Monday, 12 October 2020

बाजार और त्यौहार में फंसे आँकड़े : आशावाद से बचें



कोरोना को लेकर पिछले दो सप्ताह से आशाजनक खबरें आ रही हैं। नये संक्रमण घट रहे हैं और ठीक होने वालों की संख्या  निरंतर बढ़ती जा रही है। इस कारण मनोवैज्ञानिक तौर पर भी राहत दिख रही है। अगले सप्ताह से भारत में त्यौहारी मौसम की शुरुवात हो जायेगी जिसका सीधा सम्बन्ध अर्थव्यवस्था से है। बीते छह महीने में जनजीवन के साथ ही उद्योग-व्यापार भी अस्त व्यस्त होकर रह गये। दो महीने तो पूरी तरह लॉक डाउन रहा किन्तु उसके बाद जब ढिलाई दी गई तब कोरोना संक्रमण जिस तेजी से बढ़ा उससे सब कुछ खुला होने और बाजारों में भीड़ के बाद भी वह उत्साह नजर नहीं आया जो अपेक्षित और आवश्यक था। यद्यपि लगातार सुधार के संकेत मिल रहे हैं लेकिन जमीनी सच्चाई ये है कि न सिर्फ  मध्यम अपितु उच्च आय वर्ग में भी एक अदृश्य भय सा समा गया जिसके कारण वह अपने खर्चों में कमी करने को बाध्य हुआ। हालाँकि कुछ व्यवसायों में मांग आश्चर्यजनक तौर पर बढ़ी किन्तु समग्र तौर पर देखने पर ये महसूस हुआ कि अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान से उबरने में लम्बा समय लगेगा। दो दिन पूर्व रिजर्व बैंक ने भी माना कि कारोबारी हालात लगातार सकारात्मक संकेत दे रहे हैं फिर भी वर्तमान  वित्तीय वर्ष में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में 9 प्रतिशत से भी ज्यादा कमी आयेगी। इसका अर्थ ये हुआ कि दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था कम से कम पांच साल पीछे चली गयी। लेकिन ये विश्वव्यापी परिदृश्य है। माना जा रहा है कि केवल चीन को छोड़कर बाकी सभी देशों की अर्थव्यवस्था में गिरावट परिलक्षित होगी। उस दृष्टि से भारत का प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं कहा जा सकता। यदि अभी तक भारत में कोरोना से होने वाली मौतें वैश्विक स्तर से काफी कम हैं तो उसका कारण लॉक डाउन की शुरुवाती सख्ती भी थी जिसके लिए केंद्र सरकार को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। लेकिन बीते कुछ दिनों से आ रहे सुखद संकेतों से बेफिक्र होना आत्मघाती होगा क्योंकि जांच की संख्या को लेकर संदेहास्पद स्थिति बनी हुई है। ये भी कहा जाने लगा है कि अगस्त और सितम्बर में कोरोना संक्रमण में जिस तरह उछाल आया उसकी वजह से सरकारी अस्पतालों की क्षमता जवाब देने लगी और  निजी अस्पताल वालों को लूटमार का अवसर मिल गया। जिसके पास नगद रहित चिकित्सा बीमा जैसी सुरक्षा थी उससे भी निजी अस्पतालों ने जबरन अग्रिम राशि जमा करवाई। इस वजह से डर और घबराहट फैली। लेकिन बीते दो  हफ्ते इस लिहाज से काफी राहत भरे रहे। सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता के कारण निजी क्षेत्र के अस्पताल अपनी दरें घटाने मजबूर हो गये। लेकिन कुछ ऐसी बातें भी सुनने में आई हैं जिनके कारण कान खड़े हो जाते हैं। पहली तो ये कि त्यौहारी मौसम उद्योग-व्यापार जगत के लिए मददगार रहे इसलिए सुनियोजित तरीके से कोरोना संक्रमण के आंकड़ों में कमी प्रचारित की जा रही है। इसके लिए जांच में कमी किये जाने के  दावे भी कतिपय सूत्र कर रहे हैं। हालांकि ये भी सुनने में आ रहा है कि शीघ्र ही सस्ती जांच किट सरकार के पास आ जायेगी जिसके बाद जाँच कार्य फिर से तेज किया जावेगा। इसी बीच दो विरोधाभासी आकलन भी सामने आये हैं। जिनमें एक के मुताबिक तो नवंबर महीने में देश हर्ड इम्युनिटी की स्थिति में आ जायेगा। अर्थात आधे से ज्यादा लोगों में कोरोना की एंटीबॉडी विकसित होने से यह संक्रमण शिथिल पड़ता जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ  ये आशंका भी  है कि नवम्बर में सर्दियां शुरू होते ही कोरोना दोबारा हमला करेगा। ऐसा कहने वाले उन देशों का उदाहरण दे रहे हैं जिनमें कोरोना को खत्म मानकर लोग निश्चिन्त हो गये थे। लेकिन कुछ समय बाद कोरोना दोगुनी ताकत से लौटा तब जाकर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। ऐसे में भारत में इस संक्रमण को लेकर जिस तरह का आशावाद बीते कुछ दिनों से फैलाया जा रहा है उसके कारण यदि सावधानी न रखी गई तो वह प्राणलेवा हो सकती है। भारतीय परिस्थितियों में हर्ड इम्युनिटी को लेकर कोई अधिकृत दावा किया जाना खतरे से खाली नहीं होगा। दिल्ली उसका खामियाजा भुगत चुकी है। ऐसे में आने वाला समय बहुत ही नाजुक होगा। बाजार, त्यौहार और सरकार इन तीनों के बीच फंसी आंकड़ेबाजी अपनी जगह है लेकिन अपनी जान की रक्षा करना हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है और उसके लिए अपुष्ट दावों और अनधिकृत बातों के प्रति अतिरिक्त सावधानी रखनी चाहिए। दीपावली के पहले देश भर में साफ़ -सफाई का दौर चलने से करोड़ों टन कूड़ा-कचरा घरों से निकलता है और मौसम भी बदलता है। वहीं दीपवली के अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय के सख्त निर्देशों के बाद भी जमकर आतिशबाजी होने से वायु प्रदूषण चरम पर जा पहुंचता है जिससे साँस के मरीजों को खतरा बढ़ जाता है। शायद इसी आधार पर नवंबर में कोरोना के फिर जोर पकड़ने का अंदेशा बताया जा रहा है। इसलिए उससे बचाव के समस्त तौर-तरीके बिना किसी गफलत में पड़े अमल में लाये जाने चाहिए क्योंकि अब तक के अधिकांश आशावादी अनुमान झमेले में पड़ चुके हैं। वैक्सीन के आने की तारीखें आगे खिसकते जाना इसका सबसे अच्छा प्रमाण है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 10 October 2020

अपराध में जाति ढूंढ़ना भी तो अपराध है



हाथरस में दलित युवती के साथ सवर्ण जाति के लोगों द्वारा दुष्कर्म और ह्त्या का बवाल अभी थमा नही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा का पीड़िता के गाँव जाकर उससे मिलना बड़ी राजनीतिक घटना बन गई जिसे उप्र में कांग्रेस के पुनरोदय के तौर पर देखा जाने लगा वहीं भाजपा इस प्रकरण को लेकर रक्षात्मक होने मजबूर हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सवर्णों विशेष रूप से अपने सजातीय ठाकुरों को संरक्षण देने जैसे आरोप भी लगे। वारदात के हफ्तों बाद भी संबंधित गाँव में तनाव है और जातिगत वैमनस्य की भावना खुलकर सामने आई है। लेकिन गत दिवस राजस्थान में एक ऐसी घटना हो गई जिसमें दलित समुदाय में आने वाली मीणा जाति के व्यक्ति ने मंदिर की जमीन कब्जाने के लिए ब्राह्मण पुजारी की हत्या कर दी। इसके बाद भाजपा को अवसर मिल गया कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार से इस्तीफा मांगने और राहुल-प्रियंका पर तंज कसने का। हो सकता है वे दोनों राजस्थान आकर पुजारी के परिवार से मिलकर सांत्वना दें तथा मुख्यमंत्री श्री गहलोत पर उसके परिवार को मदद देने का दबाव डालें लेकिन इसके बाद भी भाजपा के साथ सवर्ण जातियों को भी हमलावर होने का अवसर मिल गया। राजस्थान के मुख्यमंत्री चूंकि पिछड़े वर्ग से आते हैं इसलिए उन्हें इस प्रकरण में बेहद सावधानी बरतनी होगी। लेकिन सवाल ये है कि क्या हाथरस की घटना को लेकर दलित वर्ग के उत्पीड़न पर राजनेताओं द्वारा व्यक्त किया गया गुस्सा राजस्थान के एक ब्राह्मण पुजारी की नृशंस हत्या के विरोध में भी सामने आएगा? लेकिन उससे भी बड़ा सवाल ये है कि आजादी के 73 साल बाद भी समाज को जाति के नाम पर बांटने का खेल रुक क्यों नहीं रहा? जब छुआछूत को कानूनी रूप से खत्म कर दिया गया और सामाजिक समरसता के प्रति सभी राजनीतिक पार्टियाँ समान रूप से प्रतिबद्ध हैं तब किसी अप्रिय घटना या अपराध को जातिगत आधार पर देखने का नजरिया क्या जाति के नाम पर समाज को टुकड़े-टुकड़े करने जैसा अपराध नहीं है ? अपराध चाहे उप्र में हो या राजस्थान अथवा किसी अन्य राज्य में और अपराधी किसी भी जाति का क्यों न हो उसके प्रति राजनीतिक बिरादरी की सोच एक समान होनी चाहिए। संवैधानिक व्यवस्था में किसी को भी जातिगत आधार पर किसी भी तरह का विशेषाधिकार नहीं है। दंड प्रक्रिया भी अपराधी को दण्डित करते समय उसकी जाति नहीं देखती। एक सवर्ण को भी किसी जुर्म के लिए दी जाने वाली सजा वैसे ही कृत्य के लिए एक दलित या पिछड़े वर्ग के अपराधी को मिलने वाले दंड से कम नहीं होती। लेकिन राजनेता इस सबसे अलग हटकर केवल और केवल वोटों की फसल काटने की फिराक में रहा करते हैं। और इसीलिये जो राहुल और प्रियंका ने उप्र जाकर किया वही वसुंधरा राजे और उनके साथी राजस्थान में करेंगे। उप्र में दलितों को असुरक्षित बताने वाली कांग्रेस क्या राजस्थान में सवर्णों की सुरक्षा को खतरे में मानकर वैसा ही बवाल मचाएगी? लेकिन सभी जानते हैं कि ऐसी प्रत्येक घटना के प्रति राजनेताओं की संवेदनशीलता अगली बड़ी वारदात तक ही कायम रहती है। मसलन बुलंदशहर में कांग्रेस आक्रामक थी वहीं राजस्थन के करौली में पुजारी की हत्या के बाद अब भाजपा जवाबी हमला कर रही है। वसुन्धरा राजे सहित अन्य नेतागण वारदात वाले इलाके में लाव-लश्कर के साथ पहुंचेगे और राज्य सरकार उन पर माहौल खराब करने का आरोप लगाते हुए प्रतिबंधात्मक कदम उठायेगी। कहने का आशय यही है कि जब और जहां भी हत्या और बलात्कार जैसे अपराध होते हैं वहां राजनीति के सौदागर अपनी दूकान खोलकर बैठ जाते हैं और शुरू हो जाता है जाति के नाम पर जहर फैलाने का चिर परिचित खेल। जाति तोड़ो का नारा तो न जाने कब का अर्थहीन होकर रह गया और बीते कुछ दशकों में भारतीय राजनीति ही नहीं प्रशासनिक ढांचे के साथ ही न्यायपालिका में भी जाति के वायरस देखे जा सकते हैं। चुनाव में कहने को सभी पार्टियाँ विकास पर केन्द्रित घोषणा या संकल्प पत्र प्रस्तुत करती हैं लेकिन प्रत्याशी चयन से लेकर समूचा चुनाव अभियान अंतत: जातिगत मुद्दों पर आकर सिमट जाया करता है। और यही वजह है कि अपराध होने के बाद बजाय अपराधी को पकड़कर दण्डित करने के जाति नामक बिसात बिछाकर सियासत के शकुनि अपने पांसे चलने लगते हैं। इसी कारण अपराध कम होने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं। उप्र के बुलंदशहर में हुई वारदात में आरोपी की पीड़िता और उसके भाई के साथ फोन पर बातचीत होते रहने के प्रमाण सामने आये हैं। लेकिन घटना के बाद गाँव में जातिगत दीवारें और ऊँची हो गईं। अब ऐसा ही कुछ राजस्थान में हुई घटना के बाद दोहराया जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। ये देश का दुर्भाग्य है कि विदेशों में शिक्षा प्राप्त करने के बाद खुद को आधुनिकता का प्रतीक चिन्ह मानने वाले नेतागण भी जाति के आधार पर समाज को बाँटने के काम में हाथ बंटाते हैं। ये सिलसिला कब रुकेगा इसे कोई नहीं बता सकता क्योंकि जिनके पास आग बुझाने का जिम्मा है जब वही उसमें पेट्रोल डालने जैसी शरारत करें तो फिर कहने को रह ही क्या जाता है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 9 October 2020

समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता और सम्मान दोनों ढलान पर




बीते कुछ दिनों में कतिपय टीवी चैनलों द्वारा प्रसारित की जा रही सामग्री को लेकर न्यायपालिका ने कुछ प्रतिबंधात्मक कदम उठाये। इसके अलावा कुछ चर्चित मामलों में समाचार चैनलों की भूमिका को लेकर भी सोशल मीडिया सहित अन्य मंचों पर बहस चल पड़ी है। ख़ास तौर पर एंकरों की चीख पुकार तो मजाक का विषय बन चुकी है। बीते दिनों समाचार माध्यमों पर आयोजित एक वेबिनार में वरिष्ठ पत्रकार एन.के सिंह ने किसी अभिनेत्री के घर से जाँच एजेंसी जाने और लौटने तक उसकी कार के सीधे प्रसारण को हास्यास्पद बताते हुए कहा कि समाचार चैनलों की प्रतिस्पर्धा फूहड़पन के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंची है। गत दिवस मुम्बई पुलिस ने तीन टीवी समाचार चैनलों के विरुद्ध पैसे देकर टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) बढ़ाने की शिकायत पर प्रकरण दर्ज कर लिया। आज इसमें एक और राष्ट्रीय चैनल का नाम भी आ गया। जाँच की दिशा दर्शक संख्या के फर्जी आंकड़े जुटाकर 30 हजार करोड़ के विज्ञापन कबाड़ने की तरफ  घूम गई है। हालांकि इसके पीछे शिवसेना और एक समाचार चैनल के बीच चल रही जंग बताई जा रही है लेकिन ये बात बिना संकोच के कही जा सकती है कि समाचार माध्यमों के प्रति विश्वसनीयता और सम्मान में जो कमी आई है उसके लिए समाचार चैनल काफी हद तक जिम्मेदार हैं जिन्होंने पत्रकारिता की स्थापित मान्यताओं और परम्पराओं को पूरी तरह किनारे करते हुए बॉक्स आफिस पर हिट होने के लिए बनाई जाने वाली फार्मूला फिल्मों वाली शैली समाचार संकलन और प्रस्तुतीकरण में भी अपना ली है। इस वजह से पत्रकार एंकर बन गये और एंकर पत्रकार, लेकिन इस सब में पत्रकरिता तिरोहित होती जा रही है। सम सामयिक ज्वलंत मुद्दों पर आयोजित की जाने वाली टीवी चर्चाओं में विचारों के आदान-प्रदान के साथ सार्थक बहस की जगह डब्ल्यू डब्ल्यू एफ की प्रायोजित कुश्ती जैसे नज़ारे देखने मिलते हैं। 24 घंटे और सातों दिन समाचार प्रसारित करने की प्रतिस्पर्धा में कचरे के ढेर लगाने का चलन चल पड़ा है। एक ही समाचार इतनी बार दिखाया जाता है कि ऊब होने लगती है। ऐसा नहीं है कि अखबारी जगत पूरी तरह से दूध का धुला हुआ हो लेकिन बीते दो दशक में टीवी समाचार चैनलों की जो भीड़ उभरकर आ गई है उसने समाचार माध्यम के प्रतीक चिन्ह बदल डाले और बदल डाली पत्रकारिता की स्थापित मान्यताएं और परम्पराएं। लेकिन इसके लिए केवल टीवी चैनलों से जुड़े पत्रकारों और मालिकों को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं होगा। राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं ने भी समाचार चैनलों के दिमाग खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक दौर ऐसा था जब नेता या सरकारी अफसरान अंगरेजी अखबार के संपादक या संवाददाता को देखकर उसके प्रति कुछ ज्यादा ही सौजन्यता व्यक्त करना नहीं भूलते थे। लेकिन जबसे इलेक्ट्रानिक समाचार माध्यम मैदान में आये तबसे उनको जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। किसी अखबार द्वारा आयोजित आयोजन में जाने के लिए नेताओं को फुर्सत नहीं रहती जबकि समाचार चैनलों के आमन्त्रण पर सत्ताधारी और विपक्षी नेतागण नंगे पाँव दौड़कर जाने में नहीं हिचकते। इसकी वजह किसी से छिपी नहीं है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं को जिन्हें अब प्रिंट मीडिया कहा जाने लगा है के मालिक और संपादक वगैरह का नाम सार्वजनिक होता है। वहीं समाचार चैनलों के एंकर भले दिखाई दे जाते हों लेकिन असली मालिकों के बारे में प्रामाणिक जानकारी का अभाव होता है। इस वजह से वे दबाव समूह के तौर पर आसानी से काम करने लगते हैं। जब दबाव ज्यादा बढ़ता है तब चैनलों को कोसा जाने लगता है वरना उनके कैमरे देखकर नेताओं के चेहरे पर मुस्कुराहट तैरने लगती है। मौजूदा स्थिति में बिना लागलपेट के कहा जा सकता है कि समाचार चैनलों में से कुछ को छोड़कर अधिकतर किसी न किसी विचारधारा अथवा राजनीतिक दल के या तो अंधभक्त हैं या फिर घोर आलोचक। समाचार प्रस्तुतीकरण से ही उनके झुकाव का पता चल जाता है। कुल मिलाकर पानी सिर से ऊपर आने की स्थिति बनने के बाद बात न्यापालिका और पुलिस थाने तक जा पहुँची है। लेकिन ये मसला किसी एक चैनल तक सीमित नहीं है और उसे व्यापक दृष्टिकोण के साथ देखना होगा। पूंजी आधारित समाचार माध्यमों के इस दौर में व्यवसायिकता आवश्यक बुराई के रूप में विद्यमान है। हालांकि प्रतिस्पर्धा भी बुरी नहीं है यदि उसका परिणाम स्तरीय पत्रकारिता के तौर पर सामने आये लेकिन वह एंकरों के चीखने-चिल्लाने पर केन्द्रित हो तो फिर उसे बेहूदगी ही कहा जायेगा। समाचार माध्यमों द्वारा स्व-अनुशासन का पालन करने की अपेक्षा की जाती रही है। भारतीय प्रेस परिषद के दायरे को बढ़ाकर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों को उसके अंतर्गत लाने की मांग भी उठती रही है। टीवी चैनलों में आचार संहिता के पालन हेतु भी एक संस्था है लेकिन जिस तरह की अराजक और कीचड़ उछाल प्रतिस्पर्धा वर्तमान में चल रही है वह बहुत ही शर्मनाक है। श्रेष्ठता के भाव से आत्ममुग्ध इलेक्ट्रानिक मीडिया के कारण अखबार जगत में भी चारित्रिक बदलाव देखने मिल रहा है। पूंजी के खेल में मुनाफा ही धर्म बन जाता है। दुर्भाग्य से अधिकतर समाचार माध्यम अब उसी के मकडज़ाल में फंसकर अपनी मौलिकता और पवित्रता खोते जा रहे हैं। यदि यही हालात आगे भी जारी रहे तो बड़ी बात नहीं चौथे स्तम्भ का जो सम्मान उन्हें मिला हुआ है उससे उन्हें वंचित होना पड़े।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 8 October 2020

रिया को जमानत से नई परिभाषाएं गढ़ी जा सकती हैं



अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद सबसे ज्यादा चर्चित हुईं उनकी महिला मित्र मॉडल से अभिनेत्री बनी रिया चक्रवर्ती को नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो ने पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया था। बीते अनेक हफ्तों से वे जेल में थीं। निचली अदालत द्वारा नामंजूर किये जाने के बाद गत दिवस बॉम्बे उच्च न्यायालय ने तमाम शर्तों के साथ जमानत देते हुए उनकी रिहाई का रास्ता साफ़ कर दिया। ब्यूरो ने जमानत अर्जी का ये कहते हुए विरोध किया था कि रिया गवाहों को प्रभावित और सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकती हैं तथा उनके बाहर आने से प्रक्ररण की जांच पर प्रभाव पड़ेगा। रिया का भाई अभी भी जेल में है। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी और जमानत सामान्य कानूनी प्रक्रिया होती है लेकिन संदर्भित प्रकरण चूँकि फिल्मी हस्तियों से जुड़ा हुआ है इसलिए इसे समाचारों में कुछ ज्यादा ही महत्व दिया गया। जाँच के दौरान ये जानकारी सामने आई कि सुशांत सिंह ड्रग्स का आदी था और रिया तथा उसका भाई उसके लिए नशीली चीजों की व्यवस्था उसी के पैसों से करते थे। उसके बाद मुम्बई में फिल्मी हस्तियों को ड्रग्स की आपूर्ति करने वाले अनेक लोग जांच एजेंसियों के हत्थे चढ़े तथा ये खुलासा भी हुआ कि मुम्बई की फिल्मी बिरादरी में नशे का शिष्टाचार शराब से बढ़कर ड्रग्स तक आ पहुंचा है। रिया और ड्रग्स की आपूर्ति करने वाले लोगों के फोन और व्हाट्स एप से प्राप्त जानकारी के आधार पर अनेक अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के नाम गैर कानूनी नशीली चीजों का सेवन करने के लिए सामने आये। कुछ से नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो ने पूछताछ भी की। कुछ बड़े नाम अभी भी संदेह के घेरे में हैं। इस मामले में अब तक जो बात पक्के तौर पर स्थापित हो चुकी है उसके मुताबिक रिया और उसका भाई ड्रग्स विक्रेताओं के सम्पर्क में थे। वे सुशांत के लिए ही ड्रग मंगवाते थे या किसी और के लिए भी, ये अभी भी जांच के घेरे में है । लेकिन ड्रग  के कारोबारियों से संपर्क  तो उन्होंने खुद स्वीकार किया है। ऐसे में रिया को जमानत देते हुए माननीय उच्च न्यायालय की ये  टिप्पणी चौंकाने वाली है कि उसका सुशांत के लिए ड्रग मंगवाना ये साबित नहीं करता कि वह ड्रग डीलर्स के नेटवर्क का हिस्सा है। बचाव पक्ष के अधिवक्ता की दलीलों के सामने ब्यूरो के तर्क न्यायालय को अपर्याप्त लगे। लेकिन किसी व्यक्ति का ड्रग विक्रेताओं से सीधा संपर्क क्या साधारण बात है और वह भी एक अभिनेत्री का। एक अन्य अभिनेत्री दीपिका पादुकोण से हुई पूछताछ में भी ड्रग विक्रेता से उसकी बातचीत के प्रमाण मिले। जैसी कि खबरें हैं उनके मुताबिक ब्यूरो के पास बालीवुड में ड्रग के चलन की पुख्ता जानकारी आ चुकी है परन्तु वह जल्दबाजी में कोई एकदम नहीं उठाना चाह रहा। बहरहाल रिया की रिहाई जिस कारण से की गई यदि वह अंतिम फैसले का आधार भी बना तो फिर उसका अपराध ही क्या है? यदि किसी के लिए प्रतिबंधित नशीली चीज किसी अवैध कारोबारी से मंगवाना साधारण बात है तब तो ऐसे धंधों को लेकर कुछ नई परिभाषाएं गढ़ ली जायेंगीं। हमारा कोई निकटस्थ व्यक्ति यदि ड्रग का सेवन करता है और हम उससे वाकिफ हैं तब हमारा फर्ज बनता है कि उसे इस बुरी आदत से मुक्त करवाने का प्रयास करें। लेकिन सुशांत के मामले में रिया जिसकी उसके साथ शादी होने वाली थी, यदि वही उसे ड्रग खरीदकर देती रही तो उसका आचरण पूरी तरह अनुचित, अवैध और संदिग्ध माना जाएगा। जिन दो अभिनेत्रियों ने ब्यूरो को बताया कि सुशांत ड्रग का आदी था, उन्होंने अब तक ये बात क्यों छुपाकर रखी यह बड़ा सवाल है। रिया और उसका भाई दोनों सुशांत के साथ ही रहते थे। ऐसे में उसे ड्रग मंगवाकर देने में उनकी बतौर सहायक जो भूमिका थी वह किसी सुलझे हुए व्यक्ति के गले नहीं उतरती। कोई इंसान भले ड्रग का सेवन न करे लेकिन यदि वह ड्रग विक्रेताओं से सम्बन्ध रखते हुए किसी और के लिए उसका प्रबन्ध नियमित रूप से करे और भुगतान भी उसी के जरिये हो तो सीधे तौर पर न सही लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से तो वह उस कारोबार का हिस्सा माना ही जाना चाहिए। जिस आधार पर रिया को जमानत मिली, उसी आधार पर पकड़े गए ड्रग पैडलर भी जेल से बाहर आने की अर्जी लगा सकते हैं। उनके पास  अपने बचाव का ये आधार होगा कि वे इस अवैध कारोबार का हिस्सा नहीं है। गत दिवस ज्योंही बॉम्बे उच्च न्यायालय ने रिया को जमानत दी त्योंहीं उस फैसले पर टीका-टिप्पणी होने लगी। न्यायाधीश चूँकि कानून के दायरे से बंधे होते हैं इसलिए वे उसी के अनुरूप आदेश या निर्णय पारित करते हैं किन्तु ऐसे प्रकरणों में औचित्य का निर्धारण करते समय व्यवहारिक पहलू भी देखा जाना चाहिए क्योंकि एक छोटा सा फैसला अपराध जगत के संरक्षकों के लिए रक्षा कवच न बन जाए ये चिंता भी की जानी चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 6 October 2020

कारोबारी जगत को राहत दिये बिना अर्थव्यवस्था में सुधार असंभव




लॉक डाउन में बैंकों द्वारा कर्ज अदायगी में तो छूट दे दी गई  लेकिन उस दौरान ब्याज पर माफी की मांग भी  उद्योग - व्यापार जगत से उठाई गई जिसके लिये बैंक तैयार नहीं हुए । उसके बाद बात आई कि कम से कम ब्याज पर जो ब्याज लगाया गया उसे ही वापिस ले लिया जावे। वैसे तो सरकार और बैंकों का प्रबन्धन इसके लिए तैयार नहीं था लेकिन सर्वोच्च  न्यायालय ने जब दबाव बनाया तब जाकर सरकार और रिजर्व बैंक ने ब्याज पर ब्याज माफ करने के आश्वासन संबंधी जवाब पेश कर दिया। लेकिन न्यायालय इससे संतुष्ट नहीं हुआ और हलफनामे में वर्णित प्रावधानों को लेकर और स्पष्टता के निर्देश दिए। अदालत ने कामथ समिति की रिपोर्ट भी पेश करने कहा। ये मामला चूँकि देश की सबसे  बड़ी अदालत में है इसलिए अब उसका फैसला भी वहीं से होगा लेकिन बैंकिंग प्रणाली और उसके ग्राहक विशेष रूप से कर्जदारों के बीच के रिश्ते महाजनी परम्परा पर आधारित होते हैं। इसमें दोनों पक्ष एक दूसरे के हितों का संरक्षण करते हैं। लेकिन भारत में  बैंकों ने ग्राहकों का शोषण करने की प्रवृत्ति को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बना रखा है। दुनिया में सबसे ऊंची ब्याज दर के अलावा न जाने कहाँ - कहाँ के चार्जेस लगाकर खातेदारों की  जेब काटी जाती है। इस सबके पीछे भी बैंकों में होने वाले घोटाले ही हैं। बैंकों में घुस आये भ्रष्टाचार  नामक वायरस की वजह से जो  करोड़ों रूपये के घोटाले होते हैं उनकी अप्रत्यक्ष वसूली ईमानदार ग्राहकों से करने की तरकीब निकाल  ली गई। निजी क्षेत्र के  बैंक तो छद्म चार्जेस के नाम पर ग्राहकों को चूना लगाने के  लिए वैसे भी कुख्यात हैं। वैसे बैंकों की मुनाफखोरी और शोषण करने की प्रवृत्ति के लिए सरकारें भी  कम जिम्मेदार नहीं  हैं जो अपने वोट बैंक को बनाये रखने के लिए बैंकों का बेजा इस्तेमाल करती हैं। कर्ज माफी जैसी योजनाओं की वजह से बैंकों की वसूली पर भी   बुरा असर पड़ता है। मप्र ,  छतीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सरकार बनते ही 10 दिन में किसानों के  कर्ज माफ़ करने का वायदा किया था। लेकिन बाद में आर्थिक संकट के कारण उसे टाला जाता रहा। उधर किसान बैंकों का कर्ज चुकाने से मना करने लगे । अनेक स्थानों पर वसूली करने गये बैंक कर्मियों को हिंसा का शिकार भी होना पड़ गया। कोरोना काल अर्थव्यवस्था पर अभूतपूर्व संकट लेकर आया। पहली बार ऐसा हुआ जब पूरा देश बंद हो गया। कुछ को छोड़कर सभी औद्योगिक और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में तालाबंदी हो गई। कारोबार ठप्प होने से कर्जदारों के लिए बैंकों की देनदारी चुकाने की समस्या पैदा हो गई। इसके अलावा निजी क्षेत्र में भी बड़ी  संख्या में नौकरियां जाने से  मध्यमवर्गीय तबके की ऋण अदायगी  की क्षमता पर बुरा असर पड़ा। यद्यपि लॉक डाउन  होते ही सरकार के निर्देश पर बैंकों ने ऋण की किश्तें चुकाने की समय सीमा अनेक बार बढ़ाई। लेकिन लॉक डाउन समाप्त होने के बाद जब ये लगा कि आर्थिक गतिविधियां सामान्य हो चली हैं तब कर्ज चुकाने का दबाव बनाया जाने लगा। न सिर्फ बैंकों की देनदारी बल्कि अन्य सरकारी विभागों की  वसूली भी दबाव डालकर की जाने लगी। इस वजह से व्यापार और उद्योग जगत में जबरदस्त गुस्सा व्याप्त है। सरकारी भुगतान नहीं मिलने से भी उद्योग और व्यापार जगत के समक्ष बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है। ऐसे में बैंकों और सरकारी करों के भुगतान हेतु पड़ने वाला दबाव दूबरे में दो आसाढ़ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है। और जब बात ब्याज पर थोपे गए  ब्याज की आई तब ये भावना  तेजी से फैली कि सरकार और उसके उपक्रम बने बैंक संकट की इस  घड़ी में ईमानदार व्यवसायी के साथ खड़े होने की बजाय उसका गला काटने से बाज नहीं आ रहे। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का रुख बहुत ही न्यायोचित है। बैंकों के बढ़ते मुनाफे को देखते हुए ऐसा करना बड़ी बात नहीं होगी। बेहतर होगा सरकार और रिजर्व बैंक ब्याज पर  ब्याज न लगाने संबंधी स्पष्ट नीति न्यायालय के सामने पेश करे। वैसे  तो सरकार को ये मामला सर्वोच्च न्यायलय में जाने से पहले ही व्यापार - उद्योग जगत की उचित अपेक्षाओं को पूरा करना  चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्यवश वह ऐसा नहीं कर सकी। बैंकों ने वसूली  के नोटिस भेजना शुरू कर दिए हैं। सरकार और रिजर्व बैंक के पास अभी भी  समय है परिस्थितिजन्य ऐसा फैसला करने का जो संतुलित हो। बैंक व्यावसायिक संस्था होने से घाटे  में नहीं चलाए जा सकते लेकिन समय का तकाजा है कि वे अपने मुनाफे को कम से कम एक वर्ष के लिए थोड़ा कम करें जिससे कि उद्योग और व्यापार जगत की उखड़ी हुई  सांसें वापिस लौट सकें। अर्थव्यवस्था को सबल बनाने के लिए कारोबारी जगत को भी शक्तिवर्धक दवा देना जरूरी है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 3 October 2020

न ज्यादा उत्साहित हों न ही डरें लेकिन सतर्कता जरूरी



कोरोना संबंधी जो जानकारी कुछ दिनों से आ रही है उसके अनुसार देश भर में नये संक्रमणों की दैनिक संख्या एक लाख से घटते हुए अब 90 हजार से भी कम होने लगी है। इसी के साथ स्वस्थ होने वाले मरीज किसी-किसी दिन नए संक्रमितों से ज्यादा भी निकलने लगे हैं। निश्चित रूप से ये उत्साहजनक है। चिकित्सा जगत से अधिकृत तौर पर तो कुछ संकेत नहीं है लेकिन अनेक जानकार सूत्र ये बता रहे हैं कि भारत में कोरोना का चरम आ चुका है। उसके अनुसार अब लगातार नए मामले कम होते जायेंगे वहीं स्वस्थ होने वालों का प्रतिशत निरंतर बढ़ता जायेगा। जैसा कि देखने में आया है उसके अनुसार देश में कोरोना पर जीत हासिल करने वाले मरीजों का अनुपात वैश्विक स्तर से बहुत अच्छा है। कोरोना से मौत के गाल में समाने वालों की संख्या भले ही एक लाख पार कर चुकी हो लेकिन भारत की विशाल जनसँख्या, घनी और बेतरतीब बसाहट, बीमार स्वास्थ्य सेवाएं और संक्रामक बीमारियों के फैलाव के अनुकूल परिस्थितियाँ देखते हुए ये आशंका थी कि कोरोना भारत में विकराल रूप धारण कर लेगा और इसके सामुदायिक फैलाव की स्थिति सामने आयेगी। लेकिन अभी तक के अनुभव बताते हैं कि तमाम अव्यवस्थाओं के बावजूद भारत ने कोरोना के विरुद्ध जमकर लड़ाई लड़ी। इलाज और जांच की अपर्याप्त सुविधाएं, अस्पतालों में आईसीयू के अलावा साधारण बिस्तरों की भारी कमी, वैन्टीलेटर, मास्क और सैनिटाईजर जैसे साधनों का अभाव देखते हुए डर का माहौल था। इसीलिये केंद्र सरकार को लॉक डाउन लगाना पड़ा। जिसकी वजह से पूरा कारोबार चौपट होकर रह गया। हालाँकि दो माह बाद सब कुछ खुल गया और धीरे-धीरे ही सही अर्थव्यवस्था के साथ ही जनजीवन सामान्य होने लगा लेकिन ये स्थिति बड़ी ही नाजुक है और इसीलिये चिकित्सक और सरकार दोनों लोगों को आगाह कर रहे हैं कि भले ही आंकड़े उम्मीदें जगा रहे हों लेकिन कोरोना कब छापामार शैली में दोबारा जोरदार हमला कर दे ये कहना कठिन है। एक बात ये भी जो सुनने में आ रही है कि निजी अस्पतालों द्वारा कोरोना की जांच और मृतकों के आंकड़ों को छिपाया जा रहा है। पहले तो केवल सरकारी लैबों में ही कोरोना की जांच होती थी। लेकिन बाद में जबसे निजी लैबों को जाँच हेतु अनुमति मिली तबसे हेराफेरी होने की शिकायतें भी बढ़ चली हैं। ये भी कहा जा रहा है कि सरकारी अमला निजी जांच एजेंसियों को उपकृत करने के एवज में मोटा कमीशन खा रहा है। निजी अस्पताल वाले इन एजेंसियों से मिलकर फर्जी पॉजिटिव मामले निकलवाने का षडयंत्र रच रहे हैं। इस वजह से आंकड़ों को लेकर विश्वास का संकट बना हुआ है। हालाँकि इसके दो पक्ष हैं। एक का कहना है कि मरने वालों की संख्या ज्यादा है जिसे सरकार कम बताती है। दूसरी तरफ  एक आकलन ये भी है कि कतिपय निजी अस्पताल और जाँच एजेंसियां मिलकर निगेटिव को भी पॉजिटिव बनाने जैसा अमानवीय कृत्य करते हुए अपनी तिजोरी भरने में जुटी हुई हैं। और ऐसा इसलिये संभव हो सका क्योंकि सरकारी तंत्र भी इस धंधे में भागीदार है। किसी-किसी मरीज को जबरन निजी अस्पताल वाले बिना जरूरत के भर्ती किये रहते हैं जिससे उनका बिल बढ़ता रहे वहीं दूसरी और जब उन्हें लगता है कि और ज्यादा पैसा देने वाला आ गया तब वे पूरी तरह से ठीक नहीं हुए मरीज को भी घर भेजने की जल्दबाजी करते हैं। ये सब देखते हुए आम जनता को कोरोना संबंधी सभी सावधानियों का पालन गम्भीरता के साथ करना चाहिए। कोरोना का चरम आ चुका या नहीं ये अधिकृत तौर पर स्पष्ट नहीं है और जिस बड़ी संख्या में नए संक्रमण सामने आ रहे हैं उन्हें देखते हुए किसी भी प्रकार का आशावाद घातक हो सकता है। अनेक राजनेता तथा अन्य विशिष्ट जन अपनी लापरवाही के कारण कोरोना ग्रसित हुए। दिल्ली में भी स्थिति पूरी तरह से नियंत्रित हो जाने के बाद वहां की सरकार और जनता दोनों बेफिक्र हो चले थे जिसका दुष्परिणाम कोरोना की दूसरी लहर के तौर पर सामने आया जो पहले की अपेक्षा ज्यादा तेज थी। यही हाल मुम्बई की धारावी झोपड़ बस्ती में हुआ। वहां कोरोना को नियंत्रित किये जाने की खबर ने दुनिया भर का ध्यान खींचा और विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने उसकी प्रशंसा करते हुए उसे एक मॉडल के रूप में स्वीकार किया। लेकिन कुछ समय बाद वहां दोबारा संक्रमण फैलने की शुरुवात हो गई। इसलिये एक तरफ तो सरकार द्वारा दिए जा रहे आंकड़ों से उम्मीद बांधी जा सकती है लेकिन जब ये पता चलता है कि कोरोना कहीं धूप तो कहीं छाँव का खेल रच रहा है तब डर भी लगता है। इसलिए आम जन के लिए बेहतर यही होगा कि परस्पर विरोधी खबरों से न तो ज्यादा उत्साहित हों और न ही हतोत्साहित। कोरोना को लेकर जो भी सावधानियां अपेक्षित और आवश्यक हैं उनका पालन करना ही उससे बचाव का तरीका है। उस दृष्टि से ये समय बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिन राज्यों या शहरों में कोरोना का प्रकोप कम हुआ है वहां भी पूरी तरह सतर्क रहना जरूरी है। तमाम सर्वेक्षणों से ये बात सामने आई है कि कोरोना के जो मामले अब आ रहे हैं उनके लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जो मास्क जैसी छोटी सी चीज के इस्तेमाल में अपनी तौहीन समझते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 1 October 2020

तो अशिक्षा, दकियानूसीपन और पिछड़ापन क्या बुरे थे?




उप्र के हाथरस में सामूहिक दुष्कर्म के बाद ह्त्या की वीभत्स घटना ने हर संवेदनशील इन्सान को झकझोर कर रख दिया। वारदात का विवरण दरिंदगी का चरमोत्कर्ष है। इस कांड में पुलिस और प्रशासन की भूमिका भी चौंकाने वाली है। पीड़िता का अंतिम संस्कार रात के अँधेरे में किये जाने पर भी सजातीय वाल्मीकि समाज आंदोलित है। उप्र सरकार ने परिजनों को 25 लाख का मुआवजा देने के साथ ही जांच हेतु एसआईटी गठित कर दी है। ये मामला अभी गर्म ही था कि गत दिवस बलरामपुर में एक और घटना हो गई। इनके कारण राज्य की योगी सरकार पर चौतरफा हमले होने लगे। विपक्ष तो पहले ही राज्य में कानून व्यवस्था को लेकर आक्रामक था। आज राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा हाथरस जा रहे हैं। हो सकता है उन्हें प्रशासन पहले ही रोक ले। हालाँकि उनके इस कदम का कोई औचित्य भी नहीं है। दरअसल दुष्कर्म के बाद नृशंस तरीके से हत्या कर देने की प्रवृत्ति कानून व्यवस्था से ज्यादा समाज के बदलते स्वभाव का परिचायक है। दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद कानून को सख्त किये जाने के साथ ही अदालतों द्वारा त्वरित न्याय किये जाने का चलन भी शुरू हुआ। भोपाल में तो बलात्कार के एक मामले में एक महीने से भी कम समय में न्यायालय ने आरोपी को सजा सुना दी। निर्भया काण्ड ने पूरे देश को मानसिक तौर पर आंदोलित किया था। मोमबत्ती जलाने, मौन जुलूस, पोस्टर सहित धरना आदि का सैलाब आ गया। देश की महिला शक्ति ने उस कांड पर संगठित विरोध का जो प्रदर्शन किया उससे उनका गुस्सा प्रकट हुआ। लेकिन लम्बी अदालती जंग के बाद जब अपराधियों को सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति ने भी क्षमा करने से इंकार कर दिया और फांसी की तिथि तय हो गई तब भी उन्हें बचाने का एक और कानूनी प्रयास आधी रात को हुआ। अपराधियों के वकील द्वारा लगाई गई अर्जी पर विचार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय आधी रात के बाद खुला और सुनवाई की गई। यद्यपि फांसी नहीं टली और कुछ घंटों के बाद ही निर्भया को अमानुषिक यातना देकर मौत के घाट उतारने वाले लाश में तब्दील हो गये। लेकिन देश के सबसे ज्यादा चर्चित उस काण्ड के अपराधियों को मिले मृत्युदंड को क्रियान्वित किये जाने में जितना समय लगा उसको लेकर समूची न्याय प्रणाली आलोचना का शिकार हुई। विशेष रूप से फांसी के कुछ घंटे पहले देर रात सर्वोच्च न्यायालय खोला जाना किसी को रास नहीं आया। उल्लेखनीय है आतंकवादी याकूब मेनन की फांसी के पहले भी इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने देर रात बैठकर सुनवाई की थी। जब किसी की जान का सवाल हो तब न्यायालय यदि इस तरह की संवेदनशीलता दिखाए तब उसकी मंशा पर शक नहीं करना चाहिए किन्तु एक आतंकवादी और बलात्कारी के प्रति इस तरह की सौजन्यता अपराधियों के हौसले मजबूत करने का आधार बन जाती है। और उन अधिवक्ताओं को क्या कहें जो ऐसे नराधमों को बाइज्जत बरी करवाने के लिए अपने विधिक ज्ञान का दुरूपयोग करते हैं। हाथरस और बलरामपुर दोनों की घटनाओं में पीड़िता की अस्मत लूटने के साथ ही उसे जिस बेरहमी से मारा गया वह इस बात का प्रमाण है कि अपराधी केवल दुष्कर्मी ही नहीं अपितु राक्षसी मानसिकता से ग्रसित भी थे। इस तरह की घटनाएँ केवल उप्र तक ही सीमित न होकर देशव्यापी बीमारी के रूप में सामने आने लगी हैं। संचार क्रांति के इस दौर में किसी भी घटना की जानकारी सर्वत्र फ़ैल जाती है। सोशल मीडिया भी अपनी शैली में सक्रिय हो उठता है और टीवी चैनलों को दो-चार दिन के लिए सामग्री मिल जाती है। लेकिन विचारणीय विषय ये है कि कठोरतम कानून और समाज की रोषपूर्ण प्रतिक्रिया के बावजूद यदि बलात्कार और उसके बाद बहशियाना तरीके से की जाने वाली हत्या की घटनाएँ रुकने का नाम नहीं ले रहीं तो चिंता और भी बढ़ जाती है। अदालतें बेशक बलात्कारियों के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी नहीं दिखातीं और कड़े से कड़ा दंड भी देती हैं। लेकिन उस सबका कोई असर होता नहीं दीखता। और यही समाजशास्त्रियों के लिए अध्ययन और विश्लेषण का विषय होना चाहिए। बढ़ते यौन अपराध और उनके साथ हत्या जैसी वारदातें केवल कानून व्यवस्था की नहीं वरन सामाजिक चिंता का विषय भी होना चाहिए। इसके लिए साहित्य, फिल्में, टेलीविजन और इंटरनेट सभी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। इसलिए समस्या का वस्तुपरक विश्लेषण होना चाहिए। इस तरह की घटनाओं को पूरे समाज के चरित्र का पैमाना नहीं माना जा सकता लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि परवरिश और संस्कारों के हस्तांतरण में कहीं न कहीं लापरवाही तो हो रही है। गाँव-मोहल्ले की लड़की को अपनी बेटी और बहिन मानने वाले समाज में इस तरह के नरपिशाचों का लगातार बढ़ते जाना चिंता से ज्यादा गम्भीर चिन्तन का भी विषय है। यदि यही शिक्षा, आधुनिकता और विकास का प्रतिफल है तो फिर अशिक्षा, दकियानूसीपन और पिछड़ापन क्या बुरे थे?

- रवीन्द्र वाजपेयी