Saturday, 12 December 2020

शेर की सवारी करने की गलती कर बैठे किसान नेता



किसान आन्दोलन को एक पखवाड़े से ज्यादा बीत जाने के बाद भी गतिरोध जस का तस बना हुआ है। सरकार के साथ वार्ताओं का सिलसिला भी टूट चुका है । शुरू में किसान कुछ संशोधनों के साथ समझौते के लिए तैयार दिख रहे थे लेकिन बाद में किसान संगठनों ने कानून वापिसी की जिद पकड़ ली। उसके अलावा एमएसपी को कानूनी रूप देने की मांग भी जोड़ दी। शुरु में लग रहा था कि किसान नेताओं द्वारा अतिरिक्त मांगें सौदेबाजी का जरिया थीं लेकिन ज्यों-ज्यों बातचीत का दौर आगे बढ़ा त्यों-त्यों ये महसूस होने लगा कि किसान संगठन सरकार को मजबूर मानकर चौतरफा दबाव बनाने की रणनीति पर चल रहे थे। सरकार ने शुरू में  झुकने का पूरा-पूरा संकेत दिया लेकिन जब उसे लगा कि किसानों का नेतृत्व  करने वाले हठधर्मी पर उतारू हो रहे हैं तो उसने भी चतुराई के साथ चालाकी से पेश आना शुरू कर दिया। प्रधानमन्त्री ने भले ही किसान नेताओं से रूबरू बात न की हो लेकिन उन्होंने अनेक मंचों से ये ऐलान किया कि न तो एमएसपी खत्म होगी और न ही कृषि उपज मंडी बंद की जावेंगी। विवाद की स्थिति में अदालत जाने की सुविधा, व्यापारियों का पंजीयन जैसे अनेक  मुद्दों पर भी सरकार समुचित संशोधन करने को राजी हो गई थी। जब उसे लगा कि किसान संगठन मंत्री द्वय नरेंद्र सिंह तोमर और पीयूष गोयल के मनाने से नहीं  मान रहे तब गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभालते हुए किसान नेताओं को बुलाकर बातचीत की और आश्वासन दिया कि सरकार जो कह रही हुई उस पर उन्हें विश्वास करना चाहिए। गृह मंत्री का वार्ता करने आना एक तरह से प्रधानमन्त्री की अप्रत्यक्ष मौजूदगी ही मानी जानी चाहिए थी।  लेकिन ऐसा लगता है किसान नेताओं को अपनी शक्ति का कुछ ज्यादा गुमान हो चला और उन्होंने गृह मंत्री के आश्वासनों को भी सिरे से ख़ारिज कर दिया । उसके बाद से ही सरकार ने भी सौजन्यता की बजाय बेरुखी दिखाते हुए  हमलावर रुख अपनाया। कृषि मंत्री द्वारा दिल्ली दंगों  के आरोपियों के पक्ष में पोस्टर दिखाए जाने का मामला उठाते हुए सवाल दाग दिया कि किसान आन्दोलन में इसका क्या काम? धरना स्थल पर खाने-पीने के बढ़िया इंतजाम के बाद सुख सुविधा के जो साधन जुटाए गए उनकी जानकारी जैसे-जैसे बाहर आती जा रही है वैसे-वैसे देश भर में न सिर्फ जनता अपितु किसानों के बीच भी ये चर्चा चल पड़ी है कि उनके नाम पर कुछ अज्ञात लोग अपना स्वार्थ साधने में जुटे हुए हैं। जब किसानों को लगा कि दिल्ली की चौखट पर जमे रहने से वे ख़ास दबाव नहीं  बना पा रहे तो उन्होंने आज से टोल नाके मुफ्त करने और 14 तारीख से रेल रोकने जैसे तरीके आजमाने की धमकी दे डाली। साथ ही कुछ और राजमार्ग अवरुद्ध करने का ऐलान भी कर दिया। पंजाब से  तीस हजार किसानों का  जत्था दिल्ली कूच करने की खबर भी आ रही है। इधर दिल्ली में धरना दे रहे किसानों में 11 की मौत हो चुकी है तथा गिरते तापमान के कारण सैकड़ों के बीमार होने की जानकारी सामने आई है। कृषि मंत्री ने इसके बाद किसान संगठनों से एक बार फिर धरना खत्म करने और बातचीत जारी रखने की अपील की किन्तु वे क़ानून रद्द करने के साथ ही अपनी बाकी मांगें पूरी किये बिना कुछ भी सुनने तैयार नहीं हैं। ऐसे में ये साफ़ है कि आन्दोलनकारियों के पास लड़ने के तौर-तरीके सीमित हो चले हैं। धरनास्थल पर बैठे किसान कहें कुछ भी लेकिन बिना  किसी खास उपलब्धि के उन्हें निठल्ला बिठाये रखना लम्बे समय तक संभव नहीं होगा। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी के बाद से उत्तर भारत का मौसम सर्द होने लगा है। ऐसे में हजारों लोगों का खुले क्षेत्र में रहना खतरे से खाली नहीं है।आन्दोलनकारी किसानों के बीच बुजुर्ग और महिलाएं भी हैं। बेहतर होगा उनको घर वापिस भेजा जावे जिससे उनकी जान सुरक्षित रह सके। लेकिन पहले से बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेता शेर की सवारी करने वाली स्थिति में आ गये हैं जिस पर  न तो ज्यादा देर बैठा रहा जा सकता है वहीं उतरना भी खतरे से खाली नहीं है। टोल नाके को फ्री कर देने से तो वहां से गुजरने वाले खुश हो जायेंगे लेकिन रेल रोकने का जनता पर विपरीत असर होगा। रेलवे ने पंजाब जाने वाली तमाम अनेक गाड़ियां इसी के चलते रद्द कर दीं। यदि आन्दोलन तेज हुआ तब ये संख्या बढ़ाई भी जा सकती हैं। इस सबसे अलग हटकर यक्ष प्रश्न है कि आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले किसान नेता जिन प्रदेशों से आते हैं उनमें पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से नजदीकी उप्र के पश्चिमी हिस्से के किसानों को छोड़ दें तो बाकी से आन्दोलन में हिस्सेदारी करने वालों की संख्या नगण्य है और अब तक ऐसा  कोई संकेत नहीं मिला जिससे ये लगता कि दिल्ली से दूरी पर स्थित राज्यों में भी किसान आन्दोलन की हलचल हो। केंद्र सरकार ने आन्दोलन के इस कमजोर पक्ष को ठीक तरह से समझ लिया है और इसीलिये वह भी उपेक्षा भाव दर्शाने लगी है। ये कहने में कुछ भी गलत न होगा कि किसान संगठनों ने केवल पंजाब के किसानों की मांगों को प्रतिष्ठा का विषय बनाते हुए उन्हें पूरे देश की किसानों की आवाज मानने की  जो गलती की उसकी वजह से  आन्दोलन पटरी से उतर जाये तो अचरज नहीं  होगा। बेहतर हो किसान नेता व्यर्थ की अकड़ छोड़कर व्यवहारिक सोच को अपनाएं। कूटनीति में प्रयुक्त होने वाली इस उक्ति पर उन्हें अमल  करना चाहिए कि बहादुरी का एक तरीका होशियारी भी होता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 11 December 2020

सरकार प्रायोजित हिंसा के विरुद्ध लड़कर ही तो ममता सत्ता में आईं थीं




बंगाल  की राजनीति में सत्ताधारी दल की  हिंसा नई बात नहीं है | वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने वाम मोर्चे की सरकार द्वारा प्रायोजित हिंसा के विरुद्ध बरसों तक मोर्चा सम्भाला | वामपंथी गुंडों के हमलों में वे अनेक बार घायल भी हुईं | वामपंथियों के प्रति  शीर्ष नेतृत्व के  नरम रवैये से ममता बेहद नाराज थीं   और अंततः कांग्रेस को साम्यवादियों की बी टीम बताते हुए उन्होंने तृणमूल कांग्रेस नामक अपनी  पार्टी बना ली | ज्योति बसु के सत्ता छोड़ने के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में जरूर वे  कुछ खास नहीं कर सकीं लेकिन बंगाल के जनमानस पर  ये छाप छोड़ने में पूरी तरह सफल हो गईं कि वामपंथी अराजकता से मुक्ति दिलाने में वही सक्षम हैं और इसी का नतीजा आगामी   चुनाव में देखने मिला जब उन्होंने लगभग अजेय मान लिए गये मार्क्सवादियों के लाल किले को धराशायी करते हुए सत्ता पर कब्जा कर लिया | इसके पहले वे कभी एनडीए तो कभी यूपीए और  तीसरे मोर्चे के साथ गठबंधन में रहीं किन्तु अपने विशिष्ट स्वभाव के कारण ज्यादा दिन उनकी किसी से नहीं बनी | उनकी सादगी और आम जनता जैसी जीवन शैली के कारण बंगाल के मतदाताओं का उनमें विश्वास जागा | बंगाल से वामपंथियों को उखाड़ फेंकने का कारनामा न इंदिरा गांधी कर सकीं और न ही अटल बिहारी वाजपेयी |  ये कहना गलत नहीं कि बंगाल की शेरनी का खिताब ममता को यदि मिला तो ये उनकी  स्वअर्जित उपलब्धि थी | लेकिन ऐसा लगता है सत्ता में आने के बाद वे या तो असावधान हो गईं या फिर उसके मद में डूब गईं | उनकी ईमानदार छवि को भ्रष्टाचार के अनेक मामलों ने धूमिल कर दिया | लेकिन इससे भी बड़ी गलती उनसे हुई वामपंथी सरकार के दौर के गुंडा तत्वों को तृणमूल कांगेस में भर्ती करने की | निश्चित रूप से इसके कारण ममता पूरे बंगाल में जबरदस्त राजनीतिक  ताकत बन गईं |  शहरी मध्यम वर्ग के साथ ही  ग्रामीण क्षेत्रों में भी तृणमूल का जनाधार बढ़ाने के पीछे सुश्री बैनर्जी की जुझारू और साफ़ सुथरी छवि के साथ ही वाममोर्चे के साथ जुड़े रहे वे असामाजिक  तत्व भी रहे जिनके आतंक की वजह से सत्ता का विरोध करने की हिम्मत किसी की नहीं होती | बंगाल में वामपंथी  और कांग्रेस मिलकर भी उनके प्रवाह  को रोकने में नाकामयाब  साबित हो रहे थे | लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के उदय के बाद से भाजपा ने  उसी तरह से बंगाल में ममता बैनर्जी के आधिपत्य को चुनौती देने का साहस दिखाया जैसा  कभी वे खुद किया करती थीं | 2014 के लोकसभा और उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ज्यादा कुछ तो नहीं कर सकी किन्तु उसने ये साबित कर दिया कि ममता का विकल्प बनने की क्षमता  उसी में है | बंगाल के स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव  के अलावा हुए उपचुनावों में भी भाजपा  तृणमूल की निकटतम प्रतिद्वंदी बनकर उभरी | हालाँकि जीत का अंतर काफी रहा | लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव आते तक वह ममता को टक्कर देने की स्थिति में आ गयी और 16 सीटें जीतकर अपना दमखम दिखा दिया | उसके बाद से ममता भाजपा के विरुद्ध बेहद आक्रामक हो गईं | मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियों का कांग्रेस और वामपंथी तो विरोध नहीं कर सके लेकिन भाजपा चूँकि इस मुद्दे पर खुलकर सामने आई इसलिए बंगाल  की जनता में उसके प्रति रुझान बढ़ता दिखाई देने लगा | अमित शाह भले पार्टी अध्यक्ष न रहे हों लेकिन वे बंगाल की चुनौती के प्रति गम्भीर हैं | यही वजह है कि बीते कुछ महीनों में राज्य में राजनीतिक हिंसा चरम पर पहुंच गई है | हालाँकि उसका शिकार कांग्रेस और वामपंथी भी हुए हैं  लेकिन सबसे ज्यादा हमले भाजपा और रास्वसंघ के कार्यकर्ताओं पर होने से ये साफ़ हो गया है कि सुश्री बैनर्जी भी ये मान बैठी हैं कि पिछले लोकसभा  चुनाव में भाजपा की सफलता तुक्का नहीं थी और पूरे राज्य में उसकी  जड़ें फैल चुकी  हैं | गत दिवस भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा और प्रभारी महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय पर हुए पथराव से ये साबित हो गया कि तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह अपनी पूर्ववर्ती वामपन्थी सरकार के नक़्शे कदम पर चलते हुए राजनीतिक विरोधियों के दमन पर उतारू है | हालाँकि कांग्रेस और वामपंथियों ने विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन कर रखा है लेकिन ममता को ये एहसास हो चला है कि उनका मुख्य मुकाबला भाजपा से ही है | गत दिवस की हिंसात्मक घटना के बाद सुश्री बैनर्जी ने जिस लहजे में  प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा  का मजाक उड़ाया उससे ये पता चल जाता है कि मुख्यमंत्री रहते भी वे कितनी गैरजिम्मेदार हैं | उनकी  खीझ इस बात  पर भी है कि तृणमूल के तमाम बड़े नेता और उनकी सरकार के मंत्री लगातार पार्टी छोडकर  भाजपा में शामिल हो रहे हैं | राजनीति में वैचारिक विरोधी को शत्रु मानकर रास्ते से हटा देने की नीति साम्यवादियों से तो अपेक्षित रहती है | आजकल केरल में इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है किन्तु सत्ता  में आने से पूर्व तक  ममता का समूचा राजनीतिक सफर तो इसी तानशाही के विरुद्ध रहा | ऐसे में वे भी उसी तरह का व्यवहार करने लगें तो ये देखकर हैरानी होती है | बंगाल के अलावा असम , त्रिपुरा , मणिपुर , अरुणाचल आदि में भाजपा की सरकार बनने से पूर्वोत्तर में उसका जो दबदबा कायम हुआ उसके कारण बंगाल में भी उसकी संभावनाएं प्रबल होती लग रही हैं | बिहार विधानसभा चुनाव के हालिया नतीजों के बाद हैदराबाद महानगरपालिका के चुनाव में  मिली सफलता से भाजपा का  उत्साह भी ऊंचाई पर है | गत दिवस हुई घटना के बाद भाजपा और आक्रामक होकर मैदान में उतरेगी ये तय है |  लेकिन राजनीति से अलग हटकर देखें तो चुनाव पूर्व हो रही ये  घटनाएँ  चिंता का विषय है | ममता द्वारा अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को बजाय हिंसा से दूर रहने की समझाइश देने के उलटे भाजपा नेताओं के विरुद्ध आंय - बांय बकने से  एक बात तो तय है  कि ममता का आत्मविश्वास डगमगा रहा है | उनके साथी जिस तेजी  से उनका साथ छोड़ रहे हैं  उससे डूबते जहाज से चूहों के कूदने की कहावत चरितार्थ होती दिख रही है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 10 December 2020

खुद को किसान कहने वाले सांसद - विधायक इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे



गत दिवस सरकार द्वारा भेजे गये संशोधन प्रस्तावों को सिरे से ख़ारिज करने के बाद  किसान संगठनों ने देश भर में धरना , प्रदर्शन करने के साथ ही अम्बानी और अडानी के उत्पादनों तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के बहिष्कार की घोषणा के साथ ही  भाजपा नेताओं के घेराव की चेतावनी भी दे डाली | किसान नेताओं को ये बात नागवार गुजर रही है कि सरकार भले ही  कृषि कानूनों में कतिपय सुधार और संशोधनों के लिए राजी हो गई  हो लेकिन उनको रद्द  करने से  उसने साफ़ इंकार कर दिया है और ऐसे  में आन्दोलन को वापिस लेने अथवा उसकी आक्रामकता  कम कर देने से  किसान समुदाय के बीच उनकी  विश्वसनीयता संकट में पड़ जायेगी  | गत दिवस केन्द्रीय मंत्रीपरिषद की बैठक के बाद प्रकाश जावड़ेकर ने पत्रकार वार्ता में सरकार के रवैये को दोहराते हुए आश्वस्त किया कि नये कानूनों को लेकर किसानों को भ्रमित किया गया है | इस प्रकार  सुलह की सम्भावना धूमिल होती नजर आने लगी है |  राजनीतिक नेताओं और पार्टियों को दूर रखने की नीति पर चल रहे किसान संगठनों द्वारा  भाजपा नेताओं का घेराव करने के निर्णय के बाद अब आन्दोलन को राजनीतिक होने से रोकना उनके लिए भी मुश्किल हो जाएगा क्योंकि पंजाब में भले न हो लेकिन हरियाणा , उत्तराखंड , राजस्थान , मप्र , उप्र , गुजरात , छतीसगढ़ जैसे राज्यों में किसानों के बीच भाजपा की भी अच्छी खासी पकड़ है  | इसका ताजातरीन प्रमाण राजस्थान में हुए पंचायत  समितियों तथा जिला परिषद के चुनाव परिणामों में भाजपा को मिली जबरदस्त सफलता है जिसने  ये संकेत तो दे ही दिया कि  आन्दोलन अलग विषय है और किसानों की राजनीतिक प्रतिबद्धता अलग | ऐसे में  भाजपा नेताओं के घेराव जैसे आयोजन हुए तब किसानों के बीच ही इसे लेकर मतभेद उभर सकते हैं जिससे आन्दोलन कमजोर होने की आशंका  बढ़ेगी | बेहतर हो आंदोलनकारी विभिन्न पार्टियों के उन सांसदों और विधायकों का घेराव करते हुए कृषि कानूनों के विरोध  में उनसे स्तीफा देने को कहें जिन्होंने चुनाव नामांकन पत्र में अपना व्यवसाय कृषि दर्शाया था | उल्लेखनीय है खेती की आड़ में काले धन को सफेद करते हुए आयकर बचाने वालों में निर्वाचित्त  जनप्रतिनिधियों की संख्या सैकड़ों में है  | जिस दिल्ली की देहलीज पर किसान धरना दिए बैठे हैं उसके बाहरी इलाकों में दर्जनों सांसदों , मंत्रियों और भूतपूर्व सत्ताधारियों के अनेक  फॉर्म हॉउस हैं जिनकी तुलना किसी पांच सितारा रिसॉर्ट से की जा सकती  है |  खेती करने  का दिखावा करने वाले ऐसे नेताओं से पूछा  जाना चाहिए  कि उनकी राजशाही खेती में अनाप - शनाप कमाई कैसे होती है ? इसलिए  बेहतर होगा आन्दोलन के अगले चरण में किसानों द्वारा उन सांसदों और विधायकों का पर्दाफाश किया जावे जो कृषक होने के नाम पर असली किसान के अधिकारों पर अतिक्रमण कर लेते हैं | ऐसा करने पर उन्हें सही अर्थों में जनसहानुभूति और समर्थन हासिल हो सकेगा जिससे अब तक उनका आंदोलन काफी हद तक वंचित है | दरअसल किसान  संगठनों की सबसे बड़ी मुसीबत ये है कि वे कहने को तो  राजनीतिक दलों से दूरी बनाकर चलने का दावा आकर रहे हैं किन्तु विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल उनके पास आने का अवसर तलाश रहे हैं | गत दिवस राष्ट्रपति से पांच विपक्षी नेताओं की मुलाकात इसका प्रमाण है | वैसे भी योगेन्द्र यादव जैसे लोग जिस तरह से आन्दोलनकारियों के अघोषित सलाहकार बने हुए हैं उसके बाद किसान संगठनों का राजनीतिक दलों से परहेज गले नहीं उतरता क्योंकि श्री यादव का एजेंडा सर्वविदित है | यदि किसान संगठन अपने आन्दोलन को सही मायनों में गैर राजनीतिक साबित करना चाहते हैं तो उन्हें उन सभी सांसदों और विधायकों पर इस्तीफे का दबाव बनाना चाहिए जो खुद को किसान कहकर ग्रामीण जनता के वोट तो बटोरते हैं लेकिन किसानों के घावों पर मरहम लगाने में उनकी कोई रूचि नहीं है | अभी तक जो देखने मिला उसमें अकाली नेता  प्रकाश सिंह बादल द्वारा पद्म पुरस्कार के अलावा कुछ साहित्यकारों , कलाकारों और खिलाड़ियों ने उन्हें मिले सम्मान और पुरस्कार लौटने का ऐलान करते हुए खुद को किसानों का हमदर्द साबित करने का दांव चला है |  लेकिन खुद को किसान कहने वाले एक भी सांसद और विधायक ने इस  आन्दोलन के समर्थन में  अपनी सदस्यता छोड़ना तो दूर रहा उसकी धमकी तक नहीं दी | किसान संगठनों को ऐसे जनप्रतिनिधियों की खबर लेते हुए उन पर इस्तीफे का दबाव बनाना चाहिए | ऐसा करने से पता चल जावेगा कि वे असली किसान हैं या दिखावटी ?  किसान आन्दोलन अब ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है जहां ज़रा सा दिशाभ्रम उसे भटकाव के ऐसे रास्ते पर लाकर खड़ा कर  देगा जहां से न आगे बढना संभव होगा  और न पीछे लौटना | 

-रवीन्द्र वाजपेयी



Wednesday, 9 December 2020

बंद के बाद आन्दोलन को लम्बा खींचना मुश्किल होगा



गत दिवस नए कृषि कानूनों के विरोध में आयोजित भारत बंद सफल रहा या नहीं इस बहस में पड़े बिना अब देखने वाली बात ये होगी कि इसके बाद आन्दोलनकारी किसानों और सरकार के बीच चल रही रस्साकशी कहाँ जाकर रुकती है | सबसे रोचक बात ये रही कि जो किसान नेता हाँ या न के अलावा कुछ और सुनने से इंकार कर रहे थे वे बंद के बाद ही केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बुलावे पर उनसे बातचीत करने जा पहुंचे | हालाँकि कोई समाधान नहीं निकला और  आज की वार्ता रद्द होने की बात भी सामने आ गई | लेकिन सरकारी सूत्रों से छन - छनकर आ रही खबरों के अनुसार आज की  कैबिनेट बैठक में  कुछ न कुछ  ऐसा कर दिया जावेगा जिसके बाद आम किसान के साथ ही जनता के बीच ये एहसास जाये कि सरकार ने अपनी तरफ से तो लचीला रुख दिखा दिया लेकिन किसान  नेता हठधर्मी दिखा रहे हैं | हालांकि पिछली सभी बैठकों  में सरकार की ओर से लगातार ये कहा गया कि वह किसानों की मांगों के अनुरूप कानूनों में संशोधन हेतु राजी है और जैसा बताया जाता है किसान नेता भी इससे सहमत हो रहे थे लेकिन बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनकर घुस आये कुछ तत्वों ने कानून वापिस लेने की जिद पकड़ ली जिससे  समझौते के संभावित रास्ते धीरे - धीरे बंद होते गए | ये बात भी चौंकाने वाली रही कि जब वार्ता पूरी तरह बंद नहीं हुई और 9 तारीख को उसका अगला दौर निश्चित हो चुका था तब उसके एक दिन पहले भारत बंद के आह्वान का क्या औचित्य था ? कल दोपहर तक सरकार ने ये  देख लिया कि बंद  को देश के बाकी हिस्सों में वैसा समर्थन नहीं मिला जैसा आन्दोलनकारियों को उम्मीद थी | शहरी इलाकों में जहां जबर्दस्ती बंद करवाने की कोशिश हुई उनको छोड़कर ग्रामीण क्षेत्र तक उससे अछूते रह गये | यहाँ तक कि  दिल्ली तक में बंद का असर न के बराबर दिखा जबकि आम आदमी पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने उसको समर्थन दे दिया था | बंगाल में ममता बैनर्जी की पार्टी ने किसानों का पक्ष लेने  के बाद भी बंद का समर्थन नहीं किया | कांग्रेस और विपक्ष शासित दूसरे राज्यों में भी वह  महज औपचारिकता बनकर रह गया | किसान नेता कुछ भी कहते रहें लेकिन कल के बाद ये बात स्पष्ट हो चली है कि वे आंदोलन को पंजाब और हरियाणा के बाहर व्यापक रूप नहीं  दे सके | उन्हें राजस्थान और उप्र से जैसे समर्थन की उम्मीद रही  वह पूरी नहीं  हो सकी जिसके कारण राजनीतिक दबाव बनाने में ये आंदोलन अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पा रहा | और अब  आन्दोलन की मांगों से ज्यादा धरना स्थल पर किये गए बेहतरीन इंतजामों की चर्चा शुरू हो गई है जिससे  वह इवेंट मैनेजमेंट के विद्यार्थियों  के लिए अध्ययन का विषय बनता जा रहा है  | शानदार प्रबंध और आन्दोलन का शांतिपूर्ण बना रहना निश्चित रूप से काबिले तारीफ़ है  लेकिन काजू - बादाम के साथ ही आन्दोलनकारियों की सुख - सुविधा के लिए किये गये प्रबंधों का जिस तरह से प्रचार हो रहा है उससे देश भर में फैले छोटे किसानों  के साथ ही आम जनता में भी ये धारणा तेजी से घर करती जा रही है कि ये आन्दोलन  पंजाब और सम्पन्न किसानों का है | और देर सवेर  यही बात प. उत्तर प्रदेश के किसान नेता राकेश टिकैत और उन जैसे अन्य किसान संगठनों को हजम नहीं होगी | अमित शाह से मिलने के बाद श्री टिकैत का ये कहना कि बातचीत सकारात्मक रही , बेहद महत्वपूर्ण है | जैसी कि जानकारी मिली है उसके अनुसार सरकार  केन्द्रीय मंत्रीमंडल आज की  बैठक के बाद किसान संगठनों को कृषि कानूनों में कतिपय संशोधनों के साथ सुलह प्रस्ताव भेजेगी   | हालाँकि श्री टिकैत ने कल भी ये दोहराया कि कानून वापिस लिए बिना बात नहीं बनेगी लेकिन सरकार से जुड़े सूत्रों के अनुसार उसे ये एहसास हो गया है कि यदि एमएसपी , मंडी और कान्ट्रेक्ट फार्मिंग जैसे मुद्दों पर  किसानों की आशंकाओं को दूर कर दिया जाये तब आन्दोलन केवल पंजाब और कुछ हद तक हरियाणा में ही सिमटकर रह जाएगा | ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि बंद जैसे ब्रह्मास्त्र का जल्दबाजी में उपयोग करने के बाद भी यदि जीत हासिल न हो सकी तब आखिर कब तक किसान दिल्ली के दरवाजे पर बैठे रहेंगे ?  किसान संगठन भले ही   लंबी तैयारी के दावे करते रहे हों लेकिन ज्यों - ज्यों फसल का समय आने लगेगा त्यों - त्यों किसानों में बेचैनी बढ़ेगी |  सरकार ये समझ गई है कि देश के बहुसंख्यक किसान नये कानूनों को लेकर उदासीन हैं क्योंकि उन्हें इनसे किसी नुकसान की सम्भावना नहीं है | अब जैसा कृषि मंत्री पिछली बैठकों में संकेत देते आये हैं यदि वैसे ही सुधार और संशोधनों के साथ सरकार आगे बढ़ गई तब किसानों के लिए आंदोलन को आगे खींचना कठिन होगा और बड़ी बात नहीं वह  शाहीन बाग़ की तरह से ही विवाद और आलोचना का विषय बनकर रह जाए | आंदोलनकारियों की सभी  मांगें नाजायज कदापि नहीं हैं | पंजाब और हरियाणा के किसानों  ने खाद्यान्न के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने में ऐतिहासिक योगदान दिया है लेकिन प्रतिस्पर्धा के इस युग में वे अपना एकाधिकार बनाकर समूची व्यवस्था पर  नियन्त्रण करने की सोचें तो वह अव्यवहारिक होगा | बेहतर होगा वे सरकार द्वारा दिए गए प्रस्तावों को सिरे से ख़ारिज करने की बजाय उन पर विश्वास करें क्योंकि आन्दोलन का प्रबन्धन कितना भी अच्छा क्यों न हो लेकिन उसकी तीव्रता एक जैसी नहीं रह पायेगी |  किसान संगठनों के सामने ये दुविधा है कि कानून रद्द करवाए बिना आन्दोलन वापिस लेने पर उनकी नाक कट जायेगी लेकिन अगर सरकार ने एकपक्षीय फैसले लेकर बातचीत बंद कर दी तब किसान संगठन अजीबोगरीब स्थिति  में फंस जायेंगे और उनमें बिखराव आने की  संभावना बढ़ जायेगी | कल के बंद के बाद किसान नेताओं को भी ये समझना चाहिए कि राजनीतिक दल केवल अपने फायदे के लिए उनके साथ खड़े होने का दिखावा कर रहे हैं | जिस पल उन्हें महसूस होगा कि ये  आंदोलन उनके लिए बोझ बनने लगा है उसी समय वे पल्ला झाड़कर दूर बैठ जायेंगे | सीएए के आन्दोलन में मुसलमानों को सड़कों पर बिठाकर वे जिस तरह दूर जा बैठे वह ज्यादा  पुरानी बात नहीं है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 December 2020

बच्चों की मौत बीमारू राज्य के प्रमाणपत्र का नवीनीकरण



हाल ही में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वैक्सीन संबंधी घोषणा करते हुए भारत द्वारा इस महामारी के विरुद्ध लड़ी गई लड़ाई में प्राप्त सफलता का बखान किया था | उनकी बात में सच्चाई भी है  क्योंकि विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले हमारे देश में सरकारी  चिकित्सा सेवाओं की दयनीय हालत देखते हुए इस बात की प्रबल आशंका थी कि कोरोना महामारी  की स्थिति में पहुंच जायेगा जिसके कारण बड़ी संख्या में  मौतें होंगी | लेकिन  जैसे संकेत मिल रहे  हैं उनके अनुसार भारत इस अनजान और अप्रत्याशित संकट से कम से कम नुक्सान के साथ बाहर आने में सफल दिखाई दे रहा है | यद्यपि अभी संक्रमण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ लेकिन उसकी तीव्रता में कमी आने से ये लग रहा है कि दूसरी लहर उतनी प्रभावशाली नहीं हुई जितना उसे लेकर डर था | और अब तो वैक्सीन भी आने को तैयार है | ऐसे में ये कहा जा सकता है कि हम कोरोना पर जीत हासिल करने के काफी  करीब आ चुके हैं | पूरी दुनिया में इस बात को लेकर भारत की प्रशंसा हो रही है | प्रारम्भिक अफरातफरी के बाद आपात्कालीन चिकित्सा प्रबंध जिस तेजी से किये गये वे भारतीय हालातों में किसी चमत्कार से कम न थे | इस क्षेत्र के जानकार ये मान रहे हैं कि कोरोना संकट ने भारत में चिकित्सा सेवाओं के विस्तार और सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया और उस कारण हमारे आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई है लेकिन इसी बीच मप्र के शहडोल जिले के सरकारी जिला अस्पताल में छोटे बच्चों की मौत की घटना होने से हड़कम्प मच गया | बीते कुछ ही दिनों में 14 बच्चे चल बसे | राजधानी भोपाल तक इसे लेकर हलचल है | सरकारी कर्मकांड के अनुसार अनेक लोगों को निलम्बित कर दिया गया | स्वास्थ्य विभाग के आला अफसरों के बाद आज प्रदेश के  स्वास्थ्य मंत्री भी उक्त अस्पताल का दौरा कर रहे हैं | उनके वहां जाने का असर ये होगा कि अस्पताल साफ़ - सुथरा हो जाएगा | मरीजों के बिस्तर पर धुली हुई चादर नजर आयेगी | चिकित्सक और नर्सिंग स्टाफ समय से आकर अपने काम में जुट जाएगा | मरीजों को समय से दवाइयों के साथ ही बाकी सुविधाएं  मिल जायेंगी और उनसे अच्छा व्यवहार भी  किया जावेगा | मंत्री जी भी  सहानुभूति के टोकरे उड़ेल देंगे | जिन परिवारों के नौनिहाल सस्ते में चल बसे उनको कुछ सहायता देकर गुस्सा  ठंडा कर  दिया जाएगा | मुख्यमंत्री जी की चिंता को सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करते हुए जिला  अस्पताल के उन्नयन हेतु अतिरिक्त बजट तथा उपकरण भी स्वीकृत कर दिए जाएंगे | स्थानीय  जनप्रतिनिधि मंत्री जी के सान्निध्य में अपनी जागरूकता और सक्रियता का प्रदर्शन करेंगे और फिर दिन भर के तमाशे के बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा | बच्चे किसी बीमारी से मौत के मुंह में गए या अस्पताल की लापरवाही से , ये पता लगाने की जहमत उठाये बिना बीती ताहि बिसार दे , आगे की सुधि लेय वाली उक्ति का पालन करते हुए किसी नए हादसे के होते ही सभी का ध्यान उस ओर चला जाएगा | हमारे देश के लिए ये कोई नई बात  नहीं है | जनता भी चूँकि जबरदस्त सहनशील है इसलिए नेता और नौकरशाह भी चिंता नहीं करते | यही वजह है कि इंसानी ज़िन्दगी हमारे देश में रस्ते का माल सस्ते में होकर रह गई है | शहडोल में तो अब तक गनीमत है 14 बच्चों की ही मौत हुई लेकिन बीते साल पटना और उसके पूर्व उप्र के गोरखपुर में दर्जनों बच्चे किसी अज्ञात बीमारी से चल बसे | दुर्भाग्य की बात ये है कि ऐसे हादसे साल दर  साल दोहराये जाते हैं लेकिन स्थायी निदान के बारे में कोई नहीं सोचता | इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में चिकित्सा सेवाओं का विकास और विस्तार दोनों हुए हैं | गम्भीर से गम्भीर बीमारियों तक का इलाज होने लगा है | यूरोपीय देशों की तुलना में सस्ता होने से बड़ी संख्या में विदेशी यहाँ इलाज हेतु आने लगे हैं जिसकी वजह से मेडिकल टूरिज्म विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत बनने लगा है । लेकिन बतौर विरोधाभास राजधानी एवं बड़े शहरों को छोड़कर ज्योंहीं बात जिला , तहसील और कस्बों की आती है त्योंही चिकित्सा व्यवस्था की दरिद्रता सामने आने लगती है | शहडोल जैसी अनेक घटनाएँ देश के किसी न किसी भाग में आये दिन होती रहती हैं | सूचना क्रांति की वजह से उनकी जानकारी प्रसारित भी हो जाती है लेकिन उन्हें रोकने के प्रति सरकारी स्तर पर जो लापरवाही भरा रवैया होता है वह शर्मनाक ही नहीं घोर अमानवीय भी है | हमारे जनप्रतिनिधियों को तो भूतपूर्व होने के बाद तक मुफ्त और महंगे से महंगा इलाज उपलब्ध है | देश में संभव न हो तो विदेश में महीनों रहकर जनता के पैसे से करोड़ों उन पर खर्च कर दिए जाते हैं लेकिन उन्हें सड़क से उठाकर संसद और विधानसभा पहुँचाने वाली आम जनता को कुत्ते के काटने पर लगने वाला इंजेक्शन तक अपने पैसे से खरीदकर लाना पड़ता है | प्रधानमन्त्री द्वारा कोरोना संक्रमण पर भारत की जीत का जो गौरवगान किया गया उससे किसी को ऐतराज या असहमति नहीं है किन्तु समय आ गया है जब कतार के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को भी वीआईपी न सही लेकिन साधारण स्तर की  प्राथमिक चिकित्सा तो उपलब्ध कराई जा सके | मप्र दो दशक पहले तक बीमारू राज्य की श्रेणी में आता था |  लेकिन अब उसके  विकास की राह पर बढ़ने  का दावा होने लगा है | बिजली ,पानी और सड़क जैसी  समस्याओं से वह काफी हद तक उबर चुका है लेकिन सरकारी  चिकित्सा सुविधाओं के बारे में अभी भी स्थिति संतोषजनक नहीं है | शहडोल की घटना से एक बार फिर ये विषय विचारणीय हो चला है लेकिन इसे सस्ते में हवा - हवाई कर देना असंवेदनशीलता का उदाहरण होगा | प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस तरह मप्र को कृषि के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनाया उसी तरह उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र में भी वैसी ही उपलब्धियां अर्जित करने के भगीरथी प्रयास करना चाहिए | ये वाकई शर्म  की बात है कि प्रतिदिन मप्र से सैकड़ों लोग इलाज ही नहीं  जांच तक के लिए नागपुर जाने मजबूर होते हैं | विकास के मापदंडों में चिकित्सा और स्वास्थ्य भी सर्वोच्च प्राथमिकता के विषय होना चाहिए |

- रवीन्द्र वाजपेयी 



Monday, 7 December 2020

लड़ाई में पीछे हटने के रास्ते बंद कर देना हानिकारक होता है



केंद्र सरकार और आन्दोलनकारी किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद समाधान नहीं निकला | अगली बातचीत 9 दिसम्बर को होने वाली है | लेकिन उसके पहले 8 तारीख को भारत बंद का आह्वान कर दिया गया जिसे तकरीबन 20 विपक्षी दलों ने अपना समर्थन भी दे दिया | पिछली बैठक में सरकार ने नए कानूनों में संशोधन की मंशा जताई किन्तु किसानों के नेताओं ने उससे असहमत होते हुए कानून वापिस लेने की जिद ठान  ली और उसके बाद कृषि मंत्री भी  अगली बैठक की तरीख तय करते हुए चले गये | गत दिवस कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी द्वारा दिये गए संकेतों के अनुसार सरकार कानूनों को वापिस लेने की मांग को शायद ही स्वीकार करे किन्तु वह संशोधन के लिए तैयार है | ऐसा लगता है सरकार किसानों के साथ बातचीत की प्रक्रिया को उस हद तक लाना चाहती है जहाँ उस पर ये आरोप न लग सके कि उसने विवाद हल करने के लिए कुछ नहीं किया | कल के बंद के बाद अब किसानों के पास बातचीत करने के लिए क्या बच रहेगा ये बड़ा सवाल है | सरकार के अब तक के रवैये से नहीं लगता कि वह तीनों कानून वापिस लेकर झुकने जैसा एहसास करवायेगी | यदि वह शुरू में ही ऐसा कर लेती तब शायद पराजयबोध से बच जाती लेकिन अब वैसा करना घुटने टेकना होगा , जिसकी उम्मीद बहुत कम है | दूसरी तरफ किसान भी  कानून वापिसी की जिद पकड़कर पीछे लौटने की स्थिति में नहीं रहे | ऐसे में वे संशोधनों पर राजी होकर आन्दोलन वापिस ले लेंगे ये भी संभव नहीं दिखाई देता |  जहाँ तक बंद का सवाल है तो अब इस हथियार में पहले जैसी धार नहीं रही और वह केवल एक दिन की सुर्खी बनकर रह जाता है | जाहिर है गैर भाजपा  शासित राज्यों में सरकार का संरक्षण मिलने से बंद अपेक्षाकृत सफल दिखेगा जबकि भाजपा के कब्जे वाले राज्यों में मिला जुला | यूँ भी आम जनता को इससे लेना देना नहीं है | और रही बात व्यापारी वर्ग की तो शादी सीजन में व्यापार बंद रखना उसे रास नहीं आएगा | लेकिन तोड़फोड़ के डर से वह दुकान बंद कर घर बैठ जाता है | यूँ भी दोपहर के बाद फिर बाजार खुलने लगते हैं | लेकिन परसों किसान संगठनों और सरकार के बीच बातचीत किस मुद्दे पर होगी ये समझ से परे है | यदि कानून वापिस लेने की घोषणा सरकार तब तक नहीं करती तो किसान बैठक में क्या करने जायेंगे ? और बिना क़ानून वापिस हुए आन्दोलन खत्म नहीं करने की जिद दोहराई जाती रही तब  सरकार के पास भी  किसान नेताओं के साथ बैठने की औपचरिकता का औचित्य नहीं रहेगा | ये देखते हुए हो सकता  है कि सरकार ने किसान संगठनों की आपत्तियों के मद्देनजर  नये कानूनों में जिन  संशोधनों पर रजामंदी दिखाई  है उनकी वह इकतरफा घोषणा कर दे | ऐसा करने से किसानों का एक तबका आन्दोलन को सफल मानकर शांत हो सकता है | सरकार ने भी इतने दिनों के भीतर ये तो पता किया ही होगा कि  बजाय कानूनों को वापिस लेने के वह केवल संशोधन का रास्ता  चुनती है तब उसके बाद आन्दोलन पर उसका क्या असर पड़ेगा ? किसान संगठन कहें कुछ भी लेकिन आन्दोलन के नाम पर राजनीतिक रोटी सेंकने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है | और यही उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है |  अभी तक किसान आन्दोलन की हवा से देश का बड़ा हिस्सा अछूता है | ऐसे में सरकार ने एमएसपी , मंडी और कांट्रेक्ट फार्मिंग संबंधी संशोधन कर दिए तब पंजाब - हरियाणा  के अलावा बाकी राज्यों के बहुसंख्यक किसान संतुष्ट हो सकते हैं | वैसे भी उन्हें नए  कानूनों से कुछ लेने देना है नहीं | ये सब देखते हुए अब सबकी निगाहें कल के बंद और उसके बाद 9 दिसम्बर की वार्ता पर लगी रहेंगी | चूंकि किसान संगठनों की तरफ से बीच का रास्ता निकालने की सम्भावनाएं पूरी तरह खत्म कर दी गईं हैं इसलिए बड़ी बात नहीं परसों के  बाद संवादहीनता के हालात बन जाएँ और ऐसे में आन्दोलन अनियंत्रित  होने का खतरा बढ़ जाएगा | सरकार ने अब तक जिस तरह का रवैया अपनाया हुआ है उससे लगता है वह   किसान संगठनों की हठधर्मिता को जिम्मेदार ठहराकर ये सन्देश देना  चाह रही है कि वह तो समझौता चाहती थी किन्तु किसान नेताओं ने उसमें अड़ंगेबाजी की | वैसे भी  किसी  लड़ाई  में हमेशा आक्रामक नहीं रहा जा सकता | कभी - कभी पीछे हटकर भी लड़ाई जीती जा सकती है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 December 2020

वैक्सीन के बाद भी एक वर्ष तक सावधानी जरूरी



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गत दिवस सर्वदलीय बैठक में कोरोना वैक्सीन के कुछ हफ्तों में आने की  जानकारी देते हुए आश्वस्त  किया कि प्राथमिकता के आधार पर टीकाकरण किये जाने की तैयारी प्रशासनिक स्तर पर की जा चुकी है | इस कार्य में राज्यों के साथ समन्वय स्थापित कर सबसे  पहले एक करोड़ स्वास्थ्यकर्मी और उसके बाद तकरीबन दो करोड़  मैदानी  कार्यकर्ताओं को वैक्सीन उपलब्ध  करवाई जावेगी जिनमें पुलिस , सुरक्षाबल  और निकाय कर्मी मुख्य रूप से होंगे | उसके बाद अति बुजुर्गों और वरिष्ठ नागरिकों का क्रम आयेगा | प्रधानमन्त्री ने विस्तार से बात करते हुए कहा कि वैक्सीन की कीमत को लेकर राज्यों के साथ चर्चा उपरान्त ही निर्णय किया जावेगा | उन्होंने कोरोना  संक्रमण से लडाई में भारत की सफलता का ब्यौरा  देते हुए बताया कि बड़े पैमाने पर  जांच किये जाने से संक्रमण को महामारी में बदलने में सफलता हासिल हुई | वैश्विक अनुपात में मृत्यु  दर कम रहने को भी उन्होंने उपलब्धि बताया | भारत द्वारा कोरोना के सामुदायिक फैलाव को रोकने के लिए जो उपाय किये गए उन पर हर्ष  व्यक्त करते हुए श्री मोदी ने भारत में वैक्सीन का विकास करने में जुटे वैज्ञानिकों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके प्रयासों की सफलता पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं क्योंकि किफायती दामों पर वैक्सीन  उत्पादन में भारत विश्व का अग्रणी राष्ट्र है | टीकाकरण के अभियान में राज्य सरकारों की सहभागिता की चर्चा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उसकी कीमतों के निर्धारण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी | इसी बीच ये मांग भी उठ खडी हुई है कि कोरोना की वजह से चूँकि समाज के प्रत्येक वर्ग को जबरदस्त मानसिक , आर्थिक और शारीरिक परेशानी उठानी पड़ रही है इसलिए बेहतर होगा वैक्सीन लगाने संबंधी पूरा खर्च सरकार वहन  करे | बिहार चुनाव में भाजपा ने अपने  घोषणापत्र में जब इसकी घोषणा की थी तब ये प्रश्न उठा था कि  अन्य राज्यों के निवासी भी तो मतदाता हैं | और तब केंद्र के साथ ही  अनेक राज्य सरकारों की तरफ से निःशुल्क वैक्सीन का आश्वासन दिया गया था | अब जबकि वैक्सीन उपलब्ध होने जा रही है तब ये जरूरी हो गया है कि केंद्र और राज्य मिलकर इस बारे में नीतिगत घोषणा करते हुए आम जनता के मन में व्याप्त अनिश्चितता और भय को दूर करें | वैसे भी एक वर्ग ऐसा है जो सरकारी वैक्सीन के इन्तजार में बैठने की बजाय अपने खर्च से उसे खरीद लेगा | केन्द्रीय स्वास्थ्य  मंत्री डा. हर्षवर्धन तो पहले ही कह चुके हैं कि पूरे देश को वैक्सीन लगाते - लगाते अगले साल का जुलाई महीना आ जाएगा | उनकी बात काफी हद तक सही है क्योंकि 138 करोड़ जनता का टीकाकरण छोटा काम नहीं है | इसलिए ध्यान देने योग्य बात ये है कि  वैक्सीन की खुले बाजार में उपलब्धता रहे और वह कालाबाजारी और मुनाफाखोरी के चंगुल में न फंस जाये | दूसरी तरफ वैक्सीन लगाने के अभियान में सरकारी ढर्रा बाधा न बने | लेकिन इसी के साथ सबसे ज्यादा जरूरत है कोरोना संक्रमण की वापिसी को रोकना | उल्लेखनीय है अमेरिका , ब्रिटेन , फ्रांस और इटली जैसे विकसित देशों में कोरोना की दूसरी लहर ने कहर  बरपा रखा है | नित्यप्रति बड़ी संख्या में  नए संक्रमित सामने आने से चिकित्सा प्रबंध गड़बड़ा गये हैं | अमेरिका में तो रिकॉर्ड संख्या में मौतें  हो रही हैं | वहीं अपनी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के लिए विश्व प्रसिद्ध इटली के अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ने लगे हैं | भारत के बारे में भी ऐसी ही आशंका व्यक्त की जा रही थी | दीपावली के बाद अचानक से कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ा भी लेकिन जैसा कि सरकारी आंकड़े बता रहे हैं उनके अनुसार बीते एक सप्ताह में कोरोना का फैलाव फिर नियंत्रण में आ रहा है और अस्पताल से स्वस्थ होकर घर लौटने वालों की संख्या नए संक्रमितों से ज्यादा होने से ये उम्मीद बढ़ी है कि दूसरी लहर का प्रकोप शायद आशंका जितना न रहे | लेकिन ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि सर्दियों का मौसम कोरोना के प्रारम्भिक लक्षणों के लिए काफी अनुकूल है और ऐसे में विशेष रूप से पहले से बीमार चल रहे बुजुर्गों के स्वास्थ्य के प्रति सतर्कता रखी जानी चाहिए | प्रधानमन्त्री ने भी इस बारे में आगाह किया है | इस बारे में एक बात पक्के तौर पर समझ लेनी होगी कि वैक्सीन लगने के बाद भी कम से कम आने वाले एक साल तक मास्क और  सैनिटाइजर के उपयोग के अलावा शारीरिक दूरी बनाये रखने के प्रति अनुशासित रहना होगा क्योंकि कोरोना एक वायरस है जो दोबारा नहीं आयेगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता | दुनिया के अनेक देश कोरोना की पहली लहर के ठंडे  पड़ने के बाद खुशफहमी के शिकार होकर धोखा खा चुके हैं |

-रवीन्द्र वाजपेयी