Wednesday, 21 October 2020

राहुल की आलोचना पर नाथ का जवाब नये समीकरणों का संकेत



मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ कांग्रेस के वरिष्ट नेताओं में हैं। 1980 में जब वे छिंदवाडा से लोकसभा चुनाव लड़ने आये तब उन्हें वहाँ कोई नहीं जानता था। लेकिन स्वयं इंदिरा जी ने चुनावी सभा में उनको अपना तीसरा बेटा कहकर समर्थन की अपील की जिसका जादुई असर भी हुआ। सांसद बनने के बाद श्री नाथ ने छिंदवाड़ा से अपने रिश्ते इतने प्रगाढ़ कर लिए कि लोगों को ये याद ही नहीं रहा कि वे कभी बाहरी भी थे। गांधी परिवार से निकटता का लाभ लेते हुए वे मप्र की राजनीति में एक छत्रप बनकर स्थापित हो गये। इंदिरा जी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी सत्ता में आये तब कमलनाथ की गिनती उनके ख़ासमखस में होने लगी। अपनी कार्यकुशलता और संपर्कों के बल पर वे कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में भी अपनी जगह बनाने में कामयाब हुए। केन्द्रीय मंत्री के तौर पर भी उनका काम  सराहा गया , वहीं पार्टी संगठन में उन्हें महत्वपूर्ण जवाबदारी मिलती रही। लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी मप्र का मुख्यमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा अधूरी ही थी। अंतत: 2018 में जाकर वह पूरी हुई जब कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद सपा - बसपा और निर्दलीयों का समर्थन लेकर श्री नाथ ने प्रदेश की सत्ता हासिल कर ही ली। चूँकि उनकी अध्यक्षता में कांग्रेस 15 साल बाद बहुमत की देहलीज तक पहुंच सकी इसलिए सत्ता उनके हाथ चली गई जिसमें उनके करीबी दिग्विजय सिंह का भी हाथ था जिनका उद्देश्य किसी भी तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया की ताजपोशी को रोकना था। उल्लेखनीय है श्री सिंधिया कांग्रेस के चुनाव संचालक थे और भाजपा ने उन्हीं को प्रतिद्वन्दी मानकर पूरा प्रचार अभियान माफ़ करो महाराज , हमारा नेता शिवराज के नारे पर केन्द्रित रखा। ज्योतिरादित्य को भी लगता था कि राहुल गांधी से उनकी नजदीकी मददगार बनेगी किन्तु उनकी सोच गलत साबित हुई। इधर प्रदेश की सत्ता में दिग्विजय सिंह समानांतर मुख्यमंत्री की तरह से काम करने लगे। लोकसभा चुनाव में हालाँकि भोपाल सीट से उनको जबरदस्त पराजय मिली लेकिन उससे भी बड़ा चमत्कार हुआ गुना में श्री सिंधिया के हारने का और वह भी अपने पुराने सहयोगी के हाथों। इसके बाद से प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में कमलनाथ सर्वेसर्वा बनकर उभरने लगे। श्री सिंधिया को उम्मीद थी कि पार्टी हाईकमान उनको कम से कम प्रदेश अध्यक्ष का पद तो दिलवा ही देगा किन्तु श्री नाथ की मोर्चेबंदी की वजह से उनके अरमान पूरे नहीं हो सके और अंतत: वे बगावत की राह पर आगे बढ़े और मार्च खत्म होते तक कमलनाथ सरकार धराशायी हो गई। इसके लिए दिग्विजय सिंह को ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है किन्त्तु सही बात तो ये है कि कमलनाथ की पदलिप्सा की वजह से ही कांग्रेस के हाथ आई सत्ता खिसक गई। वे यदि अध्यक्ष पद पर श्री सिंधिया को बिठाए जाने का समर्थन कर देते तब शायद उनकी सरकार बची रहती। लेकिन उसके बाद भी वे प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद कब्जाये हुए हैं और प्रदेश में हो रहे मिनी आम चुनाव की पूरी कमान अपने नियन्त्रण में ले रखी है। यहाँ तक कि उनके बेहद निकट कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह भी किनारे लगा दिए गए। अजय सिंह राहुल , अरुण यादव और सुरेश पचौरी जैसों का तो अता - पता ही नहीं है। श्री नाथ को उम्मीद है कि उपचुनाव के नतीजे उन्हें दोबारा सत्ता में ले आयेंगे। लेकिन बीते दिनों भाजपा प्रत्याशी इमरती देवी के बारे में की गई अशोभनीय टिप्पणी को कांग्रेसजनों ने भी पसंद नहीं किया। यहाँ तक कहा जाने लगा कि श्री नाथ ने भाजपा को बैठे बिठाये एक मुद्दा दे दिया। चुनाव आयोग ने भी उसे गम्भीरता से लिया। उल्लेखनीय है इमरती देवी कमलनाथ सरकार में भी मंत्री रहीं। उनके बारे में कही गयी बात का संज्ञान लेते हुए कांग्रेस के पूर्व और भावी अध्यक्ष राहुल गांधी ने नाराजगी व्यक्त करते हुए साफ़ - साफ़  कहा कि वे इस तरह की भाषा का समर्थन नहीं करते और जो श्री नाथ ने कहा वह दुर्भाग्यपूर्ण था। उपचुनावों के दौरान राहुल का ऐसा कहना श्री नाथ के लिए किसी तमाचे से कम न था। कांग्रेस में गांधी परिवार के किसी सदस्य द्वारा कही गयी बात को बिना प्रातिवाद के मान लेने का चलन रहा है। लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रमों से ये महसूस किया जा सकता है कि वह परम्परा खंडित होने लगी है। कांग्रेस में  पूर्णकालिक अध्यक्ष के लिए चुनाव करवाए जाने की मांग करने वाली चिट्ठी पर तमाम वरिष्ठ नेताओं के हस्ताक्षर किये जाने से ये बात साबित हो गई कि गांधी परिवार का लिहाज टूटने लगा है। जो नेता सोनिया गांधी का नेतृत्व बेहिचक स्वीकार करते रहे वे राहुल के झंडे तले खड़े होने में असहज महसूस करने लगे हैं। इसका ताजा प्रमाण है श्री गांधी की आलोचनात्मक टिप्पणी पर कमलनाथ का माफी मांगने से साफ इंकार करते हुए ये कहना कि ये उनकी राय है। वैसे कमलनाथ सोनिया जी के काफी निकट माने जाते हैं। उनको मुख्यमंत्री बनाये जाने में प्रियंका वाड्रा की भूमिका भी थी लेकिन गत दिवस राहुल द्वारा की गई आलोचना पर उनकी उपेक्षापूर्ण प्रतिक्रिया कांग्रेस के भावी भीतरी समीकरणों का संकेत दे रही है। मप्र के उपचुनाव श्री नाथ ही नहीं बल्कि प्रदेश में कांग्रेस का भविष्य भी तय करने वाले होंगे। जैसी कि सम्भावना व्यक्त की जा रही है उसके अनुसार ले देकर शिवराज सिंह अपनी सरकार बचा ले जायेंगे और तब कांग्रेस में नये सिरे से भगदड़ मचने की आशंका मजबूत हो जायेगी। उससे भी बड़ी बात ये होगी कि सत्ता में वापिस नहीं आई तब श्री नाथ के लिए प्रदेश अध्यक्ष तो दूर नेता प्रतिपक्ष बने रहना भी कठिन हो जाएगा। कांग्रेस की समस्या ये है कि दिग्विजय और कमलनाथ दोनों उम्रदराज हो चुके हैं और ज्योतिरादित्य ने भाजपा का दामन थाम लिया है। इनके अलावा जो वरिष्ठ और युवा नेता हैं उनकी छवि और क्षमता पार्टी को दोबारा खड़ा करने लायक नहीं लगती। ऐसे में राहुल गांधी द्वारा की गई आलोचना के जवाब में कमलनाथ की प्रतिक्रिया पार्टी के भीतर आने वाले तूफान का पूर्व संकेत हो सकती है। ये राहुल जी की राय है लेकिन मैं माफी नहीं मागूंगा जैसा जवाब देकर श्री नाथ ने कौन सा सियासी दांव चला है ये देखने वाली बात होगी। लेकिन मप्र के कांग्रेसजन इस बात को लेकर परेशान होंगे कि इमरती देवी प्रकरण पर वे राहुल की अलोचना का समर्थन कर्रें या उस पर कमलनाथ के जवाब का।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 20 October 2020

20-10-62 को याद कर चीन संबंधी स्थायी नीति बने



कहने को तो 20 अक्टूबर तारीख मात्र है लेकिन स्वाधीन भारत में 58 साल पहले का 20 अक्टूबर अविस्मरणीय दिन बन गया क्योंकि उसी दिन चीन ने धोखा देते हुए लद्दाख से अरुणाचल तक की लम्बी सीमा पर हमला बोल दिया था। तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. नेहरु के साथ ही पूरा देश हतप्रभ रह गया। हमारी तैयारी ऐसी नहीं थी कि हम उसका सामना कर पाते। परिणामस्वरूप हमारी सेना को अकल्पनीय मुसीबतें झेलनी पड़ीं। लेकिन उसने जिस शौर्य और पराक्रम का परिचय दिया वह शर्मनाक पराजय के बावजूद एक गौरवगाथा बन गई। एक महीने बाद चीन ने युद्धविराम तो कर दिया लेकिन तब तक हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि उसके कब्जे में जा चुकी थी जिसे वापिस लेने के लिए संसद में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करने के अलावा कोई प्रयास हुआ हो ऐसा कहीं से नहीं लगा। उलटे चीन कभी लद्दाख, कभी अरुणाचल तो कभी सिक्किम और भूटान से सटे इलाके को अपना बताकर दबाव बनाया करता है। अरुणाचल को तो दक्षिणी तिब्बत नाम देकर वह अपने नक्शे में दर्शाने से भी बाज नहीं आता। 1962 के बाद चीन के साथ दोबारा सीधे युद्ध की नौबत नहीं आई। लगातार शरारतपूर्ण रवैये के बावजूद चीन ने सैन्य दृष्टि से ऐसा कुछ नहीं किया जिसे युद्ध कहा जा सके। छुटपुट झड़पें तो होती रहीं लेकिन आपसी समझौते के अंतर्गत शस्त्रों के उपयोग से दोनों देश बचते रहे। बीती गर्मियों में गलवान घाटी में हुई मुठभेड़ में दोनों ओर से बड़ी संख्या में सैनिकों के हताहत होने के बावजूद एक भी गोली चलने की बात सामने नहीं आई। मार्च से ही लद्दाख अंचल में चीन ने वास्तविक नियन्त्रण रेखा की स्थिति को बदलने का दुस्साहस किया लेकिन भारत ने सैनिक और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर जबरदस्त चुनौती पेश करते हुए पहली बार चीन को दबाव में लाकर खड़ा कर दिया। अग्रिम सीमा तक सड़क , पुल और हवाई पट्टी के निर्माण किये जाने से भारत उन दुर्गम इलाकों में चीन को चुनौती देने में सक्षम है। हालांकि तनाव चरम तक पहुंचने के बाद भी अब तक युद्ध की नौबत नहीं आई किन्तु भारत द्वारा सियाचिन की तरह से ही लद्दाख सहित चीन से लगी समूची सीमा पर सेना के साथ ही मिसाइलें, तोपें, टैंक, लड़ाकू विमान आदि तैनात करने के अलावा उच्च क्षमतावान राडार प्रणाली भी स्थापित कर दी गई। यदि ये सब न किया जाता तब चीन 1962 जैसे हालात बनाने में कामयाब हो जाता। लेकिन 58 साल बाद चूंकि पहली बार युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हुई है इसलिए आज के दिन हमें इस बात पर आत्मावलोकन करना चाहिए कि इतने वर्षों में चीन के साथ सीमा विवाद का हल ढूढ़ने में सफलता क्यों नहीं मिली? आज भले चीन विश्व की बड़ी आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बन गया हो लेकिन दो-ढाई दशक पहले तक हम उससे अच्छी स्थिति में हुआ करते थे। परमाणु शक्ति संपन्न होने के बावजूद चीन के सामने भारत खुद को दबा-दबा क्यों महसूस करता रहा ये भी बड़ा सवाल है। पाक अधिकृत कश्मीर दोबारा हासिल करने के बारे में तो खूब बातें होती हैं लेकिन चीन के आधिपत्य में चली गई भूमि की लेकर किसी भी वैश्विक मंच पर भारत ने आज तक आवाज नहीं उठाई। बीते एक दशक में चीन से भारत में होने वाला आयात पूरी तरह से इकतरफा हो गया जिसके कारण उसको तो अनाप शनाप फायदा हुआ लेकिन भारत के लघु और मध्यम उद्योग तबाह हो गये। हालिया तनाव के बाद केंद्र सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर प्रतिबंधात्मक कदम उठाकर चीन को चुनौती देने का जो साहस दिखाया गया वैसा पहली बार सत्ता में आते ही क्यों नहीं किया ये भी विचारणीय है। आज का दिन इस बारे में ये सोचने का है कि चीन ने साम्यवादी शासन आते ही विस्तारवाद की जो दूरगामी नीति बनाई वह आज भी जारी है। लेकिन तिब्बत पर उसके बलात कब्जे को मान्यता देने जैसी गलती का खामियाजा भुगतने के बाद भी उसको लेकर हमारी कोई स्थायी सोच नहीं बन सकी और तात्कालिक आधारों पर ही कूटनीतिक रिश्ते नर्म-गर्म होते रहे। इस बारे में एक बात ध्यान रखने योग्य है कि चीन को भविष्य की महाशक्ति मानकर पं. नेहरु ने तुष्टीकरण करने के लिए पहले तो तिब्बत पर उसके कब्जे को मान्य किया और फिर वहां के धार्मिक शासक दलाई लामा को न केवल शरण दी अपितु तिब्बत की निर्वासित सरकार चलाने की छूट देकर उसे नाराज कर दिया। तिब्बत को कब्जाने के साथ ही चीन ने एक तरफ  तो नेहरु जी के संग पंचशील नामक समझौता कर हिन्दी-चीनी भाई भाई का नारा लगाया और दूसरी तरफ  सीमा संबंधी विवाद को हवा देने की शुरुवात करते हुए अंग्रेजों के ज़माने से चले आ रहे तमाम समझौतों को नकारते हुए कहना शुरू कर दिया कि भारत के साथ उसकी सीमाओं का कभी निर्धारण हुआ ही नहीं। वह तो उसी बात पर अड़ा है लेकिन भारत की तरफ  से आज तक चीन को कड़े शब्दों में ये कहने की हिम्मत नहीं हुई कि किसी भी तरह के सम्बन्ध रखने के पहले 20 अक्टूबर 1962 की स्थिति वापिस लाई जाए। चीन को ये बताने की जरूरत है कि यदि सीमा विषयक ऐतिहासिक समझौते और व्यवस्थाएं बेमानी हैं तब तिब्बत पर उसका कब्जा भी अमान्य करने योग्य है। हालिया घटनाक्रम से एक बात तो साफ हो गई कि चीन को उसी की शैली में जवाब दिया जाए तो उसकी धौंस कम हो जाती है अन्यथा वह डराने और धमकाने की चिर-परिचित नीति पर चलता रहता है। इस साल 20 अक्टूबर पर भले ही युद्ध न हो रहा हो लेकिन सीमा पर जो हालात हैं उनमें कब क्या हो जाए कहना कठिन है। और इसीलिये यही माकूल समय है जब चीन को लेकर भारत को अपनी ऐसी दूरगामी नीति बना लेनी चाहिए जिसमें शर्तें निर्धारित करने का अधिकार हमारे पास रहे। कूटनीति में एक तरफ  तो दिल मिलें न मिलें, हाथ मिलाते रहिये वाली उक्ति काफी प्रचलित है वहीं ये भी कि दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए। चीन ने बीते साठ साल में दूसरी उक्ति का भरपूर उपयोग किया, अब हमारी बारी है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 19 October 2020

थरूर में साहस था तो बलूचिस्तान और सिंध जैसे मुद्दे उठाते



कांग्रेस सांसद शशि थरूर की शैक्षणिक योग्यता और राजनयिक अनुभव पर कोई संदेह नहीं कर सकता। अच्छे लेखक और वक्ता के रूप में भी वे प्रतिष्ठित हैं। केरल की तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट से लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद वरिष्ठ सांसदों में उनकी गिनती होती है । लेकिन पूर्व केन्द्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर की तरह वे भी अक्सर ऐसा कुछ कह जाते हैं जिससे उनकी फजीहत तो होती ही है लेकिन कांग्रेस पार्टी को भी मुंह छिपाना पड़ता है। ताजा वाकया श्री थरूर द्वारा लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल में वीडियो कांफ्रेंसिंग  के जरिये दिया भाषण है जिसमें उन्होंने कोरोना प्रबंधन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को असफल बताते हुए ये आरोप भी लगाया कि उनकी सरकार ने कोरोना के लिए तबलीगी जमात को जिम्मेदार ठहराकर धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दिया। पूर्वोतर भारत के लोगों की शक्ल के आधार पर उनके साथ भेदभाव का सवाल भी श्री थरूर ने उठाया लेकिन उनके बयान में कोरोना की रोकथाम में भारत की तुलना में पाकिस्तान को सफल बताये जाने पर भाजपा ने जोरदार हमला बोलते हुए कांग्रेस को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा किया कि उसके नेता विदेशी मंचों पर भी देश की छवि खराब कर रहे हैं। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने पूर्व गृह मंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा दो दिन पूर्व जम्मू कश्मीर में धारा 370 को पुन: लागू किये जाने संबंधी बयान का भी उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसा कहकर उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मांग को एक तरह से समर्थन दे दिया। भाजपा प्रवक्ता द्वारा श्री थरूर के भाषण की आलोचना में राजनीति देखी जा सकती है लेकिन निष्पक्ष तौर पर देखें तो एक शत्रु देश के मंच पर देश विरोधी बात कहना श्री थरूर जैसे वैश्विक अनुभव संपन्न नेता से तो कम से कम अपेक्षित नहीं था। लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल जयपुर की तर्ज पर आयोजित होता है। श्री थरूर बतौर लेखक उसमें शिरकत करते हुए अपनी पुस्तक या वैसे ही किसी विषय पर बात करते तो किसी को आपत्ति न हुई होती। अगर उन्होंने भारत और पाकिस्तान की साझा साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए उसे आगे बढ़ाने की बात कही होती तब उनका स्वागत हुआ होता। यहाँ तक कि अतिथि धर्म का पालन करते हुए कोरोना प्रबंधन के लिए पाकिस्तान सरकार की तारीफ  कर देते तब उसे शिष्टाचार का रूप देते हुए नजरअंदाज किया जा सकता था लेकिन उन्होंने राजनीतिक लाभ की लालसा में अपने ही देश और सरकार की आलोचना करते हुए जो मुद्दे छेड़े वे घोर आपत्तिजनक हैं। कोरोना से लड़ने में भारत सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा ये किसी साहित्यिक समागम की विषय सूची का हिस्सा नहीं है। इसी तरह तबलीगी जमात से जुड़े विवाद और पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भेदभाव जैसे विषय उठाने का औचित्य और आवश्यकता भी गले नहीं उतरती। श्री थरूर यदि बलूचिस्तान, सिंध और पाक अधिकृत काश्मीर में पाकिस्तान सरकार और सेना द्वारा किये जा रहे अत्याचारों का उल्लेख करते हुए मानवाधिकारों के हनन का सवाल उठा देते तो पूरा देश उनकी शान में कसीदे पढ़ रहा होता। वे इमरान सरकार द्वारा आतंकवाद को प्रश्रय दिए जाने का जिक्र करते  तब लगता कि वे भारत के सही प्रतिनिधि हैं लेकिन ऐसा करने के बजाय उन्होंने लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल में जो कुछ कहा वह अप्रासंगिक, अनावश्यक, औचित्यहीन और राष्ट्रीय हितों के सर्वथा विरुद्ध था। उनके वक्तव्य का पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उपयोग भारत विरोधी प्रचार में करे तब श्री थरूर उसका प्रतिवाद किस मुंह से करेंगे इसका जवाब भी उनसे मांगा जाना चाहिए। बेहतर होता कांग्रेस पार्टी खुद होकर श्री थरूर के बयान की आलोचना करते हुए उनसे सवाल करती। देश की सुरक्षा और विदेश नीति के मामले में घरेलू स्तर पर चाहे जितने मतभेद हों लेकिन विदेशी मंचों पर और कम से कम चीन और पाकिस्तान से जुड़े विवादों के बारे में सभी दलों नेताओं को एक स्वर में बोलना चाहिए। उस दृष्टि से श्री थरूर ने राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध जो बयान लाहौर लिटरेचर फेस्टीवल में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये दिया वह न केवल निंदनीय वरन आपतिजनक भी है। कहावत है होशियार कौआ भी कभी-कभार गलत जगह बैठ जाता है। श्री थरूर ने इसे चरितार्थ कर दिखाया। अक्ल का गरूर भी कभी-कभी महंगा साबित होता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 17 October 2020

मप्र उपचुनाव : सत्ता की चाहत में संस्कारों को तिलांजलि



मप्र में दो दर्जन से भी ज्यादा विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने जा रहे हैं। इनमें से अधिकतर कांग्रेस विधायकों के थोक में हुए दलबदल के कारण करवाने पड़ रहे हैं जबकि कुछ विधायकों के निधन के कारण। उपचुनाव होना संसदीय प्रजातंत्र में सामान्य बात है लेकिन मप्र की मौजूदा राजनीतिक स्थितियों में ये आम चुनाव जैसा रूप ले चुके हैं। बीते मार्च महीने में नाटकीय घटनाक्रम के बाद तकरीबन दो दर्जन कांग्रेस विधायकों ने बगावत कर भाजपा का दामन थाम लिया जिससे कमलनाथ सरकार गिर गई। उसके अनेक मंत्री बाद में शिवराज सरकार में मंत्री पद पा गये। समूचे घटनाक्रम के केंद्र बिंदु  पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योत्तिरादित्य सिंधिया रहे जो कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जुगलबंदी से कांग्रेस में मनमाफिक महत्त्व नहीं मिलने से नाराज चल रहे थे। 2019 में अपनी पारिवारिक गुना लोकसभा सीट से हारने के बाद वे अपने पुनर्स्थापन के लिए बेचैन थे। राज्यसभा में उनके जाने में भी जिस तरह दिग्विजय सिंह द्वारा टांग फंसाई जा रही थी उसके बाद से वे अपने को असुरक्षित अनुभव करने लगे और आखिर में भाजपा के साथ आ गये जो उनकी स्वर्गीया दादी राजमाता सिंधिया द्वारा पोषित पार्टी है। उनके पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की राजनीतिक यात्रा भी भाजपा के पूर्ववर्ती जनसंघ से प्रारंभ हुई थी। ज्योतिरादित्य की बुआ वसुंधरा राजे राजस्थान में  भाजपा सरकार की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं वहीं दूसरी बुआ यशोधरा राजे मप्र की भाजपा सरकार का हिस्सा हैं। ज्योतिरादित्य अपने साथ उन 22 विधायकों को तोड़ लाये जो कांग्रेस की बजाय उनके प्रति निष्ठा रखते थे। इस प्रकार ये उपचुनाव केवल विधानसभा की खाली सीटों को भरने से ज्यादा शिवराज सरकार को बचाने और कमलनाथ सरकार को दोबारा लाने पर आकर टिक गया है। हालांकि भाजपा को सरकार बचाए रखने के लिए 10 सीटें मिल जाना भी काफी होगा लेकिन मुख्यमंत्री श्री चौहान को अपनी वजनदारी साबित करने के लिए कम से कम 20 सीटों पर विजय हासिल करनी होगी। यदि वे 8 -10 सीटें जीतकर सरकार बचाए रखने में सफल हो गये तब उनका भविष्य असुरक्षित हो जाएगा क्योंकि पार्टी हाईकमान को ये लगने लगेगा कि उनका आकर्षण पहले जैसा नहीं रहा और भविष्य में बड़ी लडाइयां जीतने के मद्देनजर प्रदेश भाजपा को किसी नए ऊर्जावान चेहरे की जरूरत होगी। यद्यपि शिवराज चुनावी राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी हैं लेकिन ये भी सही है कि 2018 में भाजपा बहुमत की दहलीज पर आकर जिस तरह रुक गयी उससे उनकी चमक कुछ फीकी पड़ी है। फिर भी दबाव कमलनाथ पर ज्यादा है क्योंकि दोबारा मुख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेस को कम से कम 23-24 सीटें जीतनी ही होंगी जो आसान नहीं है। हालाँकि वे जिस तरह से मेहनत कर रहे हैं उससे कांग्रेस कार्यकार्ताओं का मनोबल बहुत ऊंचा है। 15 साल बाद मिली प्रदेश की सत्ता के सस्ते में चले जाने का जो दर्द उनके मन में है उसकी वजह से वे पूरे जोश के साथ मैदान में हैं। यही वजह है कि चुनावी पंडित भाजपा की बढ़त के बारे में आश्वस्त होने के बाद भी किसी भी प्रकार की भविष्यवाणी करने से बच रहे हैं। लेकिन इन उपचुनावों में प्रचार का स्तर बहुत ही घटिया होने से चिंता के कारण बन गये हैं। मप्र की राजनीति सदैव मर्यादाओं से बंधी रही और राजनीतिक मतभिन्नता के बावजूद नेताओं के बीच सौजन्यता का एहसास होता रहा। लेकिन इन उपचुनावों में जिस तरह की स्तरहीन और अवांछनीय टिप्पणियाँ सुनने में आ रही हैं उनसे लगता है कि सत्ता की लालसा अब वासना बन गई है जिसकी पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जाने की बेशर्मी अब सहज-सरल बन गई है। चुनावों के दौरान विपक्षी उम्मीदवार या पार्टी के बारे में आंय-बांय बकने वालों को तब कितनी शर्मिदगी झेलनी पड़ती है जब वही विरोधी उनकी पार्टी में आ जाता है। पिछले चुनाव में शिवराज सिंह , सिंधिया को अंग्रेजों का मित्र बताकर ज्योतिरादित्य को गद्दार की श्रेणी में रखने का दुस्साहस करते थे किन्तु वही उनकी सरकार बनवाने में मददगार बने। दूसरी तरफ  अब कांग्रेस इस बात को कहने में जऱा भी नहीं शर्मा रही कि गद्दारी तो सिंधिया खानदान की रगों में है। कोई शिवराज को भूखा-नंगा बता रहा है  तो कोई कमलनाथ को चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुआ। किसी के चेहरे को रावण जैसा बताया जा रहा है तो किसी के बारे में दूसरे अपशब्द कहे जा रहे हैं। इस प्रकार ये उपचुनाव अब तक के सबसे गंदे प्रचार का नजारा पेश कर रहे हैं जिसे  चुनाव आयोग चुपचाप देख रहा है। चुनावी राजनीति में अच्छे लोगों के न आने का उलाहना तो सभी देते हैं लेकिन जिस तरह का माहौल चुनाव के दौरान बनने लगा है वह अच्छे लोगों को किसी भी स्थिति में रास नहीं आता। मप्र की राजनीतिक छवि उप्र और बिहार की तुलना में बहुत अच्छी मानी जाती रही है लेकिन अब लगने लगा है कि इस प्रदेश में भी सता की चाहत ने संस्कारों का अन्त्तिम संस्कार कर दिया है। सिद्धांत तो पहले ही कबाड़खाने में जा चुके हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 16 October 2020

दशहरा - दीपावली में बेहद सतर्क रहना होगा



कल से नवरात्रि प्रारम्भ हो रही है | इसी के साथ भारत में त्यौहारी मौसम की शुरुवात हो जायेगी | खरीफ  फसल भी आने लगी है |  बरसात के बाद घरों की साफ़ - सफाई का काम भी रफ्तार पकड़ने लगा है | महीनों से सूने  पड़े देवी मंदिरों पर भक्तों की मौजूदगी नजर आयेगी | दीपावली महोत्सव की शुरुवात भी इसी समय से हो जाती है | दुर्गा पूजा और  दशहरा के कारण सर्वत्र चहल पहल होना स्वाभाविक है | बीते लगभग सात महीने से कोरोना के कारण भय का जो महौल बना हुआ था उसमें  कुछ हफ्तों से  कमी आई है | इसका कारण संक्रमण में गिरावट  आना है | जिस तेजी से सक्रिय मरीजों की  संख्या घट  रही है वह इसी योजना का हिस्सा है या वास्तविकता ये तो स्पष्ट नहीं है लेकिन उस कारण देश में दशहरा - दीपावली को लेकर उत्साह बढ़ा है | सरकारी तौर पर भी सार्वजनिक दुर्गा पूजा को कतिपय प्रतिबंधों  के साथ आयोजित किये जाने की अनुमति दे दी गई है | बाजारों में ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए विज्ञापनों का दौर  चल पड़ा है | केंद्र सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों में एक लाख करोड़ रूपये बांटकर उन्हें खरीदी करने के लिए प्रेरित किया जा रहा  है  ताकि उद्योग और व्यापार दोनों को सहारा मिले और उसको राजस्व  | लेकिन कोरोना का प्रभाव कम भले हो रहा है फिर भी  ये  मान लेना भयंकर भूल होगी कि उसकी विदाई का समय आ चुका है | ऐसा कहने के पीछे न तो लोगों का मनोबल तोड़ने का उद्देश्य है और न ही त्यौहारों की खुशी में खलल डालने का , मगर ध्यान देने वाली बात ये है कि लॉक डाउन के जरिये भारत में कोरोना के फैलाव को रोकने में जो  सफलता  मिली उससे सरकार और जनता दोनों अति उत्साह में आ गये और लॉक  डाउन में ढील दे दी गई | जब पहली बार शराब की दुकानें खोली गईं तो पीने के शौकीनों ने सारे नियंत्रणों को धता बाते हुए व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दीं | वह एक तरह का संकेत था लोगों  के स्वभाव और व्यवहार का | लेकिन अर्थव्यवस्था के दबाव के कारण सरकार को भी मजबूर हो जाना पड़ा | बहरहाल जिस दिन से लॉक डाउन हटा उसी के बाद से कोरोना का संक्रमण सुरसा के मुंह की तरह फैलता चला गया और सितम्बर का आखिरी  हफ्ता आते - आते तक एक लाख से ज्यादा नए कोरोना  मरीज  प्रतिदिन की  औसत से निकलने लगे | इसकी वजह से शासकीय चिकित्सा  व्यवस्था चरमरा गई | जिसका लाभ उठाते हुए निजी अस्पतालों ने मरीजों का जमकर शोषण किया | बहरहाल बीते तीन सप्ताह से संक्रमण पर काफी नियन्त्रण होता दिखाई दिया है और जो आंकड़े आ रहे हैं उनके अनुसार रोजाना  स्वस्थ होने वाले मरीज नये संक्रमितों की तुलना में ज्यादा होने से ऐसा माना  जाने लगा है कि भारत में अब कोरोना का ढलान शुरू हो गया है और  बड़ी बात नहीं यदि नवंबर खत्म होते तक वह पूरी तरह से खत्म हो जाए | सरकारी  दावों के अनुसार जनवरी 2021 से कोरोना की वैक्सीन भारत में उपलब्ध हो जायेगी | लेकिन यूरोप के दो अति विकसित देश फ़्रांस और जर्मनी के ताजा हालात भारत के लिए चेतावनी हैं | इन दोनों ने कोरोना  पर काफ़ी हद तक काबू  पा लिया था जिसके बाद वहां  जनजीवन पूरी तरह सामान्य होने लगा | सीमित जनसंख्या के अलावा इन देशों की स्वास्थ्य सेवाएं भी उच्चस्तरीय हैं और हर व्यक्ति के पास चिकित्सा बीमा जैसी सुविधा भी होती है | उस दृष्टि से भारत काफी पीछे है | हालांकि कोरोना काल में हमारे यहाँ  भी चिकित्सा सुविधाओं का काफी विकास होने के साथ ही  जांच का काम भी तेज हुआ लेकिन फ़्रांस और जर्मनी से तुलना करने पर हमारी कमियां खुलकर सामने आ जायेंगी | चिकित्सा बीमा सुविधा से भी आबादी का बड़ा वर्ग वंचित ही है | उक्त  दोनों देशों में अचानक कोरोना ने दोबारा हमला किया और देखते ही देखते स्थिति कर्फ्यू लगाने तक आ पहुँची | फ़्रांस और जर्मनी दोनों इसकी  वजह से सकते में हैं | जबकि वहां कोरोना से सम्बन्धित सावधानियों का पालन करने के प्रति लोगों में काफी जागरूकता है और सार्वजनिक आचरण  भी काफी  अनुशासित होता है | इसके विपरीत भारत में हालात काफी उलट  हैं | घनी आबादी , बेतरतीब बसाहट , सर्वत्र भीड़ , धक्का - मुक्की और नियमों के पालन के प्रति लापरवाही युक्त हेकड़ी हमारी पहिचान है | ऐसे में नवरात्रि से प्रारम्भ हो रहे त्यौहारी मौसम में कोरोना से बचाव के प्रति थोड़ी  सी भी असावधानी  संक्रमण को महामारी में बदल सकती है जिससे  सौभाग्यवश अभी तक भारत बचा रहा | अनेक चिकित्सा विशेषज्ञ भी इसे लेकर सतर्क कर रहे हैं | दुर्गा पूजा के दौरान बंगाल सहित समूचे पूर्वी  भारत में जबर्दस्त उत्साह रहता है | इसीलिये इस बात का भय जताया जा रहा है  कि नवरात्रि के बाद बंगाल में कोरोना सुनामी बनकर कहर ढा सकता है | ऐसी ही आशंका देश के अन्य हिस्सों में भी बनी हुई है | अर्थव्यवस्था और सरकार की अपनी - अपनी मजबूरियां हैं, लेकिन आम जनता को  भी अपनी और अपनों की जान की हिफाजत के लिए पूरी तरह सावधान रहना होगा | त्यौहार मनाते  समय अपनी खुशी और जोश को नियन्त्रण में रखना समय की मांग है | दुर्गा पूजा से लक्ष्मी पूजा तक का समय इस दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील रहेगा | इस दौरान बरती गयी जरा सी लापरवाही रंग में भंग न कर दे ये देखना हर जिम्मेदार नागरिक का दायित्व है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 15 October 2020

कश्मीर : अब्दुल्ला और मुफ़्ती मिलकर भी मनमानी नहीं कर सकेंगे



जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला द्वारा हाल ही में अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाने के लिए चीन का समर्थन लेने संबंधी बयान की गूँज कम हुई नहीं थी कि कल पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को एक वर्ष से ज्यादा की नजरबंदी के बाद रिहा कर दिया गया।  फारुख और उनके बेटे उमर को पहले ही रिहाई दी जा चुकी थी। महबूबा के रिहा होते ही अब्दुल्ला पिता-पुत्र उनकी मिजाजपुर्सी करने पहुंचे और उसके बाद आये बयान के अनुसार नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के अलावा राज्य की उन तीन पार्टियों के साथ संयुक्त रणनीति बनाने हेतु आज बैठक की जा रही है जिन्होंने गत वर्ष जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाये जाने के विरुद्ध मैदानी संघर्ष करने के लिए एकजुट होने के समझौते पर हस्ताक्षर किये थे।  इनमें माकपा , जम्मू कश्मीर पीपुल्स कांफ्रेंस और जम्मू कश्मीर अवामी नेशनल कांफ्रेंस शामिल हैं।  लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि बैठक में कांग्रेस को बुलाने संबंधी कोई जानकारी नहीं है जो कि 370 और 35 ए हटाये जाने की विरोधी है।  इसकी वजह गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस हाईकमान से रिश्ते बिगड़ जाना भी हो सकता है। अलगाववाद समर्थक हुर्रियत कांफ्रेंस चूँकि चुनावी प्रक्रिया से दूर ही रहती है इसलिए वह भी इस जमावड़े से अलग रहेगी। लेकिन सबसे बड़ा पेंच है नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के गठबंधन में स्थायित्व का क्योंकि अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के बीच सांप और नेवले जैसी शत्रुता रही है। आगामी विधानसभा चुनाव के समय सीटों के बंटवारे तक क्या दोनों साथ रह सकेंगे ये बड़ा सवाल है। वैसे सीमित प्रभाव के बावजूद कश्मीर घाटी में कांग्रेस ही राष्ट्रीय दल के तौर पर उपस्थिति दर्ज करवाने लायक है। भाजपा वहां हाथ-पाँव मार जरुर रही है परन्तु अब तक उसे खास सफलता नहीं मिल सकी है। ग्राम पंचायतों को सीधे पैसा देकर पंच-सरपंचों को खुश करने की रणनीति भी बहुत कारगर नहीं रही। उस दृष्टि से ये देखने वाली बात होगी कि राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने से भाजपा को क्या हासिल होगा? हालाँकि जम्मू अंचल में वह पहले से मजबूत हुई है लेकिन अभी भी विधानसभा के शक्ति संतुलन में घाटी का पलड़ा भारी है। भाजपा की परेशानी ये भी है कि घाटी की कोई भी बड़ी पार्टी उससे गठबंधन नहीं करेगी।  महबूबा तो भाजपा से मिले झटके को शायद ही कभी भूल सकेंगी।  अब्दुल्ला परिवार के साथ भाजपा की नजदीकियां बढ़ने की अटकलें तब जरूर तेज हुई थीं जब बीते मार्च में फारुख और उमर दोनों को रिहा किया गया लेकिन भाजपा उनसे हाथ मिलाने के बारे में सोचेगी तो वह उसके लिए आत्मघाती होगा।  स्मरणीय है 2014 में जम्मू कश्मीर में भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई तब वह फैसला उसके अपने समर्थकों के गले ही नहीं उतरा था।  बाद में जरूर भाजपा ने उस रणनीति के दूरगामी प्रभाव से देश को परिचित करवाया लेकिन 370 और 35 ए नहीं हटाये जाते तब वह मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचती। आज वह जम्मू के बल पर एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरने की स्थिति में है लेकिन घाटी में जब तक उसे अपने लिए कोई सहयोगी नहीं मिलता तब तक राज्य में सरकार बनाने की उसकी महत्वाकांक्षा पूरी होने में संदेह है।  मनोज सिन्हा को वहां का उपराज्यपाल बनाये जाते ही ये तय हो गया था कि केंद्र चुनी हुई विधानसभा के लिए रास्ता साफ़ करने की सोच रहा है।  महबूबा की रिहाई भी उसी का परिणाम है।  देखना ये है कि कांग्रेस की आगामी भूमिका क्या होगी क्योंकि वह जम्मू क्षेत्र में भी कुछ प्रभाव रखती है।  लेकिन 370 और 35 ए की वापिसी जैसी मांग उसके लिए हानिकारक हो सकती है। हालांकि अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में उमर अब्दुल्ला राज्यमंत्री भी रहे किन्तु उसके बाद नेशनल कांफ्रेंस के साथ भाजपा की दूरी बढ़ती गई और पीडीपी के साथ सरकार बनाने के बाद तो और भी ज्यादा। लेकिन भाजपा की उस चाल से पीडीपी की जड़ें घाटी में कमजोर हो गईं।  पिछले चुनाव तक मुफ्ती मोहम्मद सईद जि़ंदा थे । लेकिन उनके न रहने के बाद महबूबा बहुत कमजोर हो गईं। वैसे तो अब्दुल्ला परिवार भी पहले जैसी साख और धाक नहीं रखता लेकिन अभी भी घाटी में मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति के पाँव जम नहीं सके और यही मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। उस दृष्टि से नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी द्वारा कुछ और दलों के साथ की जा रही मोर्चेबंदी पर सभी की निगाहें रहेंगी और इस पर भी कि वे कांग्रेस को कितनी जगह देती हैं। वैसे अब्दुल्ला और मुफ्ती का एक साथ चलना आसान नहीं होगा क्योंकि दोनों ही कश्मीर की सियासत के सबसे बड़े ठेकेदार बने रहने बेताब हैं।  फारुख उम्रदराज हो चले हैं और उनकी हसरत अपने बेटे उमर को मजबूती से स्थापित करने की है। वहीं महबूबा अकेली पड़ चुकी हैं और पीडीपी के अनेक नेता पार्टी छोड़ चुके है। बीते सवा साल में केंद्र सरकार ने घाटी के भीतर आतंकवाद की जड़ें खोदने की दिशा में सराहनीय काम किया है। अलगाववादियों को भी सख्ती से ये समझा दिया गया है कि उन्हें पहले जैसी स्वछंदता नहीं मिलेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि फारुख और महबूबा सहित घाटी का हर शख्स जान चुका है कि 370 और 35 ए की वापिसी अब असंभव है। केंद्र शासित होने से जम्मू कश्मीर की विधानसभा दिल्ली की तरह केंद्र सरकार के मातहत रहेगी और ऐसे में अब्दुल्ला और महबूबा मिलकर सत्ता हासिल कर लेते हैं तब भी वे स्वेच्छाचारी नहीं हो सकेंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 October 2020

ऐसी ही मेहरबानी उद्योग - व्यापार पर भी हो जाये तो बात बन जाए



कोई कुछ दे तो उसके प्रति आभार व्यक्त करना सौजन्यता का तकाजा है | लेकिन गत दिवस  वितमंत्री निर्मला सीतारमण ने केन्द्रीय कर्मचारियों  के लिए जो राहत पैकेज घोषित किया उससे किसे राहत मिलेगी ये विश्लेषण का विषय है | इसमें लीव ट्रेवल कन्सेशन की राशि के अलावा त्यौहारी अग्रिम की राशि भी शामिल है | इनमें पहली तो कर्मचारी को एक तरह से उपहार में दी गई है जबकि दूसरी किश्त्तों में  लौटाना होगी | इसमें भी रोचक बात ये है कि लीव ट्रेवल कन्सेशन की जो रकम दी जायेगी उससे कर्मचारी को 31 मार्च 2021 के पूर्व  ऐसी वस्तुएं खरीदकर उनकी रसीद पेश करनी होगी जिन पर 12 फीसदी से ज्यादा जीएसटी दिया गया हो | इसी तरह 10 हजार का त्यौहारी अग्रिम रुपे कार्ड में दिया जायेगा जिसे लौटाना तो 10 मासिक किश्तों में होगा लेकिन उस राशि  को भी आगामी वर्ष 31 मार्च तक खरीदी के तौर इस्तेमाल करना पड़ेगा | केंद्र सरकार का मानना है कि इससे एक तरफ तो कर्मचारी वर्ग खुश होगा क्योंकि दीपावली पर उसके हाथ में खर्च करने के लिए पैसा आयेगा और दूसरी तरफ बाजार में मांग बढ़ने  से उद्योग व्यापार में जान आने के साथ ही सरकार के खाते में जीएसटी के रूप में राजस्व आयेगा | सतही तौर पर देखने पर तो सरकार का फैसला समयानुकूल लगता है | निश्चित रूप से इसकी वजह से जैसा अनुमान है  लगभग 1 लाख करोड़ की राशि बाजार में आने से कारोबारी जगत को कुछ सहारा मिलेगा | कर्मचारी के पास त्यौहार में खुशियाँ मनाने के लिए नगद  रकम होगी और अन्ततः सरकारी खजाने में भी आवक होगी | लेकिन इसमें बिना ब्याज वाले त्यौहारी अग्रिम  को लेकर तो कोई परेशानी नहीं है क्योंकि ये पहले भी दिया जाता रहा किन्तु लीव ट्रेवल कंसेशन का नगदीकरण करते हुए उस राशि से अगले साल  मार्च तक अनिवार्य रूप से खरीदी करने का जो प्रावधान किया गया उसकी बजाय सरकार उतनी मेहरबानी  उद्योग  - व्यापार जगत पर  बतौर राहत कर दे तो उसका दूरगामी लाभ देश और अर्थव्यवस्था को मिलेगा | मसलन लॉक डाउन के दौरान बिजली बिलों के भुगतान में अब तक किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी गयी | लघु और मध्यम श्रेणी के व्यापारी और उद्योगपति को कोरोना काल में जो आर्थिक क्षति हुई उसकी भरपाई नहीं होने से अब तक उद्योग और व्यवसाय पटरी पर नहीं लौट सका | इसके कारण सरकार को मिलने वाला कर तो घटा ही लेकिन रोजगार में वृद्धि के अवसर भी उत्पन्न नहीं हो पा रहे हैं | उल्लेखनीय है केंद्र और राज्य सरकारें कर्मचारियों और किसानों के लिए तो काफी कुछ कर रही हैं  लेकिन उद्योग और व्यापार के लिए जितने भी पैकेज घोषित हुए उनमें सीधी राहत नहीं दिए जाने से अब तक उसके अपेक्षित परिणाम नहीं आये हैं | खरीददार के हाथ में नगदी होने से वह बाजार में आकर उसे खर्च करता है जिससे अर्थव्यवस्था गतिशील होने से एक तरफ जहां सरकार को राजस्व मिलता है वहीं श्रम शक्ति को भी रोजगार के रूप में आजीविका का साधन मिल जाता है | मौजूदा स्थिति में छोटी और मध्यम  श्रेणी की  लाखों औद्योगिक और व्यापारिक इकाइयां पूंजी के अभाव में घुटनों के बल चलने की स्थिति में हैं | उनके लिए सरकार ने  ऋण की व्यवस्था तो की है लेकिन पहले से कर्ज में डूबे तबके पर नए कर्ज का बोझ समझ से परे हैं | उस दृष्टि से केंद्र सरकार द्वारा गत दिवस घोषित राहत पैकेज कर्मचारियों को भले ही प्रसन्न कर  दे जिसका लाभ बिहार सहित देश में अनेक राज्यों में  होने जा रहे उपचुनावों में भाजपा  को हो जाये लेकिन इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने का उद्देश्य अधूरा रहेगा | बेहतर हो केंद्र सरकार दीपावली के त्यौहारी सीजन के पहले उद्योग व्यापार जगत के लिए भी ऐसी  राहत का ऐलान  करे जिससे कि वे उधार नामक  बैसाखी के बिना अपने पैरों पर खड़े हो सकें |  सरकार को ये बात अच्छी तरह से समझनी चाहिए कि अर्थव्यवस्था तब तक पूरी तरह गतिशील नहीं हो सकेगी जब तक उसे मौजूदा संकट से निकालने के लिए सरकार उदारता नहीं दिखाती | यूँ भी मोदी सरकार पर ये आरोप लगा करता है कि वह उद्योग व्यापार को जितना देती उससे ज्यादा वसूल लेती है | यदि उसका ये नजरिया नहीं बदला तो सकल घरेलू उत्पादन की गिरावट रिजर्व बैंक के अनुमानों से भी ज्यादा हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए |

- रवीन्द्र वाजपेयी