Friday, 27 November 2020

कोरोना की दूसरी लहर से गाँव और आदिवासी अंचल को बचाना ज़रूरी




जैसी आशंका थी वैसा ही हो रहा है। बीते कुछ दिनों से कोरोना के नए मामले जिस तरह बढ़ने लगे हैं उसे दूसरी लहर का नाम दिया जा रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में तो तीसरी बार कोरोना ने जोरदार हमला किया है। सुदूर केरल में भी संक्रमण बढ़ोतरी पर है जबकि शुरुवात में कोरोना को नियंत्रित करने के बारे में केरल के मॉडल को देशव्यापी प्रशंसा मिली थी। वैक्सीन आने को लेकर नए-नए दावे तो रोजाना होते हैं। उन्हें बनाने वाली तमाम कम्पनियां अपने उत्पाद को सफल बताने में भी जुटी हुई हैं। लेकिन पक्के  तौर पर उनकी उपलब्धता कब से हो जायेगी ये कह पाना कठिन है। भारत सरकार ने हालाँकि वैक्सीन लगाने के बारे में अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं और जैसा कि सरकारी सूत्र बता रहे हैं उसके अनुसार जनवरी 2021 के बाद से ही व्यापक पैमाने पर कोरोना का टीकाकरण हो सकेगा। देश भर में इस हेतु प्रशासनिक स्तर पर प्राथमिकता तय करने का काम प्रारम्भ होने की जानकारी भी मिल रही है। चिकित्सा कार्य में जुटे लोगों को सबसे पहले और उसके बाद अति बुजुर्ग और वरिष्ठ नागरिकों को वैक्सीन लगाने की योजना है। सभी लोगों तक सरकारी वैक्सीन पहुंचने में तो जैसा केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन कह चुके हैं कम से कम छ: महीने तो लग ही जाएंगे। इसी के साथ ये सम्भावना भी व्यक्त की जा रही है कि विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में बनवाई गईं वैक्सीन इसी साल दिसम्बर से बाजार में विक्रय हेतु उपलब्ध हो जायेगी। ये सब पढ़ और सुनकर हर देशवासी आशान्वित हो चला है। उसकी जो अनुमानित कीमत बताई जा रही है वह भी मध्यम आय वर्गीय व्यक्ति के बस में लगती है। ऐसे में यदि विदेशी कम्पनियों की वैक्सीन जल्दी आ गई तब आर्थिक दृष्टि से सक्षम लोग सरकार के भरोसे न रहते हुए उसका उपयोग कर लेंगे। लेकिन देश में आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों की संख्या बहुत बड़ी होने से सरकारी वैक्सीन का इन्तजार किया जाना स्वाभाविक है। सही बात तो ये है कि इस वर्ग के भीतर भी बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनके लिए कोरोना कोई मुद्दा ही नहीं रहा। मास्क लगाने तक के प्रति वे लापरवाह हैं। सैनेटाईजर जैसी चीज का उपयोग तो उनकी कल्पना से बाहर की बात है। लॉक डाउन लगने के बाद इस वर्ग के सामने पेट भरने की जो समस्या खड़ी हुई वह केंद्र सरकार ने मुफ्त अनाज और जनधन खातों में नगद राशि जमा करवाकर काफी हद तक हल कर दी। इस बारे में ये चौंकाने वाली बात है कि स्वास्थ्य संबंधी मापदंडों के लिहाज से बेहद स्तरहीन परिस्थितियों में रह रहे करोड़ों लोगों पर कोरोना संक्रमण का वैसा असर नहीं हुआ जैसा आशंकित था। इसी तरह आदिवासी अंचलों में भी कोरोना का प्रकोप न के बराबर रहने से वह महामारी नहीं बन सका , वरना हालात अमेरिका से भी बदतर हो सकते थे। चिकित्सा विज्ञान से जुड़े शोधकर्ताओं को इसके कारणों का अध्ययन करना चाहिए। वैसे साधारण तौर पर ये माना जा रहा है कि इस वर्ग के लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने से वे इस संक्रमण से बचे रह सके। लेकिन आगे भी ऐसा होता रहेगा इसे लेकर आश्वस्त हो जाना खतरनाक हो सकता है। दुनिया के अनेक देशों में ये देखने मिल रहा है कि कोरोना ने अपने दूसरे हमले में पहले से अछूते इलाकों को अपनी लपेट में ले लिया जिसकी वजह से अपने को सुरक्षित मानकर चल रहे लोग उसकी गिरफ्त में आ गए। इसलिए भारत के लिए अगले दो महीने विशेष सावधानी के रहेंगे। दीपावली के समय बाजारों में उमड़ी भीड़ देखकर कोरोना की जिस दूसरी लहर का अंदेशा व्यक्त किया गया था उसका आगमन साफ़ तौर पर नजर आने लगा है। विशेष रूप से बड़े शहरों में तो हालात पहले जैसे बनने लगे हैं। अब चूँकि लॉक डाउन हट चुका है और आवाजाही भी बढ़ गई है इस कारण कोरोना संक्रमण के सुदूर ग्रामीण अंचल, विशेष रूप से आदिवासी इलाकों तक पहुँचने का खतरा पहले से कहीं ज्यादा है। इसलिए इस बारे में शासन-प्रशासन को विशेष सावधानी बरतना होगी। दुर्भाग्य से आदिवासी क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की हालत बहुत खराब होने से वहां मलेरिया जैसी बीमारी तक का समुचित इलाज समय पर उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में कोरोना संक्रमण की चिकित्सा तो दूर उसकी समय पर जाँच भी नामुमकिन होगी। इसीलिये कोरोना की दूसरी लहर से ऐसे क्षेत्रों को बचाकर रखना बहुत जरूरी है। केंद्र और राज्य सरकारों को इस दिशा में गंभीरता से ध्यान देना होगा। ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में कोरोना से रोकथाम के उपायों के बारे में लोगों को जागरूक के साथ जिम्मेदार भी बनाया जाना चाहिए क्योंकि इन क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण का पहुँचना इसे महामारी में बदल सकता है। ऐसा न हो कि पूरा ध्यान केवल महानगरों और नगरों पर ही सीमित रहे और कोरोना दबे पाँव हमारे गांवों और आदिवासी क्षेत्रों में तांडव करने लगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 November 2020

किसानों का आन्दोलन केवल पंजाब तक ही सिमटकर रह गया



पंजाब से दिल्ली आ रहे किसानों को हरियाणा सरकार ने रोका तो उन्होंने दिल्ली-चंडीगढ़ राजमार्ग को जाम कर दिया। हरियाणा सरकार ने एहतियातन पंजाब जाने वाली बसें रद्द कर दीं। कुछ रेलगाड़ियाँ भी रद्द किये जाने की खबर है। उल्लेखनीय है कृषि संशोधन कानून के विरुद्ध किसानों ने जो आंदोलन शुरू किया वह कहने को पूरे देश में होने  का दावा किया जा रहा था किन्तु धीरे-धीरे वह मुख्यत: पंजाब में ही सिमटकर रह गया। हालाँकि पश्चिमी उप्र के अलावा राजस्थान में भी कुछ हलचल सुनाई देती है लेकिन पंजाब के किसान कुछ ज्यादा ही नाराज बताये जाते हैं। यहाँ उल्लेखनीय है कि कांग्रेस शासित पंजाब और छत्तीसगढ़  ने संदर्भित  केन्द्रीय कानूनों को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से अपने कानून बनाकर किसानों के तुष्टीकरण का प्रयास किया लेकिन वे उससे भी खुश नहीं हैं। शुरू -शुरू में तो राहुल गांधी भी किसानों की मिजाजपुर्सी करने पंजाब गये लेकिन बिहार चुनाव में मुंह की खाने के बाद कांग्रेस भी अब किसानों के समर्थन का दिखावा ज्यादा  कर रही है। उसे ये बात समझ में आ गई है कि जैसा वह सोचती थी वैसा नहीं हो सका इसलिए इस पचड़े में पड़ने से कोई लाभ नहीं होगा। यद्यपि केंद्र द्वारा पारित कानूनों के विरोध में काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है और कृषि क्षेत्र के अनेक विशेषज्ञ भी इनकी  विसंगतियों की तरफ ध्यान आकृष्ट कर चुके हैं किन्तु दूसरी  तरफ  ये भी सही है कि आन्दोलन कर  रही राजनीतिक पार्टियां और किसानों के हमदर्द बनकर घूमने वाले अन्य लोग केन्द्रीय कानूनों के विरोध में छोटे और मझोले स्तर के किसानों को आंदोलित कर पाने में विफल रहे हैं। इसका कारण ये समझ में आ रहा है कि इन क़ानूनों से प्रभावित होने वाला तबका बड़े किसानों के साथ ही उन दलालों और आढ़तियों  का है जिन्हें कृषि उपज मंडी नामक वर्तमान व्यवस्था से लाभ है। पंजाब में मंडियों पर कुछ राजनीतिक घरानों का नियन्त्रण होने से वे किसानों को मोहरा बना रहे हैं। कांग्रेस को ये चिंता है कि अकाली दल चूँकि इन क़ानूनों के विरोध में मोदी सरकार और एनडीए दोनों से नाता तोड़ चुका  है इसलिए वह अकेला किसानों की सहानुभूति और समर्थन न बटोर ले जाए। यही वजह है कि अमरिंदर सिंह सरकार द्वारा बनाये जवाबी कानूनों से किसानों  के  संतुष्ट न होने के बावजूद कांग्रेस  आन्दोलन को हवा दे रही है जिससे उनकी नाराजगी का ठीकरा केंद्र  सरकार और भाजपा के सिर पर ही फूटे। बहरहाल एक बात साफ़ हो गई है कि केन्द्रीय कानूनों के विरोध में देशव्यापी किसान आन्दोलन खड़ा करने में कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। वैसे इस बारे में किसानों के  सबसे पुराने हमदर्द वामपंथियों की गैर मौजूदगी भी विचारणीय है। किसानों के नाम पर राजनीतिक दलों के अपने संगठन तो हैं ही लेकिन उनके अलावा जो अन्य संगठन हैं उनके पास भी सक्षम नेतृत्व का चूँकि अभाव है इसलिये आन्दोलन को व्यापक रूप अब तक नहीं मिल सका। इस बारे में ये भी उल्लेखनीय है कि किसानों के बीच फैलाया जा रहा ये डर भी बेअसर साबित हो रहा है कि अनाज की सरकारी खरीद बंद की जा रही है। खरीफ फसल आने के बाद विभिन्न राज्यों में सरकारी खरीद का काम शुरू हो चुका है। ऐसा लगता है किसानों के बीच नेतृत्वशून्यता की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। इसीलिए वे अपने आन्दोलन को पंजाब से बाहर नहीं ले जा पा रहे। हरियाणा की तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री ने भी ऐलान कर दिया है कि पंजाब के  किसान यदि दिल्ली में घुसेंगे तो उनके विरूद्ध कोरोना रोकने के तहत दंडात्मक कार्र्वाई  की जाएगी। अरविन्द केजरीवाल का ये आदेश वैसे भी समयोचित है जिसे किसानों को आंदोलित करने वाले नेताओं और दलों को समझना चाहिए। दिल्ली सहित उत्तर भारत के अनेक इलाकों में कोरोना की दूसरी लहर आने से संक्रमितों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। एक तरफ  जहां अधिकतम 50 लोगों की उपास्थिति में विवाह करने की अनुमति दी जा रही हो तब हजारों की भीड़ को जमा करना किसानों की जान  खतरे में डालने जैसा है। केंन्द्र सरकार ने किसानों के  साथ बातचीत की पेशकश की थी लेकिन ऐसा लगता है विघ्नसंतोषी ये नहीं चाहते कि कोई समाधान निकले। वैसे भी इस प्रकार के आंदोलनों को लंबा खींचना संभव नहीं होता। किसानों के बीच भी नये कानूनों के विरोध में एक राय नजर नहीं आती। खरीफ फसल के बाद लघु और मध्यम किसान अगली फसल की तैयारी में जुट चुके हैं। जहां  तक विपक्ष का सवाल है तो फिलहाल कोई चुनाव भी सामने नहीं है  इसलिए वह भी व्यर्थ में पसीना बहाने से बच रहा है। यूं भी राजनीतिक दलों के पास कहने को तो ग्रामीण परिवेश से आये सैकड़ों विधायक और सांसद हैं लेकिन सच्चाई ये है कि उनकी प्रतिबद्धता किसान और कृषि की बजाय विकास के उन कामों में ज्यादा होती है जिनसे उनका हित सधता रहे। ये सब देखते हुए पंजाब के किसानों को अपने आंदोलन के तौर-तरीके पर विचार करते हुए संयम से काम लेना चाहिए। ऐसा न हो राजनीतिक दलों के फेर में फंसकर वे न इधर के रहें न उधर के। वैसे भी ये धारणा  सर्वत्र बढ़ती जा रही है कि केन्द्रीय कानूनों का विरोध केवल पंजाब तक ही सीमित रह गया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 25 November 2020

कश्मीर : देर से ही सही सच्चाई सामने आनी चाहिये



कश्मीर को भारत का मुकुट कहा जाता है लेकिन 1947 के बाद से ये पैर में कांटे की तरह से फंसा हुआ है। गत वर्ष केंद्र  सरकार ने  जम्मू - कश्मीर नामक इस राज्य का  विशेष दर्जा समाप्त करते हुए लद्दाख को उससे अलग कर दिया और   केंद्र शासित बनाकर उसकी  हैसियत घटा दी । इससे वहां के स्थापित राजनीतिक छत्रप  भन्नाए हुए हैं क्योंकि  बीते सात दशक में हुए भ्रष्टाचार और देश विरोधी करतूतें एक के बाद एक सामने आ रही हैं । जिस तरह देश में कांग्रेस और नेहरू - गांधी परिवार ने दशकों तक एक छत्र राज किया ठीक वही स्थिति जम्मू - कश्मीर में  नेशनल कांफ्रेंस और उसके संस्थापक शेख अब्दुल्ला की रही  । आज तक उनके बेटे फारुख और पोते उमर  सियासत के केंद्र में हैं । शेख से अलग होकर पीडीपी बनाने वाले मुफ्ती मो. सईद का परिवार भी दूसरी बड़ी सियासी ताकत बन गई । उनके बेटी महबूबा भी अब्दुल्ला परिवार जैसी ही हैसियत बनाये हुए है । कहने को वहां और भी नेता और पार्टियां हैं लेकिन सत्ता इन्हीं दो परिवारों के पास मुख्यत: रही । हालाँकि कांग्रेस ने भी लम्बे समय तक वहां राज किया लेकिन उसे भी अन्त्तत: अब्दुल्ला और मुफ्ती के आधिपत्य को स्वीकार करना पड़ा । इससे भी बड़ी बात ये है कि कश्मीर को लेकर सदैव आक्रामक रही भाजपा तक ने  नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के साथ गलबहियाँ करने में संकोच नहीं  किया। लेकिन कांग्रेस जहां कश्मीर को समस्या बनाये रखने वाली ताकतों को मजबूत करती रही वहीं भाजपा की मोदी सरकार ने धारा 370 और 35 ए को एक झटके में हटाकर खुद को अपराधबोध से  मुक्त करते हुए इतिहास रच दिया । कश्मीर समस्या क्या और क्यों है इसे लेकर काफी कुछ लिखा और कहा  गया  है । भाजपा और संघ  परिवार इसके लिए प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरु को दोषी ठहराते रहे हैं । जिन्होंने शेख अब्दुल्ला की कुटिल चालों में फंसकर कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह के विरूद्ध जनांदोलन भड़काकर  गृह युद्ध की  स्थिति पैदा की। महाराज द्वारा शेख को गिरफ्तार किये जाने से नेहरू जी बहुत नाराज थे । आजादी के बाद रियासतों के विलय के मसले पर हरिसिंह द्वारा जम्मू  कश्मीर को स्वतंत्र देश बनाये रखने की  जिद को समस्या की जड़ माना जाता है । पाकिस्तानी कबायली हमले के बाद उन्होंने भारत में विलय जब किया तब ही भारतीय सेना वहां  पहुँची लेकिन  तब तक काफी बड़ा हिस्सा पाकिस्तान कब्जा चुका था । भारतीय सेना उसे खाली करवा सकती थी लेकिन पं. नेहरु ने मामला संरासंघ में ले जाने की गलती कर दी जिसके बाद से आज तक ये समस्या  भारत का स्थायी सिरदर्द बनी हुई है । हाल ही में जम्मू - कश्मीर में एक बड़ा भूमि घोटाला उजागर हुआ जिसमें अब्दुल्ला परिवार  सहित तमाम राजनेताओं द्वारा सरकारी जमीन हड़पने की बात सामने आ रही है । राज्य में जिला परिषदों के चुनाव के समय सामने आये इस घोटाले को राजनीतिक कहकर नजरअंदाज किये जाने की कोशिश भी आरोपी नेताओं की तरफ से हो रही है किन्तु इससे अलग हटकर कश्मीर के  विलय के बाद पहले सदर ए रियासत बनाये गये डा. कर्णसिंह के पुत्र विक्रमादित्य ने गत दिवस कांग्रेस और पं. नेहरु पर कश्मीर समस्या को उलझाने का जो आरोप लगाया वह इस राज्य को लेकर चली आ रही बहस को नई दिशा में  ले जा सकता है । उल्लेखनीय है डा. कर्णसिंह महाराजा हरिसिंह के पुत्र हैं । विलय के बाद शेख अब्दुल्ला के बहकाने पर नेहरु जी ने उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया तथा शेष जीवन उन्हें मुम्बई में बिताना पड़ा। कर्णसिंह उस समय किशोरावस्था में थे । कालान्तर में सदर ए रियासत की पदवी खत्म कर दी गई । जिसके बाद  वे  कांग्रेस के मार्फत लोकसभा और राज्यसभा  में आते रहे तथा अनेक सरकारों में मंत्री भी रहे । उन्हें नेहरु - गांधी परिवार का खासमखास माना जाता रहा । अपने समूचे राजनीतिक जीवन में उन्होंने जम्मू - कश्मीर के विलय और उस बारे में नेहरु जी की नीति और निर्णयों पर  न ऐसा  कुछ कहा  और न ही लिखा  जो इतिहास के अनछुए पन्नों को लोगों के ध्यान में लाता  । लेकिन गत वर्ष जब मोदी सरकार ने धारा 370 हटाने का साहस दिखाया तब उसका स्वागत करने वालों में वे भी थे । यद्यपि उन्होंने उसके तरीके पर ऐतराज किया था । उसी समय ये संकेत मिलने लगे थे कि कश्मीर का राजपरिवार कांग्रेस से पिंड छुड़ाकर भाजपा के निकट आ सकता है । संयोगवश राहुल गांधी के बेहद करीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी  धारा 370 हटाये जाने के पक्ष में बयान देकर कांग्रेस नेतृत्व को  पशोपेश में डाल दिया था । लेकिन मिलिंद देवड़ा और दीपेन्द्र हुड्डा जैसे कुछ और युवा नेताओं के भी बयान भी चूंकि वैसे ही आये इसलिए कांग्रेस ने चुप रहना बेहतर समझा । हालांकि  कर्णसिंह और  सिंधिया परिवार की रिश्तेदारी के चलते राजनीतिक संकेत साफ़ होने लगे थे । जिसकी पुष्टि ज्योतिरादित्य के कांग्रेस  छोड़कर भाजपा में आने से हो गई । गत दिवस कर्णसिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह  ने   जो रिश्ते में श्री सिंधिया के बहनोई हैं , कश्मीर समस्या को लेकर कांग्रेस और पं. नेहरु पर  आरोपों की जो झड़ी लगाई उसके बाद से केवल राज्य ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्तर पर भी कश्मीर संबंधी नए - नए किस्से सामने आ सकते हैं । कहा जा सकता है कि जब राज्य में जिला परिषदों के चुनाव चल रहे हों और विधानसभा चुनाव की रूपरेखा बन रही हो उसी समय विक्रमादित्य ने अपने मन के गुबार क्यों  निकाले?  बड़ी बात नहीं वे भी अपने साले ज्योतिरादित्य की देखासीखी भाजपा में आने वाले हों । लेकिन कश्मीर के भारत में विलय में विलम्ब  के लिये उनका नेहरु जी पर दोषारोपण आसानी से हवा में उड़ाने वाली बात नहीं है । ये बात बिलकुल सही है कि धारा 370 एक अस्थायी प्रावधान था जिसे कांग्रेस ने समय रहते हटा दिया होता तो आज स्थिति इतनी विकट न होती । भाजपा और नरेंद्र मोदी से वैचारिक मतभेद रखने  वाले भी दबी  जुबान ही सही ये तो मानते ही हैं कि उस धारा का लाभ लेकर अब्दुल्ला परिवार ने अलगाववाद के जो बीज बोये उन्हीं की फसल आतंकवाद के रूप में बढ़ती गयी। बीते एक साल में  पूरे देश को पहली  बार लगा कि कश्मीर मुख्यधारा में शामिल हो गया है । अब तक  इतिहास में महाराजा हरिसिंह को खलनायक के रूप में पेश किया जाता रहा लेकिन उनके पोते विक्रमादित्य ने जिस तरह से जुबान खोली उसके बाद से अब तक प्रचलित धारणाएं बदल  सकती हैं । ये कहना गलत न होगा कि आजादी के 75 साल पूरे होते तक जम्मू - कश्मीर में सियासत  का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदला नजर आयेगा । राष्ट्रवादी राजनीति के लिए ये शुभ  संकेत है कि इस राज्य के पूर्व शासक परिवार ने लम्बे समय के बाद अपनी चुप्पी तोड़ी है । भले ही उसे राजनीतिक अवसरवाद कहा जाए लेकिन विक्रमादित्य सिंह के  खुलासों के बाद  यदि कश्मीर समस्या के असली गुनाहगार सामने लाये जा सकें तो भावी पीढ़ी को सच्चाई से अवगत कराया जा सकेगा जो बीते सात दशक तक उससे अनजान रही ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 November 2020

नेताओं और नौकरशाहों को अंग्रेजी राज वाली सुविधाएँ बंद की जाएं




देश की राजधानी दिल्ली में गत दिवस प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा सांसदों के लिए बनाये गये बहुमंजिला भवन का उद्घाटन किया गया। इसमें 76 फ्लैट हैं। लुटियन की दिल्ली कहलाने वाले वीआईपी इलाके में डा. बी.डी मार्ग स्थित आठ बड़े बंगले गिराकर बनाये गए इस बहुमंजिला भवन का निर्माण निर्धारित समय सीमा के भीतर होना भी उल्लेखनीय है। इसी के साथ कुछ और ऐसे ही शासकीय निर्माणों का भी लोकार्पण श्री मोदी ने किया। ब्रिटिश राज में लुटियन इलाके में बड़े-बड़े बंगले बनाये गये थे जो मंत्रियों और सांसदों के अलावा अन्य विशिष्ट हस्तियों तथा बड़े अधिकारियों को आवंटित किये जाते रहे हैं। साऊथ और नॉर्थ एवेन्यू में बनाये गये आवास अपेक्षाकृत छोटे हैं। बाद में स्वर्णजयंती अपार्टमेंट नामक बहुमंजिला आवसीय भवन में सांसदों के लिए  आधुनिक सुविधाओं से युक्त फ़्लैट भी निर्मित हुए। उसी के बाद से कई एकड़ में बने बंगले तोड़कर बहुमंजिला भवन बनाकर सांसदों को उनमें स्थानांतरित किया जाने लगा। इसके साथ ही शासकीय कार्यालयों में स्थानाभाव को दूर करने के लिए भी यही प्रयोग किया गया। दिल्ली में बढ़ती आबादी और यातायात की समस्या के कारण भी सरकारी दफ्तरों के दूर-दूर होने की समस्या खड़ी होने लगी थी। राष्ट्रपति भवन के हिस्से के तौर पर बने नॉर्थ और साउथ ब्लॉक भी अब छोटे पड़ने लगे हैं। यहाँ तक कि संसद भवन में भी जगह कम महसूस होती है। इसीलिये नई संसद और उसके साथ केन्द्रीय सचिवालय बनाने का प्रकल्प भी तैयार है। हालांकि विपक्ष इसका विरोध कर रहा है। लुटियन की दिल्ली की समूची परिकल्पना उस ज़माने के लिहाज से सही रही होगी किन्तु जमीनों के बढ़ते दाम के साथ ही वीआईपी सुरक्षा के मद्देनजर बड़ी-बड़ी आलीशान कोठियों के स्थान पर बहुमंजिला भवन बनाकर उनका आवासीय अथवा कार्यालयीन उपयोग समय की मांग और जरूरत है। उस दृष्टि से दिल्ली में हो रहे इस तरह के निर्माण पूरे देश के लिए एक नीति निर्देशक की तरह होना चाहिए। यूँ भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि और नौकरशाहों को मिलने वाली सामंतशाही आवासीय और अन्य सुविधाएँ लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध हैं। आज भी हर बड़े शहर में अंग्रेज साहब बहादुरों के लिए बनाई गई सिविल लाइंस हैं। यहाँ बने विशाल बंगले ब्रिटिश राज की याद दिलवाते हैं। इनके रखरखाव पर भी खासा खर्च होता है। दिल्ली की तर्ज पर बहुमंजिला आवासीय भवन बनाकर उनमें जनप्रतिनिधियों तथा नौकरशाहों के आवास की व्यवस्था किया जाना जनधन की बर्बादी रोकने के साथ ही बहुमूल्य शासकीय भूमि के बेहतर और अधिकाधिक उपयोग के अवसर उत्पन्न करेगा। विशेष रूप से राजधानियों में राजनेताओं और अधिकारियों को बड़े बंगलों की बजाय बहुमंजिला भवनों में फ्लैट बनाकर स्थानांतरित कर दिया जाए तो यह प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से लाभदायक तो होगा ही साथ ही वीआईपी सुरक्षा के लिहाज से भी बेहतर रहेगा। सबसे बड़ी बात आम जनता के मन में नेताओं और नौकरशाहों के बारे में जो नकारात्मक अवधारणा बन गई है , वह भी काफी हद तक कम हो सकेगी। भारत में राजनीति के प्रति आकर्षण के पीछे जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सामन्ती सुविधाएँ भी हैं। इसी तरह सरकारी अफसरशाही भी अंग्रेजी राज की मानसिकता छोड़ नहीं पा रही। ये देखते हुए पूरे देश में निर्वाचित नेताओं और नौकरशाहों को दी जा रही सुविधाओं की समीक्षा की जानी चाहिए। आज़ादी के 75 साल पूरे होने के मौके पर इस तरह की व्यवस्थाओं को लागू किया जाना चाहिए जिससे आम जनता के मन से ये धारणा दूर की जा सके कि अंग्रेजी राज भले चला गया हो लेकिन सियासत और हुकूमत दोनों अभी भी उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 November 2020

ओवैसी की सफलता छद्म धर्मनिरपेक्षता की विफलता का परिणाम



बिहार विधानसभा के हालिया चुनाव के बाद राजनीतिक विश्लेषक मुख्य रूप से नीतीश कुमार सरकार की स्थिरता, पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के भविष्य और तेजस्वी यादव की बतौर विपक्ष भूमिका पर काफी चर्चा कर रहे हैं। लेकिन सही मायनों में देखें तो विश्लेषण का मुख्य विषय ये होना चाहिए कि बिहार के सीमांचल में हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी पार्टी ए.आई.एम.आई.एम को मैदान में उतारकर न सिर्फ  पांच सीटें जीत लीं वरन कांग्रेस और राजद को अनेक सीटों पर हरवा भी दिया। वैसे तो ओवैसी ने 2015 में भी बिहार और 2017 के उप्र विधानसभा चुनव में अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारे थे किन्तु इक्का - दुक्का छोड़कर बाकी सबकी जमानतें जप्त हो गईं। लेकिन वे निराश नहीं हुए और इस बार फिर जोर आजमाइश करते हुए पांच विधायक जितवा लाये। आन्ध्र और तेलंगाना के बाहर केवल महाराष्ट्र में ही ओवैसी की पार्टी के विधायक थे लेकिन अब बिहार भी उस सूची में जुड़ गया है। इस सफलता से उत्साहित ओवैसी बंगाल और उप्र विधानसभा के आगामी चुनाव में भी हाथ आजमाने का ऐलान कर चुके हैं। शुरुवात में उन्हें वोट कटवा की श्रेणी में रखा जाता रहा। अनेक विश्लेषक उन्हें भाजपा की बी टीम कहकर संदेह की निगाह से देखते हैं। लेकिन बिहार के नतीजों के बाद ये माना जाने लगा है कि ओवैसी मुस्लिम समुदाय की आवाज बनकर उभर रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि वे उच्च शिक्षित होने के अलावा बेहद समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि से ताल्लुकात रखते हैं। जिस लोकसभा सीट से वे लगातार जीतते आ रहे हैं उसी से उनके पिता भी लम्बे समय तक चुने जाते रहे। ये बात भी माननी पड़ेगी कि हालिया सालों में लोकसभा में ओवैसी ही मुस्लिम समुदाय के सबसे मुखर प्रवक्ता बनकर उभरे हैं। दूसरी तरफ  ये भी सच्चाई है कि बीते कुछ वर्षों से मुसलमान खुद को नेतृत्व विहीन महसूस करने लगे हैं। जिन पार्टियों द्वारा धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर भाजपा और रास्वसंघ का हौआ खड़ा करते हुए मुसलमानों को डराकर उनके वोट हासिल किये जाते रहे वे न तो मुसलमानों को राजनीतिक तौर पर मजबूत कर सकीं और न ही उनका शैक्षणिक और आर्थिक उत्थान ही उनके शासन में हो सका। नब्बे के दशक से जिन मुद्दों को लेकर भाजपा राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में कामयाब हुई वह लगातार उन्हें लागू करवाने में सफल होती गई। केवल समान नागरिक संहिता ही बच रही है जिसके लिए मोदी सरकार के प्रयास ज़ारी हैं। मुसलमानों के मन में इसी बात को लेकर इन पार्टियों के प्रति गुस्सा और निराशा है कि वे भाजपा के तेज प्रवाह को रोकने की बजाय खुद को हिन्दूवादी साबित करने में जुटी हैं। कांग्रेस से शुरू होकर सपा, राजद और एनसीपी जैसी पार्टियां तक अंध मुस्लिम भक्ति छोड़कर ये दावा करने लगी हैं कि वे भी कम हिंदुत्व समर्थक नहीं हैं। बिहार के सीमांचल में मुस्लिम मतदाताओं को पहली बार ये कहते सुना गया कि पहले कांग्रेस और फिर लालू प्रसाद यादव के साथ एकमुश्त खड़े रहने का उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ और आज तक वे विकास से वंचित रहने के साथ ही राजनीतिक तौर पर भी पूरी तरह अनाथ हो चले हैं। इस बारे में सबसे महत्पूवर्ण बात ये है कि आजादी के बाद मुसलमानों की अपनी ऐसी कोई पार्टी नहीं रही जिसे राष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय माना जाता। मुस्लिम लीग केवल केरल में सिमटी रही। हालांकि कुछ मुस्लिम नेता अपने दम पर संसद और विधानसभाओं में जीतकर आते रहे लेकिन मुख्यत: मुसलमान कांग्रेस या ऐसी किसी अन्य क्षेत्रीय पार्टी से जुड़े  जो घोषित रूप से जनसंघ और भाजपा की विरोधी थी। लेकिन बीते कुछ सालों में विशेष रूप से केंद्र में नरेंद्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद से भाजपा ने मुस्लिम मतों की गोलबंदी को छिन्न-भिन्न करते हुए जिस तरह से अपना विस्तार किया उसके बाद से मुसलमानों को ये महसूस होने लगा कि वे धर्मनिरपेक्षता के मोहपाश में फंसकर जिन नेताओं और पार्टियों के साथ चिपके थे वे केवल रोजा इफ्तार के नाम पर उनका भावनात्मक दोहन करती रहीं। भाजपा ने बीते दो लोकसभा चुनाव में विशेष रूप से उप्र और बिहार में मुस्लिम मतों के महत्व को जिस तरह से निरर्थक साबित कर दिया उसके बाद मुस्लिम समाज में ये भावना तेजी से फैलने लगी कि अब उनको पिछलग्गू की भूमिका त्यागकर अपना नेतृत्व विकसित करना चाहिए और इसी का लाभ लेकर दक्षिण भारत से चलते हुए ओवैसी ने गंगा-यमुना के मैदान में अपनी बिसात बिछा दी। बिहार में पांच विधायक जितवाकर उन्होंने ये साबित कर दिया कि उत्तर भारत में कांग्रेस, सपा, राजद और वामपंथी दलों में जो मुस्लिम चेहरे हैं भी वे प्यादे से ज्यादा हैसियत नहीं रखते। लंबे समय तक राजनीति में रहने के बावजूद उनका अपना आभामंडल नहीं बन सका। उप्र में आजम खान इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। इन्हीं सब कारणों से बिहार के मुसलमानों ने ओवैसी में उम्मीद की किरण देखी और उन्हें अपना संरक्षक मान लिया। ये बात बंगाल और उप्र में कितनी लागू हो सकेगी ये पक्के  तौर पर कह पाना फिलहाल कठिन है लेकिन इतना तो साफ हो ही गया है कि ओवैसी के रूप में एक ऐसा नेता खड़ा हो गया है जो केवल और केवल मुसलमानों की बात करता है और जिसे हिन्दुओं की नाराजगी की परवाह नहीं। कुछ लोग उन्हें मो. अली जिन्ना का आधुनिक संस्करण मानते हैं लेकिन भारत में ध्रुवीकरण की जो दिशा है उसमें जिन्ना जैसी सोच को प्रश्रय और प्रोत्साहन देने वाली केन्द्रीय सत्ता नहीं है। और जो क्षेत्रीय दल बीते कुछ दशकों में मुसलमानों में असुरक्षा का माहौल बनाकर अपनी राजनीतिक स्वार्थ साधना करते रहे वे आज खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ नजर आ रहे हैं। इस प्रकार  के हालातों में मुसलमानों को ओवैसी में अपना भविष्य नजर आने लगा तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। कुछ लोग इसे एक गम्भीर खतरा मान रहे हैं लेकिन नि:संकोच ये कहा जा सकता है कि ओवैसी का उदय देश की उन राजनीतिक पार्टियों की असफलता है जो धर्मनिपेक्षता के नाम पर मुसलमानों को उल्लू बनाती रहीं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 November 2020

केवल सरकार के भरोसे न रहें : कोरोना से बचाव हमारे हाथ में



 न तो ये चीन द्वारा भेजा वायरस है और न ही इसमें किसी सरकार को दोष दिया जा सकता है | कोरोना की वापिसी संबंधी जो आशंका  पहले से ही जताई जा चुकी थी , वह सही साबित होती लग रही है | सर्दियों के मौसम में आम तौर पर जो बीमारियाँ आ धमकती हैं वे सब  चूँकि   कोरोना के शुरुवाती लक्षणों को दर्शाने वाली हैं । इसलिए चिकित्सा जगत एवं सरकार दोनों लोगों को सचेत करते रहे  | लेकिन जैसा देखने में मिला नवरात्रि से दीपावली के बीच के त्यौहारी मौसम में लोगों की जो भीड़ बाजारों में नजर आई उसने कोरोना के लौटते क़दमों को वापिस घुमा दिया | बीते कुछ दिनों के भीतर देश की राजधानी दिल्ली में जो भयावह स्थिति बन गई उसके कारण केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह को आपातकालीन बैठक बुलानी पड़ी और दिल्ली उच्च न्यायालय ने  केजरीवाल सरकार को समय रहते पुख्ता इंतजाम नहीं करने के लिए लताड़ लगाई  | दिल्ली से आ रही खबर पूरे देश में प्रसारित होने के बाद भी लोगों ने उस पर ध्यान नहीं दिया और एक तरह से ये मान लिया कि कोरोना पूरी तरह लौट चुका है | हालांकि इस बेफिक्री के पीछे वैक्सीन को लेकर आने वाली भ्रामक जानकारियाँ भी बड़ा कारण बनीं | भारत सरकार सहित निजी क्षेत्र ने भी वैक्सीन की उपलब्धता  को लेकर जिस तरह का माहौल बनाया  उससे लगने लगा कि दिसम्बर या हद जनवरी तक भारत में कोरोना का टीका सहज रूप से मिलने लगेगा | चूँकि भारत  वैक्सीन उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है और विश्व के अनेक देशों द्वारा कोरोना का जो टीका खोजा गया उसके उत्पादन का काम भारतीय कम्पनियों को ही मिल रहा है इसलिए भी ये एहसास प्रबल हो गया कि जल्द ही  देशवासियों को कोरोना के विरुद्ध रक्षा कवच हासिल हो जाएगा | लॉकडाउन हटने के बाद व्यापारिक गतिविधियों में भी  तेजी आई और आवागमन भी बढ़ा | सितम्बर के आख़िरी सप्ताह  से लगातार जो आंकड़े आये उनमें कोरोना तेजी से ढलान पर आता दिखा | नए संक्रमणों की संख्या में तेजी से कमी आने लगी वहीं स्वस्थ होकर घर लौटने वाले भी बढ़ते गये | इसकी वजह से भी लोगों का हौसला बढ़ा और कोरोना की वापिसी संबंधी चेतावनियों की जमकर उपेक्षा की जाने लगी | इसी दौरान बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए | मप्र में 28 उपचुनाव के कारण भी कोरोना की प्रति जमकर लापरवाही नजर आई | दीपावली  के साथ ही शादी सीजन की खरीदी भी इस दौरान होती दिखी | और इन सब वजहों का संयुक्त परिणाम कोरोना की दूसरी लहर  के रूप में देखने मिल रहा है | दीपावली के बाद ज्योंही शासन - प्रशासन ने स्थिति की समीक्षा की त्योंही दोबारा प्रतिबंधात्मक कदम उठाने पर विचार किया जाने लगा | शुरुवात दिल्ली से हुई और धीरे - धीरे अनेक राज्यों से खबरें आने लगीं | गत दिवस मप्र के अनेक शहरों में रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाने का फैसला किया गया | नए संक्रमणों की तुलना में स्वस्थ होने वालों की  संख्या बीते डेढ़ महीने में बढ़ने से राहत अनुभव की जा रही थी | लेकिन बीते एक सप्ताह में वह अंतर फिर घटता जा रहा है | मप्र में तो गत दिवस स्वस्थ होने वालों की संख्या नए संक्रमणों से  आधी निकली | भोपाल और इन्दौर में स्थिति ज्यादा गंभीर होने लगी है |  दिल्ली में विवाह आयोजनों में अतिथि संख्या घटाकर 50 कर दी गयी | अन्य राज्यों से  भी इसी तरह के फैसले लिए जाने की जानकारी  आ रही है | दोबारा लॉकडाउन की अटकलें  भी दबी जुबान सुनाई दे रही हैं | गत दिवस अहमदाबाद में तो इस कारण अफरातफरी मच गई और जनता जरूरी सामान खरीदने बाजारों में दौड़ पड़ी | हालाँकि अर्थव्यवस्था के मद्देनजर केन्द्र के साथ ही  राज्य सरकारें दोबारा लॉकडाउन जैसा कदम नहीं उठाएंगी किन्तु अब ये जनता के हाथ में है कि वह कोरोना की वापिसी को किस तरह रोके और ये कठिन काम भी नहीं है | कोरोना संबंधी सरकारी आंकड़ों में ये भी बताया जाता है कि मास्क न लगाने के कारण प्रशासन ने कितने लोगों का चालान करते हुए इतनी राशि वसूली | इसके बाद  भी सड़कों पर सैकड़ों और बाजारों में हजारों की संख्या ऐसे  लोगों की नजर आ जायेगी जो बिना मास्क के घूम रहे हैं | दरअसल ऐसे गैर जिम्मेदार लोग ही कोरोना की वापिसी की असली वजह हैं | शासन - प्रशासन अपने स्तर पर  जो भी कर रहे हैं वह अपनी जगह है | और उसमें आलोचना की जबर्दस्त गुंजाइश भी है किन्तु बेहतर होगा हर नागरिक स्वयं तो कोरोना संबंधी सावधानियां रखे ही लगे हाथ बल्कि अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उस हेतु प्रेरित , प्रोत्साहित और जरूरत पड़ने पर प्रशिक्षित भी करे | बीते लगभग 8 महीनों में एक बात तो तय हो ही गयी है कि  कोरोना पर विजय पाई जा सकती है | लेकिन इसके लिए जो जरूरी उपाय हैं वे करना अनिवार्य है | मास्क , सैनीटाईजर का उपयोग और हाथ धोते रहने के साथ ही शारीरिक दूरी जैसा  साधारण सा  अनुशासन  कोरोना से बचाव में सहायक हो सकता है | भारत ने जिस तरह से इस महामारी का मुकबला किया उसकी दुनिया भर में प्रशंसा हुई है | टीके के विकास में भी हमारी भूमिका काफी महत्वपूर्ण है लेकिन फिलहाल कोरोना पलटवार करता हुआ नजर आ रहा है और ऐसे में जरूरी होगा कि बजाय सरकार के भरोसे बैठे  रहने और व्यवस्थाओं को कोसने के हम अपने स्तर पर कोरोना से अपने और अपनों के बचाव के प्रति पूरी तरह सावधानी बरतें | आखिर ये जान भी तो हमारी है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 20 November 2020

व्यक्तिगत स्वतंत्रता : सवालों के बीच से उठते कुछ और सवाल




जबसे टीवी एंकर अर्णब गोस्वामी को सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम जमानत दी तभी से व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को लेकर न्यायालयीन भेदभाव पर बहस चल पड़ी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अर्णब की जमानत पर बॉम्बे उच्च न्यायालय को इस बात की नसीहत दी कि उसे वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा के अपनी अधिकार का उपयोग करना चाहिए था। स्मरणीय है अर्णब की जमानत पर उच्च न्यायालय ने पहले तो सभी पक्षों की बात सुनने की शर्त रखी और अंत में कह दिया कि वे चाहें तो निचली अदालत में आवेदन कर सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय को उच्च न्यायालय का ये तरीका रास नहीं आया और इसीलिये अर्णब को जमानत देते हुए उसने एक नीतिगत वक्तव्य जैसा दे दिया। इसके बाद से ही एक वर्ग विशेष ने इसे मुद्दा बनाकर जेलों में बंद उन असंख्य लोगों की चर्चा शुरू कर दी जिनकी जमानत अर्जी पर अदालतों द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा। सबसे बड़ी आपत्ति यही है कि व्यक्तिगत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में भी वर्गभेद किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय यदि अर्णब को राहत न देता और वे अभी भी जेल में रहते होते तब शायद इस मुद्दे को गर्माने वाले भी इधर-उधर के मसलों में उलझे होते। लेकिन क्या ये पहला मामला है जिसमें देश की सर्वोच्च अदालत ने जल्दबाजी दिखाते हुए याचिकाकर्ता को अति विशिष्ट व्यक्ति का दर्जा देकर उपकृत किया हो? बरसों पहले जब अभिनेता सलमान खान को निचली अदालत द्वारा हिट एंड रन के मामले में दोषी मानकर सजा सुनाई तब उसी बॉम्बे उच्च न्यायालय ने शाम को आनन-फानन में उनकी जमानत अर्जी मंजूर की थी। महंगे वकीलों के सहारे इस तरह का लाभ लेने वाले ऐसे लोगों की सूची काफी लम्बी है। जिसमें नेता, धनकुबेर और कुख्यात अपराधी तक शामिल हैं। जेलों में लम्बे समय से बंद शहरी नक्सली कहे जाने वाले लोगों की रिहाई न होने से वामपंथी विचारक, पत्रकार और बुद्धिजीवी बेहद भन्नाए हुए हैं। इसके अलावा बीते कुछ समय से सरकार विरोधी टिप्पणियाँ करने पर देश भर में अनेक पत्रकार भी बंद कर दिए गये जिसे लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला उठाया जाता रहा है। किसी भी प्रजातंत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्याय की सुलभता अत्यंत आवश्यक होती है। लेकिन हमारे देश में इसे लेकर इकतरफा सोच होने से सरकारों को मौक़ा मिल जाता है, विरोध को दबाने का। आज जो लोग शहरी नक्सली होने के शक में गिरफ्तार लोगों के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं वे बंगाल में ममता बैनर्जी और केरल में विजयन सरकार के राज में हो रही राजनीतिक हत्याओं पर आँख मूंदकर क्यों बैठे रहते हैं, इसका जवाब भी तो सामने आना चाहिए। कानून के सामने सभी बराबर हैं चाहे वे सलमान हों या अर्णब? लेकिन किसी आरोपी को महिमामंडित करने के लिए जब देश का एक नामचीन पत्रकार आधी रात के बाद उसका साक्षात्कार लेने बैठता है तो वह अभिव्यक्ति की आजादी का मजाक नहीं तो और क्या था? दिल्ली के जेएनयू विवि में राष्ट्रविरोधी नारे लगाने और, हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करने वालों की तरफदारी करना किस तरह की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है? जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाये जाने के बाद उठाये गये राष्ट्रहित के क़दमों के विरोध में आसमान सिर पर उठा लेने वाले अभिव्यक्ति के नाम पर भारत विरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ाने में सदैव आगे-आगे रहते हैं। अर्णब हो या चाहे कोई और, कानून को सभी के प्रति एक जैसा नजरिया रखना चाहिए। लेकिन एक देशद्रोही की फांसी रुकवाने के लिए आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय खुलवाना भी तो वर्गभेद है। जिन लोगों ने वह मुहिम चलाकर न्यायपालिका पर अनुचित दबाव बनाया उन्हें ही आज इस बात पर ऐतराज हो रहा है कि हजारों को नजरंदाज करते हुए एक टीवी एंकर को इसलिए त्वरित जमानत दी गई क्योंकि अदालत ने उसे विशिष्ट माना जबकि विभिन्न राज्यों में पकड़े गये छोटे पत्रकार सीखचों में हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये भी है कि जो टीवी एंकर व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के वशीभूत अर्णब की रिहाई में न्यायिक भेदभाव देख रहे हैं उन्हीं ने तो टीवी माध्यम को श्रेष्ठता के अभिमान से भरते हुए एंकरों को महामानव बनाने का तानाबाना बुना। आज समाचार जगत विश्वास के जिस संकट से गुजर रहा है उसके लिए टीवी टीवी एंकरों की जमात भी कम जिम्मेदार नहीं है। ये कहना गलत न होगा कि समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुड़े पत्रकारों और टेलीविजन के जरिये दिखने वाले एंकरों में वही अंतर है जो नाटक और फिल्म में काम करने वाले अभिनेता के बीच होता है। ऐसे में अदालत भी चेहरे की चमक देखकर प्रभावित हो जाती हो तो आश्चर्य कैसा? और फिर जब पत्रकार भी सेलेब्रिटी बनने की कोशिश करने लगे तब प्रधानमंत्री अक्षत कुमार को साक्षात्कार दें तो फिर बुरा क्यों लगता है? कहते हैं एक उंगली दूसरे पर उठाने से चार हमारी अपनी तरफ  भी उठती हैं। अर्णब को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विशेष दर्जे के तौर पर जमानत दिए जाने से न्याय के समक्ष समनाता के सिद्धांत पर सवाल उठाना स्वाभाविक है और जरूरी भी किन्तु ये भी विचारणीय है कि जो पत्रकार, बुद्धिजीवी और उनके हमकदम अन्य लोग भविष्य में यदि किसी कारण से पकड़े जायेंगे तब क्या वे अदालत से ये कहने का बड़प्पन दिखायेंगे कि उनको जमानत देने के पूर्व पहले से लम्बित प्रकरणों पर निर्णय ले लिए जाएं क्योंकि वे आम आदमी से ऊपर नहीं हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी