Wednesday, 16 September 2020

राजनीति में भी सीधी भर्ती वालों का प्रशिक्षण काल होना चाहिए



 मप्र के शहडोल जिले में पदस्थ एसडीएम और संयुक्त कलेक्टर रमेश सिंह ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। खबर है वे अनूपपुर विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी बनना चाहते हैं और इस सिलसिले में पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस  अध्यक्ष कमलनाथ से भी  मिल आये हैं। हालांकि अभी उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं  हुआ है लेकिन उन्होंने कांग्रेस से लड़ने का कारण  पारिवारिक पृष्ठभूमि को बताया। वैसे नियमों की बात करें तो इसमें गलत कुछ भी नहीं होगा। वे खुद भी अनूपपुर के रहने वाले हैं। श्री सिंह ने 14 वर्ष की सेवा पूरी कर ली जिसके बाद वे सेवानिवृत्ति के पात्र हो गए हैं। शासकीय सेवा से त्यागपत्र देकर जनसेवा करने की उनकी मंशा स्वागतयोग्य है लेकिन इसके लिए वे विधायक बनना चाहते हैं ये सुनकर आश्चर्य होता है। एक प्रशासनिक अधिकारी रहते हुए उन्हें सरकारी कार्य संस्कृति  की पर्याप्त जानकारी हो गई होगी और उस आधार पर  वे पिछड़े क्षेत्र का विकास करना चाहते हैं। एक युवा अच्छी- खासी सरकारी नौकरी छोड़कर जनसेवा के रास्ते पर चलना चाहे ये आदर्श स्थिति है किन्तु उनके निर्णय से एक बार फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ है जो किसी पूर्व न्यायाधीश को राज्यसभा  में भेजे जाने पर उठता है। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश पद से निवृत्त होते ही रंजन गोगोई को जब राज्यसभा में मनोनीत किया गया तब विपक्ष ने बड़ा बवाल मचाया था। आरोप प्रतिबद्ध  न्यायपालिका तक जा पहुंचे। सेवानिवृत्ति के फौरन बाद न्यायाधीशों को किसी प्रकार से उपकृत किये जाने पर रोक की मांग तो अरसे से उठ रही है। लेकिन सरकारी  अधिकारियों को लेकर ऐसी बंदिश की बात नहीं होती। इसीलिये सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आकर स्थापित होने की चाहत लगातार  बढ़ती ही जा रही है। रमेश सिंह से पहले भी देश भर में सैकड़ों नौकरशाह रातों -  रात राजनेता बनने के लिए चुनाव के मैदान में कूद पड़े जिनमें कुछ सफल होकर संसद - विधानसभा में पहुंचे और कई मंत्री भी बन बैठे। पूर्व नौकरशाहों के अनुभव और योग्यता का लाभ लेना बुरा नहीं  है लेकिन उसके लिए सीधे  सांसद , विधायक या मंत्री बनाने से प्रतिबद्ध नौकरशाही का आरोप लगना स्वाभाविक है। एक सरकारी अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद यदि राजनीति में उतरना चाहे तो उसे एक निश्चित समयसीमा तक चुनाव लड़ने या किसी सरकारी पद से वंचित रखा जाना चाहिए। यदि नौकरी से निवृत्त होते ही वह किसी राजनीतिक दल के टिकिट पर चुनाव लड़ता है तो उस पर ये आरोप लगता है कि सेवा में रहते हुए उसने उस राजनीतिक दल को लाभ पहुँचाया होगा। हालाँकि राजनीति में जातिवाद हावी हो जाने के बाद से अब नौकरशाही राजनीतिक विचारधारा से ज्यादा जातिगत आधार पर विभाजित हो चली है। विशेष रूप से अनु. जाति और जनजाति के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग के कर्मचारी  और अधिकारी भी एक दबाव समूह बन गये हैं। प्रातिक्रियास्वरूप प्रशासन में बैठे अगड़ी जातियों के लोग भी जातीय आधार पर संगठित होने लगे हैं। और ये सब इसीलिए हो रहा है क्योंकि नौकरशाही को राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा है। रमेश सिंह य़ा उन जैसे तमाम अधिकारी सेवा में रहते हुए भी किसी न  किसी राजनीतिक दल के हिमायती  बने रहते हैं और अवसर पाते ही उसमें  शामिल होकर नेतागिरी करने लगते हैं। प्रशासन पर इसका बुरा असर साफ़ देखा जा  सकता है। मप्र में अनु.जाति के एक आईएएस अधिकारी घूस लेते रंगे हाथ पकड़ लिए गये थे। उसके बाद वे लगातार अपनी  जाति के कारण प्रताड़ित होने का रोना रोते रहे। हालांकि  कानूनी लड़ाई के बाद वे बहाल भी हो गए किन्तु मनमाफिक पदस्थापना नहीं  मिलने से नाराज रहे और सेवानिवृत्ति पर भी उनका बयान बेहद तल्खी भरा रहा। इन सब कारणों से लगता है अब पूर्व नौकरशाहों के   राजनीति में प्रवेश संबंधी  आचार संहिता बननी चाहिए। कलेक्टर जैसा पद त्यागकर मुख्यमंत्री तक जा पहुंचे स्व. अजीत जोगी के नक़्शे कदम पर चलते हुए न जाने कितने नौकरशाह प्रशासक से शासक बन बैठे। मोदी सरकार के अनेक महत्वपूर्ण मंत्री वरिष्ठ नौकरशाह रहे हैं। आजकल तो सेवानिवृत्त होते ही किसी  राजनीतिक  दल की सदस्यता लेने का फैशन सा बन गया है। ये कितना सही या गलत है इस पर गंभीरता से विमर्श होना जरूरी है क्योंकि प्रतिबद्ध न्यायपालिका की तरह से ही प्रतिबद्ध नौकरशाही भी लोकतंत्र के लिए उतनी  ही घातक है। यहाँ ये बात उल्लेखनीय है कि सरकारी नौकरी में चयन के उपरांत अधिकारी कुछ समय तक प्रशिक्षण काल में रहता है। उसके पूरा होने के  बाद ही उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाती है। राजनीति में भी सरकारी  सेवा के बाद आये लोगों को कुछ समय तक तो प्रशिक्षण की प्रक्रिया से गुजरना चाहिए अन्यथा पार्टी के लिए बरसों से पसीना बहा रहे कार्यकर्ताओं के मन में इस सीधी भर्ती से जो असंतोष फैलता है उसकी वजह से उनके  संगठनात्मक ढांचे को नुकसान होता है। कांग्रेस तो  इसका खमियाजा भुगत ही रही है लेकिन अब भाजपा में भी पूर्व नौकरशाहों की सीधी भर्ती जिस तरह से की  जा रही है उसकी वजह से पार्टी विथ डिफरेंस का उसका दावा अर्थहीन होने  लगा  है ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 15 September 2020

प्राणों पर संकट के बीच प्राणवायु का संकट !





कहाँ तो बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते  हुए जगह-जगह ऑक्सीजन पार्लर शुरू होने  की खबरें आ रही थीं और कहाँ देश भर से ये समाचार आने लगे कि कोरोना संकट  के कारण  अस्पतालों तक में ऑक्सीजन का अभाव होने लगा। हालाँकि जैसा केन्द्रीय  स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने गत दिवस संसद में बताया उसके अनुसार देश में 92 फीसदी कोरोना मरीज साधारण किस्म के हैं जिनमें से मात्र 6 फीसदी को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही है। ठीक होने वाले कोरोना संक्रमितों का प्रतिशत भी वैश्विक स्तर से काफी कम है। नये मरीजों की संख्या  में तेजी से वृद्धि के बावजूद  संतोष का विषय है कि स्वस्थ होने वालों की संख्या भी अच्छी खासी है। लेकिन ये सरकारी  आंकड़े हैं और इन पर आँख मूंदकर विश्वास कर लेना आपने आपको धोखा देने जैसा होगा। यद्यपि ये समय  आलोचना का नहीं है क्योंकि पूरी दुनिया इससे पीड़ित है। अमेरिका जैसे विकसित देश तक कोरोना के सामने असहाय साबित हुआ। उस दृष्टि से भारत अपने प्रदर्शन पर अभी तक जो संतोष व्यक्त करता रहा वह बीते दो महीनों में सवालों के घेरे में आ गया है। भले ही आंकड़ों  में कोरोना से मृतकों  का आंकड़ा बेहद कम हो लेकिन बीते कुछ दिनों से श्मसान भूमि में होने वाले  अन्त्तिम संस्कार जिस तरह से बढ़े  वह उन दावों को झुठलाने  के लिए पर्याप्त है जो स्थानीय प्रशासन से लेकर केंद्र सरकार तक कर रही है। डा. हर्षवर्धन स्वयं चिकित्सक हैं इसलिए उनकी व्यवसायिक योग्यता और ईमानदारी पर संदेह किये बिना ये कहा जा सकता है कि मंत्री चाहे केंद्र का हो या राज्य का वह  जो जानकारी सदन में देता है वह प्रशासनिक अमले द्वारा प्रदान  की जाती है और उसमें तथ्यों को छिपाये  जाने की सम्भावना से इंकार नहीं जा सकता। उस दृष्टि से संसद में स्वास्थ्य मंत्री द्वारा दिए गये बयान पर संशय बना रहेगा। बकौल डा. हर्षवर्धन भले ही ऑक्सीजन की जरूरत बहुत ही कम मरीजों को पड़ रही हो  लेकिन  मप्र सहित कुछ राज्यों में बीते कुछ दिनों में अस्पतालों में ऑक्सीजन का स्टॉक खत्म होने से मचे हड़कंप ने एक नई समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। हालांकि आपदा प्रबंधन के तहत ऑक्सीजन उत्पादक राज्यों से जरूरत वाले राज्यों में तेजी से प्राथमिकता के स्तर पर आपूर्ति की गयी लेकिन जिस मात्रा  में नए मामले प्रतिदिन आ रहे हैं उन्हें देखते हुए आने वाले दिनों में ऑक्सीजन की कमी का अंदेशा बना रह सकता है। हालाँकि कोरोना संकट शुरू होते ही देश में उससे सम्बंधित जरूरतों मसलन मास्क , सैनीटाईजर, वैन्टीलेटर , जाँच किट आदि का  उत्पादन तेजी से होने लगा जिससे आयात की जरूरत खत्म हो गई। इसलिए ये उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि अस्पतालों में ऑक्सीजन की बढ़ती हुई मांग को पूरा  करने के लिए देश में उसका पर्याप्त उत्पादन और भंडारण जल्द हो सकेगा। लेकिन तब तक उसकी आपूर्ति सुनिश्चित रखना बड़ी चुनौती है । मप्र उन राज्यों में से है जिनमें  बीते कुछ दिनों में ऑक्सीजन के अभाव के कारण अनेक शहरों में कोरोना मरीजों को जबरदस्त परेशानी हुई। अनेक मौतें  उस वजह से होने की शिकायतें भी आई हैं। ये संतोष  का विषय है कि केंद्र सरकार द्वारा तत्काल सामंजस्य बिठाकर आपूर्ति करवा दी गई परन्तु कोरोना संक्रमण के तेजी से फैलाव के मद्देनजर आने वाले दिन और भी संकट भरे हो सकते हैं। जिन घरों में बुजुर्ग  रहते हैं  वहां  छोटे ऑक्सीजन सिलेंडर रखे जाने की सलाह अक्सर चिकित्सक दिया करते हैं। मौजूदा हालात देखते हुए तो  उसकी  जरूरत किसी को भी पड़ सकती है। कोरोना चूँकि मनुष्य के फेफड़ों को संक्रमित कर  उसके श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है इसलिए शरीर में ऑक्सीजन का वांछित स्तर बनाये रखने के लिए भी जन - जागरण किया जाना जरूरी है।  ये देखने में आया है कि साँस लेने में होने वाली तकलीफ को शुरुवात में नजरंदाज करने से  अस्पताल पहुँचने पर इलाज मुश्किल होता है।  ऑक्सीजन को प्राण वायु कहा जाता है। उसका महत्व तो दिल्ली जैसे शहर में साल में कई मर्तबा होने वाले प्रदूषण के समय समझ में आता रहा। लेकिन कोरोना संकट ने हमारे शरीर में उसकी पर्याप्त मात्रा  के बारे में भी सचेत किया है। इस बारे में भारत की परम्परागत योग पद्धति बेहद उपयोगी है जिसमें श्वसन तंत्र को मजबूत बनए रखने के तमाम व्यायाम हैं। शंख बजाना भी फेफड़ों  के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना  जाता है। बेहतर  होगा कोरोना के बहाने आम भारतीय इस तरह की सावधानियों के प्रति गंभीर हों क्योंकि छोटी-छोटी बातें भी बड़े से बड़े संकट में कारगर साबित होती  हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 14 September 2020

हिन्दी भाषी ही उसे अपना लें तो उसका उद्धार हो जाये



आज राजभाषा दिवस है। इसे हिन्दी दिवस भी कहा जाता है। 1949 में आज ही  के दिन संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया था। 1953 में हिन्दी की महत्ता प्रतिपादित करने के लिए 14 सितम्बर को राजभाषा दिवस घोषित कर दिया गया। इस प्रकार  यह एक तरह से उसका सरकारी जन्मदिवस है। कालान्तर में इसका विस्तार राजभाषा सप्ताह , पखबाड़ा और मास के तौर पर भी हो गया। वैसे तो हिन्दी के  लिये ये सम्मान की  बात है कि दर्जनों भाषाओं के होते हुए भी   पूरे  देश में सरकारी प्रेरणा से  उसका गुणगान किया जाता है। छोटे-बड़े ढेर सारे आयोजन होते हैं। हिन्दी की सहजता , सरलता और स्वीकार्यता को लेकर संकल्प और प्रतिबद्धता  दोहराई जाती है। प्रतियोगिताएँ , पुरस्कार वितरण , सम्मान  , विचार गोष्ठियां , कवि सम्मलेन, पोस्टर बैनर , जैसे वे अनेक  कर्मकांड किये जाते हैं जिनसे हम भारतीय भली-भांति परिचित हैं। काफी पहले से केंद्र  सरकार के सभी विभागों  तथा उपक्रमों में राजभाषा अधिकारी नियुक्त किये जा चुके  हैं जो हिन्दी में कामकाज को बढ़ावा देने तथा गैर हिन्दी भाषियों को हिन्दी में प्रशिक्षित करने का कार्य करते हैं। इस व्यवस्था का काफी लाभ भी हुआ। हालाँकि भाषावार प्रान्तों के गठन की जो गलती हुई थी उसका खामियाजा देश को आज तक भुगतना पड़ रहा है । जाति और धर्म की तरह से ही भाषा भी वोट बैंक का जरिया  बना ली गई। तमिलनाडु में हिन्दी का सर्वाधिक विरोध होता रहा है लेकिन वहां  के लोग अंग्रेजी  पटर-पटर करने वालों का विरोध नहीं करते। महाराष्ट्र में शिवसेना और मनसे भी मराठी अस्मिता के नाम पर जनभावनाएं भड़काने से बाज नहीं आते। देखासीखी दूसरे राज्यों में भी  क्षेत्रीय भाषा को लेकर सियासत की दूकानें खोलने का प्रयास होता  रहता है। हाल ही में घोषित नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा देने का जो प्रावधान  किया गया उसका भी तमिलनाडु और बंगाल में विरोध किया गया जिसका मुख्य कारण अगले साल होने वाले  विधानसभा के चुनाव हैं। ये संतोष का विषय है कि कम से कम उत्तर भारतीय राज्यों के न्यायालयों के साथ ही  राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर की  प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिन्दी को मान्यता  मिल गयी है। ये सब देखते हुए हिन्दी के भविष्य को लेकर संतुष्ट हुआ जा सकता है। लेकिन इस बारे में जो दूसरा पक्ष है वह चिंता भी पैदा कर रहा है। और वह है हिन्दी भाषियों के ही  एक बड़े वर्ग में हिन्दी के प्रति उपेक्षा की प्रवृत्ति  जो काफी हद तक  हीनभावना का रूप ले बैठी है। पहले उच्च वर्गीय समाज में ही अंग्रेजी का आकर्षण था क्योंकि उसे अभिजात्यता का मापदंड मान लिया गया। लेकिन बीते कुछ दशकों में मध्यम और निम्न मध्यम  वर्ग ने जिस तरह अंग्रेजी को गले लगाया उसकी वजह से हिन्दी का ज्यादा नुकसान हो रहा है। अँग्रेजी माध्यम में शिक्षा को सफलता की  सीढ़ी मान लेने की मानसिकता के कारण शालेय शिक्षा का स्वरूप ही  बदल गया और कुकुरमुत्ते की तरह  गली-गली में कान्वेंट स्कूल के बोर्ड टंग गये। यदि इनके जरिये आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग के बच्चे काम चलाऊ अंग्रेजी  ही सीख जाएँ तो इसका लाभ होगा लेकिन अंग्रेजी माध्यम के फेर में हो ये रहा हैं कि हिन्दी भाषी प्रान्तों के बच्चे ही हिन्दी में कमजोर होने लगे। इसके लिए शिक्षा प्रणाली के साथ अभिभावक भी बराबरी से दोषी  हैं जिन्होंने अंग्रेजी माध्यम की मृगमरीचिका में बच्चों को अपनी मातृभाषा से ही अपरिचित कर दिया। ये कहने में कुछ भी गलत या अतिशयोक्ति नहीं है कि हिन्दी को खत्म करना किसी के बस की बात नहीं  है क्योंकि वही ऐसी भाषा है जो पूरे देश में समझी जाती  है। दक्षिण भारत के जिन राज्यों में हिन्दी का विरोध सतह पर दिखाई देता है वहां के लोग उत्तर  भारत में आकर नौकरी करने में तनिक भी  संकोच नहीं करते। इसी तरह उप्र और बिहार जैसे विशुद्ध हिन्दी भाषी प्रदेशों के मजदूर बिना स्थानीय भाषा जाने ही दक्षिण  ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर के राज्यों में भी कार्य करते हैं। कोरोनाकाल में काम बंद हो जाने  की वजह से जब मजदूरों का पलायन हुआ तब ये तथ्य सामने आया कि हिन्दी विरोधी  राज्यों में भी हिन्दी भाषी श्रमिकों और कर्मचारियों का कोई विरोध नहीं है। ये सब देखते हुए हिन्दी भाषी लोगों को हिन्दी के प्रति उनके मन में आई हीन भावना और भविष्यगत असुरक्षा से मुक्त होना पड़ेगा । अंग्रेजी को बतौर भाषा सीखना अच्छा है लेकिन उसे ओढ़ लेने  की प्रवृत्ति हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए खतरा है। क्योंकि भाषा के साथ जो साहित्य और संस्कृति आती है  उसका असर पीढिय़ों तक रहता है और इस दौरान उसे अपनाने वाला  समाज अपनी मूल पहिचान खो बैठता है। विश्व के अनेक देशों  में विदेशी भाषा के आधिपत्य ने उनकी जड़ों को ही नष्ट कर दिया। हिन्दी  के नाम पर होने वाले इस वार्षिक आयोजन में उसके प्रचार - प्रसार और गौरवगान के जो भी प्रयास होते हैं वे सब  स्वागतयोग्य हैं लेकिन जब तक हिन्दी भाषी लोग अपनी मातृभाषा के प्रति आग्रही नहीं होंगे तब तक हिन्दी को सरकारी संरक्षण  में  राजभाषा का दर्जा भले मिलता रहे लेकिन वह सही मायने में राष्ट्रभाषा होने के बाद भी उपेक्षित ही रहेगी। हिन्दी भाषी ही यदि उस को ससम्मान अपना लें तो उसका विरोध धीरे - धीरे विलुप्त होता जाएगा। आज के दिन का सबसे सरल सन्देश यही है कि हिन्दी की बातें कम करें लेकिन  हिन्दी में बातें ज्यादा करें ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 September 2020

चीन दबाव में है लेकिन हमें खुशफहमी से बचना होगा



दो देशों के बीच मित्रता और शत्रुता दोनों के समय यदि कोई बात कायम रहती है तो वह कूटनीति ही है। अनेक उदाहरण हैं जब सेनाओं के बीच घमासान चलता रहता है वहीं सरकार के स्तर पर राजनयिक वार्ताओं के जरिये शान्ति की कोशिश भी जारी रहती हैं। ये भी देखने में भी आया है कि दो देशों के बीच के मतभेद दूर करने के लिए कोई तीसरा देश मध्यस्थता भी करता है। भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 के युद्ध के बाद तत्कालीन सोवियत संघ ने ताशकंद बुलाकर भारत के प्रधानमंत्री स्व.लालबहादुर शास्त्री और उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे अयूब खान के बीच समझौता करवाया था। दूसरे विश्व युद्ध के उपरान्त चीन में साम्यवादी क्रांति के बाद अमेरिका के साथ उसका राजनयिक रिश्ता नहीं था। सुरक्षा परिषद में भी चीन की जगह ताईवान को स्थायी सदस्य के तौर पर अमेरिका ने बिठा रखा था। लेकिन 1972 में अचानक अमेरिका के रुख में बदलाव आया और उसके विदेश सचिव हेनरी कीसिंजर पकिस्तान की मदद से चीन की गुप्त यात्रा पर गये और उससे राजनयिक रिश्ते बनाकर सुरक्षा परिषद में ताईवान की जगह उसे रखवाने में सहायता दी। उसके बाद चीन और अमेरिका वैचारिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक क्षेत्र में बेहद नजदीक आ गए। आज उनके बीच तनाव चरम पर है किन्तु दोनों ही एक दूसरे के यहाँ इतना ज्यादा पूंजी निवेश कर चुके हैं कि पूरी तरह नाता तोड़ने में उन्हें हजार बार सोचना पड़ेगा। संयोगवश भारत भी इन दिनों ऐसी ही परिस्थिति से गुजर रहा है। 1962 में चीन ने दोस्ती की आड़ में धोखा देकर हमला किया और हमारी हजारों वर्गमील जमीन पर कब्जा ली। बाद में उसने पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर का अक्साई चिन इलाका भी बतौर उपहार ले लिया। उसके बाद भी भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के बावजूद सामान्य सम्बन्ध बने रहे। और फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था विकसित होने के बाद आर्थिक सम्बन्ध इस तेजी से विकसित होते गये कि सीमा विवाद मानो भुला सा दिया गया। हालाँकि बीच-बीच में चीन अपने स्वभाव के मुताबिक कुटिलता दिखाता रहा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसके कारण दुश्मनी सतह पर आती। भारतीय अर्थव्यवस्था पर चीन की छाया इतनी व्यापक हो गई कि पूरा बाजार मेड इन चायना से भर गया। इसका दुष्प्रभाव घरेलू उद्योगों पर पड़ने के बावजूद भारत ने चीन से आयात पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई। यहाँ तक कि नरेंद्र मोदी तक चीन के साथ इकतरफा व्यापार को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से उनकी दोस्ती बड़ी राजनायिक कामयाबी मानी गई। लेकिन चीन कश्मीर और आतंकवाद के मसले पर सदैव पाकिस्तान की तरफदारी करता रहा। और फिर आ गया कोरोना जिसके बाद पूरी दुनिया उसे खलनायक मान बैठी। भारत में भी ये मानने वाले कम नहीं हैं कि दुनिया को इस महामारी के चंगुल में फंसाने वाला चीन ही है फिर भी उसके साथ व्यापारिक रिश्ते बरकऱार रखते हुए कोरोना संबंधी अनेक उपकरण और बचाव के साधन वहां से मंगाए गये। लेकिन वैश्विक महामारी के इस दौर का लाभ लेकर उसने लद्दाख क्षेत्र में घुसपैठ कर दशकों से शांत पड़ी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य हलचल बढ़ा दी। परन्तु इस बार उसे भारत से जो जवाब मिला उसके कारण वह न सिर्फ  चौंका बल्कि शर्मिन्दगी का शिकार भी हुआ। उसने नेपाल, बांग्लादेश, श्री लंका और पाकिस्तान के जरिये भी भारत पर दबाव बनाना चाहा लेकिन वह  योजना कारगर नहीं हुई। भारत ने सीमा पर दो-दो हाथ करने के इरादे तो दिखाए ही, साथ में आर्थिक मोर्चे पर चोट पहुँचाने के लिए भी ताबड़तोड़ फैसले करते हुए उसके आर्थिक बहिष्कार के प्रति जनमत पैदा कर दिया। हालाँकि चीन के नेता, राजनयिक और सरकार नियंत्रित समाचार माध्यम भारत के दावों का मजाक बनाते हुए गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देने से बाज नहीं आये लेकिन सैन्य और राजनयिक स्तर पर बातचीत करते हुए विवाद को हल करने की पहल भी बीजिंग की तरफ से होती रही। इसका ताजा उदाहरण रूस में बीते कुछ दिनों के भीतर पहले भारत और चीन के रक्षा मंत्रियों और फिर विदेश मंत्रियों के बीच हुई लम्बी वार्ताएं हैं। ये लोग मास्को में आयोजित सम्मेलनों में शिरकत करने गये थे। लेकिन इन वार्ताओं की पेशकश चीन की तरफ  से होना ये साबित करता है कि 1962 के बाद पहली बार वह इतना झुका है। लेकिन सीमा पर हरकतें और सैन्य अधिकारियों के साथ चल रही वार्ताओं में उसके अड़ियलपन से ये अनुमान लगाया जा सकता है कि वह विश्व बिरादरी को दिखाने के लिए तो बातचीत करने का ढोंग रचता है किन्तु सीमा पर युद्ध के हालात बनाये रखकर धमकाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। हालांकि चीनी मामलों के जानकार मानते हैं कि वह फिलहाल युद्ध से बचना चाहेगा क्योंकि उसे ये अंदेशा है कि इस बार भारत सैन्य मोर्चे पर जोरदार टक्कर देगा जिससे उसके महाशक्ति होने के दावे को धक्का पहुंचेगा। जून महीने में गलवान घाटी और अगस्त के अंतिम सप्ताह में पेंगांग झील पर भारत के साथ सैन्य टकराहट में उसे जिस तरह का प्रतिरोध झेलना पड़ा वह उसके लिए जितना अप्रत्याशित था उतना ही अपमानजनक भी। गत दिवस विदेश मंत्री स्तर की वार्ता के दौरान दोनों देशों के बीच जिन पांच बिन्दुओं पर सहमति बनी उनमें विश्वास बहाली भी है जिसका आशय व्यापार को पहले जैसा बनाना ही है। इस दृष्टि से भारत सरकार ने पहली बार सैन्य, आर्थिक और राजनयिक तीनों मोर्चों पर जिस तरह चीन के समक्ष  चुनौती पेश की वह उत्साहित करने वाली है। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विशषज्ञों का मानना है कि नरेंद्र मोदी को सीधे जिनपिंग से बात करना चाहिए जो तनाव खत्म करने में कारगर साबित हो सकेगी क्योंकि उनके बीच पूर्व में काफी अच्छा संपर्क  और संवाद रहा है। लेकिन वक्त की नजाकत ये कहती है कि भारत को किसी भी तरह की जल्दबाजी की बजाय बराबरी के साथ बात करनी चाहिए। चीन निश्चित तौर पर बड़ी ताकत है लेकिन हाल के वर्षों में भारत भी हर क्षेत्र में आगे आया है, वरना न तो वह चीनी सेना से टकराने का साहस दिखाता और न ही आर्थिक मोर्चे पर उसके बहिष्कार जैसी बात सोचता। इसीलिये वह चाहे जितनी धमकी और धौंस देता रहे किन्तु उसकी समझ में ये बात आ चुकी है कि भारत के साथ टकराव से उसे भी जबर्दस्त नुकसान होगा और इसीलिये वह सीमा पर शरारत करते रहने के बावजूद वार्ता के लिए लालायित है। सही बात तो ये है कि लद्दाख में सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाने के बाद वह खुद फंस गया है। यदि बिना किसी समझौते के उसने अपनी सेनायें पीछे हटाईं तो उसकी जबर्दस्त किरकिरी होगी। इसी तरह भारत ने यदि व्यापार प्रतिबन्ध जारी रखे तब भी चीन के हितों पर उनका दूरगामी असर होगा। ये देखते हुए फिलहाल भारत भारी न सही लेकिन हर तरह से बराबरी पर है। बावजूद उसके साथ किसी भी स्तर पर बातचीत और उसमें लिए जाने वाले फैसलों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता आवश्यक है क्योंकि चीन किसी भी तरह से विश्वसनीय नहीं है। भारत ने बीते कुछ महीनों में जो तैयारी की है उससे देश और दुनिया में ये एहसास पैदा हुआ है कि  1962 और 2020 के भारत में वाकई जमीन और आसमान का फर्क  है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 11 September 2020

सियासी संरक्षण और प्रतिबद्ध प्रशासन से बढ़ा भ्रष्टाचार




देश में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली एक प्रमुख संस्था है केन्द्रीय सतर्कता आयोग। इसे साधारणत: लोग विजिलेंस कमीशन के नाम से जानते हैं। इसका कार्य केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में होने वाले भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को शुरु में ही रोक देना है। सरकारी खरीदी की बड़ी निविदाओं पर भी इस आयोग की पूर्व स्वीकृति ली जाती है। लेकिन भ्रष्ट लोग भी तुम डाल -डाल, हम पात-पात वाली कहावत को चरितार्थ करने में सिद्धहस्त हैं। और इसीलिये सतर्कता के लिये तैनात अमले को चकमा देते हुए भ्रष्टाचारी जमात अपना कारोबार बेधड़क चलाती रहती है। बाद में जो शिकायतें आती भी हैं उनकी जांच और दोषी को दण्डित करने की प्रक्रिया इतनी जटिल और उबाऊ है कि भ्रष्टाचार करने वाला सीना तानकर घूमा करता है। गत दिवस आयोग ने इस विसंगति को दूर करने के लिए सतर्कता आयोग के अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार की शिकायतों संबंधी फाइलों के समयबद्ध निपटारे के लिए आवश्यक कदम उठाये हैं। जांच का काम देख रहे अधिकारियों के पास लंबित फाइलों की 30 सितम्बर तक समीक्षा की जावेगी और फिर जाँच को अंजाम तक पहुँचाने की प्रक्रिया को तेज किया जावेगा। ये खबर वाकई उत्साहित करने वाली है क्योंकि हमारे देश में यूँ तो समस्याओं के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ खड़े हुए हैं लेकिन उनकी सबसे ऊँची चोटी का नाम भ्रष्टाचार है। यदि ये न होता या कम होता तब भारत जाने कभी का विकासशील से विकसित देश बन चुका होता। चूँकि केंद्र सरकार ही देश को संचालित करती है और संघीय ढांचे के बाद भी उसका प्रभाव और उपस्थिति पूरे देश में है , इसलिए उसके विभागों के भ्रष्टाचार से राज्य सरकारों का शासकीय ढांचा भी प्रेरित होता है। इस लिहाज से यदि केन्द्रीय सतर्कता आयोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन के प्रति गंभीर और परिणाममूलक हो जाये तो देश की अधिकतर समस्याएं आसानी से हल हो सकती हैं। राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार ने अपना कब्जा जमा रखा है। उसे रोकने के लिए स्थापित जांच एजेंसियां अक्षम हों ऐसा नहीं है, लेकिन कुछ तो कार्य संस्कृति के अभाव और कुछ राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से जाँच का काम बीरबल की खिचड़ी जैसा होकर रह जाता है। जैसे-तैसे जाँच पूरी हो भी जाये तो फिर बची-खुची कसर पूरी हो जाती है नवाबी चाल से चलने वाली न्यायपालिका में आकर जहां भ्रष्टाचार के मामले भी दीवानी मुकदमों जैसे बरसों-बरस खिंचते रहते हैं। गवाहों और सबूतों पर टिकी न्यायिक प्रणाली शातिर दिमाग वालों के आगे इस कदर मजबूर हो जाती है कि सब कुछ जानते और समझते हुए भी शीघ्र न्याय प्रदान करने में वह असमर्थ है। ऐसे में यदि सतर्कता आयोग निचले स्तर पर ही अपने नाम को सार्थक साबित करते हुए भ्रष्ट लोगों के गिरेबान को पकड़ सके तो भ्रष्ट तत्वों के हौसले कमजोर किये जा सकेंगे। वर्तमान स्थिति तो बेहद चिंताजनक और निराश करने वाली है। यद्यपि इसके लिए राजनीतिक संरक्षण भी कम जिम्मेदार नहीं है जो अपने प्रभाव का बेशर्मी के साथ दुरूपयोग करते हुए जनता को लूटने वालों को रक्षा कवच प्रदान करता है। सरकार बदलने के साथ ही नौकरशाहों को इधर-उधर किये जाने की संस्कृति प्रतिबद्ध प्रशासनिक तंत्र का कारण बनने से सरकारी महकमे के अफसरों की पहिचान  राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ाव से  होने लगी। सतर्कता आयोग में बैठे अधिकारी भी हैं तो आखिर सरकार के वेतनभोगी और ऐसे में उन्हें भी अपनी नौकरी तथा भविष्य प्यारा होता है। इस लिहाज से जब तक प्रशासन राजनीतिक हस्तक्षेप और पहिचान से मुक्त नहीं होगा सतर्कता आयोग की ताजा पहल को सफलता मिलने में संदेह बना रहेगा। यूँ भी भ्रष्टाचार अब केवल किसी एक या कुछ विभागों में सीमित न रहकर समूचे तंत्र में व्याप्त हो चुका है। ऐसी स्थिति में उससे लड़ने के लिए एक समग्र, सक्षम और स्वायत्त व्यवस्था करनी होगी अन्यथा जाँच और दंड प्रक्रिया में अधूरापन बना रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 10 September 2020

आखिर ज़िन्दगी भी तो हमारी है : सावधानी हटी दुर्घटना घटी



मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी

आखिर ज़िन्दगी भी तो हमारी है : सावधानी हटी दुर्घटना घटी

 जिस तरह बच्चे के बड़े हो जाने के बाद अभिभावक उसका हाथ पकड़ना छोड़ देते हैं ठीक वही  स्थिति भारत में कोरोना को लेकर दिखाई दे रही है | यहाँ अभिभावक के रूप में सरकार और बच्चे के तौर पर जनता को रखा जा सकता है | बीते कुछ समय से ये महसूस होने लगा है कि केंद्र और राज्य दोनों ही  सरकारों ने धीरे - धीरे कोरोना से निपटने के लिए जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया है | इसका संकेत लॉक डाउन में क्रमशः दी जा रही ढील है | दिल्ली जहां कोरोना संक्रमण खत्म होने के दावों के साथ मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अस्पतालों के खाली बिस्तरों का हवाला देते हुए दूसरे राज्यों के मरीजों का  भी दिल्ली में इलाज करने की  दरियादिली दिखाने लगे थे वहां भी कोरोना ने दोबारा अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया | देश में जांच की संख्या बढाए  जाने के साथ ही नए संक्रमितों का भी  सैलाब जैसा आने लगा है और  प्रतिदिन का आंकड़ा एक लाख को छूने के करीब है | अनेक राज्यों ने जनता से कहना शुरू कर दिया है कि जाँच केन्द्रों में जाकर अपनी जाँच खुद करवा लें | इस प्रकार घर - घर जाकर कोरोना संक्रमण की खोज बंद करने की तरफ कदम बढ़ाये जा रहे हैं | हालाँकि बिना चिकित्सक का पर्चा लिए निःशुल्क जांच कराने की  सुविधा  अच्छा निर्णय है लेकिन समाज में अशिक्षा के कारण बड़ा वर्ग ऐसा है जो बीमारी के लक्षण  दिखने पर भी जाँच और इलाज के प्रति लापरवाह बना रहता है | यहाँ  तक कि  पढ़े - लिखे लोगों के बीच भी ऐसे व्यक्ति बड़ी संख्या में हैं जो बीमारी के समयोचित इलाज के प्रति उपेक्षाभाव प्रदर्शित करने में बहादुरी समझते हैं | लॉक डाउन  लगाने और बीच - बीच में उसकी अवधि बढ़ाने के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कोरोना से बचाव हेतु हाथ जोड़कर उसके तरीके बताये थे | सरकारी स्तर पर भी लोगों को खूब जागरूक किया जाता रहा | लेकिन लॉक डाउन को शिथिल किये जाने के साथ ही  सरकार ने ये मान लिया कि लोग बहुत ज्यादा समझदार और जागरूक हो गये हैं तथा अब उन्हें उनके हाल पर छोड़ा जा सकता है | चूंकि कोरोना एक वैश्विक संक्रमण है इसलिए उससे बचने के तौर - तरीके  तथा अन्य शिष्टाचार भी अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार लागू किये जा रहे हैं | लॉक डाउन खत्म होने के बाद हमारी सरकारों ने ये मान लिया है कि देश  की जनता कोरोना से बचाव के सभी तौर - तरीके अच्छी तरह से सीख - समझ गई है | इसीलिये  आये दिन  तमाम बंदिशें हटाई  जा रही हैं |  | और ये तब हो रहा है  जब कोरोना संक्रमण का फैलाव सुरसा के मुंह की तरह फ़ैल  रहा है | इसलिए इस बात पर इतराना निहायत बेवकूफी होगी कि भारत में कोरोना से मृत्यु दर बहुत कम है और ठीक होने वालों का अनुपात भी बहुत संतोषजनक है | चिंता की बात ये है कि देश के सभी शासकीय और निजी अस्पतालों में  बिस्तरों की उपलब्धता रोजाना कम होती जा रही है | अभी तक हर किसी को इस बात की उम्मीद थी कि सितम्बर तक वैक्सीन ईजाद हो जायेगी और अक्टूबर  से उसे लगाने का अभियान भी शुरू हो सकेगा | लेकिन अधिकृत रूप से जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार भारत  और विदेश दोनों जगह बन रही वैक्सीनों के अंतिम परीक्षण अभी चल रहे हैं | भले ही रूस और चीन ये दावा कर रहे हैं कि उनकी  वैक्सीन जनता को लगाई  जाने लगी है किन्तु इस बारे में अभी तक कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा  जा सकता कि भारत में आम जनता तक वैक्सीन कब तक उपलब्ध हो सकेगी | इसे देखते हुए ये जरूरी हो गया है कि अब लोग खुद ही सावधान तो रहें ही साथ ही साथ अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मास्क लगाने और हाथ धोने की जरूरत महसूस करवाएं | वैसे ये अच्छी बात है कि भारत में कोरोना को लेकर बहुत ज्यादा भय नहीं है | फिर भी उसे लेकर लापरवाही भी उचित नहीं कही  जा सकती | देखने में आया है  कि किसी भी समस्या से लड़ते समय जब हमें लगने लगता है कि हम जीत के करीब हैं तभी हम लापरवाह हो जाते हैं और बाजी हाथ से निकल जाती है | कोरोना को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है | अनेक ऐसे लोग जो प्रारंभ से पूरी तरह सावधान रहे , वे लॉक  डाउन हटने के बाद निश्चिन्त हो उठे और कोरोना की  चपेट में आ गये | इसलिए अब जबकि सरकार ने जिम्मेदारी हमारे कन्धों पर डाल दी है , इसलिए बेहतर होगा कि हम सभी कोरोना से खुद को भी बचाएं और दूसरों को भी इस हेतु प्रेरित करें | आखिर ज़िन्दगी भी तो हमारी है | वाहन चालकों को आगाह करती ये चेतावनी इस संदर्भ में भी बेहद प्रासंगिक है कि सावधानी हटी , दुर्घटना घटी ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 September 2020

देखें ड्रग किस - किस फिल्मी नायक को खलनायक बनाता है



सुशांत सिंह राजपूत नामक अभिनेता की मौत के तकरीबन तीन महीने बाद भी जांच एजेंसियां ये तय नहीं पा रहीं कि उसने आत्महत्या की या उसकी हत्या की गई ? यद्यपि सीबीआई हत्या की बात से इंकार कर चुकी है लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रह गईं कुछ तकनीकी गलतियों एवं मृतक के बिसरा की एम्स , दिल्ली द्वारा दोबारा जांच को देखते हुए ये माना जा रहा है कि सीबीआई वाले भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। लेकिन मामला आत्महत्या और हत्या से भी आगे निकलकर अब ड्रग्स ( नशीली दवाओं ) के कारोबार तक जा पहुंचा है। दिवंगत अभिनेता के साथ लिव इन में रह रही उसकी महिला मित्र रिया चक्रवर्ती जो उसकी मौत के हफ्ते भर पहले ही उसका घर छोड़कर चली गई थी , कल रात इसी सिलसिले में गिरफ्तार कर ली गई। नशीली दवाओं के विरुद्ध काम करने वाले नारकोटिक्स नियन्त्रण ब्यूरो द्वारा की गयी सघन पूछताछ के बाद रिया द्वारा खुद सेवन करने के अलावा सुशांत के लिए उसकी खरीदी के लिए ड्रग कारोबारियों से सम्बन्ध रखने की बात स्वीकार कर ली गयी। इसी मामले में ब्यूरो ने रिया के भाई के अलावा सुशांत के घर का प्रबन्ध देखने वाले शख्स और एक नौकर को पहले ही हिरासत में ले रखा था। उन सबसे हुई पूछताछ में रिया की भूमिका पता चली और उसके बाद जब उसे बुलाकर लगातार तीन दिन तक सवाल किये गए तब शुरुवाती दौर में अपने को पाक-साफ़  बताने वाली रिया अंतत: अपना गुनाह कबूल कर बैठी। यद्यपि उसने बार-बार यही दोहराया कि वह सुशांत के लिए ड्रग खरीदती थी और उसने कभी-कभार ही उसका सेवन किया 
। लेकिन उसके व्हाट्स एप से जाँच एजेंसियों ने जो बातें खोज निकालीं उनसे पता चला कि सुशांत के जीवन में आने से पहले ही वह इस कारोबार से जुड़े लोगों के सम्पर्क में आ चुकी थी। इस सबसे हटकर उसके बयानों में जो सबसे बड़ी बात सामने आई , वह है फिल्मी दुनिया के तकरीबन 25 लोगों के ड्रग सेवन करने की जानकारी। उस आधार पर नारकोटिक्स नियन्त्रण ब्यूरो अब उन 25 हस्तियों को समन भेजकर उनसे पूछताछ करने के संकेत दे रहा है। यदि ऐसा होता है तब इन दिनों अपने धाकड़ बयानों से चर्चित अभिनेत्री कंगना रनौत के ये आरोप भी विचारणीय हो जाते हैं जिनके अनुसार मुम्बई फिल्म उद्योग में ड्रग का चलन बेहद आम है। कंगना ने कुछ प्रमुख अभिनेताओं के नाम लेकर उनसे अपनी जाँच करवाने को कहा लेकिन उनमें से किसी ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। रवीना टंडन और गजेन्द्र सिंह चौहान ने अवश्य ये कहा कि कंगना को पूरी फिल्मी बिरादरी को नहीं लपेटना चाहिए था किन्तु बाकी हस्तियाँ जिस तरह चुप्पी साधकर बैठी हुईं हैं वह चोर की दाढ़ी में तिनके की कहावत को सही साबित कर रही हैं। कंगना के आरोप को अतिरंजित भी मान लें लेकिन अब तो रिया ने भी इस बारे में खुलासा कर दिया है। सुशांत खुद ड्रग लेते थे या नहीं इसकी पुष्टि तो अब तकरीबन असम्भव है लेकिन गत रात्रि जीटीवी पर प्रसारित एक वीडियो में सुशांत जहाँ नशे की हालत में दिख रहे थे वहीं रिया उनसे बात करती सुनाई दे रही थीं। ऐसा लगता है जैसे वीडियो उन्हीं के द्वारा बनाया गया था। उसे देखकर ये लगता है कि सुशांत नशे में था। लेकिन वह इसका आदी था या उसे ये किसी योजनापूर्वक दिया जाता रहा, ये अभी भी रहस्य है। लेकिन पहले कंगना और अब रिया के खुलासे के बाद मामला फिल्मी दुनिया में ड्रग के चलन पर आकर केन्द्रित हो गया है। रिया खुद को बचाने के लिए हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे वाली नीति पर चल रही है या उसकी बात में सच्चाई है, ये ब्यूरो पता करेगा। उसकी गिरफ्त में ड्रग की आपूर्ति करने वाले जो लोग आ चुके हैं उनसे भी कुछ न कुछ जानकारी तो मिली ही होगी। उसके आधार पर शराफत का नकाब पहने तमाम ऐसे चेहरे बेपर्दा होंगे जो फिल्मों में तो माफिया के विरुद्ध नायक को लड़ते और जीतते दिखाते हैं लेकिन असल जि़न्दगी में स्वयं उसी बुराई में डूबे हुए हैं। ड्रग और अवैध हथियारों का कारोबार पूरे विश्व में फैला हुआ है। भारत भी अपवाद नहीं है। फिल्मी दुनिया में ड्रग और अवैध हथियार के आरोप में अभिनेता संजय दत्त जेल तक जा चुके हैं। लेकिन फिल्म जगत ने बजाय उनका बहिष्कार करने के संजू नामक बायोपिक बनाकर उनका महिमामंडन किया। बकौल कंगना फिल्मी पार्टियों में बात शराब से बढ़कर ड्रग तक जा पहुँची है। सुशांत की मौत और उसके बाद रिया के बारे में टीवी चैनलों ने इतना ज्यादा कवरेज किया कि लोगों को टीवी समाचारों तक से वितृष्णा होने लगी। लेकिन अब ये जो नया ड्रग खुलासा हुआ है ये बहुत ही गम्भीर है क्योंकि इसके सत्य साबित होने की स्थिति में फिल्म जगत के अपराधी सरगनाओं से निकट सम्बन्ध भी उजागर हुए बिना नहीं रहेंगे। लेकिन इस मामले में शोचनीय पहलू ये भी है कि महाराष्ट्र सरकार विशेष रूप से शिवसेना जिस तरह से व्यवहार कर रही है उससे ये शक भी पैदा हो रहा है कि कहीं इस मामले का सम्बन्ध राजनीति से भी न हो। यूँ भी महाराष्ट्र विशेष रूप से मुम्बइया राजनेताओं के फिल्मी बिरादरी से आत्मीय सम्बन्ध सर्वविदित हैं और उसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन शिवसेना द्वारा सुशांत मामले की जांच सीबीआई को दिए जाने से लेकर कंगना के आरोपों पर जिस तरह की बौखलाहट दिखाई गई वह कहानी में कुछ चौंकाने वाले मोड़ आने की आशंका व्यक्त कर रही है। संयोग ये है कि फिल्मी दुनिया में ड्रग के चलन की जानकारी देने वाली कंगना महीनों बाद आज मुम्बई आ रही हैं जबकि रिया जेल। इस दोनों अभिनेत्रियों के बयान किन-किन नायकों को खलनायक साबित करेंगे ये देखने वाली बात होगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी