Monday, 9 November 2020

स्वच्छ और स्वस्थ पत्रकारिता ही हमारी प्रतिबद्धता



9 नवम्बर 1989 को मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का पहला अंक आपके हाथ में आया था। महाकोशल में सांध्य दैनिक के रूप में इसके पहले से भी अनेक अखबार थे और कुछ बाद में भी आये। लेकिन तकनीक के विकास और पूंजी के प्रवाह ने समाचार पत्रों को पठनीय कम और दर्शनीय ज्यादा बना दिया तथा प्रतिस्पर्धा में गुणवत्ता की जगह व्यवसायिकता आ गई। परिणामस्वरुप पत्रकारिता में भी चारित्रिक बदलाव बीते कुछ दशकों में अनुभव किया गया। यही वजह है कि आज उस पर जिसे देखो वह उंगली उठा देता है। लेकिन पत्रकार बिरादरी पर छाया अपराधबोध इतना गहरा हो गया है कि आरोपों का प्रतिरोध करने का साहस तक नजर नहीं आता। विश्वसनीयता के जो सवाल समाचार माध्यम उठाकर सत्ता प्रतिष्ठान को घेरते थे उन्हीं का जवाब अब उनसे पूछा जाने लगा है परन्तु दूसरों की टोपी उछालने में विजेता भाव की अनुभूति करने वाले वर्ग के सामने अपनी पगड़ी बचाने की नौबत आ गई है। ऐसा एक दिन या बरस में नहीं हुआ। सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में नैतिक पतन की जो अनवरत प्रक्रिया चल रही है उससे समाचार जगत भी अछूता नहीं रहा। अख़बार जब से उद्योग की शक्ल लेने लगे तब से उनमें होने वाला अनाप-शनाप निवेश अंतत: येन केन प्रकारेण धन बटोरने की हवस का आधार बन गया। और यही वह वजह है जिसने समूचे अख़बार जगत की चाल, चरित्र और चेहरा बदलकर रख दिया। ऐसे में छोटी पूंजी और न्यूनतम संसाधनों के बल पर किसी अखबार का संचालन बड़ा ही कठिन कार्य है। बीते 31 साल के सफर में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ से खुद को दूर रखते हुए पत्रकारिता की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को अक्षुण्ण रखने का प्रयास पूरी ईमानदारी से किया। इसमें हमारी सफलता का आकलन तो पाठकों का विशेषाधिकार है किन्तु हमें ये कहने में लेशमात्र भी संकोच नहीं है कि तीन दशक की संघर्षपूर्ण यात्रा करने के बाद भी मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का रंग - रूप नहीं बदला तो उसकी वजह इसी ईमानदारी में छिपी हुई है। ये कड़वी सच्चाई है कि बाजारवादी युग में समाचार का भी खुलकर व्यापार होने लगा है। पेड और प्रायोजित समाचार अब निर्लज्जता के साथ प्रकाशित होते हैं। इस वजह से समाचारों की स्वतंत्रता और पवित्रता का क्षरण हुआ है। पत्रकार और संपादक भी पैकेज के वशीभूत होकर अपनी विचारशक्ति गंवाते जा रहे हैं। शासकीय नीतियां तथा बाजारवादी शक्तियां समूचे समाचार जगत को अपने इशारे पर नचाने पर आमादा हैं। इस सबके बीच एक मध्यम श्रेणी के अखबार का 31 साल तक निर्बाध प्रकाशन किसी चुनौती से कम न था। लेकिन आज ये कहते हुए हमें आत्मगौरव की अनुभूति हो रही है कि मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने विषम से विषम परिस्थिति में भी अपने पाठकों की अपेक्षाओं का सम्मान रखते हुए उच्चस्तरीय और निर्भीक पत्रकारिता की परंपरा का अनुसरण किया। इसके लिए हमारे असंख्य पाठक श्रेय के हकदार हैं जिन्होंने अपना समझकर इस अखबार पर स्नेह बनाये रखा। इस अवसर पर मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस प्रशंसकों के साथ ही उन जाने-अनजाने आलोचकों के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त करता है जो हमें अपने कर्तव्य का बोध करवाते रहे हैं। यह साल देश के साथ पूरी दुनिया के लिए एक अभूतपूर्व विपत्ति लेकर आया। कोरोना नामक महामारी ने सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया। आर्थिक संकट से समाज का हर वर्ग जूझ रहा है। ऐसे में समाचार पत्रों के सामने भी अस्तित्व का सवाल आ खड़ा हुआ है। विशेष रूप से लघु और मध्यम श्रेणी के अख़बारों के लिए तो कोरोना काल मानो प्राणवायु के अभाव जैसा है। इस वजह से हमें भी अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना इस दौरान करना पड़ा, जो आज भी जारी है। शासकीय नीतियाँ कहने को तो लघु और मध्यम श्रेणी के अख़बारों को सहायता देने की बात करती हैं लेकिन वास्तविकता ये है कि सत्ता में बैठे मठाधीश, चाहे वे किसी भी दल या विचारधारा के हों , इस बारे में घोर पक्षपाती और काफी हद तक स्वार्थी हो चुके हैं। इन परिस्थितियों में भी मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस हिम्मत और हौसले के साथ आगे बढ़ता जा रहा है। पाठकों का स्नेह और विश्वास ही हमारा सम्बल है। 31 वर्ष पूरे होने के इस अवसर पर हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद भी ये यात्रा निरंतर जारी रहेगी। स्वच्छ और स्वस्थ पत्रकारिता की विरासत को संभालकर रखने के प्रति हम सदैव प्रतिबद्ध रहे हैं और ये प्रतिबद्धता हमारे विचार और आचरण में निरन्तर परिलक्षित होती रहेगी, इस आश्वासन के साथ धनतेरस और दीपावली पर अग्रिम शुभकामनाएँ।
-रवीन्द्र वाजपेयी
संपादक


Saturday, 7 November 2020

बाइडन : यदि अनुकूल नहीं तो प्रतिकूल भी नहीं रहेंगे




अब इसमें शक की गुंजाइश नहीं बची है कि जोसेफ  बाइडन ही अमेरिका के अगले राष्ट्रपति होंगे। चुनाव परिणाम को लेकर निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की जा रही नौटंकी से अब उनके पार्टी के ही लोग किनारा करने लगे हैं। अदालत से भी उन्हें राहत अब तक नहीं मिल सकी और आगे भी शायद ही मिले। वैसे भी अमेरिका में चुनाव के बाद नए राष्ट्रपति के पदग्रहण के बीच दो महीने से भी ज्यादा का समय रखा जाता है जिससे कि इस विश्वशक्ति की बागडोर सँभालने से पहले चुना हुआ व्यक्ति अपनी टीम का चयन करने के साथ ही दुनिया भर में फैले अमेरिकी जाल के बारे में समुचित जानकारी प्राप्त कर सके। चूँकि अमेरिका के सामरिक और आर्थिक हित विश्व के हर हिस्से से जुड़े हुए हैं इसलिए वहाँ के राष्ट्रपति का कार्यक्षेत्र और चिंताएं भी बड़ी होती हैं। और इसीलिये इस पद पर विराजमान व्यक्ति के पास व्यापक दृष्टिकोण के साथ ही पर्याप्त अनुभव भी होना चाहिए। ट्रंप ने अपने चार वर्षीय कार्यकाल में जो कुछ भी किया वह फिलहाल तो इतिहास बनने जा रहा है। हालाँकि तमाम चुनाव विश्लेषकों को हैरान करते हुए उन्होंने बाइडन को अच्छी चुनौती दी। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि कोरोना न आता तब उन्हें दूसरा कार्यकाल आसानी से मिल गया होता। इस महामारी से निपटने में उनके तौर-तरीके बेहद बचकाने रहे जिसकी वजह से अमेरिका में बड़ी संख्या में मौतें हुईं और दुनिया के सबसे सम्पन्न देश में आज भी प्रतिदिन हजारों की संख्या में नए कोरोना संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। उस लिहाज से बाईडन के समक्ष सिर मुंड़ाते ही ओले पड़ने वाली स्थिति रहेगी। अमेरिका में बीते चार सालों के भीतर श्वेत  और अश्वेत समुदाय के बीच काफी तेजी से ध्रुवीकरण हुआ। ऐसा न होता तब शायद ट्रंप मुकाबला करने लायक भी नहीं बचते किन्तु चीन के विरुद्ध उनकी नीतियों ने वैश्विक परिदृश्य को काफी प्रभावित किया। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग के साथ मुलाकात उनकी दुस्साहसिक कूटनीति का प्रमाण रही। हालाँकि उसका कोई विशेष परिणाम तो नहीं निकला लेकिन उसके बाद से किम जोंग का धमकी भरा अंदाज जरुर बदला। इसी के साथ ट्रंप ने साउथ चायना समुद्र में चीन के विस्तारवादी रवैये के विरुद्ध ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत के साथ मिलकर जो मोर्चेबंदी की उससे दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आया। वैसे उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल के बीच संधि करवाना। पश्चिम एशिया और पाकिस्तान में आतंकवाद के विरुद्ध ट्रंप प्रशासन के रवैये ने भारत को काफी संबल दिया। संरासंघ में भी ट्रंप के रहते चीन को भारत विरोधी हर कदम में मात खानी पड़ी। उस दृष्टि से पहले बराक ओबामा के आठ और फिर ट्रंप शासन के चार साल भारत के लिए कूटनीतिक दृष्टि से बेहद अनुकूल रहे। हालाँकि व्यापार और वीजा नीतियों को लेकर उनके कड़क रवैये के कारण मतभेद भी उभरे लेकिन आपसी रिश्तों में सकारात्मकता अपेक्षाकृत ज्यादा रही। ओबामा के बाद ट्रंप के साथ भी नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत निकटता ने भारत-अमेरिकी सम्बन्धों को अनौपचारिक स्वरूप प्रदान किया। और इसी का परिणाम था कि बाइडन ने उपराष्ट्रपति प्रत्याशी के तौर पर भारतीय मूल की कमला हैरिस को चुना जिसका लाभ भी उन्हें साफ तौर पर मिलता दिखा वरना इस वर्ग का थोक के भाव ट्रंप के पक्ष में जाना तय था। मोदी-ट्रंप की निकटता के चलते ये कयास लगने लगे हैं कि बाइडन भारत के साथ अपनी खुन्नस निकालेंगे। पाकिस्तानी मूल के साथ ही मुस्लिम मतदाताओं के बड़े हिस्से ने उनको मत देकर इस आशंका को और मजबूत भी किया है परन्तु अमेरिका में बसे भारतीय मूल के लोगों का वहां की राजनीति और व्यवसाय जगत में जिस तरह से महत्व और मौजूदगी बढ़ती जा रही है उसके बाद बाईडन चाहकर भी भारत की उपेक्षा नहीं कर सकेंगे। वैसे भी वहां की संसद में भारतीय मूल के अनेक सदस्य चुनकर पहुंच गये हैं। हालाँकि उपराष्ट्रपति बनने जा रही कमला हैरिस ने अतीत में कुछ बयान ऐसे दिए जिन्हें भारतीय हितों के विरुद्ध कहा जा सकता है लेकिन ध्यान देने वाली बात ये भी है कि बाइडन 2008 से 2016 तक बराक ओबामा के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति रह चुके हैं और उस दौर में भारत-अमेरिका के रिश्ते मधुरता के ऊँचे पायदान तक जा पहुंचे। डेमोक्रेटिक पार्टी वैसे भी भारत के प्रति हमेशा से नरम मानी जाती रही है। ओबामा के पहले बिल क्लिंटन भी भारत के पक्ष में काफी झुके रहे। चूंकि उनको पार्टी की उम्मीदवारी दिलवाने में ओबामा की भूमिका महत्वपूर्ण रही इसलिए ये उम्मीद करना बेमानी नहीं होगा कि जोसफ  बाइडन के कार्यकाल में भारतीय हित सुरक्षित रहेंगे। इस बारे में ये भी उल्लेखनीय है कोरोना के बाद के वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका को चीन से हर मोर्चे पर कड़ी और कठिन चुनौती मिलेगी जिसका सामना करने के लिए उन्हें भारत की जरूरत पड़ेगी क्योंकि चीन के मामले में अमेरिका, पाकिस्तान पर भरोसा नहीं कर सकता। ये सब देखते हुए बाइडन के व्हाईट हाउस में रहते हुए भारत -अमेरिका सम्बन्ध भले ही और मजबूत न हो सकें लेकिन उनमें कड़वाहट आने की आशंका भी फलीभूत नहीं होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 November 2020

नीतीश की घोषणा राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बने



बिहार विधानसभा चुनाव के आखिऱी चरण के चुनाव प्रचार के अंतिम दिवस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ये घोषणा कि ये उनका अंतिम चुनाव है , चर्चा का विषय बन गई। यदि वे चुनाव की शुरुवात में ऐसा कहते तब शायद वह एक स्वाभाविक बयान होता लेकिन दो चरणों के मतदान के बाद अचानक ऐसा बयान देने से उनके विरोधियों को उन पर हमला करने का अच्छा अवसर मिल गया। राजद के तेजस्वी यादव ने बिना देर लगाए कहा कि वे तो शुरू से ये बात बोलते आये हैं कि नीतीश थक गये हैं और बिहार उनसे सम्भल नहीं रहा। उधर एनडीए में रहते हुए भी नीतीश के विरोध में खड़े हुए चिराग पासवान भी मुख्यमंत्री पर तंज कसने से नहीं चूके जबकि कांग्रेस ने तो इसे नीतीश के रिटायरमेंट से जोड़ दिया। हालांकि जनता दल (यू) ने स्पष्टीकरण दिया कि जब तक जनता चाहेगी तब तक वे सेवा करते रहेंगे। लेकिन साधारण बुद्धि वाला भी ये मान रहा है कि नीतीश जैसे अनुभवी राजनेता द्वारा अंतिम दौर के मतदान के दो दिन पहले अपना अंतिम चुनाव जैसी बात करते हुए मतदाताओं की सहानुभूति हासिल करने का दांव चला गया है। उन्होंने तदाशय की घोषणा पहले दो चरणों के प्रचार के दौरान क्यों नहीं की इसका जवाब साधारण तौर पर तो यही है कि तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षण चूँकि उनकी इकतरफा जीत का संकेत दे चुके थे जिससे वे पूरी तरह निश्चिन्त थे। लेकिन चुनाव ज्यों-ज्यों आगे बढ़े त्यों-त्यों ये धारणा बहुत तेजी से विकसित होती गई कि बिहार में सत्ता विरोधी लहर बहुत तेज है और उसका केंद्र एनडीए या नरेंद्र मोदी न होकर नीतीश हैं। नीतीश की छवि एक ईमानदार, स्वच्छ और विकासवादी नेता की रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि जनता की नजरों से अचानक वे उतर कैसे गए? और इसका कारण उनके पिछले पांच वर्ष के कार्यकाल में राज्य के खाते में कोई विशेष उपलब्धि नहीं जुड़ना है। चमकी बुखार , कोरोना, बाढ़ और फिर प्रवासी मजदूरों की वापिसी जैसे मुद्दे नीतीश की छवि पर भारी पड़ गए। इसीलिये जैसे ही तेजस्वी ने 10 लाख सरकारी नौकरियों का वायदा किया त्योंही उनकी सभाओं में भीड़ नजर आने लगी। पहले दो चरणों के मतदान में हालाँकि मतदान प्रतिशत उस लिहाज से नहीं बढ़ा जो आम तौर पर सत्ता परिवर्तन के लिए होता आया है लेकिन ये कहना गलत न होगा कि राजद, कांग्रेस और वामपंथियों का महागठबंधन नीतीश कुमार पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में कामयाब दिख रहा है। बिहार चुनाव का परिणाम क्या होगा ये तो आगामी 10 तारीख को पता चलेगा लेकिन नीतीश ने अंतिम चुनाव की बात कहकर समूची राजनीतिक बिरादरी के लिए एक विचारणीय मुद्दा तो रख ही दिया। इस बारे में उल्लेखनीय है कि संभवत: भाजपा पहली ऐसी पार्टी है जिसने चुनाव लड़ने के लिए अधिकतम आयु सीमा 75 वर्ष तय कर रखी है। नीतीश फिलहाल 69 वर्ष के हैं। लगभग इतनी ही आयु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है। भाजपा के बाहर भी अभी से ये चर्चा होने लगी है कि 2024 में भी यदि श्री मोदी ही सत्ता में लौटते हैं तब क्या वे 75 के होते ही कुर्सी त्याग देंगे और उस सूरत में उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? भारतीय संविधान में चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु तो तय है लेकिन अधिकतम न होने से उम्रदराज राजनेता भी बाकायदा मैदान में उतरते हैं। इस वजह से नया नेतृत्व नहीं पनप पाता। भाजपा ने अपने अनेक ऐसे नेताओं को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जिनका स्वास्थ्य ठीक था लेकिन वे 75 वर्ष के हो चुके थे। और किसी भी दल या नेता ने इस तरह की पेशकश नहीं की। संयोगवश इन्हीं दिनों अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव भी हुआ जिसका परिणाम आजकल में आ जाएगा। यद्यपि वहां चुनाव लड़ने की कोई अधिकतम आयु सीमा नहीं है लेकिन कोई भी व्यक्ति लगातार दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं रह सकता। इस प्रावधान की वजह से बिल क्लिंटन और बराक ओबामा 60 साल से भी कम की उम्र में दो बार राष्ट्रपति रहने के बाद चुनावी राजनीति से बाहर हो गए। हमारे देश में तो 50 साल के नेताजी भी खुद को युवा कहते हैं। उस दृष्टि से नीतीश की घोषणा भले ही चुनावी चाल हो लेकिन उसे सकारात्मक तौर पर लिया जाए तो भारतीय राजनीति में एक बड़ा सुधार हो सकता है। बंगाल में 90 साल के ज्योति बसु को ढोते रहने का खामियाजा वामपंथी दलों को इस हद तक भोगना पड़ा कि वे अपनी दम पर चुनाव लड़ने तक की स्थिति में नहीं बचे। बिहार में चुनाव तो 10 तारीख को संपन्न हो जायेंगे किन्तु नीतीश की घोषणा राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनना चाहिए क्योंकि युवा पीढ़ी अब उन नेताओं को देखते-देखते ऊबने लगी है जिनके पास उसे देने के लिए नया कुछ भी नहीं है। नीतीश कुमार को भले ये बात देर से समझ में आई हो लेकिन देश का मतदाता अब राजनीति की प्रचलित संस्कृति से ऊबकर ऐसी नीतियों और नेतृत्व की जरूरत महसूस करने लगा है जो यथास्थितिवाद से निकलकर उन सपनों को साकार कर दिखाए जो उसे हर चुनाव के पहले दिखाए जाते रहे हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 November 2020

सेवा क्षेत्र के साथ होटल और पर्यटन को सहारा देना समय की मांग



अक्टूबर महीने में जीएसटी का संग्रह 1 लाख करोड़ पार कर जाने के बाद से केंद्र सरकार का हौसला बुलंद है और उसी कारण ये संकेत आया कि तीसरा आर्थिक पैकेज सम्भवत: दीपावली के पहले ही घोषित कर दिया जावेगा। वित्त मंत्रालय के सूत्रों से पता चला है कि ये पैकेज सेवा क्षेत्र के साथ ही होटल और पर्यटन व्यवसाय के लिए होगा। उल्लेखनीय है कोरोना काल में सेवा क्षेत्र के साथ होटल और पर्यटन व्यवसाय को जबरदस्त नुकसान पहुंचा। लॉक डाउन हटाये हुए भी पाँच महीने बीत चुके हैं। उसके बाद उत्पादन में वृद्धि के साथ ही त्यौहारी मांग बढ़ने से उद्योग और व्यापार जगत तो रफ्तार पकड़ने लगा है लेकिन उक्त तीनों क्षेत्रों में अभी तक रौनक नहीं लौटी। ऐसे में सरकार उनके लिए किसी भी तरह की राहत की पहल करती है तो वह सामयिक और सार्थक होगी। सेवा क्षेत्र ने बीते कुछ वर्षों में सराहनीय प्रदर्शन करते हुए अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इसी तरह होटल और पर्यटन व्यवसाय भी लगातार अच्छे परिणाम दे रहा था। मध्यमवर्ग में जिस तरह से पर्यटन के प्रति रुझान बढ़ा उसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में अपार सम्भावनाएँ नजर आने लगी थीं। राजमार्गों के विकास की वजह से सड़क परिवहन भी तेजी से बढ़ता जा रहा था। इस कारण से भी होटल व्यवसाय को सहारा मिलने लगा। मिडवे मोटल, रेस्टारेंट और ढाबे का व्यवसाय भी इसके चलते खूब फलने-फूलने लगा। शहरों के बाहर मैरिज गार्डन के रूप में एक नया उद्योग पूरे देश में पनपा जिसने अनेक सहयोगी व्यवसायों को संबल प्रदान करने के साथ ही रोजगार के अवसर भी उत्पन्न किये। कुछ कम्पनियों ने देश भर में सस्ते होटलों की चेन बनाकर होटल व्यवसाय को जबर्दस्त विस्तार दिया। घरेलू पर्यटन में लगातार वृद्धि पर होने से ट्रेवलिंग एजेंसी का व्यवसाय प्रगति पथ पर था। टैक्सी चालकों को भी इसका फायदा मिलने लगा। इसके अलावा सेवा क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न पेशेवरों का काम लगातार बढ़ता जा रहा था। आर्थिक क्षेत्र के जानकार भी ये मानने लगे थे कि सेवा, होटल और पर्यटन क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद मददगार बनने जा रहे हैं। लेकिन कोरोना के कारण लगाये गये लॉक डाउन ने उक्त व्यवसायों को अकल्पनीय क्षति पहुंचाई। परिवहन सेवा पूरी तरह ठप्प हो गयी। सैर-सपाटा, तीर्थ यात्रा, शादी ब्याह, पार्टियां और जलसों आदि पर विराम लगने से बहुत बड़ा व्यवसाय ठहर गया। होटलों में ताले लटक गए, बार -रेस्टारेंट, जिम, क्लब आदि बंद किये जाने से उनके संचालक आर्थिक संकट में आ गए। हॉलांकि लॉक डाउन शिथिल किये जाने के बाद जनजीवन सामान्य हो चला है और व्यवसाय जगत में भी हलचल दिखाई देने लगी है। वैसे दीपावली इसका बड़ा कारण है। लेकिन सरकार के प्रयास और कोरोना की रफ्तार में कमी के कारण भी उपभोक्ता वर्ग का हौसला फिर से कायम हुआ है किन्तु जिस तरह से पिछले कुछ दिनों में दिल्ली, बंगाल और केरल में कोरोना के नये मामले बढ़े उसके बाद ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि दीपावली के बाद कोरोना की दूसरी लहर आ सकती है और बड़ी बात नहीं वह पहले से ज्यादा व्यापक हो। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि कारोबारी जगत पर इसका बुरा असर पड़े बिना नहीं रहेगा। सेवा क्षेत्र के साथ ही होटल और पर्यटन उद्योग के लिए तो कोरोना का दूसरा हमला दूबरे में दो आसाढ़ जैसा होगा। इसलिए सरकार ने यदि इनके लिए राहत पैकेज लाने का सोचा है तो वह स्वागतयोग्य कदम होगा। चूँकि अभी भी सेवा क्षेत्र काम की कमी से जूझ रहा है तथा होटल और पर्यटन व्यवसाय भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रहे इसलिए उनके लिए सरकार को बिना देर किये कुछ ऐसा करना चाहिये जिससे उनका अस्तित्व कायम रहे। अर्थशास्त्री भी इस बात पर एकमत हैं कि देश में सेवा क्षेत्र के साथ ही होटल और पर्यटन आने वाले समय में अर्थव्यवस्था के मुख्य घटक होंगे। इसलिए इस दुधारू गाय को सही-सलामत रखना राष्ट्रीय आवश्यकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 November 2020

रेल यातायात रोकना जनविरोधी : सख्त कार्रवाई जरुरी



राजस्थान में गुर्जर आरक्षण की मांग कर रहे आन्दोलनकारी रेल की पटरियों पर धरना दिए हुए हैं। महिलाएं भी साथ आ गई हैं। दिल्ली-मुम्बई के बीच चलने वाली दर्जनों यात्री और मालगाड़ियां रद्द करनी पड़ी हैं। दीपावली मनाने अपने घर जाने वाले हजारों यात्री इस वजह से फंस गये हैं। प्रदेश सरकार द्वारा कुछ मांगें मान लिए जाने के बाद एक गुट ने तो आन्दोलन वापिस ले लिया लेकिन गुर्जरों का दूसरा तबका अब भी असंतुष्ट है और वही रेल पटरियों पर जमा हुआ है। राजस्थान की कांग्रेस सरकार के लिए ये आन्दोलन बड़ा सिरदर्द बनता जा रहा है। दूसरी तरफ पंजाब में भी किसान केंद्र के कृषि सुधार कानूनों के विरोध में रेल पटरियां कब्जाए बैठे हैं। पहले तो मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह सहित पूरी कांग्रेस और अकाली दल अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए किसानों को लामबंद करते रहे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी ट्रैक्टर पर बैठकर आन्दोलन का नेतृत्व किया। केंद्र के कानूनों को बेअसर करने के लिए राज्य सरकार ने नये कानून बनाकर किसानों को खुश करने का दाँव चला लेकिन उसके बाद भी वे संतुष्ट नहीं हुए। रेल पटरियां खाली करने भेजे गये मंत्रियों तक को उलटे पाँव लौटा दिया गया। इस तरह ये साफ़ हो गया कि राजस्थान के गुर्जर और पंजाब के किसान आन्दोलन में एकता नहीं है और दोनों राज्यों की सरकारों द्वारा उनके तुष्टीकरण हेतु उठाये गए कदमों का कोई असर नहीं दिख रहा। आंदोलनकारियों की मांगे उचित हैं या अनुचित ये अलग विश्लेषण का विषय है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि रेल पटरियों पर कब्जे द्वारा यात्रियों को मुसीबत में डालकर अपनी मांगें मनवाने का दबाव बनाना कहाँ तक सही है और राज्य सरकारें ऐसे आन्दोलन को रोकने के लिए सख्ती करने से क्यों डरती हैं? राजस्थान और पंजाब दोनों में कांग्रेस की सरकारें हैं। आन्दोलन के पीछे भी इसी पार्टी के नेताओं की भूमिका थी। राजस्थान के हालिया राजनीतिक संकट के परिप्रेक्ष्य में ये भी माना जा रहा है कि गुर्जर आरक्षण आन्दोलन के पीछे सचिन पायलट का हाथ भी हो सकता है। स्मरणीय है श्री पायलट ने जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विरुद्ध बगावत का रास्ता अख्तियार किया तब पड़ोसी राज्यों के गुर्जर समाज ने भी उनके समर्थन में आवाज उठाई थी। श्री गहलोत के मनाने पर गुर्जरों का एक गुट तो ठंडा हो गया लेकिन जिस गुट ने अभी तक रेल पटरियां कब्जा रखी हैं वह श्री पायलट का समर्थक हो सकता है। इसी तरह पंजाब में जब तक किसान केंद्र सरकार के विरुद्ध आन्दोलनरत रहे तब तक तो वे अमरिंदर सरकार की आँखों के तारे बने रहे लेकिन अब वे उनके हाथ से भी निकल गए हैं। ये दो उदाहरण भारत में जनादोलनों के बेपटरी होने का ताजा प्रमाण हैं। लेकिन सरकारों में बैठे लोगों को अब इस बात को समझना चाहिए कि अपने क्षणिक राजनीतिक स्वार्थों के लिए राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचाने वाले क़दमों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। रेल की पटरी पर बैठने वाले कोई भी हों लेकिन वे देश के हितचिन्तक नहीं हो सकते। हमारे देश में सड़कों पर चकाजाम करने वालों के विरूद्ध तो अपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाता है लेकिन रेल यातायात अवरुद्ध करने वालों की मान-मनौवल की जाती है ,  और वह भी सरकार के मंत्री भेजकर। पंजाब के किसानों और राजस्थान के गुर्जरों को अपनी मांगें मनवाने के लिए आंदोलन करने का पूरा अधिकार है । लेकिन इसके लिए वे हजारों रेल यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचने से रोक दें और जरूरी सामान की आवाजाही में बाधा बनें तो वह आन्दोलन नहीं बल्कि अपराध है। और अपराध करने वालों के प्रति नरमी बरतना दूसरों को वैसा ही करने के लिए प्रोत्साहित करता है। पंजाब और राजस्थान दोनों के मुख्यमंत्री बेहद अनुभवी राजनेता हैं। उन्हें देशहित समझाने की कोई जरूरत भी नहीं है। लेकिन अभी तक उन दोनों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे लगता कि वे अपने राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर भी सोचते हैं। दीपावली पर अपने घर लौटने वालों को वैसे भी बहुत दिक्कतें हो रही हैं। कोरोना के कारण अभी तक सभी रेल गाड़ियाँ शुरू नहीं हो सकीं। ऐसे में रेल यातायात को ठप्प कर देना पूरी तरह से जनविरोधी कदम है। इसलिए पंजाब और राजस्थान सरकार को रेल पटरी पर कब्जा किये बैठे आन्दोलनकारियों को तत्काल हटने की चेतावनी देने के बाद भी यदि वे न मानें तब उन्हें गिरफ्तार करने में कोई संकोच नहीं चाहिए। दु:ख की बात है कि गुर्जर आन्दोलन के नेताओं में कुछ पूर्व फौजी अफसर भी हैं। पंजाब में भी किसानों के आन्दोलन में अनेक ऐसे चेहरे आगे- आगे नजर आये जिन्हें सुशिक्षित कहा जा सकता है। बेहतर हो प्रजातंत्र को अराजक होने से बचाने के लिए आन्दोलन के ऐसे तरीके अपनाए जाएं जिनसे दूसरों के हित प्रभावित न हो और देश का नुकसान भी न हो। लोकतंत्र सभी को अपनी आवाज उठाने का अधिकार देता है लेकिन उसके साथ कुछ कर्तव्य भी हैं जिनको भुला देना हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 November 2020

चाहे ट्रम्प जीतें या बिडेन भारत की उपेक्षा नहीं कर पाएंगे



अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव यूँ तो पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाता है लेकिन भारत के लिए इसका विशेष महत्व है। हालाँकि आजादी के कई दशक बाद तक भारत और अमेरिका के सम्बन्धों में खटास बनी रही। प्रजातांत्रिक देश होने के बाद भी अमेरिका से रिश्तों में तनाव का कारण नेहरू युग में भारत का सोवियत संघ के प्रति झुकाव था। यद्यपि भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक रहा किन्तु नेहरु जी निजी तौर पर सोवियत संघ से बहुत प्रभावित थे। उनके सलाहकारों में भी वामपंथी रुझान वाले काफी लोग हुआ करते थे। इंदिरा गांधी के दौर में तो भारत और सोवियत संघ बहुत ही करीब आ गये थे। कश्मीर समस्या पर संरासंघ में अमेरिका और ब्रिटेन के पाकिस्तान समर्थक रुख पर सोवियत संघ ने सदैव भारत के पक्ष में वीटो का उपयोग किया। लेकिन विगत तीन दशक में हालात काफी बदल गये। पीवी नरसिम्हा राव के शासनकाल में जब डा. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधार लागू किये तब अमेरिका के साथ रिश्तों में सुधार होने लगा। बाद में अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा परमाणु परीक्षण किये जाने पर एक बार फिर सम्बन्ध बिगड़े लेकिन बेहतर कूटनीति के परिणामस्वरूप दोबारा उनमें मधुरता आ गई, जो लगातार बढ़ती गयी। वाजपेयी सरकार ने अप्रवासी भारतीयों को कूटनीतिक माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करते हुए अमेरिका के नजरिये को काफी प्रभावित किया। डा. मनमोहन सिंह तो वैसे भी अमेरिका समर्थक माने जाते थे। लेकिन पिछले छह साल में नरेंद्र मोदी ने इस विश्वशक्ति के साथ जिस तरह की आत्मीयता स्थापित की उसने दक्षिण एशिया के कूटनीतिक संतुलन को नया रूप दे दिया। पहले बराक ओबामा और फिर डोनाल्ड ट्रम्प के साथ श्री मोदी ने जिस तरह की अनौपचारिक निकटता बनाई वह काफी कारगर साबित हुई। डेमोक्रेटिक और रिपब्लिक पार्टी दोनों के शासनकाल में अमेरिका का भारत के पक्ष में झुकाव निश्चित तौर पर बड़ी कामयाबी है। लेकिन इसमें अमेरिका में बसे अप्रवासी भारतवंशियों के योगदान को भुलाना उनके प्रति कृतघ्नता होगी। पहले स्व. अटल जी और अब श्री मोदी ने इस माध्यम का जिस चतुराई से उपयोग किया वह जरूर उनके कूटनीतिक कौशल का परिचायक रहा। अप्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या अब अमेरिका की नागरिक है। अनेक परिवारों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी तो अमेरिका में ही जन्मी जिससे उन्हें वहां चुनाव लड़ने का अधिकार प्राप्त हो गया। बॉबी जिंदल वहां सांसद के साथ लुइसियाना राज्य के गवर्नर भी रहे। संसद के दोंनों सदनों में भारतीय मूल के सदस्यों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि अमेरिकी प्रशासन में भारतीयों की उपस्थिति भी पहले की अपेक्षा ज्यादा नजर आने लगी है। ओबामा के बाद ट्रम्प ने भी अपने निजी स्टाफ  में काफी भारतीयों को शामिल किया। वैसे भी ट्रम्प अपने व्यवसाय के सिलसिले में भारत के साथ पहले से जुड़े हुए थे। इसीलिये 2016 में उन्हें जिताने में भारतीय मूल के मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही जिसका प्रतिफल बीते चार सालों में दोनों देशों के आपसी संबंधों में आये अभूतपूर्व सुधार के रूप में देखने भी मिला। विशेष रूप से पाकिस्तान और आतंकवाद के मामले में अमेरिका का रुख काफी बदला जिससे भारत की कूटनीतिक वजनदारी बढ़ी तथा जापान और आस्ट्रेलिया जैसे देश भी भारत के निकट आये जिसकी वजह से चीन पर भी दबाव बढ़ा। यही देखकर ट्रम्प के प्रतिद्वंदी डेमोक्रेट प्रत्याशी जोसफ बिडेन ने अपने उपराष्ट्रपति प्रत्याशी के तौर पर कमला देवी हैरिस को चुना जो भारतीय माँ और अमेरिकन पिता की संतान हैं तथा 2017 से सीनेटर हैं। उनकी वजह से बिडेन का पलड़ा भारी होने का अनुमान चुनाव विश्लेषक लगा रहे हैं। उधर श्री मोदी से अच्छे सम्बन्धों के कारण भारतीय मूल के मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग ट्रम्प के तरफ भी झुका बताया जा रहा है। इनके अलावा अमेरिका में भारतीय मूल के व्यवसायियों की भी बड़ी संख्या है जो व्हाईट हॉउस तक अपनी पहुंच रखते हैं। राष्ट्रपति चुनाव में बड़ा चन्दा देने वालों में भी इन व्यवसायियों की गिनती होती है। इस प्रकार अमेरिका के राष्ट्रीय चुनाव में भारत और भारतीयों का हित चर्चित मुद्दा है। ये कहना गलत न होगा कि भारतीय समुदाय अब एक प्रभावशाली दबाव समूह के तौर पर स्थापित हो चुका है। और इसीलिये भारत विरोधी माने जाने वाले बिडेन ने न सिर्फ कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति प्रत्याशी बनाया, अपितु भारत समर्थक बयान भी देने लगे। निश्चित रूप से ये बदलाव बहुत ही आशाजनक है क्योंकि वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका और कोरोना के बाद के शक्ति संतुलन में अमेरिका के साथ भारत की जुगलबन्दी चीन की नाक में नकेल डालने का जरिया बनेगी , ये विश्वास किया जा सकता है। ट्रम्प और बिडेन में से जो भी जीते वह भारत की उपेक्षा नहीं कर सकेगा ये तय है। विशेष रूप से एशिया में चीन की चौधराहट पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत पड़ेगी। हालाँकि कुछ प्रेक्षक शुरू में ये मानकर चल रहे थे कि बिडेन वामपंथी रुझान के कारण चीन के पक्षधर होंगे लेकिन जिस तरह के संकेत आ रहे हैं उनसे तो लगता है कि उनकी समझ में भी ये बात आ चुकी है कि बतौर राष्ट्रपति वैसा करना शायद उनके लिए आसान नहीं होगा। और इसीलिए जब ट्रम्प ने भारत को गंदा देश बताया तब बिडेन ने उसका विरोध करते हुए कहा था कि मित्र देश के बारे में ऐसी टिप्पणी अवांछनीय है। अमेरिका की राष्ट्रीय राजनीति में भारतवंशियों की महत्वपूर्ण भूमिका निश्चित रूप से उत्साहवर्धक है क्योंकि इससे भारत के विश्वशक्ति बनने के आसार प्रबल प्रतीत होने लगे हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 November 2020

पड़ोसी के घर की आग हमें भी झुलसा सकती है



सऊदी अरब द्वारा जी - 20 सम्मेलन के पहले जारी किये गए एक नक्शे में जम्मू-कश्मीर के गिलगित और बाल्टिस्तान इलाके को पाकिस्तान के कब्जे के बजाय एक स्वतंत्र क्षेत्र बताये जाने पर भारत ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। पाकिस्तान के लिए तो ये एक कूटनीतिक धक्का था ही। लेकिन गत दिवस वहां के प्रधानमन्त्री इमरान खान ने उक्त दोनों क्षेत्रों को पाकिस्तान का अस्थायी प्रान्त घोषित कर दिया। भारत ने तो इसके विरोध में कड़ा बयान देते हुए पाकिस्तान से ये इलाके खाली कर देने को कहा ही किन्तु समाचार माध्यमों से मिल रही जानकारी के अनुसार गिलगित और बाल्टिस्तान की जनता भी पाकिस्तान के आधिपत्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। और इमरान सरकार के विरोध में सड़कों पर उतर आई है। वैसे भी वहां के अंदरूनी हालात बेहद खराब हैं। सिंध में हाल ही में सेना बुलानी पड़ी वहीं बलूचिस्तान पहले से ही आजाद होने के लिए संघर्षरत है। पाक अधिकृत कश्मीर कहने को तो एक स्वायत्त इलाका है लेकिन पाकिस्तान ने वहां कठपुतली सरकार बनवाकर जो दमनचक्र चला रखा है उसकी मुखालफत भी लम्बे समय से चल रही है। इसका अर्थ ये निकालना तो जल्दबाजी होगी कि वे भारत के साथ जुड़ने को तैयार हैं लेकिन इतना जरूर है कि पाकिस्तान के शोषण और ज्यादतियों से त्रस्त होकर उसके कब्जे से आजादी चाह रहे हैं। जबसे इमरान सरकार आई है तबसे पाकिस्तान के भीतरी हालात अनियंत्रित हो चले हैं। इसकी वजह राजनीतिक अनुभव की कमी के साथ-साथ उनका पूरी तरह सेना के नियन्त्रण में होना भी है। उनके दो प्रमुख प्रतिद्वंदी जनरल परवेज मुशर्रफ और नवाज शरीफ भ्रष्टाचार के मुकदमों में फंसकर सत्ता की दौड़ से बाहर कर दिए गए हैं। उनकी गैर मौजूदगी से मुल्क में नए - नये क्षेत्रीय शक्ति समूह पैदा हो गए हैं। हालांकि इमरान खुद पठान समुदाय से ताल्लुकात रखते हैं किन्तु जिस तरह की परिस्थितियां नजर आ रही हैं उनके अनुसार देर सवेर खैबर पखनूस्तान में भी आजादी की दबी हुई चिंगारी फूटना तय है। अनेक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के निर्माण के बाद से ही पंजाब और उर्दू भाषा के दबदबे के विरुद्ध देश के बाकी अंचलों में असंतोष बना हुआ है। जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर और उनके पति आसिफ अली जरदारी के रूप में  भले ही सिंध प्रांत को राजनीतिक नेतृत्व का अवसर मिला लेकिन अधिकतर फौजी जनरल चूंकि पंजाब प्रांत से ही आये इसलिए सरकार पर पंजाब का दबाव कायम रहा। इस वजह से प्रशासनिक और सांस्कृतिक तौर पर भी पंजाब को ही पाकिस्तान की पहिचान के तौर पर मान्यता मिली । जिस वजह से उर्दू सिंधी, बलूची और पश्तो भाषा पर लाद दी गयी। यही स्थिति उसके अवैध कब्जे वाले कश्मीर के साथ ही गिलगित और बाल्टिस्तान की है। जिनका भाषायी और सांस्कृतिक स्वरूप सर्वथा भिन्न है। पाकिस्तान ने आतंकवाद को प्रश्रय देने की जो नीति अपनाई उसके कारण देश में अराजकता और अस्थिरता का माहौल चरमोत्कर्ष पर आ गया है। वैसे तो पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता उसके जन्म के कुछ समय बाद ही शुरू हो चुकी थी जिसके कारण फौज समानांतर सत्ता के रूप में स्थापित होने में कामयाब हो गई। और यही उसकी सबसे बड़ी समस्या है। फौजी जनरलों ने अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए मुल्क को सदैव तनावग्रस्त बनाये रखा और प्रजातान्त्रिक तरीके से चुने गए किसी भी नेता को ताकतवर नहीं बनने दिया। वह फौज ही है जिसने पाकिस्तान में धर्मान्धता को राष्ट्रीय चरित्र बनाने में मदद की। आतंकवाद को पाकिस्तान की पहिचान बनाने में भी उसकी प्रमुख भूमिका रही। जुल्फिकार अली भुट्टो, नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो सभी उच्च शिक्षित और आधुनिक सोच वाले माने जाते थे लेकिन वे सभी फौज पर नियन्त्रण रख पाने में असफल रहे और सत्ता से बेदखल किये जाते रहे। इमरान भी उसी श्रेणी के राजनेता बनकर उभरे जिनसे उम्मीद थी कि वे अपनी आधुनिक सोच और वैश्विक छवि के अनुरूप पाकिस्तान को कट्टरपन और आतंकवाद से मुक्त करवाकर नई दिशा की ओर ले जाते हुए भारत के साथ सम्बन्ध सुधारकर विकास का माहौल बनाएंगे। लेकिन उनके साथ भी ये दुर्भाग्य जुड़ गया कि वे जनरल बाजवा के दबाव में आकर भारत से उलझ गये और आज वे पाकिस्तान के अब तक के सबसे कमजोर शासक के तौर पर बदनाम हो चुके हैं। घरेलू हालात के साथ वैश्विक मंचों पर भी इमरान बुरी तरह शिकस्त खा रहे हैं। अपने देश को आतंकवादी घोषित होने से बचाने की उनकी सभी कोशिशें बेकार साबित होने से अमेरिका सहित अन्य देशों से मिलने वाली मदद भी बंद सी ही है। चीन अकेला उसका संरक्षक है लेकिन संरासंघ में वह भी इमरान की मदद नहीं कर पा रहा। वन बेल्ट वन रोड नामक सड़क का गिलगित-बाल्टिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर के अनेक इलाकों में जबरदस्त विरोध होने से चीन ने इमरान पर दबाव डालकर उनकी स्वायत्तता खत्म करने के लिए बाध्य किया। इन क्षेत्रों में चुनाव कराए जाने का भी भारत विरोध कर रहा था। हालिया फैसलों पर भारत सरकार की बेहद तीखी प्रतिक्रिया के बाद यदि सीमा पर तनाव बढ़ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन इससे बढ़कर बात अब पाकिस्तान के बांग्ला देश जैसे कुछ और हादसों से गुजरने तक पहुंचने की आशंका तक जा पहुंची है। इमरान खान अपने बनाये जाल में जिस तरह फंसते जा रहे हैं उससे देश में गृह युद्ध के आसार बन गये हैं जिसमें सेना खुद सत्ता पर कब्जा कर सकती है। बलूचिस्तान, गिलगित और बाल्टिस्तान से आ रही खबरें भारत के लिए भी चिंता का कारण है क्योंकि बौखलाहट में पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर सीमा पर जंग के हालात पैदा कर सकता है। चीन इन इलाकों में जितना पैसा फंसा चुका है उसके बाद उसका शांत बैठना भी मुश्किल है। ऐसे में भारत को बेहद सतर्क रहना होगा क्योंकि पड़ोसी के घर की आग से अपनी दीवारें भी गर्म तो होती ही हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी