Monday, 21 September 2020

कृषि सुधार : बिखराव का प्रतीक बन गई विपक्षी एकता



संसद के दोनों सदनों से कृषि सुधार विधेयकों के पारित होने के बाद उनके कानून बनने का रास्ता साफ़ हो गया है।  लेकिन गत दिवस राज्यसभा में विपक्ष के कुछ सांसदों ने जिस तरह का अभद्र आचरण किया उससे साबित हो गया कि वह खीझ निकाल रहा है।  राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं होने के बाद भी सत्तापक्ष ने ऐसे तमाम महत्वपूर्ण विधेयक पारित करवा लिए जिनका कांग्रेस के साथ ही अन्य विपक्षी दल जमकर विरोध कर रहे थे। इसके लिए मोदी सरकार के सदन प्रबन्धन (फ्लोर मैनेजमेंट) की प्रशंसा करनी होगी।  लेकिन उससे भी बढ़कर यह विपक्ष की विफलता है जो अपना बहुमत होते हुए भी एकजुटता नहीं दिखा पाने की वजह से शुरू में तो दबाव बनाता है लेकिन निर्णय की घड़ी में उसके गुब्बारे की हवा निकल जाती है।  विरोध में चिल्लाने वाले अनेक विपक्षी दल मतदान के समय जिस तरह बहिर्गमन कर जाते हैं उससे उनके बारे में ये धारणा बन गई है कि भीतर - भीतर उनकी सत्ता पक्ष से मिली भगत है।  मौजूदा सत्र के पहले भी कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्षी एकता की कोशिश की लेकिन सत्र शुरू होने के पहले वे और राहुल गांधी चिकित्सा कार्यवश विदेश चले गये जिससे विपक्ष का बिखराव बना रहा।  और ऊपर से  कांग्रेस अपने बनाये जाल में खुद ही फंस गई। पंजाब और हरियाणा में हो रहे विरोध का कारण भी उजागर हो चुका है।  यही वजह है कि महीनों पहले जारी अध्यादेशों का किसानों के बीच राष्ट्रव्यापी विरोध खड़ा करने में कांग्रेस ही नहीं बाकी विपक्षी दल भी नाकामयाब रहे।  किसानों के पक्षधर स्वयंसेवी संगठन जितने मुखर हाल ही में नजर आ रहे हैं वे अध्यादेश जारी होने के बाद ही उनके कथित किसान विरोधी प्रावधानों पर राष्ट्रीय विमर्श छेड़ते तब शायद आम किसान और जनता उस पर ध्यान देती। सबसे बड़ी बात ये रही कि कांग्रेस का अन्तर्विरोध उस समय निकलकर बाहर आ गया जब उसके पूर्व प्रवक्ता रहे संजय झा ने ही ये बात उजागर कर दी कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के घोषणापत्र में भी ऐसे कानूनों का वायदा किया गया था। राहुल गांधी ट्वीट करते हुए लगातार इन विधेयकों को लेकर मोदी सरकार पर आरोप लगाते रहे लेकिन श्री झा के खुलासे का कोई समुचित उत्तर पास नहीं होने से उनका विरोध असरहीन रहा।  इन विधेयकों के विरोध में सबसे बड़ा तर्क दिया गया कि इनके कानून बनते ही सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था खत्म कर दी जायेगी।  लेकिन प्रधानमन्त्री और कृषि मंत्री सहित सरकार के अनेक प्रवक्ता कह चुके हैं कि नये कानून किसान को ये आजादी देंगे कि वह चाहे तो अपना उत्पादन सरकार को बेचे या जहाँ उसे ज्यादा कीमत मिले वहां उसका विक्रय करे।  सरकारी मंडियों की अनिवार्यता और प्रदेश के बाहर बिक्री पर लगी रोक हट जाने से अब किसान के सामने पूरे देश का बाजार खुला है जिसमें वह अपने लिए अधिक मुनाफे वाले अवसर चुन सकता है। सरकार के शीर्ष स्तर से संसद और उसके बाहर ये आश्वासन दिया जा चुका है कि समर्थन मूल्य पर खरीदी जारी रहने के बाद भी किसानों को सरकारी मकडज़ाल से आजादी मिल जायेगी।  ऐसे में विपक्ष को भी अपनी नीति बदलनी चाहिए वरना वह एक बार फिर हाशिये पर चला जाएगा।  गत दिवस राज्यसभा में जो कुछ भी हुआ वह बहुत ही अशोभनीय था।  दुर्भाग्यवश आसंदी के फैसले से असहमति जताने के लिए उनके माइक तोड़ने और नियमावली फाड़ देने जैसी हरकत करने वालों में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद डेरेक ओ ब्रायन भी थे जो सदन में तथ्यपूर्ण बहस के लिए जाने जाते हैं।  आसंदी के प्रति बेहद आपत्तिजनक व्यवहार के लिए दंडस्वरूप सभापति ने आज 8 विपक्षी सदस्यों को सप्ताह भर के लिए निलम्बित कर दिया।  हो सकता है इस अवधि के पूर्व सत्र ही समाप्त हो जाये। यदि विपक्ष को विधेयक के पारित होने की बात उदरस्थ नहीं हो रही थी तो संसदीय प्रजातंत्र में विरोध के लिए और भी मान्य तरीके हैं।  लेकिन ऐसा लगता है विपक्ष की दशा से ज्यादा दिशा खराब है तभी वह देश के किसानों की आवाज नहीं बन सका।  कहा जा रहा है कि कृषि सुधार के इन विधेयकों को किसानों का बड़ा वर्ग पसंद भी कर रहा है। रही बात समर्थन मूल्य की तो खरीफ फसल आने में ज्यादा समय नहीं है और धान खरीदी के समय सरकार के आश्वासन की पुष्टि हो जायेगी। बेहतर होगा विपक्ष इस मुद्दे पर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाये। नए कानूनों को लेकर उसकी आशंकाएं यदि सही थीं तो उसे अध्यादेश जारी होते ही सीधे किसानों के बीच जाना था जिसमें वह हमेशा की तरह चूक गया।  इस बारे में ध्यान देने योग्य बात ये भी है कि जब तक सरकार गरीबों को सस्ता या मुफ्त अनाज देने वाली सार्वजनिक प्रणाली जारी रखेगी तब तक उसे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देते रहना पड़ेगा।  विपक्ष ये भूल जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पूंजीपतियों को संरक्षण देने के कितने भी आरोप लगाये जाएं लेकिन वे गरीबों को खुश करने में कभी पीछे नहीं रहते जो उनकी सफलता का रहस्य है।  कोरोना काल में देश की आधी से ज्यादा गरीब आबादी को मुफ्त और सस्ता अनाज वितरित करने का उनका फैसला इसका प्रमाण है। कृषि सुधार कानूनों को लागू करने का दांव बहुत जोखिम भरा भी है क्योंकि यदि ये कारगर नहीं हुए तो केंद्र सरकार को लेने के देने भी पड़ सकते हैं। लेकिन फिलहाल तो विपक्ष एक बार फिर पराजय की मुद्रा में खड़ा नजर आ रहा है।  किसानों का एकमुश्त समर्थन हासिल करना तो दूर वह अपनी बिरादरी तक को एकजुट नहीं रख सका।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 19 September 2020

पंजाब की राजनीति भी महाराष्ट्र की राह पर बढ़ रही



अकाली दल ने तो केंद्र सरकार से अपनी एकमात्र सदस्य हरसिमरत  कौर बादल को हटाने के बावजूद राजग से अलग होने  के बारे में कुछ नहीं कहा | लेकिन गत दिवस प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने जिस अंदाज में कृषि सुधार विधेयकों का विरोध कर रहे विपक्षी दलों के अलावा अकाली  दल पर भी  निशाना साधा उससे ये संकेत  मिल रहा है कि भाजपा  अकाली दल से मुक्ति पाना चाहती है  जिसके रहते उसका पंजाब में स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बन सका  | श्री मोदी ने साफ़ शब्दों में कहा कि जब उक्त अध्यादेश जारी हुए थे तब अकाली दल उनका समर्थन कर रहा था | हालाँकि हरसमिरत ने कल ये सफाई दी कि उनके विरोध को नजरअंदाज कर दिया गया किन्तु यदि ऐसा था तो वे इतने दिनों तक क्यों रुकी रहीं , ये बड़ा सवाल है | सही बात तो ये है कि अकाली दल के मौजूदा अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल अपने कद्दावर पिता प्रकाश सिंह बादल के कारण पार्टी के मुखिया तो बन बैठे लेकिन उनमें उन जैसी राजनीतिक सूझबूझ नहीं है | ये  कहना भी गलत न होगा कि पिछले  विधानसभा चुनाव में अकाली - भाजपा गठबंधन की सरकार जिस नशे के मुद्दे के कारण सत्ता से बाहर हुई उसके लिए सुखबीर और उनके साले ही जनता की   नजर में खलनायक  बन गये थे | प्रकाश सिंह बादल संघर्ष करते हुए सियासत के शिखर तक पहुंचे लेकिन सुखबीर को सब कुछ बना - बनाया मिला | लेकिन इस घटनाक्रम  के पीछे भाजपा और श्री  मोदी की दूरगामी सोच भी है | एक समय था जब हरियाणा  में  भाजपा के लिए पैर रखने के लिए तक जगह नहीं होती थी | बंशीलाल और  देवीलाल जहां जाट नेता थे तो भजनलाल अन्य वर्गों के | स्व. सुषमा स्वराज मूलतः हरियाणा की थीं  परन्तु  वे भी वहां प्रभाव नहीं जमा सकीं | लेकिन बीते दो विधानसभा चुनाव से भाजपा वहां सरकार बनाने के साथ ही लोकसभा  चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने में सफल रही | इससे उसका हौसला बढ़ा है | लेकिन पंजाब में उसका अपना जनाधार इसलिए नहीं बन पाया क्योंकि वह बादल परिवार के  आभामंडल  में छिपकर रह जाती थी | अब चूँकि प्रकाश सिंह बादल वृद्धावस्था के कारण बीमार रहने से सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके हैं इसलिए पंजाब  की गैर कांग्रेस राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया है | बीते कुछ समय से आम आदमी पार्टी जिस तरह से पंजाब में अपने पैर जमा रही है उससे एक बात साबित हो गयी कि वहां के सिख समुदाय में कांग्रेस के प्रति नाराजगी रखने वाला वर्ग अब अकाली दल से हटकर दूसरे विकल्प के प्रति मानसिक तौर पर तैयार है | भाजपा को लग रहा है कि पंजाब के गैर सिख मतदाताओं के अलावा नई पीढ़ी  के सिख भी धार्मिक कट्टरता के मोहपाश से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ने के लिए तैयार हैं | प्रकाश सिंह बादल विपक्षी एकता के बहुत पुराने सूत्रधार थे और भाजपा की हिंदूवादी छवि के बाद भी उन्होंने उसके साथ गठबंधन बनये रखा | स्व . भैरोसिंह शेखावत और स्व. अटलबिहारी वाजपेयी से उनके निजी सम्बन्ध भी गठबंधन के स्थायित्व का कारण रहे | भाजपा भी उन्हें उसी तरह स्वीकार करती रही जैसे महाराष्ट्र में स्व. बाल ठाकरे के रहते वह शिवसेना की सहयोगी बनकर संतुष्ट थी |  लेकिन उनके न रहने पर वह उद्धव को बर्दाश्त नहीं  कर सकी | स्व. प्रमोद महाजन भाजपा के राष्ट्रीय नेता जरूर रहे लेकिन बाला साहेब के सामने वे भी ऊँची आवाज में बात नहीं कर पाते थे जबकि शिवसेना और भाजपा का गठबंधन तैयार करने वाले मुख्य शिल्पी वही थे | यही  स्थिति पंजाब में प्रकाश  सिंह बादल के सामने भाजपा की बनी रही | लेकिन ज्यों - ज्यों वे परिदृश्य से बाहर होते जा रहे हैं त्यों - त्यों भाजपा  भी पंजाब में अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बनाते हुए हरियाणा जैसे नतीजे की योजना बनाने लगी है | कृषि सुधार विधेयकों के विरोध में हरसिमरत कौर के इस्तीफे के बाद भी अकाली दल ने राजग छोड़ने की मंशा जाहिर नहीं की थी | बावजूद उसके प्रधानमंत्री ने जिस तल्खी भरे अंदाज में अकाली दल को आलोचना  के घेरे में लिया उससे लगता है कि पंजाब में अब भाजपा खुद के बलबूते खड़े  होने की तैयारी में है | इस बारे में गौर करने  वाली बात ये भी है कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री कैप्टेन  अमरिंदर सिंह के विरुद्ध जमकर असंतोष के स्वर उठ रहे हैं | पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा तो बगावत का झंडा उठाये घूमते ही रहते हैं | इसी तरह सिख समुदाय के अनेक प्रभावशाली लोग जो आम आदमी पार्टी के चमत्कारिक उदय के बाद उसके प्रति आकृष्ट हुए थे वे भी निराश होकर अब किसी और दल से  अपनी उम्मीदें जोड़ना चाह रहे हैं | भाजपा  ऐसे लोगों पर नजर रखे हुए है | इस प्रकार आने वाला समय पंजाब की राजनीति में उथल पुथल भरा होगा | बड़ी बात नहीं वहां भी महाराष्ट्र की तर्ज पर बेमेल गठबंधन नजर आएं | अकाली दल के इस्तीफे रूपी पैंतरे पर प्रधानमंत्री की रोषपूर्ण प्रतिक्रया में भविष्य के अनेक संकेत छिपे हुए हैं |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 18 September 2020

नए क़ानून : प्रधानमंत्री को चाहिए किसानों को आश्वस्त करें



भारत परम्परागत  कृषि प्रधान देश है और अर्थव्यवस्था में भी कृषि का बहुत बड़ा योगदान है। सबसे ज्यादा रोजगार इसी क्षेत्र में मिलता है। आबादी का बड़ा हिस्सा गाँवों में  ही रहता है। ग्रामीण पृष्ठभूमि के सांसदों  और विधायकों  की संख्या भी अच्छी खासी होगी। राजनीतिक दलों के संगठन में किसान प्रकोष्ठ भी होता है। अनेक स्वयंसेवी संगठन और कृषि अर्थशास्त्री किसानों की भलाई के लिए कार्य करते रहते हैं । चुनावी घोषणापत्रों का बड़ा भाग  गाँव और खेती पर केन्द्रित होता है। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की आय दोगुनी करने के लिए बाकायदा एक कार्यदल भी  बना रखा है। उनको फसल के वाजिब दाम मिलें इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदी की सरकारी व्यवस्था भी  बनी हुई है। ये मूल्य लगातार बढ़ाये जाते हैं। केंद्र  और राज्य दोनों के बजट में बहुत बड़ी राशि ग्रामीण विकास के लिए आवंटित की जाती है। इसका लाभ भी हुआ और ग्रामीण भारत की तस्वीर पूर्वापेक्षा काफी बदली है। सड़क  और बिजली की समुचित व्यवस्था होने से गाँवों के जनजीवन में  आमूल परिवर्तन  हुआ , जिसे एक सीमा तक सुधार भी कहा  जा सकता है। लेकिन किसान की माली हालत को लेकर सदैव चिंताए बनी रहती हैं। अच्छी फसल आने पर उसे दाम नहीं मिलते , वहीं खराब फसल उसे कर्ज और अवसाद में डुबो देती है। यही वजह है कि किसानों की  बदहाली राष्ट्रीय विमर्श का एक स्थायी  विषय बन गई है। खेती भारत की आत्मा कही जाती है। कोरोना काल में जब अर्थव्यवस्था के सारे अंग शिथिल हो गये तब भी किसानों के पौरुष ने देश का आत्मविश्वास बढ़ाने में ऐतिहासिक योगदान दिया। उसी के बल पर प्रधानमन्त्री  गरीबों को मुफ्त और सस्ता अनाज देने की अपनी घोषणा को सफलतापूर्वक लागू कर सके।  उसी दौरान किसानों की  आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने कुछ सुधारवादी निर्णय लेते हुए अध्यादेश जारी किये। जिन्हें कानूनी शक्ल देने के लिए संसद में पेश किया गया। कांग्रेस ने तो   इनका विरोध किया ही लेकिन मोदी सरकार में हिस्सेदार अकाली दल भी इन विधेयकों के विरोध में खडा हो गया । गत रात्रि हरसिमरत कौर बादल ने केंद्र सरकार के मंत्रीपद से भी इस्तीफा  दे दिया। संसद  में उनके पति और अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी विधेयकों को  किसान विरोधी बताया। हालांकि अकाली दल अभी भी राजग में बना हुआ है जिस पर पंजाब  के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने तंज भी कसा। दरअसल अकाली दल के विरोध का कारण पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा किये जा रहे उग्र विरोध प्रदर्शन हैं। केंद्र सरकार इन कृषि सुधारों को क्रांतिकारी बताते हुए दावा कर रही है कि इनसे किसान का शोषण रुक सकेगा और वह अपनी फसल के उचित दाम प्राप्त करने के लिए उन्हें खुले बाजार में कहीं भी बेचने के लिए स्वतंत्र होगा। सबसे बड़ी बात कृषि उपज मंडी नामक बंदिश हटा दी गयी। किसानों की ये बड़ी पुरानी मांग रही है कि सरकारी  मंडी उनके शोषण का माध्यम है। इसकी वजह से वे अपनी उपज उन स्थानों में नहीं बेच पाते जहां अपेक्षाकृत ज्यादा दाम उन्हें मिल सकते हैं। जिला और प्रदेश बंदी जैसी व्यवस्थएं खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने के तमाम आशावाद पर पानी फेरती रही हैं। सरकारी मंडियां चाहे  वे किसी भी राज्य की हों , भ्रष्टाचार का खुला अड्डा बनकर रह गईं। इनकी स्थापना किसानों को बिचौलियों और आढ़तियों से बचाने के लिए की गई थी । लेकिन हुआ उलटा और  हालात आसमान से टपके खजूर पर अटके वाले बन गये। नए सुधार में सबसे बड़ा बिंदु यही है और पंजाब - हरियाणा के किसान इसी के विरोध में आंदोलित हैं। इस विरोध का एक कारण ये बताया जा रहा है कि इन दोनों राज्यों में बीते कुछ दशकों से बासमती चावल का उत्पादन बढऩे से चावल मिलें भी खूब लग गईं। लेकिन देखा सीखी मप्र सहित अन्य कुछ पड़ोसी राज्यों के किसानों ने भी बासमती उगाना प्रारम्भ कर दिया। नई व्यवस्था में इन राज्यों से आने वाले सस्ते उत्पादन पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए नुकसान की वजह बन सकते हैं  इसी तरह अब गेंहूं में भी उक्त दोनों राज्यों का इकतरफा आधिपत्य नहीं रहा। इनके अलावा ये भी  कहा जा रहा है कि इन सुधारों के माध्यम से किसान और खेती बड़े औद्योगिक घरानों के हाथ में चली जायेगी। जो शुरुवात में तो किसानों को लुभाने के लिए उन्हें ज्यादा लाभ देंगे  लेकिन धीरे - धीरे वे अपनी चालें दिखाते हुए उन्हें अपने शिकंजे में जकड़कर लाचार बना देंगे। सरकार के दावों और विरोध के तर्कों में सही - गलत का आकलन करना जल्दबाजी होगी। हालाँकि कुछ कृषि विशेषज्ञों की  ये बात विचारणीय कि अनेक विकसित देशों में इस तरह के सुधार किसानों के लिए जबरदस्त नुकसान का सौदा साबित हुए हैं। ये देश किसानों को भरपूर  सब्सिडी दिया करते हैं जबकि भारत  पर सब्सिडी खत्म करने का दबाव बनाने में पीछे नहीं रहते। सही  बात तो ये है कि भारत की अर्थव्यवस्था अधकचरेपन का शिकार होकर रह गई है। एक तरफ तो जहाँ मुक्त अर्थव्यवस्था की हिमायत करते हुए विदेशी पूंजी  के लिए लाल कालीन बिछाने की प्रतियोगिता चलती रहती है वहीं दूसरी तरफ पश्चिमी देशों की नकल करते हुए जो सुधार लागू किये जाते हैं वे भारतीय परिवेश को  पूरी तरह रास नहीं आने से नई समस्याएँ उत्पन्न कर देते हैं। केंद्र सरकार द्वारा किये गये इन सुधारों को लेकर भी इसी तरह की आशंकाएं व्यक्त की  जा रही हैं। प्रधानमन्त्री का कहना है कि कुछ लोग किसानों को भड़काकर अपना  राजनीतिक  स्वार्थ सिद्ध करना चाह रहे हैं। उनकी बात सही भी हो सकती है किन्तु उन्हें  किसानों को आश्वस्त करना पड़ेगा कि  नए कानून उनके हिर्तों को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। प्रधानमन्त्री यूँ तो जनता से सीधे संवाद करते रहते हैं लेकिन उनके विरोध में ये अवधारणा भी तेजी से फैलाई जा रही  है कि  वे बड़े औद्योगिक घरानों के हितों के पोषक बनकर आम जनता को उनका गुलाम बनाने के लिए काम  कर रहे हैं। अभी तो केवल पंजाब और हरियाणा में किसानों का असंतोष सड़कों पर आया है। कानून पारित होने के बाद  देश  भर  से क्या प्रतिक्रियाएं आती हैं , ये देखने वाली बात होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 16 September 2020

राजनीति में भी सीधी भर्ती वालों का प्रशिक्षण काल होना चाहिए



 मप्र के शहडोल जिले में पदस्थ एसडीएम और संयुक्त कलेक्टर रमेश सिंह ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। खबर है वे अनूपपुर विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी बनना चाहते हैं और इस सिलसिले में पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस  अध्यक्ष कमलनाथ से भी  मिल आये हैं। हालांकि अभी उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं  हुआ है लेकिन उन्होंने कांग्रेस से लड़ने का कारण  पारिवारिक पृष्ठभूमि को बताया। वैसे नियमों की बात करें तो इसमें गलत कुछ भी नहीं होगा। वे खुद भी अनूपपुर के रहने वाले हैं। श्री सिंह ने 14 वर्ष की सेवा पूरी कर ली जिसके बाद वे सेवानिवृत्ति के पात्र हो गए हैं। शासकीय सेवा से त्यागपत्र देकर जनसेवा करने की उनकी मंशा स्वागतयोग्य है लेकिन इसके लिए वे विधायक बनना चाहते हैं ये सुनकर आश्चर्य होता है। एक प्रशासनिक अधिकारी रहते हुए उन्हें सरकारी कार्य संस्कृति  की पर्याप्त जानकारी हो गई होगी और उस आधार पर  वे पिछड़े क्षेत्र का विकास करना चाहते हैं। एक युवा अच्छी- खासी सरकारी नौकरी छोड़कर जनसेवा के रास्ते पर चलना चाहे ये आदर्श स्थिति है किन्तु उनके निर्णय से एक बार फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ है जो किसी पूर्व न्यायाधीश को राज्यसभा  में भेजे जाने पर उठता है। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश पद से निवृत्त होते ही रंजन गोगोई को जब राज्यसभा में मनोनीत किया गया तब विपक्ष ने बड़ा बवाल मचाया था। आरोप प्रतिबद्ध  न्यायपालिका तक जा पहुंचे। सेवानिवृत्ति के फौरन बाद न्यायाधीशों को किसी प्रकार से उपकृत किये जाने पर रोक की मांग तो अरसे से उठ रही है। लेकिन सरकारी  अधिकारियों को लेकर ऐसी बंदिश की बात नहीं होती। इसीलिये सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आकर स्थापित होने की चाहत लगातार  बढ़ती ही जा रही है। रमेश सिंह से पहले भी देश भर में सैकड़ों नौकरशाह रातों -  रात राजनेता बनने के लिए चुनाव के मैदान में कूद पड़े जिनमें कुछ सफल होकर संसद - विधानसभा में पहुंचे और कई मंत्री भी बन बैठे। पूर्व नौकरशाहों के अनुभव और योग्यता का लाभ लेना बुरा नहीं  है लेकिन उसके लिए सीधे  सांसद , विधायक या मंत्री बनाने से प्रतिबद्ध नौकरशाही का आरोप लगना स्वाभाविक है। एक सरकारी अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद यदि राजनीति में उतरना चाहे तो उसे एक निश्चित समयसीमा तक चुनाव लड़ने या किसी सरकारी पद से वंचित रखा जाना चाहिए। यदि नौकरी से निवृत्त होते ही वह किसी राजनीतिक दल के टिकिट पर चुनाव लड़ता है तो उस पर ये आरोप लगता है कि सेवा में रहते हुए उसने उस राजनीतिक दल को लाभ पहुँचाया होगा। हालाँकि राजनीति में जातिवाद हावी हो जाने के बाद से अब नौकरशाही राजनीतिक विचारधारा से ज्यादा जातिगत आधार पर विभाजित हो चली है। विशेष रूप से अनु. जाति और जनजाति के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग के कर्मचारी  और अधिकारी भी एक दबाव समूह बन गये हैं। प्रातिक्रियास्वरूप प्रशासन में बैठे अगड़ी जातियों के लोग भी जातीय आधार पर संगठित होने लगे हैं। और ये सब इसीलिए हो रहा है क्योंकि नौकरशाही को राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा है। रमेश सिंह य़ा उन जैसे तमाम अधिकारी सेवा में रहते हुए भी किसी न  किसी राजनीतिक दल के हिमायती  बने रहते हैं और अवसर पाते ही उसमें  शामिल होकर नेतागिरी करने लगते हैं। प्रशासन पर इसका बुरा असर साफ़ देखा जा  सकता है। मप्र में अनु.जाति के एक आईएएस अधिकारी घूस लेते रंगे हाथ पकड़ लिए गये थे। उसके बाद वे लगातार अपनी  जाति के कारण प्रताड़ित होने का रोना रोते रहे। हालांकि  कानूनी लड़ाई के बाद वे बहाल भी हो गए किन्तु मनमाफिक पदस्थापना नहीं  मिलने से नाराज रहे और सेवानिवृत्ति पर भी उनका बयान बेहद तल्खी भरा रहा। इन सब कारणों से लगता है अब पूर्व नौकरशाहों के   राजनीति में प्रवेश संबंधी  आचार संहिता बननी चाहिए। कलेक्टर जैसा पद त्यागकर मुख्यमंत्री तक जा पहुंचे स्व. अजीत जोगी के नक़्शे कदम पर चलते हुए न जाने कितने नौकरशाह प्रशासक से शासक बन बैठे। मोदी सरकार के अनेक महत्वपूर्ण मंत्री वरिष्ठ नौकरशाह रहे हैं। आजकल तो सेवानिवृत्त होते ही किसी  राजनीतिक  दल की सदस्यता लेने का फैशन सा बन गया है। ये कितना सही या गलत है इस पर गंभीरता से विमर्श होना जरूरी है क्योंकि प्रतिबद्ध न्यायपालिका की तरह से ही प्रतिबद्ध नौकरशाही भी लोकतंत्र के लिए उतनी  ही घातक है। यहाँ ये बात उल्लेखनीय है कि सरकारी नौकरी में चयन के उपरांत अधिकारी कुछ समय तक प्रशिक्षण काल में रहता है। उसके पूरा होने के  बाद ही उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाती है। राजनीति में भी सरकारी  सेवा के बाद आये लोगों को कुछ समय तक तो प्रशिक्षण की प्रक्रिया से गुजरना चाहिए अन्यथा पार्टी के लिए बरसों से पसीना बहा रहे कार्यकर्ताओं के मन में इस सीधी भर्ती से जो असंतोष फैलता है उसकी वजह से उनके  संगठनात्मक ढांचे को नुकसान होता है। कांग्रेस तो  इसका खमियाजा भुगत ही रही है लेकिन अब भाजपा में भी पूर्व नौकरशाहों की सीधी भर्ती जिस तरह से की  जा रही है उसकी वजह से पार्टी विथ डिफरेंस का उसका दावा अर्थहीन होने  लगा  है ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 15 September 2020

प्राणों पर संकट के बीच प्राणवायु का संकट !





कहाँ तो बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते  हुए जगह-जगह ऑक्सीजन पार्लर शुरू होने  की खबरें आ रही थीं और कहाँ देश भर से ये समाचार आने लगे कि कोरोना संकट  के कारण  अस्पतालों तक में ऑक्सीजन का अभाव होने लगा। हालाँकि जैसा केन्द्रीय  स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने गत दिवस संसद में बताया उसके अनुसार देश में 92 फीसदी कोरोना मरीज साधारण किस्म के हैं जिनमें से मात्र 6 फीसदी को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही है। ठीक होने वाले कोरोना संक्रमितों का प्रतिशत भी वैश्विक स्तर से काफी कम है। नये मरीजों की संख्या  में तेजी से वृद्धि के बावजूद  संतोष का विषय है कि स्वस्थ होने वालों की संख्या भी अच्छी खासी है। लेकिन ये सरकारी  आंकड़े हैं और इन पर आँख मूंदकर विश्वास कर लेना आपने आपको धोखा देने जैसा होगा। यद्यपि ये समय  आलोचना का नहीं है क्योंकि पूरी दुनिया इससे पीड़ित है। अमेरिका जैसे विकसित देश तक कोरोना के सामने असहाय साबित हुआ। उस दृष्टि से भारत अपने प्रदर्शन पर अभी तक जो संतोष व्यक्त करता रहा वह बीते दो महीनों में सवालों के घेरे में आ गया है। भले ही आंकड़ों  में कोरोना से मृतकों  का आंकड़ा बेहद कम हो लेकिन बीते कुछ दिनों से श्मसान भूमि में होने वाले  अन्त्तिम संस्कार जिस तरह से बढ़े  वह उन दावों को झुठलाने  के लिए पर्याप्त है जो स्थानीय प्रशासन से लेकर केंद्र सरकार तक कर रही है। डा. हर्षवर्धन स्वयं चिकित्सक हैं इसलिए उनकी व्यवसायिक योग्यता और ईमानदारी पर संदेह किये बिना ये कहा जा सकता है कि मंत्री चाहे केंद्र का हो या राज्य का वह  जो जानकारी सदन में देता है वह प्रशासनिक अमले द्वारा प्रदान  की जाती है और उसमें तथ्यों को छिपाये  जाने की सम्भावना से इंकार नहीं जा सकता। उस दृष्टि से संसद में स्वास्थ्य मंत्री द्वारा दिए गये बयान पर संशय बना रहेगा। बकौल डा. हर्षवर्धन भले ही ऑक्सीजन की जरूरत बहुत ही कम मरीजों को पड़ रही हो  लेकिन  मप्र सहित कुछ राज्यों में बीते कुछ दिनों में अस्पतालों में ऑक्सीजन का स्टॉक खत्म होने से मचे हड़कंप ने एक नई समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। हालांकि आपदा प्रबंधन के तहत ऑक्सीजन उत्पादक राज्यों से जरूरत वाले राज्यों में तेजी से प्राथमिकता के स्तर पर आपूर्ति की गयी लेकिन जिस मात्रा  में नए मामले प्रतिदिन आ रहे हैं उन्हें देखते हुए आने वाले दिनों में ऑक्सीजन की कमी का अंदेशा बना रह सकता है। हालाँकि कोरोना संकट शुरू होते ही देश में उससे सम्बंधित जरूरतों मसलन मास्क , सैनीटाईजर, वैन्टीलेटर , जाँच किट आदि का  उत्पादन तेजी से होने लगा जिससे आयात की जरूरत खत्म हो गई। इसलिए ये उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि अस्पतालों में ऑक्सीजन की बढ़ती हुई मांग को पूरा  करने के लिए देश में उसका पर्याप्त उत्पादन और भंडारण जल्द हो सकेगा। लेकिन तब तक उसकी आपूर्ति सुनिश्चित रखना बड़ी चुनौती है । मप्र उन राज्यों में से है जिनमें  बीते कुछ दिनों में ऑक्सीजन के अभाव के कारण अनेक शहरों में कोरोना मरीजों को जबरदस्त परेशानी हुई। अनेक मौतें  उस वजह से होने की शिकायतें भी आई हैं। ये संतोष  का विषय है कि केंद्र सरकार द्वारा तत्काल सामंजस्य बिठाकर आपूर्ति करवा दी गई परन्तु कोरोना संक्रमण के तेजी से फैलाव के मद्देनजर आने वाले दिन और भी संकट भरे हो सकते हैं। जिन घरों में बुजुर्ग  रहते हैं  वहां  छोटे ऑक्सीजन सिलेंडर रखे जाने की सलाह अक्सर चिकित्सक दिया करते हैं। मौजूदा हालात देखते हुए तो  उसकी  जरूरत किसी को भी पड़ सकती है। कोरोना चूँकि मनुष्य के फेफड़ों को संक्रमित कर  उसके श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है इसलिए शरीर में ऑक्सीजन का वांछित स्तर बनाये रखने के लिए भी जन - जागरण किया जाना जरूरी है।  ये देखने में आया है कि साँस लेने में होने वाली तकलीफ को शुरुवात में नजरंदाज करने से  अस्पताल पहुँचने पर इलाज मुश्किल होता है।  ऑक्सीजन को प्राण वायु कहा जाता है। उसका महत्व तो दिल्ली जैसे शहर में साल में कई मर्तबा होने वाले प्रदूषण के समय समझ में आता रहा। लेकिन कोरोना संकट ने हमारे शरीर में उसकी पर्याप्त मात्रा  के बारे में भी सचेत किया है। इस बारे में भारत की परम्परागत योग पद्धति बेहद उपयोगी है जिसमें श्वसन तंत्र को मजबूत बनए रखने के तमाम व्यायाम हैं। शंख बजाना भी फेफड़ों  के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना  जाता है। बेहतर  होगा कोरोना के बहाने आम भारतीय इस तरह की सावधानियों के प्रति गंभीर हों क्योंकि छोटी-छोटी बातें भी बड़े से बड़े संकट में कारगर साबित होती  हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 14 September 2020

हिन्दी भाषी ही उसे अपना लें तो उसका उद्धार हो जाये



आज राजभाषा दिवस है। इसे हिन्दी दिवस भी कहा जाता है। 1949 में आज ही  के दिन संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया था। 1953 में हिन्दी की महत्ता प्रतिपादित करने के लिए 14 सितम्बर को राजभाषा दिवस घोषित कर दिया गया। इस प्रकार  यह एक तरह से उसका सरकारी जन्मदिवस है। कालान्तर में इसका विस्तार राजभाषा सप्ताह , पखबाड़ा और मास के तौर पर भी हो गया। वैसे तो हिन्दी के  लिये ये सम्मान की  बात है कि दर्जनों भाषाओं के होते हुए भी   पूरे  देश में सरकारी प्रेरणा से  उसका गुणगान किया जाता है। छोटे-बड़े ढेर सारे आयोजन होते हैं। हिन्दी की सहजता , सरलता और स्वीकार्यता को लेकर संकल्प और प्रतिबद्धता  दोहराई जाती है। प्रतियोगिताएँ , पुरस्कार वितरण , सम्मान  , विचार गोष्ठियां , कवि सम्मलेन, पोस्टर बैनर , जैसे वे अनेक  कर्मकांड किये जाते हैं जिनसे हम भारतीय भली-भांति परिचित हैं। काफी पहले से केंद्र  सरकार के सभी विभागों  तथा उपक्रमों में राजभाषा अधिकारी नियुक्त किये जा चुके  हैं जो हिन्दी में कामकाज को बढ़ावा देने तथा गैर हिन्दी भाषियों को हिन्दी में प्रशिक्षित करने का कार्य करते हैं। इस व्यवस्था का काफी लाभ भी हुआ। हालाँकि भाषावार प्रान्तों के गठन की जो गलती हुई थी उसका खामियाजा देश को आज तक भुगतना पड़ रहा है । जाति और धर्म की तरह से ही भाषा भी वोट बैंक का जरिया  बना ली गई। तमिलनाडु में हिन्दी का सर्वाधिक विरोध होता रहा है लेकिन वहां  के लोग अंग्रेजी  पटर-पटर करने वालों का विरोध नहीं करते। महाराष्ट्र में शिवसेना और मनसे भी मराठी अस्मिता के नाम पर जनभावनाएं भड़काने से बाज नहीं आते। देखासीखी दूसरे राज्यों में भी  क्षेत्रीय भाषा को लेकर सियासत की दूकानें खोलने का प्रयास होता  रहता है। हाल ही में घोषित नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा देने का जो प्रावधान  किया गया उसका भी तमिलनाडु और बंगाल में विरोध किया गया जिसका मुख्य कारण अगले साल होने वाले  विधानसभा के चुनाव हैं। ये संतोष का विषय है कि कम से कम उत्तर भारतीय राज्यों के न्यायालयों के साथ ही  राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर की  प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिन्दी को मान्यता  मिल गयी है। ये सब देखते हुए हिन्दी के भविष्य को लेकर संतुष्ट हुआ जा सकता है। लेकिन इस बारे में जो दूसरा पक्ष है वह चिंता भी पैदा कर रहा है। और वह है हिन्दी भाषियों के ही  एक बड़े वर्ग में हिन्दी के प्रति उपेक्षा की प्रवृत्ति  जो काफी हद तक  हीनभावना का रूप ले बैठी है। पहले उच्च वर्गीय समाज में ही अंग्रेजी का आकर्षण था क्योंकि उसे अभिजात्यता का मापदंड मान लिया गया। लेकिन बीते कुछ दशकों में मध्यम और निम्न मध्यम  वर्ग ने जिस तरह अंग्रेजी को गले लगाया उसकी वजह से हिन्दी का ज्यादा नुकसान हो रहा है। अँग्रेजी माध्यम में शिक्षा को सफलता की  सीढ़ी मान लेने की मानसिकता के कारण शालेय शिक्षा का स्वरूप ही  बदल गया और कुकुरमुत्ते की तरह  गली-गली में कान्वेंट स्कूल के बोर्ड टंग गये। यदि इनके जरिये आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग के बच्चे काम चलाऊ अंग्रेजी  ही सीख जाएँ तो इसका लाभ होगा लेकिन अंग्रेजी माध्यम के फेर में हो ये रहा हैं कि हिन्दी भाषी प्रान्तों के बच्चे ही हिन्दी में कमजोर होने लगे। इसके लिए शिक्षा प्रणाली के साथ अभिभावक भी बराबरी से दोषी  हैं जिन्होंने अंग्रेजी माध्यम की मृगमरीचिका में बच्चों को अपनी मातृभाषा से ही अपरिचित कर दिया। ये कहने में कुछ भी गलत या अतिशयोक्ति नहीं है कि हिन्दी को खत्म करना किसी के बस की बात नहीं  है क्योंकि वही ऐसी भाषा है जो पूरे देश में समझी जाती  है। दक्षिण भारत के जिन राज्यों में हिन्दी का विरोध सतह पर दिखाई देता है वहां के लोग उत्तर  भारत में आकर नौकरी करने में तनिक भी  संकोच नहीं करते। इसी तरह उप्र और बिहार जैसे विशुद्ध हिन्दी भाषी प्रदेशों के मजदूर बिना स्थानीय भाषा जाने ही दक्षिण  ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर के राज्यों में भी कार्य करते हैं। कोरोनाकाल में काम बंद हो जाने  की वजह से जब मजदूरों का पलायन हुआ तब ये तथ्य सामने आया कि हिन्दी विरोधी  राज्यों में भी हिन्दी भाषी श्रमिकों और कर्मचारियों का कोई विरोध नहीं है। ये सब देखते हुए हिन्दी भाषी लोगों को हिन्दी के प्रति उनके मन में आई हीन भावना और भविष्यगत असुरक्षा से मुक्त होना पड़ेगा । अंग्रेजी को बतौर भाषा सीखना अच्छा है लेकिन उसे ओढ़ लेने  की प्रवृत्ति हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए खतरा है। क्योंकि भाषा के साथ जो साहित्य और संस्कृति आती है  उसका असर पीढिय़ों तक रहता है और इस दौरान उसे अपनाने वाला  समाज अपनी मूल पहिचान खो बैठता है। विश्व के अनेक देशों  में विदेशी भाषा के आधिपत्य ने उनकी जड़ों को ही नष्ट कर दिया। हिन्दी  के नाम पर होने वाले इस वार्षिक आयोजन में उसके प्रचार - प्रसार और गौरवगान के जो भी प्रयास होते हैं वे सब  स्वागतयोग्य हैं लेकिन जब तक हिन्दी भाषी लोग अपनी मातृभाषा के प्रति आग्रही नहीं होंगे तब तक हिन्दी को सरकारी संरक्षण  में  राजभाषा का दर्जा भले मिलता रहे लेकिन वह सही मायने में राष्ट्रभाषा होने के बाद भी उपेक्षित ही रहेगी। हिन्दी भाषी ही यदि उस को ससम्मान अपना लें तो उसका विरोध धीरे - धीरे विलुप्त होता जाएगा। आज के दिन का सबसे सरल सन्देश यही है कि हिन्दी की बातें कम करें लेकिन  हिन्दी में बातें ज्यादा करें ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 September 2020

चीन दबाव में है लेकिन हमें खुशफहमी से बचना होगा



दो देशों के बीच मित्रता और शत्रुता दोनों के समय यदि कोई बात कायम रहती है तो वह कूटनीति ही है। अनेक उदाहरण हैं जब सेनाओं के बीच घमासान चलता रहता है वहीं सरकार के स्तर पर राजनयिक वार्ताओं के जरिये शान्ति की कोशिश भी जारी रहती हैं। ये भी देखने में भी आया है कि दो देशों के बीच के मतभेद दूर करने के लिए कोई तीसरा देश मध्यस्थता भी करता है। भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 के युद्ध के बाद तत्कालीन सोवियत संघ ने ताशकंद बुलाकर भारत के प्रधानमंत्री स्व.लालबहादुर शास्त्री और उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे अयूब खान के बीच समझौता करवाया था। दूसरे विश्व युद्ध के उपरान्त चीन में साम्यवादी क्रांति के बाद अमेरिका के साथ उसका राजनयिक रिश्ता नहीं था। सुरक्षा परिषद में भी चीन की जगह ताईवान को स्थायी सदस्य के तौर पर अमेरिका ने बिठा रखा था। लेकिन 1972 में अचानक अमेरिका के रुख में बदलाव आया और उसके विदेश सचिव हेनरी कीसिंजर पकिस्तान की मदद से चीन की गुप्त यात्रा पर गये और उससे राजनयिक रिश्ते बनाकर सुरक्षा परिषद में ताईवान की जगह उसे रखवाने में सहायता दी। उसके बाद चीन और अमेरिका वैचारिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक क्षेत्र में बेहद नजदीक आ गए। आज उनके बीच तनाव चरम पर है किन्तु दोनों ही एक दूसरे के यहाँ इतना ज्यादा पूंजी निवेश कर चुके हैं कि पूरी तरह नाता तोड़ने में उन्हें हजार बार सोचना पड़ेगा। संयोगवश भारत भी इन दिनों ऐसी ही परिस्थिति से गुजर रहा है। 1962 में चीन ने दोस्ती की आड़ में धोखा देकर हमला किया और हमारी हजारों वर्गमील जमीन पर कब्जा ली। बाद में उसने पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर का अक्साई चिन इलाका भी बतौर उपहार ले लिया। उसके बाद भी भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के बावजूद सामान्य सम्बन्ध बने रहे। और फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था विकसित होने के बाद आर्थिक सम्बन्ध इस तेजी से विकसित होते गये कि सीमा विवाद मानो भुला सा दिया गया। हालाँकि बीच-बीच में चीन अपने स्वभाव के मुताबिक कुटिलता दिखाता रहा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसके कारण दुश्मनी सतह पर आती। भारतीय अर्थव्यवस्था पर चीन की छाया इतनी व्यापक हो गई कि पूरा बाजार मेड इन चायना से भर गया। इसका दुष्प्रभाव घरेलू उद्योगों पर पड़ने के बावजूद भारत ने चीन से आयात पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई। यहाँ तक कि नरेंद्र मोदी तक चीन के साथ इकतरफा व्यापार को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से उनकी दोस्ती बड़ी राजनायिक कामयाबी मानी गई। लेकिन चीन कश्मीर और आतंकवाद के मसले पर सदैव पाकिस्तान की तरफदारी करता रहा। और फिर आ गया कोरोना जिसके बाद पूरी दुनिया उसे खलनायक मान बैठी। भारत में भी ये मानने वाले कम नहीं हैं कि दुनिया को इस महामारी के चंगुल में फंसाने वाला चीन ही है फिर भी उसके साथ व्यापारिक रिश्ते बरकऱार रखते हुए कोरोना संबंधी अनेक उपकरण और बचाव के साधन वहां से मंगाए गये। लेकिन वैश्विक महामारी के इस दौर का लाभ लेकर उसने लद्दाख क्षेत्र में घुसपैठ कर दशकों से शांत पड़ी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य हलचल बढ़ा दी। परन्तु इस बार उसे भारत से जो जवाब मिला उसके कारण वह न सिर्फ  चौंका बल्कि शर्मिन्दगी का शिकार भी हुआ। उसने नेपाल, बांग्लादेश, श्री लंका और पाकिस्तान के जरिये भी भारत पर दबाव बनाना चाहा लेकिन वह  योजना कारगर नहीं हुई। भारत ने सीमा पर दो-दो हाथ करने के इरादे तो दिखाए ही, साथ में आर्थिक मोर्चे पर चोट पहुँचाने के लिए भी ताबड़तोड़ फैसले करते हुए उसके आर्थिक बहिष्कार के प्रति जनमत पैदा कर दिया। हालाँकि चीन के नेता, राजनयिक और सरकार नियंत्रित समाचार माध्यम भारत के दावों का मजाक बनाते हुए गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देने से बाज नहीं आये लेकिन सैन्य और राजनयिक स्तर पर बातचीत करते हुए विवाद को हल करने की पहल भी बीजिंग की तरफ से होती रही। इसका ताजा उदाहरण रूस में बीते कुछ दिनों के भीतर पहले भारत और चीन के रक्षा मंत्रियों और फिर विदेश मंत्रियों के बीच हुई लम्बी वार्ताएं हैं। ये लोग मास्को में आयोजित सम्मेलनों में शिरकत करने गये थे। लेकिन इन वार्ताओं की पेशकश चीन की तरफ  से होना ये साबित करता है कि 1962 के बाद पहली बार वह इतना झुका है। लेकिन सीमा पर हरकतें और सैन्य अधिकारियों के साथ चल रही वार्ताओं में उसके अड़ियलपन से ये अनुमान लगाया जा सकता है कि वह विश्व बिरादरी को दिखाने के लिए तो बातचीत करने का ढोंग रचता है किन्तु सीमा पर युद्ध के हालात बनाये रखकर धमकाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। हालांकि चीनी मामलों के जानकार मानते हैं कि वह फिलहाल युद्ध से बचना चाहेगा क्योंकि उसे ये अंदेशा है कि इस बार भारत सैन्य मोर्चे पर जोरदार टक्कर देगा जिससे उसके महाशक्ति होने के दावे को धक्का पहुंचेगा। जून महीने में गलवान घाटी और अगस्त के अंतिम सप्ताह में पेंगांग झील पर भारत के साथ सैन्य टकराहट में उसे जिस तरह का प्रतिरोध झेलना पड़ा वह उसके लिए जितना अप्रत्याशित था उतना ही अपमानजनक भी। गत दिवस विदेश मंत्री स्तर की वार्ता के दौरान दोनों देशों के बीच जिन पांच बिन्दुओं पर सहमति बनी उनमें विश्वास बहाली भी है जिसका आशय व्यापार को पहले जैसा बनाना ही है। इस दृष्टि से भारत सरकार ने पहली बार सैन्य, आर्थिक और राजनयिक तीनों मोर्चों पर जिस तरह चीन के समक्ष  चुनौती पेश की वह उत्साहित करने वाली है। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विशषज्ञों का मानना है कि नरेंद्र मोदी को सीधे जिनपिंग से बात करना चाहिए जो तनाव खत्म करने में कारगर साबित हो सकेगी क्योंकि उनके बीच पूर्व में काफी अच्छा संपर्क  और संवाद रहा है। लेकिन वक्त की नजाकत ये कहती है कि भारत को किसी भी तरह की जल्दबाजी की बजाय बराबरी के साथ बात करनी चाहिए। चीन निश्चित तौर पर बड़ी ताकत है लेकिन हाल के वर्षों में भारत भी हर क्षेत्र में आगे आया है, वरना न तो वह चीनी सेना से टकराने का साहस दिखाता और न ही आर्थिक मोर्चे पर उसके बहिष्कार जैसी बात सोचता। इसीलिये वह चाहे जितनी धमकी और धौंस देता रहे किन्तु उसकी समझ में ये बात आ चुकी है कि भारत के साथ टकराव से उसे भी जबर्दस्त नुकसान होगा और इसीलिये वह सीमा पर शरारत करते रहने के बावजूद वार्ता के लिए लालायित है। सही बात तो ये है कि लद्दाख में सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाने के बाद वह खुद फंस गया है। यदि बिना किसी समझौते के उसने अपनी सेनायें पीछे हटाईं तो उसकी जबर्दस्त किरकिरी होगी। इसी तरह भारत ने यदि व्यापार प्रतिबन्ध जारी रखे तब भी चीन के हितों पर उनका दूरगामी असर होगा। ये देखते हुए फिलहाल भारत भारी न सही लेकिन हर तरह से बराबरी पर है। बावजूद उसके साथ किसी भी स्तर पर बातचीत और उसमें लिए जाने वाले फैसलों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता आवश्यक है क्योंकि चीन किसी भी तरह से विश्वसनीय नहीं है। भारत ने बीते कुछ महीनों में जो तैयारी की है उससे देश और दुनिया में ये एहसास पैदा हुआ है कि  1962 और 2020 के भारत में वाकई जमीन और आसमान का फर्क  है।

-रवीन्द्र वाजपेयी