना को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है | अनेक ऐसे लोग जो प्रारंभ से पूरी तरह सावधान रहे , वे लॉक  डाउन हटने के बाद निश्चिन्त हो उठे और कोरोना की  चपेट में आ गये | इसलिए अब जबकि सरकार ने जिम्मेदारी हमारे कन्धों पर डाल दी है , इसलिए बेहतर होगा कि हम सभी कोरोना से खुद को भी बचाएं और दूसरों को भी इस हेतु प्रेरित करें | आखिर ज़िन्दगी भी तो हमारी है | वाहन चालकों को आगाह करती ये चेतावनी इस संदर्भ में भी बेहद प्रासंगिक है कि सावधानी हटी , दुर्घटना घटी ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 September 2020

देखें ड्रग किस - किस फिल्मी नायक को खलनायक बनाता है



सुशांत सिंह राजपूत नामक अभिनेता की मौत के तकरीबन तीन महीने बाद भी जांच एजेंसियां ये तय नहीं पा रहीं कि उसने आत्महत्या की या उसकी हत्या की गई ? यद्यपि सीबीआई हत्या की बात से इंकार कर चुकी है लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रह गईं कुछ तकनीकी गलतियों एवं मृतक के बिसरा की एम्स , दिल्ली द्वारा दोबारा जांच को देखते हुए ये माना जा रहा है कि सीबीआई वाले भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। लेकिन मामला आत्महत्या और हत्या से भी आगे निकलकर अब ड्रग्स ( नशीली दवाओं ) के कारोबार तक जा पहुंचा है। दिवंगत अभिनेता के साथ लिव इन में रह रही उसकी महिला मित्र रिया चक्रवर्ती जो उसकी मौत के हफ्ते भर पहले ही उसका घर छोड़कर चली गई थी , कल रात इसी सिलसिले में गिरफ्तार कर ली गई। नशीली दवाओं के विरुद्ध काम करने वाले नारकोटिक्स नियन्त्रण ब्यूरो द्वारा की गयी सघन पूछताछ के बाद रिया द्वारा खुद सेवन करने के अलावा सुशांत के लिए उसकी खरीदी के लिए ड्रग कारोबारियों से सम्बन्ध रखने की बात स्वीकार कर ली गयी। इसी मामले में ब्यूरो ने रिया के भाई के अलावा सुशांत के घर का प्रबन्ध देखने वाले शख्स और एक नौकर को पहले ही हिरासत में ले रखा था। उन सबसे हुई पूछताछ में रिया की भूमिका पता चली और उसके बाद जब उसे बुलाकर लगातार तीन दिन तक सवाल किये गए तब शुरुवाती दौर में अपने को पाक-साफ़  बताने वाली रिया अंतत: अपना गुनाह कबूल कर बैठी। यद्यपि उसने बार-बार यही दोहराया कि वह सुशांत के लिए ड्रग खरीदती थी और उसने कभी-कभार ही उसका सेवन किया 
। लेकिन उसके व्हाट्स एप से जाँच एजेंसियों ने जो बातें खोज निकालीं उनसे पता चला कि सुशांत के जीवन में आने से पहले ही वह इस कारोबार से जुड़े लोगों के सम्पर्क में आ चुकी थी। इस सबसे हटकर उसके बयानों में जो सबसे बड़ी बात सामने आई , वह है फिल्मी दुनिया के तकरीबन 25 लोगों के ड्रग सेवन करने की जानकारी। उस आधार पर नारकोटिक्स नियन्त्रण ब्यूरो अब उन 25 हस्तियों को समन भेजकर उनसे पूछताछ करने के संकेत दे रहा है। यदि ऐसा होता है तब इन दिनों अपने धाकड़ बयानों से चर्चित अभिनेत्री कंगना रनौत के ये आरोप भी विचारणीय हो जाते हैं जिनके अनुसार मुम्बई फिल्म उद्योग में ड्रग का चलन बेहद आम है। कंगना ने कुछ प्रमुख अभिनेताओं के नाम लेकर उनसे अपनी जाँच करवाने को कहा लेकिन उनमें से किसी ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। रवीना टंडन और गजेन्द्र सिंह चौहान ने अवश्य ये कहा कि कंगना को पूरी फिल्मी बिरादरी को नहीं लपेटना चाहिए था किन्तु बाकी हस्तियाँ जिस तरह चुप्पी साधकर बैठी हुईं हैं वह चोर की दाढ़ी में तिनके की कहावत को सही साबित कर रही हैं। कंगना के आरोप को अतिरंजित भी मान लें लेकिन अब तो रिया ने भी इस बारे में खुलासा कर दिया है। सुशांत खुद ड्रग लेते थे या नहीं इसकी पुष्टि तो अब तकरीबन असम्भव है लेकिन गत रात्रि जीटीवी पर प्रसारित एक वीडियो में सुशांत जहाँ नशे की हालत में दिख रहे थे वहीं रिया उनसे बात करती सुनाई दे रही थीं। ऐसा लगता है जैसे वीडियो उन्हीं के द्वारा बनाया गया था। उसे देखकर ये लगता है कि सुशांत नशे में था। लेकिन वह इसका आदी था या उसे ये किसी योजनापूर्वक दिया जाता रहा, ये अभी भी रहस्य है। लेकिन पहले कंगना और अब रिया के खुलासे के बाद मामला फिल्मी दुनिया में ड्रग के चलन पर आकर केन्द्रित हो गया है। रिया खुद को बचाने के लिए हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे वाली नीति पर चल रही है या उसकी बात में सच्चाई है, ये ब्यूरो पता करेगा। उसकी गिरफ्त में ड्रग की आपूर्ति करने वाले जो लोग आ चुके हैं उनसे भी कुछ न कुछ जानकारी तो मिली ही होगी। उसके आधार पर शराफत का नकाब पहने तमाम ऐसे चेहरे बेपर्दा होंगे जो फिल्मों में तो माफिया के विरुद्ध नायक को लड़ते और जीतते दिखाते हैं लेकिन असल जि़न्दगी में स्वयं उसी बुराई में डूबे हुए हैं। ड्रग और अवैध हथियारों का कारोबार पूरे विश्व में फैला हुआ है। भारत भी अपवाद नहीं है। फिल्मी दुनिया में ड्रग और अवैध हथियार के आरोप में अभिनेता संजय दत्त जेल तक जा चुके हैं। लेकिन फिल्म जगत ने बजाय उनका बहिष्कार करने के संजू नामक बायोपिक बनाकर उनका महिमामंडन किया। बकौल कंगना फिल्मी पार्टियों में बात शराब से बढ़कर ड्रग तक जा पहुँची है। सुशांत की मौत और उसके बाद रिया के बारे में टीवी चैनलों ने इतना ज्यादा कवरेज किया कि लोगों को टीवी समाचारों तक से वितृष्णा होने लगी। लेकिन अब ये जो नया ड्रग खुलासा हुआ है ये बहुत ही गम्भीर है क्योंकि इसके सत्य साबित होने की स्थिति में फिल्म जगत के अपराधी सरगनाओं से निकट सम्बन्ध भी उजागर हुए बिना नहीं रहेंगे। लेकिन इस मामले में शोचनीय पहलू ये भी है कि महाराष्ट्र सरकार विशेष रूप से शिवसेना जिस तरह से व्यवहार कर रही है उससे ये शक भी पैदा हो रहा है कि कहीं इस मामले का सम्बन्ध राजनीति से भी न हो। यूँ भी महाराष्ट्र विशेष रूप से मुम्बइया राजनेताओं के फिल्मी बिरादरी से आत्मीय सम्बन्ध सर्वविदित हैं और उसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन शिवसेना द्वारा सुशांत मामले की जांच सीबीआई को दिए जाने से लेकर कंगना के आरोपों पर जिस तरह की बौखलाहट दिखाई गई वह कहानी में कुछ चौंकाने वाले मोड़ आने की आशंका व्यक्त कर रही है। संयोग ये है कि फिल्मी दुनिया में ड्रग के चलन की जानकारी देने वाली कंगना महीनों बाद आज मुम्बई आ रही हैं जबकि रिया जेल। इस दोनों अभिनेत्रियों के बयान किन-किन नायकों को खलनायक साबित करेंगे ये देखने वाली बात होगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 September 2020

भारत भी तिब्बत में मानवाधिकार हनन का सवाल उठाये



गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ हुई खूनी मुठभेड़ में भले ही दोनों पक्षों के दर्जनों सैनिक हताहत हुए किन्तु उस संघर्ष में एक भी गोली नहीं चली। वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर दोनों देशों की सैन्य टुकड़ियां निरंतर निगाह रखती हैं। इस दौरान उनका आमना-सामना भी होता रहा है और कभी-कभार हाथापाई की चित्र सहित खबरें भी आती रहीं। लेकिन दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति कायम रही कि तनाव बढ़ने पर भी अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया जावेगा। ये भी तय हुआ था कि दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा पर निगरानी रखने के बावजूद उसके अतिक्रमण से परहेज रखेंगे। यद्यपि चीन गाहे-बगाहे मानवरहित क्षेत्र में अपना कब्जा ज़माने की हरकतें करता रहा जिसे रोकने के दौरान ही धक्का-मुक्की और हाथापाई की नौबत आती थी। लेकिन बीती गर्मियों में चीनी घुसपैठ के बाद हालात पहले जैसी छुटपुट घटनाओं से आगे निकलकर युद्ध की परिस्थितियों में तब्दील होते गये। गलवान घाटी की घटना के बाद भारत ने पहली बार लद्दाख क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मोर्चेबंदी की। दरअसल इस दुर्गम इलाके में सैन्य दृष्टि से सड़क, पुल, हवाई पट्टी, सेना को सर्दियों में तैनात रखने के इंतजाम, रसद की आपूर्ति, मिसाइलों, तोपों, टैंकों और लड़ाकू विमानों की तैनाती जैसे प्रबंधों के मामले में भारत तुलनात्मक रूप से चीन से बहुत पीछे था। लेकिन हाल के वर्षों में इस कमी को दूर कर लिया गया। और यही चीन की बौखलाहट का मुख्य कारण है। गलवान घाटी की घटना के पीछे भी यही विवाद था। अग्रिम चौकियों तक सड़क बनाने का चीनी सेना ने विरोध किया जिसे भारत ने नजरंदाज करते हुए अपना काम जारी रखा। उसी का लाभ ये हुआ कि चीन के आक्रामक और संदेहास्पद रवैये को भांपकर भारत ने अत्यंत तत्परता से पूरे लद्दाख क्षेत्र में चीनी सीमा पर जवाबी सैन्य जमावड़ा करते हुए उसे चौंका दिया। ये कहना पूरी तरह सही होगा कि चीन को ऐसी उम्मीद नहीं थी। वह सोचता था कि भारत उससे बातचीत की पहल करेगा लेकिन बजाय इसके हमारी सेनाओं ने युद्ध करने की तैयारी कर ली। चीन को उम्मीद थी कि अक्टूबर में सर्दियां शुरू के पहले ही भारत कुछ टुकड़ियों को छोड़कर बाकी को पीछे हटा लेगा किन्तु चीनी इरादों का सही पूर्वानुमान लगाते हुए भारत ने ये निर्णय कर लिया कि अब लद्दाख में भी सियाचिन जैसी पूर्णकालिक सैन्य तैनाती रखी जावेगी । जिससे चीन दबे पाँव कोई हरकत न कर सके। और इसका त्वरित लाभ भी दिखाई दिया जब बीते 29-30 अगस्त को पेंगांग झील इलाके में चीनी घुसपैठ को नाकाम करने के साथ ही भारत ने रणनीतिक महत्व की कुछ चोटियों से चीनी कब्जे को हटाकर अपना आधिपत्य कायम कर लिया। इसके बाद ही बीते सप्ताह मास्को में चीन के रक्षा मंत्री ने भारत के रक्षा मंत्री से मुलाकात करने की इच्छा व्यक्त की और दोनों के बीच दो घंटे बातचीत हुई। सैनिक अधिकारी भी निरंतर मिलते रहते हैं। लेकिन चीन ने गत दिवस एक बार फिर घुसपैठ की हिमाकत की जिसके चलते दोनों तरफ से दशकों बाद गोलियाँ चलने की जानकारी आई। हालांकि किसी के हताहत होने की खबर नहीं है और ये भी सुनाई दिया कि सांकेतिक तौर पर चेतावनी स्वरूप गोलियां चलीं। लेकिन ये बात स्पष्ट हो गई कि लद्दाख मोर्चे पर अब यद्ध की स्थितियां बन सकती हैं। चीन को पहली बार भारत की तरफ  से इतने जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। सीमा पर चाहे जब उसकी तरफ से होने वाली हरकतों पर भी तकरीबन रोक लग चुकी है। लद्दाख के दुर्गम निर्जन पहाड़ी इलाकों में भारतीय सैनिकों की अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए चीनी सेना गुपचुप कब्जा करने की जो कोशिश किया करती थी वह अब संभव नहीं रहा। इस कारण पहली बार वह तनाव में नजर आ रहा है। और कभी बातचीत से मसला हल करने की बात कहता, तो कभी धमकी देने से बाज नहीं आता। बहरहाल उसे ये अंदाज नहीं रहा होगा कि भारत व्यापार और सैन्य दोनों मोर्चों पर एक साथ उसे चुनौती देने का साहस करेगा। कोरोना संक्रमण फैलाने के लिए पूरी दुनिया में संदेह के घेरे में आने के बाद चीन भारत के साथ सीमा विवाद के जरिये दुनिया का ध्यान भटकाने की जो कोशिश कर रहा था वह उसे उल्टी पड़ गई प्रतीत हो रही है। लेकिन भारत को इस बारे में जरा सी भी खुशफहमी नहीं पालना चाहिए क्योंकि चीन दुनिया भर में हो रही किरकिरी से बौखलाकर भारत के साथ सीमित युद्ध का जोखिम उठा सकता है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस कारण फिलहाल उसका बहुत भरोसा करना भूल होगी। ऐसे में भारत ने अभी तक जिस तरह का दृढ़ रवैया अपनाया वह जारी रखा जाना जरूरी है।  बेहतर होगा भारत अब तिब्बत में मानव अधिकारों के हनन का मामला संरासंघ में उठाना शुरू करे जो चीन की दुखती रग है। आखिर जब वह जम्मू-कश्मीर को लेकर विश्व संगठन में चाहे जब भारत के विरुद्ध प्रस्ताव ला सकता है तब हम भी वैसा क्यों नहीं कर सकते।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 7 September 2020

गरीबों को घटिया चावल बाँटने वाले मानवता के दुश्मन



मप्र में घटिया चावल वितरण के मामले की जाँच आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दी गयी है। मंडला और बालाघाट जैसे आदिवासी बहुल जिलों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वितरित होने वाले घटिया चावल को लेकर ज्योंही वास्तविकता सामने आई त्योंही हड़कंप मच गया। राजनीतिक चिल्लपुकार और आरोप-प्रत्यारोप भी चल पड़े। सरकार जब देखती है कि भ्रष्टाचार के किसी मामले में वह कटघरे में खड़ी हो सकती है तब वह बिना देर लगाये जाँच बिठा देती है। ऐसा ही इस प्रकरण में हुआ। राशन की दुकानों से बांटा जाने वाला अनाज गरीबों को पेट भरने के लिए दिया जाता है। कोरोना काल में केंद्र सरकार ने जिस तेजी से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये गरीबों को मुफ्त और सस्ती दरों पर गल्ला उपलब्ध करवाया उसकी वजह से देश अराजकता से बच गया वरना जो होता उसकी कल्पना तक से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मप्र में सामने आये घटिया चावल के मामले में राज्य आपूर्ति निगम, चावल मिल संचालक, खाद्य विभाग के बड़े अधिकारी एवं उनकी सरपरस्ती करने वाले कौन- कौन लोग जिम्मेदार हैं ये सब तो जांच से पता चल सकेगा लेकिन इस तरह के मामले महज आर्थिक भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रखे जाने चाहिये। गरीबों के लिए सरकार द्वारा संचालित राशन व्यवस्था लोक कल्याणकारी राज्य के मूलभूत कर्तव्यों में मानी जाती है। राजतंत्र के दौर में भी जिन राजाओं को अच्छा और लोकप्रिय शासक माना गया वे अकाल या अन्य किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय प्रजा का उदर पोषण करने के लिए अन्न भण्डार खोल दिया करते थे। आजाद भारत में गरीबी की हालत में बसर करने वाले करोड़ों लोगों को सार्वजानिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ता अनाज, शक्कर, कैरोसिन वगैरह देने की व्यवस्था लम्बे समय से चली आ रही है। राशन की दूकान नामक ये प्रणाली हमारे देश के माथे पर एक धब्बा है क्योंकि बीते सात दशक में भी हम गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य को केवल चुनावी घोषणापत्र तक ही सीमित रख सके। और तो और करोड़ों लोग गरीबी रेखा से भी नीचे जीवन गुजार रहे हैं। कुछ समय पहले तक विश्व की सबसे तेज विकसित हो रही अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी के आंकड़े लज्जित करने वाले हैं लेकिन ये ऐसी हकीकत है जिसे झुठलाना सच्चाई से मुंह मोड़ना  है। उस दृष्टि से होना तो ये चाहिये कि राशन नामक ये व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी रहे। सार्वजानिक वितरण प्रणाली के लिए जिन विभागों की सेवाएँ ली जाती हैं उनको भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए । लेकिन दुर्भाग्यवश वे ही हमारे देश के भ्रष्टतम महकमों में से हैं। मप्र का संदर्भित चावल घोटाला इस तरह का पहला नहीं है। शायद ही कोई ऐसा प्रदेश या जिला होगा जहाँ अनाज की सरकारी खरीदी, उसके भण्डारण और वितरण में नीचता की हद तक भ्रष्टाचार न होता हो। इसके लिए केवल सरकारी अधिकारी अकेले जिम्मेदार नहीं होते। सत्ता में बैठे नेताओं से लेकर राशन की दूकान संचालित करने वाले तक एक गिरोह जैसा बना हुआ है। ईमानदारी से सर्वेक्षण किया जाए तो ये बात सामने आये बिना नहीं रहेगी कि देश में लाखों ऐसे गरीब मिल जायेंगे जो राशन कार्ड बनवाने के लिए भटक रहे हैं जबकि उनसे ज्यादा बोगस राशन कार्ड बने हुए हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के नाम पर जितना गोलमाल प्रारंभ से चला आ रहा है वह बोफोर्स, टेलीकाम, कोयला जैसे तमाम घोटालों पर भी भारी पड़ेगा। लेकिन जैसा शुरू में कहा गया कि इस व्यवस्था में होने वाला भ्रष्टाचार केवल आर्थिक न होकर मानवता के विरुद्ध घिनौना अपराध है। गरीबों को घटिया किस्म का चावल देने के मामले में जो भी कसूरवार साबित हो उसे इतनी कड़ी सजा दी जानी चाहिए जिससे भविष्य में गरीबों की आड़ में अपना घर भरने के पहले कोई हजार बार सोचे। मप्र सरकार को चाहिए कि वह इस मामले को सीबीआई के हवाले करे जिससे जांच एजेंसी को राज्यस्तरीय दबाव से मुक्त रखा जा सके। जिन लोगों ने ये पाप किया है उनके भीतर चूँकि इंसानियत मर चुकी है इसलिए उनको मिलने वाला दंड भी सामान्य से हटकर होना चहिये।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 September 2020

वाहन टैक्स जैसी मेहरबानी बिजली बिलों पर भी करे शिवराज सरकार



हमारे देश में निर्णय प्रक्रिया में विलम्ब से अच्छे फैसले भी समय पर लागू नहीं हो पाते। ताजा उदाहरण है मप्र में निजी बस संचालकों द्वारा वाहन टैक्स माफ किये जाने की मांग को पूरा किया जाना। स्मरणीय है निजी बस सेवा संचालक ये मांग कर रहे थे कि प्रदेश सरकार 1 अप्रैल से 31 अगस्त तक का वाहन टैक्स माफ  करे क्योंकि इस दौरान बसें खड़ी रहीं। बीते दिनों ही राज्य सरकार ने एक सितम्बर से बसें चलाने की अनुमति दे दी थी लेकिन बस संचालक बिना टैक्स माफी के इसके लिए राजी नहीं हुए और हड़ताल पर जाने की घोषणा भी कर दी। आखिरकार गत दिवस मुख्यमंत्री ने तदाशय का फैसला किया। उसके बाद हड़ताल वापिस लेते हुए बसों का संचालन आज से प्रारंभ किये जाने की जानकारी बस संचालकों द्वारा दी गई। लेकिन साथ में ये भी जोड़ दिया गया कि जिन मार्गों पर सवारियां नहीं मिलेंगी वहां सेवाएँ रोक दी जायेंगीं। उल्लेखनीय है पहले भी राज्य सरकार द्वारा आधी सवारियों के साथ बसें चलाने की अनुमति दी गई थी किन्तु उसे घाटे का सौदा मानकर बस संचालकों ने अस्वीकृत कर दिया। अब पूरी सवारियों के साथ परिचालन की बात मान ली गई। राज्य सरकार ने 121 करोड़ का टैक्स माफ कर दिया। गतिरोध खत्म होने से प्रदेश के उन इलाकों में यात्री परिवहन प्रारम्भ हो सकेगा जहाँ आवागमन के दूसरे साधन उपलब्ध नहीं थे। जिनके पास अपने वाहन नहीं हैं वे परिवहन के अन्य महंगे साधनों का उपयोग नहीं कर पा रहे थे। छोटे शहरों और कस्बों से गरीब मजदूर, छोटे व्यापारी, मरीज आदि आसपास के स्थानों पर जाने के लिए सार्वजनिक बस सेवा का उपयोग करते हैं। लेकिन मप्र में पहले लॉक डाउन और बाद में संचालकों और सरकार के बीच चल रही खींचातानी से बसों के पहिये जाम रहे। हालांकि अभी भी बस मालिक किराये में अच्छी खासी वृद्धि करने की जिद पकड़े हुए हैं जिससे बीते पांच महीनों का घाटा पूरा किया जा सके। बहरहाल ये तो हुआ कि इस फैसले के बाद प्रदेश में यात्री परिवहन में आ रही दिक्कत से आम जनता को राहत मिलेगी तथा जनजीवन और कारोबार अपने पुराने स्वरूप में लौट सकेगा। लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में विचारणीय प्रशन ये है कि जब सरकार को टैक्स माफ  करना ही था तब इतनी हीलाहवाली क्यों की गई? ऐसे मामलों में सरकार का रवैया ज्यादातार टरकाऊ होता है। इसकी एक वजह मंत्रियों के सलाहकार बने बैठे नौकरशाह भी बनते हैं जो अपनी ऐंठ में पहले- पहल किसी भी बात पर नकारात्मक रुख ही दिखाते हैं। उन्हें ये लगता है कि आसानी से किसी मांग को स्वीकार कर लेने से उनका रुतबा कम हो जाएगा। संदर्भित मामले में भी यदि बस संचालकों की मांग अनुचित थी तो उसे अभी भी नहीं माना जाना चाहिए था। और यदि सही थी तब इतना विलम्ब क्यों किया गया जिसकी वजह से सुदूर अंचलों में रह रहे साधनहीन लोगों को अकल्पनीय परेशानी और नुकसान उठाना पड़ा। ऐसा लगता है प्रदेश में होने वाले दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा उपचुनावों के कारण ये रहमदिली दिखाई गई। जनसंपर्क पर निकले नेताओं को जनता ने खरी-खोटी सुनाई होगी तब जाकर सरकार बहादुर के कान में जूँ रेंगी। इसी तरह का मामला बिजली वसूली का है। लॉक डाउन के दौरान कारखाने, व्यावसायिक प्रतिष्ठान, सिनेमा, शॉपिंग माल, होटल, रेस्टारेंट आदि महीनों बंद रहे। इस कारण उनकी बिजली खपत न के बराबर रह गई। कुछ महीनों तक तो वसूली स्थगित रखी गयी लेकिन ज्योंही लॉक डाउन में छूट दी जाने लगी त्योंही विद्युत मंडल ने ये जानते हुए भी कि अभी तक उपरोक्त में से अनेक व्यवसाय या तो प्रारंभ नहीं हो सके या फिर उनका कारोबार पटरी पर नहीं आ पाया है, विशुद्ध पठानी शैली में वसूली शुरू कर दी। उनसे न्यूनतम प्रभार के नाम पर अनाप-शनाप राशि वसूली जा रही है। जो औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर थोपे गये जजिया कर जैसा ही है। जो कारोबारी बिल का भुगतान करने में थोड़ी सी भी देरी करता है, उसकी बिजली काटकर ब्लैकमेल किया जा रहा है। चूँकि उद्योगपति और व्यापारी बस संचालकों की तरह एकजुट नहीं हैं इस वजह से उन्हें पूरी तरह उपेक्षित किया जाता है। प्रदेश सरकार के सामने जो आर्थिक संकट है उससे कोई इंकार नहीं करेगा । लेकिन उसे ये सोचना चाहिए कि सरकार का राजस्व बढ़ाने के लिए कारोबारियों के कन्धों पर पड़ रहे बोझ को हल्का करना बुद्धिमत्ता होगी। जिस तरह आज से बसों का परिचालन शुरू होने से प्रदेश भर में डीजल की बिक्री बढ़ेगी जिससे उस पर लगाए गये टैक्स के रूप में मिलने वाला राजस्व बढ़ जायेगा जो बीते पांच महीनों से रुका पड़ा था। इससे 121 करोड़ के वाहन टैक्स माफी की भरपाई आसानी से हो जायेगी। ऐसी ही बुद्धिमत्ता बिजली बिलों के मामले में भी दिखाई जाए तो तमाम रुके हुए कारोबार गति पकड़ लेंगे और राजस्व की आवक में स्वाभाविक और सुनिश्चित वृद्धि हो सकेगी। शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। इस कारण उन्हें शासन-प्रशासन के साथ जनता के सभी वर्गों मसलन व्यापारी, उद्योगपति, किसान, मजदूर, नौकरपेशा, पेंशनधारी, बेरोजगार आदि की परेशानियों का अच्छी तरह से एहसास है। बेहतर हो वे कोरोना संकट के इस दौर में अपने अनुभव और संवेदनशीलता से लोगों का दिल जीतने के साथ ही प्रदेश की छवि एक ऐसे राज्य के तौर पर स्थापित करें जहां जनहित के फैसले लेने में देर नहीं की जाती। यदि वे ऐसा कर सके तो प्रदेश में निवेशक सम्मेलनों पर करोड़ों रूपये फूंकने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 September 2020

मोबाइल की रिंगटोन से नहीं रुकने वाला कोरोना का फैलाव




देश में कोरोना संक्रमण को लेकर अजीबोगरीब स्थिति बनी हुई है। अधिकृत आंकड़ों के अनुसार नए संक्रमण रोजाना तेजी से बढ़ते जा रहे हैं वहीं ठीक होने वालों का प्रतिशत भी तेजी से बढ़कर 77 के पार जा पहुंचा है। जबकि मरने वालों का आंकड़ा घटते हुए 1.77 फीसदी हो गया है। स्वस्थ होने वाले संक्रमितों की आशाजनक संख्या और कम मृत्यु दर आश्वस्त तो कर रही है लेकिन जिस गति से नए मामले आते जा रहे हैं उससे ये डर भी लग रहा है कि इस पर नियन्त्रण न हुआ तो कोरोना वाकई महामारी में बदल जाएगा।  अभी तक कोरोना के टीके (वैक्सीन) को लेकर नये-नये अनुमान लग रहे हैं लेकिन ईमानदारी की बात ये है कि दिसम्बर के पूर्व उसकी उम्मीद करना खुद को धोखे में रखना है। और फिर हमारे देश में आबादी का आकार बहुत बड़ा होने से टीका उपलब्ध होने के बावजूद उसे लगाने में लम्बा वक्त लग जायेगा। तब तक कोरोना को रोकना हर किसी का फर्ज है। अर्थव्यवस्था को प्राणवायु देने के लिए सरकार ने लॉक डाउन की शक्ल में लगाये तमाम प्रतिबन्ध तकरीबन शिथिल कर दिए हैं। उद्योग-व्यवसाय में भी रफ़्तार देखी जा सकती है। बाजारों में जनता की भीड़ भी जनजीवन सामान्य होने का संकेत है। परिवहन भी शुरू हो गया है। रेलगाड़ियों का परिचालन क्रमश: बढ़ाया जा रहा है तथा हवाई सेवाएं भी काफी हद तक बहाल की जा चुकी हैं। निर्माण गतिविधियाँ भी जोर पकड़ने लगी हैं। अच्छे मानसून ने कृषि क्षेत्र में उत्साह भर दिया है । अनुमान के अनुसार रिकॉर्ड खरीफ  फसल की उम्मीद की जाने लगी है। इसका अनुकूल असर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। लेकिन कोरोना के प्रकोप को नहीं रोका जा सका तब समूचा आशावाद धरा रह जाएगा। प्रधानमंत्री सहित बाकी जिम्मेदार लोग भी इस बात पर आये दिन संतोष जताया करते हैं कि हमारे देश में ठीक होने वालों का आंकड़ा जहां निरंतर बढ़ रहा है वहीं मरने वालों का प्रतिशत नीचे जा रहा है। इसे चिकित्सा प्रबंधों की सफलता मान लेना गलत नहीं है लेकिन इस सच्चाई से भी तो मुंह नहीं फेरा जा सकता कि नए संक्रमणों की संख्या सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है और यही हाल रहा तो एक हफ्ते से पहले ही प्रतिदिन एक लाख से ज्यादा नए संक्रमित सामने आने लगेंगे। कुछ सूत्रों के अनुसार ग्रामीण इलाकों में भी कोरोना ने दबिश दे दी है। ठीक होने वालों की तुलना में नये संक्रमणों की ज्यादा संख्या से अस्पतालों की क्षमता जवाब देने की स्थिति में आ सकती है। देश की राजधानी दिल्ली में जहां कुछ दिन पहले तक कोरोना को नियंत्रित किये जाने की खुशी मनाई जाने लगी थी वहां बीते कुछ दिनों में हजारों नये मरीज निकलने से चिंता के बादल फिर मंडराने लगे हैं। देश के अन्य हिस्सों से भी कोरोना के पलटवार की खबरें निरंतर मिल रही हैं। इधर केंद्र सरकार ने सितम्बर माह से लॉक डाउन के तहत लगाये अधिकतर प्रतिबन्ध खत्म कर दिए हैं। एक राज्य से  दूसरे में जाने के लिए किसी पूर्वानुमति की जरूरत नहीं रही। यात्री रेल गाड़ियों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है। होटल, रेस्टारेंट, सभागारों को भी खोल दिया गया है। दिल्ली में 9 सितम्बर से बार भी प्राम्भ किये जा रहे हैं। लेकिन ये सब होने के बाद भी कोरोना के फैलाव को रोकने की लिए की जा रही सख्ती के प्रति अव्वल दर्जे का उपेक्षा भाव न केवल सरकार अपितु जनता के स्तर पर भी देखा जा सकता है जो घातक साबित हो रहा है। पुलिस मास्क नहीं पहिनने वालों से जुर्माना वसूलकर उसको अपनी उपलब्धि बताती फिरती है। जिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक उसके आंकड़े प्रसारित किये जाते हैं । लेकिन जनता को मास्क एवं शारीरिक दूरी बनाये रखने के लिए जरूरी प्रेरणा देते हुए अनुशासित करने का अभियान केवल मोबाईल फोन की रिंग टोन तक सिमटकर रह गया है। ऐसे में ये जरूरी प्रतीत हो रहा है कि भले ही लॉक डाउन को शिथिल किया जाता रहे किन्तु कोरोना से बचाव हेतु जिन सावधनियों को लेकर प्रारंभ में बेहद जागरूकता देखी जा रही थी उनके बारे में समाज का बड़ा तबका अव्वल दर्जे की लापरवाही दिखा रहा है और उसी का परिणाम नये संक्रमितों की संख्या में प्रतिदिन होने वाली वृद्धि के रूप में देखने मिल रहा है। अब जबकि साप्ताहिक लॉक डाउन को भी खत्म कर दिया गया है तब कोरोना से बचाव के मान्य तरीकों को अपनाने के प्रति आत्मप्रेरणा का भाव उत्पन्न किया जाना समय की मांग ही नहीं वरन अनिवार्यता भी है। सरकार का समूचा ध्यान अर्थव्यवस्था को दोबारा चुस्त-दुरुस्त करने के अलावा चीन के साथ सीमा पर चल रहे तनाव से निपटने में लगा है। अनेक राज्यों में बाढ़ से पैदा हुई समस्याएं भी उसका ध्यान आकर्षित कर रही हैं। इनके अलावा उसके रोजमर्रे के काम भी बीते छह महीने में काफी पिछड़ गये हैं। ऐसे में रास्वसंघ जैसे स्वयंसेवी संगठनों को आगे आकर कोरोना से बचाव के प्रति लोगों में दायित्वबोध पैदा करने का अभियान चलाना चाहिए। लॉक डाउन के दौरान जरूरतमंदों की सहायता करने की स्वप्रेरित भावना लिए अनगिनत कोरोना योद्धा सामने आये थे लेकिन उनमें से अधिकतर अब नजर नहीं आते। बेहतर हो राजनीतिक दल भी अपने कार्यकर्ताओं को इस हेतु प्रेरित करें। कोरोना के इलाज की व्यवस्था करना सरकार और चिकित्सकों का काम है लेकिन उसकी रोकथाम के लिए जिन सावधानियों का पालन अपेक्षित और आवश्यक है उसके प्रति समाज की रचनात्मक शक्तियों को मोर्चा संभालना होगा। कोरोना का टीका जब आयेगा तब आयेगा किन्तु तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो सामुदायिक संक्रमण की भयावह स्थिति को रोक पाना असम्भव हो जाएगा। देश की राजधानी दिल्ली में जिस तरह से कोरोना पहले से भी ज्यादा ताकत से आ धमका है वह पूरे देश के लिए चेतावनी भरा संकेत है।

-रवीन्द्र वाजपेयी