Thursday, 19 November 2020

गेंहू के बाद गौ संवर्धन में भी अग्रणी बन सकता है मप्र




मप्र की शिवराज सरकार ने गौ-कैबिनेट नामक नई योजना पेश करते हुए कहने को तो हिन्दू मतदाताओं को संतुष्ट करने का दांव चला लेकिन यदि उनकी सरकार वाकई गौ-संवर्धन के प्रति ईमानदार है तो उसे उस गौ माफिया का पर्दाफाश करना चाहिए जिसने उनके पिछले शासनकाल में गाय के नाम पर अपना घर भरा। वैसे ये संतोष का विषय है कि गौ पालन अब धर्म की सीमाओं से उठकर अर्थव्यवस्था का विषय बन रहा है। भले ही गाय के औषधीय महत्व का कुछ लोग मजाक उड़ाते रहे हों लेकिन धीरे-धीरे ये बात लोगों की समझ में आती जा रही है कि गाय का दूध, मूत्र और गोबर सभी बहुउपयोगी हैं। देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी में गाय के प्रति असीम श्रद्धा है। मांसाहारी हिन्दू और सिख भी गौमांस से परहेज करते हैं। लेकिन देश में गौवध को रोकने के सरकारी प्रयास अपेक्षित सफलता नहीं पा सके और जिसकी वजह से भारत गौमांस का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया। स्मरणीय है 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने गौमांस के निर्यात का मामला जोरदारी से उठाया था लेकिन बीते छ: वर्ष में केंद्र और भाजपा शासित राज्यों के प्रयासों के बावजूद गौवध पर भले ही कुछ नियन्त्रण लगा हो लेकिन गौपालन और संवर्धन के क्षेत्र में जो प्रयास हुए वे सरकारी कर्मकांड के मकड़जाल में फंसकर रह गये। हालांकि निजी तौर पर अनेक गौ भक्तों के अलावा धार्मिक और समाजसेवी संस्थानों द्वारा बड़ी-बड़ी गौशालाओं का संचालन बड़ी ही कुशलता से किया जा रहा है जिन्हें गौ भक्तों का काफी सहयोग भी मिलता है। लेकिन ये कहना गलत न होगा कि मप्र सरकार द्वारा दिए गए प्रोत्साहन और अनुदान के लालच में जो गौशालाएं खुलीं उनमें गायों का संरक्षण कम उत्पीड़न  अधिक हुआ। अव्वल तो प्रति गाय जो राशि प्रतिदिन के लिए निर्धारित की गयी वह ऊँट के मुंह में जीरे से भी कम थी। ऊपर से जिन लोगों ने गौशालाएं खोलीं उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की ही है जिनका उद्देश्य गौ संवर्धन की बजाय सरकारी अनुदान एवं सुविधाएँ हासिल करना था । यही वजह रही कि बहुतेरी गौशालाएं हद दर्जे की अव्यवस्था का शिकार होकर गौ प्रताड़ना का अड्डा बनकर रह गईं। 2018 के विधानसभा चुनाव में शिवराज सरकार के पतन के बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने धार्मिक और आर्थिक के साथ -साथ गाय के राजनीतिक महत्व को भी समझा और सॉफ्ट हिंदुत्व के प्रति कांग्रेस के झुकाव का संकेत देते हुए गौ पालन के प्रति रचनात्मक फैसले लिए। उनसे ऐसा लगने लगा कि मप्र अब गौ पालन का बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा। लेकिन बीते मार्च में वह सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान ने दोबारा मप्र की कमान संभाली किन्तु उनकी स्थिति सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने जैसी हो गयी। कोरोना के चलते लॉकडाउन लग गया जिससे शासन और प्रशासन दोनों सब काम छोड़कर उसमें उलझे रहे और फिर उसके बाद आ गई उपचुनाव जीतने की चुनौती। बहरहाल बीती दस तारीख को उपचुनावों के नतीजों के साथ शिवराज सरकार पर छाया अनिश्चितता का संकट खत्म हो गया और उसी के बाद मुख्यमंत्री ने गौ कैबिनेट के रूप में गाय के संवर्धन एवं संरक्षण के लिए व्यापक पैमाने पर कदम उठाने की घोषणा कर दी। दो दिन पहले ही उप्र सरकार ने भी गौ वध रोकने के लिए कड़ा कानून बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। ये सब सैद्धांतिक तौर पर तो स्वागतयोग्य है लेकिन सरकारी प्रयासों से गाय की रक्षा और गोवंश में वृद्धि तब तक संभव नहीं होगी जब तक गाय के आर्थिक महत्व को जनमानस में पुनर्स्थापित न किया जाए। भारत दूध का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बाद भी यहाँ प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता बहुत कम है। यहाँ तक कि मरीजों, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों तक को पर्याप्त दूध सुलभ नहीं है। खेती के आधुनिकीकरण और ग्रामीण अंचलों में शहरी संस्कृति के प्रवेश के साथ गौ पालन के प्रति रूचि कम हुई है। वरना एक समय था जब गाय और बैल भारतीय ग्राम और कृषि के साथ अभिन्न रूप से जुड़े हुए थे। वैसे ये अच्छी बात है कि धीरे-धीरे ही सही लेकिन लोग गाय के दूध और उससे बने उत्पादों के महत्व और गुणवत्ता को समझने लगे हैं। ऐसे में यदि शासकीय संरक्षण और सहयोग सही तरीके से मिले तो गाय एक बार फिर भारतीय जनजीवन के करीब आ सकेगी। शिवराज सरकार को गौ शालाओं के नाम पर अतीत में जो भ्रष्टाचार और अनियमिततायें हुईं उनसे सबक लेते हुए जिस तरह से मप्र को गेंहू के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनाया गया, ठीक उसी तरह गौ पालन और गौ संवर्धन में आगे ले जाना चाहिए। लेकिन इस दिशा में बढ़ते हुए ये ध्यान रखा जाना जरूरी है कि गाय की स्थानीय नस्लों को विकसित किया जाए जिनका रखरखाव अपेक्षाकृत आसान और सस्ता होता है और वे स्थानीय भौगोलिक संरचना और जलवायु में खुद को आसानी से ढाल लेती हैं। गाय भारतीय अर्थव्यवस्था का शाश्वत आधार है। जरूरत है सही और ईमानदार कोशिश की। उम्मीद है अपनी नई पारी में शिवराज सिंह चौहान पिछले अनुभवों से सीख लेकर गौ संवर्धन में देश को दिशा देने वाला कार्य कर दिखायेंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी



Wednesday, 18 November 2020

मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता भारतीय समाज में स्वीकार्य नहीं



एक जमाना था जब भारतीय फिल्मों में चुम्बन दृश्य दिखाए जाने की अनुमति नहीं थी। सत्तर के दशक में खोसला आयोग ने इस बारे में अपनी रिपोर्ट में इसकी सिफारिश की जिसे बड़े ही संकोच के साथ स्वीकार किया गया। फिल्मों में अश्लीलता परोसे जाने पर भी सेंसर बोर्ड बहुत ही सख्त हुआ करता था। हालांकि धीरे-धीरे पाश्चात्य समाज की देखा - सीखी भारतीय फिल्मों में भी खुलापन आने लगा। लेकिन फिर भी काफी कुछ लक्ष्मण रेखा बनी रही। दरअसल वह दौर था जब सिनेमा पूरे परिवार के मनोरंजन का साधन था और तब ये बात मायने रखती थी कि आप किशोरवय बेटे-बेटी के साथ कोई फिल्म देख सकते हैं या नहीं? लेकिन बीते तीन दशक में विशेष रूप से टेलीविजन और उसके बाद से मोबाईल के प्रसार ने मनोरंजन की दुनिया को ही बदलकर रख दिया। और फिर इन्टरनेट ने तो मानो क्रांति ही कर दी जिसकी वजह से मनोरंजन के समय और स्वरूप दोनों में आमूल बदलाव हो गया। सिनेमा हॉल से हटकर पहले फिल्म ने टीवी के परदे की जरिये घरों में प्रवेश किया। और फिर केबल टीवी से होते हुआ डिश टीवी और अब डिजिटल माध्यम ने सूचना तंत्र को अकल्पनीय रूप से सुलभ बना दिया। वीसीआर जैसे उपकरण भी बीच में आये और चलते बने। सिनेमा हॉल की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले ली। इसके बाद भी तकनीक की दौड़ रुकने का नाम नहीं ले रही। और एक कदम आगे बढ़कर वह वेब तक जा पहुँची। बीते लगभग 9 महीनों में कोरोना काल ने जब सब कुछ बंद सा कर दिया तब वेब सीरीज के रूप में मनोरंजन की एक नई दुनिया ही बस गई और देखते-देखते उसने मल्टीप्लेक्स को महत्वहीन बनाकर रख दिया। नई फिल्में  अब ओटीटी पर ही प्रदर्शित होने लगी हैं।  धारावाहिक भी वेब सीरीज के हमले से हलाकान होते लग रहे हैं। और इसका कारण है वह बेलगाम खुलापन जिसे भारतीय समाज आज भी अश्लीलता की श्रेणी में रखता है। भद्दी गालियों की भरमार के साथ ही पारिवारिक माहौल से परे इस तरह की सामग्री मनोरंजन के नाम पर पेश की जा रही है जिसे हमारा समाज सार्वजनिक स्वीकृति नहीं देता। सोशल मीडिया की स्वछंदता तो पहले से ही समस्या बनी हुई थी लेकिन अब वेब सीरीज के रूप में मनोरंजन की जो शैली हमारे सामने लाई जा रही है, उस पर उँगलियाँ उठने लगी हैं। सेंसर बोर्ड के नियन्त्रण से बाहर होने से यह माध्यम मनमानी करने के लिए स्वतन्त्र है। पहले तो टीवी और फिल्मों में दूसरे दर्जे के कहे जाने वाले कलाकार वेब सीरीज के जरिये सामने आये क्योंकि उनसे निर्माता और निर्देशक वह सब करवा सकते थे जो फिल्मों और धारावाहिकों के साथ ही सितारा कलाकारों के साथ संभव नहीं होता। लेकिन इस माध्यम की सफलता ने फिल्मी दुनिया के नामचीन निर्माताओं और कलाकारों तक को वेब की दुनिया के प्रति आकर्षित कर लिया है और ये कहा जाने वाला है कि ये भविष्य का सिनेमा है। लेकिन इसके माध्यम से आ रही वर्जनाहीन संस्कृति और अश्लीलता ने सरकार के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय तक के कान खड़े कर दिए हैं। और इसीलिये अब न सिर्फ  फेसबुक, व्हाट्स एप, इन्स्टाग्राम, ट्विटर , यू ट्यूब जैसे आभासी अपितु वेब के नाम से तेजी से उभरे माध्यम की उन्मुक्त उड़ान पर नियन्त्रण का रास्ता खोजने पर जोर दिया जाने लगा है। हालाँकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इन्टरनेट पर विदेशी नियन्त्रण जैसी समस्याओं के संचार और सूचना संबंधी अंतर्राष्ट्रीय समझौते इस काम में बाधक बन सकते हैं लेकिन हर देश इस बारे में अपनी नीति बनाने का अधिकार भी रखता है। चीन ने तो फेसबुक, व्हाटस एप जैसे सोशल मीडिया पर रोक लगाकर अपना नेटवर्क तैयार कर रखा है। हालाँकि भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में ऐसा करना वांछनीय न होगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गूगल जैसे भारतीय सर्च एंजिन के विकास की चर्चा छेड़कर एक संकेत दे दिया है जो इन्टरनेट के भारतीय संस्करण की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। अन्तरिक्ष विज्ञान में उल्लेखनीय सफलताओं के कारण अब स्वदेशी सर्च इंजिन जैसी व्यवस्था की जरूरत महसूस की जाने लगी है। वैसे भी विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए संचार क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जरूरी होगी क्योंकि अब इन्टरनेट भी कमाई का बड़ा जरिया बन चुका है। वेब सीरीज के कारण उठी चर्चाओं के बीच अब इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। अपसंस्कृति के फैलाव को चरमोत्कर्ष तक पहुँचने के पहले ही उसके बारे में नियमन करना जरूरी है। वरना स्थितियां अनियंत्रित हो जायेंगी। सबसे बड़ा खतरा किशोरावस्था के लड़के- लड़कियों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का है जिन्हें मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही सामग्री समय से पहले व्यस्क बना रही है। बढ़ते यौन अपराधों के पीछे एक बड़ा कारण इंटरनेट के जरिये आ रही नग्नता भी है। भारत कितना भी आधुनिक हो जाये लेकिन पश्चिम की वर्जनाहीन मानसिकता को वह स्वीकार नहीं सकता क्योंकि हमारे देश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ज्यादा सामाजिक मर्यादाओं को महत्व दिया जाता है और इसी कारण भारतीय संस्कृति अनगिनत झंझावातों से सुरक्षित निकलकर अपना अस्तित्व कायम रख सकी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 November 2020

गांधी परिवार कांग्रेस की एकता की बजाय टूटन का कारण बन रहा




बिहार चुनाव के बाद सर्वाधिक चिंताजनक स्थिति कांग्रेस की है जो 2015 से ज्यादा सीटें लड़ने के बाद भी मात्र 19 सीटें जीत सकी। और यही वजह रही कि पूरे चुनावी परिदृश्य में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवाने वाला महागठबंधन बहुमत की दहलीज पर आकर रुक गया। चुनाव पूर्व अधिकतर सर्वेक्षण में एनडीए की आसान विजय की संभावना का जमकर मजाक उड़ाया जाता रहा। तेजस्वी यादव द्वारा 10 लाख रोजगार का वायदा किये जाने से उनकी जनसभाओं में युवा मतदाताओं की भीड़ उमड़ने लगी तब चुनाव सर्वेक्षण करने वाले भी अपनी राय बदलने को मजबूर हुए और मतदान के बाद एक्जिट पोल में जिन एजेंसियों ने एनडीए की जीत की भविष्यवाणी की थी वे भी तेजस्वी के तेज का गुणगान करने में जुट गईं। नीतीश कुमार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान तो पहले से ही था लेकिन एग्जिट पोल के बाद तो विश्लेषक प्रवासी मजदूरों के पलायन के समय  मोदी सरकार के कुप्रबंधन को भी एनडीए की हार का बड़ा कारण बताने में जुट गए। वैसे भी बिहार के राजनीतिक माहौल में तेजस्वी के तेज उभार का एहसास होने लगा था। लेकिन जब नतीजे आये तब अच्छे-अच्छे हतप्रभ रह गए। राजद के साथ महागठबंधन में शामिल वामपंथियों ने तो अपनी सदस्य संख्या में कई गुना वृद्धि करते हुए अपनी जमीन को दोबारा हासिल करने का कारनामा कर दिखाया लेकिन कांग्रेस ने तेजस्वी पर दबाव डालकर 70 सीटें तो हासिल कर लीं परन्तु वह पूरे मनोयोग से लड़ने की बजाय महागठबंधन के भरोसे बैठी रही। अगर वह पिछली बार जितनी सीटें भी जीत जाती तो आज तेजस्वी यादव देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री होने का गौरव हासिल कर लेते। एनडीए की जीत के लिए अधिकतर लोग असदुद्दीन ओवैसी को जिम्मेदार मान रहे हैं जिनकी पार्टी जीती तो महज 5 सीटें लेकिन सीमांचल की मुस्लिम बहुल सीटों पर मुस्लिम मतों का बंटवारा करने में वह कामयाब रही जिससे राजद और कांग्रेस को करीब 20 सीटों का नुकसान हो गया और यही नीतीश की वापिसी का मुख्य कारण माना जा रहा है। लेकिन वास्तविकता ये है कि कांग्रेस ने इस चुनाव में जिस तरह की लापरवाही दिखाई उसका खामियाजा महागठबंधन को भुगतना पड़ा। हालाँकि अभी तक तेजस्वी ने तो इस बारे में कुछ नहीं कहा लेकिन राजद के वरिष्ठ नेता शिवानन्द तिवारी ने गत दिवस ये कहकर कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया कि वह गठबंधन पर बोझ बन गई। उन्होंने राहुल गांधी की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि उनसे बड़ी उम्र में भी जहां नरेंद्र मोदी बिहार में पूरा जोर लगा रहे थे वहीं खुद को युवा नेता कहलवाने राहुल गांधी अपनी बहिन प्रियंका वाड्रा के साथ पिकनिक मनाते रहे। उल्लेखनीय है श्री गांधी ने मात्र तीन रैलियां की जबकि श्री मोदी ने उनसे चार गुना ज्यादा में शिरकत की। कांग्रेस पर कमजोर प्रत्याशियों को उतारने का भी आरोप लग रहा है। श्री तिवारी की आलोचना को अप्रत्यक्ष रूप से तेजस्वी द्वारा प्रेरित ही माना जा रहा है जो स्वाभाविक भी है लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने गत दिवस ही कांग्रेस के आला नेतृत्व पर जिस तरह हमला किया वह मायने रखता है। श्री सिब्बल उन नेताओं में से हैं जिन्होंने चिट्ठी लिखकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव करवाने की मांग की थी। अपने ताजा बयान में उन्होंने पार्टी नेतृत्व को आढ़े हाथ लेते हुए कहा कि पराजय पार्टी की नियति बन गई है। बिहार चुनाव के परिणामों पर कोई अधिकृत प्रतिक्रिया नहीं दिए जाने पर भी उनकी नाराजगी झलकी। श्री सिब्बल ने देश भर में हुए उपचुनावों में कांग्रेस के शर्मनाक प्रदर्शन पर चिंता जताते हुए कहा कि गुजरात में शून्य और उप्र में दो के अलावा बाकी की सीटों में जमानत जप्त हो जाना पार्टी की कमजोर स्थिति का प्रमाण है जिस पर फौरन विचार जरूरी है। लगे हाथ उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति में मनोनयन पर भी निशाना साधा। उधर पी चिदम्बरम के बेटे कार्ति चिदम्बरम ने भी पार्टी में मंथन की जरूरत पर बल दिया। बिहार चुनाव के बाद वामपंथी दलों के भीतर भी इस बात पर विचार शुरू हो गया है कि बंगाल विधानसभा के आगामी चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन को जारी रखा जाये या नहीं ? पूरे देश से जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस संगठन की हालत खराब है। ऐसा लगता है राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की मुहिम पार्टी के भीतर विभाजन की स्थिति पैदा कर सकती है। ये बात लगातार प्रमाणित होती जा रही है कि श्री गांधी और प्रियंका नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली उक्ति को चरितार्थ कर रहे हैं। पार्टी के भीतर ये सोचने वालों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है कि जिस गांधी परिवार को कांग्रेस की एकता का आधार माना जाता था वही उसकी टूटन का कारण बन रहा है। सोनिया गांधी अपनी अस्वस्थता के कारण लगातार संगठन संबंधी मामलों से दूर होती जा रही हैं और ऐसे में सारे महत्वपूर्ण फैसले राहुल और प्रियंका मिलकर लेने लगे हैं जो वरिष्ठ नेताओं को हजम नहीं हो रहा। बिहार चुनाव पार्टी के साथ गांधी परिवार के भविष्य के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण था लेकिन राहुल की अपरिपक्वता और लापरवाही ने वह अवसर गँवा दिया। 2021 कांग्रेस के लिए यदि और बुरी खबरें लेकर आये तो आश्चर्य नहीं होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 November 2020

इस संकट से भी भारत और मजबूत होकर निकलेगा :- रवीन्द्र वाजपेयी



दीपावली भारतीय पर्व परंपरा का चरमोत्कर्ष है।  यह धन और धान्य दोनों से जुड़ा हुआ है।  धन संपदा की देवी लक्ष्मी को समर्पित होने से इस त्यौहार पर  उद्योग - व्यापार सम्वन्धी चर्चा भी  होती है।  मुहूर्त की खरीदी से अर्थव्यवस्था का आकलन  किया जाता है।  वैसे भी भारत में अधिकतर  तीज - त्यौहार प्रत्यक्ष या अप्रत्य्क्ष रूप से कृषि से जुड़े होते हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था का आधार भी वही है।  इस वर्ष दीपावली पर अर्थव्यवस्था को लेकर सामान्य से ज्यादा चर्चा हो रही है क्योंकि आर्थिक मंदी के बाद अचानक कोरोना नामक वैश्विक  संक्रमण ने भारत को भी जकड़ लिया जिसकी वजह से समूचा अर्थतंत्र पटरी से उतर गया।  मार्च के अंतिम सप्ताह में लॉक डाउन लागू किये जाने के बाद कारोबारी जगत में ठहराव आ गया ।  उद्योगों में तालाबंदी हो जाने से लाखों की संख्या में कामगार बेरोजगार हो गए।  निर्माण गतिविधियाँ भी रुक गईं।  रेल और सड़क परिवहन बंद किये  जाने के परिणामस्वरूप प्रवासी मजदूरों के हुजूम अपने गाँवों के लिए पैदल , सायकिल , स्कूटर , ऑटो रिक्शा और ट्रक जैसे साधनों से रवाना हुए।  उनकी वापिसी ने एक अभूतपूर्व दृश्य उत्पन्न कर दिया।  बुजुर्ग पीढ़ी को देश के विभाजन के दृश्य याद आ गये।   महीनों तक चली तालाबंदी से एक अदृश्य भय लोगों के मन में समा गया।  समाज का प्रत्येक वर्ग उस स्थिति से प्रभावित हुआ।  अनिश्चितता और असुरक्षा का माहौल समूचे वातावरण में व्याप्त था।  जून में जब लॉक डाउन हटा तब तक ये मान लिया गया था कि भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह गड्ढे में  जा चुकी है और उसको दोबारा खड़ा करने में बहुत लंबा समय लगेगा क्योंकि लॉकडाउन से पहले से ही  आर्थिक मंदी  दस्तक दे चुकी थी।  देश विदेश के तमाम अर्थशास्त्री एवं  रेटिंग एजेंसियां भारत के सकल घरेलू उत्पादन में ऐतिहासिक गिरावट के साथ ही विकास दर शून्य से भी नीचे जाने की आशंका व्यक्त कर रही थीं ।  बेरोजगारी के आंकड़े सर्वकालिक सर्वोच्च स्तर पर जा पहुँचे।  एक अजीब सी उदासी जनमानस में थी।  भले  ही जनजीवन पटरी पर लौटने लगा लेकिन भविष्य की चिंता पूरे देश सवार  थी किन्तु भारत के पुरुषार्थ ने एक बार फिर पूरे विश्व को चमत्कृत कर दिया।  देखते  ही देखते देश में उद्योग - व्यापार जगत ने दोबारा रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी।  अगस्त - सितम्बर में कोरोना भयावह रूप में फैला , लेकिन भारत की जनता और उद्यमी दोनों ने अभूतपूर्व साहस का परिचय देते हुए धैर्य और हिम्मत दोनों बनाये रखा।  उसी का सुपरिणाम है कि आर्थिक क्षेत्र में जबरदस्त सुधार परिलक्षित होने लगा और अब ये उम्मीद की जाने लगी है कि  आगामी वित्त वर्ष में भारत दुनिया में सबसे तेज रफ़्तार से आगे बढ़ने वाला देश होगा।  कोरोना संकट के दौर में ही चीन के साथ सीमा पर हालात बेहद तनावपूर्ण हो चले।  लेकिन भारतीय सेना ने अत्यंत विषम परिस्थितियों के बावजूद चीन को रक्षात्मक होने मजबूर कर दिया।  सौभाग्य से केंद्र  सरकार ने भी सेना को खुला हाथ दिया।  इसकी वजह से हर भारतीय का आत्मविश्वास प्रबल हुआ जिसका प्रमाण दीपावली पर नजर  आ रहा उत्साह है।  यद्यपि अभी भी अर्थव्यवस्था कोरोना द्वारा दिए गये झटके से उबर नहीं सकी किन्तु  नैराश्य का जो भाव कुछ महीने पहले था वह अब नहीं दिखाई देता।  विदेशी निवेश जिस तेजी से आ रहा है और विदेशी मुद्रा का भण्डार लबालब है वह बेहद उत्साहित करने वाला है।  उद्योगपतियों ने इस चुनौती से निपटने के लिए कमर कस ली है और श्रम शक्ति भी पूरे जोश के साथ मोर्चे पर डट गई  है।  हालाँकि ये आशंका भी है कि ज्यों - ज्यों सर्दी बढ़ेगी त्यों - त्यों कोरोना दोबारा कहर ढाएगा।  लेकिन दूसरी तरफ चिकित्सा जगत भी किसी  आपदा से निपटने में दक्षता हासिल कर चुका है और आम जनता का मनोबल भी काफी ऊंचा है।  लेकिन इसी के साथ ये समय बेहद सावधानी से कदम आगे बढ़ाने का है।  कोरोना एक चुनौती के रूप में हमारे सामने आया था।  वह छापामार शैली की बीमारी है जो दबे पाँव हमला करती है।  इसलिए दीपावली के उत्साह के बीच हमें  उससे बचाव के सभी तरीकों का ईमानदारी से पालन करना चाहिए।  अगले महीने  तक वैक्सीन आने की खबरों को सुनकर लापारवाह होना खतरे को दावत देने जैसा होगा।  अनेक विकसित देश  इस गलती की  सजा भोग रहे हैं।  इसलिए ये दीपावली बहुत  ही विशिष्ट है।  एक तरफ ये चुनौतियों पर विजय  के आत्मगौरव  का एहसास करवा रही है वहीं दूसरी तरफ भविष्य के संभावित संकटों की प्रति सतर्क भी कर रही है।  लक्ष्मी जी की पूजा अर्चना में बुद्धि और विवेक के अधिष्ठाता गणेश जी को भी शामिल किया जाता है।  हमें इसके  उद्देश्य को समझकर विवेक का इस्तेमाल करते हुए संकट के इस दौर  से देश को  निकालना है।   अतीत इस बात का गवाह है कि भारत हर संकट से  और मजबूत होकर निकला है और इस आधार पर देश के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद करना पूरी तरह सही होगा।  दीपपर्व आप सभी  के  जीवन में सुख , समृद्धि और शांति लेकर आये यही शुभकामना है।

Friday, 13 November 2020

बिहार की सफलता से बंगाल में भाजपा की उम्मीदें बढ़ीं



एक जमाने में ये उक्ति बहुत प्रचलित थी  कि जो बंगाल आज सोचता है वो हिन्दुस्तान कल सोचेगा | कोलकाता के भद्रलोक से निकला वैचारिक प्रवाह समूचे देश को आकर्षित भी करता था और रोमांचित भी | आजादी के पहले ही इस राज्य में क्रांतिकारी विचारधारा का बीजारोपण हो चुका था जिसका चरमोत्कर्ष नेताजी सुभाषचंद्र बोस के रूप में  देखने मिला | लेकिन ज्ञान - विज्ञान ,कला - साहित्य के साथ ही व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में भी बंगाल एक अग्रणी राज्य होता था | आजादी के बाद से ही साम्यवादी विचारधारा यहाँ की आबोहवा में घुलने लगी | 1962 के  चीनी हमले के बाद जब साम्यवादी पार्टी विभाजित हुई तब बंगाल में चीन समर्थक सीपीएम का वर्चस्व हो गया | आपातकाल के बाद साम्यवादी सरकार बनी जिसका  एक दशक पहले ही  पतन हुआ | ज्योति बसु ने लगभग चार दशक तक मुख्यमंत्री बने रहने का जो कीर्तिमान बनाया वह आज तक अपराजेय बना हुआ है | कांग्रेस इंदिरा  गांधी के ज़माने में वामपंथियों के बेहद करीब आई थी और ज्योति बाबू उनके सलाहकार तक बने | हालाँकि बंगाल में वह मुख्य विपक्ष की  भूमिका में रही | लेकिन कालान्तर में ये धारणा प्रबल होने लगी कि वह सीपीएम की बी टीम है  और इसी मुद्दे पर ममता बैनर्जी ने न सिर्फ कांग्रेस तोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई बल्कि सीपीएम के अभेद्य किले को ध्वस्त कर दिया | भारतीय राजनीति में वामपंथ के लिए वह एक बड़ा धक्का था | ममता चूँकि वामपंथी आतंक से संघर्ष का प्रतीक थीं इसलिए वे   विकल्प के तौर पर उभरीं और लगातार अपनी  स्थिति मजबूत करती चली गईं | लेकिन उनसे एक गलती ये हुई कि वामपंथियों के संरक्षण में पनपे गुंडातत्व धीरे - धीरे तृणमूल में घुस बैठे और वामपंथी दौर का हिंसक  नजारा फिर बंगाल में लौट आया | ममता के अस्थिर स्वभाव के कारण पहले वे एनडीए के साथ रहीं लेकिन बाद में कभी यूपीए तो कभी तीसरे मोर्चे की सूत्रधार बनने की कोशिश करती दिखीं | इसमें दो मत नहीं हो सकते कि बंगाल के मजबूत साम्यवादी  किले को धराशायी करने का जो कारनामा ममता ने कर दिखाया वह वामपंथियों की  असली  वैचारिक विरोधी भाजपा भी नहीं कर सकी | लेकिन कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग पर साम्यवादी कब्जा हटते ही भाजपा  की उम्मीदें परवान चढ़ने लगीं |  और उसके साथ ही  संघ परिवार ने भी  पूर्वोत्तर राज्यों पर ध्यान केन्द्रित किया | 2014  में नरेंद्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद अमित शाह ने जो रणनीति बनाई उसके कारण असम , अरुणाचल , मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों में भाजपा की सत्ता कायम हो सकी | लेकिन सबसे उल्लेखनीय  रहा त्रिपुरा में वामपंथ के एक और मजबूत दुर्ग का ढहना | उस सफलता से उत्साहित भाजपा को बंगाल में भी भगवा लहर की सम्भावना नजर आने लगी जो 2019 के लोकसभा चुनाव में वास्तविकता में बदल गयी जब भाजपा ने  लगभग डेढ़ दर्जन सीटें जीतकर ममता बैनर्जी  को चिंता में डाल दिया | यद्यपि 2016 के विधानसभा  चुनाव में पार्टी को मात्र तीन सीटें ही मिलीं लेकिन बीते एक दशक में भाजपा की जड़ें जिस तरह बंगाल के गाँव - गाँव तक फैलीं उसकी वजह कांग्रेस का वामपंथियों से गठबंधन करना रहा | इससे बंगाली जनता को ये डर लगा कि जिस साम्यवादी सत्ता को उसने उखाड़ फेंका वह कहीं कांग्रेस के कन्धों पर सवार होकर वापिस न लौट आये | उल्लखनीय है अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस और वामपंथी मिलकर लड़ेंगे | इसमें भाजपा को अपने लिए अनुकूल परिस्थितयां दिखाई दे रही हैं और ममता बैनर्जी भी अब उसे अपना मुख्य  प्रतिद्वंदी मानकर चलने लगी  हैं | बीते कुछ समय से भाजपा कार्यकर्ताओं  की लगातार हो  रही हत्याओं के पीछे तृणमूल कांग्रेस के गुंडों का हाथ होने की आशंका बताई जाती  है | प्रधानमंत्री ने दो दिन पूर्व दिल्ली स्थित भाजपा के मुख्यालय में बिहार की जीत के जश्न में ममता को मौत का खेल बंद करने की जो चेतावनी दी वह इस बात को साबित करती है कि भाजपा आगामी चुनाव में बंगाल की लड़ाई को बहुत ही गम्भीरता से लड़ने जा रही है | अमित शाह द्वारा  200 सीटें जीतने का जो दावा किया जा  रहा है वह उसी का हिस्सा है | स्मरणीय है भाजपा ने मप्र के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय और चुनाव संचालन में सिद्धहस्त अरविन्द मेनन को बंगाल में तैनात कर रखा है | उनके अलावा संघ परिवार भी पूरी गम्भीरता से बंगाल में ममता सरकार के विरुद्ध मोर्चेबंदी में जुटा हुआ है | इसका जमीनी असर भी दिखाई दे रहा है | अनेक तृणमूल नेता भाजपा में आ चुके हैं जिनमें ममता के खासमख़ास भी हैं | गत दिवस मंत्रीमंडल  की बैठक में कुछ मंत्रियों की गैरहाजिरी के बाद ये कयास लगाये जा रहे हैं  कि चुनाव के पहले तृणमूल में  भगदड़ मचेगी | अब सवाल ये है कि क्या जैसा भाजपा दावा कर रही है वैसी सफलता उसे मिलेगी ? बंगाल से जो जानकारी छन - छन कर आ रही है उसके मुताबिक भाजपा वहां ममता को चुनौती देने में सक्षम तो हो गई है | बीते वर्षों  में  जितने भी उपचुनाव या स्थानीय निकायों के निर्वाचन हुए उनमें वही तृणमूल कांग्रेस से मुकाबला करती दिखी जबकि कांग्रेस और वामपंथी घुटनों के बल रेंगते नजर आये | सबसे बड़ी बात जो भाजपा को लाभ पहुंचा रही है वह है बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या पर उसका कड़क रवैया और दूसरा मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध मोर्चेबंदी | इन दोनों मुद्दों पर ममता चूँकि पूर्ववर्ती वामपंथी  शासन के साथ ही कांग्रेस के नक़्शे कदम पर चल रही हैं इसलिए जनमानस में ये भाव व्याप्त होने लगा है कि ममता को सत्ता सौंपने से नीतिगत मामलों में यथास्थिति कायम है | इन सब कारणों से बंगाल में भाजपा के प्रयासों को समर्थन मिलने लगा है | यदि भाजपा और संघ परिवार इसे मतों में बदल सका तो फिर त्रिपुरा जैसा चमत्कारिक नतीजा आ सकता है | वैसे तो अभी से चुनाव परिणाम के बारे में पक्के तौर पर कुछ  भी कह पाना जल्दबाजी होगी लेकिन ये कहना  गलत न होगा कि ममता मनोवैज्ञानिक दबाव में आकर खीजने लगी हैं | उनकी समस्या ये है कि वे विपक्षी एकता की धुरी बन नहीं सकीं | यूँ भी तीसरा मोर्चा नाम की परिकल्पना अपनी मौत मर चुकी है | बंगाल में कांग्रेस और साम्यवादियों के साथ होने से ममता के समर्थन से बाकी विपक्षी दल कन्नी काटेंगे | और इसी का लाभ  भाजपा  को मिलना तय है | ममता की सत्ता रहेगी या बचेगी ये तो चुनाव नतीजे बताएँगे लेकिन इतना तय है कि बंगाल में भाजपा का उभार  जिस तेजी से हो रहा है उसे देखते हुए किसी चमत्कार की उम्मीद करना निरर्थक नहीं होगा | बिहार में जीत के बाद भाजपा और नरेंद्र मोदी का ग्राफ निश्चित रूप से ऊँचा हुआ है और उससे भी बड़ी बात है भाजपा के समर्थकों के मनोबल में वृद्धि होना जो चुनाव को काफी हद तक प्रभावित करेगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 12 November 2020

कमलनाथ का पद प्रेम दूसरी बगावत का कारण बन सकता है



मप्र की राजनीति में बीते मार्च महीने में जो तूफान आया था वह दो दिन पूर्व ठंडा पड़ गया । 22 कांग्रेसी विधायकों के सामूहिक स्तीफ़े के कारण कमलनाथ सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान फिर सत्ता में लौट आये। कुछ और विधायकों के स्तीफ़े तथा मृत्यु के परिणामस्वरूप 28 विधानसभा सीटों पर गत 3 नवम्बर को उपचुनाव हुए । कोरोना के कारण  उत्पन्न हालातों में चुनाव निर्धारित अवधि के आगे बढ़ाना पड़े । इस दौरान दलबदल करने वाले कांग्रेस के विधायकों को शिवराज सरकार में मंत्री भी बना दिया गया। बीते लगभग 7 महीने से प्रदेश अनिश्चितता के भंवर में फँसा था। हालांकि भाजपा का संख्याबल देखते हुए ये पक्का था कि वह उपचुनाव में इतनी सीटें तो जीत ही जाएगी जिससे सरकार बची रहे। कुछ निर्दलीय के अलावा सपा - बसपा के विधायकों ने भी भाजपा सरकार को समर्थन देने का निर्णय कर कमलनाथ की उम्मीदों पर नाउम्मीदी की परत चढ़ा दी थी । बावजूद इसके कांग्रेस ने गद्दारों को हराने और जनादेश का  अपमान होने के नाम पर बिकाऊ की जगह टिकाऊ का नारा उछाला और ये दावा किया कि वह सभी 28 स्थान जीतकर सत्ता में वापिसी करेगी । कांग्रेस में बगावत का नेतृत्व करने वाले ग्वालियर राजघराने के ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा पहले ही राज्यसभा में भेजकर उपकृत कर चुकी थी । उनके लिए भी ये उपचुनाव अपना प्रभाव साबित करने का अवसर था। कांग्रेस ने  ग्वालियर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए बहुत जोर लगाया जिससे श्री सिंधिया को नीचा दिखाया जा सके । लेकिन इस प्रयास में सबसे बड़ी बाधा बन गए कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ । पूरे उपचुनाव उन्हीं को केंद्र में रखकर लड़े गए। कांग्रेस के  प्रदेश अध्यक्ष होने के साथ ही वही नेता प्रतिपक्ष भी बने हुए हैं । 2018 का विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में होने से वे मुख़्यमंत्री तो बन गये किन्तु प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़ने की उदारता नहीं दिखाई और यहीं से श्री सिंधिया के साथ उनके और दिग्विजय सिंह के बीच कलह बढ़ी जिसका अंजाम अंततः सरकार गिरने के तौर पर सामने आया । लेकिन मुख़्यमंत्री पद चला जाने के बाद भी उन्होंने अध्यक्ष के साथ ही नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी भी कब्जा ली । उनकी ये पदलिप्सा पार्टी के बाकी नेताओं को भी रास नहीं आई । वैसे तो दिग्विजय सिंह को कमलनाथ का समर्थक माना  जाता है लेकिन पर्दे के पीछे वे भी श्री नाथ के एकाधिकार से रूष्ट थे। ऐसे में जब उपचुनाव रूपी जंग शुरू हुई तो कमलनाथ की तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस बिखरी - बिखरी रही जिसका परिणाम चुनावी हार के रूप में देखने मिला। उस लिहाज से यदि 2018 के चुनाव में जीत का सेहरा उन्होंने अपने सिर पर रख लिया तो इन उपचुनावों में मिली जबरदस्त हार की जिम्मेदारी भी उनको अपने नाम लिखकर उसका प्रायश्चियत करना चाहिए । लेकिन उनकी तरफ से इस आशय का कोई बयान नहीं आना ये साबित करता है कि उनको जितनी बड़ी सोच का नेता प्रचारित किया जाता रहा , वे वैसे हैं नहीं । और इसीलिए शिवराज को बधाई देने गए तो अपने सांसद बेटे को साथ ले गए । लेकिन इस हार के बाद कमलनाथ अब चुनौतीविहीन नहीं रह गए। दीपावली के बाद कांग्रेस में आंतरिक खींचतान मचेगी। यद्यपि फिलहाल ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं है जो श्री सिंधिया की तरह साहस कर सके किन्तु कमलनाथ के नाम की चमक और काम की धमक अब कमजोर पड़ती जाएगी। कांग्रेसजनों को ये भरोसा था कि उनका चुनाव प्रबंधन पार्टी को सत्ता में वापिस ले आएगा लेकिन वे बुरी तरह फुस्स साबित हुए । बेहतर हो वे दोनों पद छोड़कर नये नेतृत्व को अवसर दें। भाजपा ने विष्णुदत्त शर्मा के रूप में युवा चेहरा पेश कर मिसाल पेश कर दी किन्तु कांग्रेस में स्थापित मठाधीश हिलने का नाम तक नहीं लेते। यदि अब भी कमलनाथ ने पद का लालच नहीं छोड़ा तो बड़ी बात नहीं  कांग्रेस में दूसरी बगावत देखने मिले । सिंधिया जी के भविष्य को लेकर संशय प्रगट करने वाले अनेक कांग्रेसी उनके संपर्क में बताए जा रहे हैं । वहीं दिग्विजय सिंह की चिंता केवल बेटे जयवर्धन को लेकर है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 November 2020

मोदी की साख और धाक ने लगाई नीतीश की नैया पार



बिहार विधानसभा चुनाव का अंतिम परिणाम गत मध्यरात्रि के बाद आया |  कुछ सीटों पर मुकाबला काफी नजदीकी था इसलिए अंतिम क्षण तक अनिश्चितता बनी रही | अंततः  भाजपा की अगुआई  वाला एनडीए 125 सीटें लेकर सत्ता में लौट आया |  चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा कही गई बात अंत भला तो सब भला पर  मतदाताओं के फैसले से  मुहर लग गई | लेकिन स्पष्ट बहुमत का ये आंकड़ा भी  उनके लिए खुश होने वाली बात नहीं है | वे निश्चित रूप से मुख्यमंत्री के चेहरे  थे लेकिन चुनाव प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के नाम लिख गया | भाजपा ने जनता दल ( यू ) से काफी ज्यादा सीटें जीतकर  दबाव बनाए रखने की हैसियत हासिल कर ली | उसके अलावा एक संकट आख़िरी क्षणों में एनडीए से जुड़े वीआईपी और हम  नामक दो दलों के भी चार - चार विधायक जीतकर आये हैं | नीतीश  की ताजपोशी में इनकी भूमिका संजीवनी बूटी जैसी होगी | इसलिये ये कड़ी सौदेबाजी करें तो अचरज  नहीं होगा | भाजपा भी सत्ता में बड़ा हिस्सा मांगेगी | वीआईपी और हम यदि समर्थन न दें तो एनडीए का बहुमत नहीं रहेगा | जो 8 अन्य  जीते भी हैं उनमें  दो  निर्दलीय और एक बसपा विधायक है  | उन्हें नीतीश आसानी से खींच सकते हैं | बचे हुए 5 चूँकि असदुद्दीन ओवैसी की  पार्टी के हैं इसलिए  वे भाजपा की संगत वाले नीतीश को शायद ही समर्थन देंगे | ऐसे में भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वायदा तो निभायेगी लेकिन वे सत्ता के केंद्र में रहते हुए भी उतने महत्वपूर्ण और ताकतवर नहीं रहेंगे | सबसे बड़ी बात नई विधानसभा  में विपक्ष की  प्रभावशाली संख्या होगी | राजद के 75 के अलावा कांग्रेस के 19 और वाम दलों  के 16 विधायक मिलाकर सरकार के लिए सदन के भीतर और बाहर  कठिन चुनौती पेश करते रहेंगे | हालाँकि कांग्रेस  के लिए अपने विधायकों को सहेजकर  रखना भी बड़ी समस्या होगी क्योंकि उसके पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी ही जद ( यू ) के कार्यकारी अध्यक्ष हैं | नीतीश कुमार भले ही इस चुनाव में अपनी पहले   जैसी चमक और धमक बरकरार नहीं रख सके लेकिन उनकी राजनीतिक समझबूझ पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए और ये देखते हुए वे कांग्रेस में तोड़फोड़ कर भाजपा तथा बाकी  छोटे - छोटे सहयोगियों के दबाव से मुक्त होने का प्रयास सकते हैं | कांग्रेस के विधायकों में से अनेक अपने सुरक्षित भविष्य की खातिर पाला बदल लें तो किसी को आश्चर्य नहीं  होगा | इस लिहाज से चुनाव के बाद भी बिहार में राजनीतिक रस्साखींच जारी रहेगी | नीतीश भले ही सबसे ज्यादा बार शपथ लेने का कीर्तिमान बना रहे हों लेकिन वे अब मजबूर मुख्यमंत्री  होंगे और जैसा वे खुद कह चुके हैं ये उनका आख़िरी चुनाव था | बिहार की राजनीति में ये चुनाव दो ताकतों के लिए सुखद रहा | पहली भाजपा जो राजद की बराबरी पर आकर खड़ी होने से अब मुख्यधारा में आ गयी और दूसरी  है वाम दल जो लम्बे समय के बाद विधानसभा में दमदारी से बैठेंगे | गत चुनाव में उनकी संख्या महज तीन थी | उल्लेखनीय है एक ज़माने में बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्ष वामदल ही होते थे किन्तु मंडल की राजनीति ने उनको किनारे कर दिया | लेकिन उनका पुनरोदय तेजस्वी यादव के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि अरसे बाद अपने खोई  हुई जमीन मिलने के बाद वामपंथी उसका आकार और बढ़ाने में जुटेंगे जिसका खमियाजा सबसे ज्यादा राजद को ही होगा | वैसे नीतीश भी उसमें सेंध लगाने से बाज नहीं आएंगे | मुख्यमंत्री बनने का सपना अधूरा  रह जाने के बाद तेजस्वी के आभामंडल में भी कमी आयेगी | उनमें जोश तो है लेकिन उनके पिताश्री की छवि उनका पीछा नहीं छोड़ रही | भले ही वे  चुनावी प्रचार में लालू प्रसाद यादव के  चित्र और जिक्र से बचते रहे  लेकिन ज्योंहीं प्रधानमन्त्री ने जंगल राज का उल्लेख किया त्योंही  मतदाताओं को लालू युग की वापिसी का भय सताने लगा जिसने तेजस्वी के हाथ से जीत छीन ली | विपक्ष का नेता बनकर वे कितने  सक्रिय रहते हैं इस पर उनका भविष्य निर्भर करेगा | लेकिन उन्हें पार्टी को परिवार से बाहर निकालकर नेतृत्व में नये चेहरों को शामिल करना होगा | वरना उनकी हालत भी उप्र के अखिलेश यादव जैसी होकर  रह जायेगी | बड़ी बात नहीं लालू की राजनीतिक विरासत पर काबिज होने के लिए तेजस्वी ,  उनकी बेटी मीसा भारती और बड़े पुत्र तेजप्रताप  के बीच ही महाभारत होने लगे |  कुल मिलाकर  बिहार की राजनीति अब मंडल युग से बाहर निकलकर राष्ट्रीय  मुख्यधारा में शामिल हो गई है | लालू युग  ढलान पर  है , रामविलास पासवान रहे नहीं और उनके बेटे चिराग ने अपनी दुर्गति करवा ली | बचे नीतीश कुमार तो ये वाकई उनका आखिरी चुनाव साबित होगा | लेकिन  बिहार की जनता ने भाजपा पर भी बड़ी जिम्मेदारी डाला दी है | नीतीश पूरे चुनाव में दबे - दबे रहे  लेकिन प्रधानमन्त्री की धाक और साख ने उनकी  नैया पार लगा दी | उस दृष्टि से ये  जनादेश भाजपा के कन्धों पर चढ़कर आया है और अगले चुनाव में नीतीश के बजाय वह जवाबदेह होगी जनता की अदालत में | श्री  मोदी ने डबल इंजिन वाली सरकार का जो दांव चला  वह कारगर रहा | इसलिये अब नया बिहार बनाने के लिए भाजपा को मेहनत करनी होगी | जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है तो वह  राष्ट्रीय पार्टी होने की ऐंठ तो खूब दिखाती है लेकिन उसके पास न नीति है न ही नेतृत्व | 2015 में वह कम सीटों पर लड़कर जितनी  जीती उससे ज्यादा सीटों पर लड़ने के बाद भी उसकी संख्या घट गई | बिहार के नतीजों ने बंगाल के आगामी चुनाव में भाजपा की उम्मीदों  को ऊँचा कर दिया है | विपक्षी एकता की  संभावनाएं भी कांग्रेस के लचर  प्रदर्शन के कारण कमजोर हो रही हैं | राहुल गांधी की अधकचरी राजनीति के कारण भी भाजपा को ताकत मिल रही है | कोरोना के बाद हुए बिहार चुनाव् में  प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को जो समर्थन मिला उसके बाद भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण और तेज होगा | बिहार के सीमांचल इलाके में एनडीए को मिली सफलता काफी कुछ कह गई | 

- रवीन्द्र वाजपेयी