Friday, 30 October 2020

फ्रांस की घटना से उठा सवाल : ऐसे में कौन इन्हें शरण देगा




फ्रांस कोरोना की दूसरी जबर्दस्त लहर से भयाक्रांत है जिस कारण वहां बड़े पैमाने पर तालाबंदी करने की स्थिति आ गई। वहीं दूसरी तरफ इस्लामी आतंकवाद ने उसकी नाक में दम कर रखा है। बीते कुछ ही दिनों में इस्लाम के नाम पर जिस तरह से गला रेतकर हत्याएं की गईं उसके बाद यूरोप का यह शक्तिशाली देश मुसीबत में फंस गया है। हाल ही के कुछ सालों में वहां इस्लामी आतंकवाद का जिस तरह फैलाव हुआ वह पूरे यूरोप के लिए चिंता का विषय है। बीते पांच साल में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा लगभग 250 लोगों का मारा जाना इस बात का प्रमाण है कि इस देश की शांति व्यवस्था को भंग करने की एक सुनियोजित साजिश चल पड़ी है। मध्य एशिया में उत्पन्न संकट के कारण जब लाखों लोग वहां से पलायन कर यूरोप के अनेक देशों में शरण हेतु पहुंचे तब वहां की सरकारों के सामने धर्मसंकट पैदा हो गया। मानवीय दृष्टिकोण के कारण आखिरकार न सिर्फ  फ्रांस बल्कि ब्रिटेन, स्वीडन, और जर्मनी आदि ने भी मध्य एशिया से आये उन शरणार्थियों को अपने यहाँ रहने की जगह दी। कुछ समय तो वे नियन्त्रण में रहे लेकिन धीरे-धीरे इस्लाम की आड़ में हिंसात्मक गतिविधियाँ देखने में आने लगीं। फ्रांस में तो लगातार इस्लामी आतंकवादी हत्याएं करते आ रहे हैं। बीते कुछ दिनों के हालात ये बताते हैं कि मजहब के नाम पर बेरहमी से कत्ल करना आम हो गया है। किसी भी धर्म और उसके महापुरुषों के अपमान का कोई भी समझदार इन्सान समर्थन नहीं करेगा। लेकिन जो भी इस लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन करता है उसे सजा देना कानून का काम होना चाहिए न कि किसी कट्टरपंथी का। फ्रांस की घटनाओं पर मलेशिया और ईरान के शासकों ने जो प्रतिक्रिया दी वह भी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी भी धर्म के प्रवर्तक के बारे में कोई भी आपत्तिजनक अभिव्यक्ति चाहे वह ज़ुबानी , लिखित या चित्र के रूप में ही क्यों न हो , किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती। और फ्रांस तो शिष्टाचार के मामले में एक आदर्श माना जाता है। ईसाई बहुल होने के बावजूद उसने मध्य एशिया से आये शरणार्थियों को मानवीय संवेदनाओं के आधार पर अपने यहाँ शरण दी। लेकिन जिस तरह का व्यवहार शरणार्थियों के एक वर्ग द्वारा किया जा रहा है वह अतिथि धर्म का अपमान है। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले ये भूल जाते हैं कि उनके वहशीपन का बुरा असर दुनिया भर में फैले इस्लाम के अनुयायियों पर होता है। इसके साथ ही शरण देने वाले देशों को भी अपने फैसले पर अफसोस होता है। फ्रांस के अलावा अन्य यूरोपीय देशों में भी इस्लामी आतंक जिस तरह से सामने आता रहा है उसके बाद भविष्य में मध्य एशिया के इस्लामी देशों से पलायन करने वालों को कोई पनाह देने से पहले सौ बार सोचेगा। इस बारे में विचारणीय बात ये भी है कि फ्रांस सहित अनेक यूरोपीय देशों में जनता के एक वर्ग द्वारा सीरिया सहित अन्य मध्य एशियाई देशों से आये शरणार्थियों का जबरदस्त विरोध किया गया था। बावजूद उसके वहां की सरकारों ने मानवीय आधार पर उन्हें अपने यहाँ रहने और बसने की सुविधा दी। लेकिन बजाय शांति के साथ समय काटने के उनमें से आतंकवादी निकलकर यहाँ-वहां खूनी नज़ारे पेश करने लगे। ऐसे लोगों की वजह से ही इस्लाम पूरी दुनिया में संदेह के घेरे में आ गया है। इस बारे में चौंकाने वाली बात ये है कि मध्य एशिया के अलावा भी अन्य इस्लामी देशों से निकलने वाले शरणार्थी गैर इस्लामिक देशों में शरण लेते समय तो दयनीय बने रहते हैं लेकिन एक बार ठिकाना मिलते ही वे हावी होने की कोशिश करने लगते हैं। भारत भी इसका भुक्तभोगी है। बांग्लादेशियों के साथ ही रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी भी एक लाइलाज मर्ज बनकर रह गये हैं। बांग्लादेश अपने ही नागरिकों को लेने के लिए तैयार नहीं है। देखने वाली बात ये भी है कि दुनिया भर में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए बड़ी मात्रा में धन भेजने वाले सऊदी अरब और सम्पन्नता के प्रतीक बन चुके संयुक्त अरब अमीरात ने भी सीरिया आदि से जान बचाकर निकले शरणार्थियों को अपने यहाँ बसाने में कोई रूचि नहीं ली। फ्रांस की ताजा घटनाएँ ये साबित करती हैं कि शरणार्थियों की शक्ल में ऐसे उग्रवादी भी विदेशों में शरण ले लेते हैं जिनका उद्देश्य खून बहाना मात्र है और ऐसे लोगों को इस्लाम का अनुयायी नहीं कहा जा सकता। जिन इस्लामी देशों के शासनाध्य्क्ष इस तरह की हिंसात्मक वारदातों के औचित्य को साबित करने के लिए कुतर्क देते हैं उनसे भी विश्व बिरादरी को सवाल पूछने चाहिए क्योंकि इस तरह की सोच के चलते जो शरणार्थी दुनिया भर में फैले हैं उनके सामने दोबारा विस्थापन का खतरा पैदा हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 October 2020

मतदाताओं के बड़े वर्ग को आकर्षित नहीं कर पा रहे चुनाव




बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में गत दिवस 71 सीटों के लिए लगभग 54 प्रतिशत मतदान हुआ। कोरोना के बावजूद आधे से अधिक मतदाताओं के घर से निकलने पर चुनाव  आयोग  गदगद है। राजनीतिक दल भी कमोबेश संतुष्ट हैं। इस चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंदी एनडीए (भाजपा - जनता दल यू ) तथा महागठबंधन (राजद -   कांग्रेस ) हैं । इनके अतिरिक्त जीतनराम मांझी की हम , उपेन्द्र कुशवाहा की आरएलएसपी , मुकेश साहनी की वीआईपी पार्टी  और  वामपंथी दल  अपनी पसंद के अनुसार उक्त दोनों गठबन्धनों के साथ लड़ रहे हैं। लेकिन दिल्ली में एनडीए का हिस्सा होने पर भी चिराग पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी  अलग मोर्चा खोलकर बैठी है। इसे लेकर चर्चा है कि चिराग के एकला  चलो रवैये के पीछे भाजपा की दूरगामी रणनीति है। नीतीश कुमार के बारे में ये चर्चा आम है कि उनके प्रति मतदाता उदासीन है और इस वजह से जद ( यू ) की विधायक संख्या में काफी कमी आ सकती है। वहीं भाजपा की कोशिश है कि किसी भी कीमत पर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे जिससे भविष्य में वह बड़े भाई की भूमिका में आ सके। लेकिन जबरदस्त  राजनीतिक हलचल के बाद भी बिहार जैसे राजनीतिक तौर पर जागरूक कहे जाने वाले राज्य में मतदान के प्रति इतनी उदासीनता विचारणीय है। वैसे पिछले अनेक विधानसभा और  2019  के लोकसभा चुनाव में भी इतने मतदाता ही मतदान केन्द्रों तक पहुंचे थे। इसका अर्थ यही है कि बिहार में राजनीति की चर्चा तो खूब होती है लेकिन निर्णय लेने के समय मतदाता अपेक्षित  उत्साह नहीं  दिखाते। रही बात कोरोना की तो उसका भय चूँकि बिहार के शहरों और ग्रामीण इलाकों में कहीं दिख ही नहीं रहा इसलिए उस आधार पर मतदान के प्रतिशत को संतोषजनक मान लेना उचित नहीं लगता । बीते अनेक चुनावों से बिहार का मतदान प्रतिशत इसी आंकड़े के आसपास घूमता रहा है। 2015 के  विधानसभा चुनाव में भी राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर थी। लालू और नीतीश बरसों बाद एक साथ आये और बाजी मार ले गए । लेकिन तब भी मतदान का प्रतिशत 50 और 55 फीसदी के बीच ही रहा। उसके बाद लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे चर्चा में रहे । नीतीश वापिस भाजपा के खेमे में आ गये थे जिसकी वजह से एनडीए ने 40 में से 39 सीटें जीतकर अपना परचम लहरा दिया। लेकिन मतदाताओं का उत्साह इक्का - दुक्का सीटों को छोड़कर 54 - 55 फीसदी के इर्द - गिर्द ही सिमटा रहा। चूँकि विधानसभा चुनाव में मतों का बंटवारा विभिन्न पार्टियों के साथ निर्दलीयों में भी होता है इसलिए जिसकी भी सरकार बनेगी वह बमुश्किल 25 - 30 फीसदी मतदाताओं  की पसंद होगी। हालाँकि हमारे  देश की चुनाव प्रणाली में मतदान के प्रतिशत के कम या ज्यादा रहने से कोई फर्क नहीं  पड़ता , लेकिन बिहार में जिस तरह का राजनीतिक माहौल सदैव बना रहता है उसे देखते हुए वहां 75 फीसदी  मतदान तो अपेक्षित है ही। चुनाव आयोग घर - घर मतपर्चियां बांटकर पूरे देश में मतदाताओं को मतदान केंद्र तक जाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता  है। इसके सुखद परिणाम मतदान का प्रतिशत बढ़ने के तौर पर दिखाई भी दिए किन्तु लोकसभा  चुनाव में नागपुर में 52 - 53  फीसदी मतदान हुआ। जबकि नितिन गडकरी जैसे सक्रिय और कर्मठ केन्द्रीय मंत्री वहां मैदान में थे। इसी तरह विधानसभा चुनाव में मुम्बई के मतदाताओं ने जिस तरह की उदासीनता दिखाई वह देश की  आर्थिक राजधानी के लिए शर्मनाक रही। उस दृष्टि से बिहार में गत दिवस तकरीबन 54 फीसदी मतदान को कम माने जाने पर आपत्ति की जा सकती है लेकिन ऐसा लगता है जाति और कुनबे में बंट चुके  मतदाताओं से इतर जो भी तबका है ,  उसे मतदान में कोई रूचि नहीं है। इसका एक कारण राजनीति और राजनेताओं के प्रति बढ़ती वितृष्णा  भी है। बिहार को ही लें तो जितने भी चुनाव पूर्व सर्वे वहां के आये सभी में ये बात सामने आई कि मतदाताओं का 20 से 25 फीसदी वर्ग  कोऊ नृप होय , हमें का हानि , वाली मानसिकता से प्रभावित था। हो सकता है यही वर्ग मतदान के दिन घर बैठा रहा। एनडीए और महागठबंधन दोनों के पास अपना - अपना वोट बैंक है। छोटी पार्टियों के अलावा वोट  कटवा उम्मीदवार भी 5 से 10 फीसदी मत बटोर  ले जाते हैं। लेकिन इनके अलावा मतदाताओं  का एक ऐसा वर्ग है जो राजनीतिक और जातिगत प्रतिबद्धता से पूरी तरह पृथक होने से चुनावी वायदों में अपने लिए कुछ भी नहीं पाता। उसे नीतीश कुमार के 15 साला राज से  निराशा तो है लेकिन वह लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक उत्तराधिकारी तेजस्वी और उनके भाई तेजप्रताप को राज्य की बागडोर देने के प्रति भी अनिच्छुक हैं और तीसरे किसी विकल्प के अभाव में वह उदासीनता ओढ़कर घर बैठा रहा । ये कहानी चुनाव - दर - चुनाव दोहराई जाती है। इसका कारण राजनीतिक दलों का वोटबैंक के इर्द  - गिर्द ही मंडराना है। तेजस्वी ने 10 लाख नौकरियां देने का वायदा किया तो बाकी बातें गौण होकर रह गईं। उनके युवा समर्थक ये कहते सुने जा सकते हैं कि 10 न सही 5 तो देगा। वैसे तो  अन्य वायदे भी हैं लेकिन शपथ लेते ही 10 लाख  नौकरी देने का आदेश जारी करने जैसी बात बेरोजगारों को भले ही लुभा रही हो लेकिन दलीय अथवा जातीय झुकाव से परे मतदाता को  लगता है कि उसका केवल उपयोग होता है और इसी कुंठा के कारण वह लोकतंत्र के इस पर्व से दूरी बनाकर रखता है। बिहार में अभी मतदान के दो चरण और होने वाले हैं। अगर उनमें भी मतदान का आँकड़ा  इतना ही रहा तब ये मानना  गलत न होगा कि करोड़ों - अरबों फूंककर इतना हाईटेक प्रचार होने के बावजूद 45 मतदाता मतदान के प्रति इसलिए  अरुचि दिखाते हैं क्योंकि सत्ता और विपक्ष के पास उनमें उत्साह पैदा करने के लिए कुछ नहीं होता। वैसे ये स्थिति केवल बिहार की हो ऐसा नहीं है। देश के प्रधानमंत्री तक के साथ कुल मतदाताओं के 50 फीसदी से ऊपर का समर्थन नहीं होता। लोकतंत्र बहुमत के आधार पर चलता है लेकिन बहुमत भी जब अल्पमत का प्रतिनिधित्व करता हो तब उसे पूरे समाज की आवाज नहीं कहा जा सकता। हमारे देश में सरकारें चूँकि एक तिहाई मतदाताओं के बलबूते बनाई जा सकती हैं इसलिए शासक वर्ग बाकी को ठेंगे पर रखने का दुस्साहस कर  बैठता है। बिहार सदृश  राजनीतिक जाग्रति वाला राज्य यदि पिछड़ेपन का प्रतीकचिन्ह बनकर रह गया तो उसके लिए जितने वहां के राजनेता उत्तरदायी हैं उतने ही  मतदाता भी , जो चुनाव चर्चा में तो बढ़ - चढ़कर हिस्सा लेते हैं लेकिन मतदान के दिन लम्बी तानकर सो जाते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 28 October 2020

कश्मीर में भू स्वामित्व : काश ये निर्णय पहले हो पाता



वैसे तो नागालैंड और हिमाचल प्रदेश में भी किसी अन्य राज्य का नागरिक जमीन-जायजाद नहीं खरीद सकता लेकिन जम्मू कश्मीर की स्थिति कुछ अलग है। गत दिवस केंद्र सरकार ने वहाँ के भू स्वामित्व अधिनियम में बदलाव करते हुए जो नए प्रावधान किये उनके अनुसार अब वहां मकान, उद्योग, दुकान अदि के लिए भारत का कोई भी नागरिक भूमि खरीद सकेगा। लेकिन अभी भी खेती हेतु जमीनें खरीदने पर रोक रहेगी। गत वर्ष केंद्र शासित राज्य का दर्जा मिलने के बाद से इस राज्य की विशेष स्थिति को बदलने की दिशा में अनेक कदम उठाये जा चुके हैं। लेकिन इस संशोधन से जम्मू कश्मीर और शेष भारत का सम्बन्ध सही मायनों में मजबूत होगा। केंद्र सरकार इस राज्य के विकास के लिए जो ढांचा खड़ा करना चाहती है उसके लिए इस तरह के प्रावधान आवश्यक हैं अन्यथा भूस्वामित्व के बिना कोई भी वहां निवेश करने से हिचकिचायेगा। कोरोना के कारण वैश्विक निवेशक सम्मेलन नहीं हो सका, वरना अब तक वहां विकास के नये प्रकल्प शुरू हो चुके होते। सबसे बड़ी बात ये है कि शासकीय सेवा या किसी और कारण से जि़न्दगी का बड़ा हिस्सा इस राज्य में व्यतीत करने वाले दूसरे राज्यों के हजारों लोग वहां घर बनाकर रहने के अधिकार से वंचित थे। आजादी के बाद पंजाब से वाल्मीकि समाज के हजारों लोगों को इस राज्य में सरकारी नौकरी दी गई। लेकिन आज तक उन्हें न वहां की नागरिकता मिल सकी थी और न ही संपत्ति का अधिकार। गत वर्ष अनुच्छेद 370 और 35 ए हटने के बाद वे इस राज्य के नागरिक बनाए गए और मतदान करने का अधिकार भी उन्हें दिया जा रहा है। इस रोक की वजह से जम्मू कश्मीर में अलगाववाद की भावना को विकसित करने में मदद मिली। यहाँ तक कि इस सीमावर्ती राज्य की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले किसी अन्य राज्य के सैनिक के परिवारजन तक यहां बसने के लिए अपात्र थे। जहाँ तक बात हिमाचल सहित कुछ पूर्वोत्तर राज्यों की है तो वहां के हालात जम्मू-कश्मीर से सर्वथा भिन्न हैं और फिर वहां भूमि की उपलब्धता भी कम है। वैसे भी नागालैंड आदि मुख्यधारा में पूरी तरह से शामिल हो चुके हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के पहले से ही देश विरोधी भावनाओं का बीजारोपण शेख अब्दुल्ला द्वारा कर दिया गया था। दुर्भाग्य से पंडित नेहरु उनके मोहपाश में जकड़े रहे जिसका खामियाजा सात दशक तक देश को भुगतना पड़ा। बहरहाल, गत वर्ष हुए बदलाव के बाद अब जम्मू-कश्मीर को व्यवहारिक रूप से भारत के साथ जोड़ने की प्रक्रिया के अंतर्गत भूस्वामित्व अधिनियम में किया गया ताजा संशोधन एक नए युग का सूत्रपात करेगा। बहुत सारे सेवानिवृत्त फौजी भी इस राज्य में बसना चाहते हैं। केंद्र सरकार को चाहिये उनके लिए विशेष आवासीय व्यवस्था करे क्योंकि उनके वहां रहने से राष्ट्रवादी लोगों को मानसिक संबल मिलेगा। जहाँ तक बात कश्मीरी पंडितों की वापिसी की है तो वह तभी सम्भव हो सकेगी जब दूसरे समुदाय के लोग भी उनके साथ वहां बसाए जाएं। अन्यथा उनकी स्थिति पहले जैसी ही दांतों के बीच में जीभ की तरह होकर रह जायेगी। उस दृष्टि से केंद्र सरकार का संदर्भित निर्णय बहुत ही दूरगामी प्रभाव डालने वाला है और 370 तथा 35 ए हटाने का असली लाभ इसके लागू होने के बाद ही देखने मिलेगा। हालांकि ये काम उतना आसान नहीं है जितना ऊपर से लग रहा है। अलगाववादी ताकतें लोगों को बरगलाने की कोशिशें बंद कर देंगी ये सोचना तो जल्दबाजी होगी। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया इसका संकेत है। कुछ लोगों को ये आशंका भी है कि नये संशोधनों से वहां भूमाफिया और बड़े उद्योगपति जमीन कब्जाने का काम करने लग जायेंगे। लेकिन दूसरा पहलू ये भी है कि इस राज्य का औद्योगिक विकास अब तक इसीलिये रुका रहा क्योंकि भूस्वामित्व के अभाव में देश के बड़े उद्योगपतियों ने यहाँ निवेश में रूचि नहीं ली। दरअसल अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार चाहते भी नहीं थे कि राज्य, विशेष रूप से घाटी में औद्यगिक ढांचा खड़ा हो सके। ले देकर कश्मीर घाटी में पर्यटन ही एकमात्र पालक उद्योग है और वह भी आतंकवाद की वजह से काफी प्रभावित हुआ। इस संशोधन से अब जम्मू अंचल सहित घाटी में विकास का सूर्योदय हो सकेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि वहां का जनसंख्या असन्तुलन भी इसके कारण दूर होगा जो कि रणनीतिक तौर पर बेहद जरूरी है। कुल मिलाकर केंद्र सरकार का ये फैसला बहुप्रतीक्षित और बहुउद्देशीय है। खेती के लिए जमीन खरीदने को इससे मुक्त रखना समझदारी भरा कदम है वहीं स्कूल , अस्पताल आदि के लिए कृषि भूमि के उपयोग परिवर्तन की सुविधा भी स्वागतयोग्य है। कोरोना संकट के बाद यहाँ निवेश की प्रचुर संभावनाएं हैं। भूस्वामित्व अधिनियम में बदलाव इस राज्य को समस्याग्रस्त से सम्भावनायुक्त बनाने में निर्णायक साबित होगा, ये उम्मीद करना बेमानी नहीं है। इसके सफलतापूर्वक लागू होने के बाद हिमाचल और नागालैंड आदि में भी ऐसे ही बदलाव किये जाने का रास्ता खुल जायेगा। काश, ऐसा फैसला यदि पहले किया जा सकता तब कश्मीर में अलगाव और आतंकवाद की जड़ें इतनी गहराई तक नहीं फ़ैल पातीं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 27 October 2020

दीपावली की खरीददारी में स्थानीय छोटे व्यापारी को प्राथमिकता दें




विजयादशमी  सम्पन्न  होते ही भारत में दीपावली का माहौल बनने लगता है। इस साल कोरोना के कारण दुर्गा पूजा के दौरान पहले जैसी  रौनक नहीं रही। बंगाल जहां शारदेय नवरात्रि सबसे बड़ा लोक महोत्सव होता है , वहां भी इस वर्ष एक चौथाई भव्यता  ही रही। इसी तरह उत्तर भारत में इस दौरान होने वाली अधिकतर रामलीलाएं भी  आयोजित नहीं की जा सकी। इस सबका असर बाजार पर भी पड़ा। हालाँकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोरोना संक्रमण बीते एक महीने से लगातार कमजोर होता जा रहा है लेकिन इसके बाद भी उसका भय देवी मंदिरों में भक्तों की कम भीड़ से प्रमाणित हो गया। भले ही कोरोना को लेकर पूर्ववत डर लोगों में नहीं रहा हो और बाजारों सहित सार्वजनिक स्थानों पर खूब चहल पहल भी  दिखाई देने लगी है लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो कोरोना को लेकर व्यक्त की जा रही आशंकाओं के प्रति पूरी तरह से गंभीर भी है और चिन्त्तित भी। उसकी  चिंता हर दृष्टि से वाजिब  भी है क्योंकि कोरोना का चरित्र देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि एक संक्रमित व्यक्ति हजारों को ग्रसित कर सकता है। तमाम चिकित्सा विशेषज्ञ इस बात के प्रति आगाह कर चुके हैं कि आगामी वर्ष फरवरी तक कोरोना का प्रकोप भारत में रहेगा ही रहेगा  और जनवरी तक वैक्सीन आ जाने के बावजूद सभी का टीकाकरण करने में  कम से कम छह महीने लग जायेंगे। ये चेतावनी भी अधिकारिक  तौर पर दी जा रही है कि सर्दियां शुरू होते ही कोरोना के दोबारा फैलाव के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित हो जायेंगी। विशेष तौर पर अस्थमा जैसी बीमारी से ग्रसित बुजुर्ग उसकी चपेट में आ सकते हैं। इसलिये एक महीने से आ रहे  संतोषजनक आंकड़ों को कोरोना की इतिश्री मान लेना मूर्खता होगी। बेहतर यही होगा कि जीवन को पहले जैसा सामान्य बनाने के साथ ही कोरोना से बचाव के समस्त सुझाये  हुए तरीके अपनाते हुए त्यौहार मनाया  जाए जिससे कि हम खुद भी सुरक्षित रहें और दूसरों के लिये भी समस्या पैदा न करें। एक और बात जो इस मौके के लिए जरूरी है वह ये कि ज्यादा से ज्यादा खरीदी स्थानीय व्यापारी से की जाए। रोजमर्रे के काम में आने वाली  वस्तुएं मसलन किराना  वगैरह की खरीदी तो अपने निवास के  निकटतम स्थित छोटे अथवा मध्यम व्यापारी से ही किया जाना समयोचित होगा । आजकल  ऑन लाइन व्यापार तेजी से पैर पसार रहा है। मध्यम , उच्च मध्यम और उच्च वर्ग में इसकी पहुंच काफी गहराई तक जा पहुँची है। बाजार से कम दाम और घर बैठे  आपूर्ति की व्यवस्था  सामान्य उपभोक्ता के नजरिये से   देखने पर तो  फायदे  का सौदा है।  ख्ररीदी हुई वस्तु को लौटाने  की सुविधा ने भी ऑन लाइन व्यापार की प्रगति में उल्लेखनीय योगदान दिया। यद्यपि आधुनिकता के साथ व्यापार के पारम्परिक तौर - तरीके भी बदलने स्वाभाविक  हैं और उपभोक्ता अपने अधिकार और सुविधाओं के प्रति काफी सजग भी हुआ है।  लेकिन ऑन लाइन शॉपिंग को बढ़ावा देने के साथ ही हमें उस छोटे स्थानीय व्यापारी की रोजी - रोटी की चिंता भी करनी चाहिए जो हर परिस्थिति में हमारी छोटी - छोटी जरूरतें पूरी करने के लिए तैयार रहता है। कोरोना क़ाल में लॉक डाउन के दौरान जब सब कुछ बंद हो गया तब गली - मोहल्ले के छोटे - छोटे व्यापारी हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहे। हालाँकि इससे उनकी आजीविका भी जुड़ी हुई थी लेकिन  जान को खतरा भी कम नहीं था। बेहतर होगा उस प्रतिबद्धता के आभार स्वरूप  इस दीपावली पर ज्यादा से ज्यादा  खरीद छोटे व्यापारी से की जाए। ऑन लाइन व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से खरीददारी करने के पहले हमें एक बार छोटे स्थानीय व्यापारी का ध्यान करना  चाहिए जो हमारी सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है। ये दीपावली भारतीय समाज के हर हिस्से के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। लगभग सात महीने के ठहराव के बाद किसी तरह देश पटरी पर लौट रहा है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि अर्थव्यवस्था के मूल आधार के प्रति समाज सम्वेदनशीलता का परिचय दे। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा वोकल फॉर लोकल का जो सूत्र दिया वह केवल स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने तक ही सीमित न रहकर स्थानीय व्यापारी के  लिए भी है । कोरोना रूपी संकट का जिस तरह पूरे समाज ने एकजुट और अनुशासित होकर मुकाबला किया वैसा ही अब अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए भी हो और ऐसा करते समय छोटे कारोबारी का ध्यान उसी तरह  रखा जाना चाहिए जिस तरह मिट्टी से बने  दिये खरीदते समय हम उन्हें बनाने और बेचने वाले की मदद करने के भाव से प्रेरित होते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 October 2020

फिलहाल कश्मीर विधानसभा को भंग रखना ही बेहतर रहेगा



जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने गत दिवस कहा कि जब तक राज्य का पुराना झंडा दोबारा उन्हें नहीं मिलेगा तब तक वे तिरंगा भी नहीं थामेगीं और चुनाव भी नहीं लड़ेंगी। उन्होंने अनुच्छेद 370 की बहाली का मुद्दा भी उठाया। स्मरणीय है जम्मू कश्मीर राज्य का अलग संविधान और झंडा हुआ करता था। गत वर्ष किये गये बदलाव के बाद वह विशेष स्थिति खत्म हो गई और अलग संविधान तथा झंडा इतिहास बन गया। नई व्यवस्था के अनुसार उसे दो केंद्र शासित राज्यों में बाँट दिया गया। जम्मू और कश्मीर जहाँ एक साथ रखे गए वहीं लद्दाख को अलग कर दिया गया। मोदी सरकार के उस दांव से इस राज्य में एक नये युग की शुरुवात हो गई। हालाँकि उसके राजनीतिक परिणाम आना बाकी हैं क्योंकि विधानसभा अब तक भंग है और महबूबा, फारुख अब्दुल्ला, उमर तथा उनके अलावा लगभग सभी अलगाववाद समर्थक नेता बीते सवा साल में अधिकतर समय बंद रखे गये। महबूबा भी हाल ही में रिहा की गईं थी। उसके बाद पीडीपी के अलावा नेशनल कांफ्रेंस औए कुछ छोटे दलों ने मिलकर 370 की वापिसी के लिए संघर्ष का ऐलान किया। महबूबा ने गत दिवस जो कुछ भी कहा वह उसी की शुरुवात लगती है। लेकिन पुराने झंडे की वापिसी तक तिरंगा भी नहीं फहराए जाने की बात से साबित होता है कि वे अपनी बनाई दुनिया से बाहर नहीं निकल पा रहीं। कश्मीर में अलगावावाद की भावना पूरी तरह खत्म हो गई ये कहना सच्चाई को झुठलाना है लेकिन ये सही है कि बीते लगभग 15 महीने में वहां की जनता ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जिससे लगता कि वह नेताओं की नजरबंदी के विरुद्ध हो। इस दौरान दर्जनों आतंकवादी मार गिराए गए लेकिन मुठभेड़ के दौरान उनके बचाव के लिए सुरक्षा बलों पर पथराव करने जैसी घटनाएँ पूरी तरह से रुक गईं। जनाजे में उमड़ने वाला जनसैलाब भी नजर नहीं आया। इसकी वजह ये रही कि केंद्र शासित हो जाने से राज्य की पुलिस और प्रशासन दोनों दिल्ली के नियन्त्रण में आ गये। फारुख , बात तो फांसी पर चढ़ जाने तक की करते हैं लेकिन बीते मार्च में पुत्र सहित रिहा होने के बाद भी 370 की बहाली के लिए किसी बड़े आन्दोलन की जमीन तैयार नहीं कर सके। महबूबा की रिहाई होने पर नेशनल कांफ्रेंस के साथ कुछ दलों की जो बैठक हुई उससे भी कोई ठोस बात सामने नहीं आई। उस बैठक में कांग्रेस की गैर मौजूदगी से ये संकेत मिला था कि वह इन पार्टियों के साथ खड़े होने से बच रही है। इसका प्रमाण गत दिवस कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा महबूबा के तिरंगे संबंधी बयान का विरोध किये जाने से मिला। तिरंगा नहीं थामने के अलावा चुनाव नहीं लड़ने के उनके बयान पर फारुख और उमर की कोई प्रतिक्रिया नहीं आने से ये साबित होता है कि राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियां एकमत नहीं हैं। महबूबा ने पहले भी धमकी दी थी कि 370 हटाने पर घाटी के भीतर तिरंगा उठाने वाला नहीं मिलेगा। दरअसल पीडीपी के अनेक बड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं और महबूबा भाजपा के साथ सरकार चलाकर अपनी धाक गंवा चुकी हैं। इसलिए चुनाव नहीं लड़ने का उनका ऐलान उंगली कटाकर शहीद होने का प्रयास लगता है। लेकिन उनका तिरंगा सम्बन्धी बयान हर दृष्टि से निंदनीय है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने उसकी आलोचना कर प्रशंसा योग्य कार्य किया है। बेहतर हो बाकी पार्टियाँ भी उसके विरोध में खड़ी हों। इस बारे में वामपंथी दलों की भूमिका पर भी सबकी नजर रहेगी। महबूबा की रिहाई के बाद जिन दलों की संयुक्त बैठक में 370 की बहाली के लिए संघर्ष का निर्णय हुआ था उसमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी। ऐसे में उसे ये साफ़  करना चाहिए कि क्या वह महबूबा के बयान से सहमत है? वैसे भी ये पार्टी चीन समर्थक मानी जाती है जो 370 हटाये जाने के विरुद्ध संरासंघ तक में भारत विरोधी मुहिम चला चुका है। कुल मिलाकर महबूबा ने एक ऐसा मुद्दा छेड़ दिया जिसका समर्थन करने में जम्मू कश्मीर की अन्य पार्टियाँ भी दस बार सोचेंगी। राज्य का अलग झन्डा होने की बात तो अब्दुल्ला एन्ड कम्पनी भी करेगी किन्तु चुनाव नहीं लड़ने जैसा फैसला नेशनल कांफ्रेंस शायद ही करे। ये भी कह सकते हैं कि महबूबा ने 370 समर्थक पार्टियों को चुनाव प्रक्रिया से दूर रखने के लिए ये दांव चला हो। बहरहाल इतना तो है कि नेशनल कांफ्रेंस ,  पीडीपी और हुर्रियत के पास अब पहले जैसा जनसमर्थन नहीं रहा। बीते एक साल में जनता को ये लग गया है कि अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार ने सत्ता के लिए सिद्धांतविहीन समझौते करने के साथ ही भ्रष्टाचार से अकूत दौलत कमाई और केंद्र से आया हुआ अरबों-खरबों रुपया खुर्द- बुर्द कर दिया गया। वैसे बेहतर यही होगा कि जम्मू कश्मीर विधानसभा भंग ही रहने दी जाए तथा विकास के कामों में तेजी लाकर जनता को ये एहसास करवाया जाए कि अलगवावाद की बात करने वाले कश्मीर की तरक्की में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। कुछ दिन पहले फारुख ने चीन का समर्थन लेने की बात कही थी और अब महबूबा ने तिरंगे और चुनाव के बहिष्कार का ऐलान करते हुए साबित कर दिया कि उनकी सोच कुत्ते की पूंछ समान है। कश्मीर के आम लोगों विशेष रूप से युवाओं को धीरे-धीरे ये समझाया जाना चाहिए कि 370 हटने से यदि किसी को नुकसान हुआ तो वह अब्दुल्ला और मुफ्ती खानदान के अलावा हुर्रियत के नेताओं का जिन्हें अलगाववाद की भावना बनाये रखने के लिए पाकिस्तान से समर्थन और संसाधन मिला करते थे। रही बात आम जनता की तो बीते एक साल में वह जितने शांतिपूर्ण माहौल में रही वह उसके लिए सुखद अनुभव है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 October 2020

मुफ्त वैक्सीन ही क्यों, मुफ्त चिकित्सा क्यों नहीं



भाजपा ने बिहार चुनाव में कोरोना वैक्सीन मुफ्त में लगाने का वायदा किया तो तमिलनाडु और मप्र भी पीछे-पीछे चल पड़े। पहले गरीबों और फिर सभी को मुफ्त में कोरोना का टीका लगाने का वायदा सुनाई देने लगा। बड़ी बात नहीं जल्द ही चारों तरफ से मुफ्त-मुफ्त की आवाजें सुनाई देने लगें। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए वैक्सीन संबंधी आश्वासन में कहा था कि वह शीघ्र ही उपलब्ध होगी और सरकार उसे लगाने की कार्यप्रणाली प्राथमिकता के आधार पर तय कर रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जनवरी से भारत में कोरोना वैक्सीन उपलब्ध होने लगेगी। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन के अनुसार पूरे देश को वैक्सीन लगने में कम से कम छह महीने लग जायेंगे। सरकारी अनुमान के अनुसार अगर दीपावली के बाद दूसरी लहर नहीं आई तब आगामी वर्ष के फरवरी महीने तक कोरोना भारत से विदा हो जाएगा। और उस स्थिति में वैक्सीन को लेकर व्याप्त उत्सुकता शायद उतनी नहीं रहेगी। बहरहाल भाजपा ने इसे लेकर जो राजनीतिक पैंतरा चला उसका कितना लाभ उसे बिहार चुनाव में होगा ये तो परिणाम ही बताएँगे लेकिन इस बहाने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर बहस की गुंजाइश तो बन ही गई। अर्थात चुनावी आश्वासनों एवं वायदों में अब वैक्सीन नामक एक नई चीज और जुड़ गई। अमेरिका जैसे विकसित देश में तो स्वास्थ्य सेवाएँ चुनावों का मुद्दा बन जाती हैं लेकिन हमारे यहाँ चुनावी वायदे और आश्वासन तात्कालिक लाभ के नजरिये से किये जाते हैं क्योंकि सरकार में आने के बाद उन्हें पूरा करने संबंधी कोई वैधानिक या नैतिक जिम्मेदारी नहीं होती। चुनाव आयोग और यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय तक राजनीतिक दलों द्वारा किये जाने वाले अव्यवहारिक चुनावी वायदों पर टीका-टिप्पणी कर चुके हैं लेकिन उनमें और बढ़ोतरी होती जा रही है। तमिलनाडु में तो टीवी, मिक्सी और यहाँ तक कि मंगलसूत्र जैसे वायदे चुनाव में हो चुके हैं। बिहार में भी अतीत में सायकिल के जवाब में मोटर सायकिल जैसे लालच मतदाताओं को दिए गए। मुफ्त बिजली और कर्ज माफी तो बतौर रामबाण चुनाव में चलाये ही जाते हैं। बेरोजगारों को नौकरी का लॉलीपाप भी चिर-परिचित पहिचान बन गया है। बिहार में तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियाँ देने का दांव चला तो उसका मजाक उड़ाने वाली भाजपा ने उससे दोगुना आंकड़ा परोस दिया। विकास कार्यों के सपने तो जागती आँखों को दिखाए जाने में नेतागण यूँ भी सिद्धहस्त होते हैं। बहरहाल भाजपा द्वारा बिहार में सभी को कोरोना वैक्सीन बतौर मुफ्त उपहार दिए जाने के चुनावी वायदे के साथ ही पूरे देश से ये आवाज उठने लगी कि क्या बाकी राज्यों के लोगों को उसकी जरूरत नहीं है? सवाल है भी वाजिब क्योंकि कोरोना का कहर कुछ को छोड़कर सभी राज्यों पर टूटा । ऐसे में केवल चुनाव वाले राज्य में एक राष्ट्रीय पार्टी द्वारा मुफ्त वैक्सीन का वायदा स्वागतयोग्य होने के बाद भी अटपटा है। यद्यपि भाजपा के पास ये तर्क है कि प्रधानमंत्री ने देश भर के गरीबों को 5 लाख तक के मुफ्त इलाज की सुविधा तो पहले से ही दे रखी है जो उनके व्यापक दृष्टिकोण का परिचायक है । लेकिन बिहार चुनाव में मुफ्त कोरोना वैक्सीन के वायदे से तो ये एहसास निकलकर सामने आया कि अन्यथा वैक्सीन  के लिए लोगों को शुल्क देना पड़ता। अब चूँकि तमिलनाडु और मप्र की सरकार ने भी तत्संबंधी ऐलान कर दिया है इसलिए ये मान लेना गलत न होगा कि बाकी राज्य भी ऐसा ही करने को मजबूर हो जाएंगे और इसमें गलत कुछ भी नहीं है। लेकिन अब समय आ गया है जब चुनाव में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर चर्चा होना चाहिए। कोरोना काल में एक बात खुलकर सामने आ गई कि सरकारी चिकित्सा सेवा इतनी बड़ी आबादी के लिहाज से बहुत ही कम है और जितनी है भी , वह साधनहीनता का शिकार है। यही कारण रहा कि निजी क्षेत्र के चिकित्सा उद्योग को इस दौरान दोनों हाथों से लूटने का अवसर मिल गया और उसका अमानवीय चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया। ये देखने के बाद आपदा में अवसर तलाशने की जो समझाइश श्री मोदी ने दी उस पर सबसे पहले सरकार को ही अमल करते हुए स्वस्थ भारत के नारे को वास्तविकता में बदलने का अभियान शुरू करना चाहिए। आज भी देश की बड़ी आबादी तक प्राथमिक चिकित्सा  सुविधा नहीं पहुँच सकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जो सरकारी चिकित्सा केंद्र हैं उनकी दशा किसी से छिपी नहीं है। इस दिशा में दिल्ली की केजरीवाल सरकार द्वारा शुरू की गई मोहल्ला क्लीनिक नामक व्यवस्था एक आदर्श के रूप में अपनाई जा सकती है लेकिन दिल्ली चूँकि एक महानगर है इसलिए उस जैसा इंतजाम सुदूर इलाकों में शायद संभव न हो सके । लेकिन 21 वीं सदी के भारत में अब स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में एक महत्वाकांक्षी कार्ययोजना शुरू करने का समय आ गया है। बीमारी से लड़ने में असमर्थ देश कभी विकसित की श्रेणी में नहीं आ सकता। इस बारे में उल्लेखनीय बात ये है कि कोरोना वायरस की अधिकांश वैक्सीन भारत में ही बन रही हैं क्योंकि वैक्सीन बनाने में भारत पहले से ही दुनिया का अग्रणी देश है। लेकिन चिकित्सा सुविधाओं के मामले में ये गौरव हासिल करना अभी बाकी है। बिहार चुनाव से मुफ्त वैक्सीन का जो मुद्दा शुरू हुआ वह मुफ्त इलाज के लक्ष्य तक जब तक नहीं पहुंचता तब तक भारत कल्याणकारी राज्य की कल्पना को साकार नहीं कर सकेगा। जिस तरह घर-घर बिजली और पानी पहुंचाना सरकार की प्राथमिकताओं में है ठीक उसी तरह से अब चिकित्सा भी सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश में शिक्षा और चिकित्सा जैसे दो सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र सरकारी उपेक्षा के कारण निजी क्षेत्र के लिए लूट खसोट का साधन बन गये।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 October 2020

बड़े साहबों और सांसद - विधायकों के पद खाली क्यों नहीं रहते



अच्छा हुआ केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ही ये स्वीकार कर लिया कि हमारे देश में प्रति एक लाख पर मात्र 198 पुलिस कर्मी हैं जो वैश्विक अनुपात से बहुत कम हैं। इसी संदर्भ में ये जानकारी भी उजागर हो गयी कि देश भर में पुलिस के कुल स्वीकृत पद तकरीबन 26 लाख हैं जिनमें से 5 लाख से ज्यादा यानि 20 प्रतिशत खाली पड़े हैं। गृह मंत्री ने पुलिस स्मृति दिवस पर इस बात का आश्वासन दिया कि जनसँख्या के अनुपात में पुलिस बल की तैनाती शीघ्र की जायेगी। बढ़ती आबादी और शहरों के बेतरतीब विकास की वजह से नए पुलिस थानों की व्यवस्था तदनुसार नहीं हो सकी जिसका दुष्परिणाम अपराधियों के हौसले बुलंद होने के तौर पर सामने आया है। वैसे श्री शाह ने कोई नई बात नहीं कही। अपर्याप्त पुलिस बल का मुद्दा सदैव उठता रहा है। लेकिन पद स्वीकृत होने के बाद भी भर्ती नहीं किये जाने की संस्कृति के कारण सब कुछ जानते हुए भी सुधार की तरफ ध्यान नहीं दिया जाना अक्षम्य उदासीनता है। लेकिन केवल पुलिस महकमे में ही ये समस्या नहीं है। सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायधीशों के कुल मिलाकर सैकड़ों पद रिक्त पड़े होने से न्याय प्रक्रिया विलंबित होती है। उसके अलावा विवि में आचार्यों के पद बड़ी संख्या में रिक्त हैं। शालेय स्तर पर तो देश भर में लाखों शिक्षकों की भर्ती रुकी हुई है। यही हाल कार्यालयीन कर्मचारियों का है। सेना, रक्षा उत्पादन, रेलवे आदि में भी पदों की स्वीकृति के बावजूद लाखों भर्तियाँ ठन्डे बस्ते में डालकर रख दी गई हैं। लेकिन कुछ पद ऐसे हैं जिनको खाली नहीं रखा जाता। उनमें एक तो भारतीय प्रशासनिक सेवा के विभिन्न क्षेत्र मसलन आईएएस, आईपीएस, आईआरएस और इसी तरह के ऊँचे ओहदे वाले पद हैं। इनकी भर्ती केन्द्रीय लोकसेवा आयोग के माध्यम से प्रतिवर्ष बेनागा होती है तथा परिणाम भी समय पर घोषित कर प्रशिक्षण और नियुक्तियाँ भी तय समय पर की जाती हैं। लेकिन राज्यों के लोकसेवा आयोग इस मामले में फिसड्डी हैं जो आवेदन आने के बाद परीक्षा लेने में दो-तीन साल तक लगा देते हैं। फिर परिणाम और उसके बाद साक्षात्कार की प्रक्रिया भी कछुआ गति से बढ़ती है। इस कारण हजारों युवक-युवतियां दूसरे अवसरों से वंचित हो जाते है और कई तो आयु सीमा पार करने की वजह से सरकारी नौकरी के लिए अपात्र साबित होकर बेरोजगारी का दंश भोगने बाध्य होते हैं। एक और क्षेत्र ऐसा है जिसमें खालीपन नहीं रहता और वह है संसद और विधानसभा के सदस्यों के रिक्त स्थान। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार किसी सांसद या विधायक की मृत्यु या त्यागपत्र की स्थिति में छह महीने के भीतर उपचुनाव करवा लिया जाता है। मप्र में विधानसभा की 28 सीटों के चुनाव कोरोना के कारण उक्त अवधि में नहीं करवाए जा सके लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी अंतत: नवंबर तक उन्हें भर लिया जावेगा। सवाल ये है कि सरकारी पदों के लिए आवेदन भरवाए जाने के बाद चयन प्रक्रिया पूरी होने की कोई निश्चित समय सीमा क्यों नहीं है? और यदि नहीं है तब आईएएस और आईपीएस के पदों को नियमित क्यों भरा जाता है और सांसद-विधायकों के रिक्त पद भरने के लिए कोरोना जैसे संकट तक को नजरंदाज क्यों कर दिया जाता है? श्री शाह ने पुलिस और जनसँख्या का असंतुलन दूर करने की बात तो कह दी लेकिन बतौर गृह मंत्री उन्हें सभी शासकीय पदों के खालीपन को दूर करने की बात करनी चाहिए। उदारीकरण के बाद सरकारी नौकरियों में निरंतर कमी आती जा रही है। अनेक विभागों में संविदा नियुक्ति से काम चलाया जाने लगा है। शिक्षा विभाग में अतिथि शिक्षक नामक नया चलन देखने मिल रहा है। विभिन्न सरकारी उपक्रमों का विनिवेश होने से भी सरकारी नौकरियां घटती जा रही हैं। ऐसे में केवल पुलिस महकमे के खाली पद भरे जाने की बजाय समग्र चिंतन जरूरी है। शासन और प्रशासन में चुस्ती लाने के लिए जरूरी है कि रिक्त पद चाहे न्यायाधीश का हो या भृत्य का उसे भरा जाना चाहिये। इस बारे में किसी भी तरह का भेदभाव या वर्गभेद उचित नहीं है। दुर्भाग्य से अभी भी भारतीय शासन प्रणाली ब्रिटिश राज की मानसिकता से मुक्त नहीं सकी और इसीलिये केवल साहब बहादुरों और नव सामंतों की गद्दी खाली नहीं रखी जाती जबकि बाकी पदों को भरने के प्रति उपेक्षाभाव बना रहता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी