Monday, 7 December 2020

लड़ाई में पीछे हटने के रास्ते बंद कर देना हानिकारक होता है



केंद्र सरकार और आन्दोलनकारी किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद समाधान नहीं निकला | अगली बातचीत 9 दिसम्बर को होने वाली है | लेकिन उसके पहले 8 तारीख को भारत बंद का आह्वान कर दिया गया जिसे तकरीबन 20 विपक्षी दलों ने अपना समर्थन भी दे दिया | पिछली बैठक में सरकार ने नए कानूनों में संशोधन की मंशा जताई किन्तु किसानों के नेताओं ने उससे असहमत होते हुए कानून वापिस लेने की जिद ठान  ली और उसके बाद कृषि मंत्री भी  अगली बैठक की तरीख तय करते हुए चले गये | गत दिवस कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी द्वारा दिये गए संकेतों के अनुसार सरकार कानूनों को वापिस लेने की मांग को शायद ही स्वीकार करे किन्तु वह संशोधन के लिए तैयार है | ऐसा लगता है सरकार किसानों के साथ बातचीत की प्रक्रिया को उस हद तक लाना चाहती है जहाँ उस पर ये आरोप न लग सके कि उसने विवाद हल करने के लिए कुछ नहीं किया | कल के बंद के बाद अब किसानों के पास बातचीत करने के लिए क्या बच रहेगा ये बड़ा सवाल है | सरकार के अब तक के रवैये से नहीं लगता कि वह तीनों कानून वापिस लेकर झुकने जैसा एहसास करवायेगी | यदि वह शुरू में ही ऐसा कर लेती तब शायद पराजयबोध से बच जाती लेकिन अब वैसा करना घुटने टेकना होगा , जिसकी उम्मीद बहुत कम है | दूसरी तरफ किसान भी  कानून वापिसी की जिद पकड़कर पीछे लौटने की स्थिति में नहीं रहे | ऐसे में वे संशोधनों पर राजी होकर आन्दोलन वापिस ले लेंगे ये भी संभव नहीं दिखाई देता |  जहाँ तक बंद का सवाल है तो अब इस हथियार में पहले जैसी धार नहीं रही और वह केवल एक दिन की सुर्खी बनकर रह जाता है | जाहिर है गैर भाजपा  शासित राज्यों में सरकार का संरक्षण मिलने से बंद अपेक्षाकृत सफल दिखेगा जबकि भाजपा के कब्जे वाले राज्यों में मिला जुला | यूँ भी आम जनता को इससे लेना देना नहीं है | और रही बात व्यापारी वर्ग की तो शादी सीजन में व्यापार बंद रखना उसे रास नहीं आएगा | लेकिन तोड़फोड़ के डर से वह दुकान बंद कर घर बैठ जाता है | यूँ भी दोपहर के बाद फिर बाजार खुलने लगते हैं | लेकिन परसों किसान संगठनों और सरकार के बीच बातचीत किस मुद्दे पर होगी ये समझ से परे है | यदि कानून वापिस लेने की घोषणा सरकार तब तक नहीं करती तो किसान बैठक में क्या करने जायेंगे ? और बिना क़ानून वापिस हुए आन्दोलन खत्म नहीं करने की जिद दोहराई जाती रही तब  सरकार के पास भी  किसान नेताओं के साथ बैठने की औपचरिकता का औचित्य नहीं रहेगा | ये देखते हुए हो सकता  है कि सरकार ने किसान संगठनों की आपत्तियों के मद्देनजर  नये कानूनों में जिन  संशोधनों पर रजामंदी दिखाई  है उनकी वह इकतरफा घोषणा कर दे | ऐसा करने से किसानों का एक तबका आन्दोलन को सफल मानकर शांत हो सकता है | सरकार ने भी इतने दिनों के भीतर ये तो पता किया ही होगा कि  बजाय कानूनों को वापिस लेने के वह केवल संशोधन का रास्ता  चुनती है तब उसके बाद आन्दोलन पर उसका क्या असर पड़ेगा ? किसान संगठन कहें कुछ भी लेकिन आन्दोलन के नाम पर राजनीतिक रोटी सेंकने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है | और यही उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है |  अभी तक किसान आन्दोलन की हवा से देश का बड़ा हिस्सा अछूता है | ऐसे में सरकार ने एमएसपी , मंडी और कांट्रेक्ट फार्मिंग संबंधी संशोधन कर दिए तब पंजाब - हरियाणा  के अलावा बाकी राज्यों के बहुसंख्यक किसान संतुष्ट हो सकते हैं | वैसे भी उन्हें नए  कानूनों से कुछ लेने देना है नहीं | ये सब देखते हुए अब सबकी निगाहें कल के बंद और उसके बाद 9 दिसम्बर की वार्ता पर लगी रहेंगी | चूंकि किसान संगठनों की तरफ से बीच का रास्ता निकालने की सम्भावनाएं पूरी तरह खत्म कर दी गईं हैं इसलिए बड़ी बात नहीं परसों के  बाद संवादहीनता के हालात बन जाएँ और ऐसे में आन्दोलन अनियंत्रित  होने का खतरा बढ़ जाएगा | सरकार ने अब तक जिस तरह का रवैया अपनाया हुआ है उससे लगता है वह   किसान संगठनों की हठधर्मिता को जिम्मेदार ठहराकर ये सन्देश देना  चाह रही है कि वह तो समझौता चाहती थी किन्तु किसान नेताओं ने उसमें अड़ंगेबाजी की | वैसे भी  किसी  लड़ाई  में हमेशा आक्रामक नहीं रहा जा सकता | कभी - कभी पीछे हटकर भी लड़ाई जीती जा सकती है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 December 2020

वैक्सीन के बाद भी एक वर्ष तक सावधानी जरूरी



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गत दिवस सर्वदलीय बैठक में कोरोना वैक्सीन के कुछ हफ्तों में आने की  जानकारी देते हुए आश्वस्त  किया कि प्राथमिकता के आधार पर टीकाकरण किये जाने की तैयारी प्रशासनिक स्तर पर की जा चुकी है | इस कार्य में राज्यों के साथ समन्वय स्थापित कर सबसे  पहले एक करोड़ स्वास्थ्यकर्मी और उसके बाद तकरीबन दो करोड़  मैदानी  कार्यकर्ताओं को वैक्सीन उपलब्ध  करवाई जावेगी जिनमें पुलिस , सुरक्षाबल  और निकाय कर्मी मुख्य रूप से होंगे | उसके बाद अति बुजुर्गों और वरिष्ठ नागरिकों का क्रम आयेगा | प्रधानमन्त्री ने विस्तार से बात करते हुए कहा कि वैक्सीन की कीमत को लेकर राज्यों के साथ चर्चा उपरान्त ही निर्णय किया जावेगा | उन्होंने कोरोना  संक्रमण से लडाई में भारत की सफलता का ब्यौरा  देते हुए बताया कि बड़े पैमाने पर  जांच किये जाने से संक्रमण को महामारी में बदलने में सफलता हासिल हुई | वैश्विक अनुपात में मृत्यु  दर कम रहने को भी उन्होंने उपलब्धि बताया | भारत द्वारा कोरोना के सामुदायिक फैलाव को रोकने के लिए जो उपाय किये गए उन पर हर्ष  व्यक्त करते हुए श्री मोदी ने भारत में वैक्सीन का विकास करने में जुटे वैज्ञानिकों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके प्रयासों की सफलता पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं क्योंकि किफायती दामों पर वैक्सीन  उत्पादन में भारत विश्व का अग्रणी राष्ट्र है | टीकाकरण के अभियान में राज्य सरकारों की सहभागिता की चर्चा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उसकी कीमतों के निर्धारण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी | इसी बीच ये मांग भी उठ खडी हुई है कि कोरोना की वजह से चूँकि समाज के प्रत्येक वर्ग को जबरदस्त मानसिक , आर्थिक और शारीरिक परेशानी उठानी पड़ रही है इसलिए बेहतर होगा वैक्सीन लगाने संबंधी पूरा खर्च सरकार वहन  करे | बिहार चुनाव में भाजपा ने अपने  घोषणापत्र में जब इसकी घोषणा की थी तब ये प्रश्न उठा था कि  अन्य राज्यों के निवासी भी तो मतदाता हैं | और तब केंद्र के साथ ही  अनेक राज्य सरकारों की तरफ से निःशुल्क वैक्सीन का आश्वासन दिया गया था | अब जबकि वैक्सीन उपलब्ध होने जा रही है तब ये जरूरी हो गया है कि केंद्र और राज्य मिलकर इस बारे में नीतिगत घोषणा करते हुए आम जनता के मन में व्याप्त अनिश्चितता और भय को दूर करें | वैसे भी एक वर्ग ऐसा है जो सरकारी वैक्सीन के इन्तजार में बैठने की बजाय अपने खर्च से उसे खरीद लेगा | केन्द्रीय स्वास्थ्य  मंत्री डा. हर्षवर्धन तो पहले ही कह चुके हैं कि पूरे देश को वैक्सीन लगाते - लगाते अगले साल का जुलाई महीना आ जाएगा | उनकी बात काफी हद तक सही है क्योंकि 138 करोड़ जनता का टीकाकरण छोटा काम नहीं है | इसलिए ध्यान देने योग्य बात ये है कि  वैक्सीन की खुले बाजार में उपलब्धता रहे और वह कालाबाजारी और मुनाफाखोरी के चंगुल में न फंस जाये | दूसरी तरफ वैक्सीन लगाने के अभियान में सरकारी ढर्रा बाधा न बने | लेकिन इसी के साथ सबसे ज्यादा जरूरत है कोरोना संक्रमण की वापिसी को रोकना | उल्लेखनीय है अमेरिका , ब्रिटेन , फ्रांस और इटली जैसे विकसित देशों में कोरोना की दूसरी लहर ने कहर  बरपा रखा है | नित्यप्रति बड़ी संख्या में  नए संक्रमित सामने आने से चिकित्सा प्रबंध गड़बड़ा गये हैं | अमेरिका में तो रिकॉर्ड संख्या में मौतें  हो रही हैं | वहीं अपनी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के लिए विश्व प्रसिद्ध इटली के अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ने लगे हैं | भारत के बारे में भी ऐसी ही आशंका व्यक्त की जा रही थी | दीपावली के बाद अचानक से कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ा भी लेकिन जैसा कि सरकारी आंकड़े बता रहे हैं उनके अनुसार बीते एक सप्ताह में कोरोना का फैलाव फिर नियंत्रण में आ रहा है और अस्पताल से स्वस्थ होकर घर लौटने वालों की संख्या नए संक्रमितों से ज्यादा होने से ये उम्मीद बढ़ी है कि दूसरी लहर का प्रकोप शायद आशंका जितना न रहे | लेकिन ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि सर्दियों का मौसम कोरोना के प्रारम्भिक लक्षणों के लिए काफी अनुकूल है और ऐसे में विशेष रूप से पहले से बीमार चल रहे बुजुर्गों के स्वास्थ्य के प्रति सतर्कता रखी जानी चाहिए | प्रधानमन्त्री ने भी इस बारे में आगाह किया है | इस बारे में एक बात पक्के तौर पर समझ लेनी होगी कि वैक्सीन लगने के बाद भी कम से कम आने वाले एक साल तक मास्क और  सैनिटाइजर के उपयोग के अलावा शारीरिक दूरी बनाये रखने के प्रति अनुशासित रहना होगा क्योंकि कोरोना एक वायरस है जो दोबारा नहीं आयेगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता | दुनिया के अनेक देश कोरोना की पहली लहर के ठंडे  पड़ने के बाद खुशफहमी के शिकार होकर धोखा खा चुके हैं |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 December 2020

अमरिंदर की उम्मीदों पर फट पड़े बादल




किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच वार्ता के चार दौर पूरे होने के बाद ये कहा जा रहा है कि 5 दिसम्बर को होने वाली वार्ता में बात बन जायेगी। नए कृषि कानूनों में जरूरी संशोधन किये जाने के सरकारी आश्वासन के बाद किसानों का गुस्सा कुछ  कम होता लगा। यद्यपि ये कहना जल्दबाजी होगी कि अगली वार्ता में विवाद सुलझ ही  जाएगा। इसका कारण ये है कि पंजाब और हरियाणा के अलावा अन्य  राज्यों के किसान संगठनों की मांगें कुछ हटकर हैं। लेकिन जिन दो - तीन मुद्दों पर सहमति बनती दिखाई दे रही है उनमें एमएसपी ( न्यूनतम समर्थन मूल्य ) को कानूनी रूप दिए जाने  के अलावा एपीएमसी  ( कृषि उत्पाद बाजार  समिति ) को मजबूत बनाने के साथ ही  व्यापारी के बीच विवाद में किसान को अदालत जाने का अधिकार शामिल है। इनके अलावा कुछ ऐसी मांगें भी हैं जो मौजूदा संदर्भ में न सिर्फ अव्यवहारिक अपितु अनावश्यक भी हैं  और इनका उपयोग केवल दबाव बनाकर सौदेबाजी करने के लिए किया जा रहा है। मसलन मुफ्त बिजली , आधे दामों पर डीजल और कर्जे पूरी तरह माफ़ किया जाना है। पराली जलाने पर भारी अर्थदंड से  भी किसानों को भारी ऐतराज है।  बहरहाल सरकार की तरफ से  बिना उत्तेजित हुए जो धैर्य और समझदारी दिखाई जा रही है उससे किसान संगठन  वार्ता  के दौरान   उतने आक्रामक नहीं हो सके जितना शुरुवात में थे। इसी दौरान पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिन्दर सिंह दिल्ली आकर गृह मंत्री अमित शाह से मिले। बताया जाता है कि उन्होंने श्री शाह से किसानों की उचित मांगें जल्द मान लेने का आग्रह किया लेकिन बाहर आकर  पंजाब की आर्थिक स्थिति के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर किसानों से भी जल्द से  जल्द समझौता  करने की अपील कर डाली। लेकिन इसी दौरान पंजाब के पूर्व  मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पद्मविभूषण लौटाकर अमरिंदर सिंह को चौंका दिया। ये बात बिलकुल सही है कि किसानों का  यह आन्दोलन पंजाब की धरती से ही शुरू हुआ और अमरिंदर सिंह ने बड़ी ही चतुराई से उसे सहयोग और संरक्षण देकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का दांव चल दिया। ऐसा  अकाली दल को खलनायक बनाने के लिए किया गया जो नये कानून संबंधी अध्यादेश जारी होने के बाद भी एनडीए और केंद्र सरकार का हिस्सा बना हुआ था। संसद में विधेयक पारित होने के समय अकाली दल ने एनडीए और सरकार से नाता तोड़ तो लिया लेकिन तब तक कांग्रेस  पंजाब में आन्दोलन का नेतृत्व करने का श्रेय लूट चुकी थी । राहुल गांधी भी आनन - फानन में वहां जा पहुंचे। अकाली दल भी हालांकि आन्दोलन के समर्थन में कूदा लेकिन ये कहना गलत न होगा कि राजनीतिक तौर पर वह पिछड़ गया। बाद में अमरिंदर सरकार  द्वारा केंद्रीय कानूनों को बेअसर करने वाले कानून भी पारित करवाए गए लेकिन  किसानों को  ये समझ में आ गया कि उनसे  कोई लाभ नहीं  मिलने वाला तो वे नाराज होने लगे जिससे बचने के लिये अमरिन्दर सिंह ने आंदोलन का रुख दिल्ली की तरफ मोड़ दिया। उससे उनके राज्य में शांति हो गई और हरियाणा तथा दिल्ली में हलचल मचने लगी। यहाँ तक तो कांग्रेस आक्रामक और मुखर थी लेकिन ज्योंही किसान दिल्ली पहुंचे त्योंही अकाली दल ने गुरुद्वारों के अपने आधार को इस्तेमाल करते हुए किसानों के लिये लंगर  आदि का इंतजाम कर दिया। कमजोर संगठन और नेताओं  की अरुचि के कारण कांग्रेस  पंजाब के बाहर आने के बाद किसानों से वैसा सम्पर्क नहीं  रख सकी। कुछ सिखों द्वारा खालिस्तान समर्थक हरकतें कर दिए जाने के बाद कांग्रेस ने भी आन्दोलन से मैदानी दूरी बनाई जिसका लाभ अकाली दल ने चुपचाप उठाया। गत दिवस अमरिन्दर सिंह का दिल्ली आकर केन्द्रीय  गृह मंत्री से मिलने के बाद नर्म बयान देने के साथ ही बीमारी के कारण लम्बे अरसे से सार्वजनिक तौर पर अनुपस्थित प्रकाश सिंह बादल द्वारा पद्म विभूषण लौटाने की खबर आ गयी। और इस तरह  किसानों के पक्ष में उंगली कटाकर शहीद होने का दांव फेंक दिया गया। श्री बादल के उस कदम के बाद अन्य नेताओं और खिलाड़ियों द्वारा भी  पुरस्कार और सम्मान लौटाए जाने के समाचार आने लगे।  आन्दोलन स्थल पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी द्वारा अपने स्टाल लगाकर भोजन , चाय आदि का जो इंतजाम किया गया उसे तो किसानों ने भाव नहीं दिया लेकिन अकाली दल द्वारा पहले परदे के पीछे रहकर आन्दोलन की व्यवस्था संभाली गई और फिर सही मौके पर श्री  बादल द्वारा  पद्म विभूषण लौटाकर किसानों के सबसे बड़े हमदर्द बनने जैसा ब्रह्मास्त्र चल दिया गया और  किसान आन्दोलन के जरिये  अकाली दल द्वारा पंजाब की राजनीति में अपनी वापिसी कर ली। सही बात ये है कि भाजपा आज भी पंजाब में शहरी क्षेत्रों से आगे नहीं बढ़ पा रही। नवजोत सिंह सिद्धू के पार्टी छोड़ देने के बाद उसके पास कोई दमदार सिख चेहरा भी नहीं है। इसीलिये किसान  आन्दोलन को दिल्ली तक आने से रोकने में वह विफल रही और यहाँ भी किसान संगठनों से गैर सरकारी  स्तर पर संवाद स्थापित करने में उसे सफलता नहीं मिली। ये सब देखते हुए  कहना गलत न होगा कि कोई कहे कुछ भी लेकिन किसान आन्दोलन ने अकाली दल के राजनीतिक वनवास को काफी हद तक दूर कर दिया है जबकि प्रारम्भिक  पहल लेने के बाद भी  कांग्रेस निर्णायक क्षण आते तक आन्दोलन पर अपना नियन्त्रण और प्रभाव नहीं  छोड़ सकी। कल होने वाली वार्ता में क्या होगा ये फि़लहाल कयासों तक ही सीमित है लेकिन कुछ न कुछ तो ऐसा होगा जिससे आंदोलन खत्म न सही लेकिन उतना आक्रामक भी नहीं रह सकेगा। और उसके बाद पंजाब की राजनीति में किसानों के नाम पर अकाली दल और कांग्रेस के बीच नए सिरे से सियासी संग्राम शुरू होना तय है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 2 December 2020

आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए उद्योग-व्यापार को अधिकतम रियायत मिले




दिल्ली में हो रहे किसान आन्दोलन के बीच ये अच्छी खबर है कि आर्थिक मोर्चे पर कोरोना का असर लगातार घट रहा है। नवम्बर महीने में जीएसटी की वसूली 1 लाख 5 हजार करोड़ का आँकड़ा छू गई। इसी के साथ ये खबर भी आ गई कि अर्थव्यवस्था को लेकर व्यक्त्त की गईं  तमाम आशंकाओं और अटकलों के बावजूद शेयर बाजार लगातार नई ऊंचाइयों को छूता जा रहा है। घरेलू उत्पादन के साथ ही निर्यात में भी आशाजनक वृद्धि डूबती उम्मीदों को सहारा दे रही है। यही वजह है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के ऋणात्मक रहने की तमाम संभावनाओं के बाद भी हालात उतने बुरे नहीं हैं जितने लॉक डाउन की अवधि के दौरान लग रहे थे। उससे भी बड़ी बात ये है कि आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में विकास दर में रिकॉर्ड उछाल आने की बात न सिर्फ  भारतीय वरन वे विदेशी संस्थान भी करने लगे हैं जो अब तक ये कहते आये थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था को कोरोना काल में हुए नुकसान से उबरने में कम से कम चार साल लगेंगे। लॉक डाउन के दौरान निर्माण और उत्पादन इकाइयों में काम ठप्प होने के कारण बेरोजगारी की जो स्थिति थी उसमें भी आशातीत सुधार होने से उत्साहजनक वातावारण बनने लगा है। आर्थिक मंदी के बावजूद लॉक डाउन के बाद ज्योंही बाजार गुलजार हुए त्योंही ऑटोमोबाइल क्षेत्र में जबर्दस्त मांग और बिक्री देखने मिली जिसके कारण अन्य क्षेत्र भी निराशा से उबरकर मैदान में कूदे जिसका सकारात्मक प्रभाव दशहरा-दीपावली के दौरान त्यौहारी माहौल में देखने मिला और आशा के विपरीत उपभोक्ता बाजार भरे-भरे नजर आये। जीएसटी वसूली के ताजा आँकड़े भी उसी का परिणाम हैं। इस सबके बीच उत्साहवर्धक बात ये रही कि चीन से आने वाली छोटी-छोटी उपभोक्ता वस्तुओं के आयात में प्रभावी कमी आई है। केंद्र सरकार द्वारा इस दिशा में किए गए उपायों का घरेलू  उद्योगों पर बहुत ही अच्छा असर हुआ जिससे चीन के साथ व्यापार संतुलन थोड़ा ही सही लेकिन सुधरा। ऑनलाइन कारोबार और पढ़ाई के कारण कम्प्यूटर और मोबाईल की बिक्री ने भी कीर्तिमान स्थापित कर दिए। दुनिया भर के आर्थिक विशेषज्ञों ने भारत को लेकर अपनी जो राय बदली उसका सबसे प्रमुख कारण है कोरोना से लड़ने में मिली सफलता। विश्व के विकसित देशों में कोरोना से जिस बड़े पैमाने पर जनहानि हुई उसकी तुलना में 138 करोड़ की आबादी वाले भारत का कोरोना प्रबंधन चिकित्सा क्षेत्र में अनगिनत कमियों के बावजूद बहुत अच्छा रहा। यहाँ तक कि दूसरी लहर के आगमन के बाद भी कोरोना के नए मामलों और स्वस्थ होने वालों का अनुपात पूरी तरह से नियन्त्रण में बना हुआ है। इसी के साथ ही कोरोना की वैक्सीन विकसित करने में भारत को मिली सफलता और केंद्र सरकार द्वारा जनता को उसकी उपलब्धता शीघ्रातिशीघ्र कराए जाने की तैयारियां शुरू किये जाने से पूरी दुनिया के निवेशकों को भारत में अपार संभावनाएं नजर आने लगी हैं। और मौजूदा तिमाही में जापान के बाद भारत उन सात एशियाई देशों में दूसरे स्थान पर है जहां सबसे ज्यादा विदेशी निवेश आया। कोरोना वायरस के फैलाव को लेकर दुनिया भर में खलनायक बन चुके चीन पर से निवेशकों का जो भरोसा डगमगाया उसका सर्वाधिक लाभ भारत को मिलने की उम्मीदें लगातार मजबूत होती जा रही हैं। शुरुवात में लगा था कि वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया और इन्डोनिशिया भारत की तुलना में निवेशकों को ज्यादा पसंद थे लेकिन धीरे-धीरे स्थिति स्पष्ट होती जा रही है और जापान के बाद अब भारत के बाजार में विदेशी पूंजी का प्रवाह अनवरत जारी है। कोरोना वैक्सीन के उत्पादन और वितरण को लेकर प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से व्यक्तिगत रूचि लेते हुए आगे की योजना पर काम कर रहे हैं उससे भी आर्थिक क्षेत्र में आशाओँ का संचार हो रहा है। लेकिन दीपावली और विवाह सीजन के बाद बाजार में मांग कैसी रहेगी इस पर काफी कुछ निर्भर होगा। खरीफ  फसल में अच्छी पैदावार के बाद अगर रबी सीजन की फसलें भी आशानुरूप आ गईं तब निश्चित रूप से उपभोक्ता बाजार में बहार आयेगी। कोरोना के पहले से ही अर्थव्यस्था मंदी का शिकार थी और लॉक डाउन ने दूबरे में दो आसाढ़ वाले हालात बना दिए किन्तु अब ऐसा लगने लगा है कि नुकसान उतना नहीं हुआ जितनी आशंका व्यक्त की जा रही थी परन्तु पूरा दारोमदार इस बात पर निर्भर करेगा कि कोरोना की दूसरी लहर को काबू में रखने के साथ ही वैक्सीन जल्द से जल्द जरूरतमंदों तक पहुंचे और उस काम में अव्यवस्था न हो। आपदा में अवसर की जो बात प्रधानमन्त्री ने शुरू में ही कही थी वह वास्तविकता में बदल सकती है। लेकिन इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को भी चाहिए कि वे उद्योग-व्यापार को जितनी रियायत दे सकें उतनी दें क्योंकि ये सही समय है जब हम वैश्विक बाजारों में चीन को टक्कर देकर आर्थिक महाशक्ति बन सकते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 December 2020

असली और दिखावटी किसान में फर्क भी सामने आना चाहिए




किसान आन्दोलन के संदर्भ में ही सही लेकिन  किसानों की आर्थिक स्थिति पर एक बार फिर पूरे देश में चर्चा चल पड़ी है | हालाँकि अभी तक आन्दोलन की बागडोर पंजाब के किसानों और वह भी मुख्य रूप से संपन्न कृषकों के हाथ में ही है | देश के अनेक राज्य ऐसे हैं जो खेती के रकबे में पंजाब से कहीं बड़े हैं किन्तु वहां के आम किसान से यदि नये कृषि संशोधन कानून के बारे में पूछे तो वह अनभिज्ञता जाहिर कर देगा | जहां तक बात नये कानूनों के विरोध की है तो उसे लेकर जो शंकाएं जताई  जा रही हैं उनका निराकरण प्रधानमन्त्री के स्तर पर किये जाने के बाद भी किसान आन्दोलन को दिल्ली घेरने तक ले आना समझ से परे है | स्मरणीय है विगत 13 नवम्बर को किसान संगठनों के साथ सरकार की वार्ता हो चुकी थी जिसमें सहमति नहीं बन पाने के बाद 3 दिसम्बर की तारीख अगली वार्ता हेतु तय की गयी  , तब क्या कारण था कि आन्दोलन को इतना उग्र रूप दे दिया गया | इसी के साथ ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि नए कानूनों के पहले की स्थिति यदि किसानों के लिए हितकारी थी तब फिर सरकारी मंडी में होने वाले भ्रष्टाचार को लेकर हल्ला क्यों मचाया जाता था ? इन कानूनों के बनने के  पहले तक यदि देश के किसान खुशहाली की ज़िन्दगी जी रहे थे और उन्हें उनकी फसल का पर्याप्त मूल्य मिल रहा था तब तो केंद्र सरकार को अपने संशोधन बिना सोचे ही वापिस ले लेना चाहिए | लेकिन पुरानी व्यवस्था में यदि कोई खामी या कमी थी तो उसमें सुधार और बदलाव होना ही चाहिए | कृषि विशेषज्ञ देविन्दर शर्मा के अनुसार देश में सरकारी अनाज की 90 फीसदी खरीदी चूँकि पंजाब और हरियाणा से होती है इसीलिये वहां के किसानों को एमएसपी ( न्यूनतम समर्थन मूल्य ) खत्म किये जाने की चिंता सता रही है | उनके मुताबिक देश के केवल 6 फीसदी किसान ही एमएसपी का लाभ उठा रहे हैं और बाकी के 94 फीसदी इससे वंचित हैं और  पहले से ही बाजार पर निर्भर हैं | हालाँकि अब सरकारी खरीदी में मप्र जैसा  राज्य पंजाब और हरियाणा का मुकाबला कर रहा  है | उप्र और महाराष्ट्र के किसान गन्ना तथा फलों पर ज्यादा ध्यान देने के कारण एमएसपी को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं हैं | यही वजह है कि नए कानूनों का विरोध पंजाब से शुरू हुआ और मौजूदा आन्दोलन में भी  उसी की अगुआई है | लेकिन इस सबके बीच एक सवाल ये भी  उठ खड़ा हुआ है कि सीमान्त और लघु किसान की आवाज उठाने  वाला कौन है ? राजनीतिक दल भी बड़े किसानों के प्रति आकर्षित होते  हैं | चुनावी राजनीति पर भी उन किसानों का ही अधिकतर कब्जा है जो अपने इलाके में जमींदार या मालगुजार कहलाते हैं | शासन और  प्रशासन से भी इन्हीं  का सम्पर्क होता है और जब भी कोई मुद्दा उठता है तब यही वर्ग किसानों का प्रतिनिधि बनकर अपने हितों का संरक्षण और संवर्धन कर लेता है | एमएसपी के अंतर्गत होने वाली सरकारी खरीदी और प्राकृतिक आपदा के बाद बंटने वाले मुआवजे का लाभ अधिकतर बड़े किसान ही उठाते रहे हैं | ऐसे में किसानों के बारे में सोचते समय इस बात का संज्ञान भी जरूरी है कि कृषक समुदाय में भी जबरदस्त वर्गभेद है और उसकी वजह से छोटा किसान  लाभों से तो वंचित रहता है किन्तु व्यवस्थाजनित जितनी  भी विसंगतियां हैं उनका नुकसान उसे पूरी तरह भोगना पड़ता है | मौजूदा आन्दोलन भी किसानों की मूलभूत समस्याओं के बजाय  ऐसे विषयों पर केन्द्रित है जिनसे पूरे देश के किसानों को सरोकार नहीं है | यूँ भी कृषि अब केवल गेंहू , धान , दलहन  और तिलहन तक सीमित नहीं रही | उसमें सब्जी , फल , पशुपालन , डेरी  , मत्स्य और मुर्गी पालन भी आ गया है | आयकर मुक्त होने से कृषि के प्रति ऐसे लोग भी आकर्षित हो रहे हैं जिनके लिए वह केवल लाभ कमाने  या फिर काले धन को सफेद करने का जरिया है | इस तबके में  राजनेता , उद्योगपति और नौकरशाह शामिल हैं | कुल मिलाकर अब समय आ गया है जब असली और दिखावटी किसान की  पहिचान स्पष्ट हो | केंद्र सरकार और किसान  संगठनों के बीच आज होने वाली वार्ता किस मुकाम पर पहुँचती है ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन ये बात  गंभीरता के साथ विचार योग्य है कि जमींदारी प्रथा भले ही  खत्म कर  दी गई हो  लेकिन  जमींदार आज भी हैं जो किसानों के हक़ पर डाका डालने में पीछे नहीं रहते | आत्महत्या करने वाले किसानों के घर जाकर घड़ियाली आंसू बहाने का चुनावी कर्मकांड करने वाले राजनेता भी आखिर सुनते उन्हीं किसानों की हैं जिनके पास धनबल है | किसान समृद्ध हो ये तो हर कोई चाहता है लेकिन इस समृद्धि का बंटवारा भी यदि विषमता से भरा हो तब उसे दूर करने के बारे में भी तो आन्दोलन होना चाहिए | किसानों को मिलने वाली आयकर छूट यदि समाप्त कर दी जाए तब उससे प्रभावित होने वाले  तबके को किसान क्यों माना जाए ये भी  सवाल लम्बे समय से लंबित है | जो किसान अपनी मेहनत से 25 - 25 लाख की कारें खरीद सकता है वह आयकर क्यों नहीं दे सकता ?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 November 2020

सरकार समझा नहीं पा रही या आन्दोलनकारी समझना नहीं चाहते



केंद्र सरकार द्वारा बनाए कृषि संशोधन कानूनों के विरोध में पंजाब से आये हजारों किसान दिल्ली को घेरकर बैठ गये है। उनका दावा है कि वे लम्बी लड़ाई की तैयारी से हैं। ट्रैक्टर ट्रॉली में रहने के साथ ही वे अपने साथ भोजन बनाने की सामग्री भी लाए हैं। लंगर के रूप में सामूहिक भोज चल रहा है। किसानों ने इस अपील को ठुकरा दिया है कि वे बुराड़ी नामक जगह पर एकत्र हो जाएँ जहाँ उनकी सुरक्षा और सुविधा का पूरा इंतजाम केंद्र सरकार करने के साथ ही  उनकी मांगों के सम्बन्ध में वार्ता की जावेगी। शुरू में बातचीत हेतु 3 दिसम्बर की तारीख सरकार ने तय कर दी थी किन्तु उसके पहले ही पंजाब के किसान दिल्ली कूच क्यों कर बैठे ये बड़ा सवाल है। केंद्र सरकार ने उनसे उक्त तिथि के पहले ही बातचीत का प्रस्ताव भी दिया किन्तु किसान नेताओं की जिद है कि उन्हें दिल्ली में जंतर मंतर पर धरने की अनुमति दी जाए और वार्ता बिना शर्त के साथ ही उच्चस्तरीय हो। शायद इसके पहले सचिव स्तर पर किया गया संवाद उन्हें रास नहीं आया। इसी के साथ ही वे नए कानूनों को वापिस लेने की मांग पर भी अड़े हैं। उनकी मुख्य चिंता जो बताई जा रही है वह है एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की समाप्ति की आशंका और सरकारी मंडियों की अनिवार्यता खत्म करते हुए खुले बाजार में अपना उत्पाद बेचने की छूट। उनके मन में ये बात बिठा दी गई है सरकार किसानों को पूरी तरह बाजार की ताकतों के रहमो - करम पर छोड़कर एमएसपी पर जो खरीदी करती थी उससे पिंड छुड़ा लेगी जिससे वे व्यापारी की मनमर्जी के शिकार होकर रह जायेंगे। कांट्रेक्ट फार्मिंग के लागू होने पर बड़े पूंजीपति उनकी फसल कम दाम पर खरीदकर मुनाफाखोरी करेंगे और धीरे-धीरे उनके जमीनें हडप लेंगे। दूसरी सरकार तरफ  सरकार का कहना है कि नए क़ानून किसानों के लिए अपनी मेहनत का अधिक से अधिक लाभ हासिल करने का रास्ता खोलने वाले हैं। इसके कारण वे अपनी फसल पूरे देश में जहाँ ज्यादा दाम मिले वहां बेच सकते हैं। सरकारी मंडियों में अपना उत्पाद बेचने की मजबूरी भी नहीं रहेगी और उन्हें खुले बाजार में ज्यादा मूल्य मिलने पर वे बिना मंडी शुल्क चुकाये वहां विक्रय कर सकते हैं। सरकार की मानें तो अब तक प्रचलित व्यवस्था में किसान मंडी माफिया की गुंडागर्दी और उनके साथ मिलकर सरकारी अमले द्वारा किये जाने भ्रष्टाचार का शिकार होता रहा है। बहरहाल आज किसानों द्वारा दिल्ली को जाने वाले सभी रास्ते बंद करने की धमकी दी गई है। इस कारण दिल्ली से पंजाब और हरियाणा जाने वाले लोग परेशान हो रहे हैं। राजमार्ग अवरुद्ध कर दिए जाने से निजी वाहन से आना-जाना भी संभव नहीं हो पा रहा। उल्लेखनीय है हरियाणा सहित एनसीआर कहलाने वाले गाजिय़ाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम आदि से लाखों लोग नौकरी और कारोबार के सिलसिले में रोजाना दिल्ली में आवागमन करते हैं। इन स्थानों को जाने वाली मेट्रो रेल भी रद्द की जा रही हैं। कुल मिलाकर इस आन्दोलन की वजह से राष्ट्रीय राजधानी में आने जाने वाले भारी परेशानी झेल रहे हैं। शादियों के मौसम के कारण बारातों के जाने-आने में भी बाधा आ रही है। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी ये है कि आन्दोलनकारियों और केंद्र सरकार के बीच संवाद का कोई सक्षम माध्यम नहीं है जिस पर दोनों पक्ष भरोसा कर सकें। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने किसानों को दिल्ली भेजने की रणनीति बनाकर अपने राज्य को तो तनाव से बचा लिया। उनकी सरकार ने केन्द्रीय कानूनों को बेअसर करने के लिए जो कानून बनाये उन्हें भी किसान संगठनों ने अस्वीकार कर दिया। इसके पीछे अकाली दल की राजनीति थी जो ये नहीं चाहता था कि किसान कांग्रेस की राज्य सरकार से खुश हो जाएँ। चूँकि अकाली दल इस मसले पर एनडीए छोड़ चुका है इसलिए वह केंद्र सरकार के संदेशवाहक की भूमिका से अलग है। और पंजाब में भाजपा के पास कोई ऐसा बड़ा चेहरा भी नहीं है जिसके जरिये वह किसानों को ठंडा कर पाती। यही परेशानी किसानों के साथ भी है। उन्होंने भी मुसलमानों की तरह शाहीन बाग जैसा कदम तो उठा लिया लेकिन उनके पास भी केंन्द्र सरकार तक अपनी बात पहुँचाने वाला कोई प्रभावशाली प्रवक्ता नहीं है। दरअसल ये संवादहीनता ही इस विवाद का असली कारण है। भले ही पंजाब के किसानों के समर्थन में दिखावे के लिए पश्चिमी उप्र, हरियाणा, उत्तराखंड और राजस्थान के कुछ जत्थे आ गये हों लेकिन अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला जिससे ये लगता कि नए केन्द्रीय कानूनों का विरोध राष्ट्रव्यापी है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या केंद्र सरकार किसानों को समझा नहीं पा रही या फिर वे जानबूझकर इसे समझना नहीं चाह रहे। भले ही उनकी तरफ से ये कहा जा रहा हो कि उनके मंच पर कोई राजनीतिक हस्ती नहीं आयेगी लेकिन आन्दोलन के पीछे खड़ी राजनीतिक ताकतें अपने को छिपा नहीं पा रहीं। ऐसे में इस बात का डर है कि आन्दोलन दिशाहीन होकर भटक न जाए। वैसे भी इस तरह का कदम किसी आन्दोलन का अन्तिम अस्त्र होता है जिसे बहुत जल्दी उठाकर किसान संगठन और उनके नेता ऐसे मुकाम पर आ खड़े हुए जहाँ इधर कुआ, उधर खाई वाली स्थिति बन चुकी है। गत दिवस प्रधानमन्त्री ने रेडियो पर मन की बात में कृषि संशोधन कानूनों को किसानों के लिए हितकारी बताकर ये संकेत दे दिया कि सरकार आसानी से दबाव में आने वाली नहीं है। गत रात्रि भाजपा अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा के साथ गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की बैठक में क्या रणनीति बनी इसका खुलासा तो नहीं हुआ लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने किसानों को गृह मंत्री की अपील मान लेने की जो सलाह दी उससे लगता है उन्हें भी इस बात का भय है कि उनकी सजाई दूकान पर कहीं अकाली दल और भाजपा अपना बोर्ड न टांग ले जाएं। कुल मिलाकर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक केंद्र सरकार और आन्दोलनकारी किसानों के नेता एक दूसरे की ताकत का आकलन करने में जुटे हैं। संवाद सेतु का अभाव जब तक दूर नहीं होगा तब तक गतिरोध बना रहेगा। भाजपा नेतृत्व इस संकट से निपटने वक्त इस सम्भावना का आकलन कर रहा है कि किसानों का आन्दोलन केवल पंजाब तक ही सीमित रहेगा या उसका फैलाव अन्य राज्यों में भी होगा। यदि वह इस बात से आश्वस्त हो गया कि पंजाब के बाहर के किसानों में इस आन्दोलन को लेकर उदासीनता है तब केंद्र सरकार भी कड़ाई से पेश आयेगी। अब तक के संकेतों के अनुसार किसानों के नेता भी ये समझ रहे हैं कि कदम पीछे खींचने से उनकी भद्द पिट जायेगी। ये बात भी सही है कि राजमार्गों को लम्बे समय तक जाम रखे जाने से जन सहानुभूति से किसान वंचित हो जायेंगे। वैसे भी ये धारणा तेजी से फैल रही है कि पूरे खेल के पीछे किसानों से ज्यादा राजनेताओं और उन व्यापारियों की भूमिका है जिनको नए कानूनों से जबरदस्त नुकसान होने जा रहा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 28 November 2020

वरना हम भारत के लोग बुलडोजर और खाकी वर्दी के सामने असहाय बने रहेंगे



टीवी एंकर अर्नब गोस्वामी की चीखने - चिल्लाने की शैली , अभिनेत्री कंगना रनौत द्वारा बेवजह चुनौतियां उछालना और पत्रकारिता कम राजनीति ज्यादा करने वाले संजय राउत की बदजुबानी अति सर्वत्र वर्जयेत की श्रेणी में रखे जाने योग्य हैं | इनके समर्थक भी दबी जुबान ही सही किन्तु ये मानेंगे कि इनकी अभिव्यक्ति में अनावश्यक रूप से तैश नजर आता है | हो सकता है ऐसा करने के पीछे उद्देश्य सुर्ख़ियों में बने रहना हो लेकिन ये बात पूरी तरह सही है कि बड़बोलापन अंततः नुकसानदेह होता है और ऐसा करने वाला व्यर्थ के विवादों में उलझकर अपना समय , ऊर्जा और रचनात्मकता सस्ते में खर्च कर देता है | मुम्बई में बीते कुछ महीनों में  ऐसा घटनाचक्र चला जिसके कारण उक्त तीनों महानुभाव विवाद और चर्चा में आये | अभिनेता  सुशांत सिंह की आत्महत्या के बाद फ़िल्मी दुनिया में जो माहौल बना उसमें वे  तीनों अपनी - अपनी भूमिका में सामने आये | आरोप - प्रत्यारोप का लम्बा और आक्रामक दौर चला | इसके चलते सुशांत की मौत तो पृष्ठभूमि में चली गई और अर्नब , कंगना और संजय का त्रिकोण विवादों का केंद्र बन गया | सबने अपने - अपने ढंग से बढ़ - चढ़कर बातें कीं | लेकिन बात मुख्य मुद्दे से भटकते हुए कंगना के कार्यालय में महानगरपालिका द्वारा की गई  तोड़फोड़ और उसके बाद एक पुराने मामले में अर्नब की गिरफ्तारी तक जा पहुँची | सुशांत की आत्महत्या में उसकी  प्रेमिका रिया की कथित भूमिका और फिल्मी दुनिया में नशीली दवाओं के बढ़ते चलन जैसी बातों पर कंगना और अर्नब के विरुद्ध हुई कार्र्वाई हावी हो गई | इन  दोनों ने सीधे  मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर निशाना साधा जिसके जवाब में बुलडोजर और गिरफ्तारी जैसा कदम महाराष्ट्र सरकार के इशारे पर मुम्बई पुलिस ने उठाया जिसका समूचा वृतान्त जगजाहिर है | कंगना के कार्यालय को अवैध निर्माण मानकर आनन - फानन में धराशायी करने के मुम्बई महानगरपालिका के काम पर  उच्च न्यायालय ने तत्काल स्थगन दे दिया था और उसके बाद गत दिवस उसे पूरी तरह अवैध बताते हुए  दोबारा निर्माण की अनुमति के साथ ही सर्वेयर नियुक्त करते हुए क्षतिपूर्ति का आदेश भी दिया | लेकिन इससे आगे बढकर न्यायालय ने तोड़फोड़ की कार्रवाई को दुर्भावना से प्रेरित बताकर एक नए मुद्दे को जन्म दे दिया | इसके बाद ये सवाल उठ  खड़े हुए हैं कि बिना राज्य सरकार के संरक्षण के क्या  महानगरपलिका के अधिकारी इस तरह की दबंगी दिखा सकते थे और अब क्षतिपूर्ति की जो राशि तय होगी उसके भुगतान का दायित्व किसका होगा ? दूसरा मामला अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी का था | कुछ साल पहले हुई एक आत्महत्या के सिलसिले में उनकी गिरफ्तारी कर उन्हें जेल भेज दिया गया | उस प्रकरण का पहले ही खात्मा किया जा चुका था | ऐसे में अर्नब की गिरफ्तारी पर निचली अदालत ने प्रथम दृष्ट्या ही आपत्ति जताई और पुलिस रिमांड की मंजूरी नहीं दी | अर्नब ने जमानत  के लिए उच्च न्यायालय में अर्जी दी लेकिन उसने भी टरकाऊ रवैया दिखाया जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें पहले अंतरिम और अब स्थायी जमानत प्रदान कर दी जो एक साधारण प्रक्रिया है | लेकिन यहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की उपेक्षा करने के लिए मुम्बई उच्च न्यायालय के विरुद्ध जिस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणियाँ कीं वे न सिर्फ कानून अपितु शासन और प्रशासन के स्तर पर भी विचारणीय हैं |  कंगना और अर्नब दोनों के प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति न रखते हुए भी  ये कहना गलत न होगा कि  दोनों प्रकरण नागरिक अधिकारों के साथ ही शासन और प्रशासन की स्वेच्छाचारिता  के सामने आम नागरिक की लाचारी के नए प्रमाण बन गये हैं |  उच्च और सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हीं विषयों पर अपने फैसले को केन्द्रित रखा है | कंगना और अर्नब दोनों विशिष्ट हैसियत रखते हैं | साधन संपन्न होने के साथ ही उन्हें परदे के पीछे से ही सही किन्तु एक  खेमे का राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त था | कंगना के कार्यालय को अवैध निर्माण बताकर  धराशायी करते समय उच्च न्यायालय ने मुम्बई महानगरपालिका से ये  सवाल पूछा भी था कि मुम्बई में हजारों अवैध  निर्माणों की जानकारी होने के बावजूद केवल कंगना के कार्यालय पर बुलडोजर चलाना क्या प्रशासनिक गुंडागर्दी नहीं थी ? इसी तरह जब अर्नब को सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम जमानत दी तब भी  ये सवाल देश  भर में उठा कि जमानत के हजारों विचाराधीन प्रकरणों के लम्बित रहते हुए उन्हें फटाफट जमानत कैसे दी दी गई ? अपने फैसले में इस मुद्दे पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए निचली अदालतों के रवैये पर ऐतराज जताया   लेकिन उसने मुख्य रूप से इस बात की आलोचना की है कि उच्च न्यायालय और निचली  अदालतें ऐसे मामलों में कानूनी पहलुओं की उपेक्षा करते हुए अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन से बचती हैं | सर्वोच्च न्यायालय ने अर्नब की  गिरफ्तारी के अपर्याप्त आधार को नजरंदाज किये जाने पर जो नाराजगी व्यक्त की वह निश्चित रूप से आम आदमी को न्याय मिलने में होने वाले विलम्ब और कदम - कदम पर आने वाली अड़चनों की ओर ध्यानाकर्षण है | इसीलिये कंगना और अर्नब दोनों के मामलों  में उच्च और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए ताजा फैसले पूरे देश की कानूनी प्रक्रिया के लिए एक सुझाव और सन्देश हैं | भारत में प्रजातन्त्र जिस तरह से प्रशासनिक निरंकुशता और न्यायपालिका की मंथर गति के शिकंजे में फंसकर रह गया है उससे आम जनता के मन में गुस्से के साथ निराशा भी है जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने शब्द तो दिए हैं लेकिन जब तक पूरी व्यवस्था अपने दायित्वबोध के प्रति जागरूक और ईमानदार नहीं होगी तब तक बुलडोजर और खाकी वर्दी की मनमर्जी के आगे हम भारत के लोग असहाय बने  रहेंगे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी